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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच यह दुआ पढ़ा करते थे : "رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي" (ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे।

हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच यह दुआ पढ़ा करते थे : "رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي" (ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे।

أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَقُولُ بَيْنَ السَّجْدَتَيْنِ: «رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي».

इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
स़ह़ीह़
स्पष्टीकरण

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब दो सजदों के बीच बैठते, तो इस दुआ को पढ़ते और बार-बार दोहराते : "رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي" (ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे।) "رَبِّ اغْفِرْ لِي" इसके द्वारा बंदा अपने रब से इस बात का आग्रह करता है कि उसके गुनाह मिटा दे और उसकी कमियों पर पर्दा डाल दे।

शब्दों के अर्थ

...:

हदीस के कुछ फ़ायदे

फ़र्ज़ तथा नफ़ल नमाज़ में दो सजदों के बीच इस दुआ को पढ़ना है।

"رَبِّ اغْفِرْ لِي" को एक से अधिक बार पढ़ना मुसतहब और एक बार पढ़ना वाजिब है।

समीक्षक

सुनन अबू दावूद (2/ 154) (874).

सुनन नसई (2/ 231) (1145).

सुनन इब्ने माजह (2/ 64) (897).

मुसनद अह़मद (38/ 392) (23375).

अधिक (1)

نيل الأوطار (2/ 305).