كيفية صلاة النبي - صلى الله عليه وسلم -
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्म की नमाज़ का तरीक़ा
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्म की नमाज़ का तरीक़ा
आदरणीय शैख़
अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु अत्यंत दयावान है।
समस्त प्रकार की प्रशंसा केवल अल्लाह की है, तथा प्रशंसा एवं शांति प्राप्त हो उसके बन्दे और रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, उनके परिवार एवं सहाबा पर। इसके बद अब मूल विषय पर आते हैं :
ये कुछ संक्षिप्त बातें हैं, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ के तरीके को स्पष्ट करने के लिए लिखी गई हैं। मैं इन्हें हर मुसलमान पुरुष और महिला के समक्ष पेश करना चाहता हूँ, ताकि इनको पढ़ने वाला हर व्यक्ति नमाज़ के संबंध में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करने का प्रयास करे; क्योंकि आपका फ़रमान है : "तुम उसी प्रकार नमाज़ पढ़ो, जिस प्रकार मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो।" ([1]) अब पाठकगण की सेवा में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का तरीक़ा प्रस्तुत है : () सहीह बुख़ारी (605)।
1- संपूर्ण रूप से वज़ू करना। यानी क़ुरआन की इस आयत में दिए गए अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए, जिस तरह इसमें कहा गया है उसी तरह वज़ू करना, जिस तरह अल्लाह ने आदेश दिया है। अल्लाह के इस आदेश का पालन करते हुए : "हे ईमान वालों ! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने मुंह तथा कोहनियों सहित अपने हाथों को धो लिया करो और अपने सिर का मसह कर लो, तथा अपने पैर टखनों सहित धुल लो।" ([2]) [सूरा माइदा : 6] पूरी आयत देखें।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन के अनुसार : "बिना वज़ू के नमाज़ स्वीकार नहीं की जाती।" ([3]) () सहीह मुस्लिम (224)।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस व्यक्ति से, जिसने अपनी नमाज़ में गलती की थी, फ़रमाया : "जब तुम नमाज़ के लिए खड़े हो, तो अच्छे से वज़ू करो।" ([4]) () सहीह बुख़ारी (5782)।
2- नमाज़ी अपना चेहरा क़िबला (काबा) की ओर (पूरे शरीर के साथ) कर ले, चाहे वह जहाँ भी हो। तथा अपने दिल से उस नमाज़ की, फ़र्ज़ हो कि नफ़्ल, नीयत करे, जिसे अदा करना चाहता है। ज़बान से नीयत का उच्चारण न करे। क्योंकि, ज़बान से नीयत करना शरीयत सम्मत नहीं, बल्कि बिदअत है। क्योंकि, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने कभी ज़बान से नीयत का उच्चारण नहीं किया। नमाज़ पढ़ रहा व्यक्ति यदि इमाम हो या अकेले नमाज़ पढ़ रहा हो, तो अपने सामने एक सुत्रह (आड़) रख ले तथा उसी की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़े। क़िबला की ओर मुँह करना नमाज़ के लिए शर्त है, केवल उन विशेष परिस्थितियों को छोड़कर, जो इस्लामी विद्वानों की पुस्तकों में विस्तार से वर्णित हैं।
3- तकबीर-ए-तहरीमा के तौर पर अल्लाहु अकबर कहे तथा उस समय नज़र सजदा के स्थान पर रखे।
4- तकबीर-ए-तहरीमा कहते समय अपने हाथों को कंधों के समानांतर अथवा कानों के निचले भाग (कर्णपाली) तक उठाए।
5- अपने हाथों को अपने सीने पर रखे। दाहिने हाथ को बाएं हाथ, कलाई और बाँह पर रखे। क्योंकि, यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है।
6- नमाज़ आरंभ करने की दुआ पढ़ना सुन्नत है। नमाज़ आरंभ करने की दुआ यह है : ''ऐ अल्लाह! मेरे और मेरे पापों के बीच वैसी दूरी बना दे, जैसी दूरी तूने पूर्व और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह! मुझे पापों से ऐसे साफ-सुथरा कर दे, जिस प्रकार सफ़ेद कपड़ा मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे पापों से जल, बर्फ और ओले के द्वारा धो दे।" ([5]) [4] सहीह बुख़ारी (744), सहीह मुस्लिम (598)।
यदि चाहे तो इसके बदले यह दुआ पढ़े : "तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं। तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।" ([6]) यदि इन दोनों के स्थान पर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित कोई और दुआ -ए- इस्तिफ़्ताह़ (नमाज़ आरंभ करने की दुआ) पढ़ ले, तब भी कोई हर्ज नहीं है। वैसे, बेहतर यह है कि कभी इसे पढ़े और कभी उसे। क्योंकि, इस तरह पूर्णरूपेण नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण हो जाता है। फिर इसके बाद कहे : "मैं अल्लाह की शरण माँगता हूँ धुतकारे हुए शैतान से, एवं आरंभ करता हूँ अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयावान रहम करने वाला है।" और सूरा फ़ातिहा पढ़े। क्योंकि, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है : "जिसने सूरा-ए-फ़ातिहा नहीं पढ़ी, उसकी नमाज़ ही नहीं।" ([7]) सूरा फ़ातिहा के बाद जहरी (उच्च ध्वनी की क़िरात वाली) नमाज़ों में ज़ोर से तथा सिर्री (धीमी आवाज़ की क़िरात वाली) नमाज़ों में धीमे से आमीन कहे। फिर क़ुरआन के जितने भाग का हो सके, पाठ करे। उत्तम यह है कि ज़ोहर, अस्र और इशा की नमाज़ में सूरा अल-फातिहा के बाद औसात-ए-मुफ़स्सल से पढ़े, फ़ज्र की नमाज़ में तिवाल-ए-मुफ़स्सल से पढ़े तथा मग़्रिब में कभी तिवाल-ए-मुफ़स्सल से पढ़े और कभी क़िसार-ए-मुफ़स्सल से, ताकि इस विषय में वर्णित समस्त हदीसों पर अमल हो जाए। सहीह मुस्लिम (399)। सहीह बुख़ारी (756)।
7- रुकू करते समय तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहे, अपने हाथों को कंधों या कानों के बराबर उठाए, अपने सर को पीठ के समानांतर रखे, अपने हाथों को घुटनों पर रखे, उंगलियों को फैलाकर रखे, रुकू इत्मीनान से करे तथा यह दुआ पढ़े : "मेरा महान रब पवित्र है।" बेहतर यह है कि इस दुआ को तीन या इससे अधिक बार दोहराए। इसके साथ-साथ यह दुआ कहना भी मुस्तहब है : "ऐ अल्लाह! पवित्र है तू हर प्रकार के दोष एवं त्रुटि से, समस्त प्रकार की प्रशंसाएं तेरे लिए हैं। ऐ अल्लाह! तू मुझे क्षमा कर दे।" ([8]) () सहीह बुख़ारी (817), सहीह मुस्लिम (484)।
8- रुकू से अपना सर उठाते समय अपने हाथों को कंधों या कानों के बराबर उठाए और यदि इमाम हो या अकेले नमाज़ पढ़ा रहा हो, तो कहे : "अल्लाह ने उसकी सुन ली, जिसने अल्लाह की प्रशंसा की।" फिर खड़े होकर कहे : "हमारे पालनहार! सब प्रशंसा तेरी लिए है, भरपूर, पवित्र, और बरकत वाली प्रशंसा, जो आसमानों को भर दे, ज़मीन को भर दे, और जो कुछ उनके बीच है उसे भर दे, और जो कुछ उसके बाद तू चाहे उसे भी भर दे।" ([9]) () सहीह बुख़ारी (711), सहीह मुस्लिम (598)।
लेकिन यदि इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ रहा हो, तो रुकू से उठते समय बस इतना कहे : "ऐ हमारे रब! और तेरी ही सारी प्रशंसा है, बहुत अधिक प्रशंसा, अच्छी प्रशंसा, बरकत वाली प्रशंसा, जो आसमानों को भर दे, और धरती को भर दे, और जो कुछ तू चाहे उसे भी भर दे।" यदि उनमें से हर एक, यानी इमाम, मुक़तदी और अकेला नमाज़ पढ़ने वाला, इस दुआ में यह वाक्य भी बढ़ा ले : "ऐ प्रशंसा और महिमा के योग्य! बंदे की कही हुई सबसे सच्ची बात यही है। हम सभी तेरे ही बंदे हैं। ऐ अल्लाह! जो तू दे, उसे कोई रोकने वाला नहीं और जो तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं तथा किसी बड़े धनवान को उसका धन तेरे सामने लाभ नहीं पहुँचा सकता।" ([10]) तो बेहतर है। क्योंकि, यह आप से प्रमाणित है। () सहीह मुस्लिम (477)।
मुस्तहब यह है कि यहाँ प्रत्येक व्यक्ति -मेरा आश्य है इमाम, मुक़्तदी तथा अकेले नमाज पढ़ने वाला- अपने हाथों को अपने सीने पर उसी तरह से रखे, जैसे रुकूअ करने से पहले रखा था, क्योंकि इस बात का प्रमाण मौजूद है कि नबी सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसा किया था। चुनाँचे ऐसा करना वाईल बिन ह़ुज्र एवं सह्ल बिन साद रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से प्रमाणित है।
9- "अल्लाहु अकबर" कहते हुए सजदा करे और संभव हो तो हाथों से पहले घुटनों को ज़मीन पर रखे। लेकिन, अगर इसमें कठिनाई हो, तो घुटनों से पहले अपने हाथों को ज़मीन पर रखे। सजदे की अवस्था में अपने पैरों और हाथों की उंगलियों को क़िबला की ओर रखे और हाथों की उंगलियों को एक साथ मिलाकर खोलकर रखे। सजदा इन सात अंगों पर होना चाहिए : ललाट एवं नाक, दोनों हाथ, दोनों घुटने, दोनों पैरों की उंगलियों के अगले भाग का भीतरी हिस्सा। सजदा में यह दुआ पढ़े : "मेरा उच्च रब पवित्र है।" सुन्नत यह है कि इस दुआ को तीन या इससे अधिक बार कहा जाए। इस दुआ के साथ यह पढ़ना भी मुस्तहब है : "ऐ अल्लाह! तू पाक है। ऐ हमारे पालनहार! तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।" फिर ज़्यादा से ज़्यादा दुआ करे। क्योंकि नबी सलल्लाहु अलैहि वसल्लम का कथन है : (जहाँ तक रुकू की बात है, तो उसमें अपने रब की महानता का बखान करो, तथा सजदों में अधिक से अधिक दुआ करो, क्योंकि इस बात की बड़ी संभावना है कि तुम्हारी दुआ स्वीकार की जाएगी।) ([11]) सहीह मुस्लिम (479)।
अपने रब से दुनिया एवं आख़िरत की भलाई माँगे। नमाज़ चाहे फ़र्ज़ हो या नफ़्ल। अपने बाजुओं को अपने पहलुओं से दूर, पेट को जांघों से तथा जांघों को पिंडलियों से हटा कर और अपनी बांहों को ज़मीन से उठाए रखे। क्योंकि, नबी सलल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है : "सजदा ठीक से किया करो और तुममें से कोई अपनी कोहनियों को कुत्ते की तरह न फैलाए।" ([12]) () सहीह बुख़ारी (788), सहीह मुस्लिम (493)।
10- "अल्लाहु अकबर" कहते हुए अपने सर को उठाए, अपना बायाँ पैर बिछाकर उसपर बैठे, अपना दाहिना पैर खड़ा रखे, अपने हाथों को अपनी जाँघों और घुटनों पर रखे तथा यह दुआ पढ़े : "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर, मुझपर रहम कर, मुझे सीधा रास्ता दिखा, मुझे रोज़ी दे, मुझे स्वस्थ रख और मेरी ज़रूरतें पूरी कर। ([13]) यहाँ इत्मीनान से बैठे। () सुनन तिर्मिज़ी (284), सुनन अबू दाऊद (850), सुनन इब्न-ए-माजा (898)।
11- फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए दूसरा सजदा करे और इसमें वही सब करे, जो पहले सजदे में किया था।
12- "अल्लाहु अकबर" कहते हुए अपना सर उठाए तथा जिस प्रकार से दो सजदों के बीच में बैठा था, उसी प्रकार थोड़ी देर के लिए बैठ जाए। इस बैठक को जलसा-ए-इस्तिराहत (विश्राम की बैठक) कहते हैं, जो मुस्तहब है। यदि इसे छोड़ भी दे, तो कोई हर्ज नहीं है। इसमें न कोई जिक्र है और न दुआ। फिर, यदि कठिनाई न हो तो अपने दोनों घुटनों पर टेक लगाकर खड़ा हो जाए। यदि ऐसा करना कठिन हो, तो ज़मीन पर टेक लगाकर खड़ा हो जाए। खड़े होने के बाद सूरा फ़ातिहा पढ़े एवं क़ुरआन का जितना भाग पढ़ सकता हो, पढ़े। फिर वही सब कुछ करे, जो पहली रकात में किया था।
13- नमाज़ यदि दो रकात वाली हो, जैसे फ़ज्र, जुमा एवं दोनों ईदों की नमाज़ें, तो दूसरे सजदे से सर उठाने के बाद तशह्हुद में इस तरह बैठे कि दाहिना पाँव खड़ा हो और बायाँ पाँव ज़मीन पर बिछा हुआ। दाएँ हाथ को दाईं जाँघ पर रखकर हाथ की उंगलियों को मोड़ ले। किन्तु, शहादत की उंगली (तर्जनी) को खुला रखे तथा इसके द्वारा अल्लाह के एक होने का इशारा करे। यदि दाहिने हाथ के किनारे की दो उंगलियों (कनिष्ठा एवं अनामिका) को मोड़ ले, अंगूठे को बीच वाली उंगली (मध्यमा) के साथ मिलाकर गोलाकार (परिधि) बना ले तथा शहादत की उंगली (तर्जनी) से इशारा करे, तो यह भी अच्छा है। क्योंकि दोनों ही तरीक़े अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित हैं। बल्कि, सबसे अच्छा यह है कि कभी पहले तरीक़े पर अमल करे और कभी दूसरे तरीक़े पर। बाएँ हाथ को बाईं जाँघ एवं घुटने पर रखे। फिर इस बैठक में तशह्हुद पढ़े, जो इस प्रकार है : "हर प्रकार का सम्मान, सभी दुआएँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो। हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद (पूज्य) नहीं है एवं मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उस के रसूल हैं।" फिर यह पढ़े : "ऐ अल्लाह! मुह़म्मद एवं उनके परिवार पर उसी प्रकार अपनी रहमत भेज, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर अपनी रहमत भेजी थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनके परिवार पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनके परिवार पर की थी। निस्संदेह, तू प्रशंसापात्र तथा सम्मानित है।" ([14]) () सहीह बुख़ारी (797), सहीह मुस्लिम (402)।
इसके बाद चार चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगते हुए यह दुआ पढ़े : "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण चाहता हूँ, जहन्नम के दण्ड से और कब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह दज्जाल के फ़ितने से।" ([15]) () सहीह बुख़ारी (1311), सहीह मुस्लिम (588)।
फिर दुनिया एवं आख़िरत की जो भलाई माँगनी हो, माँगे। तथा यदि अपने माता-पिता अथवा अन्य मुसलमानों के लिए दुआ करता है, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है -चाहे नमाज़ फ़र्ज़ हो अथवा नफ़्ल। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु को तशह्हुद सिखाते समय एक व्यापक बात कही थी : "फिर वह दुआओं में से अपनी सबसे पसंदीदा दुआ चुन कर दुआ करे।" ([16]) जबकि एक रिवायत के शब्द हैं : "फिर वह जो माँगना चाहे, अल्लाह से माँगे।" ([17]) () सुनन नसई (1298)। सहीह मुस्लिम (402)।
ज़ाहिर सी बात है कि इसके अंदर दुनिया एवं आख़िरत की सारी लाभकारी बातें आ जाती हैं। फिर दाएँ और बाएँ यह कहते हुए सलाम फेरे : अस्सलामु अलैकुम व रह़मतुल्लाह, अस्सलामु अलैकुम व रह़मतुल्लाह।
14- नमाज़ यदि तीन रकात वाली हो, जैसे कि मग़्रिब या चार रकात वाली हो, जैसे कि ज़ोहर, अस्र और इशा, तो नमाज़ी अभी बताए गए तशह्हुद को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद के साथ पढ़े। फिर घुटनों का सहारा लेते हुए खड़ा हो जाए, अपने हाथों को कंधों या कानों के बराबर उठाते हुए "अल्लाहु अकबर" कहे और फिर -जैसा कि पहले बताया जा चुका है- अपने हाथों को अपने सीने पर रखे। तीसरी और चौथी रकात में केवल सूरा फ़ातिहा पढ़े। लेकिन यदि कभी-कभी ज़ोहर की तीसरी और चौथी रकात में सूरा फ़ातिहा के बाद कुछ और आयतें भी पढ़ ले, तो कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इसका प्रमाण मिलता है। यदि पहले तशह्हुद के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद न पढ़े, तो भी कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि यह मुस्तहब है, वाजिब नहीं। फिर मग़्रिब की तीसरी रकात और ज़ोहर, अस्र और इशा की चौथी रकात के बाद उसी तरह तशह्हुद पढ़े, जैसे कि दो रकात वाली नमाज़ में पढ़ा जाता है। फिर दाएँ तथा बाएँ सलाम फेरे, फिर तीन बार अस्तग़फ़िरुल्लाह कहे और उसके बाद कहे : "ऐ अल्लाह! तू ही सलामती है और सलामती तुझी से है। तू बहुत बरकत वाला है। ऐ महानता और सम्मान के मालिक!)।" ([18]) यदि इमाम हो तो पीछे नमाज़ पढ़ रहे लोगों की ओर मुँह करने से पहले तीन बार (अस्तग़्फ़िरुल्लाह) एवं उपरोक्त दुआ पढ़ ले। फिर यह दुआ पढ़े : "अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी की बादशाहत है, उसी की प्रशंसा है और वह हर चीज़ पर सक्षम है। अल्लाह के अनुग्रह के बिना कोई शक्ति और सामर्थ्य नहीं। ऐ अल्लाह! जो तू दे, उसे कोई रोकने वाला नहीं है और जो तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी धनवान को उसका धन तेरे अज़ाब से सुरक्षित नहीं रख सकता। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं और हम केवल उसी की इबादत करते हैं। उसी की नेमत तथा उसी के लिए श्रेष्ठता और प्रशंसा है। अल्लाह के सिवा कोई उपास्य नहीं है। हम केवल उसी के लिए धर्म को विशुद्ध करते हैं, चाहे काफ़िरों को हमारा यह रवैया अच्छा न भी लगे।" ([19]) () सहीह मुस्लिम (591)। सहीह मुस्लिम (402)।
इसके बाद तैंतीस (33) बार "सुब्हानल्लाह", तैंतीस (33) बार "अल-हम्दु लिल्लाह", तैंतीस (33) बार "अल्लाहु अकबर" कहे और सौ की गिनती इस दुआ के द्वारा पूरी करे : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज है, उसी की प्रशंसा है और वह समस्त चीज़ों पर सक्षम है।" इसके बाद आयl अल-कुर्सी पढ़े। फिर सूरा इख़्लास, सूरा फ़लक़ एवं सूरा नास पढ़े। प्रत्येक नमाज़ के बाद एक-एक बार। जबकि फ़ज्र एवं मग़्रिब की नमाज़ के बाद इन तीनों सूरतों का तीन-तीन बार पढ़ना मुस्तहब है। क्योंकि इस विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से हदीस वर्णित है। ध्यान रहे कि इन तमाम अज़कार का पढ़ना मुस्तहब है, वाजिब नहीं।
प्रत्येक पुरुष एवं महिला मुसलमान के लिए उचित है कि ज़ोहर की नमाज़ से पहले चार रकात तथा ज़ोहर की नमाज़ के बाद दो रकात, मग़्रिब की नमाज़ के बाद दो रकात, इशा की नमाज़ के बाद दो रकात तथा फ़ज्र की नमाज़ के पहले दो रकात नमाज़ पढ़े। कुल मिला कर यह बारह रकातें हैं। इन्हें "सुनन-ए-रवातिब" कहा जाता है। क्योंकि, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम घर में होने की अवस्था में इन नमाज़ों को नियमित रूप से पढ़ते थे। जहाँ तक यात्रा में इन नमाज़ों को पढ़ने की बात है, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यात्रा की अवस्था में "सुनन-ए-रवातिब" नहीं पढ़ते थे। लेकिन, फ़ज्र की सुन्नत एवं वित्र की नमाज़ को यात्रा एवं ठहराव दोनों ही अवस्थाओं में पाबंदी के साथ पढ़ा करते थे। बेहतर यह है कि "सुनन-ए-रवातिब" एवं "वित्र" को घर में पढ़ा जाए। मगर, यदि कोई व्यक्ति इन्हें मस्जिद में पढ़ता है, तो कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है : "व्यक्ति की सर्वश्रेष्ठ नमाज़ वह है, जो वह अपने घर में पढ़ता है, सिवाय फ़र्ज़ नमाज़ के।" ([20]) () सहीह बुख़ारी (6860)।
इन रकातों को पाबंदी के साथ पढ़ना जन्नत में प्रवेश का एक सबब है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "जिसने दिन एवं रात में बारह रकात नमाज़ पढ़ी, उसके लिए जन्नत में एक घर बनाया जाएगा।" ([21]) () सहीह मुस्लिम (728)।
यदि कोई अस्र से पहले चार रकात, म़ग़्रिब की नमाज़ से पहले दो रकात और इशा की नमाज़ से पहले दो रकात पढ़े, तो अच्छा है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस संबंध में सहीह सनद के साथ प्रमाण मौजूद है। यदि कोई ज़ोहर से पहले चार रकात और उसके बाद चार रकात पढ़े, तो यह भी अच्छा है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "जिसने ज़ोहर से पहले और ज़ोहर के बाद चार-चार रकातें पाबंदी से पढ़ीं, अल्लाह उसपर जहन्नम की आग हराम कर देगा।" ([22]) अर्थ यह है कि ज़ोहर के बाद सुन्नत-ए-रातिबा (नियमित सुन्नत) में दो रकात की वृद्धि की जाए। क्योंकि सुन्नत-ए-रातिबा ज़ोहर से पहले चार रकात और उसके बाद दो रकात है। अतः यदि कोई ज़ोहर के बाद दो रकात और बढ़ा ले, तो उसे उम्म-ए-हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस में वर्णित शुभ समाचार प्राप्त होगा। () मुस्नद अहमद (25547), सुनन तिर्मिज़ी (393), सुनन अबू दाऊद (1077)।
वैसे, सुयोग अल्लाह ही प्रदान करता है। अल्लाह तआला हमारे नबी मुह़म्मद बिन अब्दुल्लाह, उनके परिजनों, साथियों एवं अच्छे ढंग से उनका अनुसरण करने वालों पर क़यामत के दिन तक दया एवं शांति अवतरित करे।