الدعاء ويليه العلاج بالرقى من الكتاب والسنة
दुआएँ तथा किताब व सुन्नत में उल्लेखित झाड़-फूँक द्वारा इलाज
दुआएँ तथा किताब व सुन्नत में उल्लेखित झाड़-फूँक द्वारा इलाज
किताब व सुन्नत की दुआएँ
लेखक
अल्लाह के अनुग्रह का अभिलाषी डॉक्टर सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी
''और सबसे अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं। अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नामों के बारे में सीधे रास्ते से हटते हैं। उन्हें शीघ्र ही उसका बदला दिया जाएगा, जो वे किया करते थे।'' सूरा आराफ़ :180.
अल्लाह - प्रथम - अंतिम - प्रत्यक्ष - गुप्त - ऊँचा - सबसे ऊँचा
अत्यंत ऊँचा - महान - प्रतिष्ठावान - बहुत बड़ा - सब कुछ सुनने वाला - सब कुछ देखने वाला - सब कुछ जानने वाला
हर चीज़ की ख़बर रखने वाला - प्रशंसित - प्रभुत्वशाली - क्षमतावान - व्यापक क्षमता रखने वाला - सामर्थ्यवान - शक्तिशाली
बलवान - निस्पृह - हिकमत वाला - सहनशील - माफ़ करने वाला - क्षमाशील - अति क्षमाशील
अत्याधिक तौबा क़बूल करने वाला - निरीक्षक - साक्षी - संरक्षक - पैनी नज़र रखने वाला - निकट - पुकार सुनने वाला
अति प्रेम करने वाला - गुणग्राही -अति गुणग्राही - अधिपति - पूर्णता के तमाम गुणों में सम्पूर्ण - प्रभावशाली - अति प्रभावशाली
प्रभावशाली और टूटे हुए को जोड़ने वाला - हिसाब लेने वाला - मार्गदर्शन करने वाला - निर्णय करने वाला - अत्यंत पवित्र - हर ऐब तथा कमी से पाक - उपकार करने वाला
सबसे बड़ा दाता - कृपाशील - दयावान् - उदार -सबसे उदार - करुणावान - अति निर्णयकारी
रोज़ी देने वाला - बहुत ज़्यादा रोज़ी देने वाला - जीवित - संभालने वाला -रब (स्रष्टा, स्वामी, प्रबंधक) - बादशाह - स्वामी
एक - अकेला - बड़ाई वाला - पैदा करने वाला - बहुत ज़्यादा पैदा करने वाला -अलग-अलग पहचान देने वाला - आकार देने वाला
सत्य सिद्ध करने वाला और सुरक्षा प्रदान करने वाला - मुहैमिन (गवाह- प्रभुत्वशाली) - घेरे में रखने वाला - रोज़ी निर्धारित करने वाला तथा उसे पहुंचाने वाला - काम बनाने वाला - पर्याप्त - व्यापक
सत्य - सुंदर - नर्मी का मामला करने वाला - हया वाला - पर्दा डालने वाला - इबादत का हक़दार - समेटने वाला
फैलाने वाला - देने वाला - आगे करने वाला - पीछे करने वाला - स्पष्ट करने वाला - बहुत ज़्यादा उपकार करने वाला - सहायक
संरक्षक - मदद करने वाला - स्वस्थ करने वाला - राज्य का मालिक - लोगों को एकत्र करने वाला
आकाशों एवं धरती का प्रकाश - प्रतापी एवं सम्मानित - आकाशों एवं धरती का आविष्कारक [1] [1] अल्लाह के इन नामों को किताब व सुन्नत के प्रमाणों के साथ देखने के लिए पढ़ें लेखक द्वारा लिखी गई यह किताब : शर्ह असमा-ए- अल्लाह अल-हुसना फ़ी ज़ौ -ए- अल-किताब व अल-सुन्नह।
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं अति दयावान है
भूमिका
निस्संदेह सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। हम उसकी प्रशंसा करते हैं, उससे सहायता मांगते हैं, उससे क्षमा याचना करते हैं और अपनी आत्मा की बुराइयों तथा अपने बुरे कर्मों से अल्लाह की शरण मांगते हैं। जिसे अल्लाह मार्गदर्शन दे, उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं है और जिसे वह गुमराह कर दे, उसे कोई मार्गदर्शन देने वाला नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं। अल्लाह उनपर बहुत अधिक दया और शांति अवतरित करे। दरूद एवं सलाम हो उनपर, उनके परिजनों पर, उनके समस्त साथियों पर और क़यामत के दिन तक उनका अनुसरण करने वालों पर। अब मूल विषय पर आते हैं :
यह मेरी किताब "ज़िक्र, दुआ एवं झाड़-फूँक द्वारा इलाज - किताब व सुन्नत के आलोक में" [2] का संक्षिप्त रूप है। लाभ उठाना आसान हो जाए, इस बात को मैंने ध्यान में रखते हुए दुआ वाले भाग को संक्षिप्त रूप में अलग से प्रस्तुत कर दिया है तथा उसमें कुछ दुआएँ एवं लाभकारी बातें बढ़ा दी हैं। हम अल्लाह से, उसके सुंदर नामों एवं उच्च गुणों द्वारा दुआ करते हैं कि इस किताब को अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन बनाए। वह चाहे, तो ऐसा अवश्य ही हो सकता है। [2] अल्लाह का शुक्र है कि मूल पुस्तक भी चार खंडों में छप चुकी है, जिसमें उसकी हदीसों के विस्तृत हवाले दे दिए गए हैं। पहले एवं दूसरे खंड (हिस्न अल-मुस्लिम) में अज़कार हैं, तीसरे खंड में दुआएँ हैं और चौथे खंड में झाड़-फूँक द्वारा इलाज है।
दरूद व सलाम एवं बरकतें हों हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तथा आपके परिजनों, साथियों और क़यामत के दिन तक आपके बताए हुए मार्ग पर चलने वालों पर।
निवेदक सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी
शाबान 1408 हिजरी
दुआ की फ़ज़ीलत
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा तुम्हारे रब ने कहा है कि मूझी से प्रार्थना करो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकर करूँगा। वास्तव में जो लोग मेरी इबादत से अभिमान करेंगे, वे अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [4] सूरा ग़ाफ़िर : 60. एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो निश्चय मैं (उनसे) क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की दुआ क़बूल करता हूँ जब वह मुझे पुकारता है। तो उन्हें चाहिए कि वे मेरी बात मानें तथा मुझपर ईमान लाएँ, ताकि वे मार्गदर्शन पाएँ।" सूरा बक़रा : 186. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "दुआ ही इबादत है। तुम्हारे रब ने कहा है : {तुम लोग मुझसे माँगो, मैं तुम्हारी माँग पूरी करूँगा।}"[3] एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तुम्हारा बरकत वाला और महान रब बड़ा ही हया वाला तथा दानशील है। जब कोई बंदा उसके आगे अपने हाथों को फैलाता है, तो उसे उनको खाली लौटाने में शर्म आती है।" [4] एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो मुसलमान कोई दुआ करता है, जिसमें गुनाह एवं सगे-संबंधियों से संबंध विच्छेद न हो, उसे अल्लाह तीन में से कोई एक चीज़ ज़रूर देता है।या तो उसकी दुआ इसी दुनिया में क़बूल कर लेता है, या उसे उसकी आख़िरत के लिए जमा रख लेता है या उससे उसके समान बुराई दूर कर देता है।" सहाबा ने कहा : तब तो हम अधिकाधिक दुआएँ किया करेंगे। आपने कहा : "अल्लाह और अधिकाधिक देने वाला है।" [5] [3] सुनन अबू दाऊद 2/78, हदीस संख्या 1481, सुनन तिर्मिज़ी 5/211, हदीस संख्या 2959, सुनन इब्न-ए-माजा 2/1258, हदीस संख्या 3828, अल्लामा अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे अल-सग़ीर 3/150 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 2/324 में सहीह कहा है। [4] सुनन अबू दाऊद 2/78, हदीस संख्या 1488, सुनन तिर्मिज़ी 5/557, हदीस संख्या 3556, सुनन इब्न-ए-माजा 2/1271, हदीस संख्या 3865, इब्न-ए-हजर ने इसकी सनद को जैयिद (उत्तम) कहा है, और अलबानी ने इसे सहीह अल-तिर्मिज़ी 3/179 में सहीह कहा है। [5] सुनन तिर्मिज़ी 5/566, 5/462, हदीस संख्या 3573, मुस्नद-ए-अहमद 3/18, हदीस संख्या 11150, अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे अल-सग़ीर 5/116 तथा सहीह सुनन तिर्मिज़ी 3/140 में सहीह कहा है।
दुआ के कुछ आदाब एवं क़बूल होने के कुछ कारण [6] : [6] दुआ के इन आदाबों एवं क़बूल होने के इन कारणों को प्रमाणों के साथ जानने के लिए देखें मूल किताब 3/927-975.
1- अल्लाह के प्रति पूर्ण निष्ठा रखना।
2. अल्लाह की स्तुति और उसकी प्रशंसा करके दुआ शुरू करना, फिर नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजना तथा अंत में भी दरूद पढ़ना।
2- निश्चितता के साथ दुआ करना और ग्रहण होने का विश्वास रखना।
4.आग्रहपूर्वक दुआ करना और जल्दबाज़ी न करना।
5- पूरे मन से दुआ करना।
6- सुख एवं दुख दोनों हालतों में दुआ करना।
7- माँगा केवल अल्लाह से जाएगा।
8. परिवार, धन, संतान और स्वयं के विरुद्ध बद-दुआ न करना।
9. दुआ करते समय आवाज़ धीमी रखना। न मन ही मन में दुआ करना, न ऊँची आवाज़ में।
10. गुनाह का एतराफ़ करना और उनपर क्षमा माँगना, अल्लाह की दी हुई नेमतों का एतराफ़ करना और उनपर अल्लाह का आभार व्यक्त करना।
11- दुआ में जान-बूझकर तुकबंदी करने से बचना।
12- गिड़गिड़ाना, विनयशील होना तथा आशा एवं भय रखना।
13. तौबा करना और किसी का अधिकार छीना हो तो वापस करना।
14- तीन-तीन बार दुआ करना।
15- क़िबला की ओर मुँह करना।
16- दुआ करते समय दोनों हाथों को उठाना।
17- हो सके तो दुआ से पहले वज़ू कर लेना।
18- दुआ करते समय शरई सीमाओं का उल्लंघन न करना।
19. दुआ करने वाला अगर दूसरों के लिए दुआ मांगे तो पहले अपने लिए दुआ करे। [7] [7] अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से जहाँ दूसरे के लिए दुआ करने से पहले अपने लिए दुआ करना साबित है, वहीं अपने लिए दुआ न करना भी साबित है। मसलन अनस, अब्दुल्लाह बिन अब्बास और उम्म-ए-इस्माईल आदि के लिए की गई दुआएँ देखें। इस विषय के विवरण के लिए देखें : नववी की सहीह मुस्लिम की शर्ह 15/144, तोहफ़ा अल-अहवज़ी शर्ह सुनन तिर्मिज़ी 9/328 तथा फ़त्ह अल-बारी शर्ह सहीह अल-बुख़ारी 1/281.
20- अल्लाह के सुंदर नामों एवं उच्च गुणों, या अपने द्वारा किए गए नेकी के किसी काम, या किसी उपस्थित जीवित नेक व्यक्ति की दुआ को वसीला बनाए।
21- खाना, पीना एवं वस्त्र हलाल कमाई के हों।
22- गुनाह या रिशतेदारों से संबंध विच्छेद की दुआ न करे।
23- अच्छे काम का आदेश दे और बुरे काम से रोके।
24- तमाम गुनाहों से दूर रहे।
दुआ के क़बूल होने के समय, स्थितियाँ और स्थान [8] : [8] इन समयों, स्थितियों और स्थानों को प्रमाणों के साथ मूल पुस्तक 3/975-1117 में देखें।
1- शब-ए-क़द्र।
2- रात का अंतिम भाग।
3- फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद का समय।
4- अज़ान तथा इक़ामत के बीच का समय।
5- हर रात की एक घड़ी।
6- फ़र्ज़ नमाज़ों की अज़ान के समय।
7. वर्षा होने के समय।
8- अल्लाह के मार्ग में शत्रू की पंक्तियों पर धावा बोलते समय।
9- जुमे के दिन की एक घड़ी।
जुमे की इस घड़ी के बारे में सबसे सठीक बात यह है कि यह जुमे के दिन अस्र के बाद की घड़ियों में से अंतिम घड़ी है। इससे मुराद ख़ुतबा एवं नमाज़ का समय भी हो सकता है।
10. सच्ची नीयत के साथ ज़मज़म का पानी पीते समय।
11- सजदे में।
12- रात में नींद से आँख खुल जाए, तो उस समय। इस तरह आँख खुल जाने पर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित दुआएँ करनी चाहिए।
13- जब तहारत की अवस्था में सोए और रात में आँख खुल जाए और दुआ करे।
14-इन शब्दों के साथ दुआ करते समय : "तेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।"
15- किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद की गई लोगों की दुआ।
16- अंतिम तशह्हुद में अल्लाह की प्रशंसा और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजने के बाद की गई दुआ।
9. अल्लाह को उसके उस इस्मे-आज़म (सबसे महान नाम) के साथ पुकारते समय, जिसके द्वारा उसे पुकारा जाए, तो वह क़बूल करता है और माँगा जाए, तो प्रदान करता है। [9] [9] अल्लाह के सबसे महान नाम को इस किताब की हदीस संख्या 203, 104 और 105 में देखें।
18- किसी मुसलमान का अपने भाई के लिए उसकी अनुपस्थिति में दुआ करना।
19- अरफ़ा के दिन अरफ़ा में की गई दुआ।
20- रमज़ान के महीने में की गई दुआ।
21- ज़िक्र की मजलिसों में मुसलमानों के एकत्र होने के समय।
22- मुसीबत के समय यह दुआ करना, "निश्चय ही हम अल्लाह के लिए हैं और हमें उसी की ओर लौटकर जाना है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी इस मुसीबत का प्रतिफल प्रदान करना, तथा मुझे इसके स्थान पर इससे अच्छी चीज़ देना।"
23- उस समय की गई दुआ जब दिल अल्लाह की ओर मुतवज्जेह हो और इन्सान पूर्ण रूप से अल्लाह के प्रति समर्पित रहे।
24- उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति द्वारा ज़ालिम के ख़िलाफ़ की गई बद-दुआ।
25- पिता द्वारा संतान के लिए की गई दुआ या बद-दुआ।
26- यात्री की दुआ।
27- रोज़ेदार द्वारा इफ़्तार तक की गई दुआ।
28- रोज़ेदार द्वारा इफ़्तार के समय की गई दुआ।
29- परेशान व्यक्ति की दुआ।
30- न्यायकारी शासक की दुआ।
31- माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने वाली संतान की दुआ।
32- वज़ू के बाद की गई दुआ, जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस स्थिति में वर्णित दुआ माँगे।
33- कंकड़ मारने के छोटे स्थान को कंकड़ मारने के बाद की गई दुआ।
34- कंकड़ मारने के बीच वाले स्थान को कंकड़ मारने के बाद की गई दुआ।
35- काबा के अंदर की गई दुआ। हिज्र के अंदर नमाज़ पढ़ने वाले को भी काबा के अंदर नमाज़ पढ़ने वाला शुमार किया जाएगा।
36- सफ़ा पर्वत पर की गई दुआ।
37- मर्वा पर्वत पर की गई दुआ।
38- मशअर-ए-हराम के निकट की गई दुआ।
वैसे, एक मोमिन जहाँ भी रहे, उसे अपने रब से दुआ करते रहना चाहिए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में पूछें, तो निश्चय मैं (उनसे) क़रीब हूँ। मैं पुकारने वाले की दुआ क़बूल करता हूँ जब वह मुझे पुकारता है। तो उन्हें चाहिए कि वे मेरी बात मानें तथा मुझपर ईमान लाएँ, ताकि वे मार्गदर्शन पाएँ।" [13] सूरा बक़रा : 186. लेकिन विशेष रूप से इन समयों, परिस्थितियों और स्थानों पर अधिक तवज्जो देनी चाहिए।
किताब व सुन्नत की दुआएँ
हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है तथा उसकी दया और शांति अवतरित हो उसके अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर।
1- "अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है * हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है * जो अत्यंत दयावान्, असीम दया वाला है * जो बदले के दिन का मालिक है * (ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं * हमें सीधे मार्ग पर चला * उन लोगों का मार्ग, जिनपर तूने अनुग्रह किया। उनका नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनका, जो गुमराह हैं।" सूरा फ़ातिहा : 1-7.
2- "ऐ हमारे रब! हमसे स्वीकार कर ले। निःसंदेह तू ही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" सूरा बक़रा : 127.
3- "तथा हमारी तौबा क़बूल कर। निश्चय ही तू तौबा क़बूल करने वाला दयावान् है।" सूरा बक़रा : 128.
4- "ऐ हमारे रब, हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।" सूरा बक़रा : 201.
5- "हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है।" सूरा बक़रा : 285.
6- " ऐ हमारे रब! यदि हमसे भूल हुई या गुनाह हुआ, तो उस पर हमारी पकड़ मत कर। ऐ हमारे रब! हम पर वह बोझ मत डाल जो तूने हमसे पहले के लोगों पर डाला था। ऐ हमारे रब! हमसे वह बोझ न उठवा, जिसे उठाने की क्षमता हमारे अन्दर नहीं है। तू हमें क्षमा कर दे, हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हम पर कृपा कर। बस तू ही हमारा स्वामी है, अतः अविश्वासी लोगों के विरुद्ध हमारी सहायता कर।" सूरा बक़रा : 286.
7- ''ऐ हमारे रब! हमें हिदायत देने के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न कर और हमें अपनी ओर से दया प्रदान कर। निःसंदेह तू ही सबसे बड़ा दाता है।'' सूरा आल-ए-इमरान : 8.
8- ''ऐ हमारे रब! हम ईमान ला चुके। अतः हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा।'' सूरा आल-ए-इमरान : 16.
9- ''ऐ मेरे रब! मुझे अपनी ओर से एक नेक संतान प्रदान कर। निश्चय ही तू प्रार्थना सुनने वाला है।'' सूरा आल-ए-इमरान : 38.
10- "ऐ हमारे रब ! हम उसपर ईमान लाए, जो तूने उतारा और हमने रसूल का अनुसरण किया, अतः तू हमें गवाही देने वालों के साथ लिख ले।" सूरा आल-ए-इमरान : 53.
11- "ऐ हमारे रब ! हमारे पापों को क्षमा कर दे तथा हमारे कार्य में अति को (भी)। और हमारे पैरों को जमाए रख और काफ़िर क़ौम के विरुद्ध हमारी सहायता कर।" सूरा आल-ए-इमरान : 147.
12- "ऐ हमारे रब ! तूने इन्हें व्यर्थ एवं उद्देश्यहीन नहीं पैदा किया है। तेरी हस्ती पवित्र है इस बात से कि तू कुछ निरर्थक पैदा करे। अतः तू हमें जहन्नम की आग से बचा ले। * ऐ हमारे रब! तू ने जिसे जहन्नम में झोंक दिया, उसे अपमानित कर दिया और अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा। * ऐ हमारे रब ! हमने एक पुकारने वाले को सुना जो ईमान की ओर बुलाता था और कहता था कि अपने रब पर ईमान ले आओ तो हम ईमान ले आए। अतः ऐ हमारे रब ! हमारे पापों को क्षमा कर दे, जो बुराइयाँ हमारे भीतर हैं, उन्हें दूर कर दे, तथा हमारा अंत नेक लोगों के साथ कर। * ऐ हमारे रब! हमें वह सब प्रदान कर जिसका तूने अपने रसूलों से वादा किया है और हमें क़यामत के दिन अपमानित मत करना। निस्संदेह तू अपने वचन के विरुद्ध कुछ करने वाला नहीं है।" सूरा आल-ए-इमरान : 191-194.
13- "ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः हमें (सत्य) की गवाही देने वालों में लिख ले।" सूरा माइदा : 83.
14- ''ऐ हमारे रब! हमने अपने ऊपर अत्याचार किया है। यदि तूने हमें क्षमा नहीं किया और हमपर दया नहीं की, तो अवश्य ही हम घाटा उठानेवालों में से हो जाएँगे।'' सूरा आराफ़ : 23.
15- "ऐ हमारे रब ! तू हमें इन अत्याचारी लोगों के साथ न कर!" सूरा आराफ़ : 47.
16- ऐ अल्लाह! "ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। और तू सब दया करने वालों से बेहतर है। * तथा हमारे लिए इस दुनिया में भी भलाई लिख दे और आख़िरत में भी भलाई लिख दे।" सूरा आराफ़ : 155-156.
17- "मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है। मेरा उसी पर भरोसा है और वह महान सिंहासन का रब (स्रष्टा-स्वामी-प्रबंधक) है।" सूरा तौबा : 129.
18- "ऐ हमारे रब! हमें अत्याचारियों के लिए परीक्षा का साधन न बना। * और अपनी दया से हमें काफ़िरों से बचा ले।" सूरा यूनुस : 85-86.
19- "ऐ मेरे रब! मैं तुझसे शरण माँगता हूँ कि ऐसी चीज की माँग करूँ जिसके बारे में मुझे कोई ज्ञान नहीं है। अब यदि तू मुझे क्षमादान नहीं देगा और मुझ पर दया नहीं करेगा तो निश्चय ही मैं घाटा उठाने वालों में हो जाऊँगा।" सूरा हूद : 47.
20- "ऐ अल्लाह! "आकाशों एवं धरती के रचयिता! तू ही दुनिया एवं आख़िरत में मेरा सहायक है। तू मेरा अंत इस्लाम पर कर और मुझे सदाचारियों में शामिल कर ले!" सूरा यूसुफ़ : 101. [10] [10] फ़ायदा के लिए इब्न-ए-क़ैयिम की किताब अल-फ़वाइद, पृष्ठ 436, 437 देखें।
21- "ऐ मेरे रब ! तू इस नगर (मक्का) को एक शान्तिमय नगर बना दे और मुझे तथा मेरी संतानों को इस बात से कि मूर्तियों की पूजा करने लगें, बचाए रख!" सूरा इब्राहीम : 35.
22- "ऐ मेरे रब ! तू मुझे और मेरी संतानों को नमाज़ स्थापित करने वाले बना दे। ऐ हमारे रब! तू मेरी प्रार्थानाओं को स्वीकार कर ले।" सूरा इब्राहीम : 40.
23- "ऐ हमारे रब! तू मुझे, मेरे माता-पिता और ईमान वालों को उस दिन क्षमा प्रदान करना, जिस दिन हिसाब-किताब किया जाएगा।" सूरा इब्राहीम : 41.
24- "ऐ हमारे रब! हमें अपने पास से दया प्रदान कर और हमारे लिए हमारे मामले में मार्गदर्शन (सीधे रास्ते पर चलने) को आसान कर दे।" सूरा कह्फ़ : 10.
25- "ऐ मेरे रब! खोल दे, मेरे लिए मेरा सीना। * तथा सरल कर दे, मेरे लिए मेरा काम। * और खोल दे, मेरी ज़ुबान की गाँठ, ताकि लोग मेरी बात समझें।" सूरा ताहा : 25-28.
26- "ऐ मेरे रब! मेरे ज्ञान में और वृद्धि कर दे।" सूरा ताहा : 114.
27- "तेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।" सूरा अंबिया : 87.
"ऐ मेरे रब! मुझे अकेला मत छोड़ और तू सबसे बेहतर वारिस है।" सूरा अल-अंबिया : 89.
29- "ऐ मेरे रब! मैं तेरी शरण माँगता हूँ, शैतानों की शंकाओं से। * तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ, मेरे रब! कि वे मेरे पास आएँ।" सूरा मोमिनून : 97-98.
30- "ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः तू हमें क्षमा कर दे, और हमपर दया कर। और तू सबसे बेहतर दया करने वाला है।" सूरा मोमिनून : 109.
31- ''ऐ मेरे रब! क्षमा कर दे और दया कर तथा तू सबसे बेहतर दया करने वाला है।'' सूरा मोमिनून : 118.
32- "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे हटा दे। वास्तव में, उसकी यातना चिपक जाने वाली है। * वास्तव में, वह बुरा आवास और स्थान है।" सूरा फ़ुरक़ान : 65-66.
33- ''ऐ हमारे रब! हमें हमारी पत्नियों और संतानों से आँखों की ठंडक प्रदान कर और हमें परहेज़गारों का इमाम बना।'' सूरा फुरक़ान : 74.
34- "ऐ मेरे रब! मुझे हिकमत प्रदान कर और नेक लोगों से मिला दे। * और मुझे सच्ची ख्याति प्रदान कर, पिछले लोगों में। * और बना दे मुझे, सुख की जन्नत का उत्तराधिकारी।" सूरा शुअरा : 83-85.
35- "तथा मुझे निरादर न कर, जिस दिन सब जीवित किए जाएँगे। * जिस दिन, लाभ नहीं देगा कोई धन और न संतान। * परन्तु, जो अल्लाह के पास स्वच्छ दिल लेकर आएगा।" सूरा शुअरा : 87-89.
36- "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमता प्रदान कर कि मैं तेरे उस पुरस्कार का शुक्र अदा करता रहूँ, जो पुरस्कार तूने मुझ पर तथा मेरे माता-पिता पर किया है तथा यह कि मैं नेक कार्य करता रहूँ, जिससे तू ख़ुश रहे। और मुझे अपनी दया से अपने सदाचारी बंदों में शामिल कर ले।" सूरा नम्ल : 19.
37- "ऐ मेरे रब! मैंने अपने ऊपर अत्याचार कर लिया है, अतः मुझे क्षमा कर दे।" सूरा क़सस : 16.
38- "ऐ मेरे रब! मुझे बचा ले अत्याचारी जाति से।" सूरा क़सस : 21.
39- "मूझे आशा है कि मेरा रब मुझे सीधा मार्ग दिखाएगा।" सूरा क़सस : 22.
40- "ऐ मेरे रब ! तू, जोभी भलाई मुझपर उतार दे, मैं उसका आकांक्षी हूँ।" सूरा क़सस : 24.
41- "मेरे रब! मेरी सहायता कर उपद्रवी जाति पर।" सूरा अनकबूत : 30.
42- ''ऐ मेरे रब ! मुझे एक सदाचारी पुत्र प्रदान कर।'' सूरा साफ़्फ़ात : 100.
43- “ऐ मेरे रब ! मुझे क्षमता प्रदान कर कि मैं तेरी उस नेमत का आभार प्रकट करूँ, जो तूने मुझे और मेरे माता-पिता को प्रदान की है तथा यह कि मैं ऐसा सत्कर्म करूँ, जिससे तू प्रसन्न हो जाए तथा मेरे लिए मेरी संतान को सुधार दे। मैं तेरे समक्ष तौबा करता हूँ और मैं मुसलमानों में से हूँ।” सूरा अहक़ाफ़ : 15.
44- "ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे और हमारे उन इस्लामी भाइयों को भी क्षमा कर दे, जो हमसे पहले अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए हैं। तथा हमारे दिलों में किसी मोमिन के प्रति घृणा तथा द्वेष न रख। ऐ हामारे पालनहार! निश्चय तू अपने बंदों के प्रति बहुत स्नेहक, उनपर अत्यंत दयालु है।" सूरा हश्र : 10.
45- "ऐ हमारे पालनहार! हमने तुझी पर भरोसा किया और तेरी ही ओर लौटे और तेरी ही ओर लौटकर आना है।" सूरा मुम्तहिना : 4.
46- "ऐ हमारे पालनहार! हमें काफ़िरों के लिए परीक्षण न बना और ऐ हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे। निश्चय तू ही प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।" सूरा मुम्तहिना : 5.
47- "ऐ मेरे पालनहार! मुझे क्षमा करे दे, तथा मेरे माता-पिता को, और (हर) उस व्यक्ति को जो मेरे घर में मोमिन बन कर प्रवेश करे।" सूरा नूह : 28.
48- "ऐ हमारे रब! हमारे लिए हमारे प्रकाश को संपूर्ण कर दे और हमें क्षमा कर। निश्चय ही तू हर चीज़ की क्षमता रखता है।" सूरा तहरीम : 8.
49- "ऐ अल्लाह! मुझे अपनी अनुमति से जिसके प्रति मतभेद हो गया है, उसमें सत्य की राह दिखा। निश्चय तू जिसे चाहता है उसे सही रास्ता दिखाता है।''[11] [11] सूरा बक़रा : 213 से उद्धृत।
50- "ऐ अल्लाह! मुझे हिकमत प्रदान कर कि जिसे हिकमत दी गई, उसे बहुत सारी भलाइयाँ मिल गईं।"[12] [12] सूरा बक़रा : 269.
51- "ऐ अल्लाह! मुझे दुनिया के जीवन में तथा आख़िरत में पक्की बात द्वारा सुदृढ़ रख।" [13] [13] सूरा इब्राहीम : 27 से उद्धृत।
52- "ऐ अल्लाह! हमारे लिए ईमान को प्रिय बना दे, और उसे हमारे दिलों में सुशोभित कर दे तथा हमारे लिए अविश्वास एवं अवज्ञा को अप्रिय बना दे और हमें अच्छे मार्ग पर चलने वाला बना दे।" [14] [14] सूरा हुजुरात : 7 से उद्धृत।
53- "ऐ अल्लाह! मुझे मेरे मन की लालसा से बचा तथा मुझे सफलता पाने वालों में से बना।" [15] [15] सूरा तग़ाबुन : 16 से उद्धृत।
54- "ऐ अल्लाह! हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।" [16] [16] सहीह बुख़ारी : 4522 तथा 6389, सहीह मुस्लिम : 2690.
55- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ आग के फ़ितने से, आग के अज़ाब से, क़ब्र के फ़ितने से, क़ब्र के अज़ाब से, धन के फ़ितने की बुराई से और निर्धनता के फ़ितने की बुराई से। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ मसीह-ए-दज्जाल के फ़ितने की बुराई से। ऐ अल्लाह! मेरे दिल को बर्फ एवं ओले के पानी से धो दे, और मेरे दिल को गुनाहों से उसी प्रकार धो दे, जिस प्रकार सफ़ेद कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। तथा मेरे एवं मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी बना दे, जितनी दूरी पूरब एवं पश्चिम के बीच में रखी है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ, सुस्ती, गुनाह एवं क़र्ज़ से।" [17] [17] सहीह बुख़ारी : 832, सहीह मुस्लिम : 589.
56- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ विवशता, सुस्ती, कायरता, अति वृद्धावस्था एवं कंजूसी से। तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र के अज़ाब एवं जीवन एवं मरण के फ़ितने से।" [18] [18] सहीह बुख़ारी : 2823, सहीह मुस्लिम : 2706.
57- "ऐ अल्लाह! मैं आपदा के कष्ट, दुर्भाग्य के शिकार होने, बुरे भाग्य (तक़दीर) और दुश्मनों के खुश होने से तेरी शरण माँगता हूँ।" [19] [19] सहीह बुख़ारी : 6347, सहीह मुस्लिम : 2706, सहीह मुस्लिम के शब्द इस प्रकार हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आपदा के कष्ट, दुर्भाग्य के शिकार होने, बुरे भाग्य (तक़दीर) और दुश्मनों के खुश होने से अल्लाह की शरण माँगा करते थे।"
58- "ऐ अल्लाह! मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे जिसमें मेरी सुरक्षा है, मेरे लिए मेरे संसार को सुधार दे जिसके अन्दर मेरा रहना-सहना है, मेरे लिए मेरी आख़िरत को सुधार दे जिसकी ओर मुझे लौटकर जाना है, मेरे लिए जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे तथा मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मुक्ति का साधन बना दे।" [20] [20] सहीह मुस्लिम : 2720.
59- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मार्गदर्शन, धर्मनिष्ठता, पवित्रता और बेनियाज़ी माँगता हूँ।" [21] [21] सहीह मुस्लिम : 2721.
60- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ विवशता, आलस्य, कायरता, कंजूसी, अति वृद्धावस्था तथा क़ब्र की यातना से। ऐ अल्लाह! मेरे नफ़्स को तक़्वा प्रदान कर और उसे पवित्र कर दे, तू ही उसे सबसे बेहतर पवित्र करने वाला है। तू ही उसका मालिक और स्वामी है। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण चाहता हूँ ऐसे ज्ञान से जो लाभदायक न हो, ऐसे दिल से जो भय न खाता हो, ऐसे नफ़्स से जो तृप्त (संतुष्ट) न होता हो, और ऐसी दुआ से जो स्वीकार न की जाए।" [22] [22] सहीह मुस्लिम : 2722.
61- "ऐ अल्लाह! मेरा मार्गदर्शन कर और मुझे सही मार्ग पर स्थिर रख। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे मार्गदर्शन एवं सही मार्ग पर स्थिरता माँगता हूँ।" [23] [23] सहीह मुस्लिम : 2725.
62- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी नेमत के छिन के जाने, तेरी प्रदान की हुई सुरक्षा के (विपत्ति में) बदल जाने, तेरी अचानक आपदा तथा तेरे हर प्रकार के क्रोध से तेरी शरण चाहता हूँ।" [24] [24] सहीह मुस्लिम : 2739.
54- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ उस चीज़ की बुराई से जो मैंने किया है, और उस चीज़ की बुराई से जो मैंने नहीं किया है।" [25] [25] सहीह मुस्लिम : 2716.
64- "ऐ अल्लाह! मुझे ख़ूब धन एवं संतान प्रदान कर और मुझे जो कुछ दे रखा है उसमें मेरे लिए बरकत दे।" [26] "[मेरे जीवन को अपने आज्ञापालन के साथ लंबा कर दे, और मेरे कर्म को सुंदर बना दे] तथा मुझे क्षमा कर दे।" [27] [26] अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा अनस बिन मालिक के लिए की गई इस दुआ से इसका संकेत मिलता है : "ऐ अल्लाह! इसे ख़ूब धन एवं संतान प्रदान कर और इसे जो कुछ दे रखा है, उसके लिए उसमें बरकत दे।" सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 1982, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 660. [27] इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 653, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 2241, सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद, पृष्ठ 244 में सहीह कहा है। दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन से साबित होता है कि जब आपसे पूछा गया कि सबसे अच्छा इन्सान कौन है, तो आपने उत्तर दिया : "जिसे लंबी उम्र मिले और वह अच्छा अमल करता रहे।" सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2319, अहमद हदीस संख्या 17716, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/271 में सहीह कहा है। मैंने अपने गुरू शैख़ बिन बाज़ से इन शब्दों में दुआ करने तथा इसके सुन्नत होने या न होने के बारे में पूछा, तो उन्होंने इसे सुन्नत बताया।
65- "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, जो महान और सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो महान अर्श (सिंहासन) का रब है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो आकाशों का रब, धरती का रब और सम्मानित सिंहासन (अर्श) का रब है।"[28] [28] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 6345, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2730.
66- “ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे क्षण भर के लिए मेरी आत्मा के हवाले न कर। तथा मेरे लिए मेरे सारे कार्यों को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है।” [29] [29] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 5090, अहमद 5/42, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 3/250 और सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद : 260 में हसन कहा है। शैख़ बिन बाज़ ने भी तोहफ़तुल अख़यार, पृष्ठ 24 में इसे हसन कहा है।
67- "तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।" [30] [30] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3505, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी 1/505 ने उनसे सहमति दिखाई है। अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/168 में सहीह कहा है। तिर्मिज़ी के शब्द इस प्रकार हैं : "मछली वाले नबी की दुआ, जब उन्होंने मछली के पेट में अल्लाह को पुकारा : तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू पवित्र है, निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था। [सूरा अंबिया : 87] जब कोई मुसलमान किसी चीज़ के बारे में यह दुआ करता है, तो अल्लाह उसकी दुआ ज़रूर सुनता है।"
68- "ऐ अल्लाह! मैं तेरा बंदा, तेरे बंदे का बेटा, तेरी बंदी का बेटा हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है। मेरे बारे में तेरा आदेश चलता है। मेरे बारे में तेरा निर्णय न्याय पर आधारित है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम का वास्ता देकर माँगता हूँ, जिससे तूने ख़ुद को नामित किया है, या उसे अपनी किताब में उतारा है, या उसे अपनी किसी सृष्टि को सिखाया है, या उसे अपने पास अपने परोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा है, कि क़ुरआन को मेरे दिल का वसंत, मेरे सीने की रोशनी, मेरे दुःख का मोचन और मेरी व्याकुलता को समाप्त करने वाला बना दे।" [31] [31] मुस्नद-ए-अहमद 1/391, 452, हाकिम 1/509, हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने इसे अल-अज़कार की हदीसों को संदर्भित करते समय हसन तथा अलबानी ने अल-कलिम अल-तैयिब पृष्ठ 73 की हदीसों को संदर्भित करते समय सहीह कहा है।
69- "ऐ अल्लाह! दिलों के फेरने वाले! हमारे दिलों को अपनी आज्ञाकारिता की ओर फेर दे।" [32] [32] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2654.
70- ''ऐ दिलों को उलटने-पलटने वाले! मेरे दिल को अपने धर्म पर जमाए रख।'' [33] [33] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3522, मुस्नद-ए-अहमद 4/182 तथा हाकिम 1/525 , 528। हाकिम ने इसे सहीह कहा है, और अलबानी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। अलबानी ने भी सहीह अल-जामे 6/309 में और सहीह अल-तिर्मिज़ी 3/171 में सहीह कहा है। उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने कहा है : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ सबसे अधिक किया करते थे।
71- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत की शांति एवं सुरक्षा माँगता हूँ।" [34] [34] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3514, बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 726, तिर्मिज़ी के शब्द हैं : "अल्लाह से दुनिया एवं आख़िरत की शांति तथा सुरक्षा माँगो।" जबकि एक रिवायत में है : "अल्लाह से क्षमा एवं शांति तथा सुरक्षा माँगो। क्योंकि इन्सान को विश्वास के बाद शांति एवं सुरक्षा से बढ़कर कोई चीज़ नहीं दी गई।" अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 3/180, 3/185 तथा 3/170 में सहीह कहा है। इसके शवाहिद भी मौजूद हैं, जिन्हें मुस्नद-ए-इमाम अहमद में, अहमद शाकिर की तर्तीब के साथ 1/156-157 में देखा जा सकता है।
72- "ऐ अल्लाह! तमाम मामलात में हमारा अंजाम बेहतर बना और हमें दुनिया एवं आख़िरत के अपमान से बचा।" [35] [35] मुस्नद-ए-अहमद 4/181 तबरानी की अल-कबीर 2/33/1169 और अल-दुआ हदीस संख्या 1436 , एवं इब्न-ए-हिब्बान हदीस संख्या 2424, 2425 (मवारिद)। हाफ़िज़ हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 10/178 में लिखा है : अहमद की वर्णन शृंख्ला के वर्णनकर्ता तथा तबरानी की एक वर्णन शृंख्ला के वर्णनकर्ता विश्वस्त हैं।
73- "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर तथा मेरे विरुद्ध मदद न कर, मुझे सामर्थ्य प्रदान कर तथा मेरे विरुद्ध सामर्थ्य प्रदान न कर, मेरे लिए तदबीर कर तथा मेरे विरुद्ध तदबीर न कर, मुझे सच्चाई का रास्ता दिखा और मेरे लिए सच्चाई के रास्ते पर चलना आसान कर दे, तथा मुझसे बग़ावत करने वाले पर मुझे विजय प्रदान कर। ऐ मेरे रब! मुझे अपना बहुत ज़्यादा शुक्र करने वाला, बहुत ज़्यादा ज़िक्र करने वाला, बहुत ज़्यादा भय रखने वाला, आदेशों का पालन करने वाला, विनयशील, अपने सामने बहुत ज़्यादा रोने-गिड़गिड़ाने वाला तथा अपनी ओर लौटने वाला बना। ऐ मेरे रब! मेरी तौबा क़बूल कर, मेरे गुनाह धो दे, मेरी दुआ सुन ले, मेरे प्रमाणों को साबित कर दे, मेरे दिल को सच्चाई का रास्ता दिखा, मेरी ज़बान को दुरुस्त कर दे और मेरे दिल के द्वेष को निकाल दे।" [36] [36] बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 664, 665, सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1510, 1511, सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3551, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3830, मुस्नद-ए-अहमद 1/127 तथा हाकिम 1/ 519, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। अलबानी ने भी इसे सहीह अबू दाऊद 1/414 में तथा सहीह तिर्मिज़ी 3/178 में सहीह कहा है।
74- "ऐ अल्लाह! हम तुझसे वह सारी भलाइयाँ माँगते हैं, जो तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तुझसे माँगी हैं और उन सारी बुराइयों से तेरी शरण माँगते हैं, जिनसे तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तेरी शरण माँगी है। तू ही मदद माँगे जाने के लायक़ है और तेरे ही ज़िम्मे पहुँचाने का काम है तथा अल्लाह की मदद के बिना न बुराई छोड़ने की ताक़त है और न नेकी करने की शक्ति।" [37] [37] तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3521, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3846 इसी अर्थ के साथ। तिर्मिज़ी कहते हैं : "यह हदीस हसन ग़रीब है।" जबकि अलबानी ने इसे ज़ईफ़ तिर्मिज़ी पृष्ठ 387 में ज़ईफ़ कहा है।
75- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ अपने कान की बुराई से, अपनी आँख की बुराई से, अपनी ज़बान की बुराई से, अपने दिल की बुराई है और अपनी मौत की बुराई से।" [38] [38] अबू दाऊद हदीस संख्या 1551, तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3492 तथा नसई हदीस संख्या 5470 आदि। अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/166 में तथा सहीह नसाई 3/1108 में सहीह कहा है।
76- "ऐ अल्लाह! मैं सफ़ेद दाग़, पागलपन, कुष्ठ और सभी बुरी बीमारियों से तेरी शरण माँगता हूँ।" [39] [39] अबू दाऊद :हदीस संख्या 1554, नसाई हदीस संख्या 5493 तथा अहमद 3/192, अलबानी ने इसे सहीह नसई 3/1116 में तथा सहीह तिरमिज़ी 3/184 में सहीह कहा है।
77- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ बुरे व्यवहार, कर्मों, बीमारियों और आकांक्षाओं से।" [40] [40] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3591, इब्न-ए-हिब्बान हदीस संख्या 2422 (मवारिद), हाकिम 1/532 तथा तबरानी की अल-कबीर 19/19/36, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/184 में सहीह कहा है।
78- "ऐ अल्लाह! निश्चय तू क्षमा करने वाला दयालु है, तुझे क्षमा करना पसंद है। अतः मुझे क्षमा कर दे।" [92] [41] तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3513, नसाई की अल-कुबरा हदीस संख्या 7712, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/170 में सहीह कहा है।
79- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अच्छे कार्य करने, बुराइयों को छोड़ने और निर्धनों से प्यार करने का सामर्थ्य माँगता हूँ। तुझसे दुआ है कि मुझे क्षमा कर दे और मुझपर दया कर। जब तू किसी समुदाय को फितने में डालना चाहे, तो मुझे उसमें डालने से पहले ही मृत्यु दे दे। मैं तुझसे तेरी मुहब्बत और तुझसे मुहब्बत करने वालों की मुहब्बत और तेरी मुहब्बत से निकट करने वाले कार्य से मुहब्बत का सामर्थ्य माँगता हूँ।'' [42] [42] मुस्नद-ए-अहमद 5/243 इन्हीं शब्दों के साथ। सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3235 इनसे मिलते-जुलते शब्दों के साथ। तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहने के साथ-साथ कहा है : मैंने मुहम्मद बिन इस्माईल -यानी इमाम बुख़ारी से पूछ, तो उन्होंने उत्तर दिया : "यह हदीस हसन सहीह है।" इस हदीस के अंत में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यह एक सच्चा सपना है, इसलिए इसमें कही गई बातों को याद रखो और उनको सीखो।" तथा हाकिम 1/521, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/318 में सहीह कहा है।
80- “ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जल्द तथा देर से मिलने वाली हर प्रकार की भलाई माँगता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। और मैं जल्द तथा देर से आने वाली हर प्रकार की बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ, जो मैं जानता हूँ और जो नहीं जानता। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे उस भलाई का सवाल करता हूँ, जो तेरे बंदे और तेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तुझसे तलब किया है, और मैं उस बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ जिससे तेरे बंदे और तेरे नबी ने शरण चाही है। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत तथा उससे निकट करने वाले कार्य एवं कथन का सवाल करता हूँ, तथा मैं जहन्नम और उससे निकट कर देने वाले कार्य एवं कथन से तेरी शरण चाहता हूँ। और मैं तुझसे सवाल करता हूँ कि तूने मेरे लिए जो भी फ़ैसला कर रखा है, उसे बेहतर कर दे।” [43] [43] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3846 इन्हीं शब्दों के साथ तथा अहमद 6/134 एवं हाकिम, दूसरी वृद्धि के शब्द अहमद के हैं। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी 1/521 ने उनसे सहमति व्यक्त की है। पहली वृद्धि के शब्द हाकिम के हैं। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/327 में सहीह कहा है।
81- "ऐ अल्लाह! जब मैं खड़ा रहूँ तो इस्लाम के द्वारा मेरी सुरक्षा कर, जब मैं बैठा रहूँ तो इस्लाम के द्वारा मेरी सुरक्षा कर और जब मैं सोया रहूँ तो इस्लाम के द्वारा मेरी सुरक्षा कर। और मुझपर किसी ईर्ष्यालु तथा शत्रु को हँसने का अवसर न दे। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे हर वह भलाई माँगता हूँ, जिसके कोशागार तेरे हाथ में हैं, और हर उस बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसके कोशागार तेरे हाथ में हैं।" [44] [44] हाकिम 1/525, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि अलबानी ने सहीह अल-जामे 2/398 में, तथा सिलसिला सहीहा 4/54 में हदीस संख्या 1540 के अन्तर्गत इसे सहीह कहा है।
82- "ऐ अल्लाह! तू हमें अपना इतना भय प्रदान कर जो हमारे और तेरी अवज्ञा के बीच आड़ बन जाए, तथा हमें अपने आज्ञापालन का सामर्थ्य प्रदान कर जिसके द्वारा तू हमें अपनी जन्नत तक पहुँचा दे और हमें इतना विश्वास प्रदान कर जिसके द्वारा तू हमारे लिए दुनिया की आपदाओं को आसान कर दे। ऐ अल्लाह! जब तक तू हमें जीवित रख, हमारे कानों, हमारी आँखों और हमारी शक्तियों से हमें लाभान्वित होने की तौफ़ीक़ प्रदान कर, इन चीज़ों से लाभान्वित होना निरंतर (आजीवन) बाक़ी रख, हमारा प्रतिशोध उन लोगों तक सीमित कर दे जो हम पर अत्याचार करने वाले हैं, जो हमसे दुश्मनी करे उसके ख़िलाफ़ हमारी मदद कर, हमारे धर्म के मामले में हमें आपदा से ग्रस्त न कर, दुनिया को हमारा सबसे बड़ा उद्देश्य और हमारे ज्ञान की पराकाष्ठा न बना और किसी ऐसे व्यक्ति को हमपर हावी ना कर जो हम पर दया न करे।" [45] [45] तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3502, हाकिम 1/528 तथा इब्न अल-सुन्नी हदीस संख्या 446, हाकिम ने इसे सहीह कहा और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि अलबानी ने सहीह तिर्मिज़ी 3/168 एवं सहीह अल-जामे 1/400 में हसन कहा है।
83- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ कायरता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ कृपणता से, मैं तेरी शरण में आता हूँ लाचारी की अति वृद्धावस्था में लौटाए जाने से तथा मैं तेरी शरण में आता हूँ दुनिया के फ़ितने एवं क़ब्र की यातना से।" [46] [46] सहीह बुख़ारी : 2822.
84- "ऐ अल्लाह! तू मेरे पापों, अज्ञानता तथा स्वयं के मामले में ज़्यादती को और जो कुछ तू मुझसे अधिक जानता है, उसे माफ़ कर दे। ऐ अल्लाह! क्षमा कर दे मेरी इच्छा से होने वाले पाप तथा मुझसे मज़ाक़ के रूप में होने वाले पाप को, मेरी गलती तथा मेरे जान-बूझकर होने वाले पाप को और इस प्रकार के सारे पाप मुझसे हुए हैं।" [47] [47] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 6398, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2719.
85- "ऐ अल्लाह! मैंने अपने आप पर बड़ा अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए मुझे अपनी ओर से क्षमा प्रदान कर, और मुझपर दया कर। निःसंदेह तू ही क्षमा करने वाला, अति दयालु है।" [48] [48] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 834, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2705.
86- “ऐ अल्लाह! मैंने अपने आपको तेरे सामने समर्पित कर दिया, तुझपर ईमान लाया, तुझपर भरोसा किया, तेरी ओर लौटा और तेरी मदद से दुश्मनों से झगड़ा किया। ऐ अल्लाह! मैं तेरे प्रभुत्व की शरण में आता हूँ, तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, इस बात से कि तू मुझे गुमराह करे। तू जीवंत है, जिसे कभी मौत नहीं आती, जबकि जिन्न और इनसान मरते हैं।” [49] [49] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 6398, सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2719.
87- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी दया को अनिवार्य करने वाली चीज़ें, तेरी क्षमा के साधन, हर पाप से सुरक्षा, अधिक से अधिक पुण्य की सामर्थ्य, जन्नत की प्राप्ति और जहन्नम से मुक्ति माँगता हूँ।" [50] [50] हाकिम 1/525 एवं बैहक़ी की अल-दावात हदीस संख्या 206, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। तथा देखें : नववी की अल-अज़कार, पृष्ठ 340, इसके शोधकर्ता अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने इसे सहीह कहा है।
88- "ऐ अल्लाह! ईमान वाले पुरुषों तथा ईमान वाली स्त्रियों को क्षमा कर दे।" [51] [ 51] उबादा रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस की वजह से, जिसमें वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जिसने अल्लाह से ईमान वाले पुरुषों एवं ईमान वाली स्त्रियों के लिए क्षमा माँगी, अल्लाह उसके लिए हर मोमिन पुरुष और हर मोमिन स्त्री के बदले में एक-एक नेकी लिख लेता है।" तबरानी की अल-कबीर 5/202, हदीस संख्या 5092 तथा 3/334, हदीस संख्या 2155। इसकी सनद को हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 10/210 में हसन कहा है। अलबानी ने भी सहीह अल-जामे 5/242, हदीस संख्या 5909 में हसन कहा है।
89- "ऐ अल्लाह! मेरे लिए मेरे गुनाह क्षमा कर दे, मेरे लिए मेरे घर में विस्तार दे दे और मुझे जो चीज़ें दी हैं, उनमें बरकत दे दे।" [52] [52] अहमद हदीस संख्या 16599, 23114 तथा 23188 एवं तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3500, मुस्नद के शोधकर्ताओं ने कहा है : "यह हदीस अन्य हदीसों एवं सनदों के आधार पर हसन है।" देखें 27/144, 38/197 तथा 38/145.
90- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरा अनुग्रह एवं कृपा माँगता हूँ। क्योंकि इसका मालिक तू ही है।" [53] [ 53] इसे तबरानी ने रिवायत किया है और हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 10/159 में कहा है : "इस हदीस के वर्णनकर्ता सहीह के वर्णनकर्ता हैं। बस मुहम्मद बिन ज़ियाद को छोड़ कर। लेकिन वह भी विश्वस्त हैं।" इसे अलबानी ने सहीह अल-जामे 1/404, हदीस संख्या 1278 में सहीह कहा है।
91- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ बेचारगी वाले बुढ़ापे से, लुढ़कर मरने से, किसी चीज़ के नीचे दबकर मरने से, चिंता से, डूबकर मरने से, जलकर मरने से। तथा मैं इस बात से तेरी शरण माँगता हूँ कि शैतान मौत के समय मुझपर हावी हो जाए, मैं इस बात से तेरी शरण माँगता हूँ कि तेरे रास्ते में पीठ दिखाता हुआ मरूँ, और इस बात से तेरी शरण माँगता हूँ कि मेरी मौत किसी ज़हरीले जानवर के डसने के कारण हो।" [54] [54] सुनन अबू दाऊद : 1552, सुनन नसाई : 5531 एवं 5532, अलबानी ने इसे सहीह नसाई 3/1123 तथा सहीह अबू दाऊद 1/425 में सहीह कहा है।
92- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ भूख से, क्योंकि यह साथ रहने वाली बुरी चीज़ है, तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ ख़यानत से, क्योंकि यह अंदर छुपाई जाने वाली बुरी चीज़ है।" [55] [55] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1547 तथा सुनन नसाई हदीस संख्या 5483, अलबानी ने इसे सहीह नसाई 3/1112 में हसन कहा है।
93- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ विवशता से, सुस्ती से, कायरता से, कंजूसी से, बेबसी वाले बुढ़ापे से, दिल की सख़्ती से, अचेतना से, भुखमरी से, अपमान से और निर्धनता से। तथा तेरी शरण माँगता हूँ ग़रीबी से, अविश्वास से, गुनाह से, सत्य के विरोध से, निफ़ाक़ से, शोहरत की तलब से और दिखावे से। तथा तेरी शरण माँगता हूँ सुनने की शक्ति खोने से, बोलने की शक्ति खोने से, पागलपन से, कोढ़ से, सफ़ेद दाग़ से और बुरी बीमारियों से।" [56] [56] सुनन नसाई हदीस संख्या 5493, हाकिम 1/530, अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 1/406 और इरवा अल-ग़लील हदीस संख्या 852 में सहीह कहा है।
94- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ निर्धनता से, कमी से, अपमान से और तेरी शरण माँगता हूँ इस बात से कि मैं किसी पर अत्याचार करूँ या कोई मुझपर अत्याचार करे।" [57] [57] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1544, सुनन नसाई हदीस संख्या 5475, अलबानी ने इसे सहीह नसाई 3/1111 तथा सहीह अल-जामे 1/407 में सहीह कहा है। दोनों कोष्ठों के बीच का भाग इब्न-ए-हिब्बान (मवारिद) का है, और अलबानी ने उसे सहीह मवारिद अल-ज़मआन 2/455 में सहीह कहा है।
95- "ऐ अल्लाह! मैं निवास स्थान के बुरे पड़ोसी से तेरी शरण माँगता हूँ। सफ़र का पड़ोसी तो बदल जाया करता है।" [58] [58] इमाम बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 117, हाकिम 1/532, हाकिम ने इसे सहीह कहा है, और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। नसाई ने भी इसे हदीस संख्या 5517 के तहत रिवायत किया है। जबकि अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 1/408 एवं सहीह नसाई 3/1118 में सहीह कहा है।
"ऐ अल्लाह, मैं तेरी शरण माँगता हूँ उस दिल से जो विनम्र न हो, उस दुआ से जो स्वीकार न हो, उस आत्मा से जो संतुष्ट न हो और उस ज्ञान से जो लाभकारी न हो। मैं तेरी शरण माँगता हूँ इन चार चीज़ों से।"[59] [59] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3482, सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1549, अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे हदीस संख्या 1295 तथा सहीह नसाई 3/1113 में सहीह कहा है।
97- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ बुरे पड़ोसी से, बुरी रात से, बुरे क्षण से, बुरे साथी से और निवास स्थान के बुरे पड़ोसी से।" [60] [60] इसे तबरानी ने रिवायत किया है और हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 10/144 में कहा : "इसके वर्णनकर्ता सहीह के वर्णनकर्ता हैं।" अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 1/411, हदीस संख्या 1290 में हसन कहा है।
98- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत माँगता हूँ और जहन्नम से तेरी शरण माँगता हूँ।" (तीन बार) [61] [61]सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2572, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3340 तथा सुनन नसाई हदीस संख्या 5536, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/319 और सहीह नसाई 3/1121 में सहीह कहा है। नसाई के शब्द इस प्रकार हैं : "जिसने अल्लाह से तीन बार जन्नत माँगी, जन्नत कहती है : ऐ अल्लाह इसे जन्नत में दाख़िल कर दे। और जिसने जहन्नम से तीन बार शरण माँगी, जहन्नम कहती है : ऐ अल्लाह! इसे जहन्नम से शरण दे दे।"
99- "ऐ अल्लाह! मुझे दीन की समझ प्रदान कर।" [62] [62] यह दुआ बुख़ारी हदीस संख्या 143 एवं मुस्लिम हदीस संख्या 2477 की उस हदीस से प्रमाणित होती है, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहु के लिए फ़रमाई थी।
100- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ इस बात से कि जान-बूझकर किसी को तेरा साझी बनाऊँ और तुझसे क्षमा माँगता हूँ उस शिर्क के लिए जो अनजाने में हो जाए।" [63] [63]मुस्नद-ए-अहमद 4/403, इब्न-ए-अबी शैबा 10/337 तथा तबरानी की अल-मोजम अल-औसत 4/284, अलबानी ने इसे सहीह अल-तरग़ीब व अल-तरहीब 1/19 में हसन कहा है।
101- “ऐ अल्लाह, तूने मुझे जो कुछ सिखाया है, उसको मेरे लिए लाभदायक बना दे, और मुझे ऐसी चीजें सिखा, जो मुझे फायदा दें और मुझे अधिक ज्ञान प्रदान कर।” [64] [64] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3599, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 259, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 1/47 में सहीह कहा है।
102- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान, स्वच्छ रोज़ी तथा ग्रहणयोग्य अमल माँगता हूँ।" [65] [65] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 925, नसाई की अमल अल-यौम व अल-लैलह हदीस संख्या 102, तथा मुस्नद-ए-अहमद 6/294, 305, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 1/152 में सहीह कहा है।
103- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस बात के आधार पर कि तू एक, अकेला और पूर्णता के तमाम गुणों में अति सम्पूर्ण है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है, विनती करता हूँ कि मेरे गुनाहों को क्षमा कर दे। निःसंदेह तू बहुत क्षमा करने वाला और दयालु है।" [66] [66] सुनन नसाई हदीस संख्या 1300, नसाई की अल-कुबरा : 7665 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 985 ,अलबानी ने सहीह सुनन नसाई 1/147 में इसे सहीह कहा है।
"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस आधार पर विनती करता हूँ कि सारी प्रशंसा तेरी है, तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, [तू अकेला है, तेरा कोई साझी नहीं है] और तू बड़ा उपकारी एवं दाता है। [ऐ] आकाशों तथा धरती के रचयिता! हे प्रताप और सम्मान वाले! ऐ जीवित तथा नित्य स्थायी! मैं तुझसे माँगता हूँ [जन्नत और तेरी शरण माँगता हूँ जहन्नम से।]" [67] [67] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1495, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3858, सुनन नसाई : 1299, सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3544, अलबानी ने इसे सहीह नसाई 1/279 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 2/329 में सहीह कहा है।
105- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे विनती करता हूँ, क्योंकि मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, तू अकेला है, तमाम पूर्ण गुणों में अति सम्पूर्ण है, न तेरी कोई संतान है और न तू किसी की संतान है और न कोई तेरा समकक्ष है।" [68] [68] सुनन अबू दाऊद : 985, सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3475, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3857 तथा मुस्नद-ए-अहमद 5/360, अलबानी ने इसे सहीह सुनन तिर्मिज़ी 3/163 में सहीह कहा है।
106- "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरी तौबा क़बूल कर ले। निश्चय ही तू बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला और क्षमा करने वाला है।" [69] [69] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1518, सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3434, नसाई की अल-कुबरा : 10292 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3814, इस हदीस के शब्द सुनन तिर्मिज़ी के हैं। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/321 तथा सहीह तिर्मिज़ी 3/153 में सहीह कहा है।
107- "ऐ अल्लाह! मैं तेरे ग़ैब की बात जानने तथा सृष्टि पर तेरे सामर्थ्य का वास्ता देकर तुझसे विनती करता हूँ कि मुझे उस समय तक जीवित रख जब तक तेरे ज्ञान के अनुसार जीना मेरे लिए अच्छा हो, तथा उस समय मौत दे दे जब तेरे ज्ञान के अनुसार मर जाना ही मेरे लिए अच्छा हो। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरा ऐसा भय माँगता हूँ जो ज़ाहिर एवं बातिन में हो, शांत तथा क्रोधित स्थिति में सत्य बात कहने का सुयोग माँगता हूँ, संपन्नता तथा दरिद्रता जैसी अवस्थाओं में संतुलन माँगता हूँ, ऐसी नेमत माँगता हूँ जो कभी ख़त्म न हो, आँखों की ऐसी ठंडक माँगता हूँ जिसका सिलसिला कभी न टूटे। मैं तेरा निर्णय सामने आने के बाद उससे संतुष्ट रहने का सुयोग माँगता हूँ, मृत्यु के बाद सुखी जीवन माँगता हूँ, तेरे मुखमंडल को देखने का सौभाग्य माँगता हूँ और तुझसे मिलने की अभिलाषा माँगता हूँ। ऐसी अभिलाषा, जिसमें न विनाशकारी हानि हो और न पथभ्रष्ट कर देने वाला फ़ितना। ऐ अल्लाह! हमें ईमान की शोभा से सुशोभित कर तथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने वाला तथा उसका प्रचारक बना।" [70] [70 ]सुनन नसाई हदीस संख्या 1305 तथा मुसनद-ए-अहमद 4/264, अलबानी ने इसे सहीह सुनन नसाई 1/280 तथा 1/281 में सहीह कहा है।
108- "ऐ अल्लाह! मुझे अपनी मोहब्बत प्रदान कर तथा ऐसे लोगों की मोहब्बत प्रदान कर, जिनकी मोहब्बत तेरे पास मुझे फ़ायदा पहुँचाए। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी पसंद की जो चीज़ें तूने दी हैं, उन्हें मेरे लिए तेरी पसंद की चीज़ों की प्राप्ति का सबब बना। ऐ अल्लाह! मेरी पसंद की जो चीज़ें तूने मुझे नहीं दी हैं, उन्हें मेरे लिए तेरी पसंद की चीज़ों में व्यस्त होने का सबब बना दे।" [71] [71]सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3491, तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहा है तथा शैख़ अब्दुल क़ादिर अरनाऊत ने कहा है : "यह हदीस वैसी ही है, जैसी तिर्मिज़ी ने कही है।" देखें : अरनाऊत द्वारा किया गया जामे अल-ऊसूल का शोध 4/341.
109- "ऐ अल्लाह! मुझे तमाम गुनाहों से पाक कर दे। ऐ अल्लाह! मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से बर्फ, ओले और ठंडे पानी से पाक कर दे।" [72] [72] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 476 तथा सुनन नसाई हदीस संख्या 400.
110- ''ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ कंजूसी से, कायरता से, बुरी आयु से, सीने के फ़ितने से और क़ब्र के अज़ाब से।'' [73] [73]सुनन नसाई हदीस संख्या 5469 उसके शब्द हैं : "अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पाँच चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगा करते थे : कंजूसी, कायरता, बुरी आयु, सीने के फ़ितने और क़ब्र के अज़ाब से।" अबू दाऊद ने इसे हदीस संख्या 1539 के तहत नक़ल किया है और अरनाऊत ने इसे जामे अल-उसूल के शोध 4/363 में हसन कहा है।
111- "ऐ अल्लाह, जिबरील, मीकाईल तथा इसराफ़ील के रब! मैं तेरी शरण माँगता हूँ जहन्नम की गर्मी और क़ब्र के अज़ाब से।" [74] [74] सुनन नसाई हदीस संख्या 1344, मुस्नद-ए-अहमद 6/61 और बैहक़ी की अल-दावात हदीस संख्या 109, अलबानी ने इसे सहीह नसाई 3/1121 और सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 1544 में रिवायत किया है।
112- "ऐ अल्लाह! मुझे सही मार्ग दिखा, और मेरी आत्मा के बुरे प्रभाव से मेरी सुरक्षा कर।" [75] [75 ]सुनन तिर्मिज़ी 5/519, हदीस संख्या 3483, शब्द तिर्मिज़ी के ही हैं। इससे मिलते-जुलते शब्दों के साथ अहमद 33/197 हदीस संख्या 19992 और हाकिम ने 1/510 में रिवायत किया है। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि मुस्नद के शोधकर्ताओं ने मुस्नद (33/197) की हदीस के बारे में कहा है : "इसकी सनद इमाम बुख़ारी एवं इमाम मुस्लिम की शर्त के अनुसार सहीह है।" जहाँ तक तिर्मिज़ी के शब्दों की बात है, तो अलबानी ने उन्हें ज़ईफ़ तिर्मिज़ी पृष्ठ 397 में ज़ईफ़ कहा है।
113- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे लाभकारी ज्ञान माँगता हूँ और ग़ैर-लाभकारी ज्ञान से तेरी शरण माँगता हूँ।" [76] [76] नसाई की अल-कुबरा हदीस संख्या 7867 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3843, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/327 में हसन कहा है। उसके शब्द हैं : "अल्लाह से लाभकारी ज्ञान माँगो और ग़ैर-लाभकारी ज्ञान से उसकी शरण माँगो।"
"ऐ अल्लाह! [सात] आकाशों के रब, धरती के स्वामी, महान सिंहासन के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने एवं गुठली को फाड़ने वाले और तौरात, इंजील तथा क़ुरआन उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसकी पेशानी को तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह! तू प्रथम है अतः तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं है, तथा तू आख़िर (अंतिम) है, अतः तेरे बाद कोई चीज़ नहीं है, तू ज़ाहिर (प्रत्यक्ष एवं उच्च) है, अतः तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं और तू बातिन (अप्रत्यक्ष एवं गुप्त) है, अतः तुझसे परे कोई चीज़ नहीं है। तू हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें निर्धनता से मुक्ति प्रदान कर।" [[77]] [77] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2713, वर्णनकर्ता अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु।
115- "ऐ अल्लाह! हमारे दिलों को जोड़ दे, हमारे आपसी संबंधों को ठीक कर दे, हमें शांति के रास्ते दिखा, हमें अंधेरों से निकालकर प्रकाश में दाख़िल कर दे, हमें तमाम खुली तथा छुपी बेहयाइयों से बचा, हमारे लिए हमारे कानों, हमारी आँखों, हमारे दिलों, हमारी पत्नियों और हमारी संतान-संतति में बरकत दे और हमारी तौबा क़बूल फ़रमा, निश्चय ही तू बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला दयालु है। हमें अपनी नेमतों का शुक्र करने वाला, उनके आधार पर अपनी प्रशंसा करने वाला, उन्हें क़बूल करने वाला बना और उन्हें हमारे लिए संपूर्ण कर दे।" [78] [78] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 969 तथा हाकिम 1/265। शब्द हाकिम के हैं और उन्होंने कहा है : "यह हदीस इमाम मुस्लिम की शर्त पर सहीह है।" ज़हबी ने भी 1/26 में उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि अलबानी ने सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 630 में सहीह कहा है।
116- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अच्छा सवाल एवं अच्छी दुआ करने का सुयोग, अच्छी सफलता, अच्छा अमल, अच्छा प्रतिफल, अच्छा जीवन और अच्छी मौत माँगता हूँ। मुझे मज़बूती से जमाए रख, मेरे पलड़ों को भारी कर दे, मेरे ईमान को सच्चाई प्रादन कर, मेरे दर्जे ऊँचे कर दे, मेरी नमाज़ क़बूल फ़रमा और मेरे गुनाह माफ़ कर दे। मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे भलाई का आरंभ, अंत, संपूर्ण रूप, शुरु, खुली भलाई और छुपी भलाई तथा जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। तू क़बूल फ़रमा। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे उन तमाम चीज़ों और कामों की भलाई माँगता हूँ, जिन्हें मैं लाता हूँ, जिन्हें मैं करता हूँ, जिनका मैं क्रियान्वयन करता हूँ, जो छुपे हुए हैं और जो ज़ाहिर हैं। इसी तरह मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। तू क़बूल फ़रमा। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे फ़रियाद करता हूँ कि मेरे ज़िक्र को ऊँचा कर दे, मेरे गुनाह को निरस्त कर दे, मेरे हाल को दुरुस्त कर दे, मेरे दिल को पाक कर दे, मेरी शर्मगाह की सुरक्षा कर, मेरे हृदय को आलोकित कर दे, मेरे गुनाह माफ़ कर दे और मैं तुझसे जन्नत के ऊचे दर्जे माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! तू क़बूल फ़रमा। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे फ़रियाद करता हूँ कि तू मेरी जान, मेरे कान, मेरी आँख, मेरी आत्मा, मेरी संरचना, मेरे व्यवहार, मेरे परिवार, मेरे जीवन, मेरी मौत तथा मेरे अमल में बरकत दे और मेरी नेकियों को क़बूल फ़रमा तथा मैं तुझसे जन्नत के ऊँचे दर्जे माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! क़बूल फ़रमा।" [79] [79] हाकिम ने 1/520 में इसे उम्म-ए-सलमा के वास्ते से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हवाले से नक़ल करने के बाद सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि बैहक़ी ने इसे अल-दावात हदीस संख्या 225 में और तबरानी ने अल-कबीर 23/326, हदीस संख्या 717 में रिवायत किया है।
117- "ऐ अल्लाह! मुझे बुरे व्यवहार, कर्मों, आकांक्षाओं और बीमारियों से बचा।" [80] [80] हाकिम 1/523, हाकिम ने इसे इमाम मुस्लिम की शर्त पर सहीह कहा है और ज़हबी ने 1/532 में उनसे सहमति व्यक्त की है। इसी तरह तबरानी की अल-मोजम अल-कबीर 19/19, हदीस संख्या 36, अलबानी ने इसे ज़िलाल अल-जन्नह : 13 में सहीह कहा है।
118- "ऐ अल्लाह! तूने मुझे जो कुछ दिया है, उसपर मुझे संतुष्टि करने वाला बना, उसमें मेरे लिए बरकत दे और मुझसे छिनने वाली हर चीज़ के बदले में मुझे भलाई प्रादन कर।" [81] [81] हाकिम 1/532, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने 1/510 में उनसे सहमति व्यक्त की है। इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा हैं। जबकि बैहक़ी ने अल-आदाब हदीस संख्या 1084 तथा अल-दावात अल-कबीर : 211 में रिवायत किया है, और हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर ने अल-फ़ुतूहात अल-रब्बानीयह 4/383 में हसन कहा है।
119- "ऐ अल्लाह! तू मुझसे आसान हिसाब लेना।" [82] [82] मुस्नद-ए-अहमद 6/48 तथा हाकिम 1/255, हाकिम कहते हैं : "इसकी सनद इमाम मुस्लिम की शर्त पर सहीह है।" ज़हबी ने 1/255 में भी उनसे सहमति व्यक्त की है। आइशा रज़ियल्लाहु अनहा कहती हैं : "जब आप मुड़े, तो मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के नबी! आसान हिसाब क्या है? आपने उत्तर दिया : अल्लाह उसके कर्म पत्र को देखेगा और क्षमा कर देगा। ऐ आइशा! निश्चिय ही उस दिन जिससे एक-एक कर्म का हिसाब लिया जाएगा, वह बर्बाद हो जाएगा। इन्सान पर आने वाली हर मुसीबत के बदले में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह उसके गुनाहों को मिटाने का काम करता है। यहाँ तक उसे चुभने वाले एक काँटे के बदले में भी।" अलबानी ने मिश्कात अल-मसाबीह में लिखा है : "इसकी सनद जैयिद (उत्तम) है।"
120- "ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र, शुक्र और अच्छी तरह इबादत करने पर हमारी मदद फ़रमा।" [83] [83] मुस्नद-ए-अहमद 2/299 तथा हाकिम 1/499, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। दोनों की बात दुरुस्त है भी। यह हदीस सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1524 और नसाई की अल-कुबरा हदीस संख्या 9973 में भी मौजूद है। अलबानी ने इसे सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 534 में सहीह कहा है।
121- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे ऐसा ईमान माँगता हूँ जो पलटे नहीं, ऐसी नेमत माँगता हूँ जो ख़त्म न हो और जन्नत के सबसे ऊँचे भाग में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का साथ माँगता हूँ।" [84] [84] इब्न-ए-हिब्बान (मवारिद) पृष्ठ 604, हदीस संख्या 2436, अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अनहु के कथन के रूप में। जबकि अहमद ने 1/386, 400 में इसे एक अन्य वर्णन शृंख्ला से रिवायत किया है। तथा नसाई ने अमल अल-यौम व अल-लैलह हदीस संख्या 869 में रिवायत किया है और अलबानी ने सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 2301 में सहीह कहा है।
122- "ऐ अल्लाह! मुझे अपनी आत्मा की बुराई से बचा और मेरे लिए सत्य के मार्ग पर खरी उतरने वाली हालत का निर्णय फ़रमा। ऐ अल्लाह! मेरे उन तमाम गुनाहों को माफ़ कर दे, जो मैंने छुपाकर किए हैं, जो मैंने ग़लती से किए हैं, जो मैंने जान-बूझकर किए हैं, जिन्हें मैं जानता हूँ और जिन्हें मैं नहीं जानता।" [85] [85] नसाई की अल-कुबरा 6/246, हदीस संख्या 10830 तथा हाकिम 1/510। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। इसे अहमद ने 4/444 में रिवायत किया है। और यह मुस्नद की शोध संपन्न प्रति 33/197 में हदीस संख्या 19992 के तहत मौजूद है। हाफ़िज़ ने अल-इसाबा में कहा है : "इसकी सनद सहीह है।" अलबानी ने इसे रियाज़ अल-सालेहीन की तख़रीज में हदीस संख्या 1495 के नोट के तहत सहीह कहा है।
123- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़र्ज़ के बोझ तथा शत्रुओं के हावी होने और दुश्मनों के हँसने से।" [86] [86] सुनन नसाई हदीस संख्या हदीस संख्या 5475। मुस्नद-ए-अहमद 2/173। अलबानी ने इसे सहीह नसाई 3/113 में सहीह कहा है।
124- "ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे, मुझे सीधा रास्ता दिखा, मुझे रोज़ी दे तथा मुझे स्वस्थ एवं सुरक्षित रख। मैं अल्लाह की शरण माँगता हूँ क़यामत के दिन स्थान की तंगी से।"[87] [87]सुनन नसाई हदीस संख्या 1617, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 1356, अलबानी ने इसे सहीह सुनन नसाई 1/356 तथा सहीह इब्न-ए-माजा 1/226 में सहीह कहा है।
125- "ऐ अल्लाह! मुझे मेरे कान एवं आँख से लाभ उठाने का अवसर प्रदान कर और उन दोनों को मेरा वारिस बना, मुझपर अत्याचार करने वाले के विरुद्ध मेरी मदद कर और उससे मेरा बदला ले।" [88] [88] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3681, बुख़ारी की अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 650 तथा हाकिम 1/523, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि अलबानी ने सहीह तिर्मिज़ी 3/188 में हसन कहा है।
126- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे साफ़-सुथरा जीवन, संतुलित मौत तथा (दुनिया से) वापसी अपमान एवं रुस्वाई रहित माँगता हूँ।" [89] [89] हाकिम 1/541 तथा ज़वाइद मुस्नद अल-बज़्ज़ार 2/442, हदीस संख्या 2177 एवं तबरानी की अल-दुआ हदीस संख्या 1435। हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 10/179 में कहा है : "तबरानी की सनद जैयिद (उत्तम) है।"
127- "ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है। ऐ अल्लाह! जिसे तू फैलाए उसे क संकुचित नहीं कर सकता, जिसे तू संकुचित करे उसे कोई फैला नहीं सकता, जिसे तू राह से भटका दे उसे कोई सही राह पर नहीं ला सकता और जिसे तू सही राह पर रखे उसे कोई राह से भटका नहीं सकता, जो तू रोक ले उसे कोई दे नहीं सकता और जो तू दे उसे कोई रोक नहीं सकता, जिसे तू दूर कर दे उसे कोई क़रीब नहीं कर सकता और जिसे तू क़रीब कर दे उसे कोई दूर नहीं कर सकता। ऐ अल्लाह! हमपर अपनी बरकतें, कृपा, अनुग्रह और रोज़ी फैला दे। ऐ अल्लाह!, मैं तुझसे उस शाश्वत आनंद की प्रार्थना करता हूँ जो कभी बदलता या लुप्त नहीं होता। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे भूख के दिन नेमत माँगता हूँ और भय के दिन शांति माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ तेरी दी हुई चीज़ों की बुराई से और तेरी रोकी हुई चीज़ों की बुराई से। ऐ अल्लाह! हमारे लिए ईमान को प्रिय और उसे हमारे दिलों की शोभा बना दे तथा हमारे लिए अविश्वास, गुनाह तथा अवज्ञा को अप्रिय बना दे तथा हमें सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों में से बनाए रख। ऐ अल्लाह! मुसलमान रखकर मृत्यु दे और मुसलमान बनाकर जीवित रख और अपमानित किए बिना तथा फ़ितने में डाले बिना भी नेक लोगों से मिला दे। ऐ अल्लाह! उन अविश्वासियों का विनाश कर दे जो तेरे रसूलों को झुठलाते हैं तथा तेरे रास्ते से रोकते हैं। उन्हें अपने दंड एवं अज़ाब में गिरफ़्तार कर। ऐ अल्लाह! उन अविश्वासियों का विनाश कर जिन्हें किताब दी गई है। ऐ सच्चे पूज्य! [ऐ अल्लाह! क़बूल कर।]"[90] [90] अहमद 3/424 तथा 24/246, हदीस संख्या 15492, शब्द अहमद के हैं और दोनों कोषठकों के बीच का भाग हाकिम 1/507, 3/23-24 का है। बुख़ारी ने इसे अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 699 में नक़ल किया है और अलबानी ने इसे फ़िक़्ह अल-सीरह की तख़रीज पृष्ठ 284 तथा सहीह अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस संख्या 538, पृष्ठ 259 में सहीह कहा है।
128- "ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा प्रदान कर, मुझपर दया कर, मुझे सत्य का मार्ग दिखा, मुझे हर विपत्ति से सुरक्षित रख और मुझे रोज़ी प्रदान कर।"[91] [91] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2696, 2697, तथा मुस्लिम की एक रिवायत में है : "ये तुम्हारे लिए तुम्हारी दुनिया एवं आख़िरत को एकत्र कर देते हैं।" सुनन अबू दाऊद में हदीस संख्या 850 के अन्तर्गत है : (जब वह देहाती जाने लगा, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इसने अपने दोनों हाथों को भलाई से भर लिया।")
"...मेरी कमज़ोरी दूर कर और मुझे ऊँचा कर दे।" [92] [92] देखें : सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 898, सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 284, सहीह इब्न-ए-माजा 1/148 तथा सहीह तिर्मिज़ी 1/90.
129- "ऐ अल्लाह! हमें और बढ़ाकर दे और हमारे हिस्से की कोई चीज़ न घटा, हमें सम्मान दे और अपमानित न कर, हमें देते जा और हमें वंचित न कर, हमें प्राथमिकता दे और हमपर किसी को प्राथमिकता न दे तथा हमें राज़ी रख और हमसे राज़ी रह।" [93] [93] सुनन तिर्मिज़ी 5/326 हदीस संख्या 3173 तथा हाकिम 2/98, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और अब्दुल-क़ादिर अरनाऊत ने जामे अल-उसूल की शोध संपन्न प्रति 11/282, हदीस संख्या 8847 में इसे हसन कहा है।
130- "ऐ अल्लाह! तूने मुझे सुंदर रूप दिया है, अतः मेरे आचरण को सुंदर बना दे।" [94] [94] मुस्नद-ए-अहमद 6/68, 155 तथा 1/403, इब्न-ए-हिब्बान (2423 - मवारिद), तयालिसी : 374, मुस्नद-ए-अबू याला : हदीस संख्या 5075, अलबानी ने इसे इरवा अल-ग़लील 1/115, हदीस संख्या 74 में सहीह कहा है।
131- "ऐ अल्लाह! मुझे सुदृढ़ रख और सच्चा मार्ग दिखाने वाला तथा सच्चे मार्ग पर चलने वाला बना।"[95] [95] यह दुआ प्रमाणित होती है अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उस दुआ से, जो आपने ज़रीर रज़ियल्लाहु अनहु के लिए फ़रमाई थी। देखिए : सहीह बुख़ारी : हदीस संख्या 6333, 3020 तथा 3036 आदि।
"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इस बात की दुआ करता हूँ कि तू मुझे कामों में स्थिरता दे और सही मार्ग पर चलने की इच्छा-शक्ति दे। मैं तुझसे इस बात की दुआ करता हूँ कि तू मुझे अपनी दया एवं क्षमा को अनिवार्य करने वाले कार्य करने का सुयोग प्रदान कर। और तेरी नेमतों का आभार प्रकट करने तथा अच्छे ढंग से तेरी इबादत (उपासना) करने की शक्ति दे। मैं तुझसे साफ दिल और सच्ची ज़बान की दुआ करता हूँ, और मैं तुझसे उस अच्छाई की दुआ करता हूँ जो तू जानता है, और मैं तुझसे उस बुराई से शरण मांगता हूँ जो तू जानता है, और मैं तुझसे उस बात के लिए माफी मांगता हूँ जो तू जानता है। निश्चय, तू ही ग़ैब (परोक्ष) का जानने वाला है।" [96] [96] अहमद 28/338, हदीस संख्या 17114 तथा 28/356, हदीस संख्या 17133, तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3407, तबरानी की अल-मोजम अल-कबीर इन्हीं शब्दों के साथ हदीस संख्या 7135, 7157, 7175, 7176, 7177, 7178, 7179, 7180, सहीह इब्न-ए-हिब्बान 3/215 हदीस संख्या 935 तथा 5/310 हदीस संख्या 1974। शोऐब अरनाऊत ने इसे सहीह इब्न-ए-हिब्बान 5/312 में हसन कहा है। मुस्नद के शोधकर्ताओं ने भी इसे 28/338 में सभी सनदों को मिलाकर हसन कहा है। जबकि अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा, खंड 7, हदीस संख्या 3228 तथा सहीह मवारिद अल-ज़मआन हदीस संख्या 2416 तथा 2418 में ज़िक्र किया है और सहीह लिग़ैरिही कहा है।
133- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत का उच्चतम भाग फ़िरदौस माँगता हूँ।" [97] [97] दुआ के ये शब्द अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन "जब अल्लाह से माँगो तो उससे फ़िरदौस माँगो। क्योंकि वह जन्नत का मध्य और जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान है और उसके ऊपर रहमान (सबसे दयालु) का सिंहासन है, तथा उसी से जन्नत की नदियाँ निकलती हैं।'' सहीह बुख़ारी हदीस संख्या: 2790 , 7423.
134- "ऐ अल्लाह! मेरे दिल में ईमान को नया कर दे।" [98] [98] दुआ के ये शब्द अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा की हदीस से लिए गए हैं, जिसमें है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ईमान तुममें से किसी के अंदर उसी तरह पुराना हो जाता है, जिस तरह कपड़ा पुराना हो जाता है। इसलिए अल्लाह से दिलों में ईमान को नया बनाए रखने की दुआ करो।" हाकिम 1/4। हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 1/52 में कहा है : "इसे तबरानी ने रिवायत किया है और इसकी सनद हसन है।" इसी तरह अलबानी ने भी इसे सिलसिला सहीहा 4/113, हदीस संख्या 1585 में हसन कहा है।
135- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ ऐसी नमाज़ से, जो लाभ न दे।" [99] 136- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ बुरे पड़ोसी से, ऐसी जीवन संगिनी से जो मुझे बुढ़ापे से पहले बूढ़ा बना दे, ऐसी संतान से जो मेरा प्रभु बन जाए, ऐसे धन से जो मेरे लिए अज़ाब बन जाए और ऐसे मक्कार दोस्त से जिसकी आँख मुझे देख रही हो और जिसका दिल मेरी कमियों की खोज में लगा हुआ। कोई अच्छाई देखे तो दफ़न कर दे और कोई बुराई देखे, तो फैलाता रहे।" [100] [99] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 1549, अलबानी ने इसे सहीह अबू दाऊद 1/424 में सहीह कहा है। [100] तबरानी की अल-दुआ 3/1425, हदीस संख्या 1339, अलबानी ने सिलसिला सहीहा 7/377 में हदीस संख्या 3137 के तहत लिखा है : "मैं कहता हूँ : यह सनद जैयिद (उत्तम) है। इसके सारे वर्णनकर्ता अल-तहज़ीब के वर्णनकर्ता हैं।"
137- "ऐ अल्लाह! मुझे क़यामत के दिन अपमानित न करना।" [101] [101] मुस्नद-ए-अहमद 29/596, हदीस संख्या 18056, मुस्नद के शोधकर्ताओं ने कहा है : "इसकी सनद सहीह है।" इसे तबरानी ने अल-मोजम अल-कबीर 3/20, हदीस संख्या 2524 में इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : "ऐ अल्लाह! मुझे क़यामत के दिन रुस्वा न करना और मुझे कठिनाई के दिन रुस्वा न करना।"
138- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में सुरक्षा एवं शांति माँगता हूँ।" [102] [102] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3851, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 3/259 तथा सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 1138 में सहीह कहा है।
139- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण मांगता हूँ उस ज्ञान से जो लाभकारी न हो, उस अमल से जो उठाया न जाए, उस दिल से जो विनम्र न हो और उस बात से जो सुनी न जाए।"[103] [103] इब्न-ए-हिब्बान हदीस संख्या 2440 (मवारिद)। अलबानी ने इसे सहीह मवारिद अल-ज़मआन 2/454 हदीस संख्या 2066 में सहीह कहा है।
140- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।" [104] [104] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 6363, अनस रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : "मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा किया करता था, जब भी आप आते, ऐसे में मैं आपको अकसर यह कहते हुए सुनता : ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ..."
141- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ जहन्नम के अज़ाब से, मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र के अज़ाब से, मैं तेरी शरण माँगता हूँ खुले तथा छुपे फ़ितनों से तथा मैं तेरी शरण माँगता हूँ दज्जाल के फ़ितने से।" [105] [105] मुस्लिम हदीस संख्या 2867, उसमें है : "अल्लाह की शरण माँगो आग के अज़ाब से।" ... [अल्लाह की शरण माँगो क़ब्र के अज़ाब से...] अंत तक।
142- "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे तेरी राह में शहादत माँगता हूँ।" [106] [106] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 1909, दुआ के ये शब्द अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन से लिए गए हैं : "जिसने अल्लाह से सच्चे दिल से शहादत माँगी, उसे अल्लाह शहीदों के दर्जों तक पहुँचाएगा, चाहे उसकी मृत्यु बिस्तर पर ही क्यों न हो।"
143- "ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! मुझे क़यामत के दिन अपने पैदा किए हुए बहुत-से लोगों से ऊपर रखना, ऐ अल्लाह! मेरे गुनाह माफ़ कर दे और मुझे क़यामत के दिन सम्मानित स्थान में दाख़िल करना।" [107] [107] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 4323 और सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 2498, दुआ के ये शब्द अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दो दुआओं से लिए गए हैं, जो आपने उबैद बिन अबू आमिर और अबू बुर्दा रज़ियल्लाहु अनहुमा के लिए की थीं।
144- "ऐ अल्लाह! जिन लोगों को तूने हिदायत दी है उनके संग मुझे भी हिदायत दे, जिन लोगों को तूने आफियत दी है उनके संग मुझे भी आफियत दे, जिनको तूने अपना मित्र बनाया है उनके संग मुझे भी अपना मित्र बना, जो कुछ तूने हमें दे रखा है उसमें बरकत प्रदान कर, और जो फैसला तूने कर रखा है उसकी बुराई से हमें बचाए रख, जिसे तू अपना मित्र बना ले उसे कोई अपमानित नहीं कर सकता। ऐ हमारे रब! तू बरकत वाला तथा महान है।" [108] [108] मुस्नद-ए-अहमद 3/249 हदीस संख्या 1723, मुस्नद के शोधकर्ताओं ने इसकी सनद को 3/249 में सहीह कहा है। यह रिवायत आम है। इसमें वित्र की बात नहीं है। जैसा कि एक अन्य रिवायत में है। इस रिवायत में अनस रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : "आप हमें यह दुआ सिखाते थे ..."
145- "ऐ अल्लाह! बदले के दिन मेरे गुनाह को माफ़ कर देना।" [109] [109] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 214, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! इब्न-ए-जुदआन अज्ञानता काल में रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करता था और निर्धनों को खाना खिलाता था, तो क्या उसे इसका कोई लाभ मिलेगा? आपने उत्तर दिया : "उसे इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। उसने कभी नहीं कहा कि ऐ अल्लाह! बदले के दिन मेरे गुनाह को माफ़ कर देना।"
146- "मैं महान अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ, जिसके सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं, जो जीवंत है, सम्पूर्ण जगत को संभाले हुए है, और मैं उसी की ओर लौटता हूँ।" [110] [110] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3577, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/469 में सहीह कहा है : "जिसने इस दुआ को पढ़ लिया, अल्लाह उसे क्षमा कर देगा, अगरचे वह युद्ध के मैदान से भाग कर आया हो।"
147- "ऐ अल्लाह! मेरे गुनाह माफ़ कर दे, मेरे दिल का क्रोध दूर कर दे और मुझे गुमराह करने वाले फ़ितनों से बचा।" [111] [111] ये शब्द अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस दुआ से लिए गए हैं, जो आपने आइशा रज़ियल्लाहु अनहा के लिए की थी : "ऐ अल्लाह! इसके गुनाह माफ़ कर दे, इसके दिल का क्रोध दूर कर दे और इसे गुमराह करने वाले फ़ितनों से बचा।" इसे इब्न-ए-असाकिर ने अपनी सनद से अल-अरबईन फ़ी मनाक़िब उम्महात अल-मोमिनीन, पृष्ठ 85 में आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से रिवायत किया है और कहा है कि यह हदीस बक़ीया बिन वलीद के हदीस के हवाले से हसन सहीह है। इब्न अल-सुन्नी ने भी इसे मिलेते-जुलते शब्दों के साथ अमल अल-यौम व अल-लैलह हदीस संख्या 457 में रिवायत किया है। जबकि इब्न अल-सुन्नी की एक अन्य प्रति में "गुमराह करने वाले फ़ितनों से बचा" के स्थान पर "मुझे शैतान से बचा" के शब्द हैं। इसके हवालों के लिए अलबानी का सिलसिला ज़ईफ़ा हदीस संख्या 4207 देखें। उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा से इसकी एक शाहिद मिलते-जुलते शब्दों के साथ मुस्नद-ए-अहमद हदीस संख्या 26576, 2/44 में है, जिसके शब्द इस प्रकार हैं : "तुम कहो : ऐ अल्लाह! नबी मुहम्मद के रब! मेरे गुनाह माफ़ कर दे, मेरे दिल का क्रोध दूर कर दे और जब तक मैं जीवित रहूँ, मुझे गुमराह करने वाले फ़ितने से बचाए रख।" हैसमी ने इसे मजमा अल-ज़वाइद 10/27 में हसन कहा है। यह हदीस तबरानी की अल-मोजम अल-कबीर 23/338 हदीस संख्या 785 में "जब तक मैं जीवित रहूँ" के शब्दों के बिना है। इसकी एक शाहिद उम्म-ए-हानी रज़ियल्लाहु अनहा से भी मौजूद है। उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे एक दुआ सिखा दीजिए, जो मैं किया करूँ। आपने फ़रमाया : तुम कहो : "ऐ अल्लाह! मेरे गुनाह माफ़ कर दे..." इसे खराइती ने एतिलाल अल-क़ुलूब हदीस संख्या 52 तथा मसावी अल-अख़लाक़ हदीस संख्या 323 में रिवायत किया है।
148- "ऐ अल्लाह! मुझे अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत पर जीवित रख, उनके दीन पर मौत दे और गुमराह करने वाले फ़ितनों से अपनी शरण में रख।" [112] [112] बैहक़ी ने इसे अल-कुबरा 5/95 में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा की दुआ के तौर पर नक़ल किया है। इसे इब्न अल-मुलक़्क़िन ने भी अल-बद्र अल-मुनीर 6/309 में नक़ल किया है और ज़िया मक़दिसी से नक़ल करते हुए कहा है : "इसकी सनद जैयिद (उत्तम) है।" जबकि अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा है : "तुममें से कोई यह न कहे : ऐ अल्लाह! मैं फ़ितने से तेरी शरण माँगता हूँ। दरअसल हर व्यक्ति के साथ कोई न कोई फ़ितना लगा हुआ है। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तुम्हारे धन एवं तुम्हारी संतान तुम्हारे लिए फ़ितने हैं।" [सूरा तग़ाबुन : 15] इसलिए जिसे शरण माँगनी हो वह पथभ्रष्ट कर देने वाले फ़ितनों से अल्लाह की शरण माँगे।" इसे इब्न-ए-जरीर ने अपनी तफ़सीर 13/475 में हदीस संख्या 15912 के तहत रिवायत किया है। इब्न-ए-बत्ताल ने भी इसे अपनी सहीह बुख़ारी की शर्ह 4/13 में रिवायत किया है।
149- "ऐ अल्लाह! मुहम्मद एवं उनके परिवार पर उसी प्रकार अपनी रहमत भेज, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर अपनी रहमत भेजी थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनके परिवार पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर [सारे जहानों में] बरकतों की बारिश की थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है।" [113] [113] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या 3370, दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग सहीह मुस्लिम हदीस संख्या 405 में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है।
सारी प्रशंसा अल्लाह की है, उसके प्रताप एवं महान राज्य के अनुरूप। ऐ अल्लाह! दरूद व सलाम की बरखा बरसा हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिजनों, साथियों तथा क़यामत के दिन तक आपका अनुसरण करने वालों पर।
झाड़-फूँक द्वारा इलाज
क़ुरआन एवं हदीस के आलोक में
अल्लाह के अनुग्रह का अभिलाषी
डॉक्टर सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-क़हतानी
अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, जो बड़ा दयालु एवं अति दयावान है
भूमिका : क़ुरआन एवं सुन्नत द्वारा इलाज का महत्व
हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है। हम उसी की प्रशंसा करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमायाचना करते हैं। हम अपनी आत्मा और अपने कर्मों की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। जिसे अल्लाह हिदायत दे, उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता और जिसे गुमराह करे, उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं बन सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। उनपर, उनके परिवारजनों पर, उनके साथियों पर और क़यामत के दिन तक उनका अनुसरण करने वालों पर अल्लाह की अनगिनत रहमत एवं शांति अवतरित हो। अब मूल विषय पर आते हैं :
इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित दुआओं द्वारा इलाज लाभकारी एवं संपूर्ण स्वास्थ्य दिलाने वाला इलाज है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप कह दें कि क़ुरआन ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन एवं शिफ़ा है।" [1] सूरा फुस्सिलत : 44. इसी प्रकार अल्लाह तआला फ़रमाता है : ''और हम क़ुरआन में से जो उतारते हैं, वह ईमान वालों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) तथा दया है। और वह अत्याचारियों को घाटे ही में बढ़ाता है।' सूरा इसरा : 82. इस आयत में आया हुआ शब्द "मिन" यहाँ श्रेणी बयान करने के लिए आया हुआ है। इसलिए पूरा क़ुरआन शिफ़ा है। यही बात इससे पहले की आयत [1] में स्पष्ट रूप से बयान की गई है। क़ुरआन के अंदर एक अन्य स्थान में है : "ऐ लोगो! तुम्हारे पास, तुम्हारे पालनहार की ओर से एक ऐसी चीज़ आई है, जो उपदेश,अंतरात्मा के सब रोगों का उपचार, मार्गदर्शन तथा दया है उनके लिए जो विश्वास रखते हैं।" सूरा यूनुस : 57. [1] देखें : अल-जवाब अल-काफ़ी लि-मन सअला अन अल-दवा अल-शाफ़ी, लेखक : इब्न अल-क़ैयिम, पृष्ठ 20.
इस प्रकार, क़ुरआन शरीर तथा आत्मा के तमाम रोगों एवं दुनिया तथा आख़िरत की समस्त बीमारियों के लिए संपूर्ण शिफ़ा है। लेकिन हर व्यक्ति न तो क़ुरआन से शिफ़ा प्राप्त करने की योग्यता रखता है और न हर एक को इसका सुयोग प्राप्त होता है। सच्चाई यह है कि अगर कोई रोगी सच्चे मन से, ईमान तथा पूर्ण विश्वास के साथ और दुआ के क़बूल होने की शर्तों का पालन करते हुए क़ुरआन द्वारा इलाज करे, तो कभी कोई बीमारी उसके सामने ठहर नहीं सकती। भला कोई बीमारी आकाश एवं धरती के पालनहार की उस वाणी के सामने कैसे ठहर सकती है, जिसे पहाड़ों पर उतारा जाता तो पहाड़ फट जाते और धरती पर उतारा जाता, तो क्षत-विक्षत हो जाती। अतः आत्मा एवं शरीर की जितनी बीमारियाँ हो सकती हैं, क़ुरआन के अंदर उन सब के कारणों, इलाज एवं बचाव का मार्गदर्शन मौजूद है, जिससे ऐसा व्यक्ति फ़ायदा उठा सकता है, जिसे अल्लाह अपनी किताब की समझ प्रदान करे। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने आत्माओं एवं शरीरों की बीमारियों का भी ज़िक्र किया है और दोनों के चिकित्सा का भी।
जहाँ तक आत्माओं की बीमारियों का संबंध है, तो इनके दो प्रकार हैं : शक एवं संदेह की बीमारी तथा वासना एवं गुमराही की बीमारी। उच्च एवं महान अल्लाह ने बड़े ही विस्तार से आत्माओं की बीमारियों का ज़िक्र किया है और उनके कारण तथा इलाज [2] भी बताया है। उसने कहा है : "क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हमने आपपर यह ग्रन्थ (क़ुरआन) उतारी, जो उनके सामने पढ़ी जाती है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी दया और उपदेश है, जो ईमान रखते हैं।" सूरा अनकबूत : 51. इब्न-ए-क़ैयिम रह़िमहुल्लाह कहते हैं : "जिसे क़ुरआन शिफ़ा न दे उसे अल्लाह शिफ़ा न दे और जिसके क़ुरआन काफ़ी न हो उसे अल्लाह काफ़ी न हो।" [3] [2] ज़ाद अल-मआद, लेखक इब्न अल-क़ैयिम 4/6 तथा 4/352. [3] ज़ाद अल-मआद 4/342.
जहाँ तक शारीरिक रोगों का संबंध है, तो क़ुरआन ने उनके इलाज से संबंधित बुनियादी बातें एवं मूल सिद्धांत बता दिए हैं। देखा जाए तो शारीरिक चिकित्सा से संबंध में सिद्धांत की हैसियत रखने वाली बातें पवित्र क़ुरआन में बता दी गई हैं। ये सिद्धांत तीन हैं: स्वास्थ्य की रक्षा, हानिकारक चीज़ों से बचाव एवं हानिकारक वस्तुओं को निकाल बाहर करना, तथा इसी के आधार पर सारी बीमारियों का इलाज करना। [4] [4] ज़ाद अल-मआद 4/352 तथा 4/6.
अगर बंदा क़ुरआन द्वारा अच्छे से इलाज करे, तो उसे आश्चर्य रूप से शीघ्र ही शिफ़ा हासिल होगी।
इब्न-ए-क़ैयिम कहते हैं : "मक्का में मुझपर ऐसा भी समय गुज़रा है कि मैं बीमार हो गया और न कोई डॉक्टर मिल सका न दवा। ऐसे में मैं सूरा फ़ातिहा द्वारा इलाज करता था और इसका आश्चर्यजनक असर देखता था। मैं थोड़ा-सा ज़मज़म पानी ले लेता, उसपर कई बार सूरा फ़ातिहा पढ़ता और उसे पी लेता। इससे मुझे पूरी शिफ़ा मिल गई। बाद में मैं बहुत-सी बीमारियों में इसपर भरोसा करने लगा और बड़ा फ़ायदा उठाने लगा। बाद में किसी को कोई परेशानी होती, तो यह तरीक़ा मैं बताता और बहुत-से लोग तेज़ी से ठीक भी हो जाते।" [5] [5] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/178 तथा अल-जवाब अल-काफ़ी, पृष्ठ 21.
इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित तरीक़ों द्वारा इलाज भी बहुत ही लाभकारी है। दुआ भी, अगर रुकावटों से खाली हो, तो अप्रिय वस्तुओं से बचाव एवं उद्देश्य की पूर्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है। ख़ास तौर से जब दुआ गिड़गिड़ाकर की जाए। दुआ विपत्ति की दुश्मन है। दुआ विपत्ति को रोकती है, उसे आने से रोकती है, उसका उपचार करती है और आ भी जाए, तो उसे हल्का कर देती है। [6] अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "दुआ उस विपत्ति में भी लाभकारी है, जो आ चुकी है, और उस विपत्ति में भी लाभकारी है, जो नहीं आई है। इसलिए अल्लाह के बंदो! दुआ किया करो।" [7] तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "अल्लाह के निर्णय को दुआ को छोड़ कोई चीज़ टाल नहीं सकती और नेकी को छोड़ कोई चीज़ उम्र में वृद्धि नहीं कर सकती।" [8] लेकिन यहाँ एक बात समझ लेना ज़रूरी है। बात यह है कि जिन आयतों, अज़कार, दुआओं और शरण प्राप्त करने के शब्दों को स्वस्थ लाभ के लिए पढ़ा जाता है, वे स्वयं तो लाभकारी एवं शिफ़ा देने वाले हैं, लेकिन इसके लिए भी ज़रूरत होती है उनके ग्रहण होने एवं पढ़ने वाले के प्रभाव की। इसलिए अगर शिफ़ा नहीं मिलती है, तो इसका मतलब यह है कि पढ़ने वाले के अंदर कमज़ोरी है, दुआ क़बूल नहीं हो रही है या कोई ऐसी बाधा मौजूद है कि दवा काम नहीं कर रही है। क्योंकि झाड़-फूँक द्वारा इलाज उसी समय सफल होता है, जब दो बातें पाई जाएँ : [6] देखें : अल-जवाब अल-काफ़ी, पृष्ठ 22-25. [7] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या: 3548, हाकिम 1/670 तथा मुस्नद-ए-अहमद हदीस संख्या: 22044. अलबानी ने इसे हसन कहा है। देखें : सहीह अल-जामे 3/151, हदीस संख्या 3403. [8] हाकिम 1/670, तिर्मिज़ी हदीस संख्या: 2139, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा 1/76, हदीस संख्या 154 में हसन कहा है।
पहली चीज़ : रोगी के दृष्टिकोण से। दरअसल रोगी को शिफ़ा उस समय मिलती है, जब उसके अंदर आत्म बल हो, अल्लाह से सच्चा लगाव हो और दृढ़ विश्वास हो कि क़ुरआन ईमान वालों के लिए शिफ़ा एवं दया है। इसी तरह अल्लाह से ऐसी सच्ची शरण ली जाए, जिसमें दिल एवं ज़बान दोनों का तालमेल हो। क्योंकि यह एक तरह का युद्ध है और युद्ध में शत्रु से बराबरी का मुक़ाबला करने के लिए ज़रूरी है कि योद्धा के अंदर दो बातें पाई जाएँ :
एक यह कि उसके पास हथियार उचित एवं उत्कृष्ट हो, और दूसरा यह कि उसके बाज़ू मज़बूत हों। दोनों में से कोई भी एक बात न हो, तो हथियार कुछ अधिक लाभ नहीं देता। ऐसे में भला उस परिस्थिति के बारे में क्या कहा जा सकता है, जब दोनों में से कोई भी बात मौजूद न हो? दिल तौहीद, अल्लाह पर भरोसा, धार्मिकता और दीनी रुझान से खाली हो और हथियार भी पास न हो।
दूसरी चीज़ : क़ुरआन एवं सुन्नत द्वारा इलाज करने वाले के दृष्टिकोण से। वैसे, उसके अंदर भी यही दोनों बातें होनी चाहिए [9]। यही कारण है कि इब्न अल-तीन ने कहा है : "शरण के शब्दों तथा अल्लाह के नामों द्वारा इलाज आध्यात्मिक इलाज है। यह इलाज जब अल्लाह के नेक बंदों द्वारा किया जाता है, तो अल्लाह की अनुमति से शिफ़ा मिल ही जाती है।" [10] [9] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/68 तथा अल-जवाब अल-काफ़ी, पृष्ठ 21. [10] फ़त्ह अल-बारी, लेखक : हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर 10/196.
उलेमा इस बात पर एकमत हैं कि झाड़-फूँक तीन शर्तों के साथ जायज़ है :
पहली शर्त : झाड़-फूँक अल्लाह की वाणी, उसेक नामों तथा गुणों या अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वाणी द्वारा की जाए।
दूसरी शर्त : झाड़-फूँक के लिए जिन शब्दों का उच्चारण किया जाए, वो अरबी भाषा के हों या दूसरी भाषा के हों तो उनका अर्थ समझ में आ जाए।
तीसरी शर्त : यह विश्वास हो कि झाड़-फूँक स्वयं प्रभावशाली नहीं होती। वह अल्लाह की अनुमति से काम करती है। [11] वह बस एक माध्यम मात्र है। [11] देखें : फ़त्ह अल-बारी 10/195 तथा फ़तावा अल्लामा इब्न-ए-बाज़ 2/384.
इस विषय के महत्व को देखते हुए मैंने अपनी किताब "ज़िक्र, दुआ और झाड़-फूँक द्वारा इलाज - क़ुरआन एवं हदीस के आलोक में" के झाड़-फूँक वाले भाग को संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत कर दिया और उसमें कुछ लाभकारी बातें जोड़ दीं। मैं सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से, उसके सुंदर नामों एवं उच्च गुणों के वसीले से दुआ करता हूँ कि इस पुस्तक को अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन बनाए, उसे मेरे साथ-साथ उसके पाठकों, प्रकाशक और इस कार्य में सहयोग करने वाले सभी लोगों और तमाम मुसलमानों के लिए लाभदायक बनाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सारे कार्य वही करता है और इनकी शक्ति भी वही रखता है। अल्लाह की कृपा तथा शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके परिजनों, साथियों तथा क़यामत के दिन तक निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।
अल्लाह के अनुग्रह का अभिलाषी
डॉक्टर सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी
तिथि 18/ 6/1414 हिजरी
1- जादू का इलाज
जादू के शरई इलाज के दो प्रकार होते हैं :
पहला प्रकार : वह चीज़ें जिनके द्वारा जादू होने से पहले उससे बचा जा सकता है :
1- तमाम अनिवार्य कार्यों को करना, तमाम हराम कार्यों से बचना और तमाम गुनाहों से तौबा करना।
2- अधिक से अधिक क़ुरआन की तिलावत करना और हर दिन उसका एक निर्धारित भाग पढ़ना।
3- दुआओं, शरण पर आधारित शब्दों और शरीयत सम्मत अज़कार द्वारा अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करना। मसलन सुबह तथा शाम के समय तीन बार "शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ धरती और आकाश में कोई वस्तु हानि नहीं पहुँचा सकती तथा वह सब सुनने वाला और सब जानने वाला है।" पढ़ना [12], हर नमाज़ के बाद, सोते समय और सुबह-शाम आयत अल-कुर्सी पढ़ना [13] तथा सूरा इ़ख़लास, सूरा फ़लक़ एवं सूरा नास सुबह-शाम एवं सोते समय पढ़ना, हर रोज़ सौ बार "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य और उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" [14] कहना, इसी तरह सुबह-शाम के अज़कार, नमाज़ के बाद के अज़कार, सोने, जागने, घर में प्रवेश करने, घर से बाहर निकलने, सवारी पर सवार होने, मस्जिद में प्रवेश करने और मस्जिद से निकलने, शौचालय में प्रवेश करने और शौचालय से निकलने और किसी को विपत्ति में पड़ा हुआ देखने आदि के अज़कार की पाबंदी करना। मैंने इनमें से बहुत-से अज़कार का ज़िक्र "हिस्न अल-मुस्लिम" में हालात, अवसरों, स्थानों एवं समयों के अनुसार कर दिया है। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि इन अज़कार की पाबंदी इन्सान को अल्लाह की अनुमति से जादू, बुरी नज़र और जिन्नात से बचाने के साथ-साथ इन विपत्तियों में पड़ जाने की स्थिति में इन्सान का इलाज भी करती है। [15] [12] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 3388, सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 5088 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या : 3869, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/332 में सहीह कहा है। [13] हाकिम 1/562, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। जबकि अलबानी ने इसे सहीह अल-तरग़ीब व अल-तरहीब 1/273, हदीस संख्या 658 में सहीह कहा है। [14] सहीह बुख़ारी 4/95, हदीस संख्या: 3293 तथा सहीह मुस्लिम 4/2071, हदीस संख्या: 2691. [15] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/126 तथा मजमू फ़तावा अल्लामा बिन बाज़ 3/277, जिन दस कार्यों द्वारा हसद करने वाले तथा जादूगर की बुराई से बचा जा सकता है, उनके लिए इस किताब में बुरी नज़र के इलाज का तीसरा तरीक़ा देखें।
4- सुबह खाली पेट संभव हो तो सात अजवा खजूरें खाना। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने सुबह-सुबह सात अजवा खजूरें खाईं, उसे उस दिन कोई ज़हर या जादू नुक़सान नहीं पहुँचाएगा।" [16] बेहतर यह है कि खजूरें मदीने की हों जो दोनों हर्रों के बीच के पेड़ों पर लगी हों। इसका उल्लेख सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है। जबकि हमारे शैख़ अल्लामा अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ का मानना है कि मदीने की सारी खजूरों में यह गुण पाया जाता है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "जिसने सुबह-सुबह मदीने के दोनों हर्रों [17] के बीच फलने वाली सात खजूरें खाईं..." पूरी हदीस देखें। [18] [16] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/247, हदीस संख्या : 5445 और सहीह मुस्लिम 3/1618, हदीस संख्या : 2047. [17] इस हदीस में आया हुआ शब्द " लाबतैहा" से मुराद हर्रा है। दरअसल हर्रा काले रंग के बोसीदा पत्थरों, जो आग से जले हुए मालूम होते हों, वाली ज़मीन को कहते हैं। यहाँ मुराद मदीने के दोनों किनारों में स्थित दोनों हर्रे हैं। देखें : मुनावी की फ़ैज़ अल-क़दीर 2/514. [18] सहीह मुस्लिम 3/1618, हदीस संख्या : 2047.
इसी तरह शैख़ का यह भी मानना है कि मदीने के अतिरिक्त दूसरे किसी भी स्थान की सात खजूरें खाने वाले के लिए भी इसकी आशा की जा सकती है।
दूसरा प्रकार : जादू हो जाने के बाद उसका इलाज। यह इलाज भी कई तरीक़ों से किया जा सकता है :
पहला तरीक़ा : यदि जायज़ तरीक़ों से जादू के स्थान का पता चल जाए तो उसे निकाल कर नष्ट कर देना। जादू किए हुए व्यक्ति के इलाज का यह बहुत ही प्रभावी तरीक़ा है। [19] [19] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/124 तथा बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी 10/132, हदीस संख्या 5765, सहीह मुस्लिम 4/1917, हदीस संख्या 2189 तथा मजमू फ़तावा बिन बाज़ 3/228.
दूसरा तरीक़ा : शरई झाड़-फूँक। इसके कुछ तरीक़े यहाँ दिए जा रहे हैं [20] : [20] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन फ़ी इलाज अल-सर्अ व अल-सिहरि व अल-ऐन, पृष्ठ 138.
1- बेरी के सात हरे पत्तों को दो पत्थरों आदि के बीच में रखकर पीसा जाए। फिर इतना पानी डाल दिया जाए कि स्नान के लिए काफ़ी हो। फिर उसमें पढ़े :
मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ। "अल्लाह (वह है कि) उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। (वह) जीवित है, स्वयं से स्थिर रहने वाला और हर चीज़ को सँभालने (क़ायम रखने) वाला है। न उसे कुछ ऊँघ पकड़ती है और न नींद। उसी का है जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे? वह जानता है जो कुछ उनके सामने और जो कुछ उनके पीछे है। और वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ को (अपने ज्ञान से) नहीं घेर सकते, परंतु जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाशों और धरती को व्याप्त है और उन दोनों की रक्षा उसके लिए भारी नहीं है। और वही सबसे ऊँचा, सबसे महान है।" सूरा बक़रा : 255.
"और हमने मूसा को वह़्य की कि अपनी लाठी फेंको, तो अचानक वह उन चीज़ों को निगलने लगी, जो वे झूठ-मूठ बना रहे थे। फिर सत्य सिद्ध हो गया और जो कुछ वे (फ़िरऔन के पक्षधर) कर रहे थे, असत्य सिद्ध हो गया। वे पराजित हो गए और अपमानित होकर लौटे। परन्तु सारे जादूगर सजदे में गिर गए। कहने लगे : हम समस्त संसारों के पालनहार पर ईमान ले आए । मूसा तथा हारून के पालनहार पर।" सूरा आराफ़ : 117-122.
"फ़िरऔन ने कहा : जाओ, प्रत्येक प्रतिभाशाली जादूगर को मेरे पास ले आओ। जब सारे जादूगर आ गए तो मूसा ने उनसे कहा : डालो जो तुम लोग डालने वाले हो। जब उन्होंने (रस्सियों और लाठियों को) डाल दिया तो मूसा ने कहा : जो कुछ तुम लाए हो, वह जादू है और निःसंदेह अल्लाह उसे अभिव्यर्थ कर देगा, क्योंकि अल्लाह उपद्रवकारियों के कर्म को नहीं सुधारता। और अल्लाह सत्य को, अपने आदेशों के अनुसार, सत्य कर दिखाएगा। यद्यपि अपराधियों को बुरा लगे।" सूरा यूनुस : 79-82.
"उन्होंने कहा : हे मूसा! तू फेंकता है या पहले हम फेंकें? "मूसा ने कहा : बल्कि तुम्हीं फेंको। फिर उनकी रस्सियाँ तथा लाठियाँ उसे लग रही थीं कि उनके जादू (के बल) से दौड़ रही हैं। इससे मूसा अपने मन में डर गया। हमने कहा : डर मत, तू ही ऊपर रहेगा। और फेंक दे, जो तेरे दायें हाथ में है, वह निगल जाएगा, जो कुछ उन्होंने बनाया है। वह केवल जादू का स्वाँग बनाकर लाए हैं तथा जादूगर सफल नहीं होता, जहाँ से भी आए। अन्ततः, जादूगर सजदे में गिर गए। उन्होंने कहा कि हम ईमान लाए हारून तथा मूसा के पालनहार पर।" सूरा ताहा : 65-70.
शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत कृपावान है "(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो! "मैं उन (मूर्तियों) की इबादत नहीं करता, जिनकी तुम इबादत करते हो। और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ। और न मैं उन (मूर्तियों) की इबादत करने वाला हूँ, जिनकी तुमने पूजा की है। और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।" तुम्हारे लिए तम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।"
शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत कृपावान है ''(ऐ नबी!) आप कह दीजिए कि वह अल्लाह एक है। "अल्लाह निःस्पृह और तमाम गुणों में सम्पूर्ण है। न उसने (किसी को) जना है एवं न (किसी ने) उसको जना है।" और न कोई उसका समकक्ष है।"
शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत कृपावान है "(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं सुबह के रब की शरण में आता हूँ। उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की है। तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए। तथा गाँठ लगा कर उसमें फूँकने वालियों की बुराई से।" तथा द्वेष करने वाले की बुराई से, जब वह द्वेष करे।"
शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत कृपावान है "(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ। जो समस्त इन्सानों का स्वामी है। जो सारे इन्सानों का पूज्य है। भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले की बुराई से। जो लोगों के सीनों में भ्रम डालता है।" जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी।"
इन सारी आयतों को पानी पर पढ़ने के बाद उसमें से तीन घूँट पानी पी ले और शेष पानी से स्नान कर ले। इससे अल्लाह ने चाहा तो परेशानी ख़त्म हो जाएगी। यदि आवश्यकता हो तो ऐसा दो या उससे अधिक बार भी परेशानी दूर होने तक किया जा सकता है। इसे बहुतों बार आज़माया जा चुका है और अल्लाह की अनुमति से फ़ायदा भी हुआ है। किसी को पत्नी से रोक दिया जाए, तो उसे ठीक करने के लिए भी यह तरीक़ा बहुत लाभकारी है। [21] देखें : फ़तावा बिन बाज़ 3/279, फ़त्ह अल-मजीद पृष्ठ 346 तथा अल-सारिम अल-बत्तार फ़ी अल-तसद्दी लि-अल सहरह व अल-अशरार, लेखक : वहीद अब्द अल-सलाम पृष्ठ 109-117, वहाँ दुआओं द्वारा इलाज का लाभकारी एवं विस्तृत तरीक़ा मौजूद है। इसी तरह मुसन्नफ़ अब्दुर रज़्ज़ाक़ 11/13 तथा फ़त्ह अल-बारी 10/233.
2- सूरा फ़ातिहा, आयत अल-कुर्सी, सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें, सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़ और सूरा नास तीन-तीन या अधिक बार पढ़ी जाएँ और साथ में फूँक मारी जाए तथा कष्ट वाले स्थान पर दायाँ हाथ फेरा जाए। [22] [22] देखें : सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 9/62 हदीस संख्या 5016, सहीह मुस्लिम 4/1723 हदीस संख्या 2192 तथा सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/208.
3- शरण माँगने के शब्द, झाड़-फूँक तथा सारगर्भित दुआएँ :
1- "मैं विशाल सिंहासन के रब महान अल्लाह से विनती करता हूँ कि तुम्हें स्वास्थ्य लाभ कराए।" (सात बार) [23] [23] सुनन अबू दाऊद 3/187 हदीस संख्या 3106 तथा सुनन तिर्मिज़ी 2/410 हदीस संख्या 2083, अलबानी ने इसे सहीह अल-जामे 5/180 एवं 322, तथा सहीह सुनन अबू दाऊद 2/276 में सहीह कहा है।
2- रोगी शरीर के जिस भाग में कष्ट हो, उसपर अपना हाथ रखे और तीन बार बिस्मिल्लाह (अल्लाह के नाम से) कहे और सात बार " أَعُوذُ بِاللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ" (मैं अल्लाह की और उसकी शक्ति की शरण में आता हूँ उस वस्तु की बुराई से, जो मैं महसूस करता हूँ और जिसका मुझे अंदेशा है।) पढ़े।" [24] [24] सहीह मुस्लिम, 4/1728, हदीस संख्या : 2202.
3- "ऐ अल्लाह! लोगों के रब! कष्ट दूर कर दे तथा रोग से मुक्ति प्रदान कर। तू ही रोग से मुक्ति प्रदान करता है। तेरे सिवा कोई रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला नहीं है। रोग से ऐसा छुटकारा प्रदान कर कि फिर कोई रोग शेष न रहे।" [25] [25़] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/206, हदीस संख्या : 5750 और सहीह मुस्लिम 4/1721, हदीस संख्या : 2191.
4- "मैं हर शैतान, ज़हरीले जानवर एवं लग जाने वाली नज़र से अल्लाह के संपूर्ण शब्दों की शरण लेता हूँ।" [26] [26] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 6/408, हदीस संख्या : 3371.
5- "मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं की बुराई से, उसके पूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ।" [27] [27] सहीह मुस्लिम 4/1728, हदीस संख्या : 2709.
6- "मैं अल्लाह के संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ उसके क्रोध, दंड, उसके बंदों की बुराई और शैतानों के द्वारा डाले गए बुरे ख़यालों से और इस बात से कि वे मेरे पास आ जाएँ।" [28] [28] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 3893 तथा सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 3528, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/171 में हसन कहा है।
7- "मैं अल्लाह के उन संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ, जिनसे कोई अच्छा या बुरा इनसान आगे नहीं बढ़ सकता, उन तमाम चीज़ों की बुराई से जिन्हें उसने पैदा किया, अस्तित्व प्रदान किया और फैला दिया। इसी तरह मैं उसकी शरण में आता हूँ उन तमाम चीज़ों की बुराई से जो आकाश से नीचे आती हैं, उन तमाम चीज़ों की बुराई से जो नीचे से आकाश की ओर जाती हैं, उन तमाम चीज़ों की बुराई से जिनको उसने धरती में फैलाया है और उन तमाम चीज़ों की बुराई से जो धरती से निकलती हैं। इसी तरह रात और दिन के फ़ितनों की बुराई से और रात में हर आने वाले की बुराई से, सिवाय रात में उस आने वाले के, जो भलाई के साथ आता हो। ऐ रहमान!" [29] [29] मुस्नद-ए-अहमद 3/119 हदीस संख्या 15461, सहीह सनद के साथ तथा इब्न अल-सुन्नी हदीस संख्या 637, देखें : मजमा अल-ज़वाइद 10/127, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा 7/196 में सहीह कहा है।
8- "ऐ अल्लाह! आकाशों के रब, धरती के रब, महान सिंहासन के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने एवं गुठली को फाड़ने वाले और तौरात, इंजील तथा क़ुरआन उतारने वाले! मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ, जिसकी पेशानी को तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह! तू प्रथम है अतः तुझसे पहले कोई चीज़ नहीं है तथा तू आख़िर (अंतिम) है अतः तेरे बाद कोई चीज़ नहीं है, तू ज़ाहिर (प्रत्यक्ष एवं उच्च) है अतः तेरे ऊपर कोई चीज़ नहीं और तू बातिन (अप्रत्यक्ष एवं गुप्त) है अतः तुझसे परे कोई चीज़ नहीं है।" [30] [30] सहीह मुस्लिम 4/2084, हदीस संख्या : 2713.
9- "अल्लाह का नाम लेकर मैं तुम पर दम करता हूँ , तुम्हें कष्ट देने वाली प्रत्येक वस्तु से, प्रत्येक प्राणी की बुराई से अथवा ईर्ष्या करने वाली हर आँख से। अल्लाह तुम्हें आरोग्य प्रदान करे। अल्लाह का नाम लेकर मैं तुमपर दम करता हूँ।" [31] [31] सहीह मुस्लिम 4/1718, हदीस संख्या : 2186, वर्णनकर्ता अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु।
10- "अल्लाह के नाम से, अल्लाह आपको शिफ़ा दे, हर बीमारी से ठीक करे, तथा हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे और हर बुरी नज़र वाले की बुराई से।" [32] [32] सहीह मुस्लिम 4/1718, हदीस संख्या 2185, वर्णनकर्ता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा।
11- "अल्लाह का नाम ले कर मैं तुमपर दम करता हूँ, प्रत्येक उस चीज़ से जो तुमको दुःख दे, हसद करने वाले के हसद से और हर बुरी नज़र वाले से अल्लाह तुमको शिफ़ा दे।" [33] सुनन इब्न-ए-माजा हीदस संख्या 3527, वर्णनकर्ता उबादा बिन सामित रज़ियल्लाहु अनहु। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/268 में सहीह कहा है।
अल्लाह की शरण माँगने के इन शब्दों, दुआओं एवं दम करने के इन तरीक़ों द्वारा जादू, बुरी नज़र, जिन्नात के असर और अन्य तमाम बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। क्योंकि यह बड़े ही लाभकारी एवं सारगर्भित शब्द हैं।
तीसरा तरीक़ा : यदि संभव हो तो पछना लगवाकर शरीर के उस अंग या भाग से ज़हरीला पदार्थ निकाल देना, जहाँ जादू का असर हो गया हो। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो इलाज का पिछला तरीक़ा ही काफ़ी होगा। [34] [34] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/125, जादू से प्रभावित व्यक्ति के इलाज के और भी तरीक़े हैं। अनुभव से लाभकारी होना साबित हो जाए, तो उनके इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं है। देखें : मुसन्नफ़ इब्न अबू शैबा 7/386-387, फ़त्ह अल-बारी 10/233-234, मुसन्नफ़ अब्दुर रज़्ज़ाक़ 11/13, अल-सारिम अल-बत्तार पृष्ठ 194-200 तथा अल-सिह'र, हक़ीक़तुहु व हुकमुहु, लेखक : मुसफ़िर अल-दमीनी, पृष्ठ 64-66.
चौथा तरीक़ा : प्राकृतिक औषधियाँ। कई ऐसी लाभकारी प्राकृतिक औषधियाँ मौजूद हैं, जो पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से साबित हैं और जो विश्वास, सच्ची नीयत तथा इस यक़ीन के साथ प्रयोग करने पर लाभकारी सिद्ध होती हैं कि इन्हें लाभकारी बनाना अल्लाह का काम है। इसी तरह कुछ दवाएँ जड़ी-बूटियों आदि से बनाई जाती हैं, जो प्रयोग तथा अनुभव पर आधारित हैं और यदि हराम न हों, तो शरीयत उनके इस्तेमाल से रोकती नहीं है। [35] [35] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन फ़ी इलाज अल-सर्अ व अल-सिह'र व अल-ऐन, पृष्ठ 139.
अल्लाह की अनुमति से लाभकारी साबित होने वाली प्राकृतिक दवाओं में शहद [36], कलौंजी [37], ज़मज़म का पानी [37] और आसमान का पानी शामिल हैं। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "तथा हमने आकाश से बरकत वाला पानी उतारा।" सूरा क़ाफ़ : 9. इसी तरह ज़ैतून का तेल भी इसमें शामिल है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ज़ैतून का तेल खाओ और इसे लगाओ। क्योंकि यह एक बरकत वाले पेड़ से प्राप्त होता है।" [39] अनुभव, प्रयोग एवं किताबों से यह बात सिद्ध होती है कि ज़ैतून का तेल सबसे उत्तम तेल [40] है। प्राकृतिक दवाओं में स्नान करना, साफ़-सुथरा रहना और ख़ुशबू लगाना भी शामिल हैं। [41] [36] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन, पृष्ठ 140, मधु से इलाज का ज़िक्र इस किताब में आगे आएगा। [37] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन फ़ी इलाज अल-सर्अ व अल-सिह'र व अल-ऐन, पृष्ठ 141. कलौंजी से इलाज का ज़िक्र इस किताब में आगे आएगा। [38] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन, पृष्ठ 144. इस किताब में ज़मज़म के पानी द्वारा इलाज का ज़िक्र भी आने वाला है। [39] मुस्नद-ए-अहमद 3/497, हदीस संख्या 16055, तिर्मिज़ी हदीस संख्या 1851 तथा इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3319, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/166 में सहीह कहा है। देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन फ़ी इलाज अल-सर्अ व अल-सिह'र व अल-ऐन, पृष्ठ 142. [41] देखें : गुज़रा हुआ हवाला, पृष्ठ 145.
2- बुरी नज़र का इलाज
बुरी नज़र लगने का इलाज कई प्रकारों से हो सकता है :
पहला प्रकार : बुरी नज़र लगने से पहले। इसके भी कई तरीक़े हैं :
1- अज़कार, दुआओं और शरण माँगने के शरीयत सम्मत शब्दों द्वारा अपनी तथा ऐसे व्यक्ति की रक्षा करना, जिसके बारे में नज़र लगने का भय हो। इस विषय में बात जादू के इलाज के पहले तरीक़े के तहत गुज़र चुकी है। [42] [42] जादू के इलाज के बारे में इस किताब में जो कुछ लिखा जा चुका है, उसे दोबारा देखें।
2- जो व्यक्ति स्वयं की बुरी नजर लग जाने से डरता और भयभीत होता हो - यदि वह स्वयं की, अपने धन की, अपने बच्चे की, अपने भाई की या किसी अन्य की कोई ऐसी वस्तु देखता है जो उसे प्रसन्न करती है - तो वह, उसके लिए बरकत की दुआ करे। वह कहे : "वही होता है जो अल्लाह चाहता है। अल्लाह के सुयोग के बिना इन्सान के पास कोई शक्ति नहीं है। ऐ अल्लाह! इसमें बरकत दे।" क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से किसी को अपने भाई की कोई चीज़ अच्छी लगे, तो उसके लिए बरकत की दुआ करे।" [43] [43] मुवत्ता मालिक 2/938, इब्न-ए-माजा 2/1160 हदीस संख्या 3509 तथा अहमद 4/447 हदीस संख्या 15700। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/265 में सहीह कहा है। ज़ाद अल-मआद 4/170 तथा अल-सारिम अल-बत्तार फ़ी अल-तसद्दी लि-अल-सहरह व अल-अशरार, लेखक : शैख़ वहीद अब्दुस सलाम, पृष्ठ 229-252।
3- उस व्यक्ति की अच्छाइयों को छुपाना, जिसके बारे में इस बात का डर हो कि उसे बुरी नज़र लग सकती है। [44] [44] देखें : बग़वी की शर्ह अल-सुन्नह 13/116 तथा ज़ाद अल-मआद 4/173.
दूसरा प्रकार : नज़र लग जाने के बाद इलाज। इसके भी कई तरीक़े हैं :
1- जब नज़र लगाने वाल का पता चल जाए, तो उसे वज़ू कराया जाएगा और उस पानी से उस व्यक्ति को स्नान कराया जाएगा, जिसे नज़र लगी हो। [45] [45] देखें : सुनन अबू दाऊद 4/9 हदीस संख्या 5056, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा 6/61 तथा ज़ाद अल-मआद 4/163 में सहीह कहा है। देखें : अल-विक़ायह व अल-इलाज मिन अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : मुहम्मद बिन शाया, पृष्ठ 144-147.
2- इन सूरतों तथा आयतों को अधिक से अधिक पढ़ना : सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़, सूरा नास, सूरा फ़ातिहा, आयत अल-कुर्सी तथा सूरा बक़रा की अंतिम आयतें। इसी तरह झाड़-फूँक की शरीयत सम्मत दुआओं को पढ़कर फूँक मारना और कष्ट वाले स्थान पर हाथ फेरना, जैसा कि जादू के इलाज के दूसरे तरीक़े के भाग (ग) में संख्या 1-11 में पीछे बयान हो चुका है। [46] [46] इस किताब के अंदर जादू के इलाज के दूसरे तरीक़े के तहत जो कुछ लिखा गया है, उसे देखें।
3- इन्हें पानी में पढ़कर फूँक मारी जाए और फिर उस पानी का कुछ भाग रोगी पी ले और बचे हुए पानी को उसके ऊपर बहा दिया जाए। [47] या फिर इन्हें तेल में पढ़कर उसे लगाया जाए। [48] अगर ज़मज़म [49] का पानी या आसमान का पानी [50] मिल सके और इन्हें इनपर पढ़ा जाए, तो ज़्यादा बेहतर है। [47] सुनन अबू दाऊद 4/10, हदीस संख्या 3885, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा साबित बिन क़ैस के लिए किया था। जबकि अलबानी ने इसे ज़ईफ़ अबू दाऊद हदीस संख्या 836 में ज़ईफ़ (दुर्बल) कहा है। [48] मुस्नद-ए-अहमद 3/497 हदीस संख्या 16055, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा 1/108 हदीस संख्या 379 में सहीह कहा है। [49] इस किताब के अंदर जादू के इलाज के चौथे प्रकार के तहत जो कुछ लिखा गया है, उसे दोबारा पढ़ लें। [50] इस किताब के अंदर जादू के इलाज के चौथे प्रकार के तहत जो कुछ लिखा गया है, उसे देखें।
4- ऐसा भी किया जा सकता है कि क़ुरआन की कुछ आयतें लिखर उनको धोया जाए और रोगी को पिला दिया जाए। [51] मिसाल के तौर पुरी सूरा फ़ातिहा, आयत अल-कुर्सी, सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें, सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़, सूरा नास और झाड़-फूँक की दुआएँ, जिनका ज़िक्र जादू के इलाज के दूसरे तरीक़े के भाग (ख) में संख्या 1-11 में किया जा चुका है, को लिखा जा सकता है। [52] [51] देखें : ज़ाद अल-मआद लेखक इब्न-ए-क़ैयिम 4/170 तथा फ़तावा इब्न-ए-तैमिया 19/64. [52] इस किताब के अंदर जादू के इलाज के दूसरे प्रकार के तहत जो कुछ लिखा गया है, उसे देखें।
तीसरा तरीक़ा : ऐसे साधन अपनाना, जो इन्सान को ईर्ष्यालु लोगों की बुरी नज़र से बचाते हैं। ये साधन इस प्रकार हैं :
1- उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगना।
2- अल्लाह का तक़वा, उसके आदेशों का पालन करना और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहना। एक हदीस में है : "तुम अल्लाह (के आदेशों) की रक्षा करो, अल्लाह तुम्हारी रक्षा करेगा।" [53] [53] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2516, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/309 में सहीह कहा है।
3- ईर्ष्यालु व्यक्ति के ईर्ष्या पर सब्र करना और उसे क्षमा कर देना। उससे लड़ने-झगड़ने, शिकवा-शिकायत करने और उसे कष्ट पहुँचाने के बारे में सोचने से बचना।
4- अल्लाह पर भरोसा रखना। क्योंकि जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी होता है।
5- ईर्ष्यालु व्यक्ति से भय करने तथा उसके बारे में हमेशा सोचते रहने से बचना। यह एक बहुत ही लाभकारी दवा है।
6- अल्लाह की ओर मुतवज्जे होना, उसके प्रति निष्ठावान् रहना और उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने का प्रयास करना।
7- गुनाहों से तौबा करना। क्योंकि गुनाह इन्सान पर उसके दुश्मनों को हावी बना देते हैं। "और जो भी दुःख तुम्हें पहुँचता है, वह तुम्हारे अपने करतूत से पहुँचता है तथा वह क्षमा कर देता है तुम्हारे बहुत-से पापों को।" सूरा शूरा : 30.
8- जहाँ तक हो सके सदक़ा एवं उपकार करना, क्योंकि इससे इन्सान आश्चर्यजनक रूप से मुसीबत, बुरी नज़र और ईर्ष्या करने वाले की बुराई से सुरक्षित रहता है।
9- ईर्ष्या करने वाले, बुरी नज़र डालने वाले और कष्ट देने वाले की आग को उसपर उपकार करके बुझाना। जैसे-जैसे उसकी ओर से दिया जाने वाला कष्ट, बुराई और ईर्ष्या में वृद्धि हो, आप उसके उपकार, शुभचिंतन तथा दया में वृद्धि करते जाएँ। लेकिन इसका सुयोग उसी को मिलता है, जो अल्लाह वाला हो।
10- इबादत विशुद्ध रूप से एकमात्र अल्लाह की करना, जो सर्वशक्तिमान एवं हिकमत वाला है और जिसकी अनुमति के बिना कोई चीज़ न हानि कर सकती है न लाभ दे सकती है। उसी के हाथ में सब कुछ है। दरअसल विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत ऐसा क़िला है, जिसमें प्रवेश करने वाला सुरक्षित हो जाता है।
ये वो दस साधन हैं, जिनके द्वारा हम ईर्ष्या करने वाले, बुरी नज़र डालने वाले और जादूगर की बुराई से बच सकते हैं। [54] [54] देखिए : बदाये अल-फ़वाइद, लेखक : इब्न-ए-क़ैयिम 2/238-245.
3- इन्सान पर जिन्नात के असर का इलाज
जिन्नात के असर का इलाज दो तरह से किया जा सकता है :
1- जिन्नात का असर होने से पहले उसके बचाव की व्यवस्था करना :
जिन्नात के असर से बचाव का एक तरीक़ा यह है कि तमाम फ़र्ज़ एवं वाजिब कार्यों की पाबंदी की जाए, तमाम हराम चीज़ों से बचा जाए, तमाम गुनाहों से तौबा किया जाए तथा अज़कार, दुआओं एवं अल्लाह की शरण लेने के शरीयत सम्मत शब्दों द्वारा अपनी रक्षा की जाए।
2- जिन्नात का असर हो जाने के बाद उसका इलाज :
जिन्नात का असर हो जाने के बाद उसका इलाज किसी सच्चे मुसलमान की तिलावत और उसके झाड़-फूँक द्वारा किया जा सकता है। इसका सबसे कारगर इलाज यह है कि सूरा फ़ातिहा [55], आयत अल-कुर्सी, सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें, सूरा इख़लास , सूरा फ़लक़ तथा सूरा नास पढ़कर प्रभावित व्यक्ति पर फूँका जाए। इसे तीन या उससे अधिक बार भी दोहराया जाए। इनके अतिरिक्त अन्य आयतें भी पढ़ी जा सकती हैं। क्योंकि पूरा का पूरा क़ुरआन ईमान वालों के दिलों की बीमारियों की शिफ़ा है, शारीरिक शिफ़ा है, मार्गदर्शन है और दया है। [56] झाड़-फूँक की दुआएँ जादू के इलाज के दूसरे तरीक़े के भाग (ख) एवं (ग) [57] के तहत गुज़र चुकी हैं। इस इलाज में दो बातों का ख़याल रखा जाना ज़रूरी है : [55] देखें : सुनन अबू दाऊद 4/13-14 हदीस संख्या 3896 तथा अहमद 5/210 हदीस संख्या 21835, अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 2028 में सहीह कहा है। [56] देखें : अल-फ़त्ह अल-रब्बानी तरतीब मुस्नद अल-इमाम अहमद 17/183. [57] इस किताब के अंदर जादू के इलाज के दूसरे प्रकार के तहत जो कुछ लिखा गया है, उसे देखें।
एक तो प्रभावित व्यक्ति के अंदर आत्म बल होना चाहिए, अल्लाह से सच्चा लगाव होना चाहिए और सच्चे मन तथा दिल से उसका अल्लाह की शरण में जाना ज़रूरी है।
दूसरी बात यह है कि इलाज करने वाले के अंदर भी इन विशेषताओं का पाया जाना ज़रूरी है। क्योंकि हथियार उसी समय काम करते हैं, जब उसे चलाने वाले बाज़ू मज़बूत हों। [58] देखें : वहीद अब्दुस सलाम की किताब अल-सारिम अल-बत्तार पृष्ठ 109-117 में एक शरई इलाज का विस्तृत एवं लाभकारी तरीक़ा। इसी तरह देखें : ज़ाद अल-मआद 4/66-69 तथा ईज़ाह अल-हक़्क़ फ़ी दुख़ूल अल-जिन्नी बिल-इन्सी व अल-रद्द अला मन अनकरा ज़ालिक, लेखक : अल्लामा अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़, पृष्ठ 14, तथा फ़तावा इब्न-ए-तैमिया 19/9-65 तथा 24/276 एवं अल-विक़ायह व अल-इलाज मिन अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : मुहम्मद बिन शाये, पृष्ठ 66-69, साथ ही देखें : कैफ़िय्यतु तर्द अल-जिन्न मिन अल-बैत, अल-विक़ायह व अल-इलाज, लेखक : मुहम्मद बिन शाये, पृष्ठ 59 तथा आलम अल-जिन्न व अल-शयातीन, लेखक : अल-अशक़र, पृष्ठ 130.
अगर प्रभावित व्यक्ति के कान में अज़ान दे दी जाए, तो बेहतर है। क्योंकि शैतान अज़ान से भागता है। [59] [59] देखें : फ़त्ह अल-हक़्क़ अल-मुबीन फ़ी इलाज अल-सर्अ व अल-सिह'र व अल-ऐन, पृष्ठ 112 तथा बुख़ारी हदीस संख्या 574.
4- मानसिक रोगों का इलाज :
मानसिक रोगों का सबसे कारगर इलाज [60] संक्षिप्त में इस प्रकार है : [60] इस संबंध में देखें : ज़ाद अल-मआद 2/23-28 में बयान किए गए आत्मीय ख़ुशी के कारण तथा शैख़ अब्दुर रहमान बिन नासिर सादी की किताब अल-वसाइल अल-मुफ़ीदह लिल-हयात अल-सईदह।
1- सीधे मार्ग तथा एकेश्वरवाद के रास्ते पर चलना। याद रहे कि गुमराही और शिर्क आत्मा से संबंधित परेशानियों के सबसे बड़े कारणों में से एक हैं।
2- अल्लाह के द्वारा बंदे के दिल में डाले गए सच्चे ईमान का नूर तथा अच्छा अमल।
3- लाभकारी ज्ञान। इन्सान का ज्ञान जितना बढ़ता जाएगा, उसे उतनी ही आंतरिक प्रसन्नता और हार्दिक संतोष प्राप्त होगी।
4- अल्लाह की ओर लौटना, पूरे दिल से उससे प्रेम रखना, उसमें ध्यान लगाना और उसकी इबादत का आनंद लेना।
5- हमेशा, हर हाल में और हर जगह अल्लाह का ज़िक्र करते रहना। क्योंकि आंतरिक ख़ुशी तथा दिल के आनंद की प्राप्त और दुःख एवं चिंता को दूर करने में ज़िक्र का आश्चर्यजनक असर हुआ करता है।
6- लोगों पर तरह-तरह से उपकार करना और जहाँ तक हो सके, उनको लाभ पहुँचाना। क्योंकि दूसरों का भला एवं उनपर उपकार करने वाला व्यक्ति हमेशा ख़ुश एवं चिंता मुक्त रहता है एवं आनंददायी जीवन व्यतीत करता है।
7- बहादुरी, क्योंकि बहादुर इन्सान हमेशा खुश एवं प्रसन्नचित्त रहता है।
8- आत्मा के दोषों [61], जैसे ईर्ष्या, विद्वेष, कीना-कपट, दुश्मनी, नफ़रत, अत्याचार आदि बुरी बातें जो आत्मा को संकुचित एवं यातना का शिकार बनाए रखती हैं, को दिल से निकाल बाहर करना। एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सबसे उत्कृष्ट व्यक्ति के बारे में पूछा गया, तो आपने कहा : "हर साफ़ दिल एवं सच्ची ज़बान वाला व्यक्ति।" सहाबा ने पूछा : हम (आपके द्वारा प्रयुक्त एक शब्द "सदूकुल लिसान" (सच्ची ज़बान वाले) का अर्थ तो समझ गए, लेकिन (दूसरे शब्द) "मख़्मूमुल क़ल्ब" का क्या अर्थ है? आपने उत्तर दिया : "अल्लाह का भय (तक़वा) रखने वाला साफ़-सुथरा दिल, जिसमें न गुनाह हो, न सरकशी हो, न कीना-कपट हो और न ईर्ष्या हो।" [62] [61] यहाँ प्रयुक्त अरबी शब्द "दग़ल" शब्द का अर्थ है किसी चीज़ का ऐसा ऐब जो उसे खराब कर दे। [62] इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 4216, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/411 में सहीह कहा है।
9- देखने, बात करने, सुनने, मेल-जोल रखने, खाने और सोने में व्यर्थता से बचना। इससे दिल प्रसन्नचित्त, शांत एवं चिंतामुक्त रहता है।
10- किसी लाभकारी कार्य एवं किसी लाभकारी ज्ञान में व्यस्त रहना। इससे भी इन्सान का दिल चिंतामुक्त रहता है।
11- आने वाले समय पर पूरा ध्यान केंद्रित रखने और बीते हुए समय पर अफ़सोस करने की बजाय आज के दिन पर ध्यान देना। इन्सान को चाहिए कि मेहनत से दीन एवं दुनिया के फ़ायदे के काम करे तथा अल्लाह से सफलता की दुआ करे और मदद माँगे। यह चीज़ इन्सान को चिंतामुक्त रखती है।
12- स्वस्थ तथा उससे जुड़ी हुई चीज़ों और रोज़ी तथा उससे जुड़ी हुई चीज़ों में अपने से ऊपर के लोगों को देखने की बजाय नीचे के लोगों को देखा जाए।
13- पिछली अप्रिय बातों को, जिन्हें लौटाया नहीं सकता, भूल जाना और उनके बारे में सोचते न रहना।
14- जब बंदे पर कोई विपत्ति आए, तो उसे हल्का करने का प्रयास करे। इसका तरीक़ा यह है कि बंदा सबसे बुरी संभावना का अंदाज़ा लगाए, जहाँ तक मामला जा सकता है और उसके अपनी शक्ति के अनुसार उसका मुक़ाबला करे।
15- दिल को मज़बूत रखना, आशंकाओं एवं बुरे ख़्यालात से परेशान न होना, क्रोधित न होना और प्रिय वस्तुओं के हाथ से निकल जाने तथा अप्रिय घटनाओं के घटित होने की शंकाओं से ग्रसित न रहना। बल्कि सब कुछ सर्वशक्तिमान अल्लाह के हवाले कर देना, लाभकारी साधनों को अपनाना और अल्लाह से क्षमा एवं सुरक्षा माँगते रहना।
16- दिल से अल्लाह पर भरोसा और उसके बारे में अच्छा गुमान रखना। क्योंकि जो अल्लाह पर भरोसा करता है, उसको बुरे ख़्यालात प्रभावित नहीं करते।
17- अक़लमंद व्यक्ति यह जानता है कि उसका सही जीवन सुख एवं सुकून का जीवन है और वह बहुत छोटा भी है। इसलिए वह उसे चिंताओं एवं दुखों में लिप्त होकर और छोटा नहीं बनाता। क्योंकि यह बातें स्वस्थ जीवन के विपरीत हैं।
17- जब उसके सामने कोई अप्रिय वस्तु आती है, तो उस अप्रिय वस्तु की तुलना प्राप्त शेष सांसारिक एवं धार्मिक नेमतों से करता है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि उसे कितनी प्रचुर मात्रा में नेमतें प्राप्त हैं। इसी तरह वह आने वाले समय में होने वाले संभावित नुक़सानों और उनसे सुरक्षित रहने की प्रचुर संभावना के बीच तुलना करता है और दुर्बल संभावनाओं को प्रचुर प्रबल संभावनाओं पर हावी होने नहीं देता, जिससे उसकी चिंता और उसका भय दूर हो जाता है।
19- इस बात का विश्वास रखना कि लोगों के बुरा चाहने से उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। लोगों के बुरा कहने से उसके बजाय खुद कहने वालों का नुक़सान होगा। इसलिए लोगों की बातों पर ध्यान देने और चिंता करने से बचे, नहीं तो अपना नुक़सान होगा।
20- उन्हीं बातों के बारे में सोचना, जो धार्मिक एवं सांसारिक रूप से लाभदायक हों।
21- किसी का भला करने के बाद अल्लाह के अतिरिक्त किसी और से प्रशंसा की आशा न रखना। इस बात का विश्वास रखना कि वह सब कुछ अल्लाह के लिए करता है। सामने वाले के शुक्र अदा करने या न करने पर तवज्जो न दना। “हम तो तुम्हें केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खिलाते हैं, न तुम से प्रतिफल चाहते हैं न कृतज्ञता।” सूरा इंसान : 9.
22- लाभकारी विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना, उन्हें प्राप्त करने के लिए काम करना, तथा हानिकारक विषयों पर ध्यान न देना, ताकि वे मन या विचारों पर कब्जा न कर लें।
23- कार्यों को समय पर निपटा लेना और भविष्य के लिए तैयार रहना, ताकि आने वाले कार्यों को सोच समझकर और जोश व जज़्बे के साथ किया जा सके।
24- लाभकारी कार्यों एवं लाभकारी ज्ञानों का चयन प्राथमिकता के आधार पर करना। ख़ास तौर से ऐसे कार्यों का, जिनमें रुचि हो। फिर अल्लाह से मदद माँगना और मशवरा करना। फिर जब हित नज़र आने लगे और इरादा कर ले, तो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह पर भरोसा रखना।
25- अल्लाह की दी हुई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष नेमतों के बारे में बात करना। क्योंकि उनसे अवगत होना और उनके बारे में बात करना इन्सान को चिंतामुक्त बनाता है और उसके अंदर शुक्र का जज़्बा पैदा करता है।
26- पत्नी, रिश्तेदारों, साथियों और कामगारों और सभी संबंधियों के साथ व्यवहार ऐसा हो कि यदि उनके अंदर कोई दोष दिखाई दे, तो उन दोषों की तुलना उनके गुणों से किया जाए। इन सद्गुणों पर नजर रखने से रिश्ते को बनाए रखने में मदद मिलती है और दिल को सुकून मिलता है। इसीलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है : "कोई मोमिन पुरुष किसी मोमिन स्त्री से नफ़रत न करे। यदि उसकी कोई बात उसे अप्रिय लगे, तो दूसरी बात अच्छी लगेगी।" [63] [63] सहीह मुस्लिम 2/1091, हदीस संख्या : 1469.
27- तमाम चीज़ों को दुरुस्त कर दिए जाने की दुआ करना। इस प्रकार की सबसे महत्वपूर्ण दुआ यह है : "ऐ अल्लाह! मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे जिसमें मेरी सुरक्षा है, मेरे लिए मेरे संसार को सुधार दे जिसके अन्दर मेरा रहना-सहना है, मेरे लिए मेरी आख़िरत को सुधार दे जिसकी ओर मुझे लौटकर जाना है, मेरे लिए जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे तथा मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मुक्ति का साधन बना दे।" [64] इसी तरह यह दुआ भी बड़ी महत्वपूर्ण है : “ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे क्षण भर के लिए मेरी आत्मा के हवाले न कर। तथा मेरे लिए मेरे सारे कार्यों को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई इबादत के लायक़ नहीं है।” [65] [65] सहीह मुस्लिम 4/2087, हदीस संख्या : 2720. [65] अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या 5090 तथा मुस्नद-ए-अहमद हदीस संख्या 0430, इलबानी ने इसे सहीह अल-जामे हदीस संख्या 3388 में सहीह कहा है और सहीह अबू दाऊद 3/251 में हसन कहा है।
2- अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तुम अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया करो। क्योंकि जिहाद जन्नत के द्वारों में से एक द्वार है। इसके द्वारा अल्लाह दिलों की चिंता एवं शोक दूर करता है।" [66] [66] मुस्नद-ए-अहमद 5/314, 316, 319, 330 तथा 326, हदीस संख्या 21624, 22680, 22732, हाकिम ने इसे रिवायत करने के साथ-साथ सहीह कहा है और ज़हबी ने 2/75 में उनसे सहमति व्यक्त की है। अलबानी ने भी इसे सिलसिला सहीहा 2/274 में सही कहा है।
ये कुछ साधन और तरीक़े हैं, जो मनोवैज्ञानिक बीमारियों के लाभदायक उपचार हैं। यह उन लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक चिंता के सबसे अच्छे उपचारों में से हैं, जो इनपर विचार करते हैं और विश्वास तथा निष्ठा के साथ इनपर अमल करते हैं। कुछ विद्वानों ने इनके द्वारा अनेक मनोवैज्ञानिक स्थितियों और बीमारियों का इलाज किया है और इनके द्वारा अल्लाह की अनुमति से बड़ा लाभ हुआ है। [67] [67] देखें : भूमिका अल-वसाइल अल-मुफ़ीदा, पाँचवाँ प्रकाशन, पृष्ठ 6.
5- घाव एवं ज़ख़्म का इलाज
जब किसी व्यक्ति के शरीर में कोई बीमारी होती, या फोड़ा या ज़ख़्म होता, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उंगली से इस तरह इशारा करते -यह कहते समय सुफ़यान ने अपनी तर्जनी को ज़मीन पर रखा और फिर उठाया- और कहा : "अल्लाह के नाम से, यह हमारी भूमि की मिट्टी है, हममें से किसी की थूक के साथ, अल्लाह की आज्ञा से हमारा बीमार ठीक हो जाएगा।" [68] [68] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/206, हदीस संख्या : 5745 और सहीह मुस्लिम 4/1724, हदीस संख्या : 2194.
इस हदीस का अर्थ यह है कि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी तर्जनी उंगली पर अपनी कुछ लार लगाते थे, फिर उसे मिट्टी पर रखते थे, इस प्रकार उसमें कुछ मिट्टी मिल जाती थी, फिर आप उसे उस स्थान पर फेरते थे, जहाँ कोई घाव या बीमारी होती थी और वहाँ उंगली फेरते हुए यह दुआ पढ़ते थे : [69] [69] देखें : सहीह मुस्लिम पर इमाम नववी की शर्ह 14/184 तथा फ़त्ह अल-बारी 10/208, इस हदीस की विस्तृत व्याख्या के लिए देखिए : ज़ाद अल-मआद 4/186-187.
6- मुसीबत का इलाज
''धरती में एवं तुम्हारे प्राणों में जो भी आपदा पहुँचती है, वह एक पुस्तक में लिखी है, इससे पूर्व कि हम उसे उत्पन्न करें, और यह अल्लाह के लिए अति सरल है। ताकि तुम उसपर शोक न करो, जो तुमसे छूट जाए और उसपर फूल न जाओ, जो वह तुम्हें प्रदान करे। और अल्लाह किसी अहंकार करने वाले, बहुत गर्व करने वाले से प्रेम नहीं करता।" सूरा हदीद : 22-23.
2- "जो आपदा आती है, वह अल्लाह ही की अनुमति से आती है तथा जो अल्लाह पर ईमान लाये, तो वह मार्गदर्शन देता है उसके दिल को तथा अल्लाह प्रत्येक चीज़ को जानता है।" सूरा तग़ाबुन : 11.
3- ''जब किसी मुसलमान को कोई दुख पहुँचता है और वह यह दुआएँ पढ़ता है : ''इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजेऊन'' (हम सब अल्लाह के हैं और हम सब को उसी की ओर लौटकर जाना है) "ऐ अल्लाह! मुझे मेरे दुःख का प्रतिफल दे और उसका बेहतर बदल दे", तो अल्लाह उसेक दुःख का प्रतिफल प्रदान करता है और उसे पिछले से अच्छा बदला प्रदान करता है।'' [70] [70] सहीह मुस्लिम 2/633, हदीस संख्या : 918.
4- "जब किसी बंदे की बच्चे की मृत्यु हो जाती है, तो उच्च एवं महान अल्लाह अपने फ़रिश्तों से पूछता है : तुमने मेरे बंदे के बच्चे के प्राण निकाल लिए? वे उत्तर देते हैं : हाँ। अल्लाह पूछता है : तुमने उसके दिल के टुकड़े के प्राण निकाल लिए? वे फिर उत्तर देते हैं : हाँ। तो अल्लाह कहता है : मेरे बंदे ने क्या कहा? फ़रिश्ते जवाब देते हैं : उसने तेरी प्रशंसा की और इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन पढ़ा। [71] यह सुन अल्लाह कहता है : मेरे बंदे के लिए जन्नत में एक घर बना दो और उसका नाम बैत अल-हम्द (प्रशंसा का घर) रख दो।" [72] [71] यानी उसने कहा : अल-हम्दु लिल्लाह, एवं इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। [72] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 1021, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 1/298 में हसन कहा है।
5- "उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : जब मैं अपने मोमिन बंदे से दुनिया वालों में से उसके किसी प्रिय को उठा लेता हूँ, फिर वह सवाब की आशा में धैर्यवान रहता है, उसके लिए जन्नत के सिवा कुछ और बदला नहीं है।" [73] [73] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/242, हदीस संख्या : 6424.
6- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक व्यक्ति से कहा, जिसके पुत्र की मृत्यु हो गई थी : "क्या तुम्हें यह पसंद नहीं है कि तुम जन्नत के जिस द्वार पर भी जाओ, उसे अपना इंतेज़ार करता हुआ पाओ?" [74] [74] मुस्नद-ए-अहमद हदीस संख्या 15595 तथा सुनन नसाई 4/23 किताब अल-जनाइज़, अध्याय अल-अम्र बि-अल-इहतिसाब व अल-सब्र इंदा नुज़ूल अल-मुसीबह, हदीस संख्या 1870, इसकी सनद सहीह की शर्त पर सहीह है। इब्न-ए-हिब्बान ने 8/209 में सहीह कहा है। अलबानी ने भी सहीह अल-तरग़ीब व अल-तरहीब, हदीस संख्या 2007 में सहीह कहा है। देखें : फ़त्ह अल-बारी 11/243.
7- "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने कहा है : जब मैं अपने बंदे को उसकी दो प्यारी चीज़ों के संबंध में आज़माता हूँ और वह सब्र करता है [तथा इसे नेकी का ज़रिया समझता है] तो मैं उन दोनों के बदले में उसे जन्नत प्रदान करता हूँ।"आप की मुराद उसकी दोनों आँखें हैं।" [75] [75] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/116, दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग सुनन तिर्ममिज़ी हदीस संख्या 2400 से लिया गया है। देखें : सहीह तिर्मिज़ी 2/286.
8- "किसी मुसलमान को कोई कष्ट पहुँचता है, बीमारी के रूप में हो या किसी अन्य रूप में, तो अल्लाह उसके कारण उसके गुनाह उसी तरह झाड़ देता है, जिस तरह पेड़ से पत्ते झड़ते हैं।" [76] [76] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/120, हदीस संख्या : 5648 और सहीह मुस्लिम 4/1991, हदीस संख्या : 2571.
9- "जिस मुसलमान को कोई काँटा चुभता है या इससे बड़ा कोई कष्ट होता है, तो इसके बदले में उसके लिए एक दर्जा लिख दिया जाता है और उसका एक गुनाह मिटा दिया जाता है।" [77] [77] सहीह मुस्लिम 4/1991, हदीस संख्या : 2572.
10- "मुसलमान को जो भी स्थायी दर्द [78], थकान [79], बीमारी, दुख और ग़म [80] आता है, तो इसके ज़रिए उसके गुनाह मिटा दिए जाते हैं।" [81] [78] इस दुआ में आए हुए शब्द "अल-वसब" से मुराद साथ लगा रहने वाला (स्थायी) दर्द है। उच्च एवं महान अल्लाह के एक कथन में है : "अज़ाबुन वासिब" यानी उनके लिए स्थायी यातना है। देखें : इमाम नववी की शर्ह 16/130. [79] दूसरे शब्द "अल-नसब" का अर्थ थकान है। [80] इसे कुछ लोगों ने "यहुम्मुहू" पढ़ा है तथा कुछ लोगों ने "युहम्मुहू" भी पढ़ा है। यानी उसे ढाँप ले। दोनों सहीह है। देखें : इमाम नववी द्वारा लिखी गई सहीह मुस्लिम की शर्ह 16/130. [81] सहीह मुस्लिम 4/1993, हदीस संख्या : 2573.
11- "निश्चय ही बड़ा बदला बड़ी परीक्षा के साथ है। जब अल्लाह किसी क़ौम से प्रेम करता है, तो उसकी परीक्षा लेता है। अतः, जो अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट रहेगा, उससे अल्लाह प्रसन्न होगा और जो असंतुष्टी दिखाएगा, उससे अल्लाह नाराज रहेगा।" [82] [83] [82] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2396, सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 4031, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/286 में हसन कहा है। कहा जाता है : "अल-सुख्त अथवा अल-सखत". यानी संतुष्टि के विरूद्ध। "सखित" यानी क्रोधित हुआ। "साखितुन" यानी क्रोधित। "अस्खत" यानी क्रोधित किया। कहा जाता है : "तसख्खत अताअहू" यानी किसी की दी हुई चीज़ को कम समझा और उससे संतुष्टि नहीं हुआ। "सखित सखतन" दरअसल बाब "तइब" से है। "अल-सुख्तु" उसी से संज्ञा है। "सखित्तुहू, सखित्तु अलैहि एवं असखत्तुहू फ-सखित" का अर्थ एवं वज़न वही है, जो "अग़्ज़ब्तुहू फ-ग़ज़िब" का है। देखें : अल-सिहाह तथा मिस्बाह अल-मुनीर, मूल तत्व: "स ख त".
12- "मुसीबतें बंदे पर आती रहती हैं [84], यहाँ तक वह धरती पर इस तरह पाक-साफ़ होकर चलता है कि उसपर कोई गुनाह नहीं होता।" [85] [84] यानी मुसलमान व्यक्ति। [85] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2698 तथा सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 4023, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/286 में हसन कहा है।
7- शोक तथा चिंता का इलाज
1- जब किसी बंदे को कोई शोक तथा चिंता आती है और वह कहता है : "ऐ अल्लाह! मैं तेरा बंदा हूँ और तेरे बंदे का बेटा हूँ एवं तेरी बंदी का बेटा हूँ। मेरी पेशानी तेरे हाथ में है। मेरे बारे में तेरा आदेश चलता है। मेरे बारे में तेरा निर्णय न्याय पर आधारित है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम का वास्ता देकर माँगता हूँ, जिससे तूने ख़ुद को नामित किया है या उसे अपनी किताब में उतारा है या उसे अपनी किसी सृष्टि को सिखाया है या उसे अपने पास अपने परोक्ष ज्ञान में सुरक्षित कर रखा है, कि क़ुरआन को मेरे दिल का वसंत, मेरे सीने की रोशनी, मेरे दुःख का मोचन और मेरी व्याकुलता को समाप्त करने वाला बना दे, तो अल्लाह उसके कष्ट एवं दुःख को दूर कर देता है और उसके स्थान पर ख़ुशी प्रदान करता है।" [86] [86] मुस्नद-ए-अहमद 1/391 हदीस संख्या 3712, अलबानी ने इसे सहीह अल-तरग़ीब व अल-तरहीब हदीस संख्या 182 में सहीह कहा है।
2- "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ चिंता तथा शोक से, विवशता तथा सुस्ती से, कंजूसी तथा कायरता से और क़र्ज़ के बोझ तथा लोगों के वर्चस्व से।" [87] [87] सहीह बुख़ारी 7/158, हदीस संख्या : 2893, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- यह दुआ बहुत ज़्यादा पढ़ा करते थे। देखिए : सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 11/173.
8- बेचैनी का इलाज
1- "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, जो महान और सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो महान अर्श (सिंहासन) का रब है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, जो आकाशों का रब , धरती का रब और सम्मानित सिंहासन (अर्श) का रब है।" [88] [88] सहीह बुख़ारी 7/154, हदीस संख्या : 6346 तथा सहीह मुस्लिम 4/2092, हदीस संख्या : 2730.
2- “ऐ अल्लाह मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे क्षण भर के लिए मेरी आत्मा के हवाले न कर। तथा मेरे लिए मेरे सारे कार्यों को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई वास्तविक उपास्य नहीं है।” [89] [89] सुनन अबू दाऊद 4/324 हदीस संख्या 5092 तथा अहमद 5/42 हदीस संख्या 20430, अलबानी ने इसे इरवा अल-ग़लील 3/357 और अरनाऊत ने मुस्नद के शोध 34/75 में हसन कहा है।
3- "तेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। तू पवित्र है। निःसंदेह मैं ही ज़ालिमों में से था।" [90] [90] सुनन तिरमिज़ी 5/529, हदीस संख्या : 3505 तथा मुसतदरक हाकिम 1/505, हाकिम ने इसे सहीह कहा है और ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। अलबानी ने भी इसे सहीह तिरमिज़ी 3/168 में सहीह कहा है।
4- "अल्लाह केवल अल्लाह मेरा रब है, मैं किसी को उसका साझी नहीं बनाता हूँ।" [91] [91] अबू दाऊद 2/87 हदीस संख्या 1554, अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/335 तथा सहीह तिर्मिज़ी 4/196 में सहीह कहा है।
9- रोगी द्वारा ख़ुद अपना इलाज
"शरीर के जिस भाग में दर्द हो, वहाँ अपना हाथ रखो और उसके बाद तीन बार बिस्मिल्लाह कहो तथा सात बार यह दुआ पढ़ो : मैं अल्लाह तथा उसके सामर्थ्य की शरण में आता हूँ, उस चीज़ से जो मैं पाता हूँ और जिससे मैं डरता हूँ।" [92] [92] सहीह मुस्लिम, 4/1728, हदीस संख्या : 2202.
10- रोगी का हाल जानने के लिए जाते समय उसका इलाज
"जब कोई मुसलमान किसी बीमार व्यक्ति का, जिसकी मृत्यु का समय न आया हो, हाल जानने और उसे ढारस देने के लिए उसके पास जाता है और सात बार यह दुआ पढ़ता है : मैं महान अल्लाह, जो महान सिंहासन का रब है, से दुआ करता हूँ कि तुमको स्वस्थ कर दे, तो उसे शिफ़ा दे दी जाती है।" [93] [93] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 2083 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 3893, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 2/210 और सहीह अल-जामे 5/180 में सहीह कहा है।
11- नींद में घबराहट तथा भय की दुआ
"मैं अल्लाह के संपूर्ण शब्दों की शरण में आता हूँ उसके क्रोध, दंड, उसके बंदों की बुराई और शैतानों के द्वारा डाले गए बुरे ख़यालों से और इस बात से कि वे मेरे पास आ जाएँ।" [94] [94] सुनन अबू दाऊद 4/12 हदीस संख्या 3893, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/171 में हसन कहा है।
12- बुख़ार का इलाज
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "बुख़ार दोजख़ की तपिश से है, लिहाज़ा तुम उसे पानी से ठंडा करो।" [95] [95] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/174, हदीस संख्या : 3264 और सहीह मुस्लिम 4/1733, हदीस संख्या : 2210.
13- ज़हरीले कीड़ों के काटने तथा डंक मारने का इलाज
1- सूरा फ़ातिहा पढ़े और थूक एकत्र करके डसे हुए स्थान पर फूँक मारे। [96] [96] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/208, किताब : अल-तिब्ब, अध्याय : रुक़यह अल-नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम।
2- उसपर नमक पानी डाला जाए और निम्नलिखित सूरतें पढ़ी जाएं : सूरा कीफ़िरून, सूरा फ़लक़ और सूरा नास। [97] [97] तबरानी की अल-मोजम अल-सग़ीर 2/830, इसकी सनद को हैसमी ने मजमा अल-ज़वाइद 5/111 में हसन कहा है और अलबानी ने इसे सिलसिला सहीहा हदीस संख्या 548 में सहीह कहा है।
14- क्रोध का इलाज
क्रोध के इलाज के दो तरीक़े हैं :
पहला तरीक़ा : क्रोध से बचाव
यानी क्रोधित करने वाली चीज़ों, जैसे अहंकार, आत्म मुग्धता, गर्व, बुरी लालच, अनुचित हंसी-मज़ाक़ और इस प्रकार की चीज़ें।
दूसरा तरीक़ा : क्रोध आ जाने के बाद उसका इलाज
इसके भी चार प्रकार हैं :
धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगना।
वज़ू करना।
क्रोधित व्यक्ति का अपनी अवस्था को बदल लेना। मसलन बैठ जाना, लेट जाना, निकल जाना या बात करना बंद कर देना आदि।
इस बात को ज़हन में लाना कि ग़ुस्सा पीने का कितना बड़ा सवाब है और ग़ुस्से के नतीजे में कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है। [98] [98] इस विवरण को सहीह प्रमाणों के साथ पढ़ने के लिए देखें : आफ़ात अल-लिसान, पृष्ठ 110-112 तथा इस किताब के लेखक द्वारा लिखी गई किताब अल-हिकमह फ़ी अल-दावह इला अल्लाह, पृष्ठ 64-66.
15- कलौंजी द्वारा इलाज
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "कलौंजी के अंदर मौत को छोड़कर हर बीमारी का इलाज है।" इब्न-ए-शिहाब कहते हैं : इस हदीस में आए हुए शब्द "अल-साम" से मुराद मौत है। जबकि "अल- हब्बतुस सौदा" से मुराद कलौंजी है। [99] कलौंजी के अंदर बहुत सारे फ़ादये मौजूद हैं। जबकि आपके शब्द "हर बीमारी का इलाज है" उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन के समान है : "वह अपने पालनहार के आदेश से हर चीज़ का विनाश कर देगी।" सूरा अहक़ाफ़ : 25. यानी हर उस चीज़ को विनष्ट कर देगी, जो विनष्ट हो सकती है। [100] [99] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/143, हदीस संख्या : 5688 और सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1735 तथा 2215. [100] देखें : ज़ाद अल-मआद 4/297 तथा अल-तिब्ब मिन अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : अल्लामा मुवफ़़्फ़क़ुद्दीन अब्दुल लतीफ़ अल-बग़दादी, पृष्ठ 88.
16- मधु द्वारा इलाज
1- उच्च एवं महान अल्लाह ने मुधु मक्खी का ज़िक्र करते हुए कहा है : "उसके भीतर से एक पेय निकलता है, जो विभिन्न रंगों का होता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य है। वास्तव में, इसमें एक निशानी (लक्षण) है, उन लोगों के लिए, जो सोच-विचार करते हैं।" सूरा नह्ल : 69.
2-और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : "शिफा तीन चीज़ों में है।पछने लगवाने में, शहद पीने में, और आग से दाग देने में। लेकिन मैं अपनी उम्मत को दाग देने से मना करता हूँ।" [101] [101] सहीह बुख़ारी फ़त्ह अल-बारी के साथ 10/137, हदीस संख्या 5681, शहद के फ़ायदों के लिए देखें : ज़ाद अल-मआद 4/50-62 तथा अल-तिब्ब मिन अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : अल्लामा मुवफ़्फ़क़ुद्दीन अब्दुल लतीफ़ बग़दादी, पृष्ठ 129-136.
17- ज़मज़म के पानी द्वारा इलाज
1- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़मज़म के पानी के बारे में फ़रमाया है : "यह बरकत वाला पानी है। यह खाने के लिए भोजन है [और बीमारी का इलाज है।]" [102] [102] सहीह मुस्लिम 4/1922, हदीस संख्या 2473, दोनों कोष्ठकों के बीच का भाग बज़्ज़ार 2/86 का है। बैहक़ी की अल-सुनन अल-कुबरा 5/147, तबरानी की अल-मोजम अल-औसत 3/247, इसकी सनद सहीह है। देखें : मजमा अल-ज़वाइद 3/286.
2- जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नक़ल करते हैं : "ज़मज़म का पानी उस उद्देश्य के लिए होता है, जिसके लिए उसे पिया जाए।" [103] सुनन इब्न-ए-माजा हदीस संख्या 3062 आदि। अलबानी ने इसे सहीह इब्न-ए-माजा 2/183 तथा इरवा अल-ग़लील 4/320 में सहीह कहा है।
3- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है कि आप वजू के बर्तनों [104] और मशकों में ज़मज़म का पानी ले जाते और उसे रोगियों पर डालते और उन्हें पिलाते थे।" [105] इब्न-ए-क़ैयिम रहिमहुल्लाह कहते हैं : "मैंने तथा अन्य लोगों ने ज़मज़म के पानी द्वारा इलाज के बड़े चमत्कारिक फ़ायदे देखे हैं। मैंने ख़ुद कई बीमारियों का इलाज उसके द्वारा की और अल्लाह की अनुमति से शिफ़ा [106] पाई।" [107]. [104] इस हदीस में आए हुए "अल-इदावतु" शब्द का अर्थ है वजू का बर्तन। देखें : मुख़तार अल-सिहाह 1/11. [105] सुनन तिर्मिज़ी 1/180 हदीस संख्या 963, तथा बैहक़ी 5/202, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 1/284, सिलसिला सहीहा 2/572 हदीस संख्या 883 तथा ज़ाद अल-मआद 4/392 में सहीह कहा है। [106] यहाँ आए हुए अरबी शब्द "फ-बरअ्तु" को हिजाज़ वालों के अलावा अन्य लोग "फ-बरिअ्तु" कहते हैं। देखें : अल-निहायह फ़ी ग़रीब अल-हदीस 1/111. [106] ज़ाद अल-मआद 4/393 तथा 178.
18- अंतरात्मा की बीमारियों का इलाज
दिल तीन प्रकार के होते हैं :
1- स्वच्छ दिल : क़यामत के दिन मुक्ति उसी को मिलेगी, जो स्वच्छ दिल के साथ हाज़िर होगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जिस दिन न काम आएगा माल और न बेटे। परन्तु, जो अल्लाह के पास स्वच्छ दिल लेकर आएगा।" सूरा शुअरा : 88-89.
स्वच्छ दिल वह है, जो अल्लाह के आदेश एवं निषेध विरोधी हर इच्छा और अल्लाह की दी हुई सूचना विरोधी हर संदेह से पाक हो। वह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अतिरिक्त किसी और को निर्णायक मानने से पाक हो।
सारांश यह कि सही स्वच्छ दिल जो किसी भी तरीक़े से ग़ैरुल्लाह को साझी बनाने से सुरक्षित रहे। वह विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत करे। उसी को चाहे, उसी से मुहब्बत रखे, उसी पर भरोसा करे, उसी की ओर लौटे, उसी के सामने झुके, उसी से डरे और उसी से आशा रखे। इसी तरह उसका हर अमल विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए हो। किसी से मुहब्बत रखे तो अल्लाह के लिए रखे, किसी से दुश्मनी रखे तो अल्लाह के लिए रखे, किसी को कुछ दे तो अल्लाह के लिए दे, किसी से कुछ रोके तो अल्लाह के लिए रोके, जो कुछ सोचे अल्लाह के लिए सोचे, उसका प्रेम अल्लाह के लिए हो, उसका इरादा अल्लाह के लिए हो, उसका शरीर अल्लाह के लिए हो, उसके सारे काम अल्लाह के लिए हों, उसका सोना और जागना अल्लाह के लिए हो, उसकी ज़बान से निकलने वाली हर बात अल्लाह के लिए हो, अल्लाह के बारे में बात करने में उसे सबसे ज़्यादा मज़ा आए, उसके विचारों के केंद्र में वह बातें हों जिनसे अल्लाह खुश होता है और जो अल्लाह को प्रिय हैं। [108] अल्लाह हम में से हर व्यक्ति को इस प्रकार का दिल प्रदान करे। [108] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान मिन मसायिद अल-शैतान, लेखक इब्न-ए-क़ैयिम 1/7 तथा 73.
2- मरा हुआ दिल : यह स्वच्छ दिल के विपरीत होता है। ऐसा दिल, जो अपने पालनहार को न पहचाने, उसके आदेशों का पालन न करे, उसकी प्रिय एवं अप्रिय चीज़ों का ख़्याल न रखे, बल्कि अपनी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के पीछे भागता रहे, चाहे उसका पालनहार नाराज़ और क्रोधित ही क्यों न होता हो। वह ग़ैरुल्लाह की इबादत करे। उससे मुहब्बत रखे, उससे डरे, उससे आशा रखे, उसकी पसंद एवं नापसंद का ख़्याल रखे, उसका सम्मान करे और उसके आगे झुके। किसी से नफ़रत करे तो अपनी आकांक्षाओं के लिए करे, किसी से मोहब्बत करे तो अपनी आकांक्षाओं के लिए करे, किसी को कुछ दे तो अपनी आकांक्षाओं के लिए दे और किसी से कुछ रोके तो अपनी आकांक्षाओं के लिए रोके। इच्छा एवं आकांक्षा उसका मार्गदर्शक होता है, भोग-विलास उसका रहबर होता है, अज्ञानता उसका चालक होता है और अचेतना उसकी सवारी। [109] इस प्रकार के दिल से अल्लाह हमें बचाए रखे। [109] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान मिन मसायिद अल-शैतान 1/9.
3- बीमार दिल : ऐसा दिल जो जीवित तो है, लेकिन बीमार है। उसे दो विपरीत शक्तियाँ खींच रही होती हैं। कभी यह खीचती है और कभी वह कीचती है। इन दो शक्तियों में से जो हावी रहे, उसका झुकाव उसी ओर रहता है। वह अल्लाह से मोहब्बत भी रखता है, उसपर ईमान भी रखता है, उससे निष्ठा भी रखता है और उसपर भरोसा भी करता है। यह चीज़ें उसके जीवित होने की निशानी हैं। लेकिन उसके अंदर आकांक्षाओं से प्यार भी होता है, उन्हें प्राप्त करने का प्रयास भी पाया जाता है, ईर्ष्या, घमंड, आत्म-मुग्धता, महत्वकांक्षा, धरती में बिगाड़ फैलाने की भावना, निफ़ाक़, दिखावा, लालच और कंजूसी जैसी चीज़ें भी पाई जाती हैं, जो उसे विनाश की ओर खींचती हैं। [110] इस प्रकार के दिल से भी अल्लाह हमें बचाए रखे। [110] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान 1/9.
दिल की तमाम बीमारियों का इलाज क़ुरआन में मौजूद है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ लोगो! तुम्हारे पास, तुम्हारे पालनहार की ओर से एक ऐसी चीज़ आई है, जो उपदेश,अंतरात्मा के सब रोगों का उपचार, मार्गदर्शन तथा दया है उनके लिए जो विश्वास रखते हैं।" सूरा यूनुस : 57. सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने एक अन्य स्थान में कहा है : ''और हम क़ुरआन में से जो उतारते हैं, वह ईमान वालों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) तथा दया है। और वह अत्याचारियों को घाटे ही में बढ़ाता है।" सूरा इसरा : 82.
अंतरात्मा की बीमारियाँ दो तरह की होती हैं :
एक प्रकार की बीमारी वह है, जिससे ग्रसित इन्सान तुरंत पीड़ा महसूस नहीं करता। यह अज्ञानता एवं संदेह की बीमारी है। वैसे तो यह बीमारी दूसरी बीमारी से अधिक कष्टदायक है, लेकिन दिल के बिगाड़ के कारण कष्ट का एहसास नहीं होता।
जबकि दूसरे प्रकार की बीमारी वह है, जिसका कष्ट तुरंत महसूस होता है। जैसे चिंता, शोक, उदासी और क्रोध। इस प्रकार की बीमारी कभी-कभी प्राकृतिक दवाओं द्वारा इनके कारणों को दूर कर दिए जाने के बाद ठीक हो जाती हैं। [111] [111] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान 1/44.
अंतरात्मा का इलाज चार चीज़ों द्वारा किया जा सकता है :
पहली चीज़ : पवित्र क़ुरआन द्वारा; पवित्र क़ुरआन दिल के अंदर पाए जाने वाले संदेह, शिर्क, अविश्वास की गंदगी और अनुचित आकांक्षाओं की बीमारियों का इलाज करता है। क़ुरआन सत्य से अवगत एवं उसपर अमल करने वाले के लिए मार्गदर्शक और ईमान वालों को दुनिया एवं आख़िरत में प्रतिफल दिलाने के कारण दया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तो क्या, जो निर्जीव रहा हो, फिर हमने उसे जीवन प्रदान किया हो तथा उसके लिए प्रकाश बना दिया हो, जिसके उजाले में वह लोगों के बीच चल रहा हो, उस जैसा हो सकता है, जो अंधेरों में हो, उससे निकल न रहा हो? इसी प्रकार, काफ़िरों के लिए उनके कुकर्म सुंदर बना दिये गए हैं।" सूरा अनआम : 122.
दूसरी चीज़ : दिल को तीन चीज़ों की ज़रूरत होती है :
1- वह चीज़ें जो उसकी शक्ति को सुरक्षित रखती हैं। इस प्रकार की चीज़ों में ईमान, अच्छे कर्म और अल्लाह का आज्ञापालन शामिल हैं।
2- हानिकारक चीज़ों से बचाव। इसके लिए तमाम गुनाहों एवं हर तरह के शरीयत विरोधी कार्यों से बचना पड़ता है।
3- हर कष्टदायक वस्तु से खुद को खाली रखना। इसके लिए तौबा करना और अल्लाह से क्षमा माँगना होता है।
तीसरी चीज़ : आत्मा की ऐसी बीमारी का इलाज जो वासना के प्रभुत्व के कारण पैदा होती है।
इसके इलाज के दो तरीक़े हैं : आत्मचिंतन करना और वासना का विरोध करना। आत्मचिंतन के भी दो प्रकार हैं :
पहला : अमल से पहले। इसके भी चार चरण हैं :
1- क्या यह काम उसकी क्षमता के दायरे में आता है?
2- क्या इस काम का करना उसके लिए छोड़ने से बेहतर है?
3- क्या यह काम अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए किया जा रहा है?
4- अगर इस काम को करने के लिए सहयोगियों की ज़रूरत है, तो क्या इसके लिए सहयोग मिलेगा और सहोयोगी उपलब्ध हो सकेंगे? अगर उत्तर मौजूद हो, तो आगे बढ़े। वरना आगे न बढ़े।
दूसरा : काम के बाद। इसके भी तीन प्रकार हैं :
1- नेकी के उस काम पर आत्मचिंतन करना, जिसमें अल्लाह के हक़ की अदायगी में कोताही हुई हो और वांछित तरीक़े से किया न गया हो। अल्लाह के हक़ में निष्ठा, विशुद्धता, अनुसरण, एहसान के स्थान तक पहुँचना, अपने ऊपर अल्लाह के उपकार और इन सब के बाद अपनी कोताही का एहसास जैसी चीज़ें शामिल हैं।
2- हर ऐसे कार्य के बारे में आत्मचिंतन जिसे छोड़ देना करने की तुलना में बेहतर था।
3- किसी ऐसे जायज़ या नियमित कार्य के बारे में आत्मचिंतन, जिसे नहीं किया। क्या न करने का कारण अल्लाह की प्रसन्नता एवं आख़िरत की सफलता थी। अगर ऐसा है, तो अच्छी बात है। या फिर न करने के पीछे कोई सांसारिक बात मौजूद थी। अगर ऐसा है, तो बुरी बात है।
सारांश यह कि सबसे पहले फ़र्ज़ कार्यों के बारे में आत्मचिंतन करे। अगर इनके अंदर कोई कमी रह गई हो, तो उसे दूर करे। फिर अल्लाह की मना की हुई चीज़ों के बारे में आत्मचिंतन करे। अगर उनमें से कोई काम कर डाला है, तो तौबा कर ले और अल्लाह से क्षमा माँग ले। फिर शरीर के अंगों द्वारा किए गए कार्यों के बारे में और उसके बाद अचेतना के बारे में आत्मचिंतन करे। [112] [112] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान 1/136.
चौथी चीज़ : शैतान के प्रभुत्व के कारण पैदा होने वाली दिल की बीमारी का इलाज :
शैतान इन्सान का दुश्मन है और उससे बचने का अल्लाह का सिखाया हुआ रास्ता अल्लाह की शरण माँगना है। ख़ुद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अंतरात्मा की बुराई और शैतान की बुराई से एक साथ अल्लाह की शरण माँगी है। आपने अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहु से कहा है : "तुम कहो : ऐ अल्लाह! आकाशों तथा धरती के रचयिता, छिपी तथा खुली बातों के जानने वाले, हर चीज़ के रब और सवामी! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तेरी शरण में आता हूँ अपने प्राण की बुराई से, शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तथा इस बात से कि मैं अपने साथ या किसी मुसलमान के साथ कोई बुरा व्यवहार करूँ।" इस दुआ को सुबह-शाम एवं सोते समय पढ़ा करो।" [113] [113] सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या 3392 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या 5058, अलबानी ने इसे सहीह तिर्मिज़ी 3/142 में सहीह कहा है।
अल्लाह की शरण माँगना, उसपर भरोसा करना और उसके प्रति निष्ठावान रहना शैतान के प्रभुत्व को रोकता है। [114] [114] देखें : इग़ासह अल-लहफ़ान 1/145-162.
अल्लाह की कृपा तथा शांति की बरखा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके तमाम परिजनों, तमाम साथियों एवं क़यामत के दिन तक निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर।
दुआएँ तथा किताब व सुन्नत में उल्लेखित झाड़-फूँक द्वारा इलाज
सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी
डॉक्टर सईद बिन अली बिन वहफ़ अल-क़हतानी की किताब "दुआएँ तथा किताब व सुन्नत में उल्लेखित झाड़-फूँक द्वारा इलाज" दुआ और शरई झाड़-फूँक द्वारा रोगों के इलाज के विषय में एक प्रामाणिक अकादमिक संदर्भ-ग्रंथ है। यह किताब पवित्र क़ुरआन और नबवी सुन्नत से ली गई दुआओं को प्रस्तुत करती है और आध्यात्मिक एवं शारीरिक रोगों से स्वास्थ्य-लाभ के लिए उनसे लाभ उठाने की विधि बताती है। साथ ही यह झाड़-फूँक द्वारा इलाज का भी विवेचन करती है, और इस बात पर बल देती है कि स्वास्थ्य की कामना के लिए गहरा ईमान और अल्लाह तआला की ओर सच्ची लगन आवश्यक है। यह हानि एवं रोगों से बचाव तथा इलाज के प्रभावी साधन भी प्रस्तुत करती है।