محرمات استهان بها كثير من الناس
कुछ हराम कार्य, जिन्हें बहुत-से लोगों ने असान समझ लिया है
कुछ हराम कार्य, जिन्हें बहुत-से लोगों ने असान समझ लिया है
शैख़ मुहम्मद सालेह अलमुनज्जिद
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं अति कृपाशील है।
भूमिका
सारी प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए है। हम उसी की तारीफ़ करते हैं, उसी से मदद तलब करते हैं और उसी से माफ़ी चाहते हैं। हम अपने नफ़्सों (आत्माओं) की बुराइयों से तथा अपने बुरे कर्मों से उसकी शरण माँगते हैं। जिसे अल्लाह हिदायत दे उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं है और जिसे वह गुमराह करे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे तथा रसूल हैं।
अम्मा बाद (तत्पश्चात) :
अल्लाह तआला ने जिन चीज़ों को फ़र्ज़ किया है उनको नष्ट करना जायज़ नहीं है,
जो सीमाएँ निर्धारित कर दी हैं उनका उल्लंघन करना हराम है,
और जिन चीज़ों को हराम किया है उनमें संलिप्त होना नाजायज़ है । अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
"अल्लाह ने अपनी किताब में जो हलाल किया वह हलाल है, तथा जो हराम किया वह हराम है और जिससे ख़ामोशी अख़्तियार की है वह आफ़ियह है। अतः तुम अल्लाह की प्रदान की हुई आफ़ियत को क़बूल करो। बेशक अल्लाह तआला भूलने वाला नहीं है।"
फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "और तेरा रब भूलने वाला नहीं है।" इस हदीस को हाकिम (2/375) ने रिवायत किया है और अलबानी ने ग़ायत अल-मराम पृष्ठ 14 में हसन कहा है। दरअसल हराम की गई चीज़ें उच्च एवं महान अल्लाह की सीमाएँ हैं :
"और जिसने अल्लाह की सीमाओं को लाँघा उसने अपने नफ़्स (आत्मा) पर ज़ुल्म किया।"
[सूरा अत-तलाक़, आयत संख्या : 1] अल्लाह ने सीमाओं का उल्लंघन करने वालों तथा उसके द्वारा हराम क़रार दिए गए कामों को करने वालों को धमकाया है। कहा है : "और जो अल्लाह तथा उसके रसूल की अवज्ञा तथा उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा, उसे नरक में प्रवेश देगा। जिसमें वह सदावासी होगा और उसी के लिए अपमानकारी यातना है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 14] हराम चीज़ों से दूर रहना तथा उनसे परहेज़ करना ज़रूरी है । अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "मैंने तुम्हें जिन चीज़ों से रोका उनसे रुक जाओ और जिनके करने का आदेश दिया उन्हें शक्ति अनुसार करो।" इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने किताब अस-फ़ज़ाइल में रिवायत किया है। देखिए हदीस संख्या : 130। प्रकाशन, अब्दुल बाक़ी। देखा यह जाता है कि कुछ इच्छाओं के पीछे भागने वाले, कम बुद्धि और अल्प ज्ञान वाले लोग जब हराम वस्तुओं के बारे में बार बार सुनते हैं, तो तंगी महसूस करते हैं और ग़ुस्से से कहते हैं : हर चीज़ हराम है! तुमने सारी चीज़ों को हराम कर दिया है! हमारे जीवन को नीरस बना दिया है, जीवन यात्रा को कठिन कर दिया है और हमारे दिलों को तंग कर दिया है। हराम! हराम! हराम! इसके सिवाय तुम्हारे पास कुछ और है ही नहीं! हालाँकि इस्लाम एक आसान धर्म है, इसमें बड़ी उदारता है और अल्लाह क्षमाशील एवं कृपावन है। हम उनकी इन बातों का जवाब देते हुए कहेंगे : बेशक अल्लाह जो चाहे आदेश करता है, उसके आदेश पर किसी को उंगली उठाने का अधिकार नहीं है, वह हिकमत वाला और हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है। वह जिसे चाहे हलाल बताए और जिसे चाहे हराम बताए। हमारी बंदगी का तक़ाज़ा यह है कि हम अल्लाह के आदेश से संतुष्ट रहें और उसके आगे सिर झुका दें। अल्लाह के आदेश ज्ञान, हिकमत तथा न्याय पर आधारित होते हैं। उन्हें तथ्यहीन एवं खेल-तमाशा समझने बड़ी भूल होगी। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "आपके पालनहार की बात सत्य तथा न्याय की है, कोई उसकी बात (नियम) बदल नहीं सकता और वह सब कुछ सुनने-जानने वाला है।" [सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 115] अल्लाह ने हमें वह सिद्धांत भी बता दिया है, जिसपर किसी चीज़ का हलाल एवं हराम होना निर्भर करता है। उसने कहा है : "वह उनके लिए स्वच्छ चीज़ों को ह़लाल (वैध) तथा मलिन चीज़ों को ह़राम (अवैध) करेंगे।" [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 157] अतः स्वच्छ चीज़ें हलाल और मलिन चीज़ें हराम हैं। साथ ही किसी चीज़ को हलाल तथा हराम करने का अधिकार केवल अल्लाह को है। अतः अगर किसी ने अपने लिए इस अधिकार का दावा किया अथवा दूसरे के लिए इसका इक़रार किया तो वह काफ़िर होगा और इस्लाम के दायरे से बाहर निकल जाएगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "क्या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी हैं, जिन्होंने उनके लिए कोई ऐसा धार्मिक नियम बना दिया है, जिसकी अनुमति अल्लाह ने नहीं दी है?" [सूरा अश-शूरा, आयत संख्या : 21] इसके अतिरिक्त इस बाद का भी ध्यान रहे कि हलाल व हराम में किताब व सुन्नत के जानकार लोगों के सिवाय किसी का ज़ुबान खोलना जायज़ नहीं है। बिना उचित जानकारी के हलाल तथा हराम क़रार देने वालों को बड़ी सख़्त धमकी दी गई है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और मत कहो -उस झूठ के कारण, जो तुम्हारी ज़ुबानों पर आ जाए- कि यह हलाल (वैध) है और यह ह़राम (अवैध) है, ताकि अल्लाह पर मिथ्यारोप करो।" [सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 116] जो चीज़ें निश्चित रूप से हराम हैं, उनका उल्लेख क़ुरआन एवं हदीस में मौजूद है। जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप उनसे कहें कि आओ, मैं तुम्हें (आयतें) पढ़कर सुना दूँ कि तुमपर, तुम्हारे पालनहार ने क्या ह़राम (अवैध) किया है? वो ये है कि किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ, माता-पिता के साथ उपकार करो और अपनी संतानों को निर्धनता के भय से वध न करो।" [सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 151] इसी तरह हदीस में भी बहुत सारी हराम चीज़ों का उल्लेख किया गया है। जैसा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "अल्लाह ने शराब, मुर्दार, सूअर तथा मूर्तियों के बेचने को हराम क़रार दिया।" सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3486। देखिए : सहीह अबू दाऊद, हदीस संख्या : 977 इसी तरह आपका फ़रमान है : "जब अल्लाह किसी चीज़ को हराम करता है, तो उसके मूल्य को भी हराम करता है ।" सुनन दारक़ुतनी : 3/7। यह हदीस सहीह है। कुछ आयतें एवं हदीसें ऐसे भी हैं, जिनमें किसी विशेष प्रकार की हराम चीज़ों का उल्लेख है। जैसे कि खाद्य सामग्रियों के बारे में अल्लाह ने कहा है : "तुमपर हराम (अवैध) कर दिया गया है मुर्दार, (बहता हुआ) रक्त, सूअर का मांस, जिसपर अल्लाह से अन्य का नाम पुकारा गया हो, जो श्वास रोध और आघात के कारण, गिरकर और दूसरे के सींग मारने से मरा हो, जिसे हिंसक पशु ने खा लिया हो, -परन्तु इनमें से जिसे तुम वध (ज़िब्ह) कर लो- जिसे थान पर वध किया गया हो और यह कि पाँसे द्वारा अपना भाग निकालो।" [सूरा अल-माइदा, आयत संख्या : 3] उन स्त्रियों का उल्लेख करते हुए कहा है, जिनसे निकाह हराम है : "तुमपर ह़राम (अवैध) कर दी गई हैं; तुम्हारी माताएँ, तुम्हारी पुत्रियाँ, तुम्हारी बहनें, तुम्हारी फूफियाँ, तुम्हारी मोसियाँ, भतीजियाँ, भाँजियाँ, तुम्हारी वे माताएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो तथा दूध पीने से संबंधित बहनें, तुम्हारी पत्नियों की माताएँ, तुम्हारी पत्नियों की पुत्रियाँ जिनका पालन पोषण तुम्हारी गोद में हुआ हो और उन पत्नियों से तुमने संभोग किया हो, यदि उनसे संभोग न किया हो, तो तुमपर कोई दोष नहीं, तुम्हारे सगे पुत्रों की पत्नियाँ और यह कि तुम दो बहनों को एकत्र करो, परन्तु जो हो चुका। वास्तव में, अल्लाह अति क्षमाशील दयावान् है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 23] इसी तरह हराम कमाइयों का उल्लेख करते हुए कहा है : "अल्लाह ने व्यापार को ह़लाल (वैध) तथा ब्याज को हराम (अवैध) कर दिया है।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 275] अपने बंदों पर दयावान अल्लाह ने हमारे लिए इतनी अधिक संख्या में और इतने प्रकार की स्वच्छ चीज़ें हलाल की हैं, जो उनका शुमार संभव नहीं है। यही कारण है कि जायज़ चीज़ों का विवरण नहीं दिया है, क्योंकि उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है और उन्हें गिना नहीं जा सकता। अलबत्ता हराम चीज़ों की तफ़्सील बता दी है, क्योंकि वह सीमित हैं, ताकि हम उन्हें जानकर उनसे बचे रहें। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "उसने तुम्हारे लिए स्पष्ट कर दिया है, जिसे तुमपर ह़राम (अवैध) किया है, परन्तु जिस (वर्जित) के (खाने के पर) तुम विवश कर दिए जाओ" [सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 119] लेकिन हलाल चीज़ों को -अगर वह पाक हैं तो- संक्षिप्त रूप से उन्हें जायज़ क़रार दिया है। जैसा कि उसका फ़रमान है : "हे लोगो! धरती में जो ह़लाल (वैध) स्वच्छ चीज़ें हैं, उन्हें खाओ और शैतान की बताई राहों पर न चलो, वह तुम्हारा खुला शत्रु है।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 168] यह उसकी रहमत है कि उसने बुनयादी तौर पर चीज़ों को हलाल ठहराया है, जब तक कि उनके हराम होने की कोई दलील सामने न आ जाए। यह अपने बंदों पर उसकी कृपा एवं उसकी उदारता है। इसलिए हमें उसका आज्ञापालन, उसकी प्रशंसा एवं उसका शुक्र अदा करना चाहिए। कुछ लोगों के सामने जब हराम चीज़ें गिनाई जाती हैं और उनका विवरण पेश किया जाता है तो उनके दिल शरीयत के इन विधि-विधानों से कुंठित होने लगते हैं। यह उनके ईमान की कमज़ोरी तथा शरीयत की समझ की कमी का परिचायक है।
क्या यह लोग चाहते हैं कि उनके सामने हलाल चीज़ों को एक-एक करके बयान किया जाए, ताकि वह संतुष्ट हो जाएँ कि इस्लाम हक़ीक़त में आसान है ?
क्या यह लोग चाहते हैं कि स्वच्छ चीज़ों की लिस्ट उनके सामने पेश की जाए, ताकि वह निश्चिंत हो जाएँ कि शरीयत उनकी मज़े की ज़िंदगी में कोई तल्ख़ी नहीं घोलती ।
क्या ये चाहते हैं कि उनसे कहा जाए कि ज़बह किया गया ऊँट, गाय, भेड़, ख़रगोश, हिरण, पहाड़ी बकरा, मुर्ग़, कबूतर, बत्तख़, हंस, शुतुरमुर्ग़ इत्यादि का मांस और मरी हुई टिड्डी तथा मछली हलाल हैं?
सब्ज़ियाँ, तरकारियाँ, सारे ग़ल्ले और उपयोगी फल-फ्रूट हलाल हैं।
पानी, दूध, शहद, तेल तथा सिरका हलाल हैं।
नमक एवं मसाले (जैसे लौंग, मिर्च, ज़ीरा, तेजपत्ता आदी) हलाल हैं।
लकड़ी, लोहा, बालू, कंकरी, प्लास्टिक, काँच तथा रबर का प्रयोग हलाल है।
चौपायों, गाड़ियों, ट्रेनों, पानी जहाज़ों तथा हवाई जहाज़ों पर सवार होना हलाल है।
एयर कन्डीशन, फ्रीज, वाशिंग मशीन, ड्राई मशीन, चक्की, आटा गोंधने वाली मशीन, कूटने वाली मशीन, जूस मशीन और डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, हिसाब, अंतरिक्ष संबंधी विषयों का ज्ञान हासिल करना, निर्माण के सारे उपक्रण और पानी, पेट्रोल, खनीज पदार्थ निकालने तथा परिशोधन वाली मशीन और प्रिन्टिंग प्रेस एवं कम्पयूटर आदि हलाल हैं।
रूई, काटन, ऊन, पशम, जायज़ चमड़ा, नाइलोन और पालिस्टर इत्यादि का लिबास हलाल है।
शादी-ब्याह, क्रय विक्रय, किसी के देख-भाल की ज़िम्मेवारी और क़र्ज़ अदा करने की जिम्मेवारी किसी को सौंपना, किराया देना, और बढ़ई काम, लोहार का काम, मशीनों की मरम्मत तथा बकरी चराने आदि काम मूल रूप से हलाल हैं।
आप ही ज़रा सोचें कि अगर इसी तरह हम गिनाते जाएँ तो आख़िर कहाँ पहुँच कर रुकेंगे?
लोगों को क्या हो गया है? भला वे समझते क्यों नहीं हैं?
उनका दलील के तौर पर यह पेश करना कि "धर्म आसान है", एक बिल्कुल सही बात है, लेकिन इसका गलत अर्थ लिया गया है।
क्योंकि इस्लाम में आसानी का अर्थ लोगों की इच्छाओं और उनके मतों के अनुसार नहीं निकाला जाएगा, बल्कि शरीयत की शिक्षाओं के अनुसार लिया जाएगा।
“दीन आसान है” -और वह निःसंदेह आसान है- का बहाना बनाकर हराम काम करने और शरीयत की प्रगान की हुई रुख़्सतों (छूटों) पर अमल करने के दरमियान बड़ा अंतर है । शरीयत की रुख़्सतें जैसे सफ़र में दो नमाज़ का जमा करके (इकट्ठी) तथा चार रकात वाली नमाज़ों को दो-दो रकअ़त पढ़ना, और रोज़ा छोड़ना, घर में या कहीं और रुके हुए व्यक्ति का एक दिन एक रात और यात्री का तीन दिन तीन रात मोज़ों पर मसह करना, पानी के इस्तेमाल से ख़तरे का अंदेशा होने पर तयम्मुम करना, बारिश या बीमारी की वजह से दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ना, शादी का पैग़ाम देने वाले के लिए अजनबी औरत को देखना, क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करने के लिए ग़ुलाम आज़ाद करने, कपड़े पहनाने तथा खाना खिलाने में से किसी एक का चयन करना और मजबूरी में मुर्दा का खाना आदि अन्य रुख़्सतें और आसानियाँ जो शरीयत ने प्रदान की हैं। इसके अलावा मुसलमानों को जानना चाहिए कि हराम चीज़ों को हराम करने में बहुत सारी हिक्मतें हैं, जैसे : अल्लाह अपने बंदों को इन हराम की हुई चीज़ों के ज़रीए आज़माता है, ताकि देखे कि वे किस प्रकार का अमल करते हैं? इससे जन्नतियों तथा जहन्नमियों का अंतर सामने आता है, क्योंकि जहन्नमी लोग ऐसी शहवतों में डूबे होते हैं जिनसे जहन्नम घिरी हुई है। जबकि जन्नती लोग ऐसी अप्रिय चीज़ों पर सब्र करते हैं, जिनसे जन्नत घिरी हुई है ।
अगर यह आज़माइश न होती, तो आज्ञारापी और अवज्ञाकारी का अंतर सामने न आता।
ईमानदार लोग शरीयत के अनुपालन की मशक़्क़त को अज्र व सवाब की निगाह से देखते हैं और अल्लाह के आदेशों का पालन उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करते हैं, इसलिए उनके लिए इस मशक़्क़त को सहना आसान हो जाता है।
जबकि मुनाफ़िक़ लोग शरीयत के अनुपालन में होने वाली मशक़्क़त को कष्ट, वेदना एवं महरूमी की निगाह से देखते हैं, जिसकी वजह से अमल करना कठिन और आज्ञापालन मुश्किल हो जाता है।
फ़रमाबरदार लोग हराम चीज़ों को छोड़ते हुए एक विशेष प्रकार की मिठास का अनुभव करते हैं, क्योंकि जो अल्लाह के वास्ते कुछ छोड़ देता है तो अल्लाह तआला उसे इससे बेहतर प्रदान करता है और वह अपने दिल में ईमान की लज़्ज़त महसूस करता है।
इस किताब में पाठक को कुछ ऐसे हराम कार्य मिलेंगे, जिनका हराम होना साबित है। साथ ही क़ुरआन एवं हदीस से उनके हराम होने के प्रमाण भी मिल जाएँगे। हराम चीज़ों या उनके कुछ विशेष प्रकारों, जैसे बड़े गुनाहों, के बारे में कुछ उलेमा ने अलग से किताबें लिखी हैं। हराम वस्तुओं के विषय में लिखी गई महत्वपूर्ण पुस्तकों में से एक पुस्तक "तंबीह अल-ग़ाफ़िलीन अन आमाल अल-जाहिलीन" है, जिसे इब्न अल-ह्हास दिमश्क़ी ने लिखा है।
मेरी इस पुस्तक में उल्लिखित ये हराम कार्य वह हैं, जो समाज़ में आम हो चुके हैं और बहुत-से मुसलमानों के अंदर प्रचलित हैं। इन्हें बयान करने का मेरा उद्देश्य लोगों को वास्तविकता से अवगत करना और उनका शुभचिंतन है।
मैं अपने लिए और मुसलमान भाइयों के लिए अल्लाह से मार्गदर्शन, सुयोग और उसकी सीमाओं पर रुक जाने की शक्ति माँगता हूँ। वह हमें अवैध कार्यों एवं हर प्रकार की बुराई से बचाए। वही सबसे बेहतर हिफ़ाज़त करने वाला और सबसे बड़ा दयालु है।
किसी को अल्लाह का साझी बनाना : यह सबसे बड़ा हराम कार्य है। क्योंकि अबू बकरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तीन बार पूछा : "क्या मैं तुम्हें न बताऊँ कि सबसे बड़ा गुनाह क्या है?" सहाबा कहते हैं कि हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! अवश्य बताएँ! आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "किसी को अल्लाह का साझी बनाना।" सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम। देखें सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2511।
अल्लाह हर पाप क्षमा कर सकता है, लेकिन शिर्क नहीं। इसके लिए अलग से तौबा ज़रूरी है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह अल्लाह ये नहीं क्षमा करेगा कि उसका साझी बनाया जाये और उसके सिवा जिसे चाहे, क्षमा कर देगा।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 48]
शिर्क का एक प्रकार महा शिर्क है, जो इन्सान को इस्लाम के दायरे से बाहर कर देता तथा उसी के साथ मर जाए, तो उसे जहन्नम में हमेशा रहने का हक़दार बना देता है।
इस शिर्क के कुछ उदाहरण, जो बहुत-से मुस्लिम देशों में पाए जाते हैं, इस प्रकार हैं :
क़ब्रों की पूजा करना, मरे हुए औलिया के बारे में यह अक़ीदा रखना कि वे ज़रूरतें पूरी तथा परेशानियाँ दूर कर सकते हैं और उनसे मदद माँगना एवं फ़रियाद करना।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो।" [सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 23] इसी तरह दुनिया से रुख्सत हो चुके नबियों एवं सदाचारी बंदों को सिफ़ारिश या कठिनाईयाँ दूर करने के लिए पुकारना। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "या वो है, जो व्याकुल की प्रार्थना सुनता है, जब उसे पुकारे और दूर करता है दुःख तथा तुम्हें बनाता है धरती का अधिकारी, क्या कोई पूज्य है अल्लाह के साथ? तुम बहुत कम ही शिक्षा ग्रहण करते हो।" [सूरा अन-नम्ल, आयत संख्या : 62] जबकि कुछ लोग उठते-बैठते, चलते-फिरते पीर या वली का नाम जपना अपनी आदत बना लेते हैं। जब भी किसी संकट, मुसीबत या परेशानी में पड़ते हैं तो कोई “हे मुहम्मद!” कहकर पुकारता है, कोई “हे अली!” कहता है, कोई “हे हुसैन!” कहता है, कोई “हे बदवी!” कहता है, कोई “हे जीलानी!” कहता है, कोई “हे शाज़ली!” कहता है, कोई “हे रिफ़ाई!” कहता है, कोई अल-ऐद्रूस को पुकारता है, कोई सय्यिदा ज़ैनब को पुकारता है, कोई इब्न-ए-अल्वान को पुकारता है। जबकि अल्लाह तआला फ़रमाता है : "वास्तव में, अल्लाह के सिवा जिनको तुम पुकारते हो, वे तुम्हारे जैसे ही (अल्लाह के) दास हैं। अतः तुम उनसे प्रार्थना करो, फिर वे तुम्हारी प्रार्थना का उत्तर दें, यदि उनके बारे में तुम्हारे विचार सत्य हैं?" [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 194] कुछ क़ब्रों के उपासक क़ब्रों का तवाफ़ करते हैं, उनके विभिन्न भागों का स्पर्श करते हैं, उनपर हाथ फेरते हैं, उनकी चौखटों को चूमते हैं, वहाँ की मिट्टी में अपने चेहरों को रगड़ते हैं, उनको देखते ही उनको सजदा करते हैं, उनके सामने पूर्ण विनम्रता के साथ खड़े होकर अपनी हाजतें और ज़रूरतें रखते हैं। उदाहरणस्वरूप उनसे स्वास्थ्य लाभ, संतान की प्राप्ति तथा मुश्किल आसान करने का मुतालबा करते हैं। कभी-कभी तो क़ब्र में दफ़न व्यक्ति से यहाँ तक कह देते हैं कि हे मेरे स्वामी! मैं आपके पास दूर दराज़ से आया हूँ। आप मुझे महरूम न करें। जबकि अल्लाह तआला फ़रमाता है : "तथा उससे अधिक बहका हुआ कौन हो सकता है, जो अल्लाह के सिवा उसे पुकारता हो, जो उसकी प्रार्थना स्वीकार न कर सके, प्रलय तक और वे उसकी प्रार्थना से निश्चेत (अनजान्) हों?" [सूरा अल-अहक़ाफ़, आयत संख्या : 5] और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है :
"जिसकी मौत इस हालत में हुई कि वह को अल्लाह का समकक्ष बनाकर पुकारता हो, वह जहन्नम में जाएगा।"
सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्हुल बारी : 8/176। कुछ लोग क़ब्रों के पास अपने सर मूँड़ाते हैं। कुछ लोग अपने पास "मशाहिद के हज के कार्य" अथवा इस तरह के अन्य नामों की किताबें रखते हैं और मशाहिद से उनकी मुराद क़ब्रें तथा औलिया के मज़ार हुआ करते हैं। कुछ लोग अक़ीदा रखते हैं कि औलिया ब्रह्मांड के संचालिन में अपनी भूमिका निभाते हैं तथा किसी की हानि एवं लाभ कर सकते हैं। हालाँकि अल्लाह तआला फ़रमाता है : "और यदि अल्लाह आपको कोई दुःख पहुँचाना चाहे, तो उसके सिवा कोई उसे दूर करने वाला नहीं और यदि आपको कोई भलाई पहुँचाना चाहे, तो कोई उसकी भलाई को रोकने वाला नहीं।" [सूरा यूनुस, आयत संख्या : 107]
इसी तरह शिर्क के अंदर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए मन्नत मानन भी दाख़िल है। जैसा कि लोग क़ब्र में सोए हुए लोगों के नाम पर चिराग देने एवं उनकी क़ब्र पर रोशनी करने की मन्नत मानते हैं।
शिर्के अकबर का एक उदाहरण ग़ैरुल्लाह के लिए ज़बह करना भी है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तो तुम अपने पालनहार के लिए नमाज़ पढ़ो तथा क़ुरबानी करो।" [सूरा अल-कौसर, आयत संख्या : 2] यानी अल्लाह के लिए और अल्लाह के नाम पर ज़बह कीजिए। और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "अल्लाह की धिक्कार हो ऐसे व्यक्ति पर, जो अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए जानवर ज़बह करे।" सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1978, प्रकाशन अब्दुल बाक़ी। कभी-कभी ज़बह किए गए जानवर में दो हराम चीज़ें जमा हो जाती हैं : एक ग़ैरुल्लाह के लिए ज़बह करना और दूसरा ग़ैरुल्लाह के नाम पर ज़बह करना। इन दोनों ही चीज़ों से उस जानवर का मांस खाना मना हो जाता है। अज्ञानता काल के जानवर ज़बह करने की सूरतों में से एक सूरत, जो हमारे इस ज़माने में भी प्रचलित है, जिन्नात के लिए जानवर ज़बह करना है। यानी अज्ञानता काल में लोग घर ख़रीदते या बनाते समय अथवा कुआँ खोदते समय उसके पास या उसकी चौखट पर जिन्नात की तकलीफ़ से बचने के लिए जानवर ज़बह करते थे। देखिए : तैसीर अल-अज़ीज़ अल-हमीद, पृष्ठ : 158 शिर्के-ए-अकबर का एक बहुत बड़ा एवं प्रचलित उदाहरण है, अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों को हलाल करना अथवा अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ों को हराम करना है, या यह अक़ीदा रखना कि इसका अधिकार अल्लाह के अलावा किसी और को भी है, या फिर अपनी ख़ुशी से मानव रचित संविधानों के आधार पर चलने वाली अदालतों में जाना और अपने इस कृत्य को वैध जानना। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने इस बड़े कुफ़्र का उल्लेख अपने इस कथन में किया है : "उन्होंने अपने विद्वानों और धर्माचारियों (संतों) को अल्लाह के सिवा पूज्य बना लिया।" [सूरा अत-तौबा, आयत संख्या : 31] अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह आयत तिलावत फ़रमाते हुए सुना तो कहा : वह लोग तो उनकी इबादत नहीं करते थे? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “हाँ, लेकिन वे, अल्लाह ने जिसे हराम किया उसे हलाल कहते तो यह लोग भी उसे हलाल समझने लगते, और अल्लाह ने जिसे हलाल किया उसे हराम कहते तो यह लोग भी उसे हराम समझने लगते। यही तो है उनकी इबादत।” बैहक़ी की अस-सुनन अल-कुबरा : 10/116। यह हदीस सुनन तिरमिज़ी में भी हदीस संख्या : 3095 के तहत आई है और अलबानी ने इसे ग़ायत अल-मराम, पृष्ठ 19 में हसन क़रार दिया है । जबकि अल्लाह तआला ने मुश्रिकों की हालत बयान करते हुए फ़रमाया है : "और न जिसे, अल्लाह और उसके रसूल ने हराम (वर्जित) किया है, उसे हराम (वर्जित) समझते हैं, न सत्धर्म को अपना धर्म बनाते हैं।" [सूरा अत-तौबा, आयत संख्या : 29] इसी तरह अल्लाह ने कहा है : "(हे नबी!) उनसे कहो : क्या तुमने इसपर विचार किया है कि अल्लाह ने तुम्हारे लिए, जो जीविका उतारी है, तुमने उसमें से कुछ को ह़राम (अवैध) बना दिया है और कुछ को ह़लाल (वैध) , तो कहो कि क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी अनुमति दी है? अथवा तुम अल्लाह पर आरोप लगा रहे हो?" सूरा यूनुस, आयत संख्या : 59
शिर्क के जो रूप हमारे यहाँ प्रचलित हैं, उनमें जादू, कहानत तथा भविष्यवाणी आदि भी सम्मिलित हैं।
जादू कुफ़्र है और सात हलाक करने वाले बड़े गुनाहों में से एक है। वह नुक़्सान ही पहुँचाता है, फ़ायदा नहीं करता। अल्लाह ने उसे सीखने के बारे में कहा है : “और वे ऐसी चीज़ें सीखते हैं जो उनकी हानि करती हैं और लाभ नहीं पहुँचातीं।” सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 102 दूसरे स्थान में कहा है : “और जादूगर कहीं से भी आए कामयाब नहीं होता।” सूरा ताहा, आयत संख्या : 69 जादू में संलिप्त व्यक्ति काफ़िर है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "दरअसल सुलैमान ने कभी कुफ़्र (जादू) नहीं किया, परन्तु कुफ़्र तो शैतानों ने किया, जो लोगों को जादू सिखा रहे थे तथा वे उन बातों का (अनुसरण करने लगे) जो बाबिल (नगर) के दो फ़रिश्तों; हारूत और मारूत पर उतारी गईं, जबकि वे दोनों किसी को जादू नहीं सिखाते, जब तक यह न कह देते कि हम केवल एक परीक्षा हैं, अतः, तू कुफ़्र में न पड़।" सूरा अल-बक़रा : 102 जादूगर के बारे में (शरई) हुक्म यह है कि उसे क़त्ल कर दिया जाए और उसकी कमाई हराम तथा अपवित्र है। अज्ञान, अत्याचारी और कमज़ोर ईमान के लोग दूसरों पर अन्याय करने या उनसे इंतिक़ाम लेने के लिए जादूगरों के पास जाते हैं। कुछ लोग जादू ख़त्म कराने (छुड़ाने) के लिए भी जादूगरों की शरण लेकर यह हराम काम कर बैठते हैं। हालाँकि उनको अल्लाह की शरण लेनी चाहिए और रोग से मुक्ति के लिए उसकी वाणी, जैसे क़ुरआन की उन आयतों का सहारा लेना चाहिए, जिनमें अल्लाह की शरण माँगी गई है। रही बात काहिन एवं भविष्यवाणी करने वाले की, तो दोनों परोक्ष की बात जानने के दावे के माघ्यम से महान अल्लाह का कुफ़्र करते हैं। क्योंकि परोक्ष का ज्ञान अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं रखता।
इनमें से बहुत से लोग आम लोगों के भोलेपन का फ़ायदा उठाकर उनका धन निगल जाते हैं। इस तरह के लोग लोगों को धोखा देने के लिए रेत में लकीरें खींचना, कौड़ी चलाना, हथेली की लकीरें या प्याला पढ़ना या फिर शीशा और दर्पण देखना आदि विधियों का प्रयोग करते हैं।
यह लोग अगर एक सच कहते हैं तो निन्यानवे झूट कहते हैं। लेकिन धोखे में पड़े हुए लोग केवल उसी एक सच का ज़िक्र करते हैं, जो कभी-कभी इन झूठे लोगों के मुँह से निकल जाता है। वे इनके पास जाकर भविष्य जानने का प्रयास करते हैं, शादी-विवाह एवं व्यापार में सब कुछ ठीक रहेगा या खराब, यह पता करने की कोशिश करते हैं और खोई हुई चीज़ों को खोजने का प्रयास करते हैं। जबकि उनके पास जाने वाला व्यक्ति यदि उनकी बातों को सच जानता है, तो वह काफिर है और इस्लाम के दायरे से बाहर हो जाता है। इसकी दलील नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान है : "जो किसी काहिन या ज्योतिषी (गुमशुदा चीज़ों का पता बताने वाले) के पास गया और उसकी कही हुई बातों को सच माना, उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी गई शरीयत के प्रति अविश्वास व्यक्त किया।" मुसनद अहमद (2/429) सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 5939 परन्तु जो व्यक्ति उनके पास अनुभव आदि के लिए जाए और इस बात की पुष्टि न करे कि वे परोक्ष का ज्ञान रखते हैं, वह काफ़िर तो नहीं है, लेकिन उसकी चालीस दिन की नमाज़ क़बूल नहीं होंती। इसकी दलील नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान है : "जो व्यक्ति किसी खोई हुई वस्तु की सूचना देने वाले के पास जाए और उससे किसी वस्तु के बारे में पूछे, उसकी चालीस दिन की नमाज़ कबूल नहीं होती।” सहीह मुस्लिम : 4/1751 लेकिन, इसका यह मतलब नहीं है कि उसे नमाज़ नहीं पढ़नी है। उसे नमाज़ भी पढ़नी है और तौबा भी करनी है। संसार में घटने वाली घटनाओं एवं लोगों के जीवन पर सितारों एवं ग्रहों के प्रभाव का अक़ीदा रखना : ज़ैद बिन ख़ालिद अल-जुहनी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं : रात में बारिश होने के बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें लेकर फ़ज्र की नमाज़ अदा की। सलाम फेरने के बाद लोगों की ओर रुख़ करके फ़रमाया : “क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे रब ने क्या कहा?” लोगों ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं। (आपने कहा कि अल्लाह ने) फ़रमाया : “मेरे बंदों में से कुछ ने मेरे प्रति विश्वास रखते हुए और कुछ ने अविश्वास व्यक्त करते हुए सुबह की। जिसने कहा कि अल्लाह की कृपा व रहमत से हमपर बारिश हुई, वह मुझपर विश्वास रखने वाला और ग्रहों के प्रति अविश्वास जताने वाला है और जिसने कहा कि अमुक-अमुक ग्रहों के कारण हमपर बारिश हुई, वह मेरे प्रति अविश्वास व्यक्त करने वाला और ग्रहों पर विश्वास रखने वाला है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 2/333 इसी के अंतर्गत पत्रिकाओं तथा अख़बारों में बताई गई भाग्यराशियों का आश्रय लेना भी आता है। यदि आदमी उनमें लिखे ग्रहों एवं कक्षों के प्रभावों के सही होने का अक़ीदा रखे, तो वह मुश्रिक है। और अगर उन्हें मनोरंजन के लिए पढ़े, तो वह अवज्ञाकारी एवं पापी है। क्योंकि शिर्क द्वारा मनोरंजन जायज़ नहीं है। इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि शैतान उसके दिल में इसका विश्वास डाल दे, जो शिर्क का माध्यम बन जाए। शिर्क का एक रूप उन चीज़ों में लाभ का अक़ीदा रखना भी है, जिनमें सर्वशक्तिमान स्रष्टा में यह गुण नहीं रखा है। जैसे कि कुछ लोग तावीज़-गंडों, शिर्क पर आधारित मंत्रों, सीपियों, घोंघों अथवा धातु से बने कड़ों के प्रति विश्वास रखते हैं। इन सब कार्यों के लिए उनका आधार काहिन एवं जादूगर का इशारा अथवा रीति-रिवाज आदि है। यह लोग इन चीज़ों को अपने गले में अथवा अपने बच्चों के शरीर में नज़र बद से बचने के लिए बाँधते हैं। कभी इन चीज़ों को स्वयं अपने शरीर में बाँधते हैं या अपनी गाड़ियों और अपने घरों में लटकाते हैं। अथवा तरह तरह के नगीने वाली अंगूठियाँ पहनते हैं और अक़ीदा रखते हैं कि यह आपदाओं को दूर करते या टालते हैं। हालाँकि इस तरह की बातें अल्लाह पर भरोसा के विपरीत हैं और इनसे इन्सान की कमज़ोरी और बढ़ जाती है। साथ ही इनसे इलाज, हराम चीज़ों द्वारा इलाज के दायरे में आता है। एक बात और भी है। इन तावीज़ों में अकसर स्पष्ट शिर्क, जिन्नात एवं शैतानों से फ़रियाद, अस्पष्ट चित्र अथवा कुछ ऐसी चीज़ें लिखी होती हैं, जो समझ में नहीं आतीं। कुछ तावीज़ बनाने वाले तो क़ुरआन की आयतें लिखते हैं और उनके साथ अन्य शिर्क पर आधारित बातें मिला देते हैं। जबकि कुछ लोग क़ुरआन की आयतें गंदी वस्तुओं या माहवारी के रक्त से भी लिखते हैं। इस प्रकार की सारी चीज़ों को लटकाना या बाँधना हराम है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिस ने तावीज़ लटकाई उसने शिर्क किया।” मुसनद अहमद : 4/156। यह हदीस सिलसिला सहीहा में भी है। देखिए हदीस संख्या : 492 इस तरह का काम करने वाला अगर अक़ीदा रखे कि यह चीज़ें अल्लाह के बग़ैर नफ़ा या नुक़्सान पहुँचाती हैं, तो बड़ा शिर्क करने वाला होगा। और अगर अक़ीदा रखे कि यह चीज़ें नफ़ा या नुक़्सान के माध्यम हैं, तो वह छोटा शिर्क करने वाला होगा तथा यह माध्यम पर आधारित शिर्क में दाख़िल होगा।
इबादत में दिखावा :
नेक अमल की एक शर्त यह है कि उसमें दिखावा न पाया जाए और उसे सुन्नत के अनुसार अदा किया जाए। जो व्यक्ति लोगों को दिखाने के लिए अमल करे, वह मुश्रिक है और उसका अमल नष्ट हो जाता है। जैसे कोई लोगों को दिखाने के लिए नमाज़ पढ़े। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "वास्तव में, मुनाफ़िक (द्विधावादी) अल्लाह को धोखा दे रहे हैं, जबकी, वही उन्हें धोखे में डाल रहा है और जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते हैं, तो आलसी होकर खड़े होते हैं, वे लोगों को दिखाते हैं और अल्लाह का स्मरण थोड़ा ही करते हैं। " सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 142 इसी तरह अगर इस ग़र्ज़ से अमल करे कि उसकी ख़बर फैल जाए और लोग आपस में उसकी चर्चा करें तो वह शिर्क में पड़ जाएगा। ऐसा करने वाले के बारे में बड़ी सख़्त धमकी आई है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित हदीस में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो शोहरत का तालिब होगा, अल्लाह उसकी बंदगी लोगों को सुना देगा और जो लोगों को दिखाने के लिए अच्छे कर्म करेगा अल्लाह उसकी रियाकारी लोगों को दिखा देगा।” सहीह मुस्लिम : 4/2289। जिसने कोई इबादत अल्लाह और लोगों दोनों के लिए की, उसका अमल नष्ट हो जाता है। एक हदीस-ए-क़ुदसी में आया है : “मैं तमाम साझेदारों से अधिक, साझेदारी से बेनियाज़ हूँ। जिसने कोई काम किया और उसमें किसी को मेरा साझी ठहराया, मैं उसको और उसके साझी बनाने के कार्य को छोड़ देता हूँ।” सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2985 जिसने अल्लाह के लिए अमल शुरू किया, फिर उसके अमल में दिखावा आने लगा, तो यदि वह उसे बुरा जाने और हटाने का प्रयास करे, तो उसका अमल सही होगा। लेकिन अगर उसका दिल उससे संतुष्ट हो, तो अधिकांश विद्वानों के मत के अनुसार उसका अमल नष्ट हो जाएगा।
अपशगुन लेना
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तो जब उनपर सम्पन्नता आती, तो कहते कि हम इसके योग्य हैं और जब अकाल पड़ता, तो मूसा और उसके साथियों से बुरा सगुन लेते।" सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 131। अरब के लोग जब कोई काम, जैसे यात्रा आदि आरंभ करने का इरादा करते, तो एक चिड़या पकड़ कर उसे उड़ा देते। अगर वह दाईं ओर जाती, तो इससे अच्छा शगुन लेते और काम शुरू कर देते। लेकिन अगर बाईं ओर जाती, तो इससे बुरा शगुन लेते और इरादा तोड़ देते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस काम का हुक्म बयान करते हुए कहा है : “अपशगुन लेना शिर्क है।” मुसनद अहमद : 1/389। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए हदीस संख्या : 3955 इस एकेश्वरवाद विरोधी अवैध अक़ीदे के अंदर महीनों का अपशगुन लेना भी शामिल है। जैसे सफ़र महीने में शादी ब्याह न करना। इसी तरह दिनों का अपशगुन लेना, मसलन यह समझना कि प्रत्येक माह का बुधवार हमेशा अशुभ होता है, भी इसमें सम्मिलित है। या फिर संख्याओं, जैसे संख्या 13 को अशुभ मानना। या फिर कुछ नामों या शारीरिक अपंगता वाले व्यक्ति को अशुश मानना। मसलन दुकान खोलने जा रहा था कि रास्ते में किसी काना व्यक्ति को देखा और इसे अशुभ मानकर वापस हो गया। यह सब के सब हराम हैं तथा शिर्क के अंतर्गत आते हैं। इस प्रकार के लोगों से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने बरी होने की घोषणा की है। इम्रान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “वह व्यक्ति हममें से नहीं जो अपशगुन ले या जिसके लिए अपशगुन लिया जाए, तथा जो कहानत करे और जिसके लिए कहानत की जाए (मुझे लगता है कि आगे कहा है :) या जो जादू करे या जिसके लिए जादू किया जाए।” तबरानी की अल-कबीर : 18/162। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 5435। जिसने इनमें से कोई काम किया, उसका कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) वही है, जो अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा की इस हदीस में उल्लिखित है। वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिस व्यक्ति को अपशगुन ने किसी आवश्यक कार्य से रोक दिया, उसने शिर्क किया।” लोगों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल ! इसका कफ़्फ़ारा क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “वह यह दुआ पढ़े : ऐ अल्लाह! तेरी भलाई के अलावा और कोई भलाई नहीं है और लाभ एवं हानि का मालिक केवल तू है तथा तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।” मुसनद अहमद : 2/220। देखिए अस-सिलसिला अस-सहीहा, हदीस संख्या : 1065। अपशगुन लेना इन्सान की फ़ितरत में दाख़िल है। चाहे कम हो या ज़्यादा।
इसका सबसे बेहतर इलाज है सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह पर भरोसा रखना।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : “हममें से हर एक के दिल में इस प्रकार की कोई न कोई बात ज़रूर आती है, लेकिन अल्लाह अपने ऊपर भरोसे की बरकत से इसे दूर कर देता है।” सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3910। देखिए अस-सिलसिला अस-सहीहा, हदीस संख्या : 430
अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की क़सम खाना :
अल्लाह अपनी जिस सृष्टि की चाहे क़सम खाता है। लेकिन सृष्टि के लिए अल्लाह के अलावा किसी और की क़सम खाना जायज़ नहीं है। इसके बावजूद भी बहुत-से लोग ग़ैरुल्लाह की क़सम खाते रहते हैं, हालाँकि क़सम एक प्रकार के सम्मान एवं भक्ति का विषय है। अतः अल्लाह के अलावा किसी और की क़सम खाना उचित नहीं है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सुनो! अल्लाह तुम्हें अपने बाप-दादों की क़सम खाने से मना फ़रमाता है। (अतः) जो क़सम खाना चाहता है वह अल्लाह की क़सम खाए या ख़ामोश रहे।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/530। इसी तरह अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ही से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने ग़ैरुल्लाह की क़सम खाई उसने शिर्क किया।” मुसनद अहमद : 2/125। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6204। इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने और ने कहा है : “जिसने अमानत की क़सम खाई वह हममें से नहीं है।” सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3253। देखिए : अस-सिलसिला अस-सहीहा, हदीस संख्या : 94 अतः काबा, अमानत, प्रतिष्ठा, सहायता, अमुक की बरकत, अमुक के जीवन, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रतिष्ठा, वली की प्रतिष्ठा, माता-पिता तथा बच्चों के सिर इत्यादि की क़सम खाना जायज़ नहीं है। सह सब के सब हराम काम हैं। अगर किसी से इनमें से किसी की क़सम खा ली, तो उसका कफ़्फ़ारा यह है कि वह “ ला इलाह इल्लल्लाह ” पढ़े। एक सहीह हदीस में आया है : “जो व्यक्ति क़सम खाते हुए यह कहे कि लात व उज़्ज़ा की क़सम, तो उसे चाहिए कि वह, ला इलाह इल्लल्लाह, पढ़े।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/536। इस तरह के और भी बहुत से हराम तथा शिर्कसूचक शब्द हैं, जो कुछ मुसलमानों की ज़ुबानों पर चढ़े हुए हैं। जैसे, मैं अल्लाह की और आपकी शरण चाहता हूँ, मैं अल्लाह पर और आपपर भरोसा करता हूँ, यह अल्लाह की ओर से तथा आपकी ओर से है, अल्लाह और आपके अलावा मेरा कोई सहारा नहीं है, मेरे लिए आकाश में अल्लाह और ज़मीन पर आप हैं, अगर अल्लाह और अमुक न होता, मैं इस्लाम से बरी हूँ, हाय ज़माने की नाकामी तथा असफलता! और इस प्रकार का हर वाक्य जिसमें ज़माने को बुरा-भला कहा जाए। जैसे यह बुरा ज़माना है, यह अशुभ समय है, तथा ज़माना बेवफ़ा है और इस तरह के दूसरे वाक्य, क्योंकि ज़माने को बुरा-भला कहना दरअसल उसके स्रष्टा यानी अल्लाह को बुरा-भला कहना है। इसी तरह तबीयत ने चाहा कहना और हर वह नाम रखना जिसका अर्थ ग़ैरुल्लाह का बंदा हो। जैसे, अब्दुल मसीह (मसीह का बंदा), अब्दुन नबी (नबी का बंदा), अब्दुर रसूल (रसूल का बंदा) और अब्दुल हुसैन (हुसैन का बंदा)। इसी तरह कुछ नई परिभाषाएँ एवं वाक्य, जो एकेश्वरवाद विरोधी हैं। जैसे इस्लामी समाजवाद, इस्लामी गणतंत्र, अवाम की इच्छा अल्लाह की इच्छा है, धर्म अल्लाह का है और देश सब का है, अरब राष्ट्रीयता के नाम पर तथा क्रांति के नाम पर। इसी तरह कुछ और अवैध शब्द हैं : किसी इन्सान को शहंशाह (राजाधिराज) या इस जैसी कोई और उपाधि जैसे "क़ाज़ी अल-क़ुज़ात" आदि देना। किसी काफ़िर तथा मुनाफ़िक़ के लिए सय्यिद (सरदार) एवं इस अर्थ को कोई और शब्द बोलना। चाहे अरबी भाषा में हो या किसी अन्य भाषा में। “यदि” शब्द प्रयोग करना, जो नाराज़गी, शर्मिंदगी और हसरत को व्यक्त करता है तथा शैतान के कार्य का द्वार खोल देता है। इसी तरह यह कहना कि “ऐ अल्लाह! अगर तू चाहे तो मुझे माफ़ कर दे।” इस विषय में अधिक जानकारी के लिए शैख़ बक्र अबू ज़ैद की किताब “मोजमु अल-मनाही अल-लफ़ज़िय्यह” देखें।
मुनाफ़िक़ों या अवज्ञाकारियों के साथ, उनसे क़रीब होने के लिए अथवा उनको क़रीब करने के लिए उठना-बैठना :
बहुत-से ऐसे लोग, जिनके दिलों में ईमान अच्छी तरह बैठ नहीं सका है, कुछ अवज्ञाकारियों एवं पापियों के साथ उठते-बैठते हैं। बल्कि कभी-कभी तो ऐसे लोगों के साथ भी उठना-बैठना रखते हैं, जो अल्लाह की शरीयत पर कटाक्ष करते हैं तथा उसके धर्म एवं उसके औलिया का मज़ाक़ उड़ाते हैं। निःसंदेह यह ऐसा हराम काम है, जो अक़ीदे की जड़ों का खोखला करता है। अल्लाह तआला ने कहा है : "और जब आप, उन लोगों को देखें, जो हमारी आयतों में दोष निकालते हों, तो उनसे विमुख हो जायेँ, यहाँ तक कि वे किसी दूसरी बात में लग जायें और यदि आपको शैतान भुला दे, तो याद आ जाने के पश्चात् अत्याचारी लोगों के साथ न बैठें।" सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 68। अतः उनके साथ उठना-बैठना जायज़ नहीं है, यधपि क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हों, या उनका व्यवहार सुंदर तथा उनकी ज़बान मीठी ही क्यों न हो। हाँ, जो व्यक्ति उनको सत्य के मार्ग की ओर बुलाने के लिए, उनके असत्य का खंडन करने के लिए या उनको उनकी कमी से अवगत करने के लिए उनके साथ बैठे, तो उसे इसकी अनुमति है। लेकिन उनके कार्य एवं व्यवहार से संतुष्ट और खामोश रहने की अनुमति नहीं है। अल्लाह तआला ने कहा है : "यदि तुम उनसे प्रसन्न हो गये, तब भी अल्लाह उल्लंघनकारी लोगों से प्रसन्न नहीं होगा।" सूरा अत-तौबा, आयत संख्या : 96।
नमाज़ इतमीनान से न पढ़ना :
नमाज़ में चोरी एक बहुत बड़ी चोरी है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “सबसे बुरा चोर वह है, जो नमाज़ में चोरी करता है।” सहाब ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! नमाज़ में चोरी कैसे करता है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : “नमाज़ में चोरी यह है कि आदमी पूरे तौर पर रुकू एवं सजदा न करे।” मुसनद अहमद : 5/310। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए हदीस संख्या : 997। नमाज़ इतमीनान से न पढ़ना, रुकू और सजदा में पीठ को सीधा न रखना, रुकू से उठने के बाद पूरे तौर पर खड़ा न होना और दो सजदों के दरमियान बराबर न बैठना, यह सब ऐसी चीज़ें हैं जो मशहूर हैं तथा अकसर नमाज़ियों में देखी जाती हैं।
ऐसे नमाज़ियों से शायद ही कोई मस्जिद ख़ाली हो।
हालाँकि इतमीनान नमाज़ का एक रुक्न है। उसके बग़ैर नमाज़ सही नहीं होती। अतः मामला बड़ा संगीन है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “आदमी की नमाज़ उस वक़्त तक सही नहीं होती, जब तक कि रुकू और सज्दे में अपनी पीठ सीधी न कर ले।” सुनन अबू दाऊद : 1/533। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए हदीस संख्या : 7224।
निःसंदेह यह एक गलत काम है और इसका करने वाला सज़ा तथा धमकी का हक़दार है।
अबू अब्दुल्लाह अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा को नमाज़ पढ़ाने के बाद उनके एक गिरोह के साथ बैठ गए। इसी दौरान एक आदमी (मस्जिद में) दाख़िल हुआ, नमाज़ पढ़ने के लिए खड़ा हुआ, रुकू करने लगा और सजदा करते समय चोंच मारने लगा। यह देख अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तुम इसे देख रहे हो? इस हालत में जिसकी मौत होगी, वह मुहम्मद की मिल्लत से बाहर होकर मरेगा। यह अपनी नमाज़ में वैसे चोंच मार रहा है, जैसे कौआ ख़ून में चोंच मारता है। जो व्यक्ति रुकू करे और अपने सजदे में चोंच मारे, उसकी मिसाल उस भूखे की सी है, जो एक ही दो खजूर खाता हो, भला इससे उसकी भूख कहाँ मिटने वाली?” सहीह इब्न-ए-ख़ुज़ैमा : 1/332। देखिए अलबानी की सिफ़त सलात अन-नबी : 131। इसी तरह ज़ैद बिन वह्ब से रिवायत है, वह कहते हैं : हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु ने एक आदमी को अपूर्ण (ग़ैर मुकम्मल) रुकू तथा सजदा करते हुए देखकर फ़रमाया : “तुमने नमाज़ नहीं पढ़ी। अगर इस हालत में तुम्हारी मौत हो गई, तो उस फ़ितरत पर नहीं होगी, जिसपर अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को पैदा फ़रमाया है।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 2/274। नमाज़, इतमीनान से न पढ़ने वाले को जब इसका हुक्म मालूम हो, तो वह उस वक़्त की नमाज़ दोहरा ले, जिसका वक़्त उस समय हो और पीछे जो गलतियाँ हो चुकी हैं, उनके लिए अल्लाह के सामने तौबा करे। उसे पिछली नमाज़ें दोहरानी नहीं हैं। इसकी पुष्टि हदीस से इस वाक्य से होती है : “वापस जाकर दोबारा नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी नहीं है।”
नमाज़ में निरर्थक काम तथा ज़्यादा हरकत करना :
यह एक ऐसी आफ़त है, जिससे शायद ही कोई नमाज़ी सुरक्षित हो।
क्योंकि लोग अल्लाह के इस आदेश का पालन नहीं करते : "और अल्लाह तआला के लिए बा अदब (नम्रता पूर्वक) खड़े रहा करो।" सूरा बक़रा आयत संख्या : 238।
और न अल्लाह के इस कथन को समझते हैं :
"सफल हो गये ईमान वाले। जो अपनी नमाज़ों में विनीत रहने वाले हैं।" सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्या : 1-2। जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नमाज़ की हालत में सजदे की जगह की मिट्टी को बराबर करने के बारे में पूछा गया, तो फ़रमाया : “नमाज़ की हालत में तुम कुछ न छुओ। लेकिन यदि आवश्यक हो, तो एक बार कंकड़ बराबर कर लो।” सुनन अबू दाऊद : 1/581। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : 7452। उलेमा ने कहा है कि बग़ैर ज़रूरत के लगातार ज़्यादा हरकत नमाज़ को नष्ट कर देती है। ऐसे में नमाज़ के दौरान फ़ुज़ूल हरकत करने वालों का क्या होगा, जो अल्लाह के सामने खड़े होकर कभी अपनी घड़ी की तरफ़ देखते हैं, कपड़े ठीक करते हैं, नाक में उंगली डालते हैं या दाएँ-बाएँ तथा आसमान की ओर ताकते हैं। वे इस बात से नहीं डरते कि उनकी निगाहें उचक ली जाएँ और शैतान उनकी नमाज़ ले उड़े।
मुक़तदी का जान-बूझकर अपने इमाम से पहले नमाज़ का कोई काम करना :
जल्दबाज़ी इन्सान के स्वभाव में है। उच्च एवं महान अल्लाह तआला ने कहा है : “और इन्सान है ही बड़ा जल्दबाज़।” सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 11। इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “सुकून अल्लाह की ओर से तथा जल्दबाज़ी शैतान की तरफ़ से होती है।” बैहक़ी की अस-सुनन अल-कुबरा : 10/104। यह हदीस अस-सिलसिला अस-सहीहा में भी है। देखिए हदीस संख्या : 1795। आदमी जमात में खड़ा होकर अकसर यह देखता होगा कि उसके दाएँ बाएँ नमाज़ पढ़ने वाले बहुत-से लोग और कभी कभी ख़ुद भी रुकू या सजदे में इमाम से आगे बढ़ जाता है। प्रायः ऐसा एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने की तकबीरों में, यहाँ तक कि सलाम फेरने में भी देखने को मिलता है। यह एक ऐसा अमल है, जो बहुतों के नज़दीक कोई महत्व नहीं रखता, लेकिन उसके बारे में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बड़ी सख़्त चेतावनी दी है। आपने कहा है : “क्या वह व्यक्ति जो इमाम से पहले अपना सर उठाता है, इस बात से नहीं डरता कि अल्लाह उसके सर को गधे के सर में बदल दे।” सहीह मुस्लिम : 1/320-321।
नमाज़ी को नमाज़ के लिए आते हुए अगर शांति एवं सज्जनता के साथ आने का आदेश है, तो भला स्वयं नमाज़ के दौरान उसका क्या हाल होना चाहिए?
कभी-कभी कुछ लोग इमाम से आगे बढ़ने और उससे पीछे रह जाने को अलग-अलग से समझ नहीं पाते। ऐसे लोगों को फ़क़ीहों का बताया हुआ यह नियम याद रखना चाहिए कि मुक़तदी को उस समय हरकत में आना चाहिए, जब इमाम की तकबीर समाप्त हो जाए। अर्थात इमाम जब अल्लाहु अकबर का “र” कह चुके, तो मुक़तदी हरकत शुरू करे। न उससे पहले, न उसके बाद। इस तरह समस्या दूर हो जाएगी। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम इस बात का पूरा ख़याल रखते थे कि आपसे आगे न बढ़ें।
बरा बिन आज़िब नामी एक सहाबी करते हैं :
“सहाबा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे नमाज़ पढ़ते थे। जब आप रुकू से अपना सर उठाते, तो मैं किसी को उस वक़्त तक अपनी पीठ झुकाते हुए न देखता, जब तक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी पेशानी ज़मीन पर न रख लेते। इसके बाद ही पीछे के लोग सजदे में जाते।”
सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 474।
जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्र ज़्यादा हो गई और आपकी हरकत में कुछ धीमापन आ गया, तो आपने अपने पीछे नमाज़ पढ़ने वालों को सचेत करते हुए फ़रमाया :
“ऐ लोगो! मेरा शरीर भारी हो गया है। अतः तुम रुकू एवं सजदा में मुझसे पहले न जाया करो।”
बैहक़ी : 2/93। अलबानी ने इसे इरवा अल-ग़लील 2/290 में हसन कहा है। इमाम को चाहिए कि वह नमाज़ के दौरान तकबीर (अल्लाहु अकबर कहने) में सुन्नत पर अमल करे। तकबीर का उल्लेख अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित इस हदीस में हुआ है : “अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ के लिए खड़े होते तो तकबीर कहते। फिर जब रुकू करते तो तकबीर कहते। फिर जब सजदे के लिए झुकते तो तकबीर कहते। फिर जब सजदे से सर उठाते तो तकबीर कहते। फिर जब सजदा करते तो तकबीर कहते। फिर जब सजदे से सर उठाते तो तकबीर कहते। फिर अपनी पूरी नमाज़ में ऐसा ही करते, यहाँ तक कि नमाज़ पूरी फ़रमाते। दूसरी रकात के तशह्हुद के बाद उठते हुए भी तकबीर कहते।” सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 756।
अगर इमाम अपनी हरकत के साथ तकबीर कहे और मुक़तदी इससे पहले उल्लेखित नियम की पाबंदी करे, तो नमाज़ की जमात का दृश्य बड़ा ही सुंदर होगा।
प्याज़, लहसुन या कोई बदबू वाली चीज़ खाकर मस्जिद में आना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे आदम के पुत्रो! प्रत्येक मस्जिद के पास (नमाज़ के समय) अपनी शोभा धारण करो।" सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 31। जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो लहसुन या प्याज़ खाए वह हमसे अलग रहे।" या आपने फ़रमाया : "वह हमारी मस्जिद से अलग रहे और अपने घर में बैठा रहे।" सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 2/339। जबकि मुस्लिम की एक रिवायत में है : “जो प्याज़, लहसुन या लीक (प्याज़ जैसा पौधा) खाए, वह हमारी मस्जिद से क़रीब न हो, क्योंकि जिन चीज़ों से आदम की संतान को कष्ट होता है, उन चीज़ों से फ़रिश्तों को भी कष्ट होता है।” सहीह मुस्लिम : 1/395। इसी तरह उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने जुमा के दिन लोगों को संबोधित करते हुए अपने संबोधन में कहा : “फिर ऐ लोगो ! तुम दो पौधे खाते हो, मैं समझता हूँ कि वह गंदे हैं। वह प्याज़ और लहसुन हैं। मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा कि अगर मस्जिद में किसी के मुँह से इनकी बदबू आती, तो आप उसे निकालने का आदेश देते और उसे बक़ी की ओर निकाल दिया जाता। अतः जो उसे खाना चाहे, वह उसे पकाकर उसकी बू ख़त्म कर दे।” सहीह मुस्लिम : 1/396।
इसी के अंतर्गत वह लोग भी आएँगे, जो अपने कामों से फ़ारिग़ होने के फ़ौरन बाद मस्जिदों में दाख़िल होते हैं और उनके बग़लों तथा मोज़ों से बदबू आती रहती है।
लेकिन इससे भी बदतर लोग वह धूम्रपान करने वाले हैं, जो धूम्रपान करके मस्जिदों में दाख़िल होते हैं और अल्लाह के बंदों यानी फ़रिश्तों तथा नमाज़ियों को तकलीफ़ देते हैं।
व्यभिचार :
चूँकि इस्लामी विधान के मूल लक्ष्यों एवं उद्देश्यों में इसमत की सुरक्षा एवं नस्ल की सुरक्षा शामिल हैं, इसलिए उसमें व्यभिचार का हराम किया गया है। उच्च एवं अल्लाह ने कहा है : "और व्यभिचार के समीप भी न जाओ, वास्तव में, वह निर्लज्जा तथा बुरी रीति है।" सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 32। बल्कि शरीयत ने पर्दा करने तथा निगाहें नीची रखने का आदेश देकर और अजनबी स्त्री के साथ एकांत में रहने आदि को हराम करके व्यभिचार के सारे माध्यमों तथा रास्तों को बंद कर दिया है। व्यभिचारी अगर विवाहित हो, तो उसको सबसे सख़्त तथा कठिन सज़ा दी जाएगी। उसे पत्थर मार-मारकर मार दिया जाएगा, ताकि अपने किए का मज़ा चख ले और उसके शरीर का हर अंग उसी तरह तकलीफ़ महसूस करे, जिस तरह हराम काम से तृप्ति भोग किया था। लेकिन अगर व्यभिचारी अविवाहित हो, तो उसे सौ कोड़े लगाए जाएँगे, जो इस्लामी दंड विधि में कोड़े की सबसे अधिक संख्या है। इसके अतिरिक्त दंड के समय मुसलामनों की एक अच्छी-खासी संख्या की उपस्थिति, अपने नगर से दूर कर दिए जाने तथा पूरे एक वर्ष तक अपराध स्थल से बाहर कर दिए जाने का जो अपमान है, वह अलग है। जबकि व्यभिचारी एवं व्यभिचारिणी को बरज़ख़ (मरने के वक़्त से दोबारा उठने तक का ज़माना) में जो सज़ा मिलेगी, वह इस प्रकार है : इस प्रकार के लोग एक ऐसे तन्नूर में नंगे पड़े होंगे, जिसका ऊपरी हिस्सा तंग और निचला हिस्सा कुशादा होगा। उसके नीचे आग जल रही होगी। जब उस तन्नूर में आग भड़काई जाएगी, तो वे इस ज़ोर से चिल्लाएँगे और ऊपर आ जाएँगे कि मानो निकल गए हों। फिर जब आग बुझ जाएगी तो उसी में दोबारा लौट जाएँगे। क़यामत तक उनके साथ यही होता रहेगा। व्यभिचार की जघन्यता उस समय और बढ़ जाती है, जब आयु अधिक होने, क़ब्र से क़रीब पहुँचने और अल्लाह की तरफ़ से मोहलत पाने के बावजूद आदमी इसमें संलिप्त हो। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तीन आदमी हैं, क़यामत के दिन न अल्लाह उनसे बात करेगा, न उनको पाक करेगा और न उनकी तरफ़ देखेगा, तथा उनके लिए दर्दनाक यातना होगी : बूढ़ा व्यभिचारी, झूठा बादशाह और अभिनानी निर्धन।” सहीह मुस्लिम : 1/102-103। सबसे निकृष्ट कमाई व्यभिचार की कमाई है। व्यभिचार को कमाई का ज़रिया बनाने वाली स्त्री उस समय दुआ के क़बूल होने से वंचित रहती है, जब आधी रात को आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं।
इस अर्थ की हदीस सहीह अल-जामे में हदीस संख्या : 2971 के तहत मौजूद है।
याद रहे कि ज़रूरत और मोहताजी कभी भी अल्लाह की हदों को पामाल करने का उचित शरई कारण नहीं बन सकती। पहले ज़माने में लोग कहते थे : आज़ाद औरत भूखी रहना गवारा कर लेगी, लेकिन दूध बेचकर नहीं खाएगी। ऐसे में भला वह अपनी शर्मगाह बेचकर कैसे खा सकती है?! लेकिन मौजूदा दौर में बदकारी के सारे दरवाज़े खोल दिए गए हैं, शैतान ने अपने तथा अपने चेलों के फ़रेब के ज़रीए उसका रास्ता आसान कर दिया है और सारे अवज्ञाकारी तथा पापी लोग उसपर चल पड़े हैं। जिसके नतीजा में बेपर्दगी और बेहयाई आम हो गई है, बदनिगाही हर ओर फैल चुकी है, स्त्री-पुरुष के मेलजोल को बुरा नहीं समझा जाता, अश्लील पत्र-पत्रिकाओं तथा बेहयाई वाली फ़िल्मों का प्रचलन है, पाप के नगरों की यात्रा बढ़ गई है, वेश्यावृत्ति का बाज़ार गर्म हो गया है, इज़्ज़त व आबरू की परवाह किसी को नहीं रही, और नाजायज़ बच्चों तथा भ्रूण हत्याओं की संख्या बढ़ गई है।
अतः ऐ अल्लाह! हम तुझसे तेरी रहमत, तेरी दया, तेरी पर्दापोशी और तेरी सुरक्षा की भीख माँगते हैं। बेहयाई तथा बदकारी से तू हमारी हिफ़ाज़त फ़रमा।
हमारे दिलों को पाक-पवित्र कर दे, हमारी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त फ़रमा और हमारे दरमियान तथा हराम के दरमियान मज़बूत आड़ और सशक्त पर्दा खड़ा कर दे।
समलैंगिकता :
लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम का अपराध यह था कि वह मर्दों से अपनी ख़्वाहिश पूरी करते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा लूत को (भेजा)। जब उसने अपनी जाति से कहाः तुम तो वह निर्लज्जा कर रहे हो, जो तुमसे पहले नहीं किया है किसी ने संसार वासियों में से। क्या तुम पुरुषों के पास जाते हो और डकैती करते हो तथा अपनी सभाओं में निर्लज्जा के कार्य करते हो?" सूरा अल-अनकबूत, आयत संख्या : 29। इस अपराध के निकृष्ट, जघन्य तथा खतरनाक होने के कारण अल्लाह ने उन्हें चार प्रकार की यातनाएँ दीं। एक साथ चार प्रकार की यातना उनके अलावा किसी और पर उतरी नहीं है। चार यातनाएँ यह हैं कि अल्लाह ने उनकी आँखों की रोशनी समाप्त कर दी, और उनकी बस्ती का ऊपर का भाग नीचे कर दिया, और उन पर कंकड़ीले पत्थरों की बारिश बरसाई जो तह पर तह थे तथा उन पर एक बड़ी तेज़ आवाज़ भेजी। इस्लामी शरीयत में, उलेमा के सबसे प्रबल मत अनुसार, पुरुष के साथ संभोग का दंड, संभोग करने वाले और जिसके साथ किया गया हो, दोनों को तलवार से मार देना है, यदि इसमें दोनों की इच्छा शामिल हो तो। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अगर तुम किसी को लूत की क़ौम जैसा कुकर्म करते हुए पाओ, तो करने तथा कराने वाले दोनों को क़त्ल कर दो।” मुसनद अहमद : 1/300। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 6565 में भी है।
मौजूदा दौर में अश्लीलता और बदकारी के कारण जो महामारियाँ तथा विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जैसे एड्स आदि आम हो चुकी हैं, जो हमारे पूर्वजों में नहीं थीं, उनसे अंदाज़ा होता है कि शरीयत में इस अपराध की इतनी सख्त सज़ा क्यों निर्धारित की गई है।
पत्नी का बिना किसी मान्य कारण के अपने पति के बिस्तर में जाने से मना करना :
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जब पति अपनी पत्नी को अपने बिस्तर पर बुलाए और वह आने से इनकार करे, जिसके कारण पति नाराज़ होकर रात गुज़ारे, तो फ़रिश्ते सुबह होने तक उसपर लानत भेजते रहते हैं।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 6/314। बहुत-सी स्त्रियाँ, जब पति-पत्नी में मतभेद हो जाता है, तो अपने पति को सहवास के अधिकार से वंचित करने पर उतर आती हैं, जिसके नतीजे में कई बड़ी-बड़ी ख़राबियाँ सामने आती हैं। मसलन पति व्यभिचार में संलिप्त हो जाता है। कभी-कभी इसका नुक़सान पत्नी ही को उठाना पड़ता है, क्योंकि पति एक और निकाह पर उतारू हो जाता है। अतः पत्नी को चाहिए कि जब पति सहवास की इच्छा प्रकट करे, तो फौरन उसकी बात मान ले। ताकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फ़रमान का अनुपालन हो जाए : "अगर पति अपनी पत्नी को अपने बिस्तर पर बुलाए, तो वह उसकी इच्छा पूरी करे, चाहे वह हौदा पर ही क्यों न हो।" देखिए : ज़वाइद अल-बज़्ज़ार : 2/181। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 547 में भी है।
इस हदीस में आए हुए अरबी शब्त “القتب” से मुराद हौदा है, जो ऊँट की पीठ में रखा जाका है और उसमें बैठा जाता है।
लेकिन यदि पत्नी बीमार, गर्भवती या किसी कष्ट में हो, तो पति को उसका ख़याल रखना चाहिए, ताकि दोनों में प्रेम बरक़रार रहे और अनबन की नौबत न आए।
पत्नी का बिना किसी उचित कारण के अपने पति से तलाक़ माँगना :
बहुत-सी पत्नियाँ छोटी-मोटी बातों पर अपने पतियों से फ़ौरन तलाक़ माँग लेती हैं। कभी-कभी यदि किसी स्त्री का पति उसे इच्छा अनुसार धन न दे, तो तलाक़ माँग बैठती हैं। कभी-कभी उसके कुछ बुरे रिश्तेदार और पड़ोसी उसे इसपर उकसाते हैं। कभी-कभी पत्नी अपने पति को ऐसी बातें कहकर चुनौती देती है, जो उसे ललकारने का काम करती हैं।
मसलन वह कहती है कि अगर तुम मर्द हो तो मुझे तलाक़ दे दो।
जबकि इस बात से सभी परिचित हैं कि तलाक़ के नतीजे में कई बुराइयाँ सामने आती हैं। जैसे परिवार बिखर जाता है और बच्चे तितर-बितर हो जाते हैं। कभी-कभी स्त्री उस समय पछताती है, जब पछताने का कोई फ़ायदा नहीं होता। ये तथा इस तरह की अन्य बातों से ज़ाहिर होता है कि शरीयत ने इस काम को क्यों हराम किया है? सौबान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिस स्त्री ने अपने पति से बिना किसी उचित कारण के तलाक़ माँगी, उसपर जन्नत की सुगंध तक हराम है।” मुसनद अहमद : 5/277। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 2703 में भी है। तथा उक़बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “ख़ुला लेने वाली तथा तलाक़ चाहने वाली स्त्रियाँ मुनाफ़िक़ हैं।” तबरानी की अल-कबीर : 17/339। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 1934। हाँ, अगर कोई शरई कारण हो, जैसे पति नमाज़ न पढ़ता हो, नशीली चीज़ें इस्तेमाल करता हो, पत्नी को किसी हराम काम पर मजबूर करता हो, उसे नाहक़ यातना देता हो या शरई अधिकारों से वंचित रखता हो और समझाने बुझाने का कोई लाभ न होता हो तथा सुधार के सारे प्रयास बेकार जाते हों, तो ऐसी स्थिति में पत्नी का अपने धर्म एवं आत्मा की सुरक्ष के लिए तलाक़ माँगना गलत नहीं है।
ज़िहार :
अज्ञानता काल की जो बातें इस उम्मत में फैली हुई हैं, उनमें से एक ज़िहार भी है। ज़िहार यह है कि पति अपनी पत्नी से कहे : तू मुझपर मेरी माँ की पीठ की तरह है या तू मुझपर मेरी बहन की तरह हराम है। या फिर इस तरह के कुछ और गंदे शब्दों का प्रयोग करे, जो शरीयत की नज़र में अप्रिय हैं और उनके अंदर स्त्री पर अत्याचार पाया जाता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने ज़िहार का ज़िक्र करते हुए कहा है : "तुम में से जो लोग अपनी पत्नियों से ज़िहार करते हैं, तो वे उनकी माँ नहीं हैं। उनकी माँ तो वे हैं, जिन्होंने उनहें जन्म दिया है और वे अप्रिय तथा झूठी बात बोलते हैं और वास्तव में अल्लाह माफ़ करने वाला, क्षमाशील है।" सूरा अल-मुजादला, आयत संख्या : 2। शरीयत ने इसका कफ़्फ़ारा बड़ा सख़्त रखा है, जो ग़लती से किसी की हत्या कर देने के कफ़्फ़ारे जैसा और रमज़ान महीने के दिन में संभोग करने के कफ़्फ़ारे के समान है। ज़िहार करने वाला जब तक कफ़्फ़ारा अदा न कर दे, तब तक उसके लिए अपनी पत्नी के पास जाना जायज़ नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और जो लोह अपनी पत्नियों से ज़िहार कर लेते हैं, फिर अपनी बात वापस लेना चाहते हैं, तो (उसका दण्ड) एक दास मुक्त करना है, इससे पूर्व कि एक-दूसरे को हाथ लगाएँ। इसी की तुम्हें शिक्षा दी जा रही है और अल्लाह उससे जो तुम करते हो, भली-भाँति सूचित है। फिर जो (दास) न पाए, तो दो महीने निरन्तर रोज़ा रखना है, इससे पूर्व की एक-दूसरे को हाथ लगाए। फिर जो सकत न रखे, तो साठ निर्धनों को भोजन कराना है। यह आदेश इसलिए है, ताकि तुम ईमान लाओ अल्लाह तथा उसके रसूल पर और यह अल्लाह की सीमाएँ हैं तथा काफ़िरों के लिए दुःखदायी यातना है।" [सूरा अल-मुजादला, आयत संख्या : 3-4]
माहवारी की हालत में संभोग करना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा वे आपसे मासिक धर्म के विषय में प्रश्न करते हैं। तो कह दें कि वह मलिनता है और उनके समीप भी न जाओ, जब तक पवित्र न हो जाएँ। फिर जब वे भली भाँति स्वच्छ हो जाएँ, तो उनके पास उसी प्रकार जाओ, जैसे अल्लाह ने तुम्हें आदेश दिया है। निश्चय अल्लाह तौबा करने वालों तथा पवित्र रहने वालों से प्रेम करता है।" सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 222। अतः पाकी के बाद जब तक ग़ुस्ल न कर ले, उससे संभोग करना हलाल नहीं है। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर जब वे भली भाँति स्वच्छ हो जाएँ, तो उनके पास उसी प्रकार जाओ, जैसे अल्लाह ने तुम्हें आदेश दिया है।" सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 222। इस गुनाह के घिनावना होने पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन दलालत करता है : "जिसने माहवारी की हालत में संभोग किया, किसी स्त्री के मलद्वार में सहवास किया या किसी काहिन (ज्योतिषी) के पास गया, उसने उस उन शिक्षाओं के प्रति अविश्वास जताया, जो मुहम्मद पर उतारी गई हैं।" सुनन तिर्मिज़ी : 1/243, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 5918 में भी है। यदि कोई व्यक्ति गलती से बिना इरादे के ऐसा करे, तो उसे गुनाह नहीं होगा। लेकिन यदि जान-बूझकर और सब कुछ जानते हुए भी ऐसा करे, तो कुछ विद्वानों के निकट, जो कफ़्फ़ारे वाली हदीस को सहीह मानते हैं, उसे कफ़्फ़ारा देना है। इसका कफ़्फ़ारा एक दीनार या आधा दीनार है। फिर इनमें से कुछ लोगों के निकट वह चाहे तो एक दीनार दे और चाहे तो आधा दीनार। उसके लिए दोनों विकल्प खुले हैं। जबकि कुछ लोगों का मत है कि यदि माहवारी के शुरू के दिनों में, जब रक्तस्राव बड़ी तेज़ी से होता है, संभोग करे, तो उसे एक दीनार देना है। लेकिन अगर अंतिम दिनों में, जब रक्तस्राव हल्का हो जाता है, संभोग करे या माहवारी के बाद स्नान से पहले संभोग कर ले, तो आधा दीनार देना है। एक दीनार आज के हिसाब से 254 ग्राम सोना है। अतः इतना सोना या उसका मूल्य सदक़ा कर देगा।
स्त्री के मलद्वार में संभोग करना :
कुछ ऐसे भी कमज़ोर ईमान वाले लोग हैं, जो अपनी पत्नी के मलद्वार में सहवास करने से नहीं बचते। जबकि यह कबीरा गुनाह है और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इसमें संलिप्त होने वाले पर लानत फ़रमाई है। और अबू-हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “उस व्यक्ति पर लानत है, जो किसी स्त्री के मलद्वार में संभोग करे।” मुसनद अहमद : 2/479। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5865 में भी है। बल्कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यहाँ तक कहा है : "जिसने माहवारी की हालत में संभोग किया, किसी स्त्री के मलद्वार में सहवास किया या किसी काहिन (ज्योतिषी) के पास गया, उसने उस उन शिक्षाओं के प्रति अविश्वास जताया, जो मुहम्मद पर उतारी गई हैं।"
सुनन तिर्मिज़ी : 1/243। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 5918 में भी है।
हालाँकि बहुत-सी स्त्रियाँ, जो स्वच्छ आचरण की मालिक हैं, इससे इनकार करती हैं, मगर कुछ पति बात न मानने पर तलाक़ देने की धमकी दे डालते हैं। जबकि कुछ लोग अपनी पत्नियों को, जो शरीयत की जानकारी रखने वालों से पूछने से शर्माती हैं, इस धोखे में रखते हैं कि उनका यह कार्य हलाल है। कभी-कभी वे दलील के तौर पर यह आयत भी पेश कर देते हैं : “तुम्हारी बीवियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं। अतः तुम अपनी खेतियों में जिस तरह चाहो, आओ।” सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 223। हालाँकि यह बात सर्वविदित है कि सुन्नत क़ुरआन की व्याख्या करती है और उसमें है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि यदि पति अपनी पत्नी के जननांग में सहवास करता है, तो उसे यह अनुमति है कि चाहे तो आगे से आए और चाहे तो पीछे से। जबकि यह बात से किसी से छिपी हुई नहीं है कि मलद्वार जननांग नहीं है।
इस महा पाप के कुछ कारण इस प्रकार हैं :
स्वच्छ वैवाहिक जीवन में अज्ञानता काल से चली आ रही गंदगियों तथा अनैतिक एवं अवैध कार्यों के साथ
या अश्लील फ़िल्मों के नैतिकता एवं शिष्टता से परे दृश्यों से भरे हुए ज़ेहन के साथ प्रवेश करना। इसमें कहीं कोई किन्तु-परन्तु नहीं है कि यह कृत्य हराम हैं। चाहे दोनों पक्षों की रज़ामंदी से ही क्यों न हो। क्योंकि हराम पर उभय पक्ष की सहमति उसे हलाल नहीं कर सकती।
पत्नियों के बीच न्याय न करना :
अल्लाह ने अपनी पवित्र किताब क़ुरआन में हमें जिन बातों की वसीयत की है, उनमें से एक पत्नियों के बीच न्याय करना भी है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और यदि तुम अपनी पत्नियों के बीच न्याय करना चाहो, तो भी ऐसा कदापि नहीं कर सकोगे। अतः एक ही की ओर पूर्णतः झुक न जाओ और (शेष को) बीच में लटकी हुई न छोड़ दो और यदि (अपने व्यवहार में) सुधार रखो और (अल्लाह से) डरते रहो, तो निःसंदेह अल्लाह अति क्षमाशील दयावन् है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 129] वांछित न्याय का मतलब यह है कि रात गुज़ारने में दोनों के बीच न्याय किया जाए और खिलाने-पिलाने तथा पहनाने आदि में हर एक को उसका अधिकार दिया जाए। दिल के प्रेम में न्याय वांछित नहीं है। क्योंकि यह किसी इन्सान के वश की बात नहीं है। कुछ लोगों को हम देखते हैं कि जब उनके पास एक से अधिक पत्नियाँ होती हैं, तो किसी एक की ओर झुक जाते हैं और दूसरी की खबर भी नहीं लेते। एक के पास अधिक रात गुज़ारते हैं या उसपर खर्च अधिक करते हैं और दूसरी को यूँ ही छोड़ देते हैं। जबकि ऐसा करना हराम है। ऐसा करने वाला व्यक्ति क़यामत के दिन उस अवस्था में आएगा जिसका ज़िक्र एक हदीस में आया है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिसकी दो बीवियाँ हों और वह उन दोनों में से किसी एक की तरफ़ झुकाव रखे, तो वह क़यामत के दिन इस हाल में आएगा कि उसका एक हिस्सा झुका हुआ होगा।” सुनन अबू दाऊद : 2/601। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए हदीस संख्या : 6491।
पराई स्त्री के साथ एकांत में रहना :
शैतान लोगों को फ़ित्ने में डालने और हराम काम में लगाने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। यही कारण है कि पवित्र अल्लाह ने हमें सावधान करते हुए कहा है : "हे ईमान वालो! शैतान के पद्चिह्नों पर न चलो और जो उसके पदचिह्नों पर चलेगा, तो वह अश्लील कार्य तथा बुराई का ही आदेश देगा।" [सूरा अन-नूर : 21] दरअसल शैतान आदम की संतान के रगों में रक्त की तरह दौड़ता है। वह लोगों को अश्लीलत का शिकार करने के लिए जो रास्ते चुनता है, उनमें से एक किसी पराई स्त्री के साथ एकांत में रहना है। इसी लिए शरीअ़त ने इस रास्ते को बंद कर दिया है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक हदीस में है : “जब भी कोई आदमी किसी स्त्री के साथ एकांत में होता है, उन दोनों के साथ तीसरा शैतान होता है।” तिर्मिज़ी : 3/474। देखिए : मिश्कात अल-मसाबीह, हदीस संख्या : 3118। जबकि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “आज के बाद कोई मर्द किसी स्त्री के पास उसके शौहर की अनुपस्थिति में न जाए, मगर यह कि उसके साथ एक या दो आदमी हों।” सहीह मुस्लिम : 4/1711। अतः किसी मर्द के लिए किसी पराई स्त्री के साथ घर में, या कमरे में या गाड़ी में अकेले रहना जायज़ नहीं है। जैसे भाई की पत्नी के साथ अथवा नौकरानी के साथ या किसी बीमार ख़ातून का डॉक्टर के साथ एकांत में रहना इत्यादि। बहुत-से लोग इस मामले में अपने पर या दूसरों पर भरोसा करते हुए सुस्ती से काम लेते हैं, जिसके कारण व्यभिचार की राहें खुल जाती हैं। फलस्वरूप वंश में मिश्रण एवं हराम बच्चों की त्रास्दी सामने आती है।
पराई स्त्री से मुसाफ़हा करना :
यह उन विषयों में से है, जिनमें कुछ सामाजिक प्रथाएँ अल्लाह की शरीयत पर हावी दिखाई दे रही हैं और लोगों की अनैतिक आदतें और रीति-रिवाज अल्लाह के आदेश पर छा गए हैं। हाल यह है कि अगर आप इस प्रकार के लोगों को शरीयत का आदेश बताएँ और उसका प्रमाण सुनाएँ, तो आपको बुनियाद परस्त, कट्टरपंथी, पृथकतावादी और अच्छी बातों में संदेह पैदा करने वाला जैसी उपाधियाँ दे डालेंगे। हमारे समाज में चचेरी बहन, फुफेरी बहन, ममेरी बहन, ख़लेरी बहन, भाभी, चाची तथा मामी से मुसाफ़हा करना पानी पीने से भी ज़्यादा आसान हो गया है। हालाँकि अगर शरई दृष्टिकोण से इस मामले की भयावहता पर ग़ौर करते, तो ऐसा करने की हिम्मत न करते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “तुममें से किसी के सर में लोहे की सूई चुभोया जाना इस बात से बेहतर है कि वह किसी ऐसी स्त्री को छूए जो उसके लिए हलाल नहीं है।” तबरानी : 20/212। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या :49215 में भी है। इसमें कोई शक नहीं कि यह हाथ का व्यभिचार है, जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “दोनों आँखें व्यभिचार में संलिप्त होती हैं, दोनों हाथ व्यभिचार में संलिप्त होते हैं, दोनों पैर व्यभिचार में संलिप्त होते हैं और शर्मगाह व्यभिचार में संलिप्त होती है।” मुसनद अहमद : 1/412। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 4126 में भी है। क्या अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से भी ज़्यादा पाक किसी का दिल है?! लेकिन इसके बावजूद आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :
“मैं स्त्रियों से मुसाफ़हा नहीं करता।”
मुसनद अहमद : 6/357। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 2509 में भी है। एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “मैं स्त्रियों के हाथों को नहीं छूता।” तबरानी की अल-कबीर : 24/342। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 7054 में भी है। तथा देखिए : अल-इसाबा : 4/354। इसी तरह आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा से वर्णित है, वह कहती हैं : “अल्लाह की क़सम! अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हाथों ने कभी किसी स्त्री के हाथ को स्पर्श नहीं किया। आप उनसे बैअत भी ज़ुबान से लेते थे।” सहीह मुस्लिम : 3/1489। ऐसे में, उन लोगों को अल्लाह से डरना चाहिए, जो अपनी नेक बीवियों को तलाक़ की धमकी देते हैं, अगर वह उनके भाईयों से मुसाफ़हा न करें। यह भी जान लेना चाहिए कि हाथ पर कपड़े आदि रखकर उसके ऊपर से मुसाफ़हा करने से भी मामला हल्का नहीं होता। हर हालत में मुसाफ़हा हराम है।
घर से निकलते समय स्त्री का ख़ुशबू लगाना तथा खुशबू लगाकर पुरुषों के पास से गुज़रना :
यह बात भी हमारे समाज में आम हो गई है। जबकि अल्लाह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इससे सावधान करते हुए कहा है : “जो स्त्री ख़ुशबू लगाकर मर्दों के पास से गुज़रे, ताकि वे उसकी ख़ुशबू पाएँ, वह व्यभिचारिणी है।” मुसनद अहमद : 4/418। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 105। कुछ स्त्रियाँ अचेतना की शिकार हैं या इस चीज़ को कोई महत्व नहीं देतीं, जिसके कारण ड्राइवर, सामान बेचने वाले और स्कूल के गेट मैन के पास इस अवस्था में जाने से गुरेज़ नहीं करतीं। हालाँकि शरीअ़त ने ख़ुशबू लगाकर घर से निकलने का इरादा करने वाली स्त्री को जनाबत के ग़ुस्ल की तरह ग़ुस्ल करने का सख़्ती से आदेश दिया है, गरचे मस्जिद ही जाने का इरादा क्यों न करे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "जो स्त्री ख़ुशबू लगाकर मस्जिद की तरफ़ निकले, ताकि उसकी ख़ुशबू पाई जाए, तो उसकी नमाज़ उस वक़्त तक क़बूल नहीं होगी, जब तक कि वह जनाबत से ग़ुस्ल करने की तरह ग़ुस्ल न कर ले।” मुसनद अहमद : 2/444। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 2703। शादियों और स्त्रियों की सभाओं तथा अनुष्ठानों में निकलने से पहले धूप-धूनी और चंदन की लकड़ी का जो इस्तेमाल होता है, और मार्केटों में, कारों, बसों, ट्रेनों तथा फ़्लाइटों आदि में, पुरुष एवं स्त्री की मिश्रित भीड़ वाले स्थलों में, यहाँ तक कि रमज़ान की रातों में मस्जिदों के अंदर जो महक फैलाने वाली ख़ुशबूओं का व्यवहार होता है, उनके बारे में मत पूछिए, इसका शिकवा अल्लाह ही से है। हालाँकि शरीयत ने बताया कि स्त्रियों की ख़ुशबू ऐसे हो कि उसका रंग ज़ाहिर हो लेकिन उसकी महक दबी रहे। हम अल्लाह से कामना करते हैं कि वह हमसे नाराज़ न हो, नासमझ स्त्रियों एवं पुरुषों के कर्मों का नेक पुरुष एवं स्त्रियों का न दे और सबको सीधी तथा सच्ची राह दिखाए।
स्त्री का महरम के बिना यात्रा करना :
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वाली किसी महिला के लिए वैध नहीं है एक दिन और एक रात की दूरी की यात्रा इस अवस्था में करे कि उसके साथ उसका कोई महरम न हो।" सहीह मुस्लिम : 2/977। बग़ैर महरम के सफ़र करने से फ़ासिक़ों को साहस मिलता है और वे उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं। चूँकि स्त्री कमज़ोर होती है, इसलिए कभी-कभी हथियार डाल देती है या कम से कम उसकी इज़्ज़त आबरू को हानि पहुँचती है। उसके जहाज़ में सवार होने का मसला भी ऐसा ही है, अगरचे कोई महरम उसको बिठाकर आए और दूसरा रिसीव कर ले। क्योंकि बिठाकर आना और रिसीव कर लेना तो ठीक है, लेकिन उसके बाज़ू की सीट पर कौन बैठेगा?
फिर, यदि कोई अप्रिय घटना घटने के कारण फ़्लाइट किसी दूसरे एयरपोर्ट में उतर जाए या लेट होने के कारण सही समय पर न पहुँच सके, तो क्या होगा?!
बहुत-सी कहानियाँ मौजूद हैं।
महरम में चार शर्तें पाई जानी चाहिए। वह यह हैं : महरम मुसलमान हो, वयस्क हो, समझदार हो और पुरुष हो। अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वाली किसी महिला के लिए वैध नहीं है तीन दिन से अधिक दूरी की यात्रा इस अवस्था में करे कि उसके साथ उसका पिता, बेटा, पति, भाई या कोई अन्य महरम न हो।” सहीह मुस्लिम : 2/977।
जान बूझकर पराई स्त्री की ओर देखना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(हे नबी!) आप ईमान वालों से कहें कि अपनी आँखें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक पवित्र है। वास्तव में, अल्लाह सूचित है उससे, जो कुछ वे कर रहे हैं।" [सूरा अन-नूर : 30] जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “ ...आँख का ज़िना देखना है...” यानी उन चीज़ों की ओर देखना जिन्हें अल्लाह ने हराम किया है। सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/26 अलबत्ता शरई ज़रूरत के तहत देखना जायज़ है। जैसे शादी का पैग़ाम देने वाले का पैग़ाम दी जा रही स्त्री को और डॉक्टर का बीमार स्त्री को देखना। इसी तरह औरत का अजनबी मर्द को फ़ित्ना की निगाह से देखना भी हराम है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “और ईमान वालियों से कहें कि अपनी आँखें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें।” साथ ही किशोर और ख़ूबसूरत बच्चों को भी शहवत के साथ देखना हराम है। मर्दों का मर्दों की शर्मगाह की ओर देखना तथा औरतों का औरतों की शर्मगाह की ओर देखना हराम है। जिस शर्मगाह की ओर देखना हराम है, उसका छूना भी हराम है, अगरचे पर्दे के ऊपर से हो।
शैतान ने कुछ लोगों को धोखा में डाल रखा है कि
वह पत्र-पत्रिकाओं तथा फ़िल्मों में तस्वीरें देखते हैं और प्रमाण यह देखते हैं कि ये वास्तविक नहीं हैं। हालाँकि इसमें बिगाड़ तथा कामोत्तेजना का पक्ष बिल्कुल स्पष्ट है।
बेग़ैरती
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तीन प्रकार के लोगों पर अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है : शराब के आदी, माता-पिता के अवज्ञाकारी और ऐसा बेग़ैरत इन्सान पर जो अपने परिवार में बुराई देखकर ख़ामोश रहे।” मुसनद अहमद : 2/69। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 3047 में भी है।
हमारे इस युग में बेग़ैरती के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :
घर में बेटी या बीवी को अजनबी आदमी से टेलीफ़ोन पर बातचीत करते हुए देखकर ख़ामोश रहना, अपने घर की किसी औरत को किसी अजनबी मर्द के साथ तनहाई में देखते हुए भी कुछ न कहना, अपने घर की किसी औरत को किसी अजनबी मर्द जैसे ड्राईवर आदि के साथ गाड़ी में अकेली जाने देना,
शरई पर्दा के बग़ैर उन्हें बाहर निकलने की इजाज़त देना
कि वह जाने आने वालों की नज़रों की शिकार बनें और फ़ित्ना-फ़साद, बेहयाई व नग्नता फैलाने वाली पत्र-पत्रिकाएँ और फ़िल्में घर में लाना।
बच्चे का झूठ का सहारा लेकर अपने आपको अपने पिता के अलावा किसी और की ओर मंसूब करना तथा किसी व्यक्ति का अपने बच्चा का इनकार करना :
शरीयत में किसी मुसलमान का अपने आपको अपने पिता के अलावा किसी और की ओर मंसूब करना तथा अपने स्वयं उस जाति के साथ मिलाना जिसमें से वह नहीं है, जायज़ नहीं है। कुछ लोग भौतिक कारणों से यह काम करते हैं और सरकारी काग़ज़ात में झूटा नसब साबित करते हैं। जबकि कुछ लोग ऐसा अपने पिता से नफ़रत के कारण करते हैं, जिसने उन्हें बचपन में ही छोड़ दिया था। जबकि यह सब कुछ हराम है।
इसके कारण विभिन्न प्रकार की बड़ी-बड़ी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं,
जैसे महरम होने, निकाह तथा मीरास आदि के मसाइल।
सहीह बुख़ारी में
साद और अबू बकरा रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित हदीस में आया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
“जो व्यक्ति जानते हुए अपने पिता के अतिरिक्त किसी और के पिता होने का दावा करे, उसपर जन्नत हराम है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 8/45। हर वह विषय जिसमें नसब तथा वंश के साथ खिलवाड़ हो अथवा उसमें झूट का सहारा लिया जाए, हराम है। कुछ लोग अपनी पत्नी से झगड़ा होने पर बिना किसी प्रमाण के उसपर कुकर्म का लांछन लगा देते हैं और अपने बच्चे के बारे में कह देते हैं कि वह मेरा बच्चा नहीं है, हालाँकि उसका जन्म उसी के बिस्तर पर हुआ है। जबकि कुछ स्त्रियाँ भी अमानत में ख़यानत करते हुए कुकर्म के माध्यम से गर्भवती हो जाती हैं और अपने पति के वंश में उसे शामिल कर देती हैं जो हक़ीक़त में उसका अंग नहीं है। इसके बारे में हदीस में सख़्त सज़ा की बात आई है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि जब लिआ़न की आयत उतरी, तब उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना : “जिस स्त्री ने किसी जाति में उसे शामिल कराया, जो उसका अंग नहीं है, वह अल्लाह की रहमत की रत्ति भर भी हक़दार नहीं होगी तथा उसे अल्लाह अपनी जन्नत में हरगिज़ दाख़िल नहीं करेगा। तथा जिस व्यक्ति ने अपने बच्चे का इनकार किया, जो उसी की ओर ताक रहा था, उससे अल्लाह आड़ कर लेगा तथा उसे अगलों एवं पिछलों के सामने रुस्वा करेगा।” सुनन अबू दाऊद : 2/695। देखिए : मिश्कात अल-मसाबीह : 3316।
सूदख़ोरी :
अल्लाह ने अपनी किताब में सूदख़ोरों के अलावा किसी और के साथ युद्ध की घोषणा नहीं की है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे ईमान वालो! अल्लाह से डरो और जो ब्याज शेष रह गया है, उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमान रखने वाले हो तो। और यदि तुमने ऐसा नहीं किया, तो अल्लाह तथा उसके रसूल से युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।" [सूरा अल-बक़रा : 278-279] इस अपराध के अल्लाह के पास जघन्य होने के लिए यही धमकी काफ़ी है। व्यक्तिगत तथा राष्ट्रों के स्तरों पर नज़र रखने वाला महसूस कर सकता है कि सूदी कारोबार ने कितना विनाश किया है। उसके कारण दिवालियापन, आर्थिक मंदी, आर्थिक गतिरोध, क़र्ज़ अदा करने में अक्षमता, आर्थिक ह्रास, बेरोज़गारी दर में इज़ाफ़ा, बहुत-सी कम्पनियों तथा संस्थाओं का बैठ जाना, प्रतिदिन की खून पसीने की कमाई को कभी समाप्त न होने वाले सूद की अदायगी के लिए सूदखोर की झूली में डालना, तथा एक वर्गीकृत समाज विकसित करना, जिसमें धन का अधिकतर भाग मुट्ठी भर लोगों के पास होता है, इस विनाश के कुछ उदाहरण हैं। शायद यही उस युद्ध के कुछ मूर्त रूप हैं, जिसकी धमकी अल्लाह ने सूदी कारोबार करने वालों को दी है। सूदी मामला में शरीक हर व्यक्ति, चाहे लेने वाला हो या देने वाला, एजेंट हो या सहयोगी, सबके सब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़ुबानी लानती हैं। जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूद खाने वाले, खिलाने वाले, लिखने वाले तथा उसके दोनों गवाहों पर लानत की है।” आपने आगे कहा है : “यह सब बराबर हैं।” सहीह मुस्लिम : 3/1219।
अतः सूद के बारे में लिखने, उसके निर्धारण करने, खाता-पत्र नियंत्रित करने, उसे लेने तथा देने, उसके डिपोज़िट करने तथा उसकी निगरानी करने की नौकरी करना हराम है। सारांश यह है कि उसमें हिस्सा लेना तथा हाथ बटाना, चाहे किसी भी रूप में हो, हराम है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस महा पाप की निकृष्टता बयान करते हुए अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में फ़रमाया है : “सूद के तिहत्तर श्रेणियाँ हैं। उनमें सबसे कमतर श्रेणी आदमी का अपनी माँ से शादी करने की तरह है और सबसे उच्चतर श्रेणी मुस्लिम आदमी की इज़्ज़त व आबरू (पर हमला करना) है। ” मुस्तदरक हाकिम : 2/37। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 3533 में भी है। इसी तरह अब्दुल्लाह बिन हन्ज़ला रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “आदमी का जान-बूझ कर सूद का एक दिरहम खाना छत्तीस बार व्यभिचार करने से भी सख़्त है।” मुसनद अहमद : 5/225। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 3375। सूद हर हाल में हराम है। ऐसा नहीं है कि यदि धनी एवं निर्धन के बीच हो, तभी हराम है। कुछ लोगों का इस तरह का ख़याल गलत है। वह हर अवस्था में और हर व्यक्ति के लिए हराम है। फिर, इसी सूद के कारण न जाने कितने धनवान एवं और बड़े-बड़े व्यवसायी कंगाल हो गए। यह एक वास्तविकता है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। सूद का कम से कम नुक़सान यह है कि वह माल की बरकत को ख़त्म कर देता है, गरचे माल देखने में ज़्यादा लगे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “सूद चाहे (देखने में) ज़्यादा लगे, लेकिन उसका नतीजा माल में कमी है।” मुसतदरक हाकिम : 2/37। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 3542 में भी है। इस हदीस में प्रयुक्त अरबी शब्द 'قِلٍّ' का अर्थ धन की कमी है।
इसी तरह सूद, चाहे उसका दर उच्च हो या निम्न, ज़्यादा हो या कम, हर अवस्था में हाराम है।
सूदख़ोर क़यामत के दिन क़ब्र से उठाया जाएगा तो उस व्यक्ति की तरह खड़ा होगा जिसे शैतान ने छूकर उनमत्त कर दिया हो।
सूदी लेनदेन एक जघन्य अपराध तो है, लेकिन अल्लाह ने इससे तौबा की बात बताई है और उसका तरीक़ा भी बयान किया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने सूदख़ोरों से कहा है : "और यदि तुम तौबा (क्षमा याचना) कर लो, तो तुम्हारे लिए तुम्हारा मूलधन है। न तुम अत्याचार करो, न तुमपर अत्याचार किया जाए।" यही संपूर्ण न्याय है। इस बात की ज़रूरत है कि एक मोमिन के दिल में इस अपराध के प्रति नफ़रत और इसकी बुराई का एहसास हो। यहाँ तक कि जो लोग नष्ट हो जाने या चोरी हो जाने के डर से बाध्य होकर सूदी बैंकों में अपना धन रखते हैं, उन्हें इस बात का एहसास होना चाहिए कि वे बैंकों में धन मजबूरी की वजह से रख रहे हैं और यह मजबूरी की अवस्था में मुर्दार खाने की तरह या इससे भी बुरा है। साथ ही अल्लाह से क्षमा याचना करना चाहिए और जहाँ तक संभव हो इसका विकल्प ढूँढने का प्रयास करना चाहिए। उनके लिए बैंकों से सूद का मुतालबा करना जायज़ नहीं है, बल्कि अगर उनके अकाउंट में सूद के पैसे रख दिए जाएँ तो उनसे जान छुड़ाने के लिए किसी भी जायज़ रास्ते में ख़र्च कर देना चाहिए तथा इसमें सदक़ा की नीयत नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि अल्लाह पवित्र है और पवित्र चीज़ों को ही क़बूल फ़रमाता है। उनके लिए उस पैसे से किसी भी तरह का लाभ उठाना जायज़ नहीं है। न खाने में, न पीने में, न पहनने में, न सवारी में, न घर के प्रबंध में और न पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण में उसे खर्च कर सकते हैं। इसी तरह न ज़कात निकालने में, न टैक्स अदा करने में और न अत्याचार से बचाव के लिए उसका इस्तेमाल हो सकता है। अल्लाह की पकड़ के डर से किसी तरह उससे जान छुड़ा ली जाएगी।
सामान का ऐब छिपाना और बेचते समय न बताना :
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग़ल्ला के एक ढेर के पास से गुज़रते हुए उसमें अपना हाथ घुसाया, तो आपकी उँगलियों ने उसे भीगा हुआ पाया। इसपर आपने कहा : “ऐ ग़ल्ला के मालिक ! यह क्या है?” उसने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उसे बारिश पहुँच गई थी। यह उत्तर सुन आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : “तुमने उसे ऊपर क्यों नहीं कर दिया ताकि लोग देख लें। जिसने धोखा दिया, वह हममें से नहीं है।” सहीह मुस्लिम : 1/99। आज कल बहुत सारे सामान बेचने वाले लोग अल्लाह से नहीं डरते और उसका ऐब छिपाने के लिए उसपर स्टीकर लगा देते हैं, उसे कार्टून के बिल्कुल नीचे रख देते हैं या केमिकल आदि इस्तेमाल करते हैं, जिससे सामान अच्छी शक्ल में दिखता है अथवा शुरू में इंजन में मौजूद ऐब की आवाज़ ज़ाहिर नहीं होती। लेकिन जब कस्टमर उसे ले आता है तो बहुत जल्द ही ख़राब हो जाता है। जबकि कुछ लोग सामान की एक्सवायरी तिथि बदल देते हैं या कस्टमर को उसे देखने, चेक करने या टेस्ट करने का अवसर नहीं देते। बहुत सारे लोग जो गाड़ियाँ तथा मशीनरी चीज़ें बेचते हैं उनके ऐबों को नहीं बताते, हालाँकि इस तरह से बेचना हराम है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। किसी मुसलमान के लिए जायज़ नहीं है कि वह सामान में मौजूद ऐब के बताने से पहले अपने किसी भाई से उसे बेचे।” सुनन इब्न-ए-माजा : 2/754। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 6705 में भी है। और कुछ लोग समझते हैं कि नीलामी सिर्फ़ इतना कह देने से उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है कि मैं लोहे का एक ढेर बेच रहा हूँ, लोहे का एर ढेर। इस प्रकार की बिक्री से बरकत उठा ली जाती है, जैसा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “क्रेता एवं विक्रेता दोनों को अपने क्रय विक्रय को उस समय तक निरस्त करने का अधिकार है, जब तक वे एक दूसरे से जुदा न हो जाएँ। अगर दोनों ने सच कहा और बयान कर दिया, तो उनके लिए उनके क्रय-विक्रय में बरकत दे दी जाती है और अगर झूठ बोला तथा छिपाया, तो उनके क्रय-विक्रय की बरकत मिटा दी जाती है।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 4/328।
दलाली करना :
दलाल वह व्यक्ति है जिसे ख़रीदने की इच्छा न हो, पर दूसरे को धोखा देने के लिए सामान का दाम अधिक लगा दे, ताकि हक़ीक़त में ख़रीदने वाले को अधिक मूल्य देने पर मजबूर करे। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “तुम लोग दलाली न करो।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/484 इसमें कोई शक नहीं कि यह भी एक प्रकार का धोखा है।
जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है :
“चालबाज़ी तथा धोखा जहन्नम में ले जाने वाले कार्य हैं।” देखिए : सिलसिला अल-अहादीस अस-सहीहा : 1057। पब्लिक सेल, नीलाम घर तथा गाड़ियों के मार्केट में काम करने वाले बहुत सारे दलालों की कमाई नाजायज़ तथा हराम होती है, क्योंकि वह वहाँ कई हराम काम करते हैं। जैसे उनकी इस बात पर आपसी सहमति कि खरीदार को देख कर ऐसे लोग सामान का दाम बढ़ा-चढ़ाकर लगाएँगे, जो उसे खरीदने का इरादा नहीं रखते,
सामान बेचने के लिए आने वाले को धोखा देना और उसके सामान का दाम घटाकर लेने पर आपसी सहमति बना लेना,
जबकि उन्हें सामान बेचना हो तो खुद उनके कुछ लोगों का खरीदारों के बीच खड़े होकर नीलामी में हिस्सा लेना और दाम बढ़ाने का काम करना। इस तरह वे अल्लाह के बंदों को धोखा देते और नुक़सान पहुँचाते हैं।
जुमा की दूसरी अज़ान के बाद क्रय-विक्रय करना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह की याद की ओर दौड़ जाओ तथा क्रय-विक्रय त्याग दो। यह उत्तम है तुम्हारे लिए, यदि तुम जानो।" [सूरा अल-जुमुआ़, आयत संख्या : 9] कुछ लोग दूसरी अज़ान के बाद भी अपनी दुकानों में या मस्जिदों के सामने बेचने में लगे रहते हैं और उनके साथ गुनाह में वह लोग भी शरीक होते हैं जो उनसे कुछ ख़रीदते हैं, चाहे मिस्वाक ही क्यों न हो। उलेमा के अधिक प्रबल मत अनुसार यह क्रय-विक्रय निष्प्रभावी है। कुछ होटल, बैकरी तथा फ़ैक्टरी वाले अपने कर्मचारियों को जुमी की नमाज़ के समय भी काम करने पर मजबूर करते हैं । इस तरह के लोगों का यद्यपि देखने में लाभ अधिक होता हो, लेकिन असल में वे अपना नुक़सान करते हैं। रही बात कर्मचारी की, तो उसे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फ़रमान के अनुसार काम करना चाहिए : “अल्लाह की नाफ़रमानी में किसी इन्सान की फ़रमाँबरदारी नहीं की जाएगी।” मुसनद अहमद : 1/129। अहमद शाकिर ने कहा है : इसकी सनद सहीह है। देखिए : हदीस संख्या : 1065।
जुआ :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे ईमान वालो! निःसंदेह मदिरा, जुआ, देवस्थान और पाँसे शैतानी मलिन कर्म हैं। अतः इनसे दूर रहो, ताकि तुम सफल हो जाओ।"
[सूरा अल-माइदा : 90]
इस्लाम की स्थापना के पहले के काल में लोग जुआ खेला करते थे।
उनके नज़दीक इसकी एक मशहूर शक्ल यह थी कि
दस लोग बराबर शरीक होकर एक ऊँट ख़रीदते,
फिर क़ुरआ़ अंदाज़ी (लाटरी) करते और उनमें से सात लोगों को उनके रिवाज के अनुसार अलग-अलग निर्धारित हिस्से मिलते थे तथा शेष तीन लोगों को कुछ नहीं मिलता था। जबकि वर्तमान काल में जुआ के बहुत सारे रूप हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं : लाटरी : इसकी भी कई सूरतें हैं। मशहूर सूरतों में एक यह है कि पैसों से नम्बर ख़रीदे जाते हैं, फिर उनमें लाटरी करके
पहले, दूसरे और तीसरे विजेता को क्रमानुसार विभिन्न प्रकार के पुरस्कार दिए जाते हैं।
यह हराम है, अगरचे लोग इसे अपने तौर पर कल्याणकारी काम का नाम देते हैं। जुआ का एक अन्य रूप यह है कि कोई ऐसा सामान ख़रीदा जाता है, जिसके अंदर को अज्ञात वस्तु होती है। या सामान ख़रीदते समय कोई नम्बर दिया जाता, फिर लाटरी करके विजेताओं का निर्धारण किया जाता और उन्हें पुरस्कार दिया जाता है ।
मौजूदा दौर में जुआ के कुछ अन्य रूप इस प्रकार हैं :
बीमा : जैसे जीवन बीमा, वाहन बीमा, धन बीमा, अग्नि बीमा तथा व्यापक एवं तृतीय पक्ष का बीमा आदि।
कुछ गायक अपनी आवाज़ तक का भी बीमा करवाने लगे हैं।
यह और इस तरह की तमाम सूरतें जुवे में शामिल हैं। हमारे दौर में तो जुआ के लिए ख़ास क्लब भी मौजूद हैं जिनमें इस महापाप के इर्तिकाब के लिए विशेष रूप की हरी मेज़ें होती हैं। इसी तरह घुड़दौड़ और अन्य मैचों में जो सट्टे लगाए जाते हैं, वह भी एक तरह का जुआ हैं। कुछ खेल की दुकानों तथा मनोरंजन केंद्रों में खेल की ऐसी क़िस्में पाई जाती हैं जो जुआ को शामिल हैं। जैसे वह खेल जिसे लोग “फ़्लीबर्ज़” का नाम देते हैं।
जुए की शक्लों में से
वह प्रतियोगिताएँ भी हैं, जिनमें प्रतियोगिता के दोनों पक्षों या दो से अधिक पक्षों की ओर से पुरस्कार रखे जाते हैं। यह बात उलेमा के एक समूह ने स्पष्ट रूप से कही है।
चोरी :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "चोर, पुरुष और स्त्री दोनों के हाथ काट दो, उनके करतूत के बदले, जो अल्लाह की ओर से शिक्षाप्रद दण्ड है और अल्लाह प्रभावशाली गुणी है।" [सूरा अल-माइदा, आयत संख्या : 38]
चोरी का एक जघन्य रूप है,
हज एवं उमरा के इरादे से अल्लाह के घर काबा को आए हुए लोगों के माल एवं सामान की चोरी करना। इस क़िस्म के चोर सबसे सर्वश्रेष्ठ भूमि तथा अल्लाह के घर के आस-पास चोरी करके अल्लाह की सीमाओं को निःसंकोच लाँघते हैं।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूर्य ग्रहण की नमाज़ पढ़ाते समय जहन्नम के दर्शन का उल्लेख करते हुए फ़रमाया है :
“उस समय मेरे सामने (जहन्नम की) आग हाज़िर की गई थी। यह उस समय की बात है, जब तुम लोगों ने मुझे पीछे हटते हुए देखा था। (उस समय मैं पीछे हट गया था) इस डर से कि उसकी तमाज़त मुझे न लग जाए। मैंने उसमें लाठी वाले आदमी को देखा, जो आग में अपनी आँतों को खींच रहा था। वह अपनी लाठी द्वारा हाजियों के सामान चुराता था। अगर पकड़ा जाता तो कहता कि मेरी लाठी में फँस गया था और अगर पता न चलता तो सामान लेकर भाग जाता।” सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 904 चोरी का एक जघन्य रूप सरकारी चीज़ों का चुराना है। ऐसा करने वाले कुछ लोग कहते हैं कि जैसे दूसरे लोग चुराते हैं वैसे ही हम भी चुराते हैं, हालाँकि उनको पता नहीं कि यह सारे मुसलमानों का माल चुराना है, क्योंकि सरकारी धन सारे मुसलाम का धन हुआ करता है। साथ अल्लाह का भय न रखने वाले लोगों का कोई अमल इस लायक़ हो सकता कि उसे प्रमाण बनाकर उसका अनुसरण किया जाए।हीं है । कुछ लोग काफ़िरों का माल इस बात को बुनियाद बनाकर चुराते हैं कि वे काफ़िर हैं, जबकि यह सही नहीं है, क्योंकि जिन काफ़िरों का माल छीनना जायज़ है, वह वह काफ़िर हैं, जो मुसलमानों से लड़ते हैं। काफ़िरों की सारी कम्पनियाँ और उनके सारे लोग इसमें शामिल नहीं हैं।
चोरी का एक साधन
पॉकेट मारना भी है। कुछ लोग मेहमान बनकर किसी के यहाँ जाते हैं और चोरी करते हैं, कुछ लोग मेहमान का माल चुरा के उनकी थैली ख़ाली कर देते हैं, और कुछ लोग दुकानों में प्रवेश करके अपने जेबों तथा कपड़ों में कोई सामान छिपा लेते हैं। इसी तरह कुछ औरतें अपने कपड़ों के नीचे कुछ छिपा लेती हैं। कुछ लोग छोटी-मोटी या सस्ती चीज़ें चुराने को हल्का तथा मामूली समझते हैं, जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “अल्लाह की लानत हो उस चोर पर जिसका हाथ अंडा चोरी करने के जुर्म में काट दिया जाता है और (उसपर भी अल्लाह की लानत हो) जिसका हाथ रस्सी चोरी करने के जुर्म में काट दिया जाता है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 12/81 कोई भी सामान चुराने वाले को अनिवार्य रूप से सामान उसके मालिक को लौटा देना चाहिए और अल्लाह के सामने तौबा करना चाहिए। चाहे खुले तौर पर वापस करे या छिपाकर, ख़ुद वापस करे या किसी माध्यम से। अगर बहुत कोशिश के बाद भी माल के मालिक तक या उसकी मौत के बाद उसके उत्तराधिकारियों तक पहुँच न सके, तो माल को उसके मालिक की तरफ़ से सदक़ा कर दे, इस नीयत से कि उसका सवाब माल के मालिक को पहुँचे।
रिश्वत लेना तथा देना :
न्यायाधीश एवं अथवा लोगों के बीच निर्णय करने वाले को, किसी अधिकार को नष्ट करने या गलत को सही ठहराने के लिए रिश्वत देना अपराध है, क्योंकि यह न्याय को प्रभावित करने, अधिकार वाले पर अत्याचार करने और समाज में बिगाड़ को आम करने का कारण है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा आपस में एक-दूसरे का धन अवैध रूप से न खाओ और न अधिकारियों के पास उसे इस ध्येय से ले जाओ कि लोगों के धन का कोई भाग, जान-बूझ कर पाप द्वारा खा जाओ।" [सूसा अल-बक़रा : 188] और अबू-हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “फ़ैसला करने-कराने में रिश्वत लेने और देने वाले दोनों पर अल्लाह की लानत है।” मुसनद अहमद : 2/387। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5069 में भी है। हाँ अगर अपना जायज़ हक़ हासिल करने या अत्याचार से सुरक्षा के लिए रिश्वत देनी पड़े और हाल यह हो कि इसके बग़ैर कोई चारा न हो, तो यह उक्त चेतावनी में दाख़िल नहीं होगा। वर्तमान युग में रिश्वत व्यापक रूप से फैल गई है, यहाँ तक कि कुछ नौकरी करने वालों की आमदनी का ज़रिया उनके वेतन से ज़्यादा यही बन गई है, बल्कि बहुत-सी कम्पनियों के बजट में अस्पष्ट नामों से यह एक आइटम बन गई है और बहुत-से मामले न इसके बग़ैर शुरू होते हैं और न इसके बिना ख़त्म होते हैं। नतीजा यह है कि ग़रीबों को काफ़ी नुक़्सान का सामना करना पड़ रहा है, इसके कारण बहुत-सी ज़िम्मेदारियों की अदायगी में अनियमितता देखी जा रही है और यह काम कराने वालों के प्रति कर्मचारियों की उदासीनता का कारण बन गई है।
आज हाल यह है कि अच्छी सेवा उसी को मिलती है जो रिश्वत देता है। जो नहीं देता, या तो उसे अच्छी सेवा प्रदान नहीं की जाती या उसका काम लंबित हो जाता है या फिर उसपर ध्यान ही नहीं दिया जाता। जबकि, रिश्वत देने वाले, जो बाद में आते हैं, अपना काम उससे बहुत पहले निपटाकर चले जाते हैं।
रिश्वत के कारण होता यह है कि वह माल जिसपर काम वालों का अधिकार बनता था, बेचने तथा खरीदने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों की जेब में चला जाता है। अतः अल्लाह के नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ुबानी इस अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हर व्यक्ति के लिए अल्लाह की रहमत से महरूमी की बददुआ करना कोई आश्चर्य की बात नहीं। अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “रिश्वत लेने और देने वालों पर अल्लाह की लानत है।” सुनन इब्न-ए-माजा : 2313। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5114 में भी है।
ज़मीन हड़पना :
जब अल्लाह का डर ख़त्म हो जाता है तब शक्ति एवं सामर्थ्य इन्सान के लिए मुसीबत बन जाते हैं, जिन्हें वह अत्याचार के कामों, जैसे किसी के धन पर अनाधिकृत रूप से क़ब्ज़ा कर लेने आदि में इस्तेमाल करता है। इसका एक उदाहरण किसी की ज़मीन हड़पना भी है, जिसकी सज़ा अत्यंत कठोर रखी गई है। अ़ब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने नाहक़ किसी की बित्ता भर भी ज़मीन ले ली, क़यामत के दिन सात तबक़ ज़मीनों तक उसे धँसाया जाएगा।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 5/103। और याला बिन मुर्रा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “कोई भी आदमी अगर नाहक़ किसी की एक बित्ता ज़मीन भी ले ले, तो अल्लाह तआला उसे सात तबक़ ज़मीन तक ज़मीन का यह हिस्सा खोदने पर (तबरानी में है : उसे हाज़िर करने पर) बाध्य करेगा। फिर क़यामत के दिन उसे उसके गले में तौक़ बनाकर लटका देगा, यहाँ तक कि लोगों के दरमियान फ़ैसला कर दिया जाए।” तबरानी की अल-कबीर : 22/270। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 2719 में भी है। इसके अंतर्गत ज़मीन की मेंड़ बदल कर अपने पड़ोसी की ज़मीन घटाते हुए अपनी ज़मीन बढ़ा लेना भी आता है। इसी की ओर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस कथन में इशारा किया है : “ज़मीन की मेंड़ बदलने वाले पर अल्लाह की लानत (अल्लाह की रहमत से दूरी) है।” सहीह मुस्लिम, शर्ह नववी के साथ : 13/141।
सिफ़ारिश करने के कारण भेंट लेना :
पद एवं सम्मान, बंदे पर अल्लाह की एक नेमत है, यदि बंदा उसका शुक्र अदा करे। इसका शुक्र अदा करने का एक तरीक़ा यह है कि इसका प्रयोग मुसलमानों के लाभ के लिए किया जाए। यह, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की साधारण वाणी में दाख़िल है : “तुममें से जो अपने भाई को फ़ायदा पहुँचाने की ताक़त रखता है, वह उसे फ़ायदा पहुँचाए।” सहीह मुस्लिम : 4/1726। जिसने सच्ची नीयत से अपने पद का उपयोग अपने मुसलमान भाई को फ़ायदा पहुँचाने या उसे अत्याचार से बचाने के लिए किया और इसके लिए कोई अवैध कार्य नहीं किया तथा किसी का हक़ नहीं मारा, उसे अल्लाह के यहाँ इसका प्रतिफल मिलेगा। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : “सिफ़ारिश करो तुम्हें प्रतिफल मिलेगा।” सुन अबू दाऊद : 5132। यह हदीस सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में भी है। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/450, अध्याय : किताब अल-अदब, अध्याय : मोमिनों का आपस में एक-दूसरे की सहायता करना। लेकिन इस सिफ़ारिश एवं माध्यम बनने का विनिमय लेना जायज़ नहीं है। इसका प्रमाण अबू उमामा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित वह हदीस है, जिसमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिसने किसी के लिए कोई सिफ़ारिश की और इसके बदले में उसे कोई भंट दी गई तथा उसने उसे ग्रहण भी कर लिया, तो वह सूद के एक बहुत बड़े द्वार के पास आ गया।” मुसनद अहमद : 5/261। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 6292 में भी है। कुछ लोग अपने पद का उपयोग धन के बदले करने की पेशकश करते हैं। किसी को कोई नौकरी दिलाने, प्रमोशन दिलाने, स्थानांतरण कराने या किसी बीमार के इलाज आदि पर माल की शर्त रख देते हैं। उलेमा के अधिक प्रबल अनुसार इस प्रकार विनिमय लेना हराम है। इसका प्रमाण अबू उमामा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित वह हदीस है, जो अभी-अभी गुज़र चुकी है। बल्कि हदीस का ज़ाहिर यह बता रहा है कि विनिमय अगर बग़ैर शर्त के भी लिया जाए, तब भी हराम है। यह बात शैख बिन बाज़ के एक बयान से ली गई है।
भलाई करने वालों को क़यामत के दिन अल्लाह की तरफ़ से मिलने वाला प्रतिफल ही काफ़ी है।
एक आदमी हसन बिन सह्ल के पास अपनी किसी ज़रूरत की सिफ़ारिश कराने के लिए आया, तो उन्होंने सिफ़ारिश करके उसकी ज़रूरत पूरी कर दी। इसपर वह आदमी उनका शुक्रिया अदा करने लगा, तो हसन बिन सह्ल ने उससे कहा : तुम हमारा शुक्रिया किस बात का अदा कर रहे हो? हम तो समझते हैं कि धन की ज़कात की तरह पद की भी ज़कात है। इब्न अल-मुफ़लिह की किताब “अल-आदाब अश-शरइय्यह : 2/176।
यहाँ इस फ़र्क़ की ओर इशारा कर देना बेहतर समझता हूँ कि
किसी व्यक्ति को मेहनताना देकर कोई काम करवाने और काम ख़त्म न होने तक विनिमय देकर उसे उसके पीछे लगाए रखने तथा अपने पद का उपयोग करते हुए किसी का कोई काम करने और विनिमय लेकर सिफ़ारिश करने के बीच अंतर है। पहली सूर अगर शरई शर्तों के अनुसार है तो जायज़ इजारा की क़िस्मों में से है। जबकि दूसरी सूरत हराम है।
मजदूर से काम पूरा लेना मगर उसकी मज़दूरी अदा न करना :
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मज़दूर का हक़ जल्द से जल्द अदा करने की प्रेरणा देते हुए कहा है : “मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले अदा कर दो।” सुनन इब्न-ए-माजा : 2/817। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 1493 में भी है। मुस्लिम समाज अन्याय के जो कई रूप प्रचलित हैं, उनमें से एक श्रमिक, मज़दूर तथा कर्मचारियों को उनका हक़ न देना है। इसके कई रूप हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं : - मज़दूर के हक़ का सिरे से इनकार कर देना, जबकि मज़दूर के पास अपना हक़ साबित करने के लिए कोई सबूत न हो। इस तरह मज़दूर का हक़ यद्यपि दुनिया में नष्ट हो जाए, लेकिन क़यामत के दिन अल्लाह के पास उसका हक़ नष्ट नहीं होगा। क्योंकि किसी का माल खाने वाला अत्याचारी व्यक्ति जब उस दिन अल्लाह के सामने उपस्थित होगा, तो उसकी नेकियाँ उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति को दे दी जाएँगी। फिर, अगर उसकी नेकियाँ कम पड़ गईं, तो उत्पीड़ने के शिकार व्यक्ति के गुनाह उसके ऊपर लाद दिए जाएँगे और उसके बाद उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा। -मज़दूर की मज़दूरी जबरदस्ती कम देना और उसे उसका पूरा हक़ न देना। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “विनाश है डंडी मारने वालों का।” सूरा अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन, आयत संख्या : 1।
इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :
- कुछ लोगों का यह रवैया कि जब वह कहीं से काम करने वालों को मँगवाते हैं, तो उनके साथ एक निश्चित पारिश्रमिक निशि्चत करते हैं, लेकिन जब ये काम करने वाले आकर काम शुरू कर देते हैं, चो निश्चित पारिश्रमिक में बदलाव करके उसे घटा देते हैं।
ऐसे में बेचारे कामगारों को न चाहते हुए भी ठहरना पड़ता है। चूँकि अपना अधिकार सिद्ध नहीं कर पाते, इसलिए मामला अल्लाह के हवाले कर देते हैं।
और अगर मालिक मुसलमान और कामगार गैरमुस्लिम होता है, तो उसका यह आचरण अल्लाह की राह से रोकने का सबब बन जाता है। इसलिए उसे इसका पाप भी ढोना पड़ेगा।
- मालिक कामगार पर अतिरिक्त काम का बोझ डाल दे या काम का समय बढ़ा दे और उसे केवल असल काम का पारिश्रमिक दे और बढ़ाए गए काम के पारिश्रमिक से वंचित कर दे।
- मालिक कामगार को उसका हक़ देने में टाल-मटोल से काम ले। उसे अपना अधिकार लेने के लिए बड़ी मेहनत, दौड़-धूप और शिकवा-शिकायत करनी पड़े तथा दफ़तरों के चक्कर काटने पड़े। कभी-कभी विलंब के पीछ काम कराने वाले का यह उद्देश्य छिपा होता है कि कामगार थककर अपने अधिकार से हाथ खींच ले और मुतालबा न करे या फिर कर्मचारियों के पैसे को अपने कारोबार में लगाकर उससे फ़ायदा उठाना चाहता है। कुछ लोग तो उनके वेतन के पैसों को सूदी कारोबार पर लगा देते हैं और बेचारे मज़दूरों को न खाना नसीब होता है और न अपने ज़रूरतमंद परिवार के लिए ख़र्च भेज पाते हैं, जिनकी ख़ातिर वे अपना मुल्क छोड़कर आए हैं। ऐसे ज़ालिम मालिकों के लिए है क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब तथा हलाकत व बरबादी है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है कि क़यामत के दिन मैं स्वयं तीन तरह के लोगों का वादी बनूँगा। एक तो वह व्यक्ति जिसने मेरे नाम पर वादा किया फिर वादा ख़िलाफ़ी की, दूसरा वह जिसने किसी आज़ाद आदमी को बेचकर उसकी क़ीमत खाई और तीसरा वह व्यक्ति जिसने किसी को मज़दूर रखा, फिर काम तो उससे पूरा लिया, लेकिन उसकी मज़दूरी न दी।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 4/8447।
दान एवं उपहार देने में बच्चों के बीच न्याय न करना :
कुछ लोग जान-बूझकर अपने कुछ बच्चों को दान एवं उपहार देते हैं और कुछ बच्चों को छोड़ देते हैं। अगर कोई शरई कारण न हो तो उलेमा के प्रबलतम मत अनुसार ऐसा करना हराम है। शरई कारण, जैसे किसी बच्चे को कोई ऐसी ज़रूरत पेश आ जाए, जो दूसरे को न हो। मसलन कोई बीमार पड़ जाए, किसी पर क़र्ज़ का बोझ हो किसी को क़ुरआन हिफ़्ज़ करने पर पुरस्कार के तौर पर दिया जाए, किसी के पास कोई काम न हो, किसी का परिवार अधिक बड़ा हो या कोई पूरे तौर पर ज्ञान अर्जन करने में लगा हुआ हो आदि।
लेकिन इन परिस्थितियों में किसी को कुछ देते समय पिता के दिल में यह बात होनी चाहिए कि यदि दूसरे को भी इस तरह की ज़रूरत पड़ जाए, तो वह उसे भी इसी तरह देगा।
इसका सामान्य प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है : “तुम न्याय करो। वह परहेज़गारी के ज़्यादा क़रीब है और तुम अल्लाह से डरते रहो।” और इसकी विशिष्ट दलील है नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित यह हदीस, जिसमें है कि उनके पिता उनको साथ लेकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए और बोले : मैंने अपने इस बच्चे को एक ग़ुलाम प्रदान किया है। यह सुन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : “क्या तुमने अपने सारे बच्चों को उसके समान दिया है?” उन्होंने कहा : नहीं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तुम उसे वापस ले लो।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 5/211। एक दूसरी रिवायत में है : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह से डरो और अपने बच्चों के बीच न्याय करो।” वर्णनकर्ता नोमान रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि इसके बाद वह वापस गए और अपना दिया हुआ गुलाम वापस ले लिया। फ़त्ह अल-बारी : 5/211। और एक रिवायत में है : “तो फिर मुझे गवाह न बनाओ, क्योंकि मैं अत्याचार का गवाह नहीं बनता।” सहीह मुस्लिम : 3/1243। इमाम अहमद बिन हम्बल रहिमहुल्लाह की राय यह है कि मीरास की तरह बेटों को बेटियों का दोगुना दिया जाएगा। इमाम अबू दाऊद की किताब “मसाइव अल-इमाम अहमद ” : 204। इमाम इब्न-ए-क़य्यिम ने अबू दाऊद पर लिखे अपने हाशिए के अंदर इस मसले को विस्तार से बयान किया है। कुछ परिवार ऐसे भी देखने को मिलते हैं कि जहाँ पिता अपने कुछ बच्चों को कुछ से अधिक दान एवं उपहार देने के मामले में अल्लाह से डरते। इस तरह वह उनके सीनों में ईर्ष्या एवं दुश्मनी का बीज बोने का काम करते हैं। कभी-कभी तो किसी को इसलिए देते हैं कि वह चचाओं के मुशाबेह हैं और दूसरे को इसलिए नहीं देते हैं कि वह मामुओं के मुशाबेह हैं, या एक पत्नी के बच्चों को कोई ऐसी चीज़ देते हैं जो दूसरी पत्नी के बच्चों को नहीं देते। ऐसा भी होता है कि एक पत्नी के बच्चों का नामांकन विशेष स्कूलों में कराते हैं और दूसरी के बच्चों का नहीं कराते। इस नाइंसाफ़ी का खामियाज़ा स्वयं उसे ही झेलना पड़ेगा। क्यों अकसर वंचित बच्चे भविष्य में माता-पिता के अधिकारों में प्रति सजग नहीं होते। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दान एवं उपहार देने में बच्चों के बीच कमी-बेशी करने वाले के बारे में कहा है : “क्या तुम्हें यह बात पसन्द नहीं कि वह तुम्हारे साथ वे तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करने में बराबर रहें?”
मुसनदद अहमद : 4/269। यह हदीस सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1623 में भी है।
बग़ैर ज़रूरत के लोगों से माँगना :
सहल बिन अल-हन्ज़लिया रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “अपने पास ज़रूरत भर माल होते हुए भी जो किसी से माँगता है, वह ज़्यादा से ज़्यादा जहन्नम की आग के अंगारे जमा करता है।” सहाबा ने पूछा : कितना माल हो तो माँगना मुनासिब नहीं होगा? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जितना उसे दोपहर और शाम के खाने के लिए काफ़ी हो जाए।” सुनन अबू दाऊद : 2/281। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : 6280। तथा अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है :
“अपने पास ज़रूरत भर माल होते हुए भी जो किसी से माँगे, क़यामत के दिन उसके चेहरे के ज़ख़्म या नोचने के ज़ख़्म होंगे।”
मुसनद अहमद : 1/388। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6255। बाज़ माँगने वाले मस्जिदों में लोगों के सामने खड़े होकर अपने शिकवे पेश करते हुए ज़िक्र व तस्बीह में व्यवधान डालते हैं। जबकि कुछ लोग तो झूट का सहारा लेते हुए जाली काग़ज़ात पेश करते हैं और झूट-मूट के क़िस्से बयान करते हैं। कभी-कभी परिवार के सदस्यों को विभिन्न मस्जिदों में तक़्सीम कर देते हैं, फिर उन्हें इकट्ठा करते हैं और इस तरह वह एक मस्जिद से दूसरी मस्जिद का रुख़ करते रहते हैं, हालाँकि वह इतनी अच्छी हालत में होते हैं कि अल्लाह ही बेहतर जानता है। इस प्रकार के लोग जब मरते हैं तो उनकी संपत्ति लोगों के सामने आती है। दूसरी तरफ़ हक़ीक़त में जो लोग मोहताज होते हैं, उनके लोगों से चिमट कर न माँगने की वजह से नादान लोग उन्हें मालदार समझते हैं और उनकी हालत के बारे में पता न चलने की वजह से उन्हें सदक़ा भी नहीं किया जाता।
अदा न करने की नीयत से क़र्ज़ लेना :
अल्लाह के नज़दीक बंदों के अधिकारों की बड़ी अहमियत है। यह मुमकिन है कि बंदा तौबा के ज़रिए अल्लाह के हक़ से छुटकारा पा जाए, लेकिन बंदों के अधिकार उस दिन से पहले अदा कर देना ज़रूरी है, जिस दिन दीनार और दिरहम का मुतालबा नहीं होगा, बल्कि नेकियों एवं बदियों के अनुसार निर्णय होगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि धरोहर उनके स्वामियों के हवाले कर दो।” [सूरा अन-निसा : 58]
आज कल क़र्ज़ ले समाज में क़र्ज़ लेना एक आ़म तथा आसान बात हो चुकी है।
कुछ लोग सख़्त ज़रूरत पर नहीं बल्कि सुख भोग में इज़ाफ़ा करने के लिए तथा दूसरों की अंधा अनुसरण करते हुए नए मॉडल की गाड़ियाँ और घर के साज़ व सामान इत्यादी ख़रीदने के लिए क़र्ज़ का बोझ अपने कंधे पर लाद लेते हैं, हालाँकि यह सारी चीज़ें फ़ानी एवं अस्थायी हैं। ऐसे लोग ही अकसर क़िस्तों पर सामान ख़रीदते हैं, हालाँकि उसकी बहुत सारी क़िस्में संदेह अथवा अवैधता से खाली नहीं हैं। क़र्ज़ लेने में गैरज़रूरी चुस्ती अदा करने में टाल-मटोल का या दूसरे का धन नष्ट करने का कारण बनती है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस काम के परिणाम से सचेत करते हुए कहा है : “जो लोगों के माल अदा करने की नीयत से लेगा, अल्लाह उसकी तरफ़ से अदा कर देगा, और जो नष्ट करने की नीयत से लेगा अल्लाह उसे नष्ट कर देगा।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 5/854 लोग ज़्यादातर क़र्ज़ के मामले में बड़ी सुस्ती बरतते हैं और इसे अधिक तवज्जो नहीं देते, हालाँकि अल्लाह के यहाँ इसका बड़ा महत्व है। यहाँ तक कि शहीद भी, अपनी विशिष्टाओं, प्राप्त होने वाले महान प्रतिफल एवं उच्च श्रेणी के बावजूद, कर्ज़ के बोझ से छुटकारा नहीं पा सकेगा। इसकी दलील अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान है : “अल्लाह बड़ा पवित्र है! क़र्ज़ के बारे में अल्लाह ने कितनी सख़्त बात उतारी है?! क़सम है उस ज़ात की जिसके हाथ में मेरी जान है, अगर कोई आदमी अल्लाह के रास्ते में शहीद हो तथा फिर उसे ज़िंदा किया जाए, फिर शहीद हो एवं फिर ज़िंदा किया जाए और फिर इस हाल में शहीद हो कि उसपर क़र्ज़ हो, तो वह जन्नत में उस समय तक प्रवेश नहीं करेगा, जब तक उसका क़र्ज़ अदा कर न दिया जाए।” नसाई की अल-मुज्तबा : 7/314। यह हदीस सही अल-जामे, हदीस संख्या : 3594 में भी है।
क्या इसके बाद भी लोग क़र्ज़ के मामले में सुस्ती करना बंद नहीं करेंगे?!
हराम खाना :
जो अल्लाह से नहीं डरता, उसे इस बात की परवाह नहीं होती कि उसने कहाँ से धन अर्जित किया है और उसे कहाँ खर्च किया है? उसका एकमात्र लक्ष्य होता है धन में वृद्धि करना। चाहे गलत और हराम तरीक़े से ही क्यों न हो। मसलन चोरी और रिश्वत, बलपूर्वक क़ब्ज़ा और धोखा, अवैध क्रय-विक्रय और सूदी लेनदेन, यतीम का माल हड़प लेना, हराम काम, जैसे कहानत, बेहयाई और गाने-बजाने का पारिश्रमिक लेना, मुसलमानों के बैतुल माल पर और सरकारी चीज़ों पर अवैध क़ब्ज़ा, दूसरे का माल ज़बरदस्ती ले लेना या बग़ैर ज़रूरत के माँगना इत्यादि। फिर वह इसी हराम तरीक़ों से कमाए धन से खाने और पहनने का प्रबंध करता है, सवारी खरीदता है, घर बनाता है या किराए पर लेता है और सजाता है तथा हराम धन अपने पेट में दाखिल करता है। जबकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है :
“हर वह मांस जो हराम से बना हो, आग ही उसका ज़्यादा हक़दार है।”
तबरानी की अल-कबीर : 19/136। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 4495 में भी है।
क़यामत के दिन उससे यह ज़रूर पूछा जाएगा कि उसने उसे कहाँ से धन कमाया था और किसमें ख़र्च किया था? उस वक़्त वह हलाकत तथा नुक़सान से दोचार होगा।
अतः अगर किसी के पास हराम माल है, तो उससे अविलंभ छुटकारा हासिल कर ले। अगर किसी आदमी का हक़ मार रखा है, तो उससे माफ़ी माँग ले और अविलंब उसका हक़ लौटा दे। इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जब जिस दिन दीनार व दिरहम) से बदला नहीं चुकाया जाएगा, बल्कि नेकियाँ लेकर या बदियाँ लाद कर हक़ अदा किया जाएगा।
शराब पीना, चाहे एक बूंद ही क्यों न हो :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! निस्संदेह मदिरा, जुआ, देवस्थान और पाँसे शैतानी मलिन कर्म हैं। अतः इनसे दूर रहो, ताकि तुम सफल हो जाओ।" [सूरा अल-माइदा : 90] अलग रहने का आदेश हराम होने एक मज़बूत प्रमाण है। हराम होने का इशारा इससे भी मिलता है कि अल्लाह ने शराब को काफ़िरों की मूर्तियों तथा उनके माबूदों को भी मिलाकर ज़िक्र किया है। अतः उन लोगों की बात में कोई वज़न नहीं रह जाता, जो कहते हैं कि अल्लाह ने हराम नहीं कहा है, बल्कि केवल उससे बचो कहा है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस में शराब पीने वालों के लिए सख़्त सज़ा की बात आई है। जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “ ---निश्चय अल्लाह ने मादक पदार्थों का सेवन करने वालों के बारे में यह प्रतिज्ञा ली है कि वह उन्हें “तीनत अल-ख़बाल” में से पिलाएगा।” सहाबा ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! “तीनत अल-ख़बाल” क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया : “जहन्नमियों का पसीना या उनके (बदन से निकला हुआ) पीप।” सहीह मुस्लिम : 3/1587। और अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जो व्यक्ति शराब का आदी बनकर मरेगा, वह अल्लाह से एक मूर्तिपूजक की तरह मिलेगा।” तबरानी : 12/45। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6525 में भी है। हमारे इस युग में अलग-अलग क़िस्म की शराबें तथा विभिन्न प्रकार की नशीली चीज़ें सामने आ चुकी हैं, जिन्हें भाँत-भाँत के अरबी तथा गैरअरबी नामों से जाना जाता है। जैसे बीयर, अलकोहल, रस, वोदका और शैंपेन आदि। इस उम्मत में ऐसे लोग भी पैदा हो चुके हैं, जिनकी सूचना देते हुए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा था : “मेरी उम्मत के कुछ लोग शराब पिएँगे और उसे उसके असल नाम से भिन्न अन्य नाम दे देंगे।” मुसनद अहमद : 5/342। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5453 में भी है। यह लोग शराब को शराब कहने के बजाय आध्यात्मिक पेय कहते हैं, ताकि लोगों को धोखा दिया जा सके। “वे अल्लाह और ईमान वालों को धोखा देते हैं। जबकि वे स्वयं अपने आप को धोखा देते हैं, परन्तु वे इसे समझते नहीं।” शरीयत ने इस मामले में एक मह्तवपूर्ण नियम बताया है, जिससे मामला बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है और सारे चोर दरवाज़े बंद हो जाते हैं। इस नियम को बयान करते हुए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “प्रत्येक मादक पदार्थ शराब है और प्रत्येक मादक पदार्थ हराम है।” सहीह मुस्लिम : 3/1587। अतः हर वह चीज़ जो अक़्ल को प्रभावित करे और नशा लाने का काम करे, वह हराम है। थोड़ा हो ज़्यादा। एक अन्य हदीस में है : “जिस चीज़ का ज़्यादा परिमाण नशा लाए, उसका कम परिमाण भी हराम है।” सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3681। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या :3128 में भी है। अतः नाम चाहे जो भी हो और जितने भी हों, वस्तु एक ही है और उसके बारे में शरीयत का आदेश स्पष्ट है। अंत में शराब पान करने वालों के लिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह उपदेश देख लीजिए। आपने फ़रमाया : “जिसने शराब पी और उसे नशा आ गया, चालीस दिन तक उसकी नमाज़ क़बूल नहीं होगी। अगर वह इसी अवस्था में मर गया, तो जहन्नम में दाख़िल होगा और अगर तौबा कर ली, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल फ़रमाएगा। फिर अगर दोबारा शराब पी और उसे नशा आ गया, तो चालीस दिन तक उसकी नमाज़ क़बूल नहीं होगी। अगर इसी अवस्था में मर गया, तो जहन्नम में दाख़िल होगा और अगर तौबा कर ली, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल फ़रमाएगा। और अगर फिर दोबारा शराब पी और नशे में आ गया, तो चालीस दिन तक उसकी नमाज़ क़बूल नहीं होगी। अगर मर गया, तो जहन्नम में दाख़िल होगा और अगर तौबा कर ली, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल फ़रमाएगा। अगर इसके बाद ऐसा किया, तो अल्लाह क़यामत के दिन उसे “रदग़तुल ख़बाल” पिलाएगा। ”सहाबा ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! “रदग़तुल ख़बाल” क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जहन्नमियों के (बदन से निकला हुआ) पीप।” सुनन इब्न-ए-माजा : 3377। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या ; 6313 में भी है।
सोने-चाँदी के बर्तन इस्तेमाल करना और उसमें खाना-पीना :
आज कल घर के सामान बेचने वाली कोई ऐसी दुकान नहीं है जिसमें सोने चाँदी के बर्तन या सोने चाँदी के पानी का रंग चढ़ाए हुए बर्तन न हों। इसी तरह मालदारों के घरों में और कुछ होटलों में इस तरह के बर्तन देखे जा सकते हैं। बल्कि इस प्रकार के बर्तन उन क़ीमती उपहारों में शामिल हो गए हैं, जो विभिन्न अवसरों पर लोग एक दूसरे को पेश करते हैं। कुछ लोग सोने चाँदी के बर्तन अपने घर में तो नहीं रखते, लेकिन दूसरों के घरों तथा शादी-ब्याह के उत्सवों में इनका इस्तेमाल करते हैं। यह सब के सब इस्लामी शरीयत में हराम हैं। इनके इस्तेमाल करने के बारे में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बड़ी सख़्त चेतावनी दी है। उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि अल्लाह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो व्यक्ति सोने-चाँदी के बर्तन में खाता या पीता है, वह हक़ीक़त में अपने पेट में जहन्नम की आग डाल रहा होता है।” सहीह मुस्लिम : 3/1634।
इस हुक्म के अंतर्गत हर बर्तन तथा खाने के हर क़िस्म के सामान, जैसे प्लेट, काँटे वाले चमचे, चमचे, चाक़ू और मेहमान नवाज़ी में पेश किए जाने वाले बर्तन तथा अनुष्ठान आदि में पेश किए जाने वाले मिठाई के डब्ब आदि आ जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि हम इनका इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन अलमारियों में शीशे के पीछे शोभा के तौर पर सजा कर रखते हैं। इस प्रकार से रखना भी जायज़ नहीं है। इससे इस्तेमाल का रास्ता बंद करने में मदद मिलेगी।
[यह बातें शैख़ बिन बाज़ के मौखिक बयान से ली गई हैं।]
झूठी गवाही देना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है : “तुम बुतों की गंदगी से बचते रहो और झूटी बात से भी परहेज़ करते रहो।” सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 30-31। अब्दुर रहमान बिन अबू बकरा से रिवायत है, वह अपने पिता से रिवायत करते हैं कि उन्होंने कहा है : हम लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास थे कि आपने तीन बार कहा : “क्या मैं तुम्हें न बताऊँ कि सबसे बड़े गुनाह क्या हैं? अल्लाह का साझी ठहराना और माता-पिता की बात न मानना।” आप टेक लगाए हुए थे। लेकिन सीधे बैठ गए और फ़रमाया : “सुनो! और झूटी गवाही देना।” वर्णनकर्ता का बयान है कि आप इसे मुसलसल दोहराते रहे, यहाँ तक कि हमने कहा : काश आप ख़ामोश हो जाते! सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 5/4261 झूटी गवाही देने से बार बार सावधान करने की वजह यह है कि लोग इस बारे में लापरवाही करते हैं और हसद तथा दुश्मनी जैसी बहुत सारी चीज़ें इंसान को इस पर उभारती हैं तथा इससे बहुत सारी ख़राबियाँ भी जन्म लेती हैं। देखें तो सही कि झूटी गवाही के कारण कितने अधिकार नष्ट हुए, कितने निर्दोष लोग अन्याय तथा अत्याचार के शिकार हुए और कितने लोग ऐसी चीज़ों के मालिक बन बैठे जिनके वे हक़दार नहीं थे, या कितने लोग उस वंश से मिला दिए गए जिससे उनका संबंध नहीं है!! इस मामले में लापरवाही का मंज़र अदालतों में देखने को मिलता है। वहाँ आदमी किसी ऐसे व्यक्ति से, जिससे वह वहाँ मिलता है, कहता है कि मैं तुम्हारे लिए गवाही दूँगा और तुम मेरे लिए गवाही दो। अतः वह ऐसे मामले में गवाह बन जाता है जिसकी हक़ीक़त तथा वस्तुस्थिति को जानने की ज़रूरत होती है। जैसे किसी ज़मीन या किसी घर के मालिकाना हक़ की गवाही। जबकि दोनों की मुलाक़ात पहली बार अदालत के द्वार या चौखट पर ही हुई है। ऐसी गवाही झूठी गवाही है। गवाही तो वैसी होनी चाहिए, जिसका ज़िक्र अल्लाह की किताब में हुआ है : “और हमने वही गवाही दी थी, जो हम जानते थे।” सूरा यूसुफ़, आयत संख्या : 81।
संगीत सुनना :
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु अल्लाह की क़सम खाकर कहते थे कि अल्लाह के इस फ़रमान : "तथा लोगों में वो (भी) है, जो खरीदता है खेल की बात, ताकि कुपथ करें अल्लाह की राह (इस्लाम) से।" में उल्लिखित “खेल की बात” से मुराद गाना है। तफ़्सीर इब्न-ए-कसीर : 6/333। और अबू आ़मिर तथा अबू मालिक अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “मेरी उम्मत में कुछ ऐसे लोग ज़रूर होंगे जो व्यभिचार, रेशम, शराब और गाने-बजाने को हलाल समझेंगे।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 10/51। और अनस रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “इस उम्मत में ज़मीन में धँसा दिए जाने, पत्थरों की बारिश बरसाने और रूप बिगाड़ देने की यातनाएँ ज़रूर आएँगी। यह यातनाएँ उस समय आएँगी, जब लोग शराब पिएँगे, गाने वाली दासियाँ रखेंगे और गाने-बजाने के उपकरणों का प्रयोग करेंगे।” देखिए : अस-सिलसिला अस-सहीहा, हदीस संक्या : 2203। अलबानी ने इसे इब्न अबू अद-दुन्या की ज़म्म अल-मलाही की ओर मनसूब किया है। इस हदीस को तिरमिज़ी ने रिवायत किया है। देखिए : हदीस संख्या : 2212। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तबला से भी मना फ़रमाया है तथा बाजा के बारे में फ़रमाया कि वह निर्बुद्धि व दुराचारी व्यक्ति की आवाज़ है। इस्लाम के आरंभिक काल के उलेमा, जैसे इमाम अहमद ने गाने-बजाने के यंत्रों, जैसे बीन, मेनडोलीन, बाँसुरी, सारंगी और मँजीरे के हराम होने की बात स्पष्ट रूप से कही है। इस बात में भी किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है कि गाने-बजाने के आधुनिक यंत्र, जैसे चौतारा, बरबत, पियानो और छतार इत्यादि भी अल्लाह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस में निषिद्ध वाद्य यंत्रों में शामिल हैं, बल्कि ये आधुनिक यंत्र पुराने यंत्रों, जिनकी मनाही कुछ हदीसों में आई है, से कहीं अधिक प्रभावी हैं। बल्कि इनकी मस्ती एवं नशा शराब से भी बढ़कर होता है। यह बात इब्न अल-क़य्यिम आदि विद्वानों ने कही है। फिर, इसमें कोई शक नहीं कि मनाही उस समय अधिक सख़्त हो जाती है तथा पाप ज़्यादा बड़ा हो जाता है, जब संगीत के साथ गाने यानी गायकों एवं गायिकाओं की आवाज़ें हों। जबकि मुसीबत उस समय और संगीन हो जाती है जब गाने में इश्क़ व मुहब्बत, प्रेम-प्रिति, आर्ज़ू व तमन्ना और रूप तथा सौंदर्य की बातें हों। इसी लिए उलेमा ने बताया कि गाना व्यभिचार का कारण है और वह दिल में निफ़ाक़ पैदा करता है।
साधारणतया गाने और संगीत का विषय इस ज़माने में सबसे बड़े फ़ितनों में से एक फ़ितना बन गया है।
आजकल बहुत सारी चीज़ों, जैसे घड़ियों, घंटियों, बच्चों के खिलौनों और मोबाइलों आदि में संगीत दाख़िल होने से मुसीबत और बढ़ गई है। अतः इससे बचने के लिए दृढ़ संकल्प की ज़रूरत होती है। दुआ है कि अल्लाह हमें इससे बचने की शक्ति दे।
ग़ीबत :
मुसलमानों की ग़ीबत करना और उनके मान-सम्मान से खेलना आज बहुत सी सभाओं की शोभा बन चुका है। हालाँकि यह एक ऐसा विषय है, जिससे अल्लाह ने अपने बंदों को रोका है, नफ़रत दिलाई है तथा उसकी ऐसी घिनावनी मिसाल दी है, जिससे हर इन्सान की आत्मा घृणा करती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “और न एक-दूसरे की ग़ीबत करो। क्या तुममें से कोई अपने मरे भाई का मांस खाना चाहेगा?” सूरा अल-हुजुरात, आयत संख्या : 12। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग़ीबत का मतलब बयान करते हुए कहा है : “क्या तुम जानते हो कि ग़ीबत किसे कहते हैं?” सहाबा ने कहा : अल्लाह और उसके रसूल ज़्यादा जानते हैं। आपने फ़रमाया : “तेरा अपने भाई के बारे में कोई ऐसी बात कहना, जिसे वह नापसंद करता हो।” पूछा गया : आप बताएँ अगर मेरे भाई में वह चीज़ मौैजूद हो जो मैं कह रहा हूँ? आपने फ़रमाया : “अगर उसमें वह चीज़ मौजूद है जो तू कह रहा है तो फिर तू ने उसकी ग़ीबत की है और अगर वह चीज़ उसमें नहीं है तो फिर तू ने उस पर लांछन लगाया है।” सहीह मुस्लिम : 4/2001। अतः ग़ीबत यह है कि आप अपने मुस्लिम भाई में मौजूद ऐसी बातों का ज़िक्र करें, जिनमें से किसी बात को वह नापसन्द करता हो। चाहे वह बात उसके शरीर से संबंधि हो, घर्म से संबंधित हो, दुनिया से संबंधित हो, आत्मा से संबंधित हो, आचरण से संबंधित हो या शारीरिक बनावट से। ग़ीबत के बहुत सारे रूप हैं। जैसे, उसकी कमियों को बयान किया जाए या फिर कटाक्ष के तौर पर उसके किसी काम की नक़ल उतारी जाए। दरअसल लोग ग़ीबत को एक मामूली चीज़ समझते हैं, जबकि वह एक बहुत ही बुरी चीज़ है। इसका प्रमाण अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है : “सूद की बहत्तर श्रेणियाँ हैं। उनमें निम्नतम श्रेणी इस तरह है, जैसे कोई व्यक्ति अपनी माता के साथ मुँह काला करे। जबकि सबसे बड़ा सूद इन्सान का अपने भाई के मान-सम्मान को ठेस पहुँचानी वाली बात करना है।” सिलसिला सहीहा, हदीस संख्या : 1871। जिस मजलिस में ग़ीबत हो, उसमें उपस्थित हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह लोगों को इस बुराई से रोके और अपने उस भाई का बचाव करे, जिसकी ग़ीबत की जा रही हो। इसकी प्रेरणा देते हुए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जो व्यक्ति अपने भाई की इज़्ज़त का बचाव करेगा, अल्लाह क़यामत के दिन उसके चेहरे से जहन्नम की आग को दूर कर देगा।” मुसनद अहमद : 6/450। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 6238 में भी है।
चुग़लख़ोरी :
लोगों में फ़ित्ना-फ़साद फैलाने की इरादे से एक की बात दूसरे तक पहुँचाना हमेशा आपसी संबंधों को काटने तथा लोगों के दरमियान दुश्मनी की आग भड़काने के बड़े कारणों में से एक कारण है।
अल्लाह ने चुग़लख़ोरी करने वाली की निंदा करते हुए कहा है : “और आप किसी ऐसे व्यक्ति की बात न मानें जो अधिक शपथ लेने वाला, हीन हो।” सूरा अल-क़लम, आयत संख्या : 10-11। हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “चुग़लख़ोर जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 10/472। इब्न अल-असीर की “अन-निहायह” 4/11 में है : क़त्तात यानी चुग़लख़ोर वह व्यक्ति है, जो लोगों की बात इस तरह सुने कि उनको पता न चल सके और फिर चुग़ली करता फिरे। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना के एक बाग़ से गुज़रते हुए दो लोगों की आवाज़ सुनी, जिन्हें क़ब्रों में यातना दी जा रही थी। इसपर आपने कहा : “इन दोनों को अज़ाब हो रहा है, लेकिन इन्हें किसी बड़ी चीज़ के कारण अज़ाब नहीं हो रहा है।” फिर आपने फ़रमाया : “क्यों नहीं ! बेशक वह बड़ा पाप है (जिसके कारण इन्हें अज़ाब हो रहा है)। इनमें से एक अपने पेशाब से नहीं बचता था और दूसरा चुग़ली करता था।”
सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 1/317।
इस काम का एक जघन्य रूप है,
पति को पत्नी अथवा पत्नी को पति के विरुद्ध भड़काना और दोनों के संबंध को खराब करने का प्रयास करना। इसी तरह कुछ कर्मचारियों का, किसी को क्षति पहुँचाने के इरादे से, चुगलखोरी करते हुए, उसकी बात को मैनेजर या मालिक तक पहुँचाना। यह सब के सब हराम हैं।
बग़ैर इजाज़त के दूसरों के घरों में झाँकना :
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे ईमान वालो! मत प्रवेश करो किसी घर में, अपने घरों के सिवा, यहाँ तक कि अनुमति ले लो और उनके वासियों को सलाम कर लो। यह तुम्हारे लिए उत्तम है, ताकि तुम याद रखो।" [सूरा अन-नूर, आयत संख्या : 27] अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह स्पष्ट करते हुए कि किसी के घर में प्रवेश करने से पहले अनुमति लेने का कारण इस बात का भय है कि कहीं घर के लोगों की किसी गुप्त बात की जानकारी बाहर न चली जाए : “अनुमति माँगने का आदेश नज़र के कारण ही दिया गया है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/24। आज कल चूँकि बिल्डिंगें एक दूसरे से क़रीब हैं, इमारतें एक दूसरे से मिली हुई हैं तथा खिड़कियाँ और दरवाज़े एक दूसरे के आमने सामने हैं, इसलिए पड़ोसियों के सामने एक-दूसरे के भेदों से अवगत होने की आशंका अधिक बढ़ गई है। बहुत सारे लोग अपनी निगाहें नीची भी नहीं रखते। कभी-कभी ऊपर रहने वाले कुछ लोग जान-बूझकर अपनी खिड़कियों तथा छतों से नीचे रहने वाले पड़ोसियों के घरों में ताकते-झाँकते रहते हैं। जबकि ऐसा करना ख़यानत, पड़ोसियों के मान-सम्मान का हनन तथा हराम तक पहुँचने का माध्यम है और इसके कारण बहुत सारे फ़ितने और मुसीबतें सामने आती हैं। इस विषय के संगीन होने की दलील के तौर पर यह बात काफ़ी है कि शरीयत ने ताक-झाँक करने वाले की आँख फोड़ देने की अनुमति दी गई है और इसकी कोई दियत नहीं रखी गई है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो शख़्स दूसरों के घर में बग़ैर उनकी इजाज़त के झाँके, उसकी आँख फोड़ना घर वालों के लिए हलाल हो जाता है।” सहीह मुस्लिम : 3/1699। दूसरी रिवायत में है : “अगर उन्होंने उसकी आँख फोड़ दी, तो न कोई दियत है और न क़िसास।” मुसनद अहमद 2/385। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6022 में भी है।
दो व्यक्तियों को तीसरे को छोड़कर आपस में चुपके-चुपके बात करना :
यह हमारी सभाओं की बहुत बड़ी बुराई और शैतान की मुसलमानों के दरमियान फूट डालने तथा उनके सीनों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काने की शैतान की एक बड़ी चाल है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसका हुक्म और कारण बताते हुए फ़रमाया है : “जब तुम तीन आदमी हो तो तीसरे को शामिल किए बग़ैर दो आदमी काना-फूसी न करो, यहाँ तक कि लोगों से मिल जाओ, क्योंकि ऐसा करना उसे दुश्चिंता में डाल देता है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 11/83। इसके अंदर एक साथ रहने वाले तीन लोगों का चौथे साथी को छोड़कर आपस में सरगोशी करना भी दाख़िल है। इसी तरह दो व्यक्तियों का ऐसी ज़ुबान में बात करना भी, जिसे तीसरा न समझता हो। दरअसल कानाफूसी में एक तरह से तीसरे का अपमान होता है या उसे इस भ्रम में डाल दिया जाता है दोनों उसके साथ कुछ गलत करना चाहते हैं।
टख़ने के नीचे कपड़ा लटकाना :
टख़ने के नीचे लटका कर कपड़े पहनने को लोग हल्के में लेते हैं, हालाँकि अल्लाह के निकट यह एक बड़ा अपराध है। कुछ लोगों के कपड़े ज़मीन को छू जाते हैं तथा कुछ लोग कपड़े को पीछे घसीटते हुए चलते हैं। अबूज़र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अ़लैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “तीन लोग ऐसे हैं, जिनसे अल्लाह क़यामत के दिन न बात करेगा, न उनकी तरफ़ रहमत की दृष्टि से देखेगा और न उनको पाक करेगा, और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब होगा। (वह लोग हैं) अपने तहबंद को (टख़ने के नीचे) लटकाने वाला, एहसान जतलाने वाला और झूटी क़समों से अपना सामान बेचने वाला।” सहीह मुस्लिम : 1/102। जो व्यक्ति कहता है कि मैं अपना कपड़ा अभिमान से नहीं लटकाता, वह अपनी ओर से ऐसी सफ़ाई पेश करता है, जो मान्य नहीं है। क्योंकि कपड़े लटकाने वाले के लिए हदीस में जिस चेतावनी का उल्लेख है, वह आ़म है। चाहे वह अभिमान से लटकाए या बग़ैर अभिमान के। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन से यही इंगित होता है : “तहबंद का जो हिस्सा टख़नों से नीचे है, वह दोज़ख़ में है।” मुसनद अहमद 6/254। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 5571 में भी है। अतः अगर अभिमान से लटकाए तो उसकी सज़ा ज़्यादा सख़्त तथा बड़ी है। इसका उल्लेख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन में है : “जो व्यक्ति अभिमान के साथ कपड़े लटकाता है, क़यामत के दिन अल्लाह उसकी तरफ़ करुणा की दृष्टि से नहीं देखेगा।”
सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3465।
ऐसा इस लिए कि उसने एक साथ दो हराम कार्य किए हैं। याद रहे कि टखने से नीचे कपड़ा लटकाने की मनाही प्रत्येक परिधान के लिए है। इसका प्रमाण अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित यह हदीस है, जिसमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “लटकाना तहबंद, क़मीज़, पगड़ी सभी में है। जो व्यक्ति किसी कपड़े को अभिमान के साथ लटकाएगा क़यामत के दिन अल्लाह उसको रहमत की नज़र से नहीं देखेगा।” सुनन अबू दाऊद : 4/353। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : 2770। अलबत्ता औरतों के लिए पैरों के पर्दे के उद्देश्य से एक-दो बित्ता लटकाने की अनुमति है, ताकि हवा आदि के कारण कपड़ा उड़ने की स्थिति में शरीर का कोई अंग दिखाई न दे। मगर हाँ, उनके लिए भी सीमा पार करने की अनुमति नहीं है। जैसे शादी-ब्याह में कुछ दुल्हनों के कपड़े कई बित्ता तथा कई मीटर लटकते रहते हैं। कभी-कभी तो यहाँ तक नौबत आ जाती है कि दुल्हन के पीछे लटकते कपड़े किसी को पकड़े रहना पड़ता है।
पुरुषों के लिए किसी भी प्रकार के सोने का सामान इस्तेमाल करना :
अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “मेरी उम्मत की औरतों के लिए रेशम और सोना हलाल कर दिया गया है और उसके मर्दों पर हराम किया गया है।” मुसनद अहमद : 4/393। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 207। आजकल मार्केट में विशेष तौर पर पुरुषों के लिए विभिन्न कैरेट के सोने से या पूरे तौर पर सोने का पानी चढ़ा कर कई चीज़ें तैयार मिलती हैं, जैसे घड़ी, चश्मा, बटन, क़लम, चेन तथा कुंजीदान इत्यादि। कुछ प्रतियोगिताओं के पुरस्कार का ऐलान करते हुए यह कहना या लिखना कि “मर्दों के लिए सोने की घड़ी” एक गलत काम है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक आदमी के हाथ में सोने की एक अंगूठी देखकर उसे निकाल फेंका और फ़रमाया : “(क्या) तुममें से कोई आग की चिंगारी अपने हाथ में उठाने का इरादा करता है?” अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चले जाने के बाद उस आदमी से कहा गया कि तुम अपनी अंगूठी ले लो और उससे फ़ायदा उठाओ, तो उसने कहा : नहीं, अल्लाह की क़सम! मैं उसको कभी नहीं उठाऊँगा, जिसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फेंक दिया है। सहीह मुस्लिम : 3/1655।
स्त्रियों का छोटा, पतला तथा तंग कपड़ा पहनना :
आज हमारे दुश्मनों ने हमपर जिन चीज़ों के ज़रिए हमला किया है, उनमें विभिन्न डीज़ाइन के परिधान तथा विभिन्न स्टाइल व फ़ैशन के ड्रेस भी शामिल हैं जो मुसलमानों में आ़म हो चुके हैं। ये कपड़े इतने छोटे, इतने पतले या इतने तंग होते हैं कि इनसे शरीर के ढकने योग्य भाग ढकते नहीं हैं। इनमें से बहुत-से परिधानों का स्त्रियों के बीच तथा महरमों के सामने भी पहनना जायज़ नहीं है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अंतिम काल की स्त्रियों के बीच इस प्रकार के परिधानों के आम होने की सूचना पहले ही दे दी थी। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में आया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “दोज़ख़ियों की दो क़िस्में हैं जिनको मैंने नहीं देखा : एक क़िस्म वह लोग हैं जिनके पास गाय की दुमों के समान कोड़े होंगे जिनसे लोगों को मारेंगे। दूसरी क़िस्म वह औरतें हैं जो (बज़ाहिर) लिबास पहने होंगी, लेकिन नंगी होंगी, अपने कंधों को हिलाते हुए मटक-मटक कर चलेंगी, उनके सर लंबे गरदन वाले ऊँटों के कोहान के समान लचकदार होंगे, वह औरतें न जन्नत में जाएँगी और न ही जन्नत की ख़ुशबू पाएँगी, हालाँकि जन्नत की ख़ुशबू इतनी-इतनी दूर से आ रही होगी।” सहीह मुस्लिम : 3/1680। इस हदीस में आए हुए अरबी शब्द 'البُخت' का अर्थ है, लंबी गर्दनों वाले ऊँट। इस प्रकार के परिधानों में कुछ स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाले वो वस्त्र भी शामिल हैं, जो नीचे से लंबे सूराख वाले अथवा कई दिशाओं से फटे हुए होते हैं। इनको पहनकर जब कोई स्त्री बैठती है, तो उसके लज्जा स्थल के कई भाग खुल जाते हैं। साथ ही साथ इसमें काफ़िरों की मुशाबहत तथा उनके द्वारा आविष्कृत फैशनों का अनुकरण भी पाया जाता है। दुआ है कि अल्लाह हमें इस प्रकार की तमाम वस्तुओं से सुरक्षित रखे। इसी तरह कुछ कपड़ों में बुरी तस्वीरें होने का प्रचलन भी ख़तरनाक रूप धारण करता जा रहा है। जैसे गायकों की तस्वीरें, संगीत समूहों की तस्वीरें, शराब की बोतलों की तस्वीरें, सजीव चीज़ों की ऐसी तस्वीरें हो शरई दृष्टिकोण से हारम हैं, सलीब की तस्वीर, गंदगी फैलाने वाले क्लबों तथा संस्थाओं के नारे या मान-सम्मान की हानि करने वाले वाक्य, जो आम तौर पर अरबी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में लिखे होते हैं, आदि।
पुरुष अथवा स्त्री का अपने बाल में दूसरे इन्सान का या इन्सान के अलावा किसी और का बाल लगवाना :
असमा बिंत-ए-अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि एक औरत अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर कहने लगी : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी दुल्हन बेटी के बाल ख़सरा (चेचक) की बीमारी की वजह से गिर गए हैं। तो क्या मैं उसके सर में कृत्रिम बाल जोड़ सकती हूँ? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह ने उन स्त्रियों पर लानत की है जो कृत्रिम बाल जोड़ती हैं और जुड़वाती हैं।” सहीह मुस्लिम : 3/1676। और जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरत को अपने सर में कुछ मिलाने से मना फ़रमाया है। सहीह मुस्लिम : 3/1679। इसका एक उदाहरण हमारे दौर में बनावटी बालों का गुच्छा भी है। हमारे दौर में बाल मिलवाने वाली की मिसाल केश विन्यासकारीणियों की है, जिनके कार्य स्थल बहुत से बुराई से भरे होते हैं। इस हराम कार्य की एक मिसाल विग का उपयोग भी है, जिसका प्रयोग फिल्मों एवं नाटकों के ऐसे अभिनेता एवं अभिनेत्रियाँ करती हैं, जिनका आख़िरत में कोई भाग नहीं है।
वेश-भूषा, बात-चीत तथा चाल-चलन में स्त्री एवं पुरुष का एक-दूसरे की मुशाबहत एख़्तियार करना :
फ़ितरत का तक़ाज़ा यह है कि पुरुष अपने पुरुषत्व की और स्त्री अपने नारित्व की रक्षा करें। इससे लोगों का जीवन सही रूप से बसर होगा। जबकि पुरुष का स्त्री और स्त्री का पुरुष की मुशाबहत एख़्तियार करना फ़ितरत के विपरीत है। इससे बिगाड़ द्वार खुलते हैं और समाज में बेहयाई आम होती है। शरीयत की नज़र में यह कार्य हराम है। क्योंकि अगर कुरआन या हदीस में किसी कार्य को लानत का कारण बताया गया हो, तो वह कार्य हराम हुआ करता है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं : “अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्त्रियों की मुशाबहत अख़्तियार करने वाले पुरुषों पर तथा पुरुषों की मुशाबहत अख़्तियार करने वाली स्त्रियों पर लानत फ़रमाई है।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 10/324। जबकि अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ही से वर्णित दूसरी हदीस में है : “वेश-भूषा आदि में औरतों की मुशाबहत अख़्तियार करने वाले मर्दों पर तथा मर्दों की मुशाबहत अख़्तियार करने वाली औरतों पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लानत फ़रमाई है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/333। मुशाबहत कभी-कभी चाल-चलन और चलने फिरने में भी होती है। जैसे शरीर को स्त्री जैसा बनाना और बातचीत तथा चाल-ढाल में सत्रीत्व लाना। इसी तरह उभय लिंग में से किसी का भी दूसरे के जैसे कपड़े पहनना और उसकी विशेषताएँ अपनाना जायज़ नहीं है। अतः पुरुष के लिए हार, कंगन, पायल तथा झुमके इत्यादि पहनना, जो बहुत-से नासमझ लोग करते हैं, जायज़ नहीं है। इसी प्रकार स्त्री के लिए ऐसा लिबास पहनना जायज़ नहीं है, जो पुरुष के लिए ख़ास हो। स्त्री का वस्त्र रूप, विवरण और रंग में पुरुष से भिन्न होना चाहिए। इस बात का प्रमाण कि स्त्री एवं पुरुष का परिधान अलग-अलग होना ज़रूरी है, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित यह हदीस है, जिसमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “औरत की पोशाक पहनने वाले मर्द पर तथा मर्द की पोशाक पहनने वाली औरत पर अल्लाह ने लानत फ़रमाई है।” सुनन अबू दाऊद : 4/355। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : हदीस संख्या : 5071।
बालों को काले रंग से रंगना :
सहीह मत यह है कि बालों को काले रंग से रंगना हराम है, क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस तरह के लोगों को चेतावनी देते हुए कहा है : “आख़िरी ज़माने में ऐस लोग पैदा होंगे, जो अपने बालों को कबूतर के सीने की तरह काले रंग से रंगीन करेंगे, जिसके कारण वह जन्नत की ख़ुशबू तक नहीं पाएँगे।” सुनन अबू दाऊद : 4/419। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : हदीस संख्या : 8153। आज यह काम बहुत-से ऐसे लोगों में, जिनके बाल सफ़ेद होने लगे हैं, बड़ा आम हो चुका है। इस तरह के लोग अपने बालों को काले रंग से रंग लेते हैं, जिसमें कई बुराइयाँ छिपी हुई हैं। जैसे लोगों को धोखा देना और वास्तविकता को छुपनाना आदि। इसका इन्सान के व्यक्तिगत आचरण पर भी बुरा असर पड़ता है और कभी-कभी इन्सान इससे धोखा भी खा जाता है। सहीह हदीस से साबित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने बालों की सफ़ेदी को मेंहदी तथा इस प्रकार की अन्य चीज़ों से, जिनमें पीलापन, लालपन या भूरापन होता था, रंग लिया करते थे। जब मक्का विजय के दिन आपके सामने अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पिता अबू क़ुहाफ़ा लाए गए, तो उस समय उनके सर और दाढ़ी के बाल अत्यधिक पकने के कारण सफ़ेद फूल की तरह बिल्कुल सफ़ेद दिखाई दे रहे थे। यह देख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “इसे किसी चीज़ से इसे बदल दो और काले रंग से बचो।” सहीह मुस्लिम : 3/1663। सही बात यह है कि इस विषय में स्त्री भी पुरुष की तरह है। अतः वह भी अपने उन बालों को, जो काले नहीं हैं, काले रंग से रंग नहीं सकती।
कपड़े, दीवार तथा काग़ज़ इत्यादि में प्राण वाली चीज़ों की तस्वीर उतारना :
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “क़यामत के दिन अल्लाह के यहाँ सबसे सख़्त अज़ाब भोग करने वाले तस्वीर उतारने वाले लोग होंगे।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 10/824। और अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा, जो मेरे पैदा करने की तरह पैदा करने की कोशिश करता है? (अगर हो सके तो) एक दाना या एक कण)ही पैदा करके दिखाए।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/385 अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “ हर तस्वीर उतारने वाला दोज़ख़ में जाएगा, उसकी उतारी हुई हर तस्वीर में (अल्लाह तआ़ला) रूह (प्राण) डालेगा, पस वह उसे जहन्नम में अ़ज़ाब देगी । ” अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं : "अगर तुम करना ही चाहते हो, तो वृक्ष तथा आत्माही चीज़ों की तस्वीर उतारो।" सहीह मुस्लिम : 3/1671। इन हदीसों से मालूम होता है कि सजीव चीजों, जैसे इन्सानों एवं जानवरों की तस्वीर उतारना या प्रतिमा बनाना जायज़ नहीं है। चाहे तस्वीर की छाया हो या न हो, मुद्रित हो या खीची गई हो, पत्थर को कुरेदकर बनाई गई हो या उसपर लिखर, पत्थर को तराशकर बनाई गई हो या किसी धातु को पिघलाकर फ्रेम में ढालकर। तस्वीर के हराम होने से संबंधित हदीसों के अंतर्गत ये सारी उसके ये सारे रूप आ जाते हैं। मुसलमान को चाहिए कि शरई दलीलों के सामने अपने आप को टेक दे और वाद-विवाद करते हुए यह न कहे कि न तो मैं इनकी इबादत करता हूँ और न ही इनको सजदा करता हूँ!! अगर कोई ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान की दृष्टि से आग के युग में तस्वीर के कारण फैली हुई ख़राबियों में से सिर्फ़ एक ख़राबी पर ग़ौर करे, तो शरीयत में तस्वीर के हराम होने की हिकमत को जान जाएगा। इसके नतीजे में आज अश्लीलता एवं कामोत्तेजना जैसी कई खराबियाँ सामने आ गई हैं। बल्कि व्यभिचार के द्वार खुल गए हैं। एक मुसलमान को चाहिए कि अपने घर में किसी सजीव वस्तु की तस्वीर न रखे, ताकि उसके घर में फ़रिश्तों का आना जाना बंद न हो। क्योंकि अल्लाह के नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “फ़रिश्ते उस घर में प्रवेश नहीं करते, जिसमें कुत्ता या तस्वीरें हों।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 10/380। कुछ घरों में मूर्तियाँ पाई जाती हैं जिनमें से कुछ काफ़िरों के पूज्यों की मूर्तियाँ भी होती हैं, जो भेंट के नाम पर और ज़ीनत के तौर पर रखी जाती हैं, हालाँकि इसकी मनाही दूसरी तस्वीरों की तुलना में ज़्यादा अधिक है। इसी तरह लटकाई हुई तस्वीरों की मनाही अन्य तस्वीरों से अधिक है। क्योंकि इन तस्वीरों ने न जाने कितनों को सम्मान पर मजबूर किया, कितनों की दबी हुई पीड़ाओं को ताज़ा कर दिया और कितनों को अभिमान का रास्ता दिखाया!! यह कहना सही न होगा कि तस्वीरें यादगार के लिए हैं, क्योंकि किसी प्रिय एवं नाते के मुसलमान की असल याद तो दिल में होती है, जिसके नतीजे में उसके लिए क्षमा एवं दया की दुआ की जाती है। अतः सारी तस्वीरों को घर से निकाल देना या मिटा देना चाहिए। यहाँ यदि किसी को हटाना कठिन या मुश्किल हो तो बात अलग है। जैसे डब्बों, शब्दकोषों, संदर्भ पुस्तकों और अन्य लाभकारी किताबों की तस्वीरें। लेकिन जहाँ तक हो सके, उन्हें हटाने की कोशिश होनी चाहिए और उनमें से बुरी तस्वीरों से बचने का प्रयास करना चाहिए। इसी तरह उन तस्वीरों को रखा जा सकता है, जिनकी ज़रूरत पड़ती है। जैसे पहचान पत्र आदि की तस्वीरें। कुछ उलेमा उन तस्वीरों की भी अनुमति दी है, जो हेय समझी जाती हैं। जैसे चटाई पर सत्वीर हो और उसपर पाँव रखकर चला जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “तो जहाँ तक तुमसे हो सके, अल्लाह से डरते रहो।” सूरा अल-तग़ाबुन, आयत संख्या : 16।
झूठे सपने बयान करना :
कुछ लोग स्वप्न के नाम पर ऐसी बातें घड़कर लोगों को बताते हैं, जो उन्होंने देखी नहीं है, ताकि सम्मान प्राप्त कर सकें, लोगों के बीच चर्चित हो जाएँ, आर्थिक लाभ प्राप्त हो जाए या किसी ऐसे व्यक्ति को डरा सकें, जिससे उनको दुश्मनी हो। चूँकि बहुत-से साधारण लोग स्वप्नों के प्रति आस्था रखते हैं, इसलिए इस झूठ से झाँसे में आ जाते हैं। ऐसा करने वालों के लिए हदीस में बड़ी सख़्त चेतावनी आई है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “सबसे बड़ी झूठी तथा गढ़ी हुई बातों में से कुछ यह हैं कि आदमी अपने को दूसरे के बाप की ओर मंसूब करे या अपनी आँखों को वह चीज़ दिखलाए जिसको उसने देखा नहीं है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तरफ़ ऐसी बात मंसूब करे जो आपने कही नहीं है।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 6/540। दूसरी हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “जिस व्यक्ति ने ऐसा सपना बयान किया जो उसने देखा नहीं है, उससे (क़यामत के दिन) कहा जाएगा कि जौ के दो दानों के बीच गिरह लगाओ, लेकिन वह कभी गिरह लगा न सकेगा---।” सहीह बुख़ारी। देखिए फ़त्ह अल-बारी : 12/427। चूँकि दो जौ में गिरह लगाना असंभव बात है। अतः उसे दिया जाने वाला यह बदला भी उसके कर्म जैसा ही है।
क़ब्रों पर बैठना, उनको रौंदना तथा क़ब्रिस्तान में पेशाब-पाख़ाना करना :
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “तुममें से कोई आदमी अंगारे पर बैठे और अंगारा उसके कपड़ों को जला दे और उसका असर उसके चमड़े तक पहुँच जाए, उसके लिए यह बेहतर है इससे कि वह किसी क़ब्र पर बैठे।” सहीह मुस्लिम : 2/667। कुछ लोग क़ब्रों को रौंदते हुए चलते हैं। जब अपने मुर्दे को दफ़नाने जाते हैं, तो आस-पास में दफ़न दूसरे मुर्दों के सम्मान का ख़याल नहीं रखते और उन्हें अपने पैरों, बल्कि कभी-कभी अपने जूतों से भी रौंदने लगते हैं। इसके भारी अपराध होने के सिलसिले में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “मेरा किसी अंगारे पर या किसी तलवार पर चलना, अथवा पैरों के साथ अपने जूतों को सी देना, मेरे नज़दीक किसी मुसलमान की क़ब्र पर चलने से ज़्यादा प्रिय है।” सुनन इब्न-ए-माजा : 1/499। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5068 में भी है। अगर ये उनका अंजाम बै जो क़ब्रों पर चलते हैं, तो उनका क्या अंजाम होगा, जो क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाकर उसपर व्यवसाय या निवास के लिए भवन बना लेते हैं? इसी तरह कुछ अभागे लोग क़ब्रिस्तान में पेशाब-पाख़ाना कर देते हैं। इस तरह के लोगों को जब पेशाब-पाख़ाना की ज़रूरत होती है, तो क़ब्रिस्तान की दीवार फाँदकर या उसमें प्रवेश करके अपनी गंदगी से मुर्दों को कष्ट देते हैं। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाते हैं : “मुझे इसकी परवाह नहीं है कि क़ब्र के बीच में पेशाब-पाखाना करूँ या बाज़ार के बीच में।” पिछला ही संदर्भ देखें। अर्थात क़ब्रिस्तान में पेशाब-पाख़ाना करना उसी तरह बुरा है, जिस तरह बाज़ार में लोगों के सामने लज्जा स्थल खोलकर पेशाब-पाख़ाना करना। जो लोग जान-बूझकर क़ब्रिस्तानों में, ख़ासकर उन क़ब्रिस्तानों में, जो वीरान हो चुके हों और जिनकी दीवारें गिर चुकी हों, गंदगी तथा कूड़ा-करकट फेंकते हैं, उक्त धमकी में वह लोग भी शामिल हैं। क़ब्रिस्तानों की ज़ियारत के समय जिन आदाब का ख़्याल रखना चाहिए उनमें से एक यह है कि क़ब्रों के बीच चलने का इरादा करते समय अपने जूते उतार लिए जाएँ।
पेशाब से न बचना :
हमारी इस शरीयत की एक खूबी यह है कि इसने हर उस कार्य का आदेश दिया है, जो इन्सान को सुंदर बनाए। मसलन इसने गंदगी को दूर करने का आदेश दिया है और इसके लिए पेशाब-पाखाना के बाद पानी तथा पानी अपलब्ध न होने की अवस्था में ढेला-पत्थर से पवित्रता प्राप्त करने का नियम बनाया है। साथ ही पवित्रता प्राप्त करने का तरीक़ा भी बताया है। मगर कुछ लोग गंदगी दूर करने के सिलसिले में सुस्ती से काम लेते हैं, जिसके कारण उनके कपड़े या उनके शरीर में गंदगी लग जाती है और इसके नतीजे में उनकी नमाज़ सही नहीं होती। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है कि यह (यानी पेशाब से न बचना) क़ब्र में अज़ाब होने के विभिन्न कारणों में से एक कारण है। चुनांचे अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित) है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना के बाग़ों में से किसी एक बाग़ के पास से गुज़रते हुए दो ऐसे आदमी की आवाज़ सुनी जिन्हें उनकी क़ब्रों में अ़ज़ाब हो रहा था, तो आपने फ़रमाया : “इन दोनों को अज़ाब हो रहा है, लेकिन इन्हें किसी बड़ी चीज़ के कारण अज़ाब नहीं हो रहा है। ” फिर आपने फ़रमाया : “क्यों नहीं! बेशक वह बड़ा पाप है (जिसके कारण इन्हें अज़ाब हो रहा है)। इनमें से एक अपने पेशाब से नहीं बचता था और दूसरा चुग़ली करता था।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 1/317। बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यहाँ तक फ़रमाया कि : “अकसर क़ब्र का अज़ाब पेशाब की वजह से होता है।” मुसनद अहमद 2/326। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 1213 में भी है। पेशाब से न बचने वाले के अंतर्गत वह व्यक्ति भी आता है जो पूरे तौर पर पेशाब समाप्त होने से पहले उठ जाए अथवा जान-बूझ कर ऐसी अवस्था में या ऐसी जगह में पेशाब करे कि पेशाब छीटें उसके शरीर या कपड़े पर पड़ें अथवा पानी या पत्थर से इस्तिंजा न करे। या फिर करे, लेकिन सही ढंग से नहीं। वर्तमान युग में काफ़िरों का अनुकरण करते हुए कुछ शौचालयों में पेशाब के लिए ऐसी जगहें बनाई गई हैं जो दीवारों के साथ लगी तथा खुली हैं। वहाँ लोग आते हैं और आने-जाने वालों के सामने निर्लज्ज होकर पेशाब करते हैं। फिर गंदगी के साथ ही कपड़ा अपना कपड़ा पहनकर चले जाते हैं। इस तरह वे दो बुरे तथा अवैध कार्य करते हैं : 1- लोगों की निगाह से अपनी शर्मगाह की हिफ़ाज़त नहीं करते। 2- न पेशाब से बचते हैं और न उसे साफ़ करते हैं।
चोरी-छिपे किसी की बात सुनना, जबकि वह सुनाना न चाहता हो :
उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है : “और तुम जासूसी न करो।” सूरा अल-हुजुरात, आयत संख्या : 11। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिसने किसी की बात सुनी, जबकि वह सुनाना न चाहता हो, क़यामत के दिन उसके कानों में सीसा पिघलाकर डाला जाएगा।” तबरानी की अल-कबीर : 11/248-। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या :6004 में भी है।
इस हदीस में आए हुए अरबी शब्द 'الآنُك' अर्थ है : पिघलाया हुआ सीसा।
अगर वह लोगों की जानकारी के बिना उन्हें क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से उनकी बात दूसरों को पहुँचाता है, तो बिना जानकारी दिए सुनने के साथ-साथ एक और गुनाह करते हैं। क्योंकि वह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस के दायरे में आता है : “चुग़लख़ोर जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/472।
इस हदीस में आए हुए अरबी शब्द 'القتَّات' का अर्थ है : वह व्यक्ति, जो लोगों की बात इस तरह सुनता है कि वे जान न सकें।
पड़ोसियों के साथ बुरा व्यवहार करना :
अल्लाह ने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार दिया है। उसने कहा है : “अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, किसी चीज़ को उसका साझी न बनाओ तथा माता-पिता, समीपवर्तियों, अनाथों, निर्धनों, समीप और दूर के पड़ोसी, यात्रा के साथी, यात्रि और अपने दास-दासियों के साथ उपकार करो। निःसंदेह अल्लाह उससे प्रेम नहीं करता, जो अभिमानी अहंकारी हो।” सूरा अन्-निसा - 36 पड़ोसी का अधिकार बहुत बड़ा है। यही कारण है कि उसे कष्ट देना हराम है। अबू शुरैह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह की क़सम! वह मोमिन नहीं है। अल्लाह की क़सम! वह मोमिन नहीं है। अल्लाह की क़सम! वह मोमिन नहीं है।” पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! कौन? आपने फ़रमाया : “जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से सुरक्षित नहीं रहता।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/443। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पड़ोसी के हक़ में पड़ोसी की प्रशंसा अथवा निंदा को सदाचार अथवा दुराचार का मापदंड बताया है। अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : एक आदमी ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने अच्छा किया या बुरा किया, मुझे यह कैसे मालूम होगा? तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जब तुम अपने पड़ोसियों को यह कहते हुए सुनो कि तुमने यह अच्छा किया, तो जान लो कि तुमने अच्छा किया और जब तुम उन्हें यह कहते हुए सुनो कि तुमने बुरा किया तो जान लो कि तुमने बुरा किया।” मुसनद अहमद : 1/402। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या :6237 में भी है।
पड़ोसी को कष्ट विभिन्न प्रकार से दिया जा सकता है, जैसे:
उसे साझे की दीवार में लकड़ी गाड़ने से मना करना, उसकी अनुमति के बिना उससे ऊँचा मकान बनाकर धूप अथवा हवा को रोक लेना, उसके घर की तरफ़ खिड़की लगाना और उसके भेद जानने के लिए उससे झाँकना, या घबराहट देने वाली आवाज़ों द्वारा कष्ट देना। जैसे खटखटाना और चीख़ना-चिल्लाना आदि। विशेष रूप से सोने तथा आराम करने के समयों में। या फिर उसके बच्चों को मारना अथवा उसके दरवाज़े पर कचड़ा फेंकना। गुनाह उस समय अधिक बढ़ जाता है जब पड़ोसी पड़ोसी के अधिकार का हनन करे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “आदमी का दस के साथ कुकर्म करने का जुर्म अपने पड़ोसी की एक स्त्री से कुकर्म करने की अपेक्षा आसान तथा हल्का है। इसी तरह आदमी का दस घरों से चोरी करने का जुर्म अपने पड़ोसी के घर से चोरी करने की अपेक्षा आसान तथा हल्का है।” इमाम बुख़ारी की किताब अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 103। यह हदीस अस-सिलसिला अस-सहीहा, हदीस संख्या : 65 में भी है। कुछ ख़यानत करने वाले लोग अपने पड़ोसी की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाकर उसके घर में घुस जाते हैं और अपनी हवस मिटाते हैं। ऐसे लोगों के लिए आख़िरत में बड़ी भीषण यातना है।
वसीयत में हक़दार का हक़ मारकर या घटा कर उसे नुक़्सान पहुँचाना :
हमारी शरीयत का एक सिद्धांत यह है कि इन्सान किसी की न बिना इरादे हानी कर सकता है और न इराद के साथ। इसका एक उदाहरण है, शरीयत ने जिन लोगों को उत्तराधिकारी घोषित किया है, उनको या उनमें से किसी को नुक़सान पहुँचाना। जिसने ऐसा किया, उसके लिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह धमकी है : “जो दूसरों को नुक़्सान पहुँचाएगा अल्लाह उसे नुक़्सान पहुँचाएगा और जो दूसरों को तकलीफ़ देगा अल्लाह उसको तकलीफ़ देगा।” मुसनद अहमद : 3/453। देखिए : सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6348। वसीयत द्वारा नुक़्सान पहुँचाने के कुछ रूप हैं : किसी वारिस को उसके शरई अधिकार से वंचित कर देना, शरई नियम-क़ानून के ख़िलाफ़ जाकर किसी वारिस के लिए वसीयत करना या एक तिहाई धन से अधिक की वसीयत करना। उन स्थानों में जहाँ शरई क़ानून के मुताबिक़ फ़ैसला नहीं होता, हक़दार को उसका वह हक़ मिलना, जो अल्लाह ने उसे दिया है, कठिन होता है। क्योंकि वहाँ मानव रचित क़ानून लागू है, जो शरीयत के ख़िलाफ़ फ़ैसला देता है और वकील के पास लिखी हुई अत्याचारपूर्ण वसीयत को लागू करने का आदेश देता है। इस तरह के लोगों के लिए बड़ा विनाश और हलाकत है।
नरद से खेलना :
लोगों में प्रचलित बहुत सारे खेल बहुत-सी हराम चीज़ों को सम्मिलित हैं। इस तरह की एक वस्तु नरद भी है। इसके रास्ते से लोग बहुत सारे खेलों में प्रवेश करते हैं। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस नरद से खेले जाने वाले खेल से सावधान किया है, जो जुआ के दरवाज़े खोलता है। आपने कहा है : “जिसने नरद खेला, गोया उसने अपने हाथ को सुअर के मांस तथा उसके ख़ून से रंग लिया।” सहीह मुस्लिम : 4/1770। और अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने नरद का खेल खेला, उसने अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की।” मुसनद अहमद (4/394) सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6505।
मोमिन पर लानत करना तथा किसी ऐसे व्यक्ति पर लानत करना जो उसका हक़दार न हो :
बहुत-से लोग ग़ुस्से की हालत में अपनी ज़बान को कन्ट्रोल नहीं कर पाते और फ़ौरन लानत कर देते हैं। इस तरह के लोग इन्सानों के साथ-साथ जानवरों, बेजान चीज़ों, दिनों और समयों पर भी लानत करने लगते हैं। कभी-कभी तो स्वयं अपने आप तथा अपने बच्चों पर भी लानत करने लगते हैं। पति पत्नी पर और पत्नी पति पर भी लानत करती है। यह बहुत ही संगीन विषय है। अबू ज़ैद साबित बिन ज़ह्हाक अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “किसी मोमिन पर लानत करना उसकी हत्या के समान है।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/465। चूँकि लानत करने का कार्य अधिकतर स्त्रियाँ करती हैं, इसलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि यह उनके जहन्नम में प्रवेश करने का एक प्रमुख कारण है। इसके अ़लावा लानत करने वाले क़यामत के दिन सिफ़ारिशी नहीं होंगे। इससे भी ज़्यादा भयानक बात यह है कि जिसपर लानत की गई है, अगर वह इसका पात्र नहीं है तो लानत उसी की ओर लौट जाएगी। इस तरह वह स्वयं अपने लिए अल्लाह की कृपा से दूरी की दुआ करने वाला सिद्ध हो जाएगा।
मैयत पर रोना-पीटना :
हमारे समाज एक बड़ी बुराई यह है कि कुछ स्त्रियाँ किसी के मरने पर चीख-चीखकर रोती हैं, मृत व्यक्ति की अच्छाइयाँ बयान करती हैं, चेहरा पीटती हैं, कपड़े फाड़ती हैं, सिर के बाल मुँड़वाती हैं तथा इस तरह के अन्य कार्य करती हैं। दरअसल यह सारे कार्य अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट न होने तथा मुसीबत के समय सब्र न करने का परिचायक हैं। ऐसा करने वालों पर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लानत की है। अबू उमामा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना चेहरा नोचने वाली, अपना गरेबान फाड़ने वाली और हलाकत व मौत को बुलाने वाली औरत पर लानत फ़रमाई है।” सुनन इब्न-ए-माजा : 1/505। यह हदीस सहीह अल-जामे हदीस संख्या : 5068 में भी है। अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “वह व्यक्ति हममें से नहीं है, जो गाल पीटे, गरेबान फाड़े और अज्ञानता काल की बातें मुँह से निकाले।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 3/163। दूसरी हदीस में अल्लाह के नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “नौहा करने वाली जब मौत से पहले तौबा न करे, तो क़यामत के दिन इस अवस्था में उठाई जायेगी कि उसपर गंधक का कुर्ता और ख़ारिश की क़मीज़ होगी।” सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 934
चेहरे पर मारना और दाग़ लगाना :
जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं : “अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चेहरे पर मारने तथा उसे दाग़ने से मना फ़रमाया है।” सहीह मुस्लिम : 3/1673। बहुत-से पिता अपने बेटों को तथा शिक्षक अपने छात्रों को और मालिक अपने नौकरों को सज़ा देते हुए उनके चेहरों पर हाथों से या दूसरी चीज़ों से मारते हैं। ऐसा करने में जहाँ चेहरे का अपमान है, जिसे अल्लाह ने सम्मान दिया है, वहीं उसके कुछ महत्वपूर्ण ईंद्रियों के खोने का भी अंदेशा रहता है, जिसके कारण उसे पछतावे का शिकार होना पड़ेगा और कभी-कभी क़िसास की भी नौबत आ सकती है। जहाँ तक जानवरों के चेहरे पर दाग़ने यानी दागकर ऐसी विशिष्ट पहचान लगाने की बात है, जिससे जानवर का मालिक अपने जानवर को पहचान ले या गुम होने की अवस्था में उसे वापस मिल जाए, तो यह एक अवैध कार्य है, जो रूप बिगाड़ने तथा यातना देने के अंतर्गत आता है। अगर कोई यह तर्क दे कि यह उसके क़बीले की प्रथा तथा उसकी विशिष्ट पहचान है, तो चेहरे को छोड़ दूसरे स्थान में दाग़ सकता है।
किसी शरई कारण के बिना किसी मुसलमान से तीन दिन से अधिक समय तक संबंध तोड़े रखना :
शैतान की एक चाल है, मुसलमान के आपसी संबंधों को तोड़ना। शैतान के पदचिह्नों पर चलने वाले बहुत-से लोग किसी सांसारिक मतभेद या छोटे-मोटे झगड़ों आदि गैर-शरई कारणों से अपने मुसलमान भाइयों से संबंध विच्छेद कर लेते हैं और सालों साल संबंध तोड़े रखते हैं। कभी-कभी तो बात न करने की क़सम खा लेते हैं और उसका घर न जाने की मन्नत मान लेते हैं। ऐसे अगर रास्ते में मुलाक़ात हो जाती है तो मुँह फेर लेते हैं। अगर किसी सभा में मुलाक़ात हो जाती है, तो उसको छोड़कर उसके आगे-पीछे के सारे लोगों से मुसाफ़हा करते हैं। इससे मुस्लिम समाज में कमज़ोरी आती है। इसीलिए शरीयत ने इस संबंध में स्पष्ट आदेश दिया है और ऐसा करने को बड़ी सख्त चेतावनी दी है। और अबू-हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “किसी मुसलमान के लिए जायज़ नहीं है कि वह तीन दिन से ज़्यादा अपने मुसलमान भाई से संबंध तोड़कर रखे। जो व्यक्ति तीन दिन से ज़्यादा संबंध तोड़ कर रखेगा और उस काल में मरेगा, वह जहन्नम में दाख़िल होगा।” सुनन अबू दाऊद : 5/215। यह हदीस सहीह अल-जामे में भी है। देखिए : हदीस संख्या : 7635। और अबू ख़राश अस्लमी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : “जिसने अपने भाई से एक साल तक संबंध तोड़कर रखा, गोया उसने उसका ख़ून बहाया।” इमाम बुख़ारी की किताब अल-अदब अल-मुफ़रद, हदीस संख्या : 406। यह हदीस सहीह अल-जामे, हदीस संख्या : 6557 में भी है। मसलमानों से संबंध तोड़ने की यही सज़ा क्या कम है कि इससे इन्सान अल्लाह की क्षमा से वंचित हो जाता है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “हर हफ़्ता दो बार यानी सोमवार और गुरूवार को लोगों के कर्म पेश किए जाते हैं। चुनांचे हर मोमिन बंदे को माफ़ कर दिया जाता है, सिवाय उस बंदे के, जिसके बीच और उसके भाई के बीच दुश्मनी हो। कहा जाता है : इन दोनों को छोड़ दो या इनका मामला लंबित रख दो, यहाँ तक कि लौट जाएँ यानी आपस में सुलह कर लें।” सहीह मुस्लिम : 4/1988। दोनों झगड़ने वालों में से जो तौबा करे, उसे चाहिए कि अपने साथी के पास जाए और उससे सलाम करते हुए मिले। अगर उसने ऐसा किया और उसके साथी ने मुँह फेर लिया, तो वह भारमुक्त हो गया और अब ज़िम्मेदारी इनकार करने वाले के कंधे पे आ गई। अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “किसी मुसलमान के लिए जायज़ नहीं कि वह अपने भाई से तीन रात से ज़्यादा संबंध तोड़कर रखे। दोनों मुलाक़ात करें तो यह इधर मुँह कर ले और वह उधर मुँह कर ले। उन दोनों में से बेहतर वह है, जो सलाम करने में पहल करे।” सहीह बुख़ारी। देखिए : फ़त्ह अल-बारी : 10/492। लेकिन अगर संबंध तोड़ने करने का कोई शरई कारण हो, जैसे नमाज़ न पढ़ना या निरंतर कोई बुरा काम करते रहना आदि और संबंध तोड़ने से बुराई करने वाले को लाभ हो, मसलन वह सुधर जाए या उसे अपनी गलती का एहसास हो जाए, तो संबंध विच्छेद करना ज़रूरी होगा। लेकिन अगर इससे बुराई करने वाले के अंदर ज़िद आ जाए और वह अधिक गुनाह करने लगे, तो संबंध तोड़ना उचित नहीं होगा। क्योंकि इससे शरई मसलहत पूरी नहीं होगी और बिगाड़ और अधिक बढ़ जाएगा। अतः उचित यही होगा कि उसके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए, उसे अच्छा मश्वरा दिया जाए और समझाने का प्रयास किया जाए। अंत में बता दूँ कि ये हमारे समाज में फैले हुए कुछ अवैध कार्य हैं, जिन्हें एकत्र किया जा सका है। हालाँकि इस संबंध में और भी बहुत कुछ लिखने की गुंजाइश है। मेरा इरादा है कि कुरआन एवं हदीस में मना किए गए कुछ कार्यों पर आधारित एवं अध्याय अलग से लिख दिया जाए, ताकि पाठक को संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके। अल्लाह ने चाहा तो इसके लिए एक अलग से पुस्तिका तैयार की जाएगी। पवित्र एवं उच्च अल्लाह से दुआ है कि हमें अपना इतना भय प्रदान करे कि हमसे कोई गुनाह न हो तथा आज्ञापालन का इतना सुयोग प्रदान करे कि हम जन्नत प्राप्त कर सकें। साथ ही हमारे गुनाहों तथा कोताहियों को क्षमा कर दे, हमें हलाल चीज़ों द्वारा हराम चीज़ों से दूर रखे और अपने अनुग्रह से किसी दूसरे के सामने हाथ फैलाने नौबत न आने दे। और हमारी तौबा क़बूल फ़रमाए तथा हमारे गुनाहों को धो दे। निश्चय ही वह सुनने वाला और क़बूल करने वाला है। दरूद और सलाम नाज़िल हो उम्मी नबी मुहम्मद पर और उनके परिजनों तथा तमाम साथियों पर। तथा सभी प्रशंसा, अल्लाह, सर्वलोक के पालनहार के लिए है।