الأذكار التي تقال صباحًا ومساءً
الأذكار التي تقال صباحًا ومساءً كتبها بخط يده فضيلة الشيخ العلامة محمد بن صالح العثيمين من صحيح الأذكار الثابتة عن النبي -صلى الله عليه وسلم-
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत दयावान है। सुबह-शाम के अज़कार
(اللَّهُ لا إِلَهَ إِلا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلا نَوْمٌ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَنْ ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلا بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِنْ عِلْمِهِ إِلا بِمَا شَاءَ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضَ وَلا يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ), अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल-ह़य्युल क़य्यूमु, ला तअख़ुज़ुहु सिनतूँ व ला नौम, लहु मा फ़िस समावाति व मा फ़िल-अर्ज़, मन ज़ल्लज़ी यशफ़उ इंदहू इल्ला बि- इज़निही, यअलमु मा बैना ऐदीहिम वमा ख़ल्फ़हुम, व ला युहीत़ूना बि शैईम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शाआ, वसिआ कुर्सिय्युहुस् समावाति वल-अर्ज़ि वला यऊदुहू हिफ़ज़ुहुमा, व हुवल अलिय्युल अज़ीम, (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह जीवित तथा नित्य स्थायी है। उसे ऊँघ तथा निद्रा नहीं आती। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, वह सब जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च, महान है)।" [आयत अल-कुर्सी, सूरा अल-बक़रा : 255]
آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالْمُؤْمِنُون َ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ) وَرُسُلِهِ لا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِير), आमनर्रसूलु बिमा उन्ज़िला इलैहि मिर्रब्बिहि वलमूमिनूना, कुल्लुन आमना बिल्लाहि व मलाइकतिहि व कुतुबिहि व रुसुलिहि, ला नुफ़र्रिक़ु बैना अह़दिम मिर्ररुसुलिहि, व क़ालू समिअना व अत़अना ग़ुफ़्रानका रब्बना व इलैकल् मस़ीर, (रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके रब की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते। और उन्होंने कहा हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब ! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है)। لا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْساً إِلا وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لا تُؤَاخِذْنَا) إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْراً كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلا تُحَمِّلْنَا مَا لا طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ), ला युकल्लिफ़ुल्लाहु नफ़्सन इल्ला वुस्अहा, लहा मा कसबत व अलैहा मक्,तसबत, रब्बना ला तुआख़िज़्ना इन नसीना औ अख़्त़अ्ना , रब्बना वला तह़मिल अलैना इस़रन कमा ह़मलतहू अलल्लज़ीना मिन क़ब्लिना, व ला तुह़म्मिलना मा ला त़ाक़ता लना बिही, वअ्फ़ु अन्ना, वग़्फिर लना वर्ह़म्ना, अन्ता मौलाना फ़न्स़ुरना अलल क़ौमिल काफ़िरीन, (अल्लाह किसी प्राणी पर भार नहीं डालता परंतु उसकी क्षमता के अनुसार। उसी के लिए है जो उसने (नेकी) कमाई और उसी पर है जो उसने (पाप) कमाया। ऐ हमारे रब ! हमारी पकड़ न कर यदि हम भूल जाएँ या हमसे चूक हो जाए। ऐ हमारे रब ! और हमपर कोई भारी बोझ न डाल, जैसे तूने उसे उन लोगों पर डाला जो हमसे पहले थे। ऐ हमारे रब ! और हमसे वह चीज़ न उठवा जिस (के उठाने) की हममें शक्ति न हो। तथा हमें माफ़ कर और हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी (संरक्षक) है, इसलिए काफ़िरों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर)।" [सूरा अल-बक़रा : 285-286]
(قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ), क़ुल हुवल्लाहु अह़द, ((ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है)।” (قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ), क़ुल अऊज़ु बिरब्बिल फ़लक़, ((ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के रब की शरण लेता हूँ)।" (قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ), क़ुल अऊज़ु बिरब्बिन्नास, ((ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के रब की)।" तीनों सूरतें तीन बार पूरी पढ़ी जाएँ (जोकि इस प्रकार हैंः क़ुल हुवल्लाहु अह़द। अल्लाहुस़्स़मद। लम यलिद व लम यूलद। व लम यकुल लहु कुफ़ुवन अह़द। क़ुल अऊज़ु बिरब्बिल फ़लक़। मिन शर्रि मा ख़लक़। व मिन शर्रि ग़ासिक़िन इज़ा वक़ब। व मिन शर्रिन नफ़्फ़ास़ाति फ़िल उक़द। व मिन शर्रि ह़ासिदन इज़ा ह़सद। क़ुल अऊज़ु बि रब्बिन्नास। मलिकिन्नास। इलाहिन्नास। मिन शर्रिल वसवासिल ख़न्नास। अल्लज़ी युवसविसु फ़ी स़ुदूरिन्नास। मिनल जिन्नति वन्नास।)
"أعوذ بكلمات الله التامات من شر ما خلق", अऊज़ु बि-कलिमातिल्लाहित् ताम्माति मिन शर्रि मा ख़लक़, (मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं के दुष्कृत्य से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ)।" (तीन बार।)
"بسم الله الذي لا يضر مع اسمه شيء في الأرض ولا في السماء وهو السميع العليم", बिस्मिल्लाहिल्लज़ी ला यज़ुर्रु मअस्मिहि शैउन फ़िल अर्ज़ि वला फ़िस्समाई व हुवस समीउल अलीम, (शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब सुनने वाला और सब जानने वाला है)।" (तीन बार।)
"رضيت بالله ربًّا وبالإسلام دينًا وبمحمد صلى الله عليه وسلم نبيًّا", रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन व बिलइस्लामि दीनन व बिमुह़म्मदिन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नबिय्यन, (मैं अल्लाह को रब , इस्लाम को धर्म और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नबी के रूप में मानकर संतुष्ट हो गया)।" (तीन बार।)
"أصبحنا وأصبح الملك لله والحمد لله لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، رب أسألك خير ما في هذا اليوم وخير ما بعده، وأعوذ بك من شر ما في هذا اليوم ومن شر ما بعده، ربِّ أعوذ بك من الكسل والهرم وسوء الكِبَر، وأعوذ بك من عذاب النار وعذاب القبر", अस़्बह़्ना व अस़्बह़ल्मुल्कु लिल्लाहि, वल्ह़म्दुलिल्लाहि, ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु व लहुल्ह़म्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर्, रब्बि अस्अलुका ख़ैरा मा फ़ी हाज़ल यौमि व ख़ैरा मा बअदहु, व अऊज़ुबिका मिन शर्रि मा फ़ी हाज़ल यौमि व मिन शर्रि मा बअदहु, रब्बि अऊज़ुबिका मिनल कसलि वल हरमि व सूइल किबरि, व अऊज़ु बिका मिन अज़ाबिन् नारि व अज़ाबिल क़ब्रि, (हमने तथा अल्लाह के राज्य ने सुबह की, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, सारा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और वह हर बात की क्षमता रखता है। ऐ मेरे रब ! मैं तुझसे इस दिन की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ। इसी तरह इस दिन की तथा इसके बाद की बुराइयों से तेरी शरण में आता हूँ। ऐ मेरे रब ! मैं तेरी शरण में आता हूँ सुस्ती, अति व्योवृद्ध होने तथा बुढ़ापे की बुराई से। ऐ मेरे रब ! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग की यातना और क़ब्र के अज़ाब से)। जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े : "أمسينا وأمسى الملك لله, अम्सैना व अम्सल्मुल्कु लिल्लाहि..., (हमने और अल्लाह के राज्य ने शाम की..)" आगे कहे : "رب أسألك خير ما في هذه الليلة, रब्बि अस्अलुका ख़ैरा मा फ़ी हाज़िहिल्लैलति, (ऐ मेरे रब ! मैं तुझसे इस रात की तथा इसके बाद की भलाइयाँ माँगता हूँ..)" अंत तक, अर्थात "أصبحنا وأصبح الملك لله" के स्थान पर "أمسينا وأمسى الملك لله" कहे और "رب أسألك خير ما في هذا اليوم" के स्थान पर "رب أسألك خير ما في هذه الليلة" कहे। शेष ज़िक्र उसी तरह पढ़े।
"اللهم بك أصبحنا وبك أمسينا وبك نحيا وبك نموت واليك النشور", अल्लाहुम्मा बिका अस़्बह़ना व बिका अम्सैना, व बिका नह़्या व बिका नमूतु, व इलैकन्नुशूर, (ऐ अल्लाह! हमने तेरी ही नेमत से सुबह की और तेरी ही नेमत से शाम की, हम तेरी ही शरण में जीते हैं और तेरी ही शरण में मरते हैं और क़यामत के दिन तेरी ही ओर जीवित होकर जाना है)। जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े : "اللهم بك أمسينا وبك أصبحنا وبك نموت وبك نحيا وإليك المصير", अल्लाहुम्मा बिका अम्सैना व बिका अस़्बह़ना, व बिका नमूतु व बिका नह़्या, व इलैकल् मस़ीर, (ऐ अल्लाह! हमने तेरी ही नेमत से शाम की और तेरी ही नेमत से सुबह की, हम तेरी ही शरण में मरते हैं और तेरी ही शरण में जीते हैं और तेरी ही ओर जाना है)।
"اللَّهُمَّ مَا أَصْبَحَ بِي مِنْ نِعْمَةٍ أَوْ بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَمِنْكَ وَحْدَكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ، فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْرُ, अल्लाहुम्मा मा अस़्बह़ा बी मिन् नेमतिन औ बिअह़दिन् मिन ख़ल्क़िका फ़मिन्का वह़्दका ला शरीका लका, फ़लकल् ह़म्दु व लकश्शुक्रु, (ऐ अल्लाह! सुबह के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है, वह केवल तेरी ओर से ही है और उसमें तेरा कोई साझी नहीं है। अतः तेरी ही प्रशंसा है और तेरा ही शुक्र है)। जबकि शाम के समय इस ज़िक्र को इस तरह पढ़े : "اللهم ما أمسى بي...,अल्लाहुम्मा मा अम्सा बी...., ऐ अल्लाह! शाम के समय मेरे तथा तेरी हर सृष्टि के साथ जो भी नेमत है..
(तीन बार।)
"اللَّهُمَّ إنِّي أَسْألكَ الْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالأخِرَةِ، اللهم إنِّي أَسْالكُ الْعَفْوَ والْعَافِيَةَ فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأهْلِي وَمَالِي، اللَّهمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي، وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللهم احْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يديَّ وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي، وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأعُوذُ بِعَظَمَتِك أنْ أُغتَالَ مِنْ تَحْتِي", अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल आफ़ियता फ़िद्दुनिया वल आख़िरति, अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुकल् अफ़्वा वल आफ़ियता फ़ी दीनी व दुनियाया व अह्ली व माली, अल्लाहुम्मस्तुर औराती, व आमिन रौआती, अल्लाहुम्मा इह़्फ़िज़्नी मिन् बैनि यदय्या व मिन ख़ल्फ़ी, व अन् यमीनी, व अन् शिमाली, व मिन फ़ौक़ी, व अऊज़ु बि अज़मतिका अन् उग़्ताला मिन् तह़्ती, (ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने धर्म, अपने संसार, अपने परिवार और अपने धन के संबंध में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरे दोषों को छुपा दे और मुझे भय से सुरक्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह! तू मेरी, मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ और मेरे ऊपर से रक्षा कर। साथ ही मैं इस बात से तेरी महानता की शरण में आता हूँ कि मुझे नीचे से धर दबोचा जाए)।
"اللهم أنت ربي لا إله إلا أنت، خلقتني وأنا عبدك وأنا على عهدك ووعدك ما استطعت، أعوذ بك من شر ما صنعت، أبوء لك بنعمتك عليّ، وأبوء بذنبي، فاغفر لي فإنه لا يغفر الذنوب إلا أنت", अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी ला इलाहा इल्ला अन्ता खलक़तनी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअ्दिका मस्त,त़अतु अऊज़ु बिका मिन शर्रि-मा स़नअतु अबूऊ लका बि निअमतिका अलैया व अबूऊ बि ज़न्बी फग़फ़िर ली फ़इन्नहु ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्ता, (ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कुकृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जो मैंने किया है। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ। तू मुझे क्षमा कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है)।
"اللهُمَّ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ، عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ، رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ وَمَلِيكَهُ، أشْهَدُ أنْ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي، وَمِنْ شَرِّ الشَّيْطَانِ وَشِرْكِهِ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلَى نَفْسِي سُوءًا، أَوْ أَجُرَّهُ إِلَى مُسْلِمٍ", अल्लाहुम्मा फ़ात़िरस्समावाति वल अर्ज़ि, आलिमल ग़ैबि वश्शहादति, रब्बा कुल्लि शैइन व मलीकहु, अश्हुद अल् ला इलाहा इल्ला अन्ता, अऊज़ु बिका मिन् शर्रि नफ़्सी, व मिन शर्रिश्शैतानि व शिर्किही, व अन् अक़तरिफ़ा अला नफ़्सी सूअन, औ अजुर्रहु इला मुस्लिमिन, (ऐ अल्लाह, आकाशों तथा धरती के रचयिता, छिपी तथा खुली बातों के जानने वाले, हर चीज़ के रब और प्रभु! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ)।"
" اللهم إني أصبحت أُشهدُك وأشهد حملة عرشك وملائكتك وأنبياءك وجميع خلقك بأنك أنت الله لا إله إلا أنت وأن محمدًا عبدك ورسولك", अल्लाहुम्मा इन्नी अस़्बह़तु, उश्हिदुका व उश्हिदु ह़मलता अर्शिका व मलाइकतिका व अंबियाइका व जमीआ ख़ल्क़िक़ा बिअन्नका अन्तल्लाहु, ला इलाहा इल्ला अन्ता, व अन्ना मुह़म्मदन अब्दुका व रसूलुका, (ऐ अल्लाह! मैंने सुबह की। मैं तुझे, तेरा अर्श उठाने वाले फ़रिश्तों को, तेरे अन्य फ़रिश्तों को तथा तेरी सारी सृष्टि को गवाह बनाता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तेरे बंदे और रसूल हैं)।" शाम को यह ज़िक्र पढ़ना हो, तो इस तरह कहे : "اللهم إني أمسيت..., अल्लाहुम्मा इन्नी अम्सैतु..., (ऐ अल्लाह! मैंने शाम की...)" शेष दुआ उसी तरह पढ़े। (चार बार।)
"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير", ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहु ला शरीका लहु, लहुल्मुल्कु, व लहुल्मह़म्दु व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर, (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है)।" (सौ बार।) सुबह या शाम को।
"حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمُ", ह़स्बियल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवा अलैहि तवक्कल्तु व हुवा रब्बुल अर्शिल अज़ीम्, (मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है, उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मेरा उसी पर भरोसा है और वह महान सिंहासन का स्वामी है)।" (सात बार।)
سبحان الله وبحمده, सुब्ह़ानल्लाहि व बिह़म्दिहि, (अल्लाह पवित्र है अपनी प्रशंसा के साथ)। (सौ बार।) सुबह अथवा शाम को या फिर दोनों समय।
أستغفر الله وأتوب إليه, अस्तग़फ़िरुल्लाहा व अतूबु इलैहि, (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ और उसी की ओर लौटता हूँ)। (सौ बार।)
ये कुछ अज़कार हैं, जिनको मैंने लिखा है। दुआ है कि अल्लाह इन्हें लाभकारी बनाए।
इन शब्दों को मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन ने 20/1/1418 हिजरी को लिखा है।