المختصر المفيد للمسلم
मुसलमान के लिए एक संक्षिप्त एवं लाभकारी पुस्तक
मुसलमान के लिए एक संक्षिप्त एवं लाभकारी पुस्तक
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु अत्यंत दयावान है
प्रस्तावना
सभी प्रकार की प्रशंसा अल्लाह की है, तथा दया और शांति अवतरित हो सबसे प्रतिष्ठित रसूल एवं संदेष्टा हमारे पैगंबर मुहम्मद, उनकी संतान और उनके सभी साथियों पर।
अब मूल विषय पर आते हैं।
इन्सान पर अल्लाह का सबसे बड़ा उपकार यह है कि वह उसे इस्लाम की नेमत दे और उसपर मज़बूती से जमे रहने तथा उसके विधि-विधानों पर अमल करने का संयोग प्रदान करे। संक्षिप्त तथा आसान शैली में लिखी गई इस किताब द्वारा एक मुसलमान अपने दीन के ऐसे बुनियादी उसूलों को सीख सकता है, जिनसे दीन का सही अनुपालन हो सके। इस किताब द्वारा दीन की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को स्पष्ट किया गया है, ताकि अपने महान पालनहार, अपने दीन इस्लाम और अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में एक मुसलमान की जानकारी में वृद्धि हो और वह पूरे ज्ञान के साथ अल्लाह की इबादत कर सके।
बंदों को पैदा करने की हिकमत
अल्लाह तआला ने हमें एक महान उद्देश्य के तहत पैदा किया है। वह महान उद्देश्य है केवल एक अल्लाह की इबादत। उसकी कोई उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।" [सूरा ज़ारियात : 56] अर्थात: केवल उसी की इबादत करें और किसी उसके साथ किसी को शरीक न करें। इसी महान उद्देश्य के इर्द-गिर्द इस सांसारिक जीवन में हमारे सारे कर्म और उद्देश्य घूमते हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तो क्या तुमने समझ रखा था कि हमने तुम्हें उद्देश्यहीन पैदा किया है और यह कि तुम हमारी ओर लौटाए नहीं जाओगे? तो बहुत ऊँचा है अल्लाह, जो सच्चा बादशाह है। उसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, (वह) सम्मान वाले अर्श (सिंहासन) का रब है।" [सूरा मूमिनून : 115-116].
मेरा पालनहार अल्लाह है
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ।" [सूरा बक़रा : 21]
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "वह अल्लाह ही है, जिसके अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं।" [सूरा हश्र : 22]
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा शूरा : 11]
अल्लाह ही मेरा और सारी चीज़ों का पालनहार, अधिपति, सृष्टिकर्ता, जीविका दाता और हर चीज़ की योजना बनाने वाला है।
वही केवल इबादत का हक़दार है। उसके सिवा न कोई पालनहार है और न सत्य पूज्य।
उसके अच्छे-अच्छे नाम तथा ऊँचे-ऊँचे गुण हैं, जिन्हें स्वयं उसने अपने लिए तथा उसके नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसके लिए सिद्ध किया है। यह सारे नाम तथा गुण संपूर्णता तथा सुंदरता की पराकाष्ठा को प्राप्त किए हुए हैं। उस जैसा कोई नहीं है और वह सुनने वाला तथा देखने वाला है।
उसके कुछ अच्छे नाम इस प्रकार हैं :
अल-रज़्ज़ाक़ (रोज़ी देने वाला(, अल-रहमान (कृपाशील), अल-क़दीर (क्षमतावान्), अल-मलिक (बादशाह), अल-समी (सुनने वाला), अल-सलाम (शांति स्रोत), अल-बसीर (देखने वाला), अल-वकील (काम बनाने वाला), अल-ख़ालिक़ (पैदा करने वाला), अल-लतीफ़ (करुणामय), अल-काफ़ी (पर्याप्त) और अल-ग़फ़ूर (क्षमा करने वाला)।
अल-रज़्ज़ाक़ (रोज़ी देने वाला) : जो सारे बंदों को रोज़ी देता है, जिसके बिना उनके शरीर, जान और दिल काम न कर सकें।
अल-रहमान (कृपाशील) : बड़ी व्यापक कृपा का मालिक, जो कृपा हर चीज़ को शामिल हो।
अल-क़दीर (क्षमतावान) : संपूर्ण क्षमता वाला, जो न कभी विवश होता है और न उसे सुस्ती तथा कमज़ोरी आती है।
अल-मलिक (बादशाह): जो महानता, आधिपत्य तथा संचालन जैसी विशेषताओं से विशिष्ट तथा तमाम वस्तुओं का मालिक एवं उन्हें अपने हिसाब से संचालित करने वाला है।
अल-समी (सुनने वाला) : जो सभी गुप्त तथा व्यक्त सुनी जाने वाली बातों, अपने बन्दों की दुआओं तथा फ़रियादों को सुनता है।
अस-सलाम (दोषरहित): हर कमी, त्रुटि और दोष से पाक।
अल-बसीर (देखने वाला) : जिसकी निगाहों से कोई छोटी से छोटी चीज़ भी ओझल नहीं हो सकती। हर चीज़ को देखने वाला, हर चीज़ की सूचना रखने वाला और हर रहस्य का ज्ञान रखने वाला।
अल-वकील (काम बनाने वाला) : अपनी सृष्टियों को रोज़ी देने वाला, उनके हितों का रक्षक, वह अपने वलियों का दोस्त है, उनके लिए आसानियाँ पैदा करता है और उनके सारे मामले हल करता है।
अल-ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) : सारी वस्तुओं का सृष्टिकर्ता और उन्हें बिना किसी पूर्व उदाहरण के अस्तित्व में लाने वाला।
अल-लतीफ़ (कृपालु) : जो अपने बंदों पर दया तथा कृपा करता है और उनकी मुरादें पूरी करता है।
अल-काफ़ी (यथेष्ट) : जो अपने बंदों की तमाम ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी है और जिसकी सहायता के बाद किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं रह जाती।
अल-ग़फ़ूर (क्षमा करने वाला) : जो अपने बंदों को उनके गुनाहों के कुप्रभाव से बचाता है और उन्हें उनके किए की सज़ा नहीं देता।
मेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आया है। तुम्हारा कठिनाई में पड़ना उसपर बहुत कठिन है। वह तुम्हारे कल्याण के लिए अति उत्सुक है, ईमान वालों के प्रति बहुत करुणामय, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा तौबा : 128]
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।" [सूरा अंबिया : 107]
मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- दया हैं और उपहार स्वरूप प्रदान किए गए हैं :
मुहम्मद पुत्र अब्दुल्लाह पुत्र अब्दुल मुत्तलिब पुत्र हाशिम। हाशिम क़ुरैश क़बीले से हैं तथा क़ुरैश एक अरब क़बीला है।
आपकी माता आमिना बिंत वह्ब थीं और दूध-माँ हलीमा सादिया। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग्यारह स्त्रियों से शादी की और नौ पत्नियों को पीछे छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सात बच्चे थे : तीन बेटे और चार बेटियाँ। बेटे थे : क़ासिम, अब्दुल्लाह और इब्राहीम। जबकि बेटियाँ थीं : ज़ैनब, रुक़ैया, उम्म-ए-कुलसूम और फ़ातिमा।
आपने जो आदेश दिए हैं उनका पालन करना, जो सूचनाएँ दी हैं उनकी पुष्टि करना और जिन बातों से रोका है उनसे रुक जाना तथा आपके बताए हुए तरीक़े के अनुसार ही अल्लाह की इबादत करना ज़रूरी है।
आपका तथा आपसे पहले के तमाम नबियों का एक मात्र संदेश था, केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाना, जिसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अंबिया : 25]
आप नबियों और रसूलों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु को भली-भाँति जानने वाला है।" [सूरा अहज़ाब : 40]
अल्लाह तआला ने आपको दीन-ए-इस्लाम के साथ तमाम लोगों की ओर रसूल बनाकर भेजा है, जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है : "तथा हमने आपको समस्त मनुष्यों के लिए शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला ही बनाकर भेजा है। किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते।" [सूरा सबा : 28]।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हर मुसलमान पर बहुत-से बड़-बड़े अधिकार हैं; मसलन :
1- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नबूवत और सत्यता पर ईमान रखना, आपकी लाई हुई महान शरीयत को एक सच्ची शरीयत मानना और उसका अनुपालन तथा अनुसरण करना। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलता। वह तो केवल वह़्य है, जो उतारी जाती है।" [सूरा नज्म : 3-4]
2- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रेम करना और आपके प्रेम को अपनी जान, संतान और सारी सृष्टि के प्रेम से आगे रखना। इस प्रेम का एक तक़ाज़ा यह है कि आपकी सुन्नत के मुताबिक़ चला जाए, आपके आदेशों का पालन किया जाए और जिन चीज़ों से आपने मना किया और रोका है उनसे दूर रहा जाए।
3- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदर करना, आपकी मदद करना और आपका सम्मान करना ज़रूरी है।
4- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना चाहिए। दरूद का मतलब है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा करना और अल्लाह से दुआ करना कि आपके ज़िक्र को बुलंद करे और उनके सम्मान व प्रतिष्ठा में विद्धि करे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने मुझपर एक बार दरूद भेजा, उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।" सहीह मुस्लिम।
5- आपके बारे में अतिशयोक्ति करने और अल्लाह ने जो स्थान आपको दिया है, उससे ऊपर उठाने की मनाही है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को इससे अत्यन्त कड़ाई से चेताया है। फ़रमाया है : "तुम लोग मेरे प्रति प्रशंसा और तारीफ़ में उस प्रकार अतिशयोक्ति न करो, जिस प्रकार ईसाइयों ने मरयम के पुत्र के बारे में किया है। मैं केवल अल्लाह का बंदा हूँ। अतः मुझे अल्लाह का बंदा और उसका रसूल कहो।" सहीह बुख़ारी।
प्यारे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं :
सत्यता, दया, सहनशीलता, धैर्य, वीरता, उदारता, उच्च व्यवहार, न्याय, विनम्रता और क्षमा।
पवित्र क़ुरआन मेरे रब की वाणी है
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण आया है और हमने तुम्हारी ओर एक स्पष्ट प्रकाश उतारा है।" [सूरा निसा : 174]।
पवित्र क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, जो वास्तव में उसी की कही हुई है और जिसे उसने अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर उतारा है, ताकि लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर निकाल लाए और उन्हें सीधा मार्ग दिखाए। उसे पढ़ने वाले को बड़ा प्रतिफल प्राप्त होता है और जो उसके बताए हुए मार्ग पर चलता है वह सही पथ पर चलता है। अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने अल्लाह की किताब का एक अक्षर पढ़ा, उसके बदले में उसे एक नेकी मिलेगी और अल्लाह के यहाँ एक नेकी का बदला दस गुना मिलता है। मैं यह नहीं कहता कि 'अलिफ़, लाम, मीम' एक अक्षर है, बल्कि अलिफ़ एक अक्षर है, लाम एक अक्षर है और मीम एक अक्षर है।" इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
अल्लाह तआला ने उसे परिवर्तन तथा विकृति से सुरक्षित रखा है और उसे क़यामत के दिन तक एक अमर निशानी बना दिया है। महान और पवित्र अल्लाह ने फ़रमाया है : "निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा है और निःसंदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं।" [सूरा हिज्र : 9] जो कोई भी यह दावा करे कि क़ुरआन अधूरा है या उसमें विकृति कर दी गई है, वह अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाला और इस्लाम के दायरे से बाहर है।
पवित्र क़ुरआन में वह सब कुछ शामिल है जो पिछली आकाशीय ग्रंथों में था, तथा ईश्वरीय आज्ञाओं और आत्मिक नैतिक गुणों के संबंध में उनसे भी अधिक बातें हैं। पवित्र क़ुरआन पिछली पुस्तकों में आए हुए सत्य की पुष्टि करता है। इस समय अल्लाह तआला की ओर से ऐसी कोई किताब मौजूद नहीं है, जिसका अनुसरण करना, उसे पवित्र मानना, उसकी तिलावत को इबादत समझना और उसके अनुसार अमल करना ज़रूरी हो—सिवाय पवित्र क़ुरआन के।
मेरा धर्म इस्लाम है
धर्म के तीन स्तर हैं : इस्लाम, ईमान एवं एहसान।
पहला स्तर : इस्लाम
इस्लाम का अर्थ है : तौहीद (केवल अल्लाह की इबादत) के माध्यम से अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण कर देना, आज्ञाकारिता के माध्यम से उसके आदेशों के आगे झुक जाना तथा बहुदेववाद (शिर्क) एवं बहुदेववादियों से बरी हो जाना।
इस्लाम के स्तंभ
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "इस्लाम के पाँच स्तंभ (अरकान) हैं : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत एवं उपासना के लायक़ नहीं है और यह कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान महीने के रोज़े रखना तथा अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का हज करना।" सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम।
इस्लाम के स्तंभ ऐसी इबादतें हैं जिनका पालन करना हर मुसलमान पर ज़रूरी है। किसी इन्सान के इस्लाम के सही होने के लिए ज़रूरी है कि वह इनके ज़रूरी होने का विश्वास रखने के साथ-साथ इनका पालन करे। क्योंकि इस्लाम रूपी भवन इन्हीं स्तंभों पर खड़ा है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन्हें इस्लाम के स्तंभ कहा जाता है।
ये स्तंभ इस प्रकार हैं :
प्रथम स्तम्भ : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के रसूल हैं।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "अतः जान लें कि निःसंदेह तथ्य यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं।" [सूरा मुहम्मद : 19]
एक अन्य स्थान में फ़रमाया है : "निःसंदेह तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल आया है। तुम्हारा कठिनाई में पड़ना उसपर बहुत कठिन है। वह तुम्हारे कल्याण के लिए अति उत्सुक है, ईमान वालों के प्रति बहुत करुणामय, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा तौबा : 128]
"ला इलाहा इल्लल्लाहु" की गवाही देने का अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है।
और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के अल्लाह का रसूल होने की गवाही देने का अर्थ है : आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जो आदेश दिए हैं, उनका अनुपालन करना, जो सूचनाएँ दी हैं उनकी पुष्टि करना, जिन बातों से रोका है, उनसे रुक जाना तथा अल्लाह की उपासना उसी तरीक़े के अनुसार करना जो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सिखाया है।
दूसरा स्तंभ : नमाज़ स्थापित करना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा नमाज़ क़ायम करो।" [सूरा बक़रा : 110]
नमाज़ स्थापित करने का मतलब यह है कि उसे अल्लाह के बताए हुए और उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सिखाए हुए तरीक़े के अनुसार अदा किया जाए।
तीसरा स्तंभ : ज़कात देना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा ज़कात दो।" [सूरा बक़रा : 110]
अल्लाह ने ज़कात फ़र्ज़ इसलिए की है, ताकि मुसलमानों के ईमान की परीक्षा ली जाए, अल्लाह ने धन के रूप में जो नेमत दे रखी है उसका शुक्र अदा हो तथा ग़रीबों और जरूरतमंदों की सहायता हो सके।
ज़कात देने से अभिप्राय उसे उसके हक़दारों को देना है।
ज़कात धन से निकाला जाने वाला एक अनिवार्य हिस्सा है, जब वह एक निश्चित परिमाण को पहुँच जाए। ज़कात आठ प्रकार के लोगों को दी जाती है, जिनका उल्लेख अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में किया है और जिनमें फ़क़ीर तथा मिस्कीन भी शामिल हैं।
ज़कात का उद्देश्य धनवानों के दिलों में दया तथा करुणा की भावना को जागृत करना, मुसलमान के व्यवहार एवं धन को स्वच्छ बनाना, निर्धनों तथा ज़रूरतमंद लोगों को संतुष्ट करना तथा मुस्लिम समाज के सभी सदस्यों के बीच प्रेम एवं भाईचारा पर आधारित संबंधों को सुदृढ़ बनाना है। यही कारण है कि एक नेक मुसलमान उसे आंतरिक प्रसन्नता के साथ निकालता है और ज़कात देने को अपना सौभाग्य समझता है। क्योंकि इसके द्वारा अन्य लोगों के जीवन में खुशी लाई जाती है।
ज़कात के रूप में जमा किए हुए सोना, चाँदी, नक़दी नोट और ऐसे व्यापारिक धन का 2.5% अदा करना होता है, जिसे लाभ के उद्देश्य से क्रय-विक्रय के लिए तैयार रखा गया हो। इन धनों की ज़कात उस समय देनी होती है, जब उनकी क़ीमत निश्चित हद तक पहुँच जाए और इउपर एक पूरा वर्ष गुज़र जाए।
इसी तरह एक निश्चित संख्या हो जाने पर पशुओं जैसे ऊँट, गाय और बकरियों पर भी ज़कात अनिवार्य है, जब वे वर्ष का अधिकतर भाग धरती की घास चरकर गुज़ारा करते हों और उनका मालिक उन्हें खिलाने का प्रबंध न करता हो।
इसी प्रकार, धरती से निकलने वाली चीज़ों में भी ज़कात वाजिब है — जैसे रिकाज़, अर्थात् वह ख़ज़ाना जो दौर-ए-जाहिलियत के दफ़्न से मिलता है — और इसी तरह अनाजों, फलों तथा खनिजों में भी, जब वे एक निश्चित परिमाण को पहुँच जाएँ।
चौथा स्तंभ : रमज़ान महीने के रोज़े रखना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़ा रखना फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया गया है, जैसे तुमसे पहले के लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किया गया था, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।" [सूरा बक़रा : 110]।
रमज़ान हिजरी कैलेंडर का नवाँ महीना है। मुसलमानों के यहाँ यह एक सम्मानित तथा अन्य महीनों की तुलना में एक विशिष्ट महीना है। इस पूरे महीने का रोज़ा रखना इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक स्तंभ है।
रमज़ान महीने का रोज़ा रखने से मुराद, पूरे रमज़ान महीने के दिनों में फ़ज्र प्रकट होने के बाद से सूर्यास्त तक खाने, पीने, संभोग तथा अन्य सारे रोज़ा तोड़ने वाले कार्यों से दूर रहकर अल्लाह की इबादत करना है।
पाँचवाँ स्तंभ : अल्लाह के घर का हज करना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज अनिवार्य है, जो वहाँ तक पहुँचने का सामर्थ्य रखता हो।" [सूरा आल-ए-इमरान : 97]
हज जीवन में एक बार ऐसे व्यक्ति को करना है जो मक्का तक पहुँचने की शक्ति रखता हो। हज नाम है विशिष्ट दिनों में विशिष्ट इबादतों को करने के लिए मक्का में स्थित अल्लाह के पवित्र घर काबा तथा अन्य पवित्र स्थानों तक पहुँचने का। अल्लाह के अंतिम नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और पूर्व के अन्य नबियों ने भी हज किया है। इबराहीम अलैहिस्सलाम को तो अल्लाह ने आदेश दिया था कि लोगों के अंदर हज का एलान कर दें। इसका उल्लेख अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में भी किया है। उसने कहा है : "और लोगों में हज का एलान कर दो। वे तेरे पास पैदल तथा प्रत्येक दुबली-पतली सवारियों पर आएँगे, जो हर दूर-दराज़ मार्ग से आएँगी।" [सूरा हज : 27]
दूसरा स्तर : ईमान
ईमान : अल्लाह और उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिन बातों पर ईमान लाने का आदेश दिया है, उन सब का इक़रार, दिल से दृढ़ विश्वास और पूर्ण स्वीकार, तथा आंतरिक एवं बाहरी रूप से समर्पण और आज्ञाकारिता का नाम ईमान है। यह दिल का विश्वास है। ऐसा विश्वास जो दिल के आमाल और अंगों के आमाल को समेटे हुए हो। इसमें पूरे दीन पर अमल करना शामिल है। यह आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है।
ईमान के स्तंभ
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से ईमान के बारे में पूछा गया तो फ़रमाया : "ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा अच्छे एवं बुरे भाग्य पर विश्वास रखो।"
ईमान के स्तंभ से मुराद ऐसी हार्दिक इबादतें हैं जो हर मुसलमान पर अनिवार्य हैं, और जिनपर विश्वास रखे बिना तथा उनके मुताबिक़ अमल किए बिना किसी व्यक्ति का इस्लाम सही नहीं हो सकता। यही कारण है कि उन्हें ईमान के स्तंभ का नाम दिया गया है। इनके तथा इस्लाम के स्तंभों के बीच अंतर यह है कि इस्लाम के स्तंभ ऐसे ज़ाहिरी कार्य हैं, जिन्हें इन्सान शरीर के अंगों द्वारा करता है, जैसे ज़बान से अल्लाह के एकमात्र पूज्य होने और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अल्लाह के संदेष्टा होने का इक़रार करना, नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना आदि। जबकि ईमान के स्तंभ ऐसे हृदय के कार्य हैं, जिन्हें इन्सान अपने हृदय द्वारा करता है। जैसे अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों और उसके रसूलों पर विश्वास रखना।
पहला स्तंभ : अल्लाह पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह मोमिन तो वही लोग हैं, जो अल्लाह पर ईमान लाए।" [सूरा नूर : 62]
हम अल्लाह के अस्तित्व पर ईमान रखते हैं, और पालनहार होने, पूज्य होने तथा उसके नामों एवं गुणों में उसके जैसा कोई न होने पर यक़ीन रखते हैं। अतः अल्लाह पर ईमान के अंदर निम्नलिखित बातें आती हैं :
- अल्लाह के अस्तित्व पर ईमान रखना।
- उसके पालनहार तथा हर चीज़ का मालिक, सृष्टिकर्ता, आजीविकादाता तथा संचालनकर्ता होने पर ईमान रखना।
- अल्लाह के पूज्य होने तथा इस बात पर ईमान रखना कि केवल वही सारी इबादतों, जैसे नमाज़, दुआ, नज़्र, ज़बह, मदद माँगना और शरण माँगना आदि का हक़दार है और इनमें उसका कोई साझी नहीं है।
- अल्लाह के सुंदर नामों तथा उच्च गुणों पर ईमान रखना जिन्हें स्वयं उसने अपने लिए या उसके नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसके लिए सिद्ध किया है। इसी तरह अल्लाह को उन नामों एवं गुणों से पवित्र मानना जिनसे उसने स्वयं अपने आपको या जिनसे उसके नबी ने उसे पवित्र बताया है। साथ ही इस बात का विश्वास रखना कि उसके सभी नाम एवं गुण सुंदरता और श्रेष्ठता के शिखर पर पहुँचे हुए हैं, तथा यह कि उसके जैसी कोई वस्तु नहीं है और वह सुनने वाला एवं देखने वाला है।
दूसरा स्तंभ : फ़रिश्तों पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "सब प्रशंसा अल्लाह की है, जो आकाशों तथा धरती का पैदा करने वाला है, (और) दो-दो, तीन-तीन, चार-चार परों वाले फ़रिश्तों को संदेशवाहक बनाने वाला है। वह संरचना में जैसी चाहता है अभिवृद्धि करता है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" [सूरा फ़ातिर : 1]
हम इस बात पर ईमान रखते हैं कि फ़रिश्ते अदृश्य सृष्टि तथा अल्लाह के बंदे हैं, जिन्हें अल्लाह ने नूर से पैदा किया है और अपना आज्ञाकारी बनाया है।
हमारा विश्वास है कि फ़रिश्ते एक महान सृष्टि हैं, जिनकी शक्ति एवं संख्या का ज्ञान केवल अल्लाह को है। उनमें से हर एक के लिए अल्लाह की दी हुई कुछ विशेषताएँ, नाम और काम हैं। एक फ़रिश्ते का नाम जिबरील है, जिसका काम था अल्लाह के संदेश को उसके पैग़ंबरों तक पहुँचाना।
तीसरा स्तंभ : किताबों पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "(ऐ मुसलमानो!) तुम कह दो : हम अल्लाह पर ईमान लाए और उसपर जो हमारी ओर उतारा गया, और जो इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब तथा उसकी संतान की ओर उतारा गया, और जो मूसा एवं ईसा को दिया गया तथा जो समस्त नबियों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया। हम उनमें से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते और हम उसी (अल्लाह) के आज्ञाकारी हैं।" [सूरा बक़रा : 136]
हमारा ईमान है कि जगत पर हुज्जत क़ायम करने तथा अमल करने वालों को रास्ता दिखाने के लिए अल्लाह तआला ने अपने रसूलों पर किताबें उतारी हैं,
उन्हें इन किताबों के माध्यम से हिकमत सिखाते और परिष्कृत करते हैं।
एवं इस बात की अकाट्य पुष्टि करना कि अपने अंतिम संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को पूरे मनुष्य संप्रदाय की ओर भेजने के साथ ही अल्लाह ने आपको दी गई शरीयत द्वारा पिछली सारी शरीयतों को निरस्त कर दिया है और क़ुरआन को सारे आकाशीय ग्रंथों का संरक्षक, उनपर गवाह तथा उनका निरस्तकर्ता घोषित किया है। उसने इस बात की ज़िम्मेदारी भी ली है कि क़ुरआन के अंदर कोई परिवर्तन या उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी है। महान अल्लाह ने फ़रमाया है : "निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा है और निःसंदेह हम ही इसकी रक्षा करने वाले हैं।" [सूरा हिज्र : 9] क्योंकि पवित्र क़ुरआन मनुष्य की ओर उतारी जाने वाली अंतिम पुस्तक है, अल्लाह के रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अंतिम रसूल हैं और इस्लाम धर्म क़यामत के दिन तक लोगों के लिए अल्लाह का पसंद किया हुआ धर्म है। महान अल्लाह का फ़रमान है : "निःसंदेह दीन (धर्म) अल्लाह के निकट इस्लाम ही है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 19]
आकाशीय ग्रंथ, अल्लाह ने जिनका उल्लेख पवित्र क़ुरआन में किया है, इस प्रकार हैं :
पवित्र क़ुरआन : इसे अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर उतारा है।
तौरात : इसे अल्लाह ने अपने नबी मूसा -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था।
इंजील : इसे अल्लाह ने अपने नबी ईसा -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था।
ज़बूर : इसे अल्लाह ने अपने नबी दाऊद -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था।
इब्राहीम के ग्रंथ : इन्हें अल्लाह ने अपने नबी इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था।
चौथा स्तंभ : रसूलों पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो।" [सूरा नह्ल : 36]
हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने अपनी सृष्टि की ओर रसूल भेजे, जो उन्हें किसी को साझी बनाए बिना बस एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाते हैं और उसके अतिरिक्त पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों के इनकार का आह्वान करते हैं।
इसी तरह इस बात की भी अकाट्य पुष्टि होनी चाहिए कि सारे नबीगण मनुष्य तथा अल्लाह के बंदे थे, सच्चे थे तथा लोगों द्वारा सच्चे माने गए थे, धर्मपरायण तथा अमानतदार थे, सत्य का मार्ग दिखाने वाले और सत्य पर चलने वाले थे, जिन्हें अल्लाह ने उनकी सच्चाई को प्रमाणित करने वाली निशानियाँ प्रदान की थीं। साथ ही यह कि उन्होंने अल्लाह की ओर से प्रदान किए हुए संदेश को पहुँचाया और सारे के सारे नबी स्पष्ट सत्य और उज्जवल मार्ग पर थे।
मूल रूप से शुरू से अंत तक सारे के सारे नबियों का आह्वान एक रहा हैै और वह है, केवल एक सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की इबादत करना और किसी को उसका साझी न बनाना।
पाँचवाँ स्तंभ : आख़िरत के दिन पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, वह तुम्हें क़यामत के दिन अवश्य एकत्र करेगा, जिसमें कोई संदेह नहीं है, तथा अल्लाह से अधिक सच्ची बात वाला और कौन होगा?" [सूरा निसा : 87]
हम आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं। वह क़यामत का दिन है, उसके पश्चात कोई दिन नहीं होगा। हम उससे संबंधित हर बात पर ईमान रखते हैं, जिनकी सूचना सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने अपनी किताब में दी है या फिर जिनके बारे में हमारे नबी -मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है; जैसे इन्सान की मृत्यु, दोबारा जीवित किया जाना, सब लोगों को एकत्र किया जाना, सिफ़ारिश, मीज़ान, हिसाब, जन्नत और जहन्नम आदि।
छठा स्तंभ : भली-बुरी तक़दीर पर ईमान
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह हमने प्रत्येक वस्तु को एक अनुमान के साथ पैदा किया है।" [सूरा क़मर : 49]
हम भाग्य पर ईमान रखते हैं, अच्छे तथा बुरे दोनों पर। दर असल भाग्य, अल्लाह तआला का, अपने ज्ञान तथा हिक्मत के अनुसार, विश्व के सम्बन्ध में एक निर्धारण है। इस बात पर हमारा विश्वास है कि इस दुनिया में सृष्टियों के साथ जो भी घटनाएँ घटती हैं, वह अल्लाह की जानकारी में हैं, उसी के निर्धारण एवं फ़ैसले से यह सब घटित होती हैं, उसके आदेश और फ़ैसले में कोई उसका साझी नहीं। साथ ही यह कि इन भाग्यों का विवरण इन्सान की सृष्टि से पहले लिख लिया गया है। यह भी कि इन्सान का अपना इरादा और उसकी अपनी चाहत भी होती है, और वह सत्य में अपने कर्मों का कर्ता भी है; लेकिन यह सारी चीज़ें अल्लाह के ज्ञान, इरादे और चाहत के दायरे से बाहर नहीं हैं।
भाग्य पर ईमान के निम्नलिखित चार स्तर हैं :
पहला : अल्लाह के विस्तृत एवं समग्र ज्ञान पर विश्वास रखना।
दूसरा: इस बात पर विश्वास रखना कि अल्लाह ने क़यामत तक घटने सारी घटनाओं को लिख रखा है।
तीसरा : अल्लाह के अचूक इरादे तथा संपूर्ण सामर्थ्य पर विश्वास रखना और मानना कि वह जो चाहे, होगा और जो न चाहे, नहीं होगा।
चौथा : इस बात पर विश्वास रखना कि अल्लाह ही ने सारी सृष्टि की रचना की है और इस कार्य में उसका कोई साझी नहीं है।
दीन का तीसरा स्तर : एहसान
एहसान, यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस तरह करें कि जैसे आप उसे देख रहे हैं; यदि यह एहसास न उत्पन्न हो सके कि आप उसे देख रहे हैं, तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो उससे डरते हैं और जो उत्तम कार्य करने वाले हैं।" [सूरा नह्ल : 128]
पवित्रता प्राप्त करना
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह अल्लाह उनसे प्रेम करता है जो बहुत तौबा करने वाले हैं और उनसे प्रेम करता है जो बहुत पाक रहने वाले हैं।" [सूरा बक़रा : 22]
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "जिसने मेरे इस वज़ू की तरह वज़ू किया, फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी, तथा उन दो रकातों में अपने आपसे बात नहीं की, अल्लाह उसके पिछले गुनाहों को माफ़ कर देगा।" इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
नमाज़ की महानता यह है कि अल्लाह ने उससे पहले तहारत (पाक होने) को अनिवार्य किया है और पाकी को उसके सही होने की शर्त क़रार दिया है। तहारत नमाज़ की चाभी और उसकी महत्ता का ऐसा एहसास है, जिससे दिल नमाज़ की ओर खिंचा चला आता है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाले स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है, और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है; चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक अन्य हदीस में फ़रमाया है : "जो अच्छी तरह वज़ू करता है, उसके शरीर से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि उसके नाखूनों के नीचे से भी निकल जाते हैं।" सहीह मुस्लिम।
इस तरह जब बंदा अपने पालनहार के सामने उपस्थित होता है, तो वह वज़ू के रूप में अनुभूव होने वाली स्वच्छता प्राप्त कर चुका होता है और इस इबादत की अदायगी के माध्यम से आंतरिक स्वच्छता भी प्राप्त कर चुका होता है, साथ ही वह अल्लाह के प्रति निष्ठावान होता है और अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के तरीक़े का अनुपालन कर रहा होता है।
वो कार्य, जिनके लिए वज़ू करना अनिवार्य है :
1- हर प्रकार की नमाज़, फ़र्ज़ हो या नफ़ल।
2- काबा का तवाफ़ (परिक्रमा)।
3- मुसहफ़ को छूना।
मैं पवित्र पानी से वज़ू तथा स्नान करता हूँ :
पवित्र पानी से मुराद हर वह पानी है जो आसमान से बरसा हो या धरती से फूटा हो और अपनी असल अवस्था पर बाकी हो तथा उसके तीन गुणों यानी रंग, स्वाद तथा गंध में से कोई गुण किसी ऐसी चीज़ के कारण न बदला हो जो पानी की पवित्रता को समाप्त कर देती है।
वज़ू
पहला चरण : नीयत करना। नीयत का स्थान दिल है। इसका अर्थ है, अल्लाह की निकटता प्राप्त करने हेतु दिल में किसी इबादत का इरादा करना।
दूसरा चरण : "बिस्मिल्लाह" कहना।
तीसरा चरण : दोनों हथेलियों को तीन बार धोना।
चौथा चरण : तीन बार कुल्ली करना।
कुल्ली करने का मतलब है मुँह में पानी डालकर अंदर घुमाना और उसके बाद बाहर निकाल देना।
पाँचवाँ चरण : नाक में पानी लेना, फिर तीन बार नाक झाड़ना। नाक में पानी लेने का अर्थ है, सांस के माध्यम से नाक के अंतिम भाग तक पानी ले जाना।
जबकि नाक झाड़ने का अर्थ है : नाक के अंदर जो गंदगियाँ हों, उन्हें साँस द्वारा निकाल बाहर करना।
छठा चरण : चेहरे को तीन बार धोना।
चेहरे की सीमाएँ :
चेहरा शरीर के उस भाग को कहते हैं जिससे किसी का सामना होता है।
चौड़ाई में इसकी सीमा एक कान से दूसरे कान तक है।
जबकि लंबाई में सर के बाल उगने के सामान्य स्थान से ठुड्डी के अंतिम भाग तक है।
चेहरे को धोने में उसके हल्के बाल, उसके सफ़ेद भाग और कान के सामने की पट्टियों को धोना भी शामिल है।
सफ़ेद भाग से मुराद कान के सामने की पट्टी और कान की लौ के बीच का भाग है।
कान के सामने की पट्टी से मुराद वह बाल हैं जो कान के छिद्र के सामने की उभरी हुई हड्डी के ऊपर होते हैं, जिनका विस्तार ऊपर में सर के अंदर तक और नीचे कान के सामने के भरे हुए भाग तक रहता है।
इसी तरह चेहरे को धोने की अनिवार्यता में दाढ़ी के घने बालों के बाहरी और लटके हुए भाग को धोना भी शामिल है।
सातवाँ चरण : दोनों हाथों को उँगलियों के किनारों से कोहनियों तक तीन बार धोना।
हाथों के साथ कोहनियों को धोना भी फ़र्ज़ है।
आठवाँ चरण : हाथों से पूरे सर का, कानों के साथ, एक बार मसह करना।
मसह का आरंभ सर के अगले भाग से करते हुए दोनों हाथों को गुद्दी तक ले जाएगा और फिर उनको वापस ले आएगा।
दोनों तर्जनीयों को अपने दोनों कानों में डालेगा,अपने दोनों अंगोठों को कानों के ज़ाहिरी भाग के चारों ओर फेरेगा और इस प्रकार कान के बाहरी एवं भीतरी भाग का मसह करेगा।
नवाँ चरण : दोनों पैरों को उँगलियों के किनारों से टखनों तक तीन बार धोना। पैरों को धोते समय टखनों को धोना भी फ़र्ज़ है।
टखनों से मुराद पिंडली के सबसे निचले भाग में दो उभरी हुई हड्डियाँ हैं।
दसवाँ चरण : सुन्नत है कि मुसलमान वज़ू के बाद यह दुआ पढ़े: "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। मैं इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं। ऐ अल्लाह! मुझे तौबा करने वालों में शामिल कर ले, और मुझे पाक-साफ़ रहने वालों में शामिल कर ले।" क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने वज़ू किया और वज़ू को अच्छी तरह पूरा-पूरा किया, फिर कहा : "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं। ऐ अल्लाह! मुझे तौबा करने वालों में, और मुझे पाक-साफ़ रहने वालों में शामिल कर ले।" तो उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, वह जिससे चाहे प्रवेश कर जाए।" इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
वज़ू, निम्नलिखित चीज़ों से टूट जाता है :
1- दोनों रास्तों से निकलने वाली चीज़ें, जैसे- पेशाब, पाखाना, वायु, वीर्य और मज़ी से।
2- गहरी नींद, बेहोश हो जाने, नशा अथवा पागलपन के कारण अक़्ल के लुप्त हो जाने से।
3- स्नान को अनिवार्य करने वाली सारी चीज़ें, जैसे जनाबत, माहवारी और प्रसवोत्तर रक्तस्रावआदि।
जब इन्सान पेशाब या पाखाना करे, तो उसे अनिवार्य रूप से गंदगी को या तो स्वच्छ पानी से साफ़ करना है, जो कि सबसे उत्तम है, या फिर अन्य गंदगी दूर करने वाली वस्तुओं से जैसे पत्थर, मिट्टी, पेपर अथवा कपड़े आदि से साफ़ करना है। इस शर्त के साथ कि तीन अथवा अधिक बार इस तरह साफ़ करना है कि सफ़ाई प्राप्त हो जाए तथा साफ़ किसी पवित्र एवं हलाल वस्तु से किया जाए।
चमड़े एवं कपड़े आदि के मोज़ों पर मसह
जब इन्सान चमड़े अथवा कपड़े आदि का मोज़ा पहना हुआ हो, तो उन्हें धोने की बजाय उनपर मसह किया जा सकता है। लेकिन कुछ शर्तों के साथ, जो इस प्रकार हैं :
1- उन्हें छोटी तथा बड़ी नापाकियों से संपूर्ण पवित्रता प्राप्त करने के बाद पहना जाए।
2- दोनों मोज़े पवित्र हों, नापाक नहीं।
3- मसह उसकी नियत अवधि में किया जाए।
4- मोज़े हलाल हों। मसलन चुराए हुए या छीने हुए न हों।
अरबी शब्द "الخف" (अल-ख़ुफ़्फ़) से मुराद पतले चमड़े आदि का मोज़ा है। इसी के समान वह जूते भी हैं, जो दोनों क़दमों को ढाँपे होते हैं। अरबी शब्द "الجورب" (अल-जौरब) से मुराद कपड़े आदि का मोज़ा है; अरबी में इसे "الشراب" भी कहा जाता है।
मोज़ों पर मसह की अनुमति की हिकमत : मोज़ों पर मसह करने की अनुमति दरअसल मुसलमानों को आसानी प्रदान करने और उनका बोझ हल्का करने के लिए दी गई है, जिन्हें ख़ुफ़्फ़ या मोज़ा उतारना और पैरों को धोना कठिन पड़ता है, विशेष रूप से जाड़े के मौसम में, सख़्त ठंडी के समय और यात्रा में।
मसह की अवधि : ठहरे हुए व्यक्ति के लिए एक दिन एक रात (24 घंटे) तथा यात्री के लिए तीन दिन तीन रात (72 घंटे)।
मसह की इस अवधि का आरंभ वज़ू टूटने के बाद मोज़े पर किए जाने वाले पहले मसह से होगा।
मोज़ों पर मसह का तरीक़ा :
1- दोनों हाथों को तर किया जाए।
2- हाथ को क़दम के ऊपरी भाग (उँगलियों के किनारों से पिंडली के आरंभिक भाग तक) पर फेरा जाए।
3- दाएँ क़दम का मसह दाएँ हाथ से और बाएँ क़दम का मसह बाएँ हाथ से किया जाएगा।
मसह को निष्प्रभावी करने वाली चीज़ें : 1- हर वह चीज़ जिसके कारण स्नान वाजिब होता हो। 2- मसह की अवधि का समाप्त हो जाना।
स्नान
जब कोई पुरुष अथवा स्त्री संभोग कर ले, यद्यपि वीर्य स्खलन न हुआ हो, या जागने की अवस्था में वासना से दोनों में से किसी का वीर्य स्खलन हो, या नींद में स्खलन हो जाए; तो दोनों पर स्नान करना वाजिब होगा, ताकि नमाज़ पढ़ सकें एवं अन्य ऐसे कार्य कर सकें, जिनके लिए तहारत (पाक होना) अनिवार्य है। इसी तरह जब कोई स्त्री माहवारी एवं निफ़ास (प्रसवोत्तर रक्तस्राव) से पवित्र हो, तो नमाज़ पढ़ने या अन्य कोई ऐसा कार्य करने से पहले जिसके लिए तहारत अनिवार्य है, उसपर स्नान करना अनिवार्य है।
स्नान का तरीक़ा कुछ इस प्रकार है :
स्नान का तरीक़ा यह है कि मुसलमान किसी भी तरह से हो, अपने पूरे शरीर में पानी बहाए, जिसमें कुल्ला करना तथा नाक झाड़ना भी शामिल है। पूरे शरीर पर पानी बहा देने से बड़ी नापाकी दूर हो जाएगी और पवित्रता प्राप्त हो जाएगी।
वज़ू का एक और तरीक़ा भी है, जो अधिक संपूर्ण है। यानी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वज़ू करने का तरीक़ा, जो इस प्रकार है :
1- नापाकी को दूर करने की नीयत करना।
2- बिस्मिल्लाह कहना, दोनों हाथों को तीन बार धोना, फिर शर्मगाह को धोना।
3- पूरा वज़ू करना, जैसे नमाज़ के लिए वज़ू किया जाता है।
4- सर पर तीन बार पानी डाला, जिससे बाल की जड़ों तक पानी पहुँच जाए।
5- पूरे शरीर पर पानी पहुँचाना। शुरुआत शरीर की दाहिनी तरफ को धोने से करें, फिर बाईं तरफ। दोनों हाथों से मल लें, ताकि पानी शरीर के सभी हिस्सों तक पहुँच जाए।
जुंबी व्यक्ति जब तक स्नान न कर ले, निम्नलिखित कार्य नहीं कर सकता :
1- नमाज़ पढ़ना।
2- काबा का तवाफ़ करना।
3- मस्जिद में रुकना। यदि न रुके, तो केवल गुज़र जाने की अनुमति है।
4- मुसहफ़ को छूना।
5- क़ुरआन पढ़ना।
तयम्मुम
जब किसी मुसलमान को पवित्रता प्राप्त करने के लिए पानी न मिल सके या किसी रोग आदि के कारण पानी का प्रयोग न कर सके और नमाज़ का समय निकल जाने का भय हो, तो वह मिट्टी से तयम्मुम करेगा।
इसका तरीक़ा यह है कि अपने दोनों हाथों को एक बार मिट्टी पर मारे और फिर दोनों हाथों से चेहरे तथा दोनों हथेलियों का मसह करे। मिट्टी का पाक होना शर्त है।
तयम्मुम निम्नलिखित चीज़ों से टूट जाता है :
1- तयम्मुम उन तमाम चीज़ों से नष्ट हो जाता है, जिनसे वज़ू नष्ट होता है।
2- जब वह इबादत शुरू करने से पहले, जिसके लिए तयम्मुत किया गया है, पानी मिल जाए।
नमाज़
अल्लाह ने एक मुसलमान पर दिन और रात में पाँच नमाज़ें फ़र्ज़ की हैं, जो कुछ इस तरह हैं : फ़ज्र, ज़ोहर, अस्र, मग़्रिब और इशा।
नमाज़ की तैयारी
जब नमाज़ का समय हो जाए तो यदि मुसलमान छोटी नापाकी या बड़ी नापाकी में हो, तो उससे पवित्रता प्राप्त करेगा।
बड़ी नापाकी से मुराद वह नापाकी है, जिसके कारण मुसलमान पर स्नान करना अनिवार्य हो जाता है।
छोटी नापाकी से मुराद वह नापाकी है, जिसके कारण मुसलमान पर वज़ू करना अनिवार्य होता है।
मुसलमान पाक वस्त्र धारण कर, पवित्र स्थान में, अपने शरीर के ढ़ाँपने योग्य भागों को ढाँपकर नमाज़ पढ़ेगा।
मुसलमान नमाज़ के समय उचित वस्त्र से सुशोभित होकर उपस्थित होगा और अपने शरीर को ढाँपकर रखेगा। पुरुष के लिए नमाज़ की स्थिति में नाभि से घुटने के बीच के भाग के किसी भी अंग को खुला रखना जायज़ नहीं है।
स्त्री के लिए नमाज़ की अवस्था में चेहरे तथा दोनों हथेलियों को छोड़ शरीर के अन्य किसी भाग को खोलना जायज़ नहीं है।
नमाज़ की हालत में कोई मुसलमान नमाज़ के साथ खास अज़कार तथा दुआओं के अतिरिक्त कोई शब्द ज़बान से नहीं निकालेगा, इमाम को ध्यान से सुनेगा तथा नमाज़ की अवस्था में इधर-उधर नहीं देखेगा। लेकिन यदि नमाज़ में पढ़ी जाने वाली क़ुरआन की आयतों, अज़कार तथा दुआओं को याद न कर सके, तो नमाज़ के अंत तक अल्लाह को याद करेगा और उसकी पवित्रता बयान करेगा और जल्द से जल्द नमाज़ तथा उसके अज़कार एवं दुआओं को याद कर लेगा।
सही तौर पर नमाज़ अदा करने के लिए हम अल्लाह की तौफ़ीक़ से निम्नलिखित चरणों का पालन एवं पाबंदी करेंगे :
चरण 1 : उस नमाज़ की नीयत करना जिसे अदा करना हो। याद रहे कि नीयत दिल से होती है।
वज़ू कर लेने के बाद क़िबला की ओर मुँह कर लेंगे और यदि शक्ति हो तो खड़े होकर नमाज़ पढ़ूेंगे।
चरण 2 : दोनों हाथों को दोनों कंधों के बराबर उठाना है और नमाज़ में प्रवेश करने के इरादे से "अल्लाहु अकबर" कहना है।
चरण 3 : हदीस में आई हुई दुआ-ए-इसतिफ़ताह (नमाज़ के आरंभ में पढ़ी जाने वाली दुआ) पढ़नी है। एक दुआ-ए-इसतिफ़ताह इस प्रकार है : "सुबहानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका, व तबारक्स्मुका, व तआला जद्दुका, व लाइलाहा ग़ैरुका" (तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।)
चरण 4 : धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगना है। इसके शब्द इस प्रकार हैं : "मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।"
चरण 5 : फिर हर रकात में सूरा फ़ातिहा पढ़नी है, जो इस प्रकार है : "हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है। जो अत्यंत दयावान्, असीम दया वाला है। जो बदले के दिन का मालिक है। (ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं। हमें सीधे मार्ग पर चला। उन लोगों के मार्ग पर, जिनपर तूने अनुग्रह किया। उनके मार्ग पर नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनके मार्ग पर, जो गुमराह हो गए।"
फिर ''आमीन'' कहना है, जिसका अर्थ है : हे अल्लाह! तू क़बूल कर ले।
सूरा फ़ातिहा के बाद प्रत्येक नमाज़ की केवल पहली तथा दूसरी रकात में क़ुरआन का जितना भाग हो सके, पढ़ना है। यह यद्यपि वाजिब नहीं है, लेकिन इससे बड़ा प्रतिफल प्राप्त होता है।
चरण 6 : उसके बाद "الله أكبر" कहेंगे और फिर इस तरह रुकू करेंगे कि पीठ सीधी रहे, दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रहें और उनकी उँगलियाँ एक-दूसरी से अलग रहें। फिर रुकू में तीन बार कहेंगे : "سبحان ربي العظيم" अर्थात् : मेरा महान पालनहार पवित्र है।
चरण 7 : रुकू से सर "سمع الله لمن حمده" कहते और अपने दोनों हाथों को कंधों के बराबर उठाते हुए उठाएँगे और जब शरीर ठीक सीधा हो जाए तो कहेंगे : "ربنا ولك الحمد" (ऐ हमारे पालनहार! तेरी ही प्रशंसा है।)
चरण 8 : "अल्लाहु अकबर" कहेंगे और दोनों हाथों, दोनों घुटनों, दोनों क़दमों तथा पेशानी एवं नाक पर सजदा करेंगे और सजदे में तीन बार "سبحان ربي الأعلى" कहेंगे।
चरण 9 : फिर "अल्लाहु अकबर" कहेंगे और सजदा से उठेंगे। जब इस तरह ठीक से बाएँ क़दम पर बैठ जाएँगे कि दायाँ क़दम खड़ा हो और पीठ बिलकुल सीधी हो, तो तीन बार "ربي اغفر لي" (ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे।) कहेंगे।
चरण 10 : फिर"अल्लाहु अकबर" कहेंगे और पहले सजदा ही की तरह एक और सजदा करेंगे।
चरण 11: फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए सजदा से उठाएँगे और सीधा खड़ा हो जाएँगे। इसी तरह नमाज़ की शेष रकातों में वही कुछ करेंगे, जो पहली रकात में किया था।
जुहर, अस्र, मग़्रिब, अस्र तथा इशा की नमाज़ की दूसरी रकात के बाद पहला तशह्हुद पढ़ने के लिए बैठ जाएँगे। तशह्हुद इस प्रकार है : "हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतें हों, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के नेक बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं है एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।" फिर इसके बाद तीसरी रकात के लिए खड़ा हो जाएँगे।
प्रत्येक नमाज़ की अंतिम रकात के बाद अंतिम तशह्हुद पढ़ने के लिए बैठेंगे, जो इस प्रकार है : "हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतें हों। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के नेक बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं साक्षी हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं है एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं। ऐ अल्लाह! तू उसी तरह दरूद व सलाम भेज मुहम्मद एवं उनकी संतान पर जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान पर दरूद व सलाम भेजा है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद तथा उनकी संतान पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान पर बरकतों की बारिश की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।"
चरण 12 : इसके बाद हम नमाज़ से निकलने के इरादे से दाईं ओर सलाम फेरेंगे और कहेंगे : "السلام عليكم ورحمة الله" तथा बाईं ओर सलाम फेरेंगे और कहेंगे : "السلام عليكم ورحمة الله" इतना करने के बाद हमने नमाज़ अदा कर ली।
मुस्लिम स्त्री का पर्दा
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "ऐ नबी! अपनी पत्नियों, अपनी बेटियों और ईमान वाले लोगों की स्त्रियों से कह दें कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें डाल लिया करें। यह इसके अधिक निकट है कि वे पहचान ली जाएँ, फिर उन्हें कष्ट न पहुँचाया जाए। और अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अहज़ाब : 59]
अल्लाह ने मुस्लिम महिला पर पर्दा तथा अपने पूरे शरीर को अजनबी पुरुषों से अपने क्षेत्र में प्रचलित पोशाक से ढाँपने को अनिवार्य किया है। अपने पति अथवा महरम पुरुषों के अतिरिक्त किसी और के सामने हिजाब उतारना जायज़ नहीं है। महरम से मुराद वह सारे लोग हैं, जिनसे मुस्लिम महिला का निकाह सर्वकालिक रूप से हराम हो। वह लोग हैं : पिता, और उसके ऊपर के (दादा-परदादा आदि) लोग; बेटा, और उसके नीचे के (पोता-परपोता आदि) लोग; चाचा और मामा; भाई, भतीजा (भाई का बेटा) और भांजा (बहन का बेटा); माँ का पति (सौतेला पिता); पति का पिता, और उसके ऊपर के लोग; पति का बेटा और उसके नीचे के लोग; दूध-शरीक भाई और दाई का पति। रज़ाअत (दूध पिलाने) से वही चीज़ें हराम होती हैं जो नसब (खून के रिश्ते) से हराम होती हैं।
मुस्लिम महिला अपने पहनावे के संबंध में निम्नलिखित सिद्धांतों का ख़्याल रखेगी :
1- पूरा शरीर ढका हुआ हो।
2- परिधान ऐसा न हो कि उसे महिला शृंगार के लिए पहनती हो, यदि वह गैर-महरम (अजनबी) पुरुषों की उपस्थिति में हो ।
3- इतना पतला न हो कि शरीर झलकता हो।
4- ढीला-ढाला हो। इतना तंग न हो कि शरीर के किसी भाग को दर्शाता हो।
5- सुगंधित न हो, यदि वह ऐसे गैर-महरम पुरुषों के पास से गुज़रे, जिन्हें उससे इत्र की महक महसूस हो।
6- पुरुषों के वस्त्र जैसा न हो।
7- लिबास उस प्रकार का न हो जिस प्रकार का लिबास गैर-मुस्लिम स्त्रियाँ अपने उपासनाओं तथा त्योहारों के अवसर पर पहनती हैं।
8- दिखावे का कपड़ा न हो।
मोमिन के कुछ गुण
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "(वास्तव में) ईमान वाले तो वही हैं कि जब अल्लाह का ज़िक्र किया जाए, तो उनके दिल काँप उठते हैं, और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाएँ, तो उनका ईमान बढ़ा देती हैं, और वे अपने पालनहार ही पर भरोसा रखते हैं।" [सूरा अनफ़ाल : 2]
- वह सदा सच बोलता है और झूठ बोलने से गुरेज़ करता है।
- दिए हुए वचन का पालन करता है।
- झगड़ा करते समय बदज़बानी नहीं करता।
- अमानत में ख़यानत नहीं करता है।
- अपने मुस्लिम भाई के लिए वही पसंद करता है जो अपने लिए पसंद करता हो।
- वह उदार होता है।
- लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करता है।
- खूनी रिश्तों को जोड़ के रखता है।
- अल्लाह के निर्णय पर संतुष्ट रहता है, खुशहाली के समय अल्लाह का शुक्र अदा करता है और परेशानी के समय सब्र करता है।
- हया वाला होता है।
- सृष्टि पर दया करता है।
- उसका हृदय ईर्ष्या से पाक तथा उसके शरीर के अंग किसी पर ज़ुल्म करने से स्वच्छ होते हैं।
- क्षमाशील होता है।
- न सूद खाता है और न सूदी लेन-देन करता है।
- व्यभिचार में लिप्त नहीं होता है।
- मदिरा पान नहीं करता है।
- अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करता है।
- न अत्याचार करता है और न धोखा देता है।
- न चोरी करता है और न चालबाज़ी से काम लेता है।
- अपने माता-पिता का आज्ञापालन करता है और भलाई के काम में उनके आदेशों को मानता है, चाहे वह गैर-मुस्लिम ही क्यों न हों।
- अपने बच्चों को आदर्श जीवन जीने की शिक्षा देता है, उन्हें शरीयत द्वारा अनिवार्य किए हुए कार्यों का आदेश देता है और बुरे तथा वर्जित कार्यों से रोकता है।
- ग़ैर-मुस्लिमों की धार्मिक विशिष्टताओं तथा ऐसी आदतों, जो उनकी पहचान बन चुकी हों, की नक़्क़ाली नहीं करता।
- अल्लाह की ओर लौटता है और उसी से अपनी कोताही और पापों के लिए क्षमा माँगता है
मुसलमान के अक़ीदे के महत्वपूर्ण सिद्धंत
1- अल्लाह हमारा पालनहार है; उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, उसके अलावा कोई पालनहार नहीं है, उसके समान कोई चीज़ नहीं है, उसके लिए कोई चीज़ असंभव नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला तथा सब कुछ देखने वाला है।
2- अल्लाह तआला आसमान में है, अपनी समस्त सृष्टि के ऊपर है और उनसे अलग है। उसकी बुलंदी हर दृष्टिकोण से सम्पूर्ण है: अपनी हस्ती के दृष्टिकोण से, सम्मान एवं प्रतिष्ठा के दृष्टिकोण से और शक्ति एवं सामर्थ्य के दृष्टिकोण से। वह हर चीज़ को घेरे हुए है।
3- हम उन नामों एवं गुणों को स्वीकार करते हैं, जिन्हें अल्लाह तआला ने अपने लिए सिद्ध किया है या उसके नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसके लिए सिद्ध किया है। अल्लाह को उन नामों एवं गुणों से पवित्र मानते हैं, जिनसे उसने स्वयं अपने आपको या उसके नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उसे पवित्र बताया है।
4- अल्लाह तआला दुआओं को स्वीकार करता है, हाजतों को पूरा करता है और हर चीज़ का मालिक है। उसके सिवा न कोई हानि पहुँचा सकता है और न लाभ। बंदा उससे पल भर के लिए भी बेनियाज़ नहीं हो सकता। किसी मुसलमान के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह इबादत के किसी भी प्रकार—जैसे दुआ, नमाज़, मन्नत, कुर्बानी, भय, आशा, तवक्कुल और अन्य सभी प्रकट या अप्रकट इबादतों—में अल्लाह तआला के अलावा किसी का ओर रुख करे। जो अल्लाह तआला के सिवा किसी और के लिए किसी भी प्रकार की इबादत अर्पित करे, वह अल्लाह के साथ साझी ठहराने वाला है।
5- सबसे बड़ा गुनाह है, अल्लाह का साझी बनाना। जो शिर्क की हालत में मर गया, उसपर जन्नत हराम है और उसका ठिकाना जहन्नम है। अल्लाह का साझी बनाना एक ऐसा गुनाह है, जिसे अल्लाह क्षमा नहीं करता, यदि बंदा उसी पर मर जाए और उससे तौबा न करे।
6- जो चीज़ बंदो को नहीं मिली, वह उसे मिलनी ही नहीं थी; और जो उसे मिल गई, वह उसके हाथ से निकल नहीं सकता थी। एक मुसलमान पर वाजिब है कि तक़दीर पर ईमान रखे, अल्लाह तआला के फ़ैसलों से ख़ुश रहे, अपने रब की प्रशंसा करे और हर हाल में उसका आभार प्रकट करे।
7- हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सारे इन्सानों में सबसे श्रेष्ठ और नबियों के सिलसिला की अंतिम कड़ी हैं। क़यामत के दिन आप सिफ़ारिश करेंगे और आपकी सिफ़ारिश क़बूल भी होगी। अल्लाह ने आपको अपना प्रिय बनाया है, जैसे इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपना प्रिय बनाया था।
10- हमारा ग्रंथ पवित्र क़ुरआन है—एक चमत्कारिक ग्रंथ, जिसकी सत्यता सिद्ध और निर्विवाद है, और जिसकी तिलावत खुद इबादत है—जिसे अल्लाह तआला ने हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, सबसे सम्माननीय फ़रिश्ता जिबरील अलैहिस्सलाम के द्वारा उतारा। अल्लाह तआला ने उसे परिवर्तन और फेरबदल से सुरक्षित रखा, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह हमने ही इस ज़िक्र (क़ुरआन) को उतारा है और निःसंदेह हम ही इसकी रक्षा करेंगे।" [सूरा हिज्र : 9].
11- अल्लाह तआला के सबसे निकट वही लोग हैं, जो उसके सबसे अधिक आज्ञाकारी और उसकी शरीयत के सबसे अधिक अनुसरण करने वाले हों। न किसी अरब को किसी ग़ैर-अरब पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त है, और न किसी ग़ैर-अरब को किसी अरब पर; न किसी गोरे को किसी काले पर, और न किसी काले को किसी गोरे पर। श्रेष्ठता केवल धर्मपरायणता के आधार पर प्राप्त होती है। लोग आदम -अलैहिस्सलाम- की संतान हैं, और आदम -अलैहिस्सलाम- मिट्टी से हैं। उच्च शान वाले अल्लाह ने फ़रमाया है : "निःसंदेह अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मान वाला वह है, जो तुममें सबसे अधिक तक़्वा वाला है।" [सूरा हुजुरात : 13]
12- मुसलमान ‘किरामन कातिबीन’ अर्थात सम्मानित लिखने वाले फ़रिश्तों पर ईमान रखता है, उनके अस्तित्व की पुष्टि करता है और यह मानता है कि वे अल्लाह के पैदा किए हुए बन्दे हैं। अल्लाह ने उन्हें नूर (प्रकाश) से पैदा किया है। वे अल्लाह तआला की सृष्टियों में से हैं। उनमें से जिबरील वह्य लाने के कार्य पर नियुक्त हैं, मीकाईल बारिश बरसाने के कार्य पर नियुक्त हैं, इस्राफ़ील सूर फूँकने पर नियुक्त हैं और मौत का फ़रिश्ता बन्दों की रूहें क़ब्ज़ करने पर नियुक्त है।
13- मुसलमान क़यामत की निशानियों पर, दज्जाल के निकलने पर, अंतिम ज़माने में आसमान से ईसा बिन मरयम -अलैहिस्सलाम- के उतरने पर और पश्चिम से सूर्य के निकलने पर ईमान रखता है।
14- मुसलमान यह विश्वास रखता है कि जो क़ब्र की यातना का हक़दार हो, उसे क़ब्र की यातना होगी, और जो क़ब्र की नेमतों का हक़दार हो, उसे क़ब्र की नेमतें प्राप्त होंगी; तथा मुनकर व नकीर उसकी क़ब्र में उससे उसके रब, उसके दीन और अल्लाह के सन्देष्टा (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में सवाल करेंगे; और यह कि क़ब्र जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है या जहन्नम के गड्ढों में से एक गड्ढा।
15- वह दोबारा जीवित होकर उठने और क़यामत के दिन कर्मों के प्रतिफल पर ईमान रखता है। इस बात पर भी ईमान रखता है कि जन्नत एवं जहन्नम अल्लाह द्वारा पैदा की गई हैं और कभी नष्ट नहीं होंगी।
16- जादू से संलिप्त होना दरअसल अल्लाह के प्रति अविश्वास है। इसे सीखना जायज़ नहीं है और न जादूगरों व धोखेबाज़ों के पास जाना जायज़ है। मुसलमान न किसी काहिन की और न किसी भविष्य बताने वाले की बात को सच माने। जिसने काहिन या भविष्य बताने वाले की बात को सच माना, उसने उस शरीयत का इनकार किया, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी गई है।
17- मुसलमान, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथीगण से प्रेम करता है, और जो उनसे प्रेम करते हैं उनसे भी प्रेम करता है तथा जो उनसे द्वेष रखते हैं उनसे द्वेष रखता है; क्योंकि उनसे प्रेम करना दीन और नेकी है, और उनसे द्वेष रखना कुफ़्र और निफ़ाक़ है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "मेरे साथियों को बुरा-भला न कहो।" इस हदीस को मुस्लिम ने रिवायत किया है। जिसने किसी सहाबी दोषारोपण किया या उसे कमतर दिखाया, वह गुमराह एवं बिदअती है।
16- मुसलमान रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद ख़िलाफ़त का हक़दार इन लोगों को मानता है : सबसे पहले अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु को — उन्हें तमाम उम्मत पर तरजीह और फ़ज़ीलत देते हुए —, फिर उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु को, फिर उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु को, फिर अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु को। ये ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन और सत्य मार्ग पर चलने वाले इमाम हैं।
17- सारी इबातें अल्लाह तथा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित होने पर निर्भर हैं। अतः अल्लाह तआला की बन्दगी किसी भी इबादत द्वारा करना जायज़ नहीं है, जब तक वह अल्लाह की किताब या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से साबित न हो। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वफ़ात के बाद लोगों द्वारा ईजाद की गई हर इबादत, जिसकी शिक्षा आपने नहीं दी थी, बिद्अत और अस्वीकार्य है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : “जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसा नया कार्य किया, जो उसका भाग नहीं है, तो उसका वह कार्य स्वीकार-योग्य नहीं है।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
18- इबादत का ग्रहण होना दो मूलभूत स्तंभों पर निर्भर है : पहला, इबादत केवल अल्लाह तआला के लिए करना और दूसरा, उसे रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए तरीक़े के अनुसार करना। अतः यदि इबादत अल्लाह के लिए ख़ालिस न हो तो वह क़बूल नहीं होती और यदि रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के तरीक़े के अनुसार न की जाए, तो भी क़बूल नहीं होती।
कल्याण का मार्ग केवल इस्लाम धर्म है
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगे। और निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे।" [सूरा नह्ल : 97]
एक मुसलमान को सबसे अधिक ख़ुशी तथा सबसे अधिक संतुष्टि उसका अपने पालनहार से ऐसा सीधा संबंध दिलाता है कि जिसमें किसी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा किसी बुत आदि का कोई वास्ता न हो। अल्लाह ने अपनी पवित्र पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि वह सदा अपने बंदों के निकट रहता है, उन्हें सुनता है तथा उनकी दुआएँ ग्रहण करता है। उसका फ़रमान है : "और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो निश्चय मैं (उनसे) क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की दुआ क़बूल करता हूँ, जब वह मुझे पुकारता है। तो उन्हें चाहिए कि वे मेरी बात मानें तथा मुझपर ईमान लाएँ, ताकि वे मार्गदर्शन पाएँ।" [सूरा बक़रा : 186] अल्लाह ने हमें उसे पुकारने का आदेश दिया है और इसे उसकी निकटता प्राप्त करने वाली एक महत्वपूर्ण इबादत भी कहा है। उसने कहा है : "तथा तुम्हारे पालनहार ने कहा है : तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [सूरा गाफ़िर : 60] अतः एक सदाचारी मुसलमान हमेशा अपनी ज़रूरतें अपने रब के सामने रखता है, उसके सामने हाथ फैलाता है और सत्कर्मों द्वारा उसकी निकटता प्राप्त करने के प्रयास में रहता है।
दरअसल अल्लाह ने हमें इस दुनिया में बेकार नहीं, बल्कि एक बड़े उद्देश्य के लिए पैदा किया है। वह उद्देश्य यह है कि हम केवल उसी की इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ। उसने हमें एक ऐसा व्यापक धर्म प्रदान किया है जो हमारे जीवन के सभी आम तथा खास कामों को व्यवस्थित करता है। उसने इसी न्याय पर आधारित धर्म के ज़रिए हमारे जीवन की ज़रूरतों यानी हमारे धर्म, जान, मान-सम्मान, बुद्धि और धन की रक्षा की है। जिसने शरई आदेशों का पालन करते हुए और हराम चीज़ों से दामन बचाते हुए जीवन व्यतीत किया, उसने इन ज़रूरी चीज़ों की रक्षा की और सौभाग्यशाली तथा संतुष्ट जीवन गुजारा।
एक मुसलमान का संबंध अपने पालनहार से बड़ा गहरा होता है, जो दिल में संतुष्टि एवं शांति लाता है, सुकून तथा प्रसन्नता का एहसास प्रदान करता है और इस बात की अनुभूति कराता है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह अपने मोमिन बंदे के साथ रहता है, उसका ख़याल रखता है और उसकी सहायता करता है। महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह ईमान वालों का दोस्त (संरक्षक) है, वह उन्हें अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लाता है।" [सूरा बक़रा : 257]
यह प्रगाढ़ संबंध दरअसल एक अनुभूति की अवस्था हुआ करता है जो इन्सान को अल्लाह की इबादत में आनंद और उससे मिलने का शौक़ प्रदान करता है और उसकी अंतरात्मा को खुशियों के आकाश की सैर कराता है तथा ईमान की मिठास प्रदान करता है।
वह मिठास, जिसका स्वाद वही बयान कर सकता है, जिसने पुण्य के कार्य करके और गुनाहों से बचकर उसका स्वाद चखा हो। यही कारण है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने अल्लाह को अपने रब के रूप में, इस्लाम को अपने धर्म के रूप में और मुहम्मद को अपने रसूल के रूप में स्वीकार कर लिया, उसने ईमान का स्वाद चख लिया।" सहीह मुस्लिम।
जब किसी इन्सान को इस बात का एहसास हो कि वह हमेशा अपने स्रष्टा के सामने रहता है, फिर उसे उसके नामों एवं गुणों के आधार पर जानता हो, उसकी इबादत ऐसे करता हो जैसे वह उसे देख रहा है, पूरी निष्ठा से उसकी उपासना करता हो और इससे उसका उद्देश्य अल्लाह के अतिरिक्त किसी और को प्रसन्न करना न हो, तो वह दुनिया में सौभाग्यशाली जीवन व्यतीत करता है और आख़िरत में अच्छा स्थान प्राप्त करता है।
एक मुसलमान को दुनिया में जो भी विपत्तियाँ आती हैं, उनकी तपिश दूर हो जाती है अल्लाह पर उसके विश्वास, उसके निर्णय पर संतुष्टि और भाग्य के हर भले-बुरे फ़ैसले पर उसकी प्रशंसा व ख़ुशी की ठंडक से।
एक मुसलमान को अपने कल्याण, सुख-चैन तथा संतुष्टि में बढ़ोतरी के लिए अल्लाह का अधिक से अधिक ज़िक्र करना चाहिए। महान अल्लाह ने कहा है : "वे जो ईमान लाए और उनके दिलों को अल्लाह की याद से संतुष्टि मिलती है। सुन लो! अल्लाह की याद ही से दिलों को संतुष्टि मिलती है।" [सूरा राद : 28] एक मुसलमान अल्लाह के ज़िक्र तथा क़ुरआन की तिलावत में जितना अधिक लीन होता जाएगा, अल्लाह से उसका संबंध उतना ही अधिक मज़बूत होता जाएगा, उसकी आत्मा पवित्र होती जाएगी और उसका ईमान प्रबल होता जाएगा।
इसी तरह एक मुसलमान को अपने धर्म की बातें सही संदर्भों से प्राप्त करनी चाहिए, ताकि अल्लाह की इबादत उचित ज्ञान के आधार पर कर सके। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहा है : "विद्या का प्राप्त करना हर मुसलमान पर अनिवार्य है।" इसे इब्न-ए-माजा ने रिवायत किया है। जिस अल्लाह ने उसकी सृष्टि की है, वह उसके आदेशों का पालन खुले दिल से करे, चाहे उन आदेशों के रहस्य से अवगत हो या न हो। अल्लाह ने अपने पवित्र ग्रंथ में कहा है : "तथा किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री को यह अधिकार नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी बात का निर्णय कर दें, तो उनके लिए अपने मामले में कोई अख़्तियार बाक़ी रहे। और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे, वह खुली गुमराही में पड़ गया।" [सूरा अहज़ाब : 36]
दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिवार-परिजन और तमाम साथियों पर।