अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत दयावान है। सुबह-शाम के अज़कार (اللَّهُ لا إِلَهَ إِلا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلا نَوْمٌ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلا بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِنْ عِلْمِهِ إِلا بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ وَلا يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ), अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल-ह़य्युल क़य्यूमु, ला तअख़ुज़ुहु सिनतूँ व ला नौम, लहु मा फ़िस समावाति व मा फ़िल-अर्ज़, मन ज़ल्लज़ी…
"بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم", बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यज़ुर्रु मअस्मिहि शैउन फ़िल अर्ज़ि वला फ़िस्समाई व हुवस समीउल अलीम, (शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब सुनने वाला और सब जानने वाला है)।"(तीन बार।)
"رضيت بالله ربًّا وبالإسلام دينًا وبمحمد صلى الله عليه وسلم نبيًّا", रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन व बिलइस्लामि दीनन व बिमुह़म्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नबिय्यन, (मैं अल्लाह को रब , इस्लाम को धर्म और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नबी के रूप में मानकर संतुष्ट हो गया)।"(तीन बार।)
"أصبحنا وأصبح الملك لله والحمد لله لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، رب أسألك خير ما في هذا اليوم وخير ما بعده، وأعوذ بك من شر ما في هذا اليوم ومن شر ما بعده، ربِّ أعوذ بك من الكسل والهرم وسوء الكِبَر، وأعوذ بك من عذاب النار وعذاب القبر", अस़्बह़्ना व अस़्बह़ल्मुल्कु लिल्लाहि, वल्ह़म्दुलिल्लाहि, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु व लहुल्ह़म्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर्, रब्बि अस्अलुका ख़ैरा मा फ़ी हाज़ल यौमि व ख़ैरा मा बअदहु, व अऊज़ुबिका मिन शर्रि मा फ़ी हाज़ल यौमि व मिन शर्रि मा बअदहु, रब्बि अऊज़ुबिका मिनल कसलि वल हरमि व सूइल किबरि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिन् नारि व अज़ाबिल क़ब्रि, (हमने तथा अल्लाह के राज्य ने सुबह की, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, सारा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। ऐ मेरे रब ! मैं तुझसे इस दिन की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ। इसी तरह इस दिन की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ। ऐ मेरे रब ! मैं तेरी शरण में आता हूँ सुस्ती, अति व्योवृद्ध होने तथा बुढ़ापे की बुराई से। ऐ मेरे रब ! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग की यातना और क़ब्र के अज़ाब से)।जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े :"أمسينا وأمسى الملك لله, अम्सैना व अम्सल्मुल्कु लिल्लाहि..., (हमने और अल्लाह के राज्य ने शाम की..)"आगे कहे :"رب أسألك خير ما في هذه الليلة, रब्बि अस्अलुका ख़ैरा मा फ़ी हाज़िहिल्लैलति, (ऐ मेरे रब ! मैं तुझसे इस रात की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ..)"अंत तक, अर्थात "أصبحنا وأصبح الملك لله" के स्थान पर "أمسينا وأمسى الملك لله" कहे और "رب أسألك خير ما في هذا اليوم" के स्थान पर "رب أسألك خير ما في هذه الليلة" कहे। शेष ज़िक्र उसी तरह पढ़े।
"اللهم بك أصبحنا وبك أمسينا وبك نحيا وبك نموت واليك النشور", अल्लाहुम्मा बिका अस़्बह़ना व बिका अम्सैना, व बिका नह़्या व बिका नमूतु, व इलैकन्नुशूर, (ऐ अल्लाह! हमने तेरी ही नेमत से सुबह की और तेरी ही नेमत से शाम की, हम तेरी ही शरण में जीते हैं और तेरी ही शरण में मरते हैं और क़यामत के दिन तेरी ही ओर जीवित होकर जाना है)।जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े :"اللهم بك أمسينا وبك أصبحنا وبك نموت وبك نحيا وإليك المصير", अल्लाहुम्मा बिका अम्सैना व बिका अस़्बह़ना, व बिका नमूतु व बिका नह़्या, व इलैकल् मस़ीर, (ऐ अल्लाह! हमने तेरी ही नेमत से शाम की और तेरी ही नेमत से सुबह की, हम तेरी ही शरण में मरते हैं और तेरी ही शरण में जीते हैं और तेरी ही ओर जाना है)।
"اللَّهُمَّ مَا أَصْبَحَ بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ, अल्लाहुम्मा मा अस़्बह़ा बी मिन् नेमतिन औ बिअह़दिन् मिन ख़ल्क़िका फ़मिन्का वह़्दका ला शरीका लका, फ़लकल् ह़म्दु व लकश्शुक्रु, (ऐ अल्लाह! सुबह के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है, वह केवल तेरी ओर से ही है और उसमें तेरा कोई साझी नहीं है। अतः तेरी ही प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है)।जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े :"اللهم ما أمسى بي...,अल्लाहुम्मा मा अम्सा बी...., ऐ अल्लाह! शाम के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है..
(तीन बार।)
"اللَّهُمَّ إنِّي أَسْألكَ الْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالأخِرَةِ، اللهم إنِّي أَسْالكُ الْعَفْوَ والْعَافِيَةَ فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأهْلِي وَمَالِي، اللَّهمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي، وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللهم احْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يديَّ وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي، وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأعُوذُ بِعَظَمَتِك أنْ أُغتَالَ مِنْ تَحْتِي", अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल आफ़ियता फ़िद्दुनिया वल आख़िरति, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल् अफ़्वा वल आफ़ियता फ़ी दीनी व दुनियाया व अह्ली व माली, अल्लाहुम्मस्तुर औराती, व आमिन रौआती, अल्लाहुम्मा इह़्फ़िज़्नी मिन् बैनि यदय्या व मिन ख़ल्फ़ी, व अन् यमीनी, व अन् शिमाली, व मिन फ़ौक़ी, व अऊज़ु बि अज़मतिका अन् उग़्ताला मिन् तह़्ती, (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने धर्म, अपने संसार, अपने परिवार और अपने धन के संबंध में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरे दोषों को छुपा दे और मुझे भय से सुरक्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह! तू मेरी, मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ और मेरे ऊपर से रक्षा कर। साथ ही मैं इस बात से तेरी महानता की शरण में आता हूँ कि मुझे नीचे से धर दबोचा जाए)।
"اللهم أنت ربي لا إله إلا أنت، خلقتني وأنا عبدك وأنا على عهدك ووعدك ما استطعت، أعوذ بك من شر ما صنعت، أبوء لك بنعمتك عليّ، وأبوء بذنبي، فاغفر لي فإنه لا يغفر الذنوب إلا أنت", अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी ला इलाहा इल्ला अन्ता खलक़तनी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअ्दिका मस्त,त़अतु अऊज़ु बिका मिन शर्रि-मा स़नअतु अबूऊ लका बि निअमतिका अलैया व अबूऊ बि ज़न्बी फग़फ़िर ली फ़इन्नहु ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्ता, (ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कुकृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जो मैंने किया है। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ। तू मुझे क्षमा कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है)।
"اللهُمَّ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ، عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أشْهَدُ أنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءًا، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ", अल्लाहुम्मा फ़ात़िरस्समावाति वल अर्ज़ि, आलिमल ग़ैबि वश्शहादति, रब्बा कुल्लि शैइन व मलीकहु, अश्हुद अल् ला इलाहा इल्ला अन्ता, अऊज़ु बिका मिन् शर्रि नफ़्सी, व मिन शर्रिश्शैतानि व शिर्किही, व अन् अक़तरिफ़ा अला नफ़्सी सूअन, औ अजुर्रहु इला मुस्लिमिन, (ऐ अल्लाह, आकाशों तथा धरती के रचयिता, छिपी तथा खुली बातों के जानने वाले, हर चीज़ के रब और प्रभु! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ)।"
" اللهم إني أصبحت أُشهدُك وأشهد حملة عرشك وملائكتك وأنبياءك وجميع خلقك بأنك أنت الله لا إله إلا أنت وأن محمدًا عبدك ورسولك", अल्लाहुम्मा इन्नी अस़्बह़तु, उश्हिदुका व उश्हिदु ह़मलता अर्शिका व मलाइकतिका व अंबियाइका व जमीआ ख़ल्क़िक़ा बिअन्नका अन्तल्लाहु, ला इलाहा इल्ला अन्ता, व अन्ना मुह़म्मदन अब्दुका व रसूलुका, (ऐ अल्लाह! मैंने सुबह की। मैं तुझे, तेरा अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों को, तेरे अन्य फ़रिश्तों को तथा तेरी सारी सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तेरे बंदे और रसूल हैं)।"शाम को यह ज़िक्र पढ़ना हो, तो इस तरह कहे :"اللهم إني أمسيت..., अल्लाहुम्मा इन्नी अम्सैतु..., (ऐ अल्लाह! मैंने शाम की...)"शेष दुआ उसी तरह पढ़े। (चार बार।)
"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير", ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु, व लहुल्मह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है)।"(सौ बार।) सुबह या शाम को।
"حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمُ", ह़स्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवा अलैहि तवक्कल्तु व हुवा रब्बुल अर्शिल अज़ीम्, (मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है, उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मेरा उसी पर भरोसा है और वह महान सिंहासन का स्वामी है)।"(सात बार।)
سبحان الله وبحمده, सुब्ह़ानल्लाहि व बिह़म्दिहि, (अल्लाह पवित्र है अपनी प्रशंसा के साथ)।(सौ बार।) सुबह अथवा शाम को या फिर दोनों समय।
أستغفر الله وأتوب إليه, अस्तग़फ़िरुल्लाहा व अतूबु इलैहि, (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसी की ओर लौटता हूँ)।(सौ बार।)
ये कुछ अज़कार हैं, जिनको मैंने लिखा है। दुआ है कि अल्लाह इन्हें लाभकारी बनाए।
इन शब्दों को मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन ने 20/1/1418 हिजरी को लिखा है।
इस किताब में क़ुरआन एवं सुन्नत से अज़्कार एकत्र किए गए हैं, ताकि विभिन्न समय और परिस्थितियों में उन्हें दोहराना आसान हो जाए। इसमें जागने, वुज़ू, नमाज़, यात्रा और अन्य अवसरों की दुआएँ शामिल हैं, जो एक मुसलमान को अपनी हिफ़ाज़त करने में मदद करती हैं, ताकि वह अल्लाह की सुरक्षा और संरक्षण में रहे।
मानवता को मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ईशदौत्य (पैगम्बरी) की आवश्यकता भाषाः अरबी हे मनुष्य! क्या तुमने अपने-आपसे कभी पूछा है कि तुम्हें किसने पैदा किया है? और तुमको किसलिए पैदा किया गया है? दुनिया की इस जिंदगी में पृथ्वी के ऊपर तुम्हारे अस्तित्व के क्या मायने और उद्देश्य हैं? निस्संदेह, जिसने तुम्हें पैदा किया है, वह अल्लाह है, मूर्तियाँ नहीं हैं, न गाय है, न मसीह हैं, न प्रकृति है और ना ही तुमने खुद को पैदा किया है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (क्या वे बिना किसी चीज के पैदा किए गए हैं या वे स्वयं ही अपने स्रष्टा हैं?) सूरा अत्-तूर: 35 जब बिना किसी आविष्कारक के उनका वजूद में आना असंभव…
"नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का तरीक़ा" पुस्तक में, सम्माननीय शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ रहिमहुल्लाह ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ के तरीक़े को सरल भाषा में और सटीक व सूक्ष्म विधि के साथ संक्षेप में प्रस्तुत किया है। इस किताब में उन्होंने प्रामाणिक साक्ष्यों पर आधारित विवरण दिया है, ताकि यह मुसलमान के लिए उसकी नमाज़ में मार्गदर्शन का साधन बन जाए। उन्होंने इस पुस्तक में वज़ू से लेकर सलाम तक नमाज़ के सभी स्तंभों, सुन्नतों और उसकी संपूर्ण प्रक्रिया को दलील के साथ बयान किया है और इस महानतम इबादत में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अनुसरण का आह्वान किया है।
पुस्तक "इस्लाम के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम" में नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वंश, पालन-पोषण, शुभ विवाह, वह्य के आरंभ और अंतिम संदेश की शुरुआत तक के जीवन का वर्णन है। यह पुस्तक आपकी नुबुव्वत के चमत्कारों और सच्चाई के प्रमाणों को स्पष्ट करती है, और आपके द्वारा लाई गई शरीअत तथा मानव अधिकारों एवं गरिमा की रक्षा में उसकी भूमिका की व्याख्या करती है। साथ ही, यह आपके दुश्मनों के दृष्टिकोण और आपके पक्ष में उनकी गवाहियों को उजागर करते हुए, आपके उन उत्तम सद्गुणों पर भी प्रकाश डालती है, जिन्होंने आपको लोगों के लिए एक आदर्श और सृष्टिकर्ता के तौहीद का प्रचारक बनाया।