حصن المسلم من أذكار الكتاب والسنة

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हिस्न अल-मुस्लिम (क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ)

Language: lang_hi
Prepared by: सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हत़ानी
Version: 5.0
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हिस्न अल-मुस्लिम (क़ुरआन एवं हदीस की दुआएँ)

अल्लाह का मोहताज

डॉक्टर सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-क़हतानी

अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं अति दयावान् है

भूमिका

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह की है। हम उसी की प्रशंसा एवं स्तुति करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमायाचना करते हैं। हम अपनी आत्माओं और अपने कर्मों की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। वह जिसका मार्गदर्शन करे, उसे कोई पथ-भ्रष्ट नहीं कर सकता, और जिसे वह पथभ्रष्ट करे, उसका कोई मार्गदर्शक नहीं हो सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई शरीक नहीं। तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे एवं उसके रसूल हैं। उनपर, उनके परिजनों पर और उनके साथियों पर, अल्लाह की अपार कृपा एवं शांति की बरखा बरसे। तत्पश्चात :

यह संक्षिप्त पुस्तक दरअसल मेरी कितबा "अज़-ज़िक्र वद-दुआ वल-इलाज बिर-रुक़ा मिनल-किताब वस-सुन्नह" [1] का सार रूप है, जिसमें उसके अज़कार वाले भाग को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि उसे यात्रा के दौरान आसानी से साथ रखा जा सके। [1] असल किताब, उसमें उल्लिखित हदीसों के संदर्भों के विस्तृत रूप से उल्लेख के साथ चार खंडों में छप चुकी है। उसके प्रथम एवं द्वितीय खंड में "हिस्न अल-मुस्लिम" मौजूद है।

मैंने अपनी इस पुस्तक में केवल हदीस के मत्न (पाठ) को नक़ल किया है, और असल पुस्तक में उल्लिखित उसके संदर्भों में से महज़ एक-दो संदर्भ का उल्लेख किया है। जो वर्णन करने वाले सहाबी एवं अधिक संदर्भों से अवगत होना चाहे, उसे असल किताब का अध्ययन करना चाहिए। मैं सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से, उसके सुंदर नामों एवं उच्च गुणों के वसीले से दुआ करता हूँ कि इस पुस्तक को अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन बनाए, उसे मेरे जीवन में तथा मेरी मृत्यु के बाद मेरे साथ-साथ उसके पाठकों, प्रकाशकों और इस कार्य में सहयोग करने वाले सभी लोगों के लिए लाभदायक बनाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सारे कार्य वही करता है और इनकी शक्ति भी वही रखता है। अल्लाह की कृपा तथा शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिजनों, साथियों तथा क़यामत के दिन तक निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।

लेखक

इन शब्दों को सफ़र 1409 हिजरी में लिखा गया है।

ज़िक्र का महत्व

अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "अतः, तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा और मेरे आभारी रहो तथा मेरे कृतघ्न न बनो।" [2] [2] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 152

"हे ईमान वालो, अल्लाह को बहुत ज्यादा याद करते रहो।" [3] [3] सूरा अल-अह़ज़ाब, आयत संख्या : 41

"तथा अल्लाह को अत्याधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह ने इन्हीं के लिए क्षमा तथा महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।" [4] [4] सूरा अल-अह़ज़ाब, आयत संख्या : 35

"और (हे नबी!) अपने पालनहार का स्मरण विनय पूर्वक तथा डरते हुए और धीमे स्वर में प्रातः तथा संध्या करते रहो और उन लोगों में से न हो जाओ, जो अचेत रहते हैं।" [5] [5] सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 205

तथा अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "उस व्यक्ति का उदाहरण जो अपने रब को याद करता हो और जो अपने रब को याद न करता हो, जीवित और मृत की तरह है।"[6] [6] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/208, हदीस संख्या : 6407 तथा सहीह मुस्लिम 1/539, हदीस संख्या : 779। सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "उस घर का उदाहरण जिसमें अल्लाह को याद किया जाए और उस घर का उदाहरण जिसमें अल्लाह को याद न किया जाए, ऐसे है, जैसे जीवित और मृत।"

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "क्या मैं तुम्हें तुम्हारा सबसे उत्तम कार्य न बताऊँ, जो तुम्हारे प्रभु के निकट सबसे ज़्यादा सराहनीय, तुम्हारे दरजे को सबसे ऊँचा करने वाला, तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी दान करने से बेहतर तथा इस बात से भी बेहतर है कि तुम अपने शत्रु से भिड़ जाओ और तुम उनकी गर्दन मार दो और वह तुम्हारी गर्दन मार दें?" सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल! तो फ़रमाया : "अल्लाह का ज़िक्र करना, जो उच्च एवं महान है।" [7] [7] सुनन तिरमिज़ी 5/459, हदीस संख्या : 3377 तथा सुनन इब्न माजा 2/124, हदीस संख्या : 3790। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/316 तथा सुनन तिरमिज़ी 3/139।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बंदे के साथ वही करता हूँ, जो वह मेरे बारे में गुमान रखता है, तथा जब वह मुझे याद करता है, तो मैं उसके साथ होता हूँ। अगर वह मुझे अपने नफस में याद करता है, तो मैं भी उसे अपने नफस में याद करता हूँ। अगर वह मुझे लोगों के बीच याद करता है, तो मैं उसे ऐसे लोगों में याद करता हूँ, जो उनसे अच्छे हैं। अगर वह मुझसे एक बित्ता क़रीब आता है, तो मैं उससे एक हाथ क़रीब आता हूँ और अगर वह मुझसे एक हाथ क़रीब आता है, तो मैं उससे दोनों हाथों को फैलाकर जितनी दूरी बनती है, उतना क़रीब आता हूँ और अगर वह मेरे पास चलकर आता है, तो मैं उसके पास दौड़ कर आता हूँ।" [8] [8] सहीह बुख़ारी 8/171, हदीस संख्या : 7405 तथा सहीह मुस्लिम 4/2061, हदीस संख्या : 2675। शब्द सहीह बुख़ारी के हैं।

अब्दुल्लाह बिन बुस्र- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे सामने इस्लाम के बहुत सारे अहकाम (विधान) मौजूद हैं। अतः, आप मुझे कोई ऐसा व्यापक कार्य बता दें, जिसे मैं मज़बूती से पकड़ लूँ। आपने फ़रमाया : “तुम्हारी ज़बान हमेशा अल्लाह के ज़िक्र से तर रहे।” [9] [9] सुनन तिरमिज़ी 5/458, हदीस संख्या : 3375 तथा सुनन इब्न-माजा 2/1246,3793। अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/139 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/317 में सहीह कहा है।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने अल्लाह की किताब का एक अक्षर पढ़ा, उसके बदले में उसे एक नेकी मिलेगी और अल्लाह यहाँ एक नेकी का बदला दस गुना मिलता है। मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़, लाम, मीम एक अक्षर है। बल्कि अलिफ़ एक अक्षर है, लाम एक अक्षर है और मीम एक अक्षर है।" [10] [10] सुनन तिरमिज़ी 5/175, हदीस संख्या : 2910, अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/9 और सहीह अल-जामे अस-सग़ीर 5/340 में सहीह कहा है।

उक़बा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं : हम लोग सुफ़्फ़ा में उपस्थित थे कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- निकले और फरमाया : "तुममें से कौन यह पसंद करता है कि प्रत्येक सुबह बुतहान या अक़ीक़ जाए और बिना कोई गुनाह किए या किसी रिश्तेदार का हक़ मारे दो ऊँचे कोहान वाले ऊँट ले आए? हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! हममें से हर व्यक्ति को यह पसंद है। तब फ़रमाया : "तुममें से कोई यदि मस्जिद जाए और सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की किताब की दो आयतें सीखे या पढ़े, तो यह उसके लिए दो ऊँटों से बेहतर है। यदि तीन आयतें सीखता या पढ़ता है तो तीन उँटों से बेहतर है, और यदि चार आयतें सीखता या पढ़ता है चार ऊँटों से बेहतर है। इस प्रकार जितनी आयतें वह सीखता या पढ़ता जाएगा, वह उतने ऊँटों से बेहतर होगा।" [11] [11] सहीह मुस्लिम, 1/553, हदीस संख्या : 803।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो किसी जगह बैठा और वहाँ अल्लाह को याद न किया, तो वह बैठना उसके लिए अल्लाह की ओर से पछतावे का कारण बनेगा, और जो किसी जगह लेटा और वहाँ अल्लाह को याद न किया, तो उसका वह लेटना उसके लिए अल्लाह की ओर से पछतावे का कारण बनेगा।" [12] [12] सुनन अबू दाऊद 4/264, हदीस संख्या : 4856, आदि, और देखिए : सहीह अल-जामे 5/342 ।

और आप-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-ने फ़रमाया : "जो लोग किसी सभा में बैठते हैं और वहाँ अल्लाह को याद नहीं करते तथा अपने नबी पर दरूद नहीं भेजते, तो उनका वह बैठना उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा। अब यदि अल्लाह चाहेगा, तो उन्हें यातना देगा और चाहेगा तो माफ़ करेगा।" [13]। [13] सुनन तिरमिज़ी 5/461। हदीस संख्या : 3380। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/140 ।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो लोग किसी सभा से अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उठ जाते हैं, वे जैसे मरे हुए गधे के पास से उठते हैं और यह उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा।" [14] [14] सुनन अबू दाऊद 4/264, हदीस संख्या : 4855 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/389, हदीस संख्या : 10680। देखिए : सहीह अल-जामे 5/176 ।

1- नींद से जागने के अज़कार

"सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें मृत्यु के पश्चात जीवन दिया और उसी की ओर लौटकर जाना है।" [15] [15] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6314 और सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2711 ।

अल्ह़म्दु लिल्लाहि अल्लज़ी अह़्याना बअद मा अमातना, व इलैहि अन्नुशूर

"अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, पूर्ण स्वामित्व बस उसी को प्राप्त है, सारी प्रशंसा उसी के लिए है और वह हर चीज़ करने में सक्षम है। अल्लाह पाक है समस्त प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं, और अल्लाह के सिवा कोई भी सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है और उच्च एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त न किसी के पास भलाई के मार्ग पर लगाने की शक्ति है, न बुराई से रोकने की क्षमता। हे मेरे प्रभु! मुझे क्षमा कर दे।"[16] [16] जिसने यह दुआ पढ़ी, उसे क्षमा कर दिया जाएगा। उसके बाद यदि अल्लाह से कुछ माँगा, तो उसकी माँग पूरी की जाएगी। फिर यदि उठकर वज़ू किया और नमाज़ पढ़ी, तो उसकी नमाज़ क़बूल कर ली जाएगी। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/39, हदीस संख्या : 1154 आदि। शब्द इब्न-ए-माजा के हैं। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/335।

ला इलाह इल्लल्लाहु वह़दहू ला शरीक लहू, लहुल मुल्कु वलहुल ह़म्दु, व'हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, सुब्ह़ानल्लाहि, वल्ह़म्दु लिल्लाहि, वला इलाह इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबर, वला ह़ौल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम, रब्बिग़फ़िर ली

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे शारीरिक रूप से स्वस्थ रखा, मुझे मेरा प्राण लौटा दिया और मुझे अपने ज़िक्र की अनुमति दी।" [17] [17] सुनन तिरमिज़ी 5/473। हदीस संख्या : 3401। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/144।

अल्ह़म्दु लिल्लाहि अल्लज़ी आफ़ानी फ़ी जसदी, व-रद्दा अलैय्या रूह़ी, व-अज़ि'ना ली बिज़िक्रिह

"वस्तुतः आकाशों तथा धरती की रचना और रात्रि तथा दिवस के एक के पश्चात् एक आते-जाते रहने में, मतिमानों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं। जो खड़े, बैठे तथा सोए (प्रत्येक स्थिति में,) अल्लाह को याद करते तथ आकाशों और धरती की रचना में विचार करते रहते हैं। (कहते हैं :) हे हमारे पालनहार! तू ने यह सब व्यर्थ नहीं रचा है। हमें अग्नि के दंड से बचा ले। हे हमारे पालनहार! तू ने जिसे नरक में झोंक दिया, उसे अपमानित कर दिया और अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा। हे हमारे पालनहार! हमने एक पुकारने वाले को ईमान के लिए पुकारते हुए सुना कि अपने पालनहार पर ईमान लाओ, तो हम ईमान ले आए। हे हमारे पालनहार! हमारे पाप क्षमा कर दे तथा हमारी बुराइयों को अनदेखी कर दे तथा हमारी मौत पुनीतों (सदाचारियों) के साथ हो। हे हमारे पालनहार! हमें, तू ने रसूलों द्वारा जो वचन दिया है, हमें वो प्रदान कर तथा क़यामत के दिन हमें अपमानित न कर। वास्तव में तू वचन विरोधी नहीं है। तो उनके पालनहार ने उनकी (प्रार्थना) सुन ली, (तथा कहा कि) निःसंदेह मैं किसी कार्यकर्ता के कार्य को व्यर्थ नहीं करता, नर हो अथवा नारी। तो जिन्होंने हिजरत (प्रस्थान) की, अपने घरों से निकाले गए, मेरी राह में सताए गए और युद्ध किया तथा मारे गए, तो हम अवश्य उनके दोषों को क्षमा कर देंगे तथा उन्हें ऐसे स्वर्गों में प्रवेश देंगे, जिनमें नहरें बह रही हैं। यह अल्लाह के पास से उनका प्रतिफल होगा और अल्लाह ही के पास अच्छा प्रतिफल है। (ऐ नबी!) नगरों में काफ़िरों का (सुविधा के साथ) चलना-फिरना आपको धोखे में न डा दे। यह तनिक लाभ है। फिर उनका स्थान नरक है और वह क्या ही बुरा आवास है! परन्तु जो अपने पालनहार से डरे, तो उनके लिए ऐसे स्वर्ग हैं, जिनमें नहरें प्रवाहित हैं। उनमें वे सदावासी होंगे। यह अल्लाह के पास से अतिथि सत्कार होगा तथा जो अल्लाह के पास है, पुनीतों के लिए उत्तम है। और निःसंदेह अह्ले किताब (अर्थात यहूद और ईसाई) में से कुछ ऐसे भी हैं, जो अल्लाह पर तथा तुम्हारी ओर जो उतारा गया है उसपर ईमान रखते हैं, अल्लाह से डरे रहते हैं और उसकी आयतों को थोड़ी-थोड़ी क़ीमतों पर बेचते भी नहीं। उनका बदला उनके रब के पास है। निःसंदेह अल्लाह जल्दी ही हिसाब लेने वाला है। हे ईमान वालो! तुम धैर्य रखो, एक-दूसरे को थामे रखो, जिहाद के लिए तैयार रहो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम अपने उद्देश्य को पहुँचो।" [सूरा आल-ए-इमरान : 190-200] [18] [18] आयतें सूरा आल-ए-इमरान (190-200) की हैं। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/337, हदीस संख्या : 4569 तथा सहीह मुस्लिम 1/530, हदीस संख्या : 256।

2- कपड़ा पहनने की दुआ

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह कपड़ा पहनाया और मुझे कपड़ा प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य..." [19] [19] इसे अबू दाऊद हदीस संख्या : 4023, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3458 और इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3285 ने रिवायत किया है, और अलबानी ने इरवा अल-ग़लील 7/47 में हसन कहा है।

अल्ह़म्दु लिल्लाहि अल्लज़ी कसानी हाज़ा अस़्स़ौब व रज़क़नीहि मिन ग़ैरि हौलिन् मिन्नी व ला क़ुव्वता

3- नया कपड़ा पहनने की दुआ

"ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है कि तू ने मुझे यह कपड़ा पहनाया। मैं तुझसे इस कपड़े की भलाई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी भलाई माँगता हूँ। इसी तरह मैं इसकी बुराई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ।" [20] [20] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 4020, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 1767, बग़वी 12/40 तथा अलबानी की किताब मुख़्तसर शमाइल तिरमिज़ी पृष्ठ : 47।

अल्लाहुम्मा लकल ह़म्दु अन्त कसौतनीहि, अस्अलुक मिन ख़ैरिहि व ख़ैरि मा स़ुनिअ लहू, व अऊज़ु बिका मिन शर्रिहि व शर्रि मा स़ुनिअ लहू

4- नया कपड़ा पहनने वाले को दी जाने वाली दुआ

"तुम इसे पहन कर पुराना करो और इसके बाद तुम्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह नया कपड़ा दे।" [21] [21] सुनन अबू दाऊद 4/41, हदीस संख्या : 4020 तथा देखिए : सहीह अबू दाऊद 2/760।

तुब्ली वयुख़्लिफ़ुल्लाहु तआला

"तुम नया कपड़ा पहनो, प्रशंसनीय जीवन व्यतीत करो और शहीद होकर मरो।" [22] [22] इब्न-ए-माजा 2/1178, हदीस संख्या : 3558 तथा बग़वी 41/12। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/275।

इल्बस जदीदन, वइश ह़मीदन, वमुत शहीदन

5- कपड़ा उतारने की दुआ

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।" [23] [23] सुनन तिरमिज़ी 2/505, हदीस संख्या : 606। देखिए : इरवा अल-ग़लील हदीस संख्या : 50 तथा सहीह अल-जामे 3/203।

बिस्मिल्लाह

6- शौचालय जाने की दुआ

"अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों एवं नापाक जिन्नियों से तेरी शरण माँगता हूँ।" [24] [24] सहीह बुख़ारी 1/45 हदीस संख्या : 142 तथा सहीह मुस्लिम 1/283 हदीस संख्या : 375। शुरू में "अल्लाह के नाम से" की वृद्धि सईद बिन मनसूर से की गई है। देखिए : फ़त्ह अल-बारी 1/244।

[बिस्मिल्लाह], अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल ख़ुब्स़ि वल ख़बाइस़

7- शौचालय से निकलने की दुआ

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी क्षमा का प्रार्थी हूँ।" [25] [25] इसे नसई के अतिरिक्त सुनन के तीनों संकलनकर्ताओं यानी अबू दाऊद ने हदीस संख्या : 30, तिरमिज़ी ने हदीस संख्या : 7 और इब्न-ए-माजा ने हदीस संख्या : 300 के तहत रिवायत किया है। इसी तरह नसई ने "अमल अल-यौम वल-लैलह" में हदीस संख्या : 79 के तहत रिवायत किया है और अलबानी ने सहीह सुनन अबू दाऊद 1/19 में सहीह कहा है।

ग़ुफ़रानक

8. वज़ू से पहले की दुआ

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।" [26] [26] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 101, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 397 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 9418। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/122।

बिस्मिल्लाह

9. वज़ू के बाद की दुआ

"मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।" [27] [27] सहीह मुस्लिम 1/209, हदीस संख्या : 234।

अश्हदु अन् ला इलाह इल्लल्लाहु, वह़्दहू ला शरीक लहू, व अश्हदु अन्ना मुह़म्मदन अब्दुहु व रसूलुहू

"ऐ अल्लाह, मुझे बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों में से बना और ख़ूब साफ़-सुथरा रहने वालों में से बना।" [28] [28] सुनन तिरमिज़ी 1/78, हदीस संख्या : 55। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/18।

अल्लाहुम्मज् अल्नी मिनत् तव्वाबीना वज् अल्नी मिनल मुतत़ह्हिरीन

"ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौटकर आता हूँ।" [29] [29] नसई की "अमल अल यौम व अल-लैलह" पृष्ठ : 173। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/135 तथा 3/94।

सुब्ह़ानका अल्लाहुम्मा व बिहम्दिका, अश्हदु अन् ला इलाहा इल्ला अन्ता, अस्तग़फ़िरुकाव अतूबु इलैका

10- घर से निकलने की दुआ

"मैं अल्लाह का नाम लेकर निकलता हूँ। मैंने अल्लाह पर भरोसा किया। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोक सकता है।" [30] [30] सुनन अबू दाऊद 4/325, हदीस संख्या : 5095 तथा तिरमिज़ी 5/490 हदीस संख्या : 3426। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/151।

बिस्मिल्लाहि, तवक्कल्तु अलल्लाहि, व ला ह़ौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह

"ऐ अल्लाह! मैं इस बात से तेरी शरण में आता हूँ कि स्वयं सीधे मार्ग से भटक जाऊँ या कोई मुझे सीधे मार्ग से हटा दे, स्वयं गुनाह में पड़ जाऊँ या कोई मुझे गुनाह में डाल दे, खुद किसी पर अत्याचार करूँ या कोई मुझपर अत्याचार करे, खुद अज्ञानता दिखाऊँ या कोई मेरे साथ अज्ञानतापूर्ण व्यवहार करे।" [31] [31] अबू दाऊद हदीस संख्या : 5094, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3427, नसई हदीस संख्या : 5501 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3884। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/152 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 2/336।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका अन अज़िल्ला, औ उज़ल्ला, औ अज़िल्ला, औ उज़ल्ला, औ अज़्लिमा, औ उज़्लमा, औ अजहला, औ युजहला अलैय्या

11- घर में प्रवेश करने की दुआ

"अल्लाह के नाम के साथ हम अंदर आए और अल्लाह के नाम के साथ हम बाहर निकले तथा अल्लाह ही पर हम ने भरोसा किया जो हमारा पालनहार है।" यह दुआ पढ़ने के बाद अपने घर वालों को सलाम करे। [32] [32] सुनन अबू दाऊद 4/325, हदीस संख्या : 5096। शैख़ बिन बाज़ ने अपनी पुस्तक "तोहफ़ा अल-अख़यार" पृष्ठ : 28 में इसकी सनद को हसन कहा है। जबकि सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 2018) में है : "जब इनसान घर में प्रेवेश करते समय तथा खाना खाते समय अल्लाह का स्मरण करता है, तो शैतान कहता है कि यहाँ तुम्हारे लिए (शैतान के लिए) रात बिताना और रात के भोजन में सम्मिलित होना असंभव होगया।"

बिस्मिल्लाहि वलज्ना, व बिस्मिल्लाहि ख़रज्ना, व अलल्लाहि रब्बिना तवक्कल्ना

12- मस्जिद जाने की दुआ

"ऐ अल्लाह! मेरे हृदय में उजाला कर दे, मेरी ज़बान में उजाला कर दे, मेरे कान में उजाला कर दे, मेरी आँख में उजाला कर दे, मेरे ऊपर उजाला कर दे, मेरे नीचे उजाला कर दे, मेरे दाएँ उजाला कर दे, मेरे बाएँ उजाला कर दे, मेरे आगे उजाला कर दे, मेरे पीछे उजाला कर दे, मेरी अंतरात्मा में उजाला कर दे, मेरे लिए उजाला बड़ा कर दे तथा मेरे लिए उजाला को बहुत बड़ा कर दे और मुझे उजाला प्रदान करदे और मुझे स्वयं उजाला बना दे। ऐ अल्लाह! मुझे उजाला प्रदान कर, मेरे पट्ठों में उजाला कर दे, मेरे मांस में उजाला कर दे, मेरे रक्त में उजाला कर दे, मेरे बालों में उजाला कर दे और मेरी त्वचा में उजाला कर दे।" [33] [33] इन सारे शब्दों के लिए देखिए : सहीह बुख़ारी 11/116, हदीस संख्या : 6316 तथा सहीह मुस्लिम 1/526, 529 और 530, हदीस संख्या : 763।

अल्लाहुम्मज्-अल फ़ी क़ल्बी नूरन, व-फ़ी लिसानी नूरन, व-फ़ी सम्ई नूरन, व-फ़ी बस़री नूरन, व-मिन फ़ौक़ी नूरन, व-मिन तह़ती नूरन, व-अन यमीनी नूरन, व-अन शिमाली नूरन, व-मिन अमामी नूरन, व-मिन ख़ल्फ़ी नूरन, वज्-अल फ़ी नफ़्सी नूरन, व-अअ़ज़िम ली नूरन, व-अज़्ज़िम ली नूरन, वज-अल ली नूरन, वज-अल्नी नूरन, अल्लाहुम्मा अअ़तिनी नूरन, वज-अल फ़ी अस़बी नूरन, व-फ़ी लह़मी नूरन, व-फ़ी दमी नूरन, व-फ़ी शअरी नूरन, व-फ़ी बशरी नूरन

"ऐ अल्लाह! मेरी क़ब्र में उजाला कर दे... और मेरी हड्डियों में उजाला कर दे।" [34] "मेरे उजाले को बढ़ा दे, मेरे उजाले को बढ़ा दे, मेरे उजाले को बढ़ा दे।" [35] "मुझे उजाला ही उजाला प्रदान कर।" [36] [34] सुनन तिरमिज़ी 5/483, हदीस संख्या : 3419। [35] इसे इमाम बुखारी ने अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 695, पृष्ठ : 258 में रिवायत किया है। एवं अलबानी ने सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 538 में इसकी सनद को सहीह कहा है। [36] इसका उल्लेख इब्न-ए-हजर ने फ़त्ह अल-बारी में किया है, और किताब अद-दुआ में उसकी निस्बत इब्न अबू आसिम की ओर किया है। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/118। उन्होंने कहा है : "विभिन्न रिवायतों को मिलाने के बाद पच्चीस चीज़ें एकत्र हो जाती हैं।"

अल्लाहुम्मज्अल ली नूरन फ़ी क़ब्री... व नूरन फ़ी इज़ामी, व ज़िदनी नूरन, व ज़िदनी नूरन, व ज़िदनी नूरन, व हब ली नूरन अला नूरिन

13- मस्जिद में प्रवेश करने की दुआ

पहले अपना दायाँ पाँव अंदर रखेगा [37] और कहेगा : "मैं महान अल्लह, उसके सम्मानित मुख मंडल तथा उसके आद्य सत्ता की शरण में आता हूँ धुतकारे हुए शैतान से।" [38] [37] क्योंकि अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : "सुन्नत यह है कि मस्जिद में प्रवेश करते समय पहले अपना दायाँ पाँव अंदर रखो और बाहर निकलते समय पहले बायाँ निकालो।" इसे हाकिम ने मुसतदरक 1/218 में नक़ल किया है और इमाम मुस्लिम की शर्त पर सहीह कहा है। ज़हबी ने भी उनकी पुष्टि की है। जबकि बैहक़ी ने भी (2/442) में इसे नक़ल किया है और अलबानी ने सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा (5/624, हदीस संख्या : 2478) में हसन कहा है। [38] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 466, देखिए : सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 4591।

अऊज़ु बिल्लाहिल् अज़ीम, व बिवज्हिहिल् करीम, व सुल्तानिहिल् क़दीम, मिनश् शैत़ानिर रजीम «बिस्मिल्लाहि वस़्स़लातु»[39] «वस्सलामु अला रसूलिल्लाह»[40] [39] इसे इब्न अस-सुन्नी ने हदीस संख्या : 88 के तहत सहीह कहा है, और अलबानी ने अष-षमर अल-मुसतताब पृष्ठ : 607 में हसन कहा है। [40] सुनन अबू दाऊद 1/126, हदीस संख्या : 465, देखिए : सहीह अल-जामे 1/528।

अल्लाह के नाम से (आरम्भ करता हूँ), तथा अल्लाह के रसूल पर शांति एवं कल्याण की वर्षा हो। "अल्लाहुम्मा इफ़्तह ली अब्वाबा रह़मतिक"[41] [41] सहीह मुस्लिम 1/494, हदीस संख्या : 713। जबकि सुनन इब्न-ए-माजा में फ़ातिमा -रज़ियल्लाहु अनहा- की हदीस में है : "ऐ अल्लाह मेरे गुनाह क्षमा कर दे और मेरे लिए अपनी दया के द्वार खोल दे।" और इस हदीस के कई शवाहिद (साक्षी हदीसों) के कारण अलबानी ने इसे सही कहा है। देखिए : सहीह इब्न-माजा 1/128-129।

ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी कृपा के द्वार खोल दे।

14- मस्जिद से निकलने की दुआ

"पहला अपना बायाँ पाँव बाहर निकाले।" [42] और कहे : "अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, और दुरूद व सलाम हो अल्लाह के रसूल पर," [42] मुसतदरक हाकिम 1/218, बैहक़ी 2/442। अलबानी ने सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 5/624, हदीस संख्या : 2478 में इसे हसन कहा है। इससे पहले इसके संदर्भों का उल्लेख हो चुका है।

बिस्मिल्लाहि वस्सलातु वस्सलामु अला रसूलिल्लाह ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी कृपा माँगता हूँ,

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका मिन फ़ज़्लिक "ऐ अल्लाह! मुझे दुत्कारे हुए शैतान से सुरक्षित रख।"[43] [43] मस्जिद में प्रवेश के समय पढ़ी जाने वाली दुआ से संबंधित उल्लिखित हदीस की विभिन्न रिवायतों के संदर्भ हदीस क्रम संख्या 20 में देख लीजिए। "ऐ अल्लाह! मुझे धुतकारे हुए शैतान से बचा।" की वृद्धि इब्न-ए-माजा से ली गई है। देखिए : सहीह सुनन इब्न-ए-माजा 1/129।

अल्लाहुम्मा इअ़सिम्नी मिनश् शैत़ानिर रजीम

15- अज़ान के अज़कार

अज़ान सुनने वाला वही कुछ कहे जो अज़ान देने वाला कह रहा हो। अंतर बस यह है कि सुनने वाला "हय्या अलस्सलाह " तथा "हय्या अललफ़लाह" के उत्तर में कहेगा : "अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना ना पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य की क्षमता।" [44] [44] सहीह अल-बुख़ारी 1/152, हदीस संख्या : 611 एवं 613 तथा सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या : 383।

ला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह

इसके साथ यह दुआ भी पढ़े : "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। मैं अल्लाह को प्रभु, मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को रसूल और इस्लाम को धर्म मानकर संतुष्ट हूँ।"[45] [45] सहीह मुस्लिम 1/290, हदीस संख्या : 386।

व अना अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू व अन्ना मुह़म्मदन अब्दुहू व रसूलुहू, रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन, व बिमुह़म्मदिन रसूलन, व बिल इस्लामि दीना (यह दुआ मुअज़्ज़िन के "अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाह" एवं "अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह" कहने के बाद कहे।) [46] [46] इब्न-ए-ख़ुज़ैमा 1/220।

"मुअज़्ज़िन का उत्तर देने के बाद अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजे।" [47] [47] सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या : 384।

इसके साथ यह दुआ भी पढ़े : "ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तू ने उन्हें वचन दिया है। [निश्चय तू वचन नहीं तोड़ता]।" [48] [48] सहीह बुख़ारी 1/152, हदीस संख्या : 614। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग बैहक़ी 10/410 से लिया गया है। इसकी सनद को शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 38 में हसन कहा है।

अल्लाहुम्मा रब्बा हाज़िहिद् दअ़-वतित ताम्मति, वस़-स़लातिल क़ाइमति, आति मुह़म्मदनिल् वसीलति वल-फ़ज़ीलति, वब-अस़्-हु मक़ामम मह़मूदनिल्लज़ी वअ़द्-तहु, [इन्नका ला तुख़्लिफ़ुल मीआद]

अज़ान तथा इक़ामत के बीच अपने लिए दुआ करेगा, क्योंकि इस समय की जाने वाली दुआ रद्द नहीं की जाती। [49] [49] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3594, 3595, सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 525 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 12200। देखिए : इरवा अल-ग़लील 1/262।

16- नमाज़ आरंभ करने की दुआ

"ऐ अल्लाह! मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह! मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।" [50] [50] सहीह बुख़ारी 1/181, हदीस संख्या : 744 तथा सहीह मुस्लिम 1/419, हदीस संख्या : 598।

अल्लाहुम्म बाइद बैनी व-बैना ख़त़ायाया कमा बाअद्ता बैनल-मशरिक़ि वल-मग़रिबि, अल्लाहुम्मा नक़्क़िनी मिन ख़तायाया कमा युनक़्क़स़-स़ौबुल अब्यज़ु मिनद्दनसि, अल्लाहुम्मग़्सिलनी मिन ख़तायाया, बिस़-स़ल्जि वल-माइ वल-बरद।

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र है। हम तेरी प्रशंशा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है और तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।" [51] [51] सही मुस्लिम हदीस संख्या : 399, अबू दाऊद हदीस संख्या : 775, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 243, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 806 तथा नसई : 899, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/177 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 1/135।

सुब्ह़ानका अल्लाहुम्मा व बिह़म्दिका, व तबारकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा ग़ैरुका

"मैंने अपना मुख एकाग्र होकर, उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों तथा धरती की रचना की है और मैं मुश्रिकों में से नहीं हूँ। निश्चय मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी तथा मेरा जीवन-मरण संसार के पालनहार अल्लाह के लिए है, जिसका कोई साझी नहीं तथा मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह तू ही बादशाह है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू मेरा पालनहार है और मैं तेरा बंदा। मैंने अपने प्राण पर अत्याचार किया है और मैं अपने गुनाह का एतराफ़ करता हूँ। अतः, मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे। तेरे सिवा कोई क्षमा करने वाला नहीं है। मुझे सर्वोत्तम व्यवहार का मार्ग दिखा, जो कि तेरे अतिरिक्त कोई और दिखा नहीं सकता। मुझे कुव्यवहार से बचा, जिससे तेरे सिवा कोई बचा नहीं सकता। मैं तेरे आदेश के अनुपालन के लिए तत्पर हूँ और तेरे धर्म के अनुसरण के प्रति उत्साहित हूँ। सारी भलाइयाँ तेरे हाथ में हैं। जबकि बुराई की निसबत तेरी ओर नहीं की जा सकती। मुझे तू ही सामर्थ्य प्रदान करता है और मुझे तेरी ही ओर लौटकर जाना है। तू बड़ी भलाइयों वाला है और तेरी हस्ती बड़ी ऊँची है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी और लौटकर आता हूँ।" [52] [52] सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 771।

वज्जह्तु वज्हिया लिल्लज़ी फ़तरस-समावाति वल-अर्ज़ा हनीफ़न वमा अना मिनल मुश्रिकीन, इन्ना सलाती, व-नुसुकी, व-मह़्याया, व-ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, ला शरीका लहु व-बिज़ालिका उमिर्तु व अना मिनल मुस्लिमीन, अल्लाहुम्मा अन्तल मलिकु ला इलाह इल्ला अन्ता, अन्ता रब्बी व अना अब्दुक, ज़लम्तु नफ़्सी वअ्तरफ़्तु बिज़म्बी फ़ग़्फ़िर ली ज़ुनूबी जमीअन इन्नहु ला यग़्फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्त, वह्दिनी लि-अह़्सनिल अख़्लाक़ि ला यह्दी लि-अह़्सनिहा इल्ला अन्त, वस्रिफ़ अन्नी सय्यिअहा, ला यस्रिफ़ु अन्नी सय्यिअहा इल्ला अन्त, लब्बैक व-सअदैक, वल-ख़ैरु कुल्लुहु बि-यदैक, वश-शर्रु लैस इलैक, अना बिक व-इलैक, तबारक्त व-तआलैत, अस्तग़्फ़िरुक व-अतूबु इलैक

"ऐ अल्लाह! ऐ जिबरील, मीकाईल तथा इसराफ़ील के रब! आकाश तथा धरती को बनाने वाले और हाज़िर और ग़ायब का ज्ञान रखने वाले! तू ही अपने बन्दों के मतभेदों का निर्णय करने वाला है। जिस सत्य के बारे में लोगों में मतभेद हो गया है, उसके बारे में मेरा मार्गदर्शन कर। निश्चय तू जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखाता है।" [53] [53] सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 770।

अल्लाहुम्मा रब्बा जिब्राईला, व मीकाईला, व इसराफ़ीला, फ़ात़िरस्-समावाति वल्-अर्ज़, आलिमल्-ग़ैबि वश्-शहादति अन्ता तह़्कुमु बैना इबादिका फ़ीमा कानू फ़ीहि यख़्तलिफ़ून, इह्दिनी लिमख़्तुलिफ़ा फ़ीहि मिनल्-हक़्क़ि बि-इज़्निक, इन्नका तहदी मन तशाउ इला स़िरातिम्-मुस्तक़ीम

"अल्लाह बहुत बड़ा है, अल्लाह बहुत बड़ा है, अल्लाह बहुत बड़ा है। अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है, अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है, अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है। मैं सुबह एवं शाम अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।"

अल्लाहु अकबरु कबीरन, अल्लाहु अकबरु कबीरन, अल्लाहु अकबरु कबीरन, वल ह़म्दु लिल्लाहि कस़ीरन, वल ह़म्दु लिल्लाहि कस़ीरन, वल ह़म्दु लिल्लाहि कस़ीरन, व सुब्हानल्लाहि बुक्रतन व असीला तीन बार "मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ शैतान के अभिमान, उसकी बुराई और उसके उन्माद से।"[54] [54] सुनन अबू दाऊद 1/203, हदीस संख्या : 764, इब्न-ए-माजा 1/265, हदीस संख्या : 807 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/85, हदीस संख्या : 16739, शोऐब अरनाऊत ने इसे इसकी विभिन्न सनदों को मिलाकर हसन कहा है, जबकि अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इब्न-ए-तैमिया की किताब "अल-कलिम अत-तय्यिब" की हदीसों के संदर्भों का उल्लेख करते समय इसे इस अर्थ की अन्य रिवायतों के आधार पर सहीह कहा है। इसी तरह अलबानी ने इसे "सहीह अल-कलिम अत-तय्यिब" में हदीस संख्या : 62 के तहत दर्ज किया है। इसी तरह इमाम मुस्लिम ने अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से इसी आशय की एक हदीस नक़ल की है, जिसमें एक घटना भी है। देखिए : सहीह मुस्लिम 1/420, हदीस संख्या : 601।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानि: मिन नफ़्ख़िहि, व नफ़्स़िहि, व हम्ज़िहि

"ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है [55] कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का प्रकाश है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का संरक्षक है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का पालनहार है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का प्रभु है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू आकाशों एवं धरती तथा उनके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का शासक है। सारी प्रशंसा तेरी है कि तू सत्य है, तेरा वचन सत्य है, तेरा कथन सत्य है, तुझसे मिलना सत्य है, जन्नत सत्य है, जहन्नम सत्य है, सारे नबी-गण सत्य हैं, मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सत्य हैं और क़यामत सत्य है। ऐ अल्लाह! मैंने तेरे आगे सिर झुकाया, तेरे ऊपर भरोसा किया, तुझपर ईमान रखा, तुझसे नाता जोड़ा, तेरे ज़रिए वाद-विवाद किया और अपने सारे मामलों को तेरे सामने रखा। अतः, मैंने जो भी बुरे कर्म किए, जो भी अच्छे कर्म छोड़े, जो कुछ छुपा कर किया और जिसे तू मुझसे अधिक जानता है, उन सब को माफ़ कर दे। तू ही आगे करने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू मेरा पूज्य है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अल्लाह की तौफीक के बिना न किसी के पास अच्छा काम करने की क्षमता है और न बुरे काम से बचने की शक्ति है।" [56] [55] नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब रात में तहज्जुद के लिए उठते, तो यह दुआ पढ़ते थे। [56] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/3, 11/116, 13/371, 423 तथा 465, हदीस संख्या : 1120, 6317, 7385, 7442 तथा 7499। इमाम मुस्लिम ने भी संक्षिप्त रूप से इसी जैसी हदीस रिवायत की है। देखिए : 1/532, हदीस संख्या : 769।

अल्लाहुम्मा लकल ह़म्दु, अन्ता नूरुस-समावाति वल-अर्ज़ि वमन फ़ीहिन्ना, व-लकल ह़म्दु अन्ता क़य्यिमुस-समावाति वल-अर्ज़ि वमन फ़ीहिन्ना, [व-लकल ह़म्दु अन्ता रब्बुस-समावाति वल-अर्ज़ि वमन फ़ीहिन्ना], [व-लकल ह़म्दु लका मुल्कुस-समावाति वल-अर्ज़ि वमन फ़ीहिन्ना], [व-लकल ह़म्दु अन्ता मलिकुस-समावाति वल-अर्ज़ि], [व-लकल ह़म्दु], [अन्तल् ह़क़्क़ु, व वअ़दुकल हक़्क़ु, व क़ौलुकल हक़्क़ु, व लिक़ाउकल हक़्क़ु, वल-जन्नतु हक़्क़ुन, वन-नारु हक़्क़ुन, वन-नबिय्यूना हक़्क़ुन, व मुह़म्मदुन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हक़्क़ुन, वस-साअतु हक़्क़ुन], [अल्लाहुम्मा लका अस्लम्तु, व अलैका तवक्कल्तु, व बिका आमन्तु, व इलैका अनब्तु, व बिका ख़ास़म्तु, व इलैका हाकम्तु, फ़ग़्फ़िर ली मा क़द्दम्तु, व मा अख़्ख़र्तु, व मा असरर्तु, व मा अअ्लन्तु], [व मा अन्ता अअ्लमु बिही मिन्नी], [अन्तल मुक़द्दिमु, व अन्तल मुअख़्ख़िरु ला इलाहा इल्ला अन्त], [अन्ता इलाही ला इलाहा इल्ला अन्त], [वला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह]

17- रुकू की दुआ

«सुब्हाना रब्बियल अज़ीम»।

मेरा महान् रब (पालनहार) सर्वथा पवित्र है। तीन बार। [57] [57] अबू दाऊद हदीस संख्या : 870, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 262, नसई हदीस संख्या : 1007, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 897 तथा अहमद हदीस संख्या : 3514, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/83।

"ऐ अल्लाह! तू पाक है। ऐ हमारे पालनहार! तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।" [58] [58] सहीह बुख़ारी 1/99 हदीस संख्या : 794 तथा सहीह मुस्लिम 1/350 हदीस संख्या : 484।

सुब्ह़ानका अल्लाहुम्मा रब्बना व बिह़म्दिका, अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।" [59] [59] सहीह मुस्लिम 1/353 हदीस संख्या : 487 तथा अबू दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 872।

सुब्बूह़ुन, क़ुद्दूसुन, रब्बुल मलाइकति वर्रूह़

"ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रुकू किया, तुझपर ईमान रखा और तेरे आगे सिर झुकाया। तेरे सामने नत्मस्तक हुआ मेरा कान, मेरी आँख, मेरा विवेक, मेरी हड्डी, मेरा पट्ठा और मेरा पूरा शरीर।"[60] [60] सहीह मुस्लिम 1/534 हदीस संख्या : 771, अबू दाऊद हदीस संख्या : 760 तथा 761, तिरमिज़ी हदीस संख्या 3421 और नसई हदीस संख्या : 1049। दोनों कोष्ठकों के बीच के शब्द इब्न-ए-खुज़ैमा हदीस संख्या : 607 तथा इब्न-ए-हिब्बान हदीस संख्या : 1901 से लिए गए हैं।

अल्लाहुम्मा लका रकअ़तु, व-बिका आमन्तु, व-लका अस्लम्तु, ख़'श'अ लका सम्ई, व-बस़री, व-मुख़्ख़ी, व-अज़्मी, व-अस़बी, [व-मस्तक़ल्लत बिहि क़दमी]

"पवित्र है वह अल्लाह, जो प्रबलता , प्रभुत्व , महानता और विशालता से विसेषित है।" [61] [61] सुनन अबू दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 873, सुनन नसई हदीस संख्या : 1131 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 23980। इसकी सनद हसन है।

सुब्ह़ाना ज़िल-जबरूति, वल-मलकूति, वल-किब्रियाई, वल-अज़मति

18- रुकू से उठाने की दुआ

"अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।" [62] [62] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/282, हदीस संख्या : 796।

समिअल्लाहु लिमन ह़मिदह

"ऐ हमारे रब, तेरी ही प्रशंसा है, अत्यधिक, पवित्र तथा बरकत वाली प्रशंसा।" [63] [63] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 2/284, हदीस संख्या : 796।

रब्बना व-लकल ह़म्दु, ह़म्दन कस़ीरन त़य्यिबन मुबारकन फ़ीह

"आकाशों एवं धरती, उन दोनों के बीच की सारी चीज़ों और इसके बाद तू जो कुछ चाहे, उसकी समाई के बराबर। ऐ प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा के मालिक! तू बंदे की प्रशंसा का सबसे अधिक हक़दार है और हम सब तेरे बंदे हैं। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।" [64] [64] सहीह मुस्लिम 1/346, हदीस संख्या : 477।

मिल्अस-समावाति व मिल्अल-अर्ज़ि, व मा बैनहुमा, व मिल्अ मा शिअता मिन शैइन् बअदु. अहलस़-स़नाइ वल-मज्दि, अह़क़्क़ु मा क़ालल-अब्दु, व कुल्लुना लका अब्दुन, अल्लाहुम्मा ला मानिआ लिमा अअ़त़ैता, व ला मुअत़िया लिमा मनअ़ता, व ला यन्फ़उ ज़ल-जद्दि मिन्कल-जद्द

19- सजदे की दुआ

«सुब्ह़ाना रब्बियल अअ्ला» यानी मेरा उच्च एवं महान पालनहार पवित्र है।

सुब्ह़ाना रब्बियल आला तीन बार। [65] [65] अबू दाऊद हदीस संख्या : 870, तिरमिज़ी : 262, नसई हदीस संख्या : 1007, इब्न-ए-माज़ा हदीस संख्या : 897 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 3514, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/83।

"ऐ अल्लाह! तू पाक है। ऐ हमारे पालनहार! तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।" [66] [66] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 794 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 484। यह हदीस पीछे हदीस क्रमांक 34 के तहत गुज़र चुकी है।

सुब्ह़ानका अल्लाहुम्मा रब्बना व बिह़म्दिका, अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली

"ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।" [67] [67] सहीह मुस्लिम 1/533 हदीस संख्या : 487 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 872। यह हदीस इससे पहले हदीस क्रमांक 35 के तहत गुज़र चुकी है।

सुब्बूह़ुन, क़ुद्दूसुन, रब्बुल मलाइकति वर्रूह़

"ऐ अल्लाह! मैंने तेरे सामने सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरे सामने नत्मस्तक हुआ। मेरा चेहरा उसके लिए सजदे में गया, जिसने उसे पैदा किया, उसे आकृति दी और उसकी सुनवाई और उसकी दृष्टि के लिए जगह बनाया । बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, जो सबसे अच्छा उत्पत्तिकार है।" [68] [68] सहीह मुस्लिम 1/534 हदीस संख्या : 771 आदि।

अल्लाहुम्मा लका सजद्तु व-बिका आमन्तु, व-लका अस्लम्तु, स'ज'द वज्हिया लिल्लज़ी ख़'ल'क़'हु, व-स़व्वरहु, व-शक़्क़ा सम्अहु व-बस़रहु, तबारकल्लाहु अह़्सनुल ख़ालिक़ीन

"पवित्र है वह अल्लाह, जो प्रबलता , प्रभुत्व , महानता और विशालता से विसेषित है।" [69] [69] अबूद दाऊद 1/230 हदीस संख्या : 873, नसई हदीस संख्या : 1131 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 23980। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/166 में सहीह कहा है। इसके संदर्भों का उल्लेख इससे पहले हदीस संख्या 37 के तहत हो चुका है।

सुब्ह़ाना ज़िल जबरूति, वल मलकूति, वल किब्रियाइ, वल अज़मति

"ऐ अल्लाह! तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा खुले एवं छुपे सभी को।" [70] [70] सहीह मुस्लिम 1/230 हदीस संख्या : 483।

अल्लाहुम्म् इग़्फ़िर ली ज़म्बी कुल्लहु: दिक़्क़हु व जिल्लहु, व अव्वलहु व आख़िरहु, व अलानिय्यतहु व सिर्रहु

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी समपूर्ण प्रशंसा नहीं कर सकता। तू वैसा ही है, जैसा तूने अपनी प्रशंसा स्वयं की है।" [71] [71] सहीह मुस्लिम 1/352 हदीस संख्या : 486।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिरिज़ाका मिन सख़त़िका, व-बिमुआफ़ातिका मिन उक़ूबतिका, व-अऊज़ु बिका मिन्का, ला उहस़ी स़नाअन अलैका, अन्ता कमा अस़नैता अला नफ़्सिक।

20- दो सजदों के बीच बैठने की अवस्था में पढ़ी जाने वाली दुआ

"ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे।" [72] [72] सुनन अबू दाऊद 1/231 हदीस संख्या : 874 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 897। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/148।

रब्बिग़्फ़िर ली, रब्बिग़्फ़िर ली

"ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा, मेरी चारागरी कर, मुझे हर विपत्ति से सुरक्षित रख, मुझे रोज़ी प्रदान कर और मुझे ऊँचा कर दे।" [73] [73] सुनन अबू दाऊद 1/231 हदीस संख्या : 850, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 284 तथा 285 और सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 898। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/90 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 1/148।

अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली, वर्ह़म्नी, वह्दिनी, वज्बुर्नी, व-आफ़िनी, वर्ज़ुक़्नी, वर्फ़अनी

21- सजदा-ए-तिलावत की दुआ

"मेरे चेहरे ने उसके सामने सजदा किया, जिसने उसे पैदा किया तथा अपने सामर्थ्य एवं शक्ति के बल पर उसकी सुनवाई और उसकी दृष्टि के लिए जगह बनाया। बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, जो सबसे अच्छा पैदा करने वाला है।"

स'ज'द वज्हिया लिल्लज़ी ख़'ल'क़'हु, व-शक़्क़ा सम्अ़हु व-बस़रहु बिह़ौलिहि व-क़ुव्वतिहि, फ़-तबारकल्लाहु अह़्सनुल ख़ालिक़ीन [सूरा मोमिनून : 14] [74]. [74] सुनन तिरमिज़ी 2/474, हदीस संख्या : 3425, मुसनद-ए-अहमद 6/30, हदीस संख्या : 24022 और मुसतदरक हाकिम 1/220। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनके कथन से सहमति व्यक्त की है। वृद्धि वाला भाग मुसतदरक हाकिम ही से लिया गया है। जबकि आयत सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्या : 14 से ली गई है।

"ऐ अल्लाह! तू अपने यहाँ मेरे लिए इस सजदे का प्रतिफल लिख ले, इसके बदले में मेरा गुनाह मिटा दे, इसे अपने यहाँ मेरा कोश बना दे और इसे मेरी ओर से उसी तरह ग्रहण कर ले, जैसे अपने बंदे दाऊद की ओर से ग्रहण किया था।" [75] [75] सुनन तिरमिज़ी 2/473 तथा हाकिम 1/219। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनके कथन की पुष्टि की है।

अल्लाहुम्मा उक्तुब ली बिहा इन्दका अज्रन, व-ज़अ् अन्नी बिहा विज़्रन, वज्अल्हा ली इन्दका ज़ुख़्रन, व-तक़ब्बल्हा मिन्नी कमा तक़ब्बल्तहा मिन अब्दिका दावूद

22- तशह्हुद

"हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उस के रसूल हैं।" [76] [76] सहीह बुख़ारी 2/311, हदीस संख्या : 831 तथा मुस्लिम 1/301, हदीस संख्या : 402।

अत्तह़िय्यातु लिल्लाहि, वस़्स़लवातु, वत़्त़य्यिबातु, अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु व रह़मतुल्लाहि व बरकातुहु, अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस़्स़ालिह़ीन, अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्ना मुह़म्मदन अब्दुहु व रसूलुह

23- तशह्हुद के बाद अल्लाह के नबी-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-पर दरूद

"हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।" [77] [77] बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/408, हदीस संख्या : 3370 तथा मुस्लिम : 406।

अल्लाहुम्मा स़ल्लि अला मुह़म्मदिन, व अला आलि मुह़म्मदिन, कमा स़ल्लैता अला इब्राहीमा, व अला आलि इब्राहीमा, इन्नका ह़मीदुन मजीद, अल्लाहुम्मा बारिक अला मुह़म्मदिन व अला आलि मुह़म्मदिन, कमा बारकता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीमा, इन्नका ह़मीदुन मजीद

"ऐ अल्लाह! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की और उनकी पत्नियों तथा संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जैसे इबराहीम -अलैहिस्सलाम- की संतान-संतति की प्रशंसा की है। निश्चय ही, तू प्रशंसायोग्य और सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आपकी पत्नियों तथा संतान-संतति में उसी प्रकार बरकत दे, जैसे इबराहीम -अलैहिस्सलाम- के अंदर बरकत रखी थी। निश्चय ही, तू प्रशंसा-योग्य और सम्मानित है।" [78]। [78] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/407, हदीस संख्या : 3369, तथा मुस्लिम 1/306, हदीस संख्या : 407। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

अल्लाहुम्मा स़ल्लि अला मुह़म्मदिन व अला अज़वाजिही व ज़ुर्रिय्यतिही, कमा स़ल्लैता अला आलि इब्राहीमा, व बारिक अला मुह़म्मदिन व अला अज़वाजिही व ज़ुर्रिय्यतिही, कमा बारक्ता अला आलि इब्राहीमा, इन्नका ह़मीदुन मजीद

24- अंतिम तशह्हुद के बाद सलाम से पहले की दुआ

"हे अल्लाह! मैं तेरी शरण चाहता हूँ, क़ब्र के अज़ाब से, नरक की यातना से, क़ब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फितने से और मसीह दज्जाल के फितने से।" [79] [79] सहीह बुख़ारी 2/102, हदीस संख्या : 1377 तथा मुस्लिम 1/412, हदीस संख्या : 588, शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल क़ब्रि, व मिन अज़ाबि जहन्नमा, व मिन फ़ित्नतिल मह़्या वल-ममाति, व मिन शर्रि फ़ित्नतिल मसीह़िद् दज्जाल

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र की यातना से, मैं तेरी शरण माँगता हूँ मसीह दज्जाल के फ़ितने से और मैं तेरी शरण माँगता हूँ जीवन-मरण के फ़ितने से। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ गुनाह तथा क़र्ज़ से।" [80] [80] सहीह बुख़ारी 1/202, हदीस संख्या : 832, तथा मुस्लिम 1/412, हदीस संख्या : 587।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल क़ब्रि, व-अऊज़ु बिका मिन फ़ित्नतिल मसीह़िद् दज्जालि, व-अऊज़ु बिका मिन फ़ित्नतिल मह़्या वल-ममाति, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल-मअस़मि वल-मग़्रमि।

"ऐ अल्लाह! मैंने अपने आप पर बड़ा अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए मुझे अपनी ओर से क्षमा प्रदान कर और मुझपर दया कर। निःसंदेह तू ही क्षमा करने वाला, अति दयालु है।" [81] [81] सहीह बुख़ारी 8/168, हदीस संख्या : 834 तथा सहीह मुस्लिम 4/2078, हदीस संख्या : 2705।

अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी ज़ुल्मन कस़ीरन, वला यग़्फ़िरुज़ ज़ुनूबा इल्ला अंता, फ़ग़्फ़िर ली मग़्फ़िरतम् मिन इन्दिका वर्ह़म्नी, इन्नका अंतल ग़फ़ूरुर रह़ीम।

"हे अल्लाह, तू मेरे पापों तथा कोताहियों को क्षमा कर दे, मेरे छिपाकर किए गए गुनाहों को माफ़ कर दे, मेरे दिखाकर किए गए गुनाहों को माफ़ कर दे, मेरी ओर से की गई ज़्यादतियों को माफ़ कर दे तथा उन गुनाहों को भी माफ़ कर दे, जिन्हें तू मुझसे अधिक जानता है। तू ही आगे करने वाला और तू ही पीछे करने वाला है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं" [82] [82] सहीह मुस्लिम 1/534, हदीस संख्या : 771।

अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली मा क़द्दमतु, वमा अख़्ख़र्तु, वमा असरर्तु, वमा अअ्लन्तु, वमा असरफ़्तु, वमा अन्त अअ्लमु बिहि मिन्नी, अन्तल मुक़द्दिमु, व-अन्तल मुअख़्ख़िरु ला इलाह इल्ला अन्त

"ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र, शुक्र और अच्छी तरह इबादत करने के संबंध में मेरी मदद फ़रमा।" [83] [83] सुनन अबू दाऊद 2/86, हदीस संख्या : 1522 और सुनन नसई 3/53, हदीस संख्या : 2302। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/284 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा अइन्नी अला ज़िक्रिका, व-शुक्रिका, व-हुस्नि इबादतिक

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ कृपणता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ कायरता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ लाचारी की आयु में लौटाए जाने से तथा मैं तेरी शरण में आता हूँ दुनिया के फ़ितने एवं क़ब्र की यातना से।" [84] [84] बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/35, हदीस संख्या : 2822 तथा 6390।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल बुख़्लि, व-अऊज़ु बिका मिनल जुब्नि, व-अऊज़ु बिका मिन अन उरद्दा इला अर्ज़लिल उमुरि, व अऊज़ु बिका मिन फ़ित्नतिद् दुन्या व अज़ाबिल क़ब्र

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से तेरी शरण में आता हूँ।" [85] [85] सहीह अबू दाऊद हदीस संख्या 792 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 910, देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/328।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल जन्नता, व अऊज़ु बिका मिनन् नार

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे ग़ैब की बात जानने तथा सृष्टि पर तेरे सामर्थ्य का वास्ता देकर तुझसे विनती करता हूँ कि मुझे उस समय तक जीवित रख जब तक तेरे ज्ञान के अनुसार जीना मेरे लिए अच्छा हो, तथा उस समय मौत दे दे जब तेरे ज्ञान के अनुसार मर जाना ही मेरे लिए अच्छा हो। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरा ऐसा भय माँगता हूँ जो ज़ाहिर एवं बातिन में हो, शांत तथा क्रोधित स्थिति में सत्य बात कहने का सुयोग माँगता हूँ, संपन्नता तथा दरिद्रता जैसी अवस्थाओं में संतुलन माँगता हूँ, ऐसी नेमत माँगता हूँ जो कभी ख़त्म न हो, आँखों की ऐसी ठंडक माँगता हूँ जिसका सिलसिला कभी न टूटे। मैं तेरा निर्णय सामने आने के बाद उससे संतुष्ट रहने का सुयोग माँगता हूँ, मृत्यु के बाद सुखी जीवन माँगता हूँ, तेरे मुखमंडल को देखने का सौभाग्य माँगता हूँ और तुझसे मिलने की अभिलाषा माँगता हूँ। ऐसी अभिलाषा, जिसमें न विनाशकारी हानि हो और न पथभ्रष्ट कर देने वाला फ़ितना। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की शोभा से सुशोभित कर तथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने वाला तथा उसका प्रचारक बना।" [86] [86] सुनन नसई 3/54,55, हदीस संख्या : 1304 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/364, हदीस संख्या : 21666, अलबानी ने इसे सहीह सुनन नसई 1/281 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा बि-इल्मिकल ग़ैबा व क़ुदरतिका अलल् ख़ल्क़ि, अह़यिनी मा अलिमतल् ह़याता ख़ैरन ली, व-तवफ़्फ़नी इज़ा अलिमतल वफ़ाता ख़ैरन ली, अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका ख़श्यतका फ़िल ग़ैबि वश-शहादति, व-असअलुका कलिमतल हक़्क़ि फ़िर-रिज़ा वल ग़ज़बि, व-अस्अलुकल क़स्दा फ़िल ग़िना वल फ़क़्रि, व-असअलुका नईमन ला यन्फ़दु, व-असअलुका क़ुर्रता ऐ़निन ला तनक़तिउ, व-असअलुकर-रिज़ा बअ्दल क़ज़ाइ, व-असअलुका बर्दल ऐशि बअ्दल मौति, व-अस्अलुका लज़्ज़तन् नज़रि इला वज्हिका, वश-शौक़ा इला लिक़ाइका फ़ी ग़ैरि ज़र्रा-अ मुज़िर्रतिन, व-ला फ़ित्नतिन मुज़िल्लतिन, अल्लाहुम्मा ज़य्यिन्ना बिज़ीनतिल ईमानि, वज्अल्ना हुदातन मुहतदीन।

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस बात के आधार पर कि तू अकेला और बेनियाज़ है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है, विनती करता हूँ कि मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे। निःसंदेह तू बहुत क्षमा करने वाला और दयालु है।" [87] [87] सुनन नसई 3/52, हदीस संख्या : 1300। शब्द उसी के हैं। मुसनद-ए-अहमद 4/338, हदीस संख्या : 18974। अलबानी ने इसे सहीह नसई 1/280 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका या अल्लाहु बिअन्नकल वाह़िदुल अह़दुस़ स़मदुल लज़ी लम् यलिद व लम् यूलद, व लम् यकुल्लहु कुफुवन अह़दुन, अन तग़्फ़िरा ली ज़ुनूबी इन्नका अन्तल ग़फ़ूरुर रह़ीम।

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस आधार पर विनती करता हूँ कि सारी प्रशंसा तेरी है, तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है, और तू बड़ा उपकारी एवं दाता है। ऐ आकाशों तथा धरती के रचयिता! ऐ विशाल प्रभु एवं दाता! ऐ जीवित तथा नित्य स्थायी! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से तेरी शरण माँगता हूँ।" [88] [88] अबू दाऊद हदीस संख्या : 1495, तिरमिज़ी : 3544, इब्न-ए-माजा : 3858 और नसई हदीस संख्या : 1299। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/329।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका बिअन्ना लकल ह़म्दा ला इलाहा इल्ला अन्ता वह़्दका ला शरीका लका, अलमन्नानु, या बदीअस समावाति वल-अर्ज़ि या ज़ल जलालि वल-इक्रामि, या ह़य्यु या क़य्यूमु इन्नी अस्अलुकल जन्नता व अऊज़ु बिका मिनन् नारि

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे विनती करता हूँ, क्योंकि मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, बेनियाज़ है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है।" [89] [89] सुनन अबू दाऊद 2/62 हदीस संख्या : 1493, सुनन तिरमिज़ी 5/515 हदीस संख्या : 3475, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 2/1267, सुनन नसई हदीस संख्या : 1300 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 18974। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/329 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/163।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुका बिअन्नी अश्हदु अन्नका अन्ता अल्लाहु ला इलाहा इल्ला अन्ता अल-अह़दु अस़-स़मदु अल्लज़ी लम् यलिद व लम् यूलद व लम् यकुल् लहु कुफ़ुवन अह़द

25- सलाम फेरने के बाद के अज़कार

«मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ

अस्तग़फ़िरुल्लाह (तीन बार।) "ऐ अल्लाह! तू ही सुरक्षा तथा शांति का मालिक है और तेरी ही ओर से सुरक्षा एवं शांति प्राप्त होती है। हे महानता और भलाई वाले ! तू बड़ी बरकतों वाला है।" [90] [90] सहीह मुस्लिम 1/414, हदीस संख्या : 591।

अल्लाहुम्मा अन्तस् सलामु, व-मिन्कस् सलाम, तबारक्ता या ज़ल जलालि वल इकराम

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु वलहुल ह़म्दु व-हुवा अला कुल्लि शै-इन क़दीर [तीन बार।] "ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।"[91] [91] सहीह बुख़ारी 1/255 हदीस संख्या : 844 तथा सहीह मुस्लिम 1/414 हदीस संख्या : 593। दोनों कोष्ठकों के बीच की वृद्ध सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 6473 से ली गई है।

अल्लाहुम्मा ला मानिअ़ लिमा अअ़त़ैता, व ला मुअत़िया लिमा मनअ़ता, व-ला यन्फ़उ ज़ल-जद्दि मिन्कल-जद्द

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोकने की क्षमता रखता है। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा उपास्य नहीं है, हम केवल उसी की उपासना करते हैं, उसी की सब नेमतें हैं और उसी का सब पर उपकार है और उसी के लिए समस्त अच्छी प्रशंसाएँ हैं। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, हम उसी के लिए धर्म को शुद्ध करते हैं, चाहे ये बात काफिरों को नागवार लगती हो।" [92] [92] सहीह मुस्लिम 1/415 हदीस संख्या : 594।

ला इलाहा इल्लल्लाह वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल् मुल्कु, व-लहुल ह़म्दु, व-हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, ला ह़ौला व-ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाहु, व ला नअ्बुदु इल्ला इय्याहू लहुन् निअमतु व-लहुल फ़ज़्लु व लहुस़-स़नाउल ह़सन, ला इलाहा इल्लल्लाहु मुख़्लिस़ीना लहुद् दीना व लौ करिहल काफ़िरून «अल्लाह पवित्र है, सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है और अल्लाह सबसे बड़ा है।

सुब्ह़ानल्लाहि, वल्ह़म्दुलिल्लाहि, वल्लाहु अकबर (तैंतीस बार।) "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है।" [93] [93] सहीह मुस्लिम 1/418 हदीस संख्या : 597। उसमें आगे है : "जिसने हर नमाज़ के बाद इस ज़िक्र की पाबंदी की, उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, चाहे वह समुद्र की झाग के समान ही क्यों न हों।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर

“(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है। अल्लाह निःछिद्र है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न उसके बराबर कोई है। [सूरा इख़लास : 1-4]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया। तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए। तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से। तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे। [सूरा फ़लक़ : 1-5]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l जो सारे इन्सानों का स्वामी है। जो सारे इन्सानों का पूज्य है। भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से। जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है। जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी। [सूरा नास : 1-6]

हर नमाज़ के बाद। [94] [94] सुनन अबू दाऊद 2/86 हदीस संख्या : 1523, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 2903 तथा सुनन नसई 3/68 हदीस संख्या : 1335। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/8। इन तीन सूरतों को "अल-मुअव्वज़ात" कहा जाता है। यानी ऐसी सूरतें जिनकी ज़रिए अल्लाह की शरण माँगी जाए। देखिए : फ़त्ह अल-बारी 9/62।

“अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।” [सूरा बक़रा : 255] इसे हर नमाज़ के बाद पढ़ा जाए। [95] [95] जिसने हर नमाज़ के बाद इसे पढ़ा, उसे जन्नत में प्रवेश से मृत्यु के अतिरिक्त कोई चीज़ बचा नहीं सकती। देखिए : नसई की किताब अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 100 तथा इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 121। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 5/339 तथा सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 2/697 हदीस संख्या : 972 में सहीह कहा है। इसमें दर्ज आयत सूरा अल-बक़रा की आयत संख्या : 255 से ली गई है।

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य और उसी की सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु युह़्यी व युमीतु व-हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर इसे मग़्रिब तथा फ़ज्र की नमाज़ के बाद दस बार पढ़ा जाएगा। [96] [96] सुनन तिरमिज़ी 5/515 हदीस संख्या : 3474 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/227 हदीस संख्या : 17990। इसके विस्तृत संदर्भों के लिए देखिए : ज़ाद अल-मआद 1/300।

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, पवित्र रोज़ी एवं ग्रहण होने वाला अमल माँगता हूँ।"

अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका इल्मन नाफ़िअन, व-रिज़्क़न त़य्यिबन, व अमलन मुतक़ब्बलन फ़ज्र की नमाज़ में सलाम फेरने के बाद का ज़िक्र [97] [97] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 925 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 102। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/152 तथा मजमा अज़-ज़वाइद 10/11। आगे यह हदीस हदीस संख्या : 95 के तहत भी आएगी।

26- इस्तिख़ारा की नमाज़ की दुआ

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमें सभी कामों के लिए उसी प्रकार इस्तिख़ारा सिखाते थे, जिस प्रकार हमें क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फरमाते हैं: "जब तुम में से किसी को कोई महत्वपूर्ण काम करना हो तो फ़र्ज़ नमाज़ के अतिरिक्त दो रक्अत पढ़े और फिर यह दुआ पढ़े : ऐ अल्लाह! मैं तेरे अपार ज्ञान के कारण तुझसे भलाई माँगता हूँ, तेरे असीम सामर्थ्य के कारण तुझसे सामर्थ्य माँगता हूँ, और तुझसे तेरे बड़े अनुग्रह का प्रार्थी हूँ। क्योंकि तू सामर्थ्यवान है, मैं सामर्थ्य नहीं रखता और तू जानता है, मैं नहीं जानता। ऐ अल्लाह! यदि तू जानता है कि यह कार्य (यहाँ कार्य का नाम लेकर बताए) मेरे धर्म, मेरी दुनिया और मेरी आख़िरत के लिए बेहतर है, (या यूँ कहे कि मेरी इस दुनिया और उस दुनिया के लिए बेहतर है) तो इसे मेरे लिए निर्धारित कर दे तथा इसे करना मेरे लिए सरल बना दे और फिर मेरे लिए उसमें बरकत भी रख दे। लेकिन यदि तू जानता है कि यह कार्य मेरे धर्म, मेरी दुनिया और मेरी आख़िरत के लिए बेहतर नहीं है, (या यूँ कहे कि मेरी इस दुनिया और उस दुनिया के लिए बेहतर नहीं है) तो उसको मुझसे और मुझको उससे दूर फ़रमा और मेरे लिए भलाई निश्चित कर दे, जहाँ कहीं भी हो और फिर मुझे उसपर संतुष्टि प्रदान कर।"[98] [98] सहीह बुख़ारी 7/162, हदीस संख्या : 1162।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्तख़ीरुका बिइल्मिका, व अस्तक़दिरुका बिक़ुदरतिका, व अस्अलुका मिन फ़ज़्लिकल् अज़ीम; फ़इन्नका तक़दिरु वला अक़दिरु, व-तअलमु वला अअ्लमु, व अन्ता अल्लामुल ग़ुयूब, अल्लाहुम्मा इन कुन्ता तअ्लमु अन्ना हाज़ल अम्रा - व युसम्मी हाजतहु - ख़ैरुन् ली फ़ी दीनी व मआशी व आक़िबति अम्री - औ क़ाल: आ़जिलिही व आजिलिही - फ़क़्दुर्हु ली व यस्सिर्हु ली स़ुम्मा बारिक ली फ़ीहि, व इन कुन्ता तअलमु अन्ना हाज़ल अम्रा शर्रुन् ली फ़ी दीनी व मआशी व आक़िबति अम्री - औ क़ाल: आ़जिलिही व आजिलिही - फ़स्रिफ़हु अन्नी वस्रिफ़नी अन्हु वक़्दुर लियल ख़ैरा हैस़ु काना, सुम्म अर्ज़िनी बिह

याद रहे कि जिसने अल्लाह से भलाई तलब की, इमानदार लोगों का परामर्श लिया और पूरी लगन के साथ काम किया, वह शर्मिंदा नहीं हो सकता। उच्च एवं पाक अल्लाह का फ़रमान है : "तथा उनसे भी मामले में परामर्श करो, फिर जब कोई दृढ़ संकल्प ले लो, तो अल्लाह पर भरोसा करो।" [99] [99] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 159

27- सुबह तथा शाम के अज़कार

"हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है तथा उसकी दया और शांति अवतरित हो उसके अंतिम संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर।" [100] [100] अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से रिवायत करते हुए कहते हैं : मुझे ऐसे लोगों के साथ बैठना, जो फ़ज्र की नमाज़ से सूर्य निकलते समय तक अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, इस बात से अधिक प्रिय है कि इसमाईल -अलैहिस्सलाम- की नस्ल के तीन दासों को मुक्त कर दूँ। इसी तरह ऐसे लोगों के साथ बैठना, जो अस्र की नमाज़ से सूरज डूबने तक अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, इस बात से अधिक प्रिय है कि चार दास मुक्त करूँ। सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 3667। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/698 में हसन कहा है।

"मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।"

“अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।”] [सूरा बक़रा : 255][101] [101] सूरा अल-बक़रा, आयत : 255। जिसने सुबह इसे कहा उसे शाम तक शैतान से बचाया जाएगा, और जिसने शाम को इसे कहा उसे सुबह तक शैतान से बचाया जाएगा। मुसतदरक हाकिम 1/562। अलबानी ने इसे सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273 में सहीह कहा है और नसई तथा तबरानी की ओर मनसूब किया है और कहा है कि तबरानी की इसनाद जय्यिद है।

“(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है। अल्लाह निःछिद्र है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न उसके बराबर कोई है। [सूरा इख़लास : 1-4]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया। तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए। तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से। तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे। [सूरा फ़लक़ : 1-5]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l जो सारे इन्सानों का स्वामी है। जो सारे इन्सानों का पूज्य है। भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से। जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है। जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी। [सूरा नास : 1-6] तीन बार। [102] [102] जिसने सुबह या शाम को इन सूरतों को पढ़ लिया, उसे यह सूरतें हर चीज़ से बचाने के लिए काफ़ी होंगी। सुनन अबू दाऊद 4/322 हदीस संख्या : 5082 और सुनन तिरमिज़ी 5/567 हदीस संख्या : 3575, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/182।

"हमने तथा अल्लाह के राज्य ने सुबह की, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, सारा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। ऐ मेरे पालनहार! मैं तुझसे इस दिन की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ। इसी तरह इस दिन की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण में आता हूँ सुस्ती तथा बुढ़ापे की बुराई से। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग की यातना और क़ब्र के अज़ाब से।" [103] [103] सहीह मुस्लिम 4/2088, हदीस संख्या : 2723।

अस़्बह्ना व अस़्बह़ल मुल्कु लिल्लाहि, वल ह़म्दु लिल्लाहि, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु व-हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, रब्बि असअलुक ख़ैरा मा फ़ी हाज़ल यौमि व ख़ैरा मा बअदहू, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फ़ी हाज़ल यौमि व शर्रि मा बअदहू, रब्बि अऊज़ु बिका मिनल कसलि व सूइल किबरि, रब्बि अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिन फ़िन् नारि व अज़ाबिन फ़िल क़ब्र।

और शाम को कहे : "हमने तथा अल्लाह के राज्य ने शाम की, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, सारा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। ऐ मेरे पालनहार! मैं तुझसे इस रात्रि की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ। इसी तरह इस रात्रि की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण में आता हूँ सुस्ती तथा बुढ़ापे की बुराई से। ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग की यातना और क़ब्र के अज़ाब से।" [104] [104] पूर्वोक्त हवाला।

अम्सैना व अम्सल मुल्कु लिल्लाहि, वल ह़म्दु लिल्लाहि, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शै-इन क़दीर, रब्बि अस-अलुका ख़ैरा मा फ़ी हाज़िहिल लैलति, व ख़ैरा मा बअ्-दहा, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फ़ी हाज़िहिल लैलति, व शर्रि मा बअ्-दहा, रब्बि अऊज़ु बिका मिनल कसलि व सू-इल किबरि, रब्बि अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिन फ़िन-नारि व अज़ाबिन फ़िल-क़ब्र

"ऐ अल्लाह, हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ सुबह की और तेरे ही (अनुग्रह के) साथ शाम की और हम तेरे ही अनुग्रह से जीते हैं और तेरे ही नाम से मरते हैं, और हमें तेरी ही ओर उठकर जाना है।" [105] [105] सुनन तिरमिज़ी 5/466 हदीस संख्या : 3391, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/142।

अल्लाहुम्मा बिका अस़्बह़्ना, व-बिका अम्सैना, व-बिका नह़्या, व-बिका नमूतु व इलैका अन्नुशूर

और शाम को कहे : ""ऐ अल्लाह हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ शाम की, तेरे ही (अनुग्रह के) साथ सुबह की, तेरे ही नाम से जीते हैं और तेरे ही नाम से मरते हैं, और तेरी ओर ही लौटकर जाना है।" [106]" [106] गुज़रा हुआ हवाला।

अल्लाहुम्मा बिका अम्सैना, व-बिका अस़्बह़्ना, व-बिका नह़्या, व-बिका नमूतु, व इलैकल मस़ीर

"ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जिसके कारण मैं तेरी रह़मत से दूर हो जाऊँ। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ [107]। तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है।" [108] [107] أَبُوءُ का अर्थात है मैं इक़रार एवं एतराफ़ करता हूँ। [108] जिसने विश्वास के साथ शाम को यह दुआ पढ़ी और उसी रात मर गया, वह जन्नत में दाख़िल होगा। यही हाल सुबह का भी है। सहीह बुख़ारी 7/150, हदीस संख्या : 6306।

अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी ला इलाहा इल्ला अन्ता, ख़लक़्तनी व अना अब्दुक, व अना अला अहदिका व वअ्दिका मस्तत़अ्तु, अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा स़नअतु, अबूउ लका बिनिअ्मतिका अलैय्या, व अबूउ बिज़म्बी फ़ग़्फ़िर ली फ़-इन्नहू ला यग़्फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्त।

"ऐ अल्लाह! मैंने सुबह की। मैं तुझे, तेरा अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों को, अन्य फ़रिश्तों को तथा तेरी सारी सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तेरे बंदे और रसूल हैं।"

अल्लाहुम्मा इन्नी अस़्बह़्तु उश्हिदुका, व उश्हिदु ह़'म'ल'ता अर्शिका, व मलाईकतिका, व जमीआ ख़ल्क़िका, अन्नका अन्तल्लाहु ला इलाहा इल्ला अन्ता वह़्दका ला शरीका लका, व अन्ना मुह़म्मदन अब्दुका व रसूलुक चार बार कहना है। [109] [109] जिसने सुबह या शाम को चार बार यह दुआ पढ़ी, उसे अल्लाह आग से मुक्ति प्रदान करेगा। अबू दाऊद 4/317, हदीस संख्या : 5071, तथा इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 1201, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 9 तथा इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 70। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 23 में नसई तथा अबू दाऊद की सनद को हसन कहा है।

और शाम को कहे : "ऐ अल्लाह! मैंने शाम की। मैं तुझे, तेरा अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों को, अन्य फ़रिश्तों को तथा तेरी सारी सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तेरे बंदे और रसूल हैं।"

अल्लाहुम्मा इन्नी अम्सैतु उशहिदुका, व उशहिदु ह़'म'ल'ता अर्शिका, व मलाइकतिका, व जमीआ खल्क़िका, अन्नका अन्तल्लाहु ला इलाहा इल्ला अन्ता वह़्दका ला शरीका लका, व अन्ना मुह़म्मदन अब्दुका व रसूलुक। चार बार कहना है। [110] [110] गुज़रा हुआ हवाला।

"ऐ अल्लाह! सुबह के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है, वह केवल तेरी ओर से है और उसमें तेरा कोई साझी नहीं है। अतः तेरी ही प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है।" [111] [111] जिसने सुबह यह दुआ पढ़ी, उसने उस दिन का शुक्र अदा कर लिया। इसी तरह जिसने शाम को यह दुआ पढ़ी, उसने उस रात का शुक्र अदा कर लिया। अबू दाऊद 4/318, हदीस संख्या : 5075, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 7, इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 41 तथा इब्न-ए-हिब्बान (मवारिद) हदीस संख्या : 2361। शैख़ बिन बाज़ ने तौहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 24 में इसकी सनद को हसन कहा है।

अल्लाहुम्मा मा अस़्बह़ा बी मिन् निअ्मतिन औ बिअह़दिम् मिन ख़ल्क़िका फ़मिन्का वह़दका ला शरीका लका, फ़'ल'कल ह़म्दु व-लकश् शुक्र

और शाम को कहे : "ऐ अल्लाह! शाम के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है, वह केवल तेरी ओर से है और उसमें तेरा कोई साझी नहीं है। अतः तेरी ही प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है।" [112] [112] गुज़रा हुआ हवाला।

अल्लाहुम्मा मा अम्सा बी मिन निअ्मतिन औ बिअह़दिम् मिन ख़ल्क़िका फ़-मिनका वह़्दका ला शरीका लक, फ़'ल'कल ह़म्दु वलकश् शुक्र

"ऐ अल्लाह! मुझे शारीरिक कुशलता प्रदान कर। ऐ अल्लाह! मुझे सुनने की कुशलता प्रदान कर। ऐ अल्लाह! मुझे दृष्टि की कुशलता प्रदान कर। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ कुफ़्र (अविश्वास) और निर्धनता से और तेरी शरण में आता हूँ क़ब्र की यातना से। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।"

अल्लाहुम्मा आफ़िनी फ़ी बदनी, अल्लाहुम्मा आफ़िनी फ़ी सम्ई, अल्लाहुम्मा आफ़िनी फ़ी बस़री, ला इलाहा इल्ला अन्ता, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल कुफ़्रि, वल फ़क़्रि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिल क़ब्रि, ला इलाहा इल्ला अन्त तीन बार। [113] [113] अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या : 5092, अहमद 5/42 हदीस संख्या 20430, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह हदीस संख्या : 22, इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 69 तथा इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 701। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 26 में इसकी सनद को हसन कहा है।

"मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है, उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मेरा उसी पर भरोसा है और वह महान सिंहासन का स्वामी है।"

हस्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवा अलैहि तवक्कल्तु व हुवा रब्बुल अर्शिल अज़ीम इसे सात बार कहे। [114] [114] जिसने सुबह एवं शाम यह दुआ सात बार पढ़ी, उसे अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत के दुखों से बचाएगा। इब्न-अस-सुन्नी ने इसे हदीस संख्या : 71 के तहत अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कथन के रूप में नक़ल किया है। जबकि अबू दाऊद ने 4/321, हदीस संख्या : 5081 में इसे सहाबी के कथन के रूप में नक़ल किया है। शोऐब अरनाऊत तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इसकी सनद को सहीह कहा है। देखिए : ज़ाद अल-मआद 2/376।

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने धर्म, अपने संसार, अपने परिवार और अपने धन के संबंध में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरे ऐबों को छुपा दे और मुझे भय से सुरक्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह! तू मेरी, मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ और मेरे ऊपर से रक्षा कर। साथ ही मैं इस बात से तेरी महानता की शरण में आता हूँ कि मुझे नीचे से धर दबोचा जाए।" [115] [115] अबू दाऊद, हदीस संख्या : 5074 और इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3871। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/332।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल-अफ़वा वल-आफ़ियता फ़िद-दुन्या वल-आख़िरह, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल-अफ़वा वल-आफ़ियता: फ़ी दीनी व-दुन्याया व-अहली, व-माली, अल्लाहुम्मस्तुर औराती, व-आमिन रौआती, अल्लाहुम्मा इह़्फ़ज़नी मिम् बैनि यदय्या, व-मिन ख़ल्फ़ी, व-अन यमीनी, व-अन शिमाली, व-मिन फ़ौक़ी, व-अऊज़ु बि-अज़मतिका अन उग़्ताला मिन तह़्ती

"ऐ अल्लाह, छिपी तथा खुली बातों का जानने वाला, आकाशों तथा धरती का रचयिता, हर चीज़ का पालनहार और प्रभु! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके फ़रेब से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ।" [116] [116] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3392, और सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 5067, देखिए :सहीह तिरमिज़ी 3/142।

अल्लाहुम्मा आलिमल ग़ैबि वश-शहादति फ़ात़िरस-समावाति वल-अर्ज़ि, रब्बा कुल्लि शैइन व मलीकहु, अश-हदु अल-ला इलाहा इल्ला अन्ता, अऊज़ु बिका मिन शर्रि नफ़्सी, व मिन शर्रिश-शैतानि व श'र'किही, व अन अक़्तरिफ़ा अला नफ़्सी सूअन, औ अजुर्रहू इला मुस्लिम।

"शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब सुनने वाला और सब जानने वाला है।"

बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यज़ुर्रु म'अस्मिही शैउन फ़िल अर्ज़ि व ला फ़िस-समाई व हुवस-समीउल अलीम तीन बार। [117] [117] जिसने सुबह को तीन बार और शाम को तीन बार यह दुआ पढ़ी, उसे कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। सुनन अबू दाऊद 4/323 हदीस संख्या : 5088, सुनन तिरमिज़ी 5/465 हदीस संख्या : 3388, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3869 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 446। देखिए सहीह इब्न-ए-माजा 2/332। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 39 में इसकी सनद को हसन कहा है।

"मैं अल्लाह को रब, इस्लाम को धर्म और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को नबी के रूप में मान कर संतुष्ट हो गया।"

रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन, व बिल-इस्लामि दीनन, व बि-मुह़म्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नबिय्यन तीन बार। [118] [118] जिसने सुबह को तीन बार और शाम को तीन बार यह दुआ पढ़ी, उसे क़यामत के दिन संतुष्ट करना अल्लाह पर अनिवार्य हो जाता है। मुसनद अहमद 4/337, हदीस संख्या : 18967, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 4, और इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 68, सुनन अबू दाऊद 4/318, हदीस संख्या : 1531 और सुनन तिरमिज़ी 5/465, हदीस संख्या : 3389। शैख़ बिन बाज़ ने तोहफ़ा अल-अख़्यार पृष्ठ : 39 में इसकी सनद को हसन कहा है।

"हे जीवित एवं नित्य स्थायी प्रभु! मैं तेरी कृपा के वसीले से तुझसे फ़रियाद करता हूँ कि मेरा सारा हाल ठीक रख और मुझे क्षण भर के लिए भी मेरे नफ़्स के हवाले न कर।" [119] [119] मुसतदरक हाकिम 1/545, और ज़हबी ने इसकी पुष्टि की है। देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273।

या ह़य्यु या क़य्यूमु, बिरह़मतिका अस्तग़ीस़ु, अस़्लिह़ ली शानिया कुल्लहू, वला तकिल्नी इला नफ़्सी तर्फ़ता ऐन

"हमने तथा सारे संसार के पालनहार अल्लाह के राज्य ने सुबह की। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस दिन की भलाई; इसकी विजय, सहायता, प्रकाश, बरकत और मार्गदर्शन माँगता हूँ। इसी तरह इस दिन की कोख में जो कुछ है उसकी बुराई तथा इसके बाद की बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"[120] [120] सुनन अबू दाऊद 4/322, हदीस संख्या : 5084। इसकी सनदों को शोऐब तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने ज़ाद अल-मआद की हदीसों को संदर्भित करते समय हसन कहा है। देखिए ज़ाद अल-मआद 2/373।

अस़्बह़्ना व अस़्बह़ल मुल्कु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरा हाज़ल यौमि: फ़त-ह़हु, व नस़्रहू, व नू-रहू, व ब'र'क'त'हू, व हुदाहू, व अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फ़ीहि व शर्रि मा बअ्दह।

और शाम को कहे : "हमने तथा सारे संसार के पालनहार अल्लाह के राज्य ने शाम की। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस रात की भलाई; इसकी विजय, सहायता, प्रकाश, बरकत और मार्गदर्शन माँगता हूँ। इसी तरह इस रात की कोख में जो कुछ है उसकी बुराई तथा इसके बाद की बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"[121] [121] गुज़रा हुआ हवाला।

अम्सैना व-अम्सल् मुल्कु लिल्लाहि रब्बिल-आलमीन, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरा हाज़िहिल-लैलति: फ़त्ह़हा, व-नस़्रहा, व-नूरहा, व-ब'र'क'त'हा, व-हुदाहा, व-अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा फ़ीहा, व-शर्रि मा बअ्दहा

"हमने इस्लाम की फितरत (अर्थाथ सत्य धर्म ) पर, इखलास (विशुद्धता ) के कलिमा पर, अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के धर्म पर तथा अपने पिता इबराहीम -अलैहिस्सलाम- जो मुश्रिकों में से नहीं थे, के संप्रदाय पर एकाग्र रूप से मुसलमान होकर सुबह की।" [122] [122] मुसनद-ए-अहमद 3/406, 407, हदीस संख्या : 15360, 15363 तथा इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 34। देखिए : सहीह अल-जामे 4/209।

अस़्बह़्ना अला फ़ितरतिल इस्लाम, व अला कलिमतिल इख़लास़ि, व अला दीनि नबिय्यिना मुह़म्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, व अला मिल्लति अबीना इब्राहीमा, हनीफ़म् मुस्लिमन व मा काना मिनल् मुश्रिकीन।

शाम को कहे : "हमने इस्लाम की फितरत (अर्थात सत्य धर्म ) पर, इख़लास (निष्ठा) के कलिमा पर, अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के धर्म पर तथा अपने पिता इबराहीम -अलैहिस्सलाम- जो मुश्रिकों में से नहीं थे, के संप्रदाय पर एकाग्र रूप से मुसलमान होकर शाम की।" [123] [123] गुज़रा हुआ हवाला।

अम्सैना अला फ़ित़'रतिल इस्लामि, व अला कलिमतिल इख़्लास़ि, व अला दीनि नबिय्यिना मुह़म्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, व अला मिल्लति अबीना इब्राहीमा, हनीफ़म् मुस्लिमन व मा काना मिनल मुशरिकीन

"मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ।"

सुब्ह़ानल्लाहि वबिह़म्दिह सौ बार। [124] [124] जिसने सुबह एवं शाम को सौ बार इसे कहा, क़यामत के दिन उससे उत्तम अमल के साथ केवल वही व्यक्ति उपस्थित होगा, जिसने उसी की तरह सौ बार या उससे अधिक बार इसे कहा होगा। सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2692।

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु, व हुव अला कुल्लि शैइन क़दीर दस बार [125], या फिर केवल एक बार आलस्य के समय [126]। [125] नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 24, देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/272 तथा शैख़ बिन बाज़ की किताब तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 44,तथा इसकी फ़ज़ीलत के लिए देखिए पृष्ठ : 146, हदीस संख्या : 255। [126] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 5077 तथा इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3798 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 8719। देखिए : सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/270, सहीह अबू दाऊद 3/957, सहीह इब्न-ए-माजा 2/331 तथा ज़ाद अल-मआद 2/377।

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु, वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु वलहुल ह़म्दु व-हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर सुबह के समय सौ बार [127]। [127] जिसने दिन में सौ बार इसे कहा, उसे दस दासों को मुक्त करने के बराबर पुण्य मिलेगा, उसके लिए सौ नेकियाँ लिखी जाएँगी, उसके सौ गुनाह मिटा दिए जाएँगे, उसे उस दिन शाम तक शैतान से सुरक्षा प्राप्त होगी और उससे उत्तम अमल के साथ केवल वही व्यक्ति उपस्थित होगा, जिसने इससे अधिक बार इसे कहा हो। सहीह बुख़ारी 4/95, हदीस संख्या : 3293 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2691।

"मैं अल्लाह की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करता हूँ, उसकी सृष्टियों की संख्या के समान, उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति के समान, उसके सिंहासन के वज़न के बराबर और उसके शब्दों की संख्या के बराबर।"

सुब्ह़ानल्लाहि व बिह़म्दिहि: अ'द'दा ख़ल्क़िहि, व रिज़ा नफ़्सिहि, व ज़ि'न'त अर्शिह, व मिदादा कलिमातिह सुबह के समय तीन बार [128]। [128] सहीह मुस्लिम (4/2090), हदीस संख्या : (2726)।

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, स्वच्छ रोज़ी तथा ग्रहणयोग्य अमल माँगता हूँ।"

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका इल्मन नाफ़िअन, व रिज़्क़न त़य्यिबन, व अमलम् मुतक़ब्बलन सुबह के समय[129]। [129] इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 54 और इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 925, शोऐब तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने ज़ाद अल-मआद की हदीसों को संदर्भित करते समय इसकी सनद को हसन कहा है। देखिए ज़ाद अल-मआद 2/375। यह हदीस इससे पीछे हदीस संख्या : 73 के तहत गुज़र चुकी है।

"मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसी की ओर लौटता हूँ।"

अस्तग़फ़िरुल्लाहा व अतूबु इलैहि दिन में सौ बार। [130] [130] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/101, हदीस संख्या : 6307 तथा सहीह मुस्लिम 4/2702, हदीस संख्या : 2775 एवं 2702।

"मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं की बुराई से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ।"

अऊज़ु बि-कलिमातिल्लाहित् ताम्माति मिन शर्रि मा ख़लक़ शाम को तीन बार [131]। [131] जिसने शाम को तीन बार इसे कहा, उसे उस रात किसी ज़हरीले कीड़े के डंक मारने से कोई हानि नहीं होगी। मुसनद-ए-अहमद 2/290 हदीस संख्या : 7898, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 590 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 68। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/187, सहीह इब्न-ए-माजा 2/266 तथा इब्न-बाज़ की किताब तोहफ़ा अल-अख़यार पृष्ठ : 45।

"ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुह़म्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की प्रशंसा अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के बीच कर और उन पर शांति की जलधारा बरसा।"

अल्लाहुम्मा स़ल्लि व सल्लिम अला नबिय्यिना मुह़म्मद दस बार। [132] [132] "जिसने सुबह को दस बार तथा शाम को दस बार मुझपर दरूद भेजा , उसे क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश प्राप्त होगी।" तबरानी ने इसे दो सनदों से नक़ल किया है, जिनमें से एक जय्यिद है। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 10/120 तथा सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/273।

28- सोने के अज़कार

दोनों हथेलियों को जमा करके उनमें फूँक मारे और उनमें इन सूरतों को पढ़े : “(आप) कह दीजिए कि अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न उसके बराबर कोई है। [सूरा इख़लास :1-4]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं भोर के रब की शरण लेता हूँl हर उस चीज़ की बुराई से, जिसे उसने पैदा किया। तथा रात की बुराई से, जब उसका अंधेरा छा जाए। तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से। तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे। [सूरा फ़लक़: 1-5]

"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ l जो सारे इन्सानों का स्वामी है। जो सारे इन्सानों का पूज्य है। भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले (शैतान ) की बुराई से। जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता रहता है। जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी। [सूरा नास : 1-6]

फिर दोनों हाथों को जहाँ तक हो सके, अपने शरीर पर फेरे और इसका आरंभ अपने सर, चेहरा तथा शरीर के अगले भाग से करे। ऐसा तीन बार करे। [133] [133] बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 9/62, हदीस संख्या : 5017 तथा मुस्लिम, हदीस संख्या : 2192।

“अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। ना उसे ऊँघ आती है और ना निद्रा आती है। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, उन सब को अल्लाह जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है।” [136] [सूरा बक़रा : 255][134] [134] सूरा अल-बक़रा, आयत संखअया : 255, जिसने बिस्तर में जाते समय इसे पढ़ लिया, उसकी रक्षा के लिए अल्लाह की ओर से एक फ़रिश्ता नियुक्त रहता है और सुबह तक शैतान उसके निकट नहीं जाता। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 4/487, हदीस संख्या : 2311।

"रसूल उस चीज़ पर ईमान लाया, जो उसके लिए अल्लाह की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले उसपर ईमान लाए। वे सब अल्लाह तथा उसके फ़रिश्तों और उसकी सब ग्रन्थों एवं रसूलों पर ईमान लाए। (वे कहते हैं :) हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अन्तर नहीं करते। हमने सुना और हम आज्ञाकारी हो गए। ऐ हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे और हमें तेरे ही पास आना है। अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी क्षमता से अधिक (दायित्व का) भार नहीं रखता। जो सदाचार करेगा, उसका लाभ उसी को मिलेगा और जो दुराचार करेगा, उसकी हानि भी उसी को होगी। हे हमारे पालनहार! यदि हम भूल चूक जाएँ, तो हमें न पकड़। हे हमारे पालनहार! हमारे ऊपर इतना बोझ न डाल, जितना हमसे पहले के लोगों पर डाला गया। हे हमारे पालनहार! हमारे पापों की अनदेखी कर दे, हमें क्षमा कर दे तथा हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी है तथा काफ़िरों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।" [137] [सूरा बक़रा : 285-286][135] [135] जिसने रात में इन दोनों आयतों को पढ़ लिया, दोनों आयतें उसके लिए काफ़ी होंगी। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 9/94, हदीस संख्या : 4008 तथा सहीह मुस्लिम 1/554, हदीस संख्या : 807। दोनों आयतें सूरा अल-बक़रा की हैं। आयत संख्या : 285-286।

"ऐ अल्लाह! तेरे नाम से [38] मैंने अपना पहलू रखा और तेरे ही अनुग्रह से उसे उठाऊँगा। यदि तू ने मेरे प्राण को रोक लिया, तो उसपर दया करना और अगर वापस कर दिया, तो उस चीज़ के द्वारा उसकी रक्षा करना जिसके द्वारा अपने सदाचारी बंदों की रक्ष करता है।"[137] [136] "जब तुममें से कोई अपने बिस्तर से उठने के बाद दोबारा बिस्तर में जाए, तो उसे अपनी लुंगी को किनारे से तीन बार झाड़े और अल्लाह का नाम ले। क्योंकि वह नहीं जानता कि उसके बिस्तर में कौन आया था। फिर जब लेटे तो कहे :..." इस हदीस में आए हुए शब्द "صَنِفة إزاره" का अर्थ है : लुंगी का किनारा। देखिए : अन-निहायह फ़ी ग़रीब अल-हदीस वल-असर (صنف)। [137] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/126, हदीस संख्या : 6320 और सहीह मुस्लिम 4/2084, हदीस संख्या : 2714।

बिस्मिका रब्बी वज़अ्तु जम्बी, वबिका अर्फ़अहु, फ़इन अम्सक्ता नफ़्सी फ़र्ह़म्हा, वइन अर्सल्तहा फ़ह़्फ़ज़्हा, बिमा तह़्फ़ज़ु बिहि इबादकस़-स़ालिह़ीन।

"ऐ अल्लाह! तू ने मेरे प्राण की रचना की है और तू ही उसे मृत्यु देगा। मृत्यु तथा जीवन दोनों तेरे हाथ में हैं। यदि तू ने उसे जीवित रखा, तो उसकी रक्षा करना और यदि मृत्यु दे दी, तो उसे क्षमा कर देना। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे स्वास्थ्य तथा सुरक्षा माँगता हूँ।" [138] [138] सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2712 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/79, हदीस संख्या : 5502 अपने शब्द के साथ।

अल्लाहुम्मा इन्नका ख़लक़्ता नफ़्सी व-अन्ता तवफ़्फ़ाहा, लका ममातुहा व-मह़्याहा, इन अह़्यैतहा फ़ह़्फ़ज़्हा, व-इन अमत्तहा फ़ग़्फ़िर लहा, अल्लाहुम्म इन्नी अस्अलुकल-आफ़िया

"ऐ अल्लाह! मुझे उस दिन अपनी याताना से सुरक्षित रखना [139], जिस दिन अपने बंदों को जीवित करके उठाएगा।" [140] [139] अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने का इरादा करते, तो अपने दाएँ गाल के नीचे अपना हाथ रख लेते और उसके बाद कहते :... [140] सुनन अबू दाऊद 4/311 हदीस संख्या : 5045 अपने शब्द के साथ, तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3398। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/143 तथा सहीह अबू दाऊद 3/240।

अल्लाहुम्मा क़िनी अज़ाबका यौमा तब्अस़ु इबादक

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे ही नाम से मरता और जीता हूँ।" [141] [141] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6324 और सहीह मुस्लिम 4/2083, हदीस संख्या : 2711।

बिस्मिका अल्लाहुम्मा अमूतु व अह़्या

''सुब्ह़ानल्लाह

अल्लाह पवित्र है (तैंतीस बार।) और सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है

वल्ह़म्दु लिल्लाह (तैंतीस बार।) और अल्लाह सबसे बड़ा है

वल्लाहु अकबर चौंतीस बार।" [142] [142] जिसने बिस्तर पर जाते समय यह अज़कार पढ़े, यह उसके लिए एक सेवक से उत्तम होंगे। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 7/71, हदीस संख्या : 3705 तथा सहीह मुस्लिम 4/2091, हदीस संख्या : 2726।

"ऐ अल्लाह! आकाशों के स्वामी, धरती के स्वामी, महान सिंहासन के स्वामी, हमारे स्वामी और हर चीज़ के स्वामी, दाने एवं गुठली को फाड़ने वाले और तौरात, इंजील तथा क़ुरआन उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसकी पेशानी को तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह! तू प्रथम है अतः तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं है तथा तू आख़िर (अंतिम) अतः तेरे बाद कोई चीज़ नहीं है, तू ज़ाहिर (प्रत्यक्ष एवं उच्च) है अतः तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं और तू बातिन (अप्रत्यक्ष एवं गुप्त) है अतः तुझसे परे कोई चीज़ नहीं है।तू हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें निर्धनता से मुक्ति प्रदान कर।" [143] [143] सहीह मुस्लिम 4/2084, हदीस संख्या : 2713।

अल्लाहुम्मा रब्बस-समावातिस-सब्इ व रब्बल-अर्ज़ि, व रब्बल-अर्शिल-अज़ीमि, रब्बना व रब्बा कुल्लि शैइन्, फ़ालिक़ल-ह़ब्बि वन-नवा, व मुन्ज़िलत-तौराति वल-इन्जीलि, वल-फ़ुर्क़ानि, अऊज़ु बिका मिन शर्रि कुल्लि शैइन् अन्ता आख़िज़ुन बिनास़ियतिहि, अल्लाहुम्मा अन्तल-अव्वलु फ़लैसा क़ब्लका शैउन्, व अन्तल-आख़िरु फ़लैसा बअ्दका शैउन्, व-अन्तज़-ज़ाहिरु फ़लैसा फ़ौक़का शैउन्, व-अन्तल-बात़िनु फ़लैसा दूनका शैउन्, इक़्ज़ि अन्नद-दैना व अग़्निना मिनल-फ़क़्र।

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने हमें खिलाया, पिलाया, पर्याप्ति प्रदान की तथा शरण दी। कितने ऐसे लोग हैं, जिनको न कोई पर्याप्ति प्रदान करने वाला है, न शरण देने वाला।" [144] [144] सहीह मुस्लिम 4/2085, हदीस संख्या : 2715।

अल्ह़म्दु लिल्लाहिल लज़ी अत़्अ'म'ना व-सक़ाना, व-कफ़ाना, व-आवाना, फ़कम् मिम्मल् ला काफ़िया लहु व ला मुअ्वीया

"ऐ अल्लाह, छिपी तथा खुली बातों का जानने वाला, आकाशों तथा धरती का रचयिता, हर चीज़ का पालनहार और मालिक ! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके फ़रेब से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ।" [145] [145] सुनन अबू दाऊद 4/317 हदीस संख्या : 5067 तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3629। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/142।

अल्लाहुम्मा आलिमल ग़ैबि वश-शहादति फ़ात़िरस्-समावाति वल-अर्ज़ि, रब्बा कुल्लि शैइन व-मलीकहु, अश्हदु अल् ला इलाहा इल्ला अन्ता, अऊज़ु बिका मिन शर्रि नफ़्सी, व-मिन शर्रिश-शैत़ानि व-शिर्किहि, व-अन अक़्तरिफ़ा अला नफ़्सी सू-अन, औ अजुर्रहु इला मुस्लिम।

अलिफ़ लाम मीम तनज़ीलस्सजदह और तबारकल्लज़ी बि-यदिहिलमुल्क, दोनों सूरतों को पढ़े। [146] [146] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3404 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 707। देखिए : सहीह अल-जामे 4/255।

"ऐ अल्लाह [147]! मैंने अपने प्राण को तेरे हवाले कर दिया, अपना मामला तुझे सौंप दिया, अपना चेहरा तेरी ओर कर दिया, तेरे ही ऊपर भरोसा किया और यह सब तेरी नेमतों की चाहत और तेरी यातना के भय से किया। क्योंकि स्वयं तेरे दरबार के अतिरिक्त न तेरी पकड़ से भाग कर जाने का कोई स्थान है और न शरण लेने की कोई जगह। मैं ईमान लाया तेरी उतारी हुई किताब और तेरे भेजे हुए नबी पर।" [148] [147] "जब तुम सोने के स्थान में जाने लगो, तो उसी तरह वज़ू करो, जैसे नमाज़ के लिए वज़ू करते हो, फिर बाएँ करवट पर लेट जाओ और उसके बाद कहो : ...।" [148] अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यह दुआ पढ़ने वाले के बारे में कहा है : "अब अगर तुम मर गए, तो इस्लाम पर मरोगे।" सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/113, हदीस संख्या : 6313 तथा सहीह मुस्लिम 4/2081, हदीस संख्या : 2710।

अल्लाहुम्मा अस्लम्तु नफ़्सी इलैका, व-फ़व्वज़्तु अम्री इलैका, व-वज्जह्तु वज्ही इलैका, व-अल्जअ्तु ज़ह्री इलैका, रग़्बतन व-रह्बतन इलैका, ला मल्जअ् व-ला मन्जा मिन्का इल्ला इलैका, आमन्तु बिकिताबिकल् लज़ी अन्ज़ल्ता, व बिनबिय्यिकल् लज़ी अर्सल्ता।

29- रात को करवट बदलते समय की दुआ

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, बलशाली है, आकाशों तथा धरती और उन दोनों के बीच स्थित सारी चाज़ों का रब है, शक्तिमान है और अत्यधिक क्षमा करने वाला है।" [149] [149] रात को जब करवट बदले तो यह दुआ पढ़े। मुसतदरक हाकिम 1/540 हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है।, नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 202 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 757। तथा देखिए : सहीह अल-जामे 4/213।

ला इलाहा इल्लल्लाहुल वाह़िदुल क़ह्हारु, रब्बुस समावाति वल अर्ज़ि व-मा बैनहुमल अज़ीज़ुल ग़फ़्फ़ार

30- नींद में बेचैनी तथा घबराहट की दुआ

"मैं अल्लाह के संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ उसके क्रोध, दंड, उसके बंदों की बुराई और शैतानों के द्वारा डाले गए बुरे ख़यालों से और इस बात से कि वे मेरे पास आजाएं ।" [150] [150] सुनन अबू दाऊद 4/12 हदीस संख्या : 3893 तथा सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3528। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/171।

अऊज़ु बिकलिमातिल्लाहित-ताम्माति मिन ग़'ज़'बिहि व-इक़ाबिहि, व-शर्रि इबादिहि, व-मिन हमज़ातिश-शयात़ीनि व अन् यह़्ज़ुरून

31- कोई व्यक्ति बुरा स्वप्न देखे तो क्या करे?

अपनी बाईं ओर तीन बार थूके [151]। [151] सहीह मुस्लिम 4/1772, हदीस संख्या : 2261।

शैतान से तथा अपने इस स्वप्न की बुराई से तीन बार अल्लाह की शरण माँगे।[152] [152] सहीह मुस्लिम 4/1773, 1773, हदीस संख्या : 2261 तथा 2262।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैत़ानिर रजीम

स्वप्न में क्या कुछ देखा है, किसी को न बताए। [153] [153] सहीह मुस्लिम 4/1772 हदीस संख्या : 2261 तथा 2263।

पहलू बदल ले और दूसरे करवट पर लेटे। [154] [154] सहीह मुस्लिम 4/1773, हदीस संख्या : 2261।

यदि इच्छा हो, तो उठकर नमाज़ पढ़े। [155] [155] सहीह मुस्लिम 4/1773, हदीस संख्या : 2263।

32- वित्र की दुआ-ए-क़ुनूत

"ऐ अल्लाह जिन लोगों को तू ने हिदायत दी है उनके संग मुझे भी हिदायत दे, जिन लोगों को तू ने आफियत दी है उनके संग मुझे भी आफियत दे, जिनको तू ने अपना मित्र बनाया है उनके संग मुझे भी अपना मित्र बना, जो कुछ तू ने हमें दे रखा है उसमें बरकत प्रदान कर, और जो फैसला तू ने कर रखा है उसकी बुराई से हमें बचाए रख, (क्योंकि) फैसला तू करता है और तेरे विरुद्ध फैसला नहीं किया जा सकता, जिसको तू अपना मित्र बना ले उसे कोई अपमानित नहीं कर सकता। हे हमारे रब! तू बरकत वाला तथा महान है।" [156] [156] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 1425, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 464, सुनन नसई हदीस संख्या : 1744, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1178, मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 1718, दारिमी हदीस संख्या : 1592, हाकिम 3/172 और बैहक़ी 2/209। दोनों कोष्ठकों के बीच के शब्द बैहक़ी के हैं। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/144, सहीह इब्न-ए-माजा 1/194 तथा अलबानी की किताब इरवा अल-ग़लील 2/172।

अल्लाहुम्मह्दिनी फ़ीमन हदैता, व-आफ़िनी फ़ीमन आफ़ैता, व-तवल्लनी फ़ीमन तवल्लैता, व-बारिक ली फ़ीमा अअ़्त़ैता, व-क़िनी शर्रा मा क़ज़ैता; फ़'इन्नका तक़्ज़ी व ला युक़्ज़ा अलैका, इन्नहू ला यज़िल्लु मन् वालैता, व-ला यइज़्ज़ु मन आदैता, तबारक्ता रब्बना व तआलैत

"ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा संपूर्ण रूप से नहीं कर सकता । तू वैसा ही है, जैसा तूने अपनी प्रशंसा की है।" [157] [157] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 1427, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3566, सुनन नसई हदीस संख्या : 1746, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1179 तथा मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 751। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/180, सहीह इब्न-ए-माजा 1/194 तथा इरवा अल-ग़लील 2/175।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिरिज़ाका मिन सख़त़िका, व-बिमुआफ़ातिका मिन उक़ूबतिका, व-अऊज़ु बिका मिन्का, ला उह़्स़ी स़नाअन अलैका, अन्ता कमा अस़्नैता अला नफ़्सिक

"ऐ अल्लाह! हम तेरी ही बंदगी करते हैं, तेरे ही लिए नमाज़ पढ़ते और तुझी को सजदा करते हैं, तेरी ओर तेज़ी से भागते और दौड़ते हैं, तेरी कृपा की आश रखते हैं, तेरी यातना से भयभीत रहते हैं, निश्चय ही तेरी यातना काफ़िरों को पहुँच कर रहेगी। ऐ अल्लाह! हम तुझसे सहयोग माँगते हैं, तुझसे क्षमा याचना करते हैं, तेरी अच्छी प्रशंसा करते हैं, तेरे प्रति अविश्वास का भाव नहीं रखते, तुझपर ईमान रखते हैं, तेरे सामने नत्मस्तक होते हैं और तेरे प्रति अविश्वास व्यक्त करने वालों से अलग होने की घोषणा करते हैं।" [158] [158] इसे बैहक़ी ने अस-सुनन अल-कुबरा 2/211 में नक़ल किया है और इसकी सनद को सही कहा है। जबकि अलबानी ने इरवा अल-ग़लील 2/170 में कहा है : "यह सनद सही है।" हालाँकि यह उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- का कथन ही है।

अल्लाहुम्मा इय्याका नअ्बुदु, व लका नुस़ल्ली व नस्जुदु, व इलैका नस्आ व नह्फ़िदु, नर्जू रह़्मतका, व नख़्शा अज़ाबका, इन्ना अज़ाबका बिल्-काफ़िरीना मुल्हिक़ुन, अल्लाहुम्मा इन्ना नस्तईनुका, व नस्तग़्फ़िरुका, व नुस़्नी अलैकल् ख़ैरा, व ला नक्फ़ुरुका, व-नुअ्मिनु बिका, व नख़्ज़उ लका, व नख़्लऊ मन् यक्फ़ुरुक

33- वित्र से सलाम फेरने के बाद का ज़िक्र

वह परम पावन बादशाह पवित्र है।

सुब्ह़ानल् मलिकिल क़ुद्दूस तीन बार। और तीसरी बार इसे बुलंद आवाज़ से और अपनी आवाज़ को खींचकर पढ़े, और कहे : "फ़रिश्तों एवं रूह (जिबरील) का रब।" [159] [159] सुनन नसई 3/244, हदीस संख्या : 1734 तथा दारक़ुतनी 2/31 आदि। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग दारक़ुतनी 2/31, हदीस संख्या : 2 से लिया गया है और उसकी सनद सहीह है। देखिए : ज़ाद अल-मआद 1/337, शोऐब अरनाऊत तथा अब्दुल क़ादिर अरनाऊत के अनुसंधान के साथ।

रब्बिल मलाइकति वर्रूह़

34- ‏शोक तथा चिंता के समय की दुआएँ

"ऐ अल्लाह! मैं तेरा बंदा और तेरे बंदे एवं बंदी का बेटा हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है। मेरे बारे में तेरा आदेश चलता है। मेरे बारे में तेरा निर्णय न्याय पर आधारित है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम का वास्ता देकर माँगता हूँ, जिससे तूने ख़ुद को नामित किया है, या उसे अपनी किताब में उतारा है, या उसे अपनी किसी सृष्टि को सिखाया है, या उसे अपने पास अपने परोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा है, कि क़ुरआन को मेरे दिल का वसंत, मेरे सीने की रोशनी, मेरे दुःख का मोचन और मेरी व्याकुलता को समाप्त करने वाला बना दे।" [160] [160] मुसनद-ए-अहमद 1/391, हदीस संख्या : 3712, अलबानी सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा 1/337 में इसे सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा इन्नी अब्दुका, इब्नु अब्दिका, इब्नु अ'म'तिका, नास़ियती बियदिका, माज़िन फ़िय्या ह़ुक्मुका, अद्लुन फ़िय्या क़ज़ाउका, अस्अलुका बिकुल्लिस्मिन् हुवा लका, सम्मैता बिहि नफ़्सका, औ अन्ज़ल्तहु फ़ी किताबिका, औ अल्लम्तहु अह़दम् मिन् ख़ल्क़िका, अविस्तअ्सर्ता बिहि फ़ी इल्मिल-ग़ैबि इन्दका, अन् तज्अ़लल-क़ुरआना रबीआ क़ल्बी, व नूरा स़द्री, व जलाअ हुज़्नी, व ज़हाबा हम्मी।

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।" [161] [161] सहीह बुख़ारी 7/158, हदीस संख्या : 2893, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- यह दुआ बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे। देखिए : सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/173। यह हदीस आगे भी पृष्ठ : 89 में हदीस संख्या : 137 के तहत आएगी।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल हम्मि वल-ह'ज़'नि, वल-अज्ज़ि वल-कसलि, वल बुख़्लि वल जुब्नि, व दलइद दैनि व ग़लबतिर रिजाल

35- बेचैनी की दुआ

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, जो महान और सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो महान अर्श (सिंहासन) का मालिक है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो आकाशों का रब , धरती का रब और सम्मानित सिंहासन (अर्श) का रब है।" [162] [162] सहीह बुख़ारी 7/154 हदीस संख्या : 6345 तथा सहीह मुस्लिम 4/2092, हदीस संख्या : 2730।

ला इलाहा इल्लल्लाहु, अल-अज़ीमुल् ह़लीमु, ला इलाहा इल्लल्लाहु, रब्बुल अर्शिल अज़ीमि, ला इलाहा इल्लल्लाहु, रब्बुस् समावाति व रब्बुल अर्ज़ि व रब्बुल अर्शिल् करीम

“ऐ अल्लाह मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे क्षण भर के लिए मेरी आत्मा के हवाले न कर। तथा मेरे लिए मेरे सारे कार्यों को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई वास्तविक उपास्य नहीं है।” [163] [163] सुनन अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या : 5090 तथा अहमद 5/42 हदीस संख्या : 20430, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/959 में हसन कहा है।

अल्लाहुम्मा रह़्मतका अर्जू, फ़ला तकिल्नी इला नफ़्सी त़र्फ़ता ऐनिन, व अस़्लिह़ ली शअ्नी कुल्लहु, ला इलाहा इल्ला अन्त

"तेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।" [164] [164] सुनन तिरमिज़ी 5/529, हदीस संख्या : 3505 तथा मुसतदरक हाकिम 1/505। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। तथा देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/168।

ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्ह़ानका इन्नी कुन्तु मिनज़-ज़ालिमीन

"अल्लाह, अल्लाह, मेरा रब , मैं किसी को उसका साझी नहीं बनाऊँगा।" [165] [165] सुनन अबू दाऊद 2/87 हदीस संख्या : 1525 तथा इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 3882। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/335।

अल्लाहु अल्लाहु रब्बी ला उश्रिकु बिहि शैअन

36- शत्रु तथा शासक से मिलने की दुआ

"ऐ अल्लाह, हम तुझे उनके मुक़ाबले में पेश करते हैं और उनकी विषैलेपन से तेरी पनाह चाहते हैं।" [166] [166] सुनन अबू दाऊद 2/89, हदीस संख्या : 1537। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : मुसतदरक हाकिम 2/142।

अल्लाहुम्मा इन्ना नज्अलुका फ़ी नुह़ूरिहिम, व नऊज़ु बिका मिन शुरूरिहिम

"ऐ अल्लाह तू ही मेरा बाज़ू और सहायक है। तेरे ही सहारे मैं स्थान बदलता हूँ, तेरी ही मदद से शत्रु पर आक्रमण करता हूँ और तेरी सहायता से युद्ध करता हूँ।" [167] [167] सुनन अबू दाऊद 3/42, हदीस संख्या : 2632 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/572, हदीस संख्या : 3584। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/183।

अल्लाहुम्मा अन्ता अज़ुदी, व-अन्ता नस़ीरी, बिका अह़ूलु व-बिका अस़ूलु, व-बिका उक़ातिल

"अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है और वही सबसे अच्छा कार्य-साधक है।" [168] [168] सहीह बुख़ारी 5/172, हदीस संख्या : 4563।

ह़स्बुनल्लाहु व-निअ्मल वकील

37- शासक के अत्याचार से डरे हुए व्यक्ति की दुआएँ

"ऐ अल्लाह, सातों आकाशों के रब तथा महान सिंहासन के रब ! मुझे अमुक से जो अमुक का पुत्र है तथा उसके जत्थों से शरण देने वाला बन जा कि उनमें से कोई मुझपर अत्याचार अथवा अतिक्रमण करे। तेरी शरण पाने वाला बलवान है, तेरी प्रशंसा बहुत बड़ी है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।" [169] [169] इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद 707। अलबानी ने इसे सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 545 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा रब्बस समावातिस-सब्इ, व रब्बल् अर्शिल् अज़ीमि, कुन् ली जारन मिन फुलान् इब्नि फुलानिन, व अह़्ज़ाबिही मिन ख़लाइक़िका, अन् यफ़्रुत़ा अलय्या अ'ह़'दुम् मिन्हुम औ यत़्ग़ा, अज़्ज़ा जारुका, व-जल्ला स़नाउका, व ला इलाहा इल्ला अन्त

"अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह अपनी सारी सृष्टि से अधिक बलशाली है। अल्लाह उससे भी बलशाली है, जिससे मैं डर रहा हूँ तथा भय महसूस कर रहा हूँ। मैं उस अल्लाह की शरण में आता हूँ, जिसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, जिसने सातों आकाशों को धरती के ऊपर गिरने से रोक रखा है, और जिसकी अनुमति मिलने पर आकाशों का बंधन टूट जाएगा, उसके अमुक बंदे, उसकी सेनाओं और उसके अनुसरणकारी जिन्नों एवं इनसानों की बुराई से। ऐ अल्लाह! मुझे उनकी बुराई से शरण देने वाला बन जा। तेरी प्रशंसा बहुत बड़ी है, तेरी शरण में आने वाला बलवान हो जाता है, तेरा नाम बरकत वाला है और तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।"

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अ-अज़्ज़ु मिन ख़ल्क़िही जमीअन, अल्लाहु अ-अज़्ज़ु मिम्मा अख़ाफ़ु व अह़्ज़रु, अऊज़ु बिल्लाहिल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवा, अल-मुम्सिकिस् समावातिस् सब्इ अन् यक़अ्ना अलल अर्ज़ि इल्ला बि-इज़्निही, मिन शर्रि अब्दिका फ़ुलानिन, व-जुनूदिही व-अत्बाइही व-अश्याइही, मिनल जिन्नि वल इन्सि, अल्लाहुम्मा कुन् ली जारन मिन शर्रिहिम, जल्ला स़नाउका व अज़्ज़ा जारुका, व-तबारकस्मुका, व ला इलाहा ग़ैरुक। तीन बार। [170] [170] अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या :708। अलबानी ने सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 546 में इसे सहीह कहा है।

38- शत्रु के लिए बददुआ

"ऐ अल्लाह! किताब उतारने वाले और जल्दी हिसाब लेने वाले! इन जत्थों को पराजित कर। ऐ अल्लाह! इन्हें पराजित कर और इन्हें हिलाकर रख दे।" [171] [171] सहीह मुस्लिम 3/1362, हदीस संख्या : 1742।

अल्लाहुम्मा मुन्ज़िलल किताबि, सरीअल हिसाबि, इह्ज़िमिल अहज़ाबि, अल्लाहुम्मा इह्ज़िम्हुम व ज़ल्ज़िलहुम

39- जिसे लोगों का डर हो, वह यह दुआ पढ़े

"ऐ अल्लाह! तू जैसे चाहे, मेरी ओर से उनसे निमट ले।" [172] [172] सहीह मुस्लिम 4/2300, हदीस संख्या : 3005।

अल्लाहुम्म् इक्फ़िनीहिम बिमा शिअ्ता

40- जिसे अपने ईमान में संदेह होने लगे, उसके लिए दुआ

अल्लाह की शरण माँगे। [173] यह दुआ पढ़े : "मैं दुत्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" [173] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/336, हदीस संख्या : 3276 तथा सहीह मुस्लिम 1/120, हदीस संख्या : 134।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर् रजीम

इस संदेह से खुद को अलग कर ले। [174] [174] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/336, हदीस संख्या : 3276 तथा सहीह मुस्लिम 1/120, हदीस संख्या : 134।

(यह कहे : (मैं अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाया।)) [175] [175] सहीह मुस्लिम 1/119-120, हदीस संख्या : 134।

आमन्तु बिल्लाहि व रुसुलिहि

यह आयत पढ़े : "वही प्रथम, वही अन्तिम और प्रत्यक्ष तथा गुप्त है और वह प्रत्येक वस्तु का जानने वाला है।" [सूरा हदीद : 3] [176] [176] सूरा अल-हदीद आयत संख्या : 3। सुनन अबू दाऊद 4/329, हदीस संख्या : 5110। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/962 में सहीह कहा है।

41- क़र्ज़ की अदायगी के लिए दुआ

"ऐ अल्लाह! मुझे अपने हलाल चीज़ों के द्वारा अपनी हराम चीज़ों से बचा ले और मुझे अपने अनुग्रह से अपने अतिरिक्त अन्य लोगों से बेनियाज़ कर दे।" [177] [177] सुनन तिरमिज़ी 5/560। हदीस संख्या :3563। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/180।

अल्लाहुम्मक्फ़िनी बिह़लालिका अन ह़रामिका, व अग़्निनी बिफ़ज़्लिका अम्मन सिवाक

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।" [178] [178] सहीह बुख़ारी 7/158, हदीस संख्या : 2893। यह हदीस पहले भी पृष्ठ : 83 में हदीस संख्या : 121 के तहत गुज़र चुकी है।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिनल हम्मि वल ह़'ज़'नि, वल अज्ज़ि वल क'स'लि, वल बुख़्लि वल जुब्नि, व ज़'ल'इद् दैनि व ग़'ल'बतिर् रिजाल

42- नमाज़ में अथवा क़ुरआन पढ़ते समय आने वाले बुरे ख़यालों से बचने की दुआ

"«मैं दुत्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर् रजीम तथा अपने बाईं ओर तीन बार थुकथुकाए[179]।" [179] सहीह मुस्लिम 4/1729, हदीस संख्या : 2203। वर्णनकर्ता उसमान बिन अबू अल-आस -रज़ियल्लाहु अनहु- हैं। इसमें उनका यह कथन भी है कि मैंने ऐसा किया, तो अल्लाह की कृपा से बुरे ख़याल दूर हो गए।

43- उस व्यक्ति की दुआ, जिसे कोई कार्य कठिन दिखाई पड़े

"ऐ अल्लाह! आसान केवल वही कार्य है, जिसे तू आसान बनाए और तू जब चाहे तो कठिन कार्य को भी आसान बना दे।" [180] [180] सहीह इब्न-ए-हिब्बान, हदीस संख्या : 2427 (मवारिद) तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 351। हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर कहते हैं : "यह एक सहीह हदीस है।" अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने भी इसे इमाम नववी की अल-अज़कार की हदीसों को संदर्भित करने के क्रम में पृष्ठ संख्या : 106 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा ला सहला इल्ला मा जअल्तहु सहलन्, व अन्ता तज्अलुल ह़ज़्ना इज़ा शिअ्ता सहला

44- आदमी गुनाह कर बैठे, तो कौन-सी दुआ पढ़े और क्या करे?

"जब कोई बंदा कोई गुनाह कर बैठे, फिर अच्छी तरह वज़ू करे, फिर उठकर दो रकात नमाज़ पढ़े और अल्लाह से क्षमा माँगे, तो अल्लाह उसे क्षमा कर देता है।" [181] [181] सुनन अबू दाऊद 2/86, हदीस संख्या : 1521 और सुनन तिरमिज़ी 2/257, हदीस संख्या : 406। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/283 में सहीह कहा है।

45- शैतान और उसके बुरे ख़यालों को दूर करने की दुआ

अल्लाह से उसकी शरण माँगना। [182] [182] सुनन अबू दाऊद 1/203 तथा सुनन इब्न-ए-माजा 1/265, हदीस संख्या : 807। पीछे पृष्ठ संख्या : 31 के तहत इसके संदर्भों का उल्लेख किया जा चुका है। देखिए : सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्या : 97-98।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर् रजीम

अज़ान देना। [183] [183] सहीह मुस्लिम 1/291, हदीस संख्या : 389 तथा सहीह बुख़ारी 1/151, हदीस संख्या : 608।

अज़कार एवं क़ुरआन की तिलावत में व्यस्त होना।

"तुम अपने घरों को क़ब्रिस्तान न बनाओ। निस्संदेह शैतान उस घर से दूर भागता है, जिसमें सूरह अल-बक़रह पढ़ी जाए।"[184] [184] सहीह मुस्लिम (1/539), हदीस संख्या : (780)।

इसी तरह सुबह एवं शाम, सोने तथा जागने, घर में प्रवेश करने तथा घर से बाहर निकलने और मस्जिद के अंदर जाने और उससे बाहर निकलने आदि के अज़्कार, तथा इनके अतिरिक्त अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सिखाए हुए अन्य अज़्कार, जैसे सोते समय आयत अल-कुर्सी एवं सूरह अल-बक़रह की अंतिम दो आयतों का पढ़ना आदि भी शैतान को भगाने का काम करते हैं। इसी तरह जिसने कहा : अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर सौ बार, उसे पूरे दिन शैतान से सुरक्षा प्राप्त होगी [185], इसी तरह अज़ान भी शैतान को भगाने का काम करती है। [185] सहीह बुख़ारी (4/126), हदीस संख्या : (3293)।

46- जब कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए या आदमी विवश दिखाई दे, उस समय की दुआ

"यही अल्लाह का निर्णय है और अल्लाह जो चाहे करता है।" [186] [186] “शक्तिशाली मोमिन कमज़ोर मोमिन के मुकाबले में अल्लाह के समीप अधिक बेहतर तथा प्रिय है। किंतु, प्रत्येक के अंदर भलाई है। जो चीज तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसके लिए तत्पर रहो और अल्लाह की मदद माँगो तथा असमर्थता न दिखाओ। फिर यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि अल्लाह ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है। क्योंकि ‘अगर’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।” सहीह मुस्लिम 4/2052, हदीस संख्या : 2664।

क़'द'रुल्लाहि व मा शाआ फ़'अ'ल

47- जिसके घर नया बच्चा पैदा हुआ हो, उसके लिए मुबारकबाद तथा उसका उत्तर

"अल्लाह ने आप को जो बच्चा दिया है, उसमें आप के लिए बरकत दे, आप बच्चा देने वाले का शुक्र अदा करें, बच्चा युवावस्था को पहुँचे और आप को उसके अच्छे व्यवहार का लाभ मिले।" [187] [187] इसे हसन बसरी के कथन के रूप में बयान किया जाता है। देखिए : इब्न अल-क़य्यिम की किताब तोहफ़ा अल-मौदूद पृष्ठ : 20। जबकि अल-औसत में इसे इब्न अल-मुंज़िर के हवाले से नक़ल किया गया है।

बारकल्लाहु लका फ़िल् मौहूबि लका, व श'कर्तल वाहिबा, व ब'ल'ग़ा अशुद्दह, व रुज़िक़्ता बिर्रहू और बधाई पाने वाला उसे जवाब में यह कहे : "अल्लाह आप पर बरकतों की बारिश करे, आप को इसका अच्छा बदला दे, इसके समान आप को भी दे और ख़ूब प्रतिफल दे।" [188] [188] यह बात नववी ने अल-अज़कार पृष्ठ : 349 में कही है। तथा देखिए : सलीम हिलाली की सहीह अल-अज़कार 2/713 तथा इस किताब में लेखक की किताब तमाम अत-तख़रीज फ़ी अज़-ज़िक्र व अद-दुआ व अल-इलाज बि-अर-रुक़ा 1/ 416।

बारकल्लाहु लका व बारका अलैका, व जज़ाकल्लाहु ख़ैरन, व र'ज़'क़'कल्लाहु मिस़्लहू, व अज्ज़ल स़वाबक।

48- बच्चों को अल्लाह की शरण में देने के शब्द

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हसन और हुसैन -रज़ियल्लाहु अनहुमा- को इन शब्दों द्वारा अल्लाह की शरण में देते थे : "मैं तुम दोनों को अल्लाह के संपूर्ण शब्दों द्वारा अल्लाह की शरण में देता हूँ हर शैतान, ज़हरीले जानवर एवं लग जाने वाली नज़र से।" [189] [189] सहीह बुख़ारी 4/119, हदीस संख्या : 3371, वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- हैं।

उईज़ुकुमा बिकलिमातिल्लाहित् ताम्मति मिन कुल्लि शैत़ानिन व हाम्मतिन, व मिन कुल्लि ऐनिन लाम्मतिन।

49- रोगी का हाल जानने जाते समय उसके लिए की जाने वाली दुआ

"कोई बात नहीं है। अल्लाह ने चाहा तो यह (बीमारी) पाक-साफ करने वाली है।" [190] [190] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ (10/118), हदीस संख्या : (3616)।

ला बअसा, त़हूरुन, इन शा अल्लाह

"मैं विशाल सिंहासन के रब महान अल्लाह से विनती करता हूँ कि तुम्हें स्वास्थ्य लाभ कराए।"

अस्अलुल्लाहा अल-अज़ीमा, रब्बल अर्शिल अज़ीमि, अन् यश्फ़ियका इसे सात बार कहे। [191] [191] "जब कोई मुसलमान किसी बीमार व्यक्ति का, जिसकी मृत्यु का समय न आया हो, हाल जानने और उसे ढारस देने के लिए उसके पास जाता है और सात बार यह दुआ पढ़ता है : ... तो उसे स्वास्थ्य लाभ हो जाता है।" सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 2083 तथा सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3106। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/210, तथा सहीह अल-जामे 5/180।

50- बीमार व्यक्ति का हाल जानने के लिए जाने की फ़ज़ीलत

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब कोई व्यक्ति अपने बीमार मुसलमान भाई को देखने जाता है, तो जब तक उसके पास जाकर बैठ नहीं जाता, उस समय तक जन्नत के फलों को चुनने के लिए चल रहा होता है। फिर जब वह बैठ जाता है, तो उसे अल्लाह की कृपा ढाँप लेती है। अगर वह सुबह के समय निकला होता है, तो शाम तक उसके लिए सत्तर हज़ार फ़रिश्ते अल्लाह की कृपा की दुआ करते रहते हैं, और अगर शाम के समय निकला होता है, तो सुबह तक सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उसके लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं।" [192] [192] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 969, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1442 और मुसनद-ए-अहमद हदीस संख्या : 975। देखिए सहीह इब्न-ए-माजा 1/244 तथा सहीह तिरमिज़ी 1/286। अहमद शाकिर ने भी इसे सहीह कहा है।

51- जीवन से निराश रोगी की दुआ

"ऐ अल्लाह, तू मुझे माफ कर दे और मुझपर दया कर तथा मुझे रफ़ीक़-ए-आला (उच्च मित्र अर्थात नबियों, शहीदों, सिद्दीक़ों तथा नेक लोगों) से मिला दे।" [193] [193] सहीह बुख़ारी 7/10 हदीस संख्या : 4435 तथा सहीह मुस्लिम 4/1893 हदीस संख्या : 2444।

अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली, वर्ह़म्नी, व अल्हिक़्नी बिर-रफ़ीक़िल आला

मृत्यु के समय अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने दोनों हाथ पानी में डालकर उनको अपने चेहरे पर फेरने लगे और यह दुआ करने लगे : अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। निश्चय मृत्यु के समय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।" [195] "अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं"

ला इलाहा इल्लल्लाह इन्ना लिल् मौति स'क'रातिन [194] [194] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/144 हदीस संख्या : 4449। इस हदीस में मिसवाक का उल्लेख है।

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह सबसे बड़ा है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है तथा अल्लाह की मदद के बिना न किसी के पास पुण्य करने की क्षमता है, न गुनाह से बचने की शक्ति।" [195] [195] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3430, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3794। अलबानी ने इसे सहीह तिरमिज़ी 3/152 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/317 में सहीह कहा है।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबरु, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु, ला इलाह इल्लल्लाह वहदहु ला शरीक लहु, ला इलाह इल्लल्लाह लहुल मुल्कु वलहुल हम्दु, ला इलाह इल्लल्लाह वला हौल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाह

52- मृत्यु के निकट व्यक्ति को कलिमा पढ़ने की प्रेरणा देना

"जिसकी ज़बान से निकलने वाला अंतिम शब्द अल्लाह के सिवा कोई (वास्तविक) पूज्य नहीं

ला इलाहा इल्लल्लाह हो, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।" [196] [196] सुनन अबू दाऊद 3/190, हदीस संख्या : 3116। देखिए : सहीह अल-जामे 5/432।

53- विपत्ति के शिकार व्यक्ति की दुआ

"निश्चय ही हम अल्लाह के लिए हैं और हमें उसी की ओर लौटकर जाना है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी इस मुसीबत का प्रतिफल प्रदान करना तथा मुझे इसके स्थान पर इससे अच्छी चीज़ देना।" [197] [197] सहीह मुस्लिम 2/632, हदीस संख्या : 918।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन, अल्लाहुम्मअ्जुर्नी फ़ी मुस़ीबती, व अख़्लिफ़ ली ख़ैरम् मिन्हा

54- मृतक की आँखें बंद करते समय की दुआ

ऐ अल्लाह! अमुक (उसका नाम लेकर कहे) को क्षमा कर दे, सुपथगामी लोगों में उसका पद ऊँचा कर दे, उसके जाने के बाद उसके छोड़े हुए लोगों में उसका प्रतिनिधि बन जा। हे सारे संसार के पालनहार! हमें और उसे क्षमा कर दे, उसके लिए उसकी क़ब्र को खूब फैला दे और उसके लिए उसमें प्रकाश का प्रबंध कर दे।" [198] [198] सहीह मुस्लिम 2/634, हदीस संख्या : 920।

अल्लाहुम्म् इग़फ़िर लिफ़ुलानिन (बिस्मिही), वरफ़अ् द'र'ज'तहु फ़िल-महदिय्यीना, वख़्लुफ़हु फ़ी अक़िबिही फ़िल-ग़ाबिरीन, वग़फ़िर लना व-लहु या रब्बल आलमीना, वफ़्सह़ लहु फ़ी क़ब्रिही, व-नव्विर लहु फ़ीहि

55- जनाज़े की नमाज़ में मृतक के लिए दुआ

"ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, इसपर दया कर, इसे सकुशल रख, इसे माफ़ कर, इसका ससम्मान सत्कार कर, इसकी क़ब्र को फैला दे, इसे पानी, बर्फ और ओले से धो दे, इसे गुनाहों से उस तरह स्वच्छ एवं साफ़ कर, जैसे तू ने उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया है, इसे अपने घर के बदले में उससे उत्तम घर प्रदान कर, अपने घर वालों से अच्छे घर वाले दे और अपने जीवन साथी से अच्छा जीवन साथी दे, इसे जन्नत में दाख़िल कर और क़ब्र की यातना तथा आग के अज़ाब से बचा।" [199] [199] सहीह मुस्लिम 2/663, हदीस संख्या : 963।

अल्लाहुम्मग़फ़िर लहु वर्ह़म्हु, व आफ़िहि, वअ्फ़ु अन्हु, व अक्रिम नु'ज़ु'लहु, व वस्सिअ मुद्ख़'ल'हु, वग़्सिल्हु बिल-माई वस़-स़ल्जि वल-ब'र'दि, व नक़्क़िहि मिनल-ख़त़ाया कमा नक़्क़ैतस़-स़ौबल-अब्यज़ा मिनद्-द'न'सि, व अब्दिल्हु दारन ख़ैरम् मिन दारिहि, व अहलन ख़ैरम् मिन अहलिहि, व ज़ौजन ख़ैरम् मिन ज़ौजिहि, व अद्ख़िलहुल-जन्नता, व अइज़्हु मिन अज़ाबिल-क़ब्रि [व अज़ाबिन-नार]

"ऐ अल्लाह, हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, इस्लाम पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे ईमान की अवस्था में मौत दे। ऐ अल्लाह, हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद पथ-भ्रष्ट मत कर।" [200] [200] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 3201, तिरमिज़ी : 1024, नसई : 1985, इब्न-ए-माजा 1/480, हदीस संख्या : 1498 तथा मुसनद-ए-अहमद 2/368, हदीस संख्या : 8809। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/251।

अल्लाहुम्मग़फ़िर लिह़य्यिना व-मय्यितिना, व-शाहिदिना व-ग़ाइबिना, व-सग़ीरिना व-कबीरिना, व-ज़करिना व-उन्साना, अल्लाहुम्मा मन अह़्यैतहु मिन्ना फ़अह़्यिही अलल इस्लामि, व-मन तवफ़्फ़ैतहु मिन्ना फ़'त'वफ़्फ़हु अलल ईमानि, अल्लाहुम्मा ला तह़रिम्ना अज्रहु, वला तुज़िल्लना बअ्दहु।

"ऐ अल्लाह, अमुक पुत्र अमुक तेरी शरण तथा तेरी सुरक्षा में है। अतः उसे क़ब्र की आज़माइश और आग के अज़ाब से बचा। तू दाता और प्रशंसायोग्य है। ऐ अल्लाह, इसे क्षमा कर दे और इसपर दया कर। निश्चय ही तू अति क्षमाशील और दयावान है।" [201] [201] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1499। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/251। सुनन अबू दाऊद 3/211, हदीस संख्या : 3202।

अल्लाहुम्मा इन्ना फुलानब्ना फुलानिन फ़ी ज़िम्मतिका, व ह़ब्लि जिवारिका, फ़क़िहि मिन फ़ित्नतिल् क़ब्रि, व अज़ाबिन् नारि, व अन्ता अहलुल वफ़ाइ वल हक़्क़ि, फ़ग़्फ़िर लहु वर्ह़म्हु इन्नका अन्तल ग़फ़ूरुर रह़ीम।

"ऐ अल्लाह! यह तेरा बंदा और तेरी दासी का बेटा है, जो तेरी दया का मोहताज है और तुझे उसे यातना देने की आवश्यकता नहीं है। अगर यह सदाचारी है, तो तू इसकी नेकियों को बढ़ा दे और अगर दुराचारी है, तो इसे क्षमा कर दे।" [202] [202] मुसतदरक हाकिम 1/359। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : अलबानी की किताब अहकाम अल-जनाइज़ पृष्ठ : 125।

अल्लाहुम्मा अब्दुका वब्नु अमतिका इह़्ताजा इला रह़मतिका, व अन्ता ग़निय्युन अन अज़ाबिही, इन् काना मुह़सिनन फ़ज़िद फ़ी ह़सनातिही, व इन् काना मुसीअन फ़तजावज़ अन्हु

56- जनाज़े की नमाज़ में बच्चे के लिए की जाने वाली दुआएँ

"ऐ अल्लाह! इसे क़ब्र की यातना से बचा।" [203] [203] सईद बिन मुसय्यिब कहते हैं : "मैंने अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- के पीछे एक ऐसे बच्चे की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, जिसने कभी कोई गुनाह नहीं किया था, इसके बावजूद उन्होंने यह दुआ पढ़ी : ...।" देखिए : इमाम मालिक की अल-मुवत्ता 1/288, इब्न-ए-अबू शैबा की अल-मुसन्नफ़ 3/217 तथा बैहक़ी 4/9। शोऐब अरनाऊत ने शर्ह अस-सुन्नह के अनुसंधान 5/357 में इसकी सनद को सहीह कहा है।

अल्लाहुम्म अइज़्हु मिन अज़ाबिल क़ब्र

और यदि कहे : "ऐ अल्लाह! इसे इसके माता-पिता के लिए अग्रदूत एवं संग्रह और एक स्वीकार्य सिफ़ारिशकर्ता बना दे। ऐ अल्लाह! इसके द्वारा उनके तराजू को भारी कर दे, और इसके द्वारा उनके पुण्य को बढ़ा दे। इसे नेक मोमिनों के साथ मिला दे, इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- की कफ़ालत (ज़िम्मेदारी, लालन-पालन) में रख एवं अपनी दया से इसे जहन्नम के अज़ाब से बचा। इसे इसके घर से बेहतर घर एवं इसके परिवार से बेहतर परिवार प्रदान कर। ऐ अल्लाह! हमारे पूर्वजों, अग्रदूतों एवं ईमान के साथ हमसे आगे बढ़ चुके लोगों को क्षमा कर।"

अल्लाहुम्मजअल्हु फ़रत़न् व ज़ुख़रन् लिवालिदैहि, व शफ़ीअन् मुजाबन, अल्लाहुम्म स़क़्क़िल बिहि मवाज़ीनहुमा, व आअज़िम बिहि उजूरहुमा, व अल्हिक़्हु बिस़ालिह़िल मुअ्मिनीना, वज्अल्हु फ़ी कफ़ालति इब्राहीमा, व-क़िहि बिरह़्मतिका अज़ाबल जहीमि, व अब्दिल्हु दारन ख़ैरन् मिन दारिहि, व अहलन ख़ैरन् मिन अहलिहि, अल्लाहुम्मग़फ़िर लि-अस्लाफ़िना, व अफ़्रात़िना, व-मन स'ब'क़ना बिलईमान। तो उत्तम है। [204] [204] देखिए : इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी 3/416 तथा शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ की किताब अद-दुरूस अल-मुहिम्मह लि-आम्मह अल-उम्मह पृष्ठ : 15।

"ऐ अल्लाह! इसे हमारे लिए गंतव्य में पहले पहुँचकर तैयारी करने वाला,हमारे लिए हम से पहले जन्नत की तरफ जाने वाला और प्रतिफल का साधन बना।" [205] [205] हसन बच्चे पर सूरा फ़ातिहा पढ़ते और उसके बाद यह दुआ पढ़ते : ... इसे बग़वी ने शर्ह अस-सुन्नह 5/357 में तथा अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने हदीस संख्या : 6558 के तहत नक़ल किया है। जबकि इमाम बुख़ारी ने इसे किताब अल-जनाइज़, अध्याय : क़िराअह फ़ातिहा अल-किताब अला अल-जनाज़ह 2/113 में, हदीस संख्या : 1335 से पहले तालीक़ करके नक़ल किया है।

अल्लाहुम्मजअल्हु लना फ़'र'त़न, व स'ल'फ़न, व अज्रन

57- मृतक के परिजन को सांत्वना देने के शब्द

"बेशक अल्लाह ही का है, जो उसने ले लिया और उसी का है, जो उसने दिया। उसके निकट प्रत्येक वस्तु का समय निश्चित है। अतः अब तू सब्र कर तथा अल्लाह से प्रतिफल की उम्मीद रख।" [206] [206] सहीह बुख़ारी 2/80, हदीस संख्या : 1284 तथा सहीह मुस्लिम 2/636, हदीस संख्या : 923।

इन्ना लिल्लाहि मा अ'ख़'ज़, व लहु मा आअ्त़ा, व कुल्लु शैइन इन्दहु बि-अ'ज'लिन् मुसम्मा... फ़ल्तस्बिर वल्तह्तसिब

यदि यह दुआ भी पढ़ ले : "अल्लाह तुम्हें बड़ा प्रतिफल दे, हिम्मत से काम लेने की शक्ति दे और तुम्हारे मृतक को क्षमा करे।"

आअ्ज़मल्लाहु अज्रका, व अह़सना अज़ाअका, व ग़'फ़'रा लि-मय्यितिक तो उत्तम है [207]। [207] नववी की किताब अल-अज़कार पृष्ठ : 126।

58- मृतक को क़ब्र में दाखिल करते समय की दुआ

"हम इसे अल्लाह के नाम से और उसके रसूल की सुन्नत के अनुरूप क़ब्र में रख रहे हैं।" [208] [208] सुनन अबू दावूद (3/314), हदीस संख्या : (3215), सहीह सनद के साथ। इसी तरह मुसनद अहमद, हदीस संख्या : (5234) तथा (4812)। उसके शब्द हैं : "बिस्मिल्लाहि व-अला मिल्लति रसूलिल्लाहि" इसकी सनद भी सहीह है।

बिस्मिल्लाहि व-अला सुन्नति रसूलिल्लाह

59- मृतक को दफ़न करने के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ

"ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे और सुदृढ़ रख।" [209] [209] अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब मृतक को दफ़न करने का काम संपन्न कर लेते तो उसके पास खड़े हो जाते और फ़रमाते : "अपने भाई के लिए क्षमायाचना करो और उसके लिए सुदृढ़ रहने की दुआ करो। क्योंकि इस समय उससे प्रश्न किया जा रहा है।" सुनन अबू दाऊद 3/315, हदीस संख्या : 3223, तथा हाकिम 1/370। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है।

अल्लाहुम्मग़्फ़िर लहु, अल्लाहुम्म स़ब्बित्हु

60- क़ब्रों की ज़ियारत की दुआ

"ऐ इस स्थान के रहने वाले मोमिनो और मुसलमानो, अल्लाह तुमपर शांति की जलधारा बरसाए और हम भी इन शा अल्लाह तुमसे मिलने वाले हैं। अल्लाह हममें से आगे जाने वालों और पीछे आने वालों पर दया करे। मैं अल्लाह से हमारे तथा तुम्हारे लिए कल्याण की प्रार्थना करता हूँ।" [210] [210] सहीह मुस्लिम 2/671, हदीस संख्या : 975 तथा इब्न-ए-माजा 1/494, हदीस संख्या : 1547। हदीस के वर्णनकर्ता बुरैदा -रज़ियल्लाहु अनहु- हैं और यहाँ नक़ल किए गए शब्द इब्न-ए-माजा से लिए गए हैं। जबकि दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग सहीह मुस्लिम 2/671, हदीस संख्या : 975 में लिया गया है और आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है।

अस्सलामु अलैकुम अह्लद-दियारि, मिनल मुअ्मिनीना वल मुस्लिमीना, व-इन्ना इन शा अल्लाहु बिकुम लाहिक़ून, [व-यरह़मुल्लाहुल् मुस्तक़दिमीना मिन्ना वल मुस्तअ्ख़िरीना], अस-अलुल्लाहा लना व लकुमुल आफ़ियता।

61- आँधी के समय की दुआ

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस तेज़ हवा (आँधी) की भलाई माँगता हूँ और इसकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।" [211] [211] सुनन अबू दाऊद 4/326 हदीस संख्या : 5099 तथा इब्न-ए-माजा 2/1228, हदीस संख्या : 3727। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/305।

अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका ख़ैरहा, व अऊज़ु बिका मिन् शर्रिहा

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई, इसमें जो कुछ है उसकी भलाई तथा इसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी भलाई माँगता हूँ। तथा इसकी बुराई, इसमें जो कुछ है उसकी बुराई और इसे जिसके साथ भेजा गया है उसकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।" [212] [212] सहीह मुस्लिम 2/666, हदीस संख्या : 899 तथा सहीह बुख़ारी 4/76, हदीस संख्या : 3206 एवं 4829। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरहा, व ख़ैरा मा फ़ीहा, व ख़ैरा मा उर्सिलता बिहि, व अऊज़ु बिका मिन शर्रिहा, व शर्रि मा फ़ीहा, व शर्रि मा उर्सिलता बिहि।

62- बादल गरजते समय की दुआ

"मैं पवित्रता बयान करता हूँ उस प्रभु की, बिजली की कड़क जिसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करती है और फ़रिश्ते उसके भय से काँपते हैं।" [213] [213] अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- जब बादल गरजने की आवाज़ सुनते, तो बात करना बंद कर देते और यह दुआ पढ़ते : ...। मुवत्ता 2/992। अलबानी सहीह अल-कलिम अत-तय्यिब पृष्ठ : 157 में कहते हैं : सहाबी के कथन के रूप में इसकी सनद सहीह है।

सुब्ह़ानल्लज़ी युसब्बिह़ुर् रअ्दु बिह़म्दिही वल्-मलाइकतु मिन ख़ीफ़तिहि

63- बारिश माँगने की कुछ दुआएँ

"ऐ अल्लाह! हमें ऐसी बारिश दे, जो सहायक, अनुकूल और हरियाली लाने वाली हो। हानीकारक होने की बजाए लाभदायक हो, और देर न करे, बल्कि जल्दी आए।" [214] [214] सुनन अबू दाऊद 1/303, हदीस संख्या : 1171, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/216 में सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा इस्क़िना ग़ैस़न् मुग़ीस़न् मरीअन मरीअ़न, नाफ़िअन ग़ैरा ज़ार्रिन, आ़जिलन ग़ैरा आजिलिन

"ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे, ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे, ऐ अल्लाह! हमें बारिश दे।" [215] [215] सहीह बुख़ारी 1/224, हदीस संख्या : 1014, तथा सहीह मुस्लिम 2/613, हदीस संख्या : 897।

अल्लाहुम्मा अग़िस़्ना, अल्लाहुम्मा अग़िस़्ना, अल्लाहुम्मा अग़िस़्ना

"ऐ अल्लाह! अपने बंदों तथा अन्य प्राणियों की पियास दूर कर दे, अपनी कृपा की चादर फैला दे और अपने मृत नगर को फिर से जीवित कर दे।" [216] [216] सुनन अबू दाऊद 1/305, हदीस संख्या : 1178। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/218 में हसन कहा है।

अल्लाहुम्मस्क़ि इबादका, व-बहाइमका, वन्शुर् रह़मतका, व अह़्यी ब'ल'द'कल मय्यिता

64- बारिश होते देखते समय की दुआ

"ऐ अल्लाह! इसे लाभदायक बारिश बना दे।" [217] [217] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ (2/518), हदीस संख्या : (1032)।

अल्लाहुम्मा स़य्यिबन नाफ़िअन

65- बारिश होने के बाद की दुआ

"हमें अल्लाह के अनुग्रह तथा उसकी कृपा से वर्षा प्राप्त हुई।" [218] [218] सहीह बुख़ारी 1/205, हदीस संख्या : 846, तथा सहीह मुस्लिम 1/83, हदीस संख्या : 71।

मुत़िर्ना बिफ़ज़्लिल्लाहि व रह्मतिहि

66- बारिश रुकवाने की दुआ

"ऐ अल्लाह! हमारे आस-पास बारिश बरसा, हमपर नहीं। ऐ अल्लाह! टीलों पर, पहाड़ियों पर, घाटियों में और पेड़ों के उगने की जगहों पर बारिश बरसा।" [219] [219] सहीह बुख़ारी 1/224, हदीस संख्या : 933, तथा सहीह मुस्लिम 2/614, हदीस संख्या : 897।

अल्लाहुम्मा ह़वालैना व-ला अ़लैना, अल्लाहुम्मा अलल-आकामि वज़-ज़िराबि, व-बुत़ूनिल-औदियति, व मनाबितिश-शजर

67- नया चाँद देखने की दुुआ

"अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! तू इसे हमारे सामने शांति, ईमान, सुरक्षा और इस्लाम के साथ ला तथा उस चीज़ के सुयोग के साथ, जिसे तू ऐ हमारे रब प्रिय जानता और पसंद करता है। (ऐ चाँद!) हमारा तथा तुम्हारा पालनहार अल्लाह है।" [220] [220] सुनन तिरमिज़ी 5/504, हदीस संख्या : 3451, तथा सुनन दारिमी 1/336। शब्द दारिमी के हैं। देखिए : सहीह तिरमिज़ी : 3/157।

अल्लाहु अकबर, अल्लाहुम्मा अहिल्लहु अ़लैना बिल अम्नि वल-ईमानि, वस्सलामति वल-इस्लामि, वत्तौफ़ीक़ि लिमा तुह़िब्बु रब्बना व तर्ज़ा, रब्बुना व-रब्बुकल्लाह

68- रोज़ा इफ़तार करते समय की दुआ

"प्यास दूर हो गई, रगें तर हो गईं और अल्लाह ने चाहा तो प्रतिफल भी सिद्ध हो गया।" [221] [221] सुनन अबू दाऊद 2/306, हदीस संख्या :2359, आदि। देखिए : सहीह अल-जामे 4/209।

ज़'ह'बज़् ज़'म'उ वब्तल्लतिल उरूक़ु, व'स़'ब'तल अज्रु इन् शा अल्लाह

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी उस कृपा का वास्ता देकर विनती करता हूँ, जिसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है, कि मुझे क्षमा कर दे।" [222] [222] सुनन इब्न-ए-माजा 1/557, हदीस संख्या : 1753 में इसे अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- की दुआ के रूप में नक़ल किया गया है। हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने इसे अल-अज़कार की तख़रीज में हसन कहा है। देखिए : शर्ह अल-अज़कार 4/342।

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका, बिरह़्मतिका अल्लती वसिअत कुल्ला शैइन, अन् तग़्फ़िरा ली

69- खाने से पहले की दुआ

"जब तुम में से कोई व्यक्ति कोई चीज़ खाए, तो कहे :" अल्लाह के नाम से,

बिस्मिल्लाहि यदि शुरू में भूल जाए, तो कहे: "मैं इसके आरंभ और अंत में अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।" [223] [223] सुनन अबू दाऊद 3/347, हदीस संख्या : 3767 तथा सुनन तिरमिज़ी 4/288, हदीस संख्या : 1858। देखिए सहीह तिरमिज़ी 2/167।

बिस्मिल्लाहि फ़ी अव्वलिहि व आख़िरिह

"जिसे अल्लाह कोई खाना खिलाए, वह कहे : ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसमें बरकत दे और हमें इससे उत्तम भोजन खिला।

अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व अत़्इम्ना ख़ैरम् मिन्हु और जिसे अल्लाह दूध पिलाए, वह कहे : "ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसमें बरकत दे और हमें इस में से अधिक दे।" [224]" [224] सुनन तिरमिज़ी 5/506, हदीस संख्या :3455, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/158।

अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ीहि व ज़िद्ना मिन्हु

70- खाना खा लेने के बाद की दुआ

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खाना खिलाया और मुझे यह भोजन प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य।" [225] [225] इसे अबू दाऊद हदीस संख्या :4025, तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3458 और इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3285 ने रिवायत किया है। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/159।

अल्ह़म्दु लिल्लाहि अल्लज़ी अत़्अमनी हाज़ा, व र'ज़'क़'नीहि, मिन ग़ैरि ह़ौलिम् मिन्नी व ला क़ुव्वता

"मैं अल्लाह की अत्यधिक, स्वच्छ और बरकत वाली प्रशंसा करता हूँ। अल्लाह को छोड़ न प्रयाप्ति प्राप्त की जा सकती है, न उसे छोड़ा जा सकता है और न उससे बेनियाज़ी बरती जा सकती है, ऐ हमारे रब !" [226] [226] सहीह बुख़ारी 6/214, हदीस संख्या : 5458 और सुनन तिरमिजी 5/507, हदीस संख्या : 3456। शब्द सुनन तिरमिज़ी के हैं।

अल-ह़म्दु लिल्लाहि ह़म्दन कस़ीरन त़य्यिबम् मुबारकन फ़ीहि, ग़ैरा [मकफ़िय्यिन व-ला] मुवद्दइन, व-ला मुस्तग़्नन अन्हु रब्बना

71- अतिथि की दुआ आतिथेय के लिए

"ऐ अल्लाह! तू ने इन्हें जो रोज़ी दी है, उसमें बरकत दे, इन्हें क्षमा कर और इनपर कृपा कर।" [227]। [227] सहीह मुस्लिम 3/1615, हदीस संख्या : 2042।

अल्लाहुम्मा बारिक लहुम फ़ीमा रज़क़्तहुम, वग़्फ़िर लहुम वर्ह़म्हुम

72- दुआ के माध्यम से खाने या पीने की चीज़ माँगने का इशारा

"ऐ अल्लाह! तू उसे खिला जो मुझे खिलाए और उसे पिला जो मुझे पिलाए।" [228] [228] सहीह मुस्लिम 3/1626, हदीस संख्या : 2055।

अल्लाहुम्मा अत़्इम मन अत़्अ'म'नी, वस्क़ि मन सक़ानी

73- किसी के घर में रोज़ा इफ़तार करने के समय की दुआ

"तुम्हारे यहाँ रोज़ेदार इफ़तार करें , तुम्हारा खाना नेक लोग खायें और फ़रिश्ते तुम्हारे लिए दुआ करें ।" [229] [229] सुनन अबू दाऊद 3/367, हदीस संख्या : 3856, इब्न-ए-माजा 1/556, हदीस संख्या : 1747 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 296-298। यहाँ स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब किसी के यहाँ इफ़तार करते, तो यह दुआ पढ़ते थे। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/730 में सहीह कहा है।

अफ़्त़रा इन्दकुमुस़ स़ाइमूनe, व अ'क'ला त़आ'म'कुमुल् अबरारु, व स़ल्लत़ अलैकुमुल् मलाइकतु

74- रोज़ेदार की दुआ जब खाना उपस्थित हो और वह रोज़ा न तोड़े

"जब तुममें से किसी को निमंत्रण दिया जाये , तो वह निमंत्रण स्वीकार करे। अगर रोज़ेदार हो, तो दुआ दे दे और अगर रोज़े से न हो, तो खाए।" [230] इस हदीस में आए हुए शब्द "فَلْيُصَلِّ" का अर्थ है, दुआ दे दे। [230] सहीह मुस्लिम 2/1054, हदीस संख्या : 1150।

75- रोज़ेदार को जब कोई गाली दे, तो वह क्या कहे?

"मैं रोज़े से हूँ। मैं रोज़े से हूँ।" [231] [231] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 4/103, हदीस संख्या : 1894, तथा सहीह मुस्लिम 2/806, हदीस संख्या : 1151।

76- पहला फल देखने के समय की दूआ

"ऐ अल्लाह! हमारे लिए हमारे फलों में बरकत दे, हमारे लिए हमारे नगर में बरकत दे, हमारे लिए हमारे साअ् में बरकत दे और हमारे लिए हमारे मुद्द में बरकत दे।" [232] [232] सहीह मुस्लिम 2/1000, हदीस संख्या : 1373।

अल्लाहुम्मा बारिक लना फ़ी स़'म'रिना, व-बारिक लना फ़ी मदी'न'तिना, व-बारिक लना फ़ी स़ाइना, व-बारिक लना फ़ी मुद्दिना

77- छींक की दुआ

"जब तुम में से कोई छींके, तो कहे : सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है,

अलह़म्दु लिल्लाह और उसका भाई या जो उसके साथ है वह कहे: अल्लाह तुझ पर कृपा करे,

यर्ह़मुकल्लाह जब वह उससे ''यर्ह़मुकल्लाह'' (अल्लाह आप पर रहम करे) कहे, तो वह कहे: "अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारी दशा ठीक कर दे।" [233] [233] सहीह बुख़ारी 7/125, हदीस संख्या : 5870।

यह्दीकुमुल्लाहु वयुस़्लिह़ु बा'ल'कुम

78- यदि कोई काफ़िर छींकने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करे, तो क्या कहा जाए?

"अल्लाह तुम्हें हिदायत दे और तुम्हारी दशा ठीक कर दे।" [234] [234] सुनन तिरमिज़ी 5/82, हदीस संख्या : 2741, मुसनद-ए-अहमद 4/400, हदीस संख्या : 19586 तथा अबू दाऊद 4/308, हदीस संख्या : 5040। देखिए : सहीह अबू दाऊद 2/354।

यह्दीकुमुल्लाहु वयुस़्लिह़ु बा'ल'कुम

79- नवव्याहता के लिए दुआ

"अल्लाह तेरे लिए और तुझपर बरकत की बरखा बरसाए और तुम दोनों को अच्छाई के कामों में एकमत रखे।" [235] [235] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 2130, सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 1091, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 1905 तथा नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 259। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 1/316।

बारकल्लाहु लका, व बारका अलैका, व ज'म'अ बैनकुमा फ़ी ख़ैर

80- नवव्याहता तथा जानवर खरीदने वाले के लिए दुआ

जब तुम में से कोई किसी स्त्री से विवाह करे या कोई दास खरीदे, तो कहे : "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेषताएँ रखी हैं, उनकी भलाई माँगता हूँ। तथा मैं इसकी बुराई एवं इसकी रचना के समय तू ने इसके अंदर जो विशेषताएँ रखी हैं, उनकी बुराई से तेरी शरण में आता हूँ।"

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरहा, व ख़ैरा मा जबल्तहा अलैहि, व अऊज़ु बिका मिन शर्रिहा, व शर्रि मा जबल्तहा अलैह इसी तरह जब कोई ऊँट खरीदे, तो उसके कोहान का ऊपरी भाग पकड़ कर यह दुआ पढ़े।" [236] [236] सुनन अबू दाऊद 2/248 हदीस संख्या : 2160 तथा इब्न-ए-माजा 1/617, हदीस संख्या 1918। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 1/324।

81- स्त्री से संभोग से पहले की दुआ

"अल्लाह के नाम से। ऐ अल्लाह! हमें शैतान से बचा और हमें जो संतान दे उसे भी शैतान से बचा।" [237] [237] सहीह बुख़ारी 6/141, हदीस संख्या : 141 तथा सहीह मुस्लिम 2/1028, हदीस संख्या : 1434।

बिस्मिल्लाहि, अल्लाहुम्मा जन्निबनश् शैत़ाना, व जन्निबिश् शैत़ाना मा रज़क़्तना

82- क्रोध के समय की दुआ

"मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" [238] [238] सहीह बुख़ारी 7/99 हदीस संख्या : 3282 तथा सहीह मुस्लिम 4/2015 हदीस संख्या : 2610।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर रजीम

83- किसी विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति को देखकर पढ़ने की दुआ

"सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे उस विपत्ति से सुरक्षित रखा, जिसके साथ तुम को आज़माईश में डाला , और मुझे अपनी बहुत-सी सृष्टियों से स्रेष्ठ बनाया।" [239] [239] सुनन तिरमिज़ी 5/494, 5/493, ददीस संख्या : 3432। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153।

अल्ह़म्दु लिल्लाहिल्लज़ी आफ़ानी मिम्मब्तलाका बिहि, वफ़ज़्ज़लनी अला कसीरिम् मिम्मन् ख़लक़ा तफ़्ज़ीलन

84- सभा में पढ़ने की दुआ

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि उनकी गिनती के अनुसार अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक ही सभा में खड़े होने से पहले-पहले यह दुआ सौ बार पढ़ लिया करते थे : "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरी तौबा क़बूल कर ले। निश्चय ही तू बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला और क्षमा करने वाला है।" [240] [240] सुनन तिरमिज़ी हदीस संख्या : 3434 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3814, देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153 और सहीह इब्न-ए-माजा 2/321। शब्द तिरमिज़ी के हैं।

रब्बिग़्फ़िर ली, व-तुब अलैय्या, इन्नका अन्तत् तव्वाबुल ग़फ़ूर

85- सभा का प्रायश्चित

"ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौटकर आता हूँ।" [241] [241] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 4858, सुनन तिरमिज़ी : 3433 और सुनन नसई हदीस संख्या : 1344। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/153। एक सहीह हदीस में है कि आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने फ़रमाया : "अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब भी किसी सभा में बैठते, क़ुरआन की तिलावत करते या कोई नमाज़ पढ़ते तो उसका अंत इन शब्दों द्वारा करते : ... " नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 308 तथा मुसनद-ए-अहमद 6/77, हदीस संख्या : 24486। इसे डॉ फ़ारूक़ हमादा ने नसई की अमल अल-यौम वल-लैलह के अनुसंधान के दौरान सहीह कहा है। देखिए पृष्ठ : 273।

सुब्ह़ा'न'कल्लाहुम्मा व-बिह़म्दिका, अश्हदु अल्ला इलाह इल्ला अन्ता, अस्तग़्फ़िरुका व-अतूबु इलैका

86- उसके लिए दुआ, जिसने कहा : "अल्लाह तुझे क्षमा करे"

"और तुझे भी।" [242] [242] मुसनद-ए-अहमद 5/82, हदीस संख्या : 20778 तथा नसई की अमल अल-यौम व अल-लैलह, पृष्ठ : 218, हदीस संख्या : 421, अनुसंधान : डॉक्टर फ़ारूक़ हमादा।

व'ल'क

87- कोई उपकार करने वाले के लिए दुआ

"अल्लाह तुझे अच्छा बदला दे।" [243] [243] सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 2035। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6244 तथा सहीह अत-तिरमिज़ी 2/200।

जज़ाकल्लाहु ख़ैरन

88- दज्जाल के फ़ितने से बचाव के उपाय

"जिसने सूरा अल-कह्फ़ के आरंभ से दस आयतें याद कर लीं, उसे दज्जाल के फ़ितने से बचा लिया जाएगा।" [244] इसी तरह हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद के बाद दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह की शरण माँगने से भी उससे सुरक्षा प्राप्त होगी। [245] [245] देखिए : इस किताब की हदीस संख्या : (55) तथा (56), पृष्ठ : (41)। [244] सहीह मुस्लिम (1/555), हदीस संख्या : (809)। जबकि एक रिवायत में है : "सूरा अल-कह्फ़ के अंत से।" सहीह मुस्लिम (1/556), हदीस संख्या : (809)।

89- "मुझे तुमसे अल्लाह के लिए प्रेम है" कहने वाले के लिए दुआ

"तुझसे भी वह प्रेम रखे, जिसके लिए तू मुझसे प्रेम रखता है।" [246] [246] सुनन अबू दाऊद 4/333, हदीस संख्या : 5125। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/965 में सहीह कहा है।

अ'ह़ब्बक् अल्लज़ी अह़्बब्तनी लहु

90- अपना धन प्रस्तुत करने वाले के लिए दुआ

"अल्लाह तेरे परिवार एवं धन-संपत्ति में बरकत दे।" [247] [247] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ (4/288), हदीस संख्या : (2049)।

अल्लाह आपके परिवार और आपके धन-संपत्ति में बरकत प्रदान करे।

91- क़र्ज़ अदा करते समय क़र्ज़ देने वाले के लिए दुआ

"अल्लाह तेरे लिए तेरे धन एवं परिवार में बरकत दे। क़र्ज़ का बदला यह है कि देने वाले की प्रशंसा की जाए और लिए हुए क़र्ज़ को अदा कर दिया जाए।" [248] [248] नसई की अलम अल-यौम वल-लैलह, पृष्ठ : 300 तथा इब्न-ए-माजा 2/809, हदीस संख्या : 2424। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/55।

बा'र'कल्लाहु लका फ़ी अहलिका व मालिका

92- शिर्क से भय की दुआ

"ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि जान-बूझकर किसी को तेरा साझी बनाऊँ और तुझसे क्षमा माँगता हूँ उस शिर्क के लिए जो अनजाने में हो जाए।" [249] [249] मुसनद-ए-अहमद 4/403, हदीस संख्या : 19606 तथा बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या : 716। देखिए : सहीह अल-जामे 3/233 तथा अलबानी की सहीह अत-तरग़ीब व अत-तरहीब 1/19।

अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका अन् उश्रिका बिका व अना अअ्लमु, व अस्तग़्फ़िरुका लिमा ला अअ्लमु

93-यह दुआ (अल्लाह तुझ में बरकत दे) देने वाले के लिए दुआ

"अल्लाह तुझ में भी बरकत दे।" [250] [250] इब्न अस-सुन्नी, पृष्ठ : 138, हदीस संख्या : 278। देखिए : इब्न अल-क़य्यिम की अल-वाबिल अस-सय्यिब, पृष्ठ : 304, अनुसंधान : बशीर मुहम्मद अयून।

व-फ़ीका बा'र'कल्लाह

94- अपशगुन को अप्रिय जानने की दुआ

"ऐ अल्लाह! तेरे शगुन के अतिरिक्त कोई शगुन नहीं है, तेरी भलाई के अतिरिक्त कोई भलाई नहीं है और तेरे अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है।" [251] [251] मुसनद-ए-अहमद 2/220, हदीस संख्या : 7045 तथा इब्न अस-सुन्नी, हदीस संख्या : 292। अलबानी ने इसे अस-सिलसिला अस-सहीहा 3/54, हदीस संख्या : 1065 में सहीह कहा है। अल्लाह के रसूल को शगुन पसंद था। यही एक कारण है कि आपने एक व्यक्ति से एक अच्छी बात सुनी, जो आपके मन को भा गई, तो फ़रमाया : "हमने तेरे मुँह से तेरा शगुन ले लिया।" सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3719 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 9040। अलबानी ने इसे अस-सिलसिला अस-सहीहा 2/363 में अबू अश-शैख़ की कितबा अख़लाक़ अन-नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, पृष्ठ : 270 के हवाले से सहीह कहा है।

अल्लाहुम्मा ला त़ैरा इल्ला तै़रुका, वला ख़ैरा इल्ला ख़ैरुका, वला इलाहा ग़ैरुका

95- सवारी पर सवार होने की दुआ

"मैं अल्लाह के नाम से सवार होता हूँ। और सारी प्रशंसा अल्लाह की है।

बिस्मिल्लाहि, वल्ह़म्दु लिल्लाह {पवित्र है वह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया। अन्यथा हम इसे अपने वश में नहीं कर सकते थे।

सुब्ह़ानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा वमा कुन्ना लहु मुक़्रिनीन तथा हम अवश्य ही अपने पालनहार की ओर फिरकर जाने वाले हैं।}

व-इन्ना इला रब्बिना लमुन्क़लिबून "सारी प्रशंसा अल्लाह की है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है। तू पवित्र है। ऐ अल्लाह! मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया है। अतः मुझे क्षमा कर दे। क्योंकि तेरे अतिरिक्त कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।" [252] [252] सुनन अबू दाऊद 3/34, हदीस संख्या : 2602 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/501, हदीस संख्या : 3446। देखिए : सहीह तिरमिजी 3/156। दोनों आयतों के लिए देखिए : सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़, आयत संख्या : 13-14।

अल-ह़म्दु लिल्लाहि, अल-ह़म्दु लिल्लाहि, अल-ह़म्दु लिल्लाहि, अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु, सुब्ह़ानक् अल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी फ़ग़्फ़िर ली; फ़इन्नहु ला यग़फ़िरु अज़्-ज़ुनूबा इल्ला अन्ता

96- यात्रा की दुआ

अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।

अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु, अल्लाहु अकबरु {पवित्र है वह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया। अन्यथा हम इसे अपने वश में नहीं कर सकते थे।

सुब्ह़ानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा वमा कुन्ना लहु मुक़रिनीना तथा हम अवश्य ही अपने पालनहार की ओर फिरकर जाने वाले हैं।}

व इन्ना इला रब्बिना लमुन्क़लिबून "ऐ अल्लाह! हम अपनी इस यात्रा में तुझसे भलाई, धर्मपरायणता और ऐसा अमल माँगते हैं, जो तुझे पसंद हो। ऐ अल्लाह! हमारे लिए हमारी इस यात्रा को आसान कर दे और इसकी दूरी को समेट दे। ऐ अल्लाह! तू ही यात्रा में साथी और अनुपस्थिति में घर-परिवार की देखभाल करने वाला है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ यात्रा की कठिनाइयों, बुरी हालत और धन तथा परिवार में बुरे परिवर्तन से।"

अल्लाहुम्मा इन्ना नस्अलुका फ़ी स'फ़'रिना हाज़ल-बिर्रा वत्तक़वा, वमिनल-अमलि मा तर्ज़ा अल्लाहुम्मा हव्विन अलैना स'फ़'रना हाज़ा वत़्वि अन्ना बुअ्दहु, अल्लाहुम्मा अन्तस़्-स़ाह़िबु फ़िस-सफ़रि, वल-ख़लीफ़तु फ़िल-अहलि, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन वअ्स़ाइस्-सफ़रि, व-काआबतिल मंज़रि, व-सूइल मुन'क़'लबि फ़िल-मालि वल-अहल जब यात्रा से वापस आए, तो इन वाक्यों के साथ-साथ यह वृद्धि भी करे : "हम लौट आए तौबा करते हुए तथा अपने रब की इबादत और उसकी प्रशंसा करते हुए।" [253] [253] सहीह मुस्लिम 2/978, हदीस संख्या : 1342।

आयिबूना, ताइबूना, आबिदूना, लिरब्बिना ह़ामिदून

97- गाँव या नगर में दाख़िल होने की दुआ

"ऐ अल्लाह! सातों आकाशों तथा उनके नीचे की सारी चीज़ों के रब ! सातों धरतियों और उनके ऊपर की सारी चीज़ों के रब! शैतानों तथा उनके बहकावे में आए हुए लोगों के रब तथा हवाओं एवं उनके द्वारा उड़ाई गई वस्तुओं के रब! मैं तुझसे इस गाँव, इसके निवासियों और इसमें मौजूद चीज़ों की भलाई माँगता हूँ तथा मैं इस गाँव, इसके रहने वालों और इसमें मौजूद चीज़ों से तेरी शरण माँगता हूँ।" [254] [254] मुसतदरक हाकिम 2/100, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 524। जबकि हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने तख़रीज अल-अज़कार 5/154 में हसन कहा है। शैख़ बिन बाज़ कहते हैं : "नसई ने इसे हसन सनद से रिवायत किया है।" देखिए : तोहफ़ा अल-अख़यार, पृष्ठ : 37।

अल्लाहुम्मा रब्बस-समावातिस सब्-इ वमा अज़्लल्ना, व-रब्बल अर्ज़ीनस-सब्इ वमा अक़्लल्ना, व-रब्बश शयात़ानि वमा अज़्लल्ना, व-रब्बर् रियाह़ि वमा ज़रैना, अस्अलुका ख़ैरा हाज़िहिल क़र्यति, व-ख़ैरा अहलिहा, व-ख़ैरा मा फ़ीहा, व-अऊज़ु बिका मिन शर्रिहा, व-शर्रि अहलिहा, व-शर्रि मा फ़ीहा।

98- बाज़ार में प्रवेश करने की दुआ

"अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य और उसी की सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।" [255] [255] सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3428, इब्न-ए-माजा 5/291, हदीस संख्या : 3860 तथा हाकिम 1/538। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/21 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/152 में हसन कहा है।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु, व लहुल ह़म्दु, युह़्यी व युमीतु, व हुवा ह़य्युन ला यमूतु, बियदिहिल ख़ैरु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर

99- सवारी के फिसलने के समय की दुआ

"मैं अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ।" [256] [256] सुनन अबू दाऊद 4/296, हदीस संख्या : 4982। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/941 में सहीह कहा है।

बिस्मिल्लाह

100- यात्री की मुक़ीम (ठहरे हुए) के लिए दुआ

"मैं तुम्हें अल्लाह के हवाले करता हूँ, जिसके हवाले की हुई चीज़ें नष्ट नहीं होती हैं।" [257] [257] मुसनद-ए-अहमद 2/403, हदीस : 9230 तथा इब्न-ए-माजा 2/943, हदीस संख्या : 2825। देखिए : सहीह इब्न-ए-माजा 2/133।

अस्तौदिउ कुमुल्लाहल् लज़ी ला तज़ीउ व-दाइउहु

101- ठहरे हुए व्यक्ति की यात्री के लिए दुआ

"मैं तेरे धर्म, तेरी अमानत और तेरे अंतिम कर्मों को अल्लाह के हवाले करता हूँ।" [258] [258] मुसनद-ए-अहमद 2/7, हदीस संख्या : 4524 और सुनन तिरमिज़ी 5/499, हदीस संख्या : 3443। अलबानी ने इसे सहीह सुनन तिरमिज़ी 3/419 में सहीह कहा है।

अस्तौदिउल्लाहा दीनका, व अमानतका, व ख़वातीमा अमलिका

"अल्लाह तुम्हें धर्मपरायणता का पाथेय प्रदान करे, तुम्हारे गुनाह माफ़ करे और जहाँ भी रहो, तुम्हारे लिए भलाई को प्राप्त करना आसान करे।" [259] [259] सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3444। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/155।

ज़व्वदकल्लाहु अत-तक़वा, व ग़'फ़'रा ज़म्बका, व यस्सरा लकल ख़ैरा हैस़ु मा कुन्त

102- यात्रा के करने के दौरान अल्लाह की बड़ाई और पवित्रता बयान करना

जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : "जब हम ऊपर चढ़ते तो अल्लाहु अकबर कहते, यह दुआ पढ़े : (अल्लाह सबसे बड़ा है)

अल्लाहु अकबर और जब नीचे उतरते तो सुब्ह़ानल्लाह कहते थे।"[260] यह दुआ पढ़े : (अल्लाह पवित्र है) [260] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ (6/135), हदीस संख्या : (2993)।

सुब्ह़ानल्लाह

103- यात्री के लिए सुबह के समय पढ़ने की दुआ

"एक सुनने वाले ने हमारी ओर से अल्लाह की प्रशंसा करने और नेमतों द्वारा उसकी हमारी परीक्षा लेने को दूसरों तक पहुँचाया। ऐ हमारे पालनहार! तू हमारे साथ रह और हमपर अनुग्रह फ़रमा। मैं यह बात जहन्नम से अल्लाह की शरण में आते हुए कह रहा हूँ।" [261] [261] सहीह मुस्लिम 4/2086, हदीस संख्या : 2718। इस हदीस में आए हुए शब्द "سَمعَ سامِعٌ" को दो तरह से पढ़ा गया है। एक "سَمِعَ سامعٌ", जिसका अर्थ है, एक गवाही देने वाले ने हमारे द्वारा अल्लाह की नेमतों पर उसकी प्रशंसा किए जाने और नेमतों द्वारा उसके हमारी परीक्षा लेने की गवाही दी। दूसरे "سَمَّعَ سامِعٌ" का अर्थ है, एक सुनने वाले ने हमारे इस कथन को दूसरे तक पहुँचाया। दरअसल अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस तरह की बात भोर के समय ज़िक्र तथा दुआ के महत्व को इंगित करने के लिए कही है। शर्ह अन-नववी अला सहीह मुस्लिम 17/39।

सम्मआ सामिउम् बिह़म्दिल्लाहि, व ह़ुस्नि बलाइहि अ़लैना, रब्बना स़ाह़िब्ना, व अफ़्ज़ल अ़लैना, आइज़म् बिल्लाहि मिनन् नार

104- यात्रा के दौरान या बिना यात्रा के भी किसी जगह ठहरने की दुआ

"मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं की बुराई से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ।" [262] [262] सहीह मुस्लिम 4/2080, हदीस संख्या : 2709।

अऊज़ु बि'क'लिमातिल्लाहित् ताम्माति मिन शर्रि मा ख़'ल'क़

105- यात्रा से वापसी की दुआ

«हर ऊंचे स्थान पर तीन बार तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहे, फिर कहे: "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम की शक्ति रखता है। हम वापस हो रहे हैं, तौबा करते हुए और अपने रब की इबादत तथा उसकी प्रशंसा करते हुए। अल्लाह ने अपना वचन सच कर दिखाया, अपने बंदे की मदद की और अकेले ही सारे जत्थों को पराजित कर दिया।" [263] [263] अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब किसी युद्ध या हज से लौटते, तो यह दुआ कहते थे। सहीह बुख़ारी 7/163, हदीस संख्या : 1797 तथा सहीह मुस्लिम 2/980, हदीस संख्या : 1344।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु, व'ल'हुल ह़म्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीरुन, आयिबूना, ताइबूना, आबिदूना, लिरब्बिना ह़ामिदूना, स'द'क़ल्लाहु वअ्दहू, व नस़रा अब्दहू, व ह'ज़'मल अह़ज़ाबा वह़्दहु

106- कोई प्रिय अथवा अप्रिय घटना घटित होते समय की दुआ

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने जब कोई ऐसी बात आती, जो आपको पसंद होती, तो फ़रमाते : "सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसके अनुग्रह से सब अच्छे काम संपन्न होते हैं।"

अल्ह़म्दु लिल्लाहिल् लज़ी बिनिअ्मतिहि ततिम्मुस़् स़ालिह़ात और जब सामने कोई ऐसी बात आती, जो पसंद न होती, तो फ़रमाते : "सारी प्रशंसा हर हाल में अल्लाह की है।" [264] [264] इब्न अस-सुन्नी की अमल अल-यौम वल-लैलह, हदीस संख्या : 377 तथा मुसतदरक हाकिम 1/499। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 4/201 में सहीह कहा है।

अल्ह़म्दु लिल्लाहि अला कुल्लि ह़ाल

107- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजने की फ़ज़ीलत

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने मुझपर एक बार दरूद भेजा , उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।" [265] जैसे कि यह कहें : (ऐ अल्लाह! हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की प्रशंसा अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के बीच कर और उन पर शांति की जलधारा बरसा।) [265] सहीह मुस्लिम 1/288, हदीस संख्या :384।

अल्लाहुम्मा स़ल्लि व सल्लिम अला नबिय्यिना मुह़म्मद

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : " मेरी क़ब्र को मेला स्थल बनाओ।और मुझपर दुरूद भेजते रहो, क्योंकि तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा दुरूद मुझे पहुँच जाएगा।" [266] [266] सुनन अबू दाऊद 2/218, हदीस संख्या : 2044 तथा अहमद 2/367, हदीस संख्या : 8804। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 2/383 में सहीह कहा है।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "असल कंजूस वह व्यक्ति है, जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझपर दरूद न भेजे।" [267] [267] सुनन तिरमिज़ी 5/551, हदीस संख्या : 3546 आदि। देखिए : सहीह अल-जामे 3/25 तथा सहीह अत-तिरमिज़ी 3/177।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते हैं, जो धरती में घूमते फिरते हैं। वे मुझे मेरी उम्मत का सलाम पहुँचाते हैं।" [268] [268] सुनन नसई 3/43, हदीस संख्या : 1282 तथा हाकिम 2/421। अलबानी ने इसे सहीह नसई 1/274 में सहीह कहा है। .

और आप-सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-ने फ़रमाया : "जब कोई बंदा मुझपर सलाम पढ़ता है, अल्लाह मुझे मेरी आत्मा लौटा देता है, यहाँ तक कि मैं उसे सलाम का उत्तर दे दों।" [269] [269] अबू दाऊद हदीस संख्या : 2041। अलबानी ने सहीह अबू दाऊद 1/383 में इसे हसन कहा है।

108- सलाम को आम करना

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है : "तुम जन्नत मेें उस समय तक प्रवेश नहीं कर सकते, जब तक ईमान न लाओ, और तुम उस समय तक मोमिन नहीं हो सकते, जब तक एक-दूसरे से प्रेम न करने लगो। क्या मैं तुम्हारा मार्गदर्शन ऐसे कार्य की ओर न कर दूँ, जिसे यदि तुम करोगे तो एक-दूसरे से प्रेम करने लगोगे? अपने बीच में सलाम को आम करो।" [270] [270] सहीह मुस्लिम 1/74, हदीस संख्या : 54 तथा मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 1430। शब्द मुसनद-ए-अहमद के हैं। जबकि सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "तुम जन्नत में उस समय तक प्रवेश नहीं कर सकते..."

"तीन बातें ऐसी हैं कि जिसने उन्हें एकत्र कर लिया, उसने ईमान को एकत्र कर लिया : अपने साथ न्याय करना, तमाम लोगों को सलाम करना और तंगी होने के बावजूद खर्च करना।" [271] [271] इमाम बुख़ारी ने इसे अपनी सहीह 1/82 हदीस संख्या : 28 में अम्मार बिन यासिर -रज़ियल्लाहु अनहु- से सहाबी के कथन में रूप में बिना सनद के नक़ल किया है।

अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है कि एक आदमी ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि इस्लाम का कौन-सा कार्य सबसे अच्छा है ? आपने फ़रमाया : "तुम खाना खिलाओ और सलाम करो। जिसे जानते हो उसे भी और जिसे न जानते हो उसे भी।" [272] [272] सहीह बुख़ारी 1/55, हदीस संख्या : 12 तथा सहीह मुस्लिम 1/65 हदीस संख्या : 39।

109- यदि काफ़िर सलाम करे, तो उसका उत्तर कैसे दिया जाए?

"जब अह्ले किताब तुम्हें सलाम करें, तो कहो : व अलैकुम (तुमपर भी)।" [273] [273] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/42, हदीस संख्या : 6258 तथा सहीह मुस्लिम 4/1705, हदीस संख्या : 2163।

व अलैकुम

110- मुर्गे के बाँग देने और गधे के रेंकने के समय की दुआ

"जब तुम मुर्गे की बाँग सुनो तो अल्लाह से उसका अनुग्रह माँगों, क्योंकि उसने किसी फ़रिश्ते को देखा है। जैसे कि यह कहें : (ऐ अल्लाह! मैं तुझ से तेरी कृपा माँगता हूँ।)

अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका मिन फ़ज़्लिका "और जब तुम गधे का रेंकना सुनो तो शैतान से अल्लाह की शरण माँगो, क्योंकि उसने किसी शैतान को देखा है।"[274] जैसे कि यह कहें : "मैं दुत्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" [274] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/350 हदीस संख्या : 3303 और सहीह मुस्लिम 4/2092 हदीस संख्या : 2729।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर रजीम

111- रात को कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनते समय की दुआ

"जब तुम रात में कुत्ते के भौंकने तथा गधे के रेंकने की आवाज़ सुनो, तो तुम उनसे अल्लाह की शरण माँगो, क्योंकि ये जानवर वह देखते हैं, जो तुम नहीं देखते।" [275] जैसे कि यह कहें : "मैं दुत्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" [275] सुनन अबू दाऊद 4/327 हदीस संख्या : 5105 तथा अहमद 3/306, हदीस संखअया : 14283। अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/961 में सहीह कहा है।

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर रजीम

112- उस व्यक्ति के हक़ में दुआ, जिसे तुमने गाली दी हो

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "ऐ अल्लाह! जिस किसी ईमान वाले को मैंने गाली दी है, उसके लिए इसे क़यामत के दिन तेरी निकटता की प्राप्ति का साधन बना दे।" [276] [276] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/171, हदीस संख्या : 6361 तथा सहीह मुस्लिम 4/2007, हदीस संख्या : 396। सहीह मुस्लिम के शब्द हैं : "उसे उसके लिए परिशुद्धता एवं कृपा का साधन बना दे।"

113- मुसलमान किसी मुसलमान की प्रशंसा में क्या कहे?

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुममें से किसी को अपने साथी की प्रशंसा करनी ही हो, तो कहे : "मैं अमुक को (ठीक) समझता हूँ, हालाँकि उसका हिसाब अल्लाह ही लेगा और मैं किसी को अल्लाह के सामने पवित्र नहीं कहता।" मैं अमुक को ऐसा और ऐसा समझता हूँ -अगर वह जानता हो कि उसके अंदर यह बात सचमुच मौजूद है-।" [277] [277] सहीह मुस्लिम 4/2296, हदीस संख्या : 3000।

114- जब कोई मुसलमान अपनी प्रशंसा सुने तो क्या कहे?

"ऐ अल्लाह! लोग जो कुछ कह रहे हैं, उसके आधार पर मेरी पकड़ न करना और मेरी उन बातों को क्षमा कर देना जो लोग नहीं जानते और मुझे उनकी कल्पना से भी उत्तम बना देना।" [278] [278] बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 761। अलबानी ने इसे सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 585 में सहीह कहा है। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग बैहक़ी की शोअब अल-ईमान 4/228 से लिया गया है और एक अन्य सनद से वर्णित है।

अल्लाहुम्मा ला तुआख़िज़्नी बिमा यक़ूलूना, वग़्फ़िर ली मा ला यअ्लमून, [वज्अलनी ख़ैरम् मिम्मा यज़ुन्नून]।

115- हज या उमरा का एहराम बाँधा हुआ व्यक्ति तलबिया कैसे कहे?

"में उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।" [279] [279] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/408, हदीस संख्या :1549 तथा सहीह मुस्लिम 2/841, हदीस संख्या 1184।

लब्बैका अल्लाहुम्मा लब्बैका, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैका, इन्नल ह़म्दा, वन्निअ्मता, लका वल मुल्का, ला शरीका लका

116- हजर-ए-असवद के पास आते समय तकबीर कहना

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक ऊँट पर सवार होकर काबा का तवाफ़ किया। इस दौरान आप जब-जब हजर-ए-असवद वाले कोने के पास आते, तो अपने पास मौजूद किसी चीज़ से उसकी ओर इशारा करते और अल्लाहु अकबर कहते।" [280] [280] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/476, हदीस संख्या : 1613। यहाँ जिस चीज़ से इशारा करने की बात कही गई है, उससे मुराद नेज़ा है। सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी 3/472।

117- रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद के बीच की दुआ

"ऐ हमारे रब , हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।" [281] [281] सुनन अबू दाऊद 2/179, हदीस संख्या : 1894, मुसनद-ए-अहमद 3/411, हदीस संख्या : 15398 और बग़वी की शर्ह अस-सुन्नह 7/354। आयत के लिए देखिए : सूरा अल-बक़रा आयत संख्या : 201।

रब्बना आतिना फ़िद्दुन्या ह़'स'न'तन् व फ़िल आख़िरति ह़'स'न'तन् व क़िना अज़ाबन् नार

118- सफ़ा और मरवा पर ठहरने समय की दुआ

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सफ़ा के निकट आए, तो यह आयत पढ़ी : "निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं...", " मैं उसी से आरंभ करता हूँ, जिससे अल्लाह ने आरंभ किया है।"

इन्नस़् स़फ़ा वल मर्वता मिन श'आइरिल्लाहि..., अब्दउ बिमा ब'द'अल्लाहु बिहि चुनांचे आप पहले सफ़ा पहाड़ी के पास जाकर उसपर चढ़ गए, यहाँ तक कि जब काबा दिखने लगा, तो क़िबले की ओर मुँह करके खड़े हो गए, अल्लाह का एकत्व और उसकी बड़ाई बयान की तथा फ़रमाया : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम करने की क्षमता रखता है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपना वचन पूरा कर दिखाया है, अपने बंदे की मदद की है और अकेले ही सारे जत्थों को पराजित कर दिया। फिर इसके बीच आपने दुआ फ़रमाई। इसी तरह आपने तीन बार कहा।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु, अंजज़ा वअ्दहु, व न'स़'रा अब्दहु, व ह'ज़'मल अहज़ाबा वह़्दहु फिर इसके बीच में दुआ करे, इस तरह तीन बार कहे। इस हदीस में आगे है : उन्होंने मरवा पर वैसा ही किया, जैसा सफ़ा पर किया था। [282] [282] सहीह मुस्लिम 2/888, हदीस संख्या : 1218। आयत के लिए देखिए : सूरा अल-बक़रा आयत संख्या : 158।

119- अरफ़ा के दिन की दुआ

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "सबसे अच्छी दुआ अरफ़ा के दिन की दुआ है और मैंने तथा मुझसे पहले नबियों ने जो सबसे अच्छी बात कही है, वह यह है : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" [283] [283] सुनन तिरमिज़ी, दीस संख्या : 3585। अलबानी ने इस सहीह तिरमिज़ी 3/184 तथा सिलसिला सहीहा 4/6 में हसन कहा है।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल मुल्कु व लहुल ह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर

120- मशअर-ए-हराम के निकट का ज़िक्र

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- क़सवा पर सवार होकर मशअर-ए-हराम आए और क़िबला की ओर मुँह करके दुआ की, अल्लाह की बड़ाई बयान की, उसके अतिरिक्त कोई अन्य पूज्य न होने का ऐलान किया और उसके एकत्व को बयान किया। आप अच्छी तरह भोर होने तक यहीं रुके रहे और सूरज निकलने से पहले यहाँ से चल पड़े।" [284] [284] सहीह मुस्लिम 2/891, हदीस संख्या : 1218।

121- कंकड़ी मारते समय हर कंकड़ के साथ अल्लाहु अकबर कहना

"तीनों जमरात के पास हर कंकड़ी फेंकने के साथ अल्लाहु अकबर कहे। फिर पहले तथा दूसरे जमरे के बाद थोड़ा-सा आगे बढ़े और क़िबला की ओर मुँह करके खड़े होकर तथा दोनों हाथों को उठाकर दुआ करे। रही बात जमरा अक़बा की, तो उसमें हर बार कंकड़ी मारते समय अल्लाहु अकबर कहे और उसके बाद वहाँ रुके बिना ही वापस लौट जाए।" [285] [285] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/583, हदीस संख्या : 1751। यहाँ लाए गए शब्द यहीं से लिए गए हैं। तथा सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 3/583, 3/584, 3/581, हदीस संख्या : 1753। इमाम मुस्लिम ने भी इसे रिवायत किया है। देखिए हदीस संख्या : 1218।

122- आश्चर्यचकित करने वाली तथा प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने के समय की दुआ

"मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।" [286] [286] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 1/210, 390, 414, हदीस संख्या : 115, 3599 एवं 6218 और सहीह मुस्लिम 4/ 1857 हदीस संख्या : 1674।

सुब्ह़ानल्लाह

"अल्लाह सबसे बड़ा है।" [287] [287] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 8/441, हदीस संख्या : 4741 तथा 3092, सुनन तिरमिज़ी : 2180 तथा नसई की अल-कुबरा हदीस संख्या : 11185। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 2/103 एवं 2/235 तथा मुसनद-ए-अहमद 5/218, हदीस संख्या : 21900।

अल्लाहु अकबर

123- कोई प्रसन्नतापूर्ण बात सामने आने पर आदमी क्या करे?

"अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने जब कोई प्रसन्न करने वाली बात आती, तो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के शुक्र के तौर सजदे में गिर जाते।" [288] [288] अबू दाऊद हदीस संख्या : 2774, तिरमिज़ी हदीस संख्या :1578, इब्न-ए-माजा हदीस संख्या :1394। देखिए : सहीह अब्न-ए-माजा 1/233 तथा इरवा अल-ग़लील 2/226।

124- शरीर में कोई दर्द होने पर आदमी क्या करे और क्या कहे?

"शरीर के जिस भाग में दर्द हो, वहाँ अपना हाथ रखो और उसके बाद तीन बार बिस्मिल्लाह कहो तथा सात बार यह दुआ पढ़ो : अल्लाह के नाम से,

बिस्मिल्लाह तीन बार। और सात बार कहे: "मैं उस चीज़ की बुराई से जिसे मैं अनुभव करता हूँ और जिस से मैं डरता हूँ, अल्लाह और उसकी क़ुदरत की शरण में आता हूँ।" [289] [289] सहीह मुस्लिम 4/1728, हदीस संख्या : 2202।

अऊज़ु बिल्लाहि व क़ुद्रतिहि मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु

125- जिसे भय हो कि उसकी नज़र किसी वस्तु को लग सकती है ,तो वह आदमी क्या कहे?

"जब तुममें से कोई अपने भाई के अंदर, स्वयं अपने अंदर या अपने धन में कोई ऐसी बात देखे, जो उसके मन को भा जाए, तो उसके लिए बरकत की दुआ करे। क्योंकि नज़र लगना सत्य है।" [290] [290] मुसनद-ए-अहमद 4/447, हदीस संख्या : 15700, इब्न-ए-माजा, ददीस संख्या : 3508 तथा मालिक 3/118-119। अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 1/212 में सहीह कहा है। देखिए अरनाऊत द्वारा संपादित ज़ाद अल-मआद की अनुसंधानयुक्त प्रति 4/170।

126- घबराहट के समय का ज़िक्र

"अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है।" [291] [291] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/381, हदीस संख्या : 3346 तथा सहीह मुस्लिम 4/2208, हदीस संख्या :2880।

ला इलाहा इल्लल्लाह

127- ऊँट अथवा अन्य जानवरों को ज़बह करते समय क्या कहा जाए?

"मैं अल्लाह के नाम से ज़बह करता हूँ और अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! यह तेरी ओर से है और तेरे लिए है। ऐ अल्लाह! इसे मेरी ओर से ग्रहण कर ले।" [292] [292] सहीह मुस्लिम 3/1557, हदीस संख्या : 1967 तथा बैहक़ी 9/287। दोनों कोषठकों के बीच का भाग बैहक़ी 9/287 आदि से लिया गया है। जबकि अंतिम वाक्य को मैंने सहीह मुस्लिम की रिवायत से लिया है लेकिन केवल अर्थ लिया है शब्द नहीं।

बिस्मिल्लाहि वल्लाहु अकबरु, [अल्लाहुम्मा मिन्का व-लका], अल्लाहुम्मा तक़ब्बल मिन्नी

128- सरकश शैतानों के फ़रेब से बचने की दुआ

"मैं अल्लाह के उन संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ, जिनसे कोई अच्छा या बुरा इनसान आगे नहीं बढ़ सकता, जिसे उसने पैदा किया, अस्तित्व प्रदान किया, और फैला दिया, उन तमाम चीज़ों की बुराई से। इसी तरह मैं उसकी शरण में आता हूँ उन तमाम चीज़ों की बुराई से, जो आकाश से नीचे आती हैं, नीचे से आकाश की ओर जाती हैं, जिनको उसने धरती में फैलाया है और जो धरती से निकलती हैं। इसी तरह रात और दिन के फ़ितनों की बुराई से और हर रात में आने वाले की बुराई से, सिवाय उस रात में आने वाले के, जो भलाई के साथ आता हो। ऐ रहमान!" [293] [293] मुसनद-ए-अहमद 3/419, दीस संख्या : 15461, सहीह सनद के साथ। इब्न अस-सुन्नी हदीस संख्या : 637। इसकी सनद को अरनाऊद ने अत-तहाविया की अनुसंधानयुक्त प्रति पृष्ठ : 133 में सहीह कहा है। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 10/127।

अऊज़ु बिकलिमातिल-लाहित-ताम्मातिल-लती ला युजाविज़ुहुन्ना बर्रुन व ला फ़ाजिरुन, मिन शर्रि मा ख़'ल'क़ा, व ब'र'आ व ज़'र'आ, व मिन शर्रि मा यन्ज़िलु मिनस-समाई, व मिन शर्रि मा यअरुजु फ़ीहा, व मिन शर्रि मा ज़'र'आ फ़िल-अर्ज़ि, व मिन शर्रि मा यख़रुजु मिन्हा, व मिन शर्रि फ़ितनिल-लैलि वन-नहारि, व मिन शर्रि कुल्लि त़ारिक़िन इल्ला त़ारिक़न यत़्रुक़ु बिख़ैरिन या रह़मान

129- तौबा तथा क्षमा याचना

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है : "अल्लाह की क़सम! मैं दिन में सत्तर बार से अधिक अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसके सामने तौबा करता हूँ।" [294] [294] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ (11/101), हदीस संख्या : (6307)।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो और उससे क्षमा माँगो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।" [295] [295] सहीह मुस्लिम 4/2076, हदीस संख्या : 2702।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : «जिसने कहा : मैं महान अल्लाह से क्षमा मांगता हूं, जिसके सिवा कोई (वास्तविक) पूज्य नहीं, जो जीवंत है, सम्पूर्ण जगत को संभाले हुए है, और मैं उसी की ओर लौटता हूं,

अस्तग़्फ़िरुल्लाहल् अज़ीम् अल्लज़ी ला इलाहा इल्ला हुवल् ह़य्युल क़य्यूमु व अतूबु इलैहि उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वह युद्ध के मैदान से भाग खड़ा ही क्यों न हुआ हो।" [296] [296] सुनन अबू दाऊद 2/85, हदीस संख्या : 1517, तिरमिज़ी 5/569, हदीस संख्या : 3577 और मुसतदरक हाकिम 1/511। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त कही है। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/182 तथा जामे अल-उसूल लि-अहादीस अर-रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, अरनाऊत के अनुसंधान के साथ 4/389-390।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "अल्लाह अपने बंदे से सबसे निकट रात के अंतिम भाग में होता है। अतः यदि उस समय अल्लाह का स्मरण करने वालों में शामिल हो सको, तो हो जाओ।" [297] [297] सुनन तिरमिज़ी, हदीस संख्या : 3579, सुनन नसई 1/279, हदीस संख्या : 572 और हाकिम 1/309। देखिए : सहीह तिरमिज़ी 3/183 तथा जामे अल-उसूल लि-अहादीस अर-रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, अरनाऊत के अनुसंधा के साथ 4/144।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः, तुम उसमें अधिक दुआएँ किया करो।" [298] [298] सहीह मुस्लिम 1/350, हदीस संख्या : 482।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मेरे दिल पर पर्दा सा आ जाता है और मैं दिन में सौ बार अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ।" [299] [299] सहीह मुस्लिम 4/2075, हदीस संख्या : 2702, इब्न अल-असीर कहते हैं : : "ليُغان على قلبي" का अर्थ है, मेरे दिल पर पर्दा डाल दिया जाता है और उसे ढाँप दिया जाता है। दरअसल इससे मुराद ग़फ़लत है। क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमेशा अल्लाह के ज़िक्र, उससे निकटता की प्राप्ति के फ़िक्र और उसके ध्यान में लीन रहते थे। अतः, इस संबंध में कभी ज़रा सी भी ग़फ़लत होती, तो उसे पाप समझते हुए क्षमा याचना करने लगते। देखिए : जामे अल-उसूल 4/386।

130- सुबहान अल्लाह, अलहम्दु लिल्लाह, ला इलाह इल्लल्लाह तथा अल्लाहु अकबर कहने की फ़ज़ीलत

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने दिन में सौ बार कहा : "जिसने यह दुआ पढ़ी : मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ।

सुब्ह़ानल्लाहि व बिह़म्दिहि दिन में सौ बार, उसके सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।"[300] [300] सहीह बुख़ारी 7/168, हदीस संख्या : 6405 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2691। देखिए : इसी किताब की पृष्ठ संख्या : 65।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने कहा : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।"

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल् मुल्कु, व'ल'हुल ह़म्दु, व-हुवा अ़ला कुल्लि शैइन क़दीर दस बार, वह उस व्यक्ति के समान है जिसने इस्माईल -अलैहिस्सलाम- की संतान में से चार दासों को मुक्त किया।" [301] [301] सहीह बुख़ारी 7/67, हदीस संख्या : 6404 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या : 2693 यहाँ शब्द मुस्लिम के हैं। देखिए : इस किताब की दुआ संख्या : 93, पृष्ठ : 66।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "दो शब्द ऐसे हैं, जो बोलने में ज़बान पर हल्के हैं, तराज़ू में भारी सिद्ध होंगे एवं रह़मान (अल्लाह) को बड़े प्रिय हैं : "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ। मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।" [302] [302] सहीह बुख़ारी 7/168 हदीस संख्या :6404 तथा सहीह मुस्लिम 4/2072 हदीस संख्या :2694।

सुब्ह़ानल्लाहि व बिह़म्दिहि, सुब्ह़ानल्लाहिल अज़ीम

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मेरा यह कहना : अल्लाह पवित्र है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए योग्य है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और अल्लाह सबसे बड़ा है।

सुब्ह़ानल्लाहि, वल्ह़म्दुलिल्लाहि, व ला इलाहा इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबर मुझे उन सारी वस्तुओं से अधिक प्रिय है, जिन पर सूरज निकलता है।" [303] [303] सहीह मुस्लिम 4/2072, हदीस संख्या : 2695।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "क्या तुममें से कोई इस बात से विवश है कि प्रत्येक दिन एक हज़ार नेकियाँ प्राप्त करे? आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछा : आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमाया : “सौ बार 'सुबहानल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाएँगी अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटा दिए जाएँगे।”[304] [304] सहीह मुस्लिम 4/2073, हदीस संख्या : 2698।

सुब्ह़ानल्लाह

"जिसने यह दुआ पढ़ी : "मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ।"

सुब्ह़ानल्लाहिल् अज़ीमि व बिह़म्दिह उसके लिए जन्नत में एक खजूर का पेड़ लगा दिया जाता है।" [305] [305] सुनन तिरमिज़ी 5/511, हदीस संख्या : 3464 तथा मुसतदरक हाकिम 1/501। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : सहीह अल-जामे 5/531 तथा सहीह तिरमिज़ी 3/160।

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "ऐ अब्दुल्लाह बिन क़ैस! क्या मैं तुमको जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाने के बारे में न बता दूँ?" मैंने कहा : अवश्य, ऐ अल्लाह के रसूल। आपने फ़रमाया : "आप कह दें : "अल्लाह की तौफ़ीक़ के बिना ना पाप से बचने की शक्ति है, न पुण्य करने की क्षमता।" [306] [306] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/213, हदीस संख्या :4206 और सहीह मुस्लिम 4/2076, हदीस संख्या :2704।

ला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह

एक अन्य हदीस में है कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "अल्लाह के निकट सबसे प्रिय वाक्य चार हैं : अल्लाह पवित्र है, सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए योग्य है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और अल्लाह सबसे बड़ा है।

सुब्ह़ानल्लाहि, वल्ह़म्दु लिल्लाहि, वला इलाहा इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबर "तुम उन में से जिस से भी आरंभ करो, तुम्हें कोई हानि नहीं होगी।" [307] [307] सहीह मुस्लिम 3/1685, हदीस संख्या : 2137।

एक देहाती, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और बोला : मुझे कोई ऐसी बात सिखा दीजिए, जो मैं कहता रहूँ। आपने फ़रमाया : "आप कह दें : अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह बहुत बड़ा है। उसकी अत्यधिक प्रशंसा है। मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ जो सारे संसार का पालनहार है। सर्वशक्तिमान एवं हिकमत वाले अल्लाह के अतिरिक्त न किसी के पास भलाई के मार्ग पर लगाने की शक्ति है, न बुराई के मार्ग से रोकने की क्षमता।

ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहु, अल्लाहु अकबरु कबीरन, वल-ह़म्दु लिल्लाहि कस़ीरन, सुब्ह़ानल्लाहि रब्बिल आलमीना, ला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अज़ीज़िल ह़कीम उसने कहा : यह बातें तो मेरे रब के लिए हैं। मेरे लिए क्या है? आपने कहा : "आप कहें : "ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझ पर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।" [308] [308] सहीह मुस्लिम 4/2072, हदीस संख्या : 2696। जबकि अबू दाऊद 1/220 हदीस संख्या : 832 में यह वृद्धि है : जब वह देहाती जाने लगा, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "इसने अपने हाथ को भलाई से भर लिया।"

अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली, वर्ह़म्नी, वह्दिनी, वर्ज़ुक़्नी

जब कोई व्यक्ति इस्लाम ग्रहण करता, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसे नमाज़ सिखाते और फिर उसेआज्ञा देते कि इन शब्दों द्वारा दुआ करे: "ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा, मुझे हर विपत्ति से सुरक्षित रख और मुझे रोज़ी प्रदान कर।" [309] [309] सहीह मुस्लिम 4/2073, हदीस संख्या : 3697। जबकि एक रिवायत में है : "ये वाक्य तुम्हारे लिए दुनिया एवं आख़िरत दोनों को एकत्र कर देंगे।"

अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली, वर्ह़म्नी, वह्दिनी, वआफ़िनी वर्ज़ुक़्नी

"सबसे उत्तम दुआ सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है,

अल्ह़म्दु लिल्लाह और सबसे उत्तम ज़िक्र "अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है।" [310] [310] सुनन तिरमिज़ी 5/462, हदीस संख्या : 3383, इब्न-ए-माजा 2/1249, हदीस संख्या : 3800 तथा हाकिम 1/503। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। देखिए : सहीह अल-जामे 1/362।

ला इलाहा इल्लल्लाह

"शेष रहने वाले सत्कर्म हैं : "अल्लाह पवित्र है, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है और अल्लाह की मदद के बिना न किसी के पास पुण्य करने की क्षमता है, न गुनाह से बचने की शक्ति।" [311] [311] मुसनद-ए-अहमद, हदीस संख्या : 513, अहमद शाकिर की तरतीब के साथ। देखिए : मजमा अज़-ज़वाइद 1/297। इब्न-ए-हजर ने इसे बुलूग़ अल-मराम में अबू सईद की रिवायत से नसई (की अल-कुबरा : 10617) की ओर मंसूब किया है और उसके बाद कहा है : इसे इब्-ए-हिब्बान [हदीस संख्या : 840] और हाकिम [1/541] ने सहीह कहा है।

सुब्ह़ानल्लाहि, वल्ह़म्दु लिल्लाहि, वला इलाहा इल्लल्लाहु, वल्लाहु अकबरु, वला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह

131- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तसबीह कैसे पढ़ते थे?

अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं : "मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को अपनी उँगलियों से तसबीह गिनते देखा।" जबकि एक जगह यह वृद्धि है : "दाएँ हाथ की ।" [312] [312] सुनन अबू दाऊद 2/81, हदीस संख्या : 1502 तथा सुनन तिरमिज़ी 5/521, हदीस संख्या : 3486। देखिए : सहीह अल-जामे 1/271, हदीस संख्या : 4865। यहाँ आए हुए शब्द सुनन अबू दाऊद के हैं। देखिए : सहीह अल-जामे 4/271, हदीस संख्या : 4865। अलबानी ने इसे सहीह सुनन अबू दाऊद 1/411 में सहीह कहा है।

132- विभिन्न प्रकार के पुण्य एवं व्यापक शिष्टाचार

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब रात आने लगे या फिर शाम होने लगे, तो अपने बच्चों को रोक लो। क्योंकि इस समय सारे शैतान फैल जाते हैं। फिर जब रात का कुछ भाग गुज़र जाए, तो उन्हें छोड़ दो और अपने घरों के द्वार बंद कर लो तथा अल्लाह का नाम ले लिया करो। क्योंकि शैतान बंद द्वार नहीं खोलता। इसी तरह अपने मशकीज़ों का मुँह रस्सी से बाँध दो और अल्लाह का नाम ले लिया करो। इसी प्रकार अपने बरतनों को ढाँप दो और अल्लाह का नाम ले लिया करो। कुछ नहीं तो चौड़ाई में कोई चीज़ ही रख दो। साथ ही अपने चराग भी बुझा दिया करो।" [313] [313] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/88, हदीस संख्या : 5623 तथा सहीह मुस्लिम 3/1595, हदीस संख्या : 2012।

अल्लाह की दया और शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुह़म्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके परिजनों और सभी साथियों पर।