المنتقى من المتجر الرابح في ثواب العمل الصالح - المعتمد

المنتقى من المتجر الرابح في ثواب العمل الصالح - المعتمد

كتاب جامع لجملة من أحاديث النبي -صلى الله عليه وسلم- الصحيحية في ثواب الأعمال الصالحة كطلب العلم والطهارة والصلاة، وصلاة التطوع، والجمعة والجنائز، والصدقات والصوم والحج والجهاد، وقراءة القرآن، وذكر الرحمن وغيرها.

Language: lang_hi
Prepared by:
Version: 1.0
Translations 12
English Spanish Persian French +8
Attachments 7
PDF
Audio
Video
+3

सदाचार का प्रतिफल

इल्म एवं उलेमा का प्रतिफल

मुआविया -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''अल्लाह जिसके साथ भलाई का इरादा करता है, उसे दीन की समझ प्रदान करता है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 71, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1037]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो कोई ज्ञान की खोज में निकलता है, तो अल्लाह उसके कारण उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है। जब कभी लोग अल्लाह के घरों में से किसी घर में जमा होते हैं, अल्लाह की किताब की तिलावत करते हैं और आपस में इसका अध्ययन करते हैं, तो उनपर शांति अवतरित होती है, उनको रहमत घेर लेती है, उनके लिए फ़रिश्ते पर बिछाते हैं और अल्लाह अपने पास के फ़रिश्तों के बीच उनका गुणगान करता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2699]

इल्म सिखाने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो उसके कर्मों का सिलसिला समाप्त हो जाता है, सिवाय तीन चीज़ों के : स़दक़ा जारिया (अनवरत चलने वाला दान), अथवा ऐसी विद्या छोड़कर जाना जिससे लोग लाभांवित हों, अथवा ऐसा नेक (सदाचारी) संतान जो उसके लिए (मरने के बाद) दुआ करे।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1631]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने किसी हिदायत की ओर बुलाया, उसे उतना ही सवाब मिलेगा, जितना उसका अनुसरण करने वालों को मिलेगा। लेकिन इससे उन लोगों के सवाब में कोई कमी नहीं होगी। तथा जिसने किसी गुमराही की ओर बुलाया, उसे उतना ही गुनाह होगा, जितना गुनाह उसका अनुसरण करने वालों को होगा। परन्तु इससे उन लोगों के गुनाह में कोई कमी नहीं होगी।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2674]

अबु मसउद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया :

"जिसने किसी अच्छे काम की राह दिखाई, उसे उसके करने वाले के बराबर स़वाब (पुण्य) मिलेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1893]

अच्छी तरह वज़ू करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब कोई मुस्लिम या मोमिन बंदा वज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँखों से देखकर किए थे। फिर जब वह अपने हाथों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके हाथ के वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उनके हाथों के पकड़ने से हुए थे। फिर जब वह अपने पैरों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके पैरों से वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जिनकी ओर उसके पाँव चलकर गए थे। इस तरह वह गुनाहों से पवित्र होकर निकलता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 244]

और उस़मान बिन अफ़्फ़ान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने वज़ू किया, और अच्छी तरह वज़ू किया, तो उसके शरीर से सारे पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि उसके नाखूनों के नीचे से भी पाप निकलते हैं।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 229]

परेशानियों के बावजूद अच्छी तरह वज़ू करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''क्या मैं तुम्हें ऐसी बातें न बताऊँ, जिनके ज़रिए अल्लाह गुनाहों को मिटा देता है और दर्जे ऊँचे कर देता है? सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल। फ़रमाया : परेशानियों के बावजूद अच्छी तरह वज़ू करना, इन्सान का अधिक से अधिक मस्जिद जाना और नमाज़ के बाद अगली नमाज़ की प्रतीक्षा करना। यही पहरेदारी है (अच्छा अमल या असल जिहाद है)।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 251]

मिस्वाक करने का प्रतिफल

आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''मिस्वाक करना मुँह को साफ़ करने वाला और अल्लाह को प्रसन्न करने वाला काम है।''

[सुनन नसई : 1/10, इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में इसे बिना सनद के नक़ल किया है। देखिए सहीह बुख़ारी : 4/158]

वज़ू की रक्षा करने का प्रतिफल

स़ौबान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''सत्य पथ पर चलो, उससे निकट हो जाओ और यह जान लो कि तुम्हारा सबसे अच्छा काम नमाज़ है। वज़ू की रक्षा तो मोमिन ही करता है।''

[मुसनद अहमद, हदीस संख्या : 22378]

वज़ू के बाद दोनों गवाही देने का प्रतिफल

उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जब तुममें से कोई वज़ू करता है, एवं उसको पूरा-पूरा करता है, फिर कहता है (أشهد أن لا إله إلا الله، وأن محمدا عبد الله ورسوله) अर्थात - मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पुज्य नहीं है एवं मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं, तो उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, वह जिससे चाहे प्रवेश कर जाए।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 234]

वज़ू के बाद नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बिलाल -रज़ियल्लाहु अनहु से फ़ज्र की नमाज़ के समय कहा :

''हे बिलाल! तुमने इस्लाम में कौन-सा ऐसा नफ़ली अमल किया कि मैंने जन्नत में अपने सामने तुम्हारे जूतों की आहट सुनी?''

उन्होंने उत्तर दिया : मैंने इससे अधिक आशा वाला काम कुछ नहीं किया है कि दिन हो या रात, जब भी वज़ू किया है, उसके बाद जितनी हो सकी, नमाज़ पढ़ी है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1149, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2458]

उकबा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो मुसलमान अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर खड़े होकर मन तथा तन के साथ दो रकात नमाज़ पढ़ता है, उसके लिए जन्नत अनिवार्य हो जाती है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 234]

उस़मान बिन अफ़्फ़ान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने मेरे इस वज़ू की तरह वज़ू किया, फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी, तथा उन दो रकातों में अपने आपसे बात नहीं की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।''

[सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 164, एवं सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 226]

अज़ान देने वाले का प्रतिफल

इब्न-ए- अबू सासआ अंसारी से वर्णित है कि अबु सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने उनसे कहा :

''मैं तुमको देखता हूँ कि तुम बकरी को एवं देहात को पसंद करते हो। अतः जब तुम अपनी बकरियों के साथ देहात में रहो और नमाज़ के लिए अज़ान दो, तो ऊँची आवाज़ में अज़ान दो, इसलिए कि अज़ान देने वाले की आवाज़ जो भी जिन्न, इन्सान या और कोई औप सुनेगा, वह क़यामत के दिन उसके लिए गवाही देगा।''

अबू सईद कहते हैं कि मैंने यह हदीस अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सुनी है।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3296]

तलहा बिन यह्या अपने चचा से वर्णन करते हैं, उन्होंने कहा :

मैं मुआविया बिन अबू सुफ़ियान -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- के पास था कि उनके पास एक अज़ान देने वाला आया, जो उन्हें नमाज़ के लिए बुला रहा था, तो मुआविया ने कहा :

मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : क़यामत के दिन अज़ान देने वालों की गर्दनें सबसे ऊँची होंगी।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 387]

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फज्र के समय (दुश्मन पर) धावा बोलते थे। पहले आप अज़ान सुनने की कोशिश करते। यदि अज़ान सुन लेते, तो रुक जाते। वरना धावा बोल देते। एक बार आपने एक व्यक्ति को कहते सुना : ''الله أكبر، الله أكبر'' (अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है) तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहा : ''यह फ़ितरत पर है।'' (अर्थात इस्लाम पर है।) फिर उसने कहा : ''أشهد أن لا إله إلا الله، أشهد أن لا إله إلا الله'' (अर्थात, मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पुज्य नहीं है, मैं साक्ष्य हूँ कि अल्लाह ही सत्य पूज्य है।) तो रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: ''तू जहन्नम से निकल गया।'' फिर उन लोगों ने पता लगाया, तो मालूम हुआ कि वह माज़ क़बीले का एक चरवाहा था।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 382]

मुअज़्ज़िन के पीछे-पीछे अज़ान के शब्दों को दोहराने का प्रतिफल

उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब मुअज़्ज़िन अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर कहता है और तुममें से कोई अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर कहता है, फिर मुअज़्ज़िन अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाह कहता है और वह अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाह कहता है, फिर मुअज़्ज़िन अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह कहता है और वह अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह कहता है, फिर मुअज़्ज़िन हय्या अला अस-सलाह कहता है और वह ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह कहता है, फिर मुअज़्ज़िन हय्या अला अल-फ़लाह कहता है और वह ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह कहता है, फिर मुअज़्ज़िन अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर कहता है और वह अल्लाहु अकबर कहता अल्लाहु अकबर कहता है, फिर मुअज़्ज़िन ला इलाहा इल्लल्लाह कहता है और वह दिल से ला इलाहा इल्लल्लाह कहता है, तो वह जन्नत में प्रवेश करता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 385]

अज़ान के बाद ज़िक्र और साबित दुआ करने का प्रतिफल

अब्दुल्ला बिन अम्र बिन आस़ से वर्णित है कि उन्होंने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह कहते हुए सुना है :

"जब तुम लोग मुअज़्ज़िन को अज़ान देते सुनो, तो वह जो कहता हो, तुम भी उसी की भाँति कहो। फिर मुझपर दरूद भेजो। क्योंकि जो मुझपर एक बार दरूद भेजेगा, अल्लाह उसकी प्रशंसा दस बार अपने फ़रिश्तों के सम्मुख करेगा। फिर मेरे लिए अल्लाह से वसीला माँगों। क्योंकि यह जन्नत का एक ऐसा स्थान है, जो केवल अल्लाह के एक बंदे के लिए उचित है और मुझे आशा है कि अल्लाह का वह बंदा मैं ही हूँ। अतः जो मेरे लिए वसीला माँगेगा, उसके लिए मेरी सिफ़ारिश अनिवार्य हो जाएगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 384]

जाबिर बिन अब्दुल्ला -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया :

''जिसने अज़ान सुनने के बाद यह दुआ पढ़ी : اللهم رب هذه الدعوة التامة، والصلاة القائمة، آت محمدا الوسيلة والفضيلة، وابعثه مقاما محمودا الذي وعدته अर्थात "ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तूने उन्हें वचन दिया है।" उसके लिए क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश अनिवार्य हो जाएगी।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 614]

साद बिन अबू वक़्क़ास़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सुनकर कहता है : أشهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له وأنَّ محمداً عبده ورسولُه، رضيتُ بالله رباً وبمحمدٍ رسولاً وبالإسلام دِينا, (मैं गवाही देता हूँ कि एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, उसका कोई साझी नहीं, मुहम्मद उसके बंदे एवं उसके रसूल हैं, मैं राज़ी हूँ अल्लाह से रब के तौर पर, मुहम्मद से रसूल के तौर पर और इस्लाम से दीन के तौर पर), उसके गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 386]

नमाज़ का प्रतिफल

मादान बिन अबू तल्हा यामुरी से वर्णित है, वह कहते हैं :

मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के आज़ाद किए हुए दास स़ौबान से मुलाक़ात की और कहा : मुझे किसी ऐसे कार्य के बारे में बताइए, जिसके कारण अल्लाह मुझे जन्नत में प्रवेश करा दे। उनका कहना है कि या मैंने यह कहा था : मुझे कोई ऐसा काम बताइए, जो अल्लाह के निकट सबसे महबूब हो। मेरी बात सुनकर वह चुप रहे। मैंने फिर प्रश्न किया, तो वह चुप रहे। मैंने तीसरी बार प्रश्न दोहराया, तो उन्होंने कहा : मैंने इस बारे में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा, तो आपने कहा : ''अधिक से अधिक अल्लाह के लिए सजदा करो, इसलिए कि तुम्हारे हर एक सजदा के बदले अल्लाह तुम्हारा एक दर्जा ऊँचा करता है और तुम्हारे एक गुनाह को मिटा देता है।''

मादान ने कहा : फिर मैं अबू दरदा से मिला औप उनसे पूछा, तो उन्होंने भी मुझसे वही बात कही, जो स़ौबान ने कही थी।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 488]

रबीआ बिन काब अस्लमी से वर्णित है, वह कहते हैं :

मैं रात को अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ होता था। मैं आपके लिए वज़ू का पानी एवं ज़रूरत का सामान लेकर आया, तो आपने मुझसे कहा : ''माँगो'', तो मैंने कहा : मैं स्वर्ग में आपका साथ चाहता हूँ, तो आपने कहा : ''इसके अतिरिक्त कुछ और?'', मैंने कहा : बस यही, तो आपने कहा : अधिक सजदों के द्वारा अपने लिए मेरी मदद करो।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 489]

फ़र्ज़ नमाज़ों एवं उनकी पाबंदी करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"यदि तुम में से किसी के द्वार पर एक नदी हो, जिसमें वह प्रत्येक दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर पर कुछ मैल-कुचैल बाक़ी रहेगा? साहबा ने उत्तर दिया कि मैल-कुचैल में से कुछ भी बाक़ी न रहेगा। तब आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "इसी प्रकार पांचों नमाज़ हैं, इनके द्वारा अल्लाह पापों को मिटा देता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 528, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 667]

अम्र बिन सईद बिन आस़ से वर्णित है, वह कहते हैं :

मैं उस़मान -रज़ियल्लाहु अन्हु- के पास था। उन्होंने पवित्रता प्राप्त करने का पानी मँगवाया और कहा : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है :

''जब किसी मुसलमान व्यक्ति के सामने फ़र्ज़ नमाज़ का समय आ जाता है और वह अच्छी तरह वज़ू करता है, शांति के साथ नमाज़ पढ़ता है और रुकू करता है, तो बड़े गुनाह के अलावा उसके पूर्व के सभी गुनाह मिट जाते हैं। ऐसा हमेशा होता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 227]

फ़ज्र और अस्र की नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"तुम्हारे बीच रात तथा दिन के फ़रिश्ते बारी-बारी आते-जाते रहते हैं, जो फ़ज्र तथा अस्र की नमाज़ में एकत्र होते हैं। फिर जब वह फ़रिश्ते अल्लाह की ओर चढ़ते हैं, जिन्होंने तुम्हारे पास रात गुज़ारी थी, तो अल्लाह, जो बेहतर जानता है, उनसे पूछता है कि तुम मेरे बंदों को किस अवस्था में छोड़ आए हो? वह उत्तर देते हैं : हम जब उन्हें छोड़ आए थे, तो वे नमाज़ पढ़ रहे थे और जब उनके पास पहुँचे थे, तब भी वे नमाज़ पढ़ रहे थे।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 555, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 632]

तथा जरीर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है, वह कहते हैं :

''हम नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास थे कि आपने एक रात चौदहवीं की चाँद की तरफ देखकर फरमाया : निःसंदेह तुम अपने रब को इस तरह देखोगे, जैसे इस चाँद को देख रहे हो। उसे देखने में तुम्हें कोई दिक़्क़त न होगी। इसलिए अगर तुम ऐसा कर सको कि सूरज निकलने और डूबने से पहले की नमाज़ों के मामले में (शैतान के सामने) कमज़ोर न पड़ो, तो ज़रूर करो। फिर आपने यह आयत तिलावत फरमाई, "सूरज निकलने और उसके डूबने से पहले अपने रब की प्रशंसा और उसकी पवित्रता बयान करो।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 554, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 633]

उमारा बिन रुएैबा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

''जो व्यक्ति सूर्य निकलने तथा डूबने से पूर्व नमाज़ पढ़ता है, वह जहन्नम में कदापि प्रवेश नहीं करेगा।''

अर्थात फ़ज्र और अस्र की नमाज़।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 634]

तथा अबू मूसा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने दो ठंडे समय की नमाज़ें पढ़ीं, वह जन्नत में जाएगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 574, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 635]

दो ठंड समय की नमाजों से मुराद अस्र एवं फ़ज्र की नमाज़े हैं।

अस्र की नमाज़ का प्रतिफल

अबू बस़रा ग़िफ़ारी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें मुख़म्मस़ (मक्का के रास्ते में ईर पहाड़ के पास एक जगह) में अस्र की नमाज़ पढ़ाई और कहा : ''इस नमाज़ को तुमसे पहले वाले समुदायों पर फ़र्ज़ किया गया था, तो उन्होंने इसको बर्बाद कर दिया। जो इसकी रक्षा करेगा, उसके लिए दोहरा प्रतिफल है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 830]

फ़ज्र की नमाज़ का प्रतिफल

जुन्दुब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने सुबह की नमाज़ पढ़ी, वह अल्लाह के ज़िम्मे है। अब तुममें से किसी के लिए जायज़ नहीं है कि वह अल्लाह के ज़िम्मे में किसी प्रकार का छेड़-छाड़ करे। जो ऐसा करेगा उसको अल्लाह का अज़ाब पकड़ लेगा एवं उसे चेहरे के बल घसीटकर जहन्नम में डाल दिया जाएगा।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 657]

इशा और फ़ज्र की नमाज़ जमात के साथ पढ़ने का प्रतिफल

उस़मान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वे बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

''जिसने इशा की नमाज़ जमात के साथ पढ़ी, तो मानो उसने आधी रात क़याम किया (नमाज़ पढ़ी), और जिसने (इशा के साथ-साथ) फ़ज्र की नमाज़ भी जमात से पढ़ी, तो जैसे उसने पूरी रात नमाज़ पढ़ी।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 656]

निर्धारित समय पर नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि अल्लाह के निकट कौन-सा कार्य सबसे प्रिय है? आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : ''निर्धारित समय पर नमाज़ पढ़ना।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 527, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 85]

नमाज़ में आमीन कहने का महत्व

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जब इमाम (غير المغضوب عليهم ولا الضالين) कहे, तो तुम लोग (آمين) कहो। क्योंकि जिसकी बात फ़रिश्तों की बात से मिल जाएगी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 782 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 410]

तथा अबू मूसा अश्अरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें नसीहत की और हमें हमारा तौर-तरीक़ा बताया तथा हमें हमारी नमाज़ सिखाई। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : ''जब तुम नमाज़ पढ़ो, तो अपनी कतारों (पंक्तियों) को सीधा कर लो, फिर तुममें से एक इमामत कराए। जब वह अल्लाहु अकबर कहे तो तुम भी अल्लाहु अकबर कहो और जब वह (غير المغضوب عليهم ولا الضالين) कहे तो तुम आमीन कहो। अल्लाह तुम्हारी दुआ को क़बूल करेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 404]

रुकू से उठने के बाद (اللهم ربنا لك الحمد) कहने की फ़ज़ीलत

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जब इमाम (غير المغضوب عليهم ولا الضالين) कहे, तो तुम लोग (آمين) कहो। क्योंकि जिसकी बात फ़रिश्तों की बात से मिल जाएगी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 796 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 409]

तथा अबू मूसा अशअ़री -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं :

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें संबोधित किया और हमें हमारा तौर-तरीक़ा बताया तथा हमें हमारी नमाज़ सिखाई। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : ''जब तुम नमाज़ पढ़ो, तो अपनी कतारों (पंक्तियों) को सीधा कर लो, फिर तुममें से एक इमामत कराए। जब वह (سمع الله لمن حمده) कहे, तो तुम लोग (اللهم ربنا لك الحمد) कहो, अल्लाह तुम्हारी (पुकार) सुनेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 404]

नमाज़ी का रुकू से उठकर सीधे खड़े होने के बाद 'रब्बना व लकल-हम्द' कहने की फ़ज़ीलत

रिफ़ाआ बिन राफ़े ज़रक़ी से वर्णित है, वह कहते हैं :

हम एक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पीछे नमाज़ पढ़ रहे थे। जब आपने रुकू से सर उठाकर (سمع الله لمن حمده) कहा, तो एक आदमी ने पीछे से (ربنا ولك الحمد حمدا كثيرا طيبا مباركا فيه) कहा। जब आप नमाज़ से फारिग़ हुए, तो फरमाया : "यह बात किसने कहा?" वह आदमी बोला : मैंने। तब आपने फरमाया : "मैंने तीस से ज़्यादा फरिश्तों को देखा कि वह इस बात पर आपस में आगे बढ़ते थे कि कौन इसको पहले लिख ले।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 799]

जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 645 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 650]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''आदमी का जमात के साथ नमाज़ पढ़ना बाज़ार या घर में नमाज़ पढ़ने की तुलना में (पुण्य के मामले में) बीस से अधिक दर्जा बढ़ा हुआ होता है। इस प्रकार कि जब तुममें से कोई अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर नमाज़ ही के इरादे से मस्जिद आता है और नमाज़ के सिवा कोई चीज़ उसे घर से नहीं निकालती है, तो मस्जिद पहुँचने तक वह जो भी क़दम उठाता है, उसके बदले में उसका एक दर्जा ऊँचा होता है और एक गुनाह मिटाया जाता है। फिर जब मस्जिद में प्रवेश करता है, तो जब तक नमाज़ उसे रोके रखती है, वह नमाज़ में होता है। तथा फ़रिश्ते तुममें से किसी के लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं, जब तक वह उस जगह में होता है, जहाँ नमाज़ पढ़ी है। वे कहते रहते हैं : ऐ अल्लाह! इसपर दया कर, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे और ऐ अल्लाह! इसकी तौबा कबूल कर। यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब तक वह वहाँ किसी को कष्ट न दे, जब तक वहाँ उसका वज़ू न टूट जाए।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 647, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 649]

पहली पंक्ति में नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''यदि लोग जानते कि अज़ान एवं पहली पंक्ति का क्या पुण्य है, तो वह उनका लाभ उठाने के लिए लड़ पड़ते।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 615, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 437]

हदीस़ में आए 'निदा' शब्द का अर्थ अज़ान है।

जबकि (الاستهام) इस्तेहाम का अर्थ कागज़ में लिखकर या किसी अन्य तरीक़े से निर्वाचन करना है।

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''पुरुषों के लिए सर्वोत्तम सफ़ (पंक्ति) सबसे प्रथम सफ है और सबसे बुरी सफ़ सबसे अंतिम सफ़ है। जबकि महिलाओं के लिए सबसे अच्छी सफ़ अंतिम सफ़ है तथा सबसे बुरी सफ़ सबसे प्रथम सफ़ है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 440]

मस्जिद-ए-ह़राम तथा मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ अदा करने का प्रतिफल।

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''मेरी इस मस्जिद (मस्जिद-ए-नबवी) में पढ़ी गई एक नमाज़ मस्जिद-ए-हराम के अलावा दूसरी मस्जिदों में पढ़ी गई हज़ार नमाज़ों से बेहतर है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1190, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या :1394]

अल्लाह के लिए मस्जिद बनाने का प्रतिफल

उस़मान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वu बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

''जो अल्लाह को ख़ुश करने के लिए कोई मस्जिद बनाता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत में एक घर बनाता है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 450, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 533]

नमाज़ के लिए मस्जिदों की तरफ चलकर जाने का प्रतिफल

तथा अबू मूसा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''लोगों में नमाज़ का प्रतिफल सबसे अधिक वह व्यक्ति पाता है, जो मस्जिद को दूर से चलकर आता है, और जो नमाज़ की प्रतीक्षा करता है यहाँ तक कि इमाम के साथ नमाज़ पढ़ता है, वह उससे अधिक नेकी पाता है, जो नमाज़ पढ़ता है और सो जाता है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 651, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 662]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो सुबह के समय मस्जिद की ओर जाता है या शाम के समय जाता है, तो वह सुबह या शाम को जब भी जाता है, उसके बदले अल्लाह उसके लिए जन्नत में सत्कार का सामान तैयार करता है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 662, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 669]

उबय बिन काब -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं :

मेरी जानकारी के अनुसार एक अंसारी का घर मस्जिद से सबसे ज़्यादा दूर था, परन्तु उनकी कोई नमाज़ नहीं छूटती थी। सो, उनसे कहा गया कि यदि आप एक गधा ख़रीद लें और अंधेरे तथा धूप की गर्मी के समय उसपर सवार होकर आएँ तो अच्छा हो। उन्होंने कहा : मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरा घर मस्जिद के बगल में हो। मैं चाहता हूँ कि मैं जब मस्जिद आऊँ तो मेरा आना और जब घर वापस जाऊँ तो मेरा जाना लिखा जाए। इसपर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : ''अल्लाह ने तेरे लिए इन सब बातों को जमा कर दिया है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 663]

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं :

हमारे घर मस्जिद से बहुत दूर थे, हमने चाहा कि हम अपने घरों को बेच दें एवं मस्जिद से निकट आ जाएँ, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें मना किया और कहा : ''तुम्हारे हर क़दम के बदले एक दर्जा बुलंद किया जाता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 664]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो कोई अपने घर में पाकी हास़िल करता है, फिर अल्लाह के घरों में से किसी घर की ओर चलकर जाता है, ताकि अल्लाह के फ़र्ज़ों में से कोई फ़र्ज़ अदा करे, तो उनके दो क़दमों में से एक क़दम के बदले एक गुनाह मिटता है, तो दूसरे क़दम के बदले एक दर्जा ऊँचा होता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 666]

जिसका दिल मस्जिद में लटका रहता है, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वे बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''अल्लाह सात प्रकार के लोगों को उस दिन छाया प्रदान करेगा, जिस दिन कोई छाया नहीं होगी : न्याय करने वाला इमाम, ऐसा जवान जो अल्लाह की इबादत में पला-बढ़ा हो और ऐसा व्यक्ति जिसका दिल मस्जिद से लटका रहता है...।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1423, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1031]

नमाज़ की प्रतीक्षा में मस्जिद में बैठने वाले का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''बन्दा जब तक नमाज़ की प्रतीक्षा में मुसल्ला (नमाज़ के स्थान) पर बैठा रहता है, उस वक़्त तक नमाज़ ही में रहता है और फ़रिश्ते उसके लिए दुआ करते रहते हैं कि हे अल्लाह! इसे माफ़ कर दे, हे अल्लाह! इसपर रहम कर। यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब वह लौट न जाए या उसका वज़ू टूट न जाए।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 176, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 649]

घर में नफ़्ल नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जब तुम मस्जिद मे (फ़र्ज़) नमाज़ अदा कर लो, तो घर में उसके हिस्से की नमाज़ (नफ़्ल) पढ़ो, क्योंकि अल्लाह तुम्हारे घर में नमाज़ पढ़ने के कारण उसमें भलाई पैदा करने वाला है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 778]

सुन्नत की पाबंदी करने का प्रतिफल

उम्म-ए-हबीबा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से वर्णित है, वह कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"जो मुसलमान बन्दा अल्लाह के लिए प्रतिदिन फ़र्ज़ (अनिवार्य) के अतिरिक्त बारह रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़ता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत (स्वर्ग) में घर बनाता है, या जन्नत में उसके लिए घर बनाया जाता है।''

उम्म-ए-हबीबा कहती हैं कि मैंने उसके बाद इनको पढ़ना कभी न छोड़ा।

अम्र कहते हैं : मैं उसके बाद इनको पढ़ना कभी न छोड़ा।

नुमान ने भी इसी प्रकार की बात कही है।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 728]

फ़ज्र की दो रकात सुन्नत नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''फ़ज्र की दो रकातें दुनिया एवं उसकी सारी चीजों से उत्तम हैं।''

एक दूसरी रिवायत में है : ''यह दोनों रकातें मेरे निकट पूरी दुनिया से अधिक प्रिय हैं।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 725]

आख़िरी रात में वित्र पढ़ने की नेकी

जाबिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णनित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसको यह डर हो कि वह रात के अंतिम भाग में नहीं उठ पाएगा, उसे चाहिए कि प्रथम भाग में ही वित्र पढ़ ले, और जिसे लगे कि वह अंतिम भाग में उठ जाएगा उसे चाहिए कि रात के अंतिम भाग में ही वित्र पढ़े, क्योंकि रात के अंतिम भाग की नमाज़ देखी जाती है (यानी उस समय फरिश्ते उपस्थित रहते हैं) तथा यह बेहतर है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 755]

जिसने रात की नमाज़ पढ़ी और अपनी पत्नी को भी जगाया, उसकी नेकी

अबू सईद ख़ुदरी एवं अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है, वे बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जो रात को जगा और अपनी पत्नी को भी जगाया तथा दोनों ने मिलकर दो रकात नमाज़ पढ़ी, तो दोनों का नाम अल्लाह को बहुत अधिक याद करने वालों एवं याद करने वालियों में लिख दिया जाता है।''

[सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 1451]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''अल्लाह उस व्यक्ति पर दया करे, जो रात को उठे, नमाज़ पढ़े और अपनी पत्नी को भी जगाए, और वह भी नमाज़ पढ़े। यदि वह इनकार करे, तो उसके चेहरे पर पानी छिड़के। तथा अल्लाह उस स्त्री पर दया करे, जो रात को उठे, नमाज़ पढ़े और अपने पति को जगाए और वह भी नमाज़ पढ़े। यदि वह इनकार करे, तो उसके चेहरे पर पानी छिड़के।"

[मुसनद अहमद, हदीस संख्या : 7410, एवं सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 1308]

चाश्त (दिन चढ़ने का समय) की नमाज़ पढ़ने का प्रतिफल

अबूज़र -रज़ियल्लाहु अन्हु- नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णित करते हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''तुम्हारे हर एक जोड़ के बदले स़दक़ा है, (और वह इस प्रकार अदा हो सकता है) तुम्हारा अल्लाह की हर पाकी बयान करना स़दक़ा है, उसकी हर प्रशंसा स़दक़ा है, हर बार ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' कहना स़दक़ा है, अल्लाह की हर बड़ाई बयान करना स़दक़ा है, भलाई का आदेश देना स़दक़ा है, बुराई से रोकना स़दक़ा है, और इन तमाम कामों की ओर से चाश्त की दो रकात नमाज़ काफ़ी है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 720]

जुमा की नमाज़ का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''पाँचों नमाज़ें एवं एक जुमा से दूसरे जुमा तक, उनके बीच जो भी गुनाह होंगे, वे उनके लिए कफ़्फ़ारा (मिटाने वाले) हैं, जब तक कि बड़े गुनाह न हों।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 233]

नहाने, ख़ुश्बू लगाने एवं जुमा का ख़ुत्बा (वक्तव्य) ध्यान से सुनने की प्रतिफल

सलमान फ़ारसी -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने जुमा के दिन स्नान किया, जहाँ तक हो सका अच्छी तरह पाकी (पवित्रता) प्राप्त की, तेल या ख़ुश्बू लगाया, फिर नमाज़ के लिए चला, एवं दो व्यक्तियों के बीच घुसकर न बैठा, फिर जो सुन्नत एवं नफ़्ल पढ़ पाया पढ़ा, फिर जब इमाम ख़ुत्बा देने के लिए खड़ा हुआ तो उसकी बातों को ध्यान से सुना, तो दोनों जुमा के बीच उनके द्वारा किए गए छोटे गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 910]

औक अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिसने स्नान किया, फिर जुमा की नमाज़ पढ़ने पहुँचा, जो सुन्नत अथवा नफ़्ल पढ़ पाया पढ़ा, फिर चुप रहा यहाँ तक कि इमाम ख़ुत्बा ख़त्म कर लिया, फिर उसके साथ नमाज़ पढ़ी, तो दोनों जुमा के बीच उसके जो भी (छोटे) गुनाह होते हैं, वे सारे क्षमा कर दिए जाते हैं तथा अतिरिक्त दिन दिनों के गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 857]

जुमा की नमाज़ के लिए जल्दी मस्जिद जाने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने जुमा के दिन जनाबत का स्नान (पत्नी से सहवास के बाद का स्नान) किया, फिर पहले समय में मस्जिद गया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक ऊँट दिया; जो दूसरे समय पर गया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक गाय दी; जो तीसरे समय में गया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक बकरी दी; जो चौथे समय में गया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक मुर्गी दी तथा जो पाँचवें समय में गया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक अंडा दिया। फिर जब इमाम निकल आता है, तो फ़रिश्ते ख़ुत्बा सुनने लगते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 881, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 850]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जुमा के दिन मस्जिद के हर द्वार पर फ़रिश्ते होते हैं, जो क्रम के अनुसार हर आने वाले का नाम लिखते जाते हैं। फिर जब इमाम मिंबर पर बैठ जाता है, तो वे अपने खाते समेट लेते हैं और ख़ुत्बा सुनने लगते हैं। तो सबसे पहले आने वाले ने गोया अल्लाह के लिए एक ऊँट दान किया; दूसरे नंबर पर आने वाले आदमी ने गोया अल्लाह के रास्ते में एक गाय दान की; तीसरे नंबर पर आने वाले व्यक्ति ने गोया अल्लाह के रास्ते में एक बकरी दान की; चौथे नंबर पर आने वाले व्यक्ति ने गोया एक मुर्गी दान की तथा जो पाँचवें नंबर पर आया, गोया उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए एक अंडा दिया। फिर जब इमाम निकल आता है, तो फ़रिश्ते ख़ुत्बा सुनने लगते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 929, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 850]

जुमा के दिन दुआ कबूल होने के समय दुआ करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जुमा के दिन एक ऐसा समय है, जब कोई मुसलमान उस समय माँगता है तो उसे दिया जाता है।''

साथ ही फ़रमाया : वह संक्षिप्त समय है।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 935, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 852। यहाँ सहीह मुस्लिम के शब्द लिए गए हैं।

जिसकी ज़बान से निकलने वाला आख़री शब्द ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' हो, उसका प्रतिफल

मुआज़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णनित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसकी ज़बान से निकलने वाले अंतिम शब्द ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' होंगे, वह जन्नत में प्रवेश करेगा।"

[सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 3116]

जनाज़ा में उपस्थित होने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो कोई ईमान के साथ एवं सवाब हासिल करने की नीयत से किसी मुसलमान के जनाज़े के साथ जाए और नमाज़ व दफ़न के समाप्त होने तक उसके साथ रहे, तो वह दो क़ीरात सवाब लेकर वापस आता है। हर क़ीरात उहुद पहाड़ के बराबर है। और जो आदमी जनाज़ा पढ़कर दफ़न से पहले लौट आए, वह एक क़ीरात सवाब लेकर लौटता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 47, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 945]

जिस व्यक्ति के जनाज़े की नमाज़ में सौ या चालीस लोग उपस्थित हों, उसका प्रतिफल

आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''यदि किसी (मुसलमान) मृतक पर मुसलमानों की एक जमात नमाज़ पढ़े, जिसकी संख्या एक सौ हो, और वे तमाम लोग उसके लिए सिफ़ारिश करें, तो उसके बारे में उनकी सिफ़ारिश सुनी जाती है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 947]

कुरैब, अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत करते हैं कि क़ुदैद या उसफ़ान में उनके एक बेटे की मृत्यु हो गई, तो उन्होंने कहा : कुरैब! ज़रा देखकर आओ कि इसके जनाज़े की नमाज़ के लिए कितने लोग इकट्ठा हुए हैं? उनका कहना है कि मैं निकला, तो देखा की कुछ लोग इकट्ठे हो चुके हैं। मैंने उनको ख़बर दी, तो उन्होंने कहा : क्या संख्या चालीस है? उनका कहना है कि मैंने हाँ में उत्तर दिया, तो उन्होंने ने कहा : तो इसको (मृतक को) निकालो, इसलिए कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है: ''कोई भी मुसलमान जब मरता है और उसके जनाज़े की नमाज़ में चालीस लोग जमा होते हैं, जो अल्लाह के साथ शिर्क न ठहराते हों, तो अल्लाह उसके बारे में उनकी दुआ को कबूल करता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 948]

दु:ख के समय ''इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन'' कहने का प्रतिफल

उम्म-ए-सलमा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से वर्णित है, वह कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सना है :

''जब किसी मुसलमान को कोई दुख पहुँचता है, और वह यह दुआएँ पढ़ता है, जिनका अल्लाह ने आदेश दिया है : ''इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजेऊन'' (हम सब अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटकर जाना है) "हे अल्लाह! मुझे मेरे दुःख का प्रतिफल दे और उसका बेहतर बदल दे", तो अल्लाह उसे पिछले से अच्छा बदल प्रदान करता है।''

वह कहती हैं : जब अबू सलमा की मौत हुई, तो मैंने सोचा कि कौन-सा मुसलमान अबू सलमा से अच्छा हो सकता है? उनका परिवार पहला परिवार था, जिसने रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ओर हिजरत किया! फिर मैंने वह दुआएँ पढ़ीं, तो अल्लाह ने उनके बदले मुझे अपने रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को प्रदान किया।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 918]

ताऊन से मरने वाले का प्रतिफल

अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वे बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

''ताऊन हर मुसलमान के लिए शहादत की तरह है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2830 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1916]

आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है, वह कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से प्लेग के बारे में पूछा, तो आपने बताया कि यह अज़ाब है। उसे अल्लाह जिसपर चाहता है, भेजता है। परन्तु अल्लाह ने इसे ईमान वालों के लिए अनुकंपा बना दिया है। अतः, जो भी बंदा प्लेग से ग्रस्त हो जाए और धैर्य के साथ तथा सवाब (पुण्य) की आशा में अपने नगर में ठहरा रहे, तथा यह विश्वास रखे कि उसे वही पहुँच सकता है, जो अल्लाह ने उसके लिए लिख दिया है, तो उसे शहीद के बराबर नेकी मिलेगी।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3474]

जिसके दो या तीन बच्चे वयस्क होने से पहले मर जाएँ, उसका प्रतिफल

अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिस मुस्लिम के तीन बच्चे बालिग़ (वयस्क) होने से पूर्व ही मर जाएँ, उसे अल्लाह उन बच्चों पर खास दया करते हुए जन्नत में दाखिल कर देगा।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1248]

अबू सईद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं : औरतों ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा कि हमारे संबोधन के लिए एक दिन निर्धारित कर दें। अतः आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनको नसीहत की और कहा : ''जिस औरत के तीन बच्चे मर जाएँ, तो वे उसके लिए जहन्नम से आड़ होंगे।'' एक औरत ने कहा : यदि दो मरें? तो आपने कहा : ''हाँ दो भी।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1249 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या -2633]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''जिस मुस्लिम के तीन बच्चे मर जाएँ, उसे जहन्नम की आग केवल क़सम पूरी करने भर छूएगी।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1251 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2632]

जिसका कोई अपना मर जाए और वह उसपर सब्र करे, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : जब मैं अपने मोमिन बंदे से दुनिया वालों में से उसके किसी प्रिय को उठा लेता हूँ, फिर वह सवाब की आशा में धैर्यवान रहता है, तो उसके लिए जन्नत के सिवा कुछ और नहीं है।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6424]

इस हदीस में आए हुए ''सफ़ी'' शब्द का अर्थ निकट का प्रिय, जैसे बेटा, भाई या हर वह व्यक्ति है, जिसे इन्सान प्यार करता है।

सदक़ा का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''स़दक़ा माल में से कुछ कम नहीं करता है।''

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2588]

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

अबू तलहा मदीना के अंसार के बीच खजूर के बाग़ के मामले में सबसे मालदार इन्सान थे। उनके निकट सबसे प्रिय माल मदीना में स्थित बैरुहा बाग था, जो मस्जिद नबवी के बिल्कुल सामने था। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- वहाँ जाते और उसका मीठा पानी पीते थे।

अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि जब यह आयत उतरी ''لن تنالوا البر حتى تنفقوا مما تحبون'' (तुम लोग उस समय तक पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक कि अल्लाह के रास्ते में वह खर्च न करो, जो तुम्हें पसंद है), तो अबू तलहा अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और कहा : हे अल्लाह के रसूल! अल्लाह कहता है : (तुम लोग उस समय तक पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक कि अल्लाह के रास्ते में वह खर्च न करो, जो तुम्हें पसंद है) और मेरे निकट सबसे प्रिय धन बैरुहा बाग़ है, अतः यह अल्लाह के लिए सदक़ा है। मैं आशा करता हूँ कि अल्लाह के निकट यह नेकी शुमार हो और मुझे जमा पूंजी के रूप में मिले। हे अल्लाह के रसूल! आप अल्लाह की मंशा के मुताबिक़ इसका जैसा चाहें, प्रयोग करें।

यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: ''बहुत ख़ूब! देखो, यह लाभदायक माल है। यह लाभदायक माल है। तुमने जो कहा वह मैंने सुना, परन्तु मैं उचित समझता हूँ कि तुम इसे अपने निकट के रिश्तेदारों में बाँट दो।'' अबू तलहा ने कहा : मैं ऐसा ही कूरँगा हे अल्लाह के रसूल! फिर अबू तलहा ने उस बाग़ को अपने क़रीबी संबंधियों एवं चचेरे भाइयों में बाँट दिया।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1461 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 998]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो व्यक्ति हलाल की कमाई से एक खजूर के बराबर भी कोई वस्तु सदक़ा करता है और वैसे भी अल्लाह केवल हलाल वस्तु ही को स्वीकार करता है, तो अल्लाह उसे अपने दाहिने हाथ से ग्रहण करता है और फिर उसे सदक़ा करने वाले के लिए उसी प्रकार बढ़ाता जाता है, जिस प्रकार तुममें से कोई घोड़े के बच्चे की परवरिश करता है, यहाँ तक कि वह पहाड़ के समान हो जाता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 7430 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1014]

ज़कात का माल वसूलने का काम करने वाले और कोषाध्यक्ष यदि ईमानदार हों, तो उनका प्रतिफल

अबू मूसा -रज़ियल्लाहु अन्हु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णित करते हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अमानतदार, मुसलमान कोषाधिकारी, जो खुशी-खुशी उसका अक्षरशः पालन करता हो, जिसका आदेश उसे मिला हो और वहीं खर्च करता हो, जहाँ खर्च करने का आदेश उसे दिया गया हो, तो वह भी एक सदक़ा करने वाला है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1438, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1023]

ग़रीब के सदक़ा करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक दिरहम एक लाख दिरहम पर भारी पड़ गया।" लोगों ने पूछा: हे अल्लाह के रसूल! वह कैसे?

तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "एक आदमी के पास दो दिरहम थे, उसने उसमें से एक दिरहम सदक़ा कर दिया, जबकि दूसरे आदमी के पास बहुत सारे माल थे और उसने अपने उन मालों में से एक लाख दिरहम लिया और सदक़ा कर दिया।"

[मुसनद अहमद, हदीस संख्या : 8929 एवं सुनन नसाई, हदीस संख्या : 2527]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि उन्होंने कहा : हे अल्लाह के रसूल! कौन-सा सदक़ा उत्तम है? तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "वह सदक़ा जो ग़रीब अपनी यथाशक्ति दे। देखो, सदक़ा करते समय उन लोगों से शुरू करो, जो तुमपर आश्रित हैं (अर्थात क़रीबी ज़रुरतमंद लोगों से)।"

[मुसनद अहमद, हदीस संख्या : 8702 एवं सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 1677]

छुपाकर सदक़ा करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"सात लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्श के नीचे छाया देगा, जिस दिन उसके अतिरिक्त कोई छाया नहीं होगी।" फिर आपने उनमें से एक व्यक्ति का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया : "एक ऐसा व्यक्ति, जो सदक़ा करता है एवं उसे इस तरह छुपाता है कि उसके बाएँ हाथ को ख़बर नहीं होती है कि दाएँ हाथ ने क्या खर्च किया।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1423 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1031]

ऐसे व्यक्ति का प्रतिफल, जिसे काम चलने के बराबर रोज़ी दी गई और वह उससे संतुष्ट रहा, सब्र से काम लिया और अल्लाह पर भरोसा रखते हुए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया

अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"वह व्यक्ति सफल हो गया, जिसने इस्लाम ग्रहण कर लिया तथा उसे ज़रूरत भर रोज़ी मिल गई और वह अल्लाह ने जो कुछ दिया है, उससे संतुष्ट रहा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1054]

तथा अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि कुछ अन्सारियों ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से (धन) माँगा, तो आपने दे दिया। उन्होंने दोबारा माँगा तो आपने फिर दे दिया। उन्होंने फिर माँगा, तो आपने उन्हें फिर दिया। यहाँ तक कि आपके पास जो कुछ था, सब ख़त्म हो गया। अंततः आपने फरमाया: "मेरे पास जो माल होगा, उसे तुम लोगों से बचा कर नहीं रखूँगा। लेकिन याद रखो, जो आदमी माँगने से बचेगा, अल्लाह उसे दरिद्रता से बचाएगा और जो आदमी (दुनिया के माल से) बेपरवाह रहेगा, अल्लाह उसे मालदार कर देगा और जो आदमी सब्र करेगा, अल्लाह उसे सब्र करने वाला बना देगा, और किसी आदमी को सब्र से बेहतर एवं व्यापक नेमत (अनुग्रह) नहीं दी गई है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1469, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1053]

अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खाना खिलाने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"महान एवं सम्माननीय अल्लाह क़यामत के दिन कहेगा : हे आदम की संतान! मैं बीमार हुआ परन्तु तुमने मेरी इयादत (बीमार का हाल-चाल जानने के लिए जाना) नहीं की, तो वह कहेगा : हे रब! मैं कैसे आपको देखने आता, जबकि आप सारे संसारों के रब (पालनहार) हैं?

अल्लाह कहेगा : क्या तुम नहीं जानते कि मेरा अमुक बंदा बीमार हुआ था, परन्तु तुमने उसकी इयादत (बीमार का हाल-चाल जानने के लिए जाना) नहीं की। क्या तुम नहीं जानते कि यदि तुम उसकी इयादत करते, तो मुझे उसके पास पाते?

हे आदम की संतान! मैंने तुमसे खाना माँगा, परन्तु तुमने मुझे खाना नहीं खिलाया? तो वह कहेगा : हे रब! मैं कैसे आपको खाना खिलाता, जबकि आप सारे संसारों के रब हैं?

अल्लाह कहेगा : क्या तुम नहीं जानते कि मेरे अमुक बंदे ने तुमसे खाना माँगा, मगर तुमने उसको खाना नहीं दिया? क्या तुम नहीं जानते कि यदि तुम उसको खाना खिलाते, तो अपने इस कर्म को मेरे पास पाते?

हे आदम की संतान! मैंने तुमसे पानी माँगा, परन्तु तुमने मुझे पानी नहीं पिलाया? वह कहेगा : हे रब! मैं कैसे आपको पानी पिलाता, जबकि आप सारे संसारों के रब हैं?

अल्लाह कहेगा : मेरे अमुक बंदे ने तुमसे पानी माँगा, मगर तुमने उसको पानी नहीं दिया, यदि तुम उसको पानी पिलाते, तो अपने उस काम को मेरे पास पाते।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2569]

किसी आदमी या जानवर को पानी पिलाने वाले का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक आदमी ने एक कुत्ते को देखा कि वह प्यास के मारे शबनम से भीगी ज़मीन को चाट रहा है, तो उस आदमी ने अपने मोज़े को उतार कर, (उसमें पानी भर कर) उस कुत्ते को पानी पिलाया और उसकी प्यास बुझा दी, तो इसपर अल्लाह ने उसका धन्यवाद किया और उसको जन्नत में प्रवेश कराया।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 173]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"बड़ी गर्मी का दिन था कि एक व्यभिचारिणी ने एक कुत्ते को कुएँ के चारों ओर चक्कर लगाते देखा, जिसने प्यास के कारण ज़ुबान निकाल रखी थी। अतः, उसने मोज़ा निकाला और उसे पानी पिलाया, तो उसके इस कार्य के कारण उसे क्षमा कर दिया गया।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2245]

खेती करने या पौधा लगाने का प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब कोई मुसलमान पौधा लगाता है या खेती करता है, और उससे कोई चिड़िया या इन्सान या जानवर खाता है, तो वह उसके लिए सदक़ा होता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2320 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1553]

जाबिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो कोई मुसलमान कोई पौधा लगाता है, तो उसमें से जो कुछ खा लिया जाए, वह उसके लिए सदक़ा है, उसमें से जो कुछ चोरी हो जाए, वह उसके लिए सदक़ा है, उसमें से जो जानवर खा जाए, वह उसके लिए सदक़ा है, उसमें से जो चिड़िया खा ले, वह उसके लिए सदक़ा है तथा उसको कोई नुक़सान पहुँचाए, तो वह उसके लिए सदक़ा है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1552]

कल्याणकारी कार्यों पर खर्च करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"बंदे जिस दिन भी सुबह करते हैं, तो दो फ़रिश्ते उतरते हैं; एक कहता है : ऐ अल्लाह ख़र्च करने वाले को उत्तम प्रतिफल प्रदान कर, जबकि दूसरा कहता है : ऐ अल्लाह, रोकने वाले का विनाश कर।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1442, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1010]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"उच्च एवं महान अल्लाह फ़रमाता है : ऐ आदम की संतान, खर्च करो, तुमपर खर्च किया जाएगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5352 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 993]

तंगहाल के साथ नर्मी करने, उसे ढ़ील देने या क्षमा करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

एक व्यापारी था, वह लोगों को उधार देता था। जब वह किसी तंगहाल (दरिद्र) को देखता, तो अपने आदमियों से कहता कि इसे माफ़ कर दो, शायद अल्लाह हमें माफ़ कर दे। चुनांचे अल्लाह ने उसे माफ़ कर दिया।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2078 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1562]

अब्दुल्लाह बिन अबू क़तादा से वर्णित है कि अबू क़तादा ने एक व्यक्ति को बुला भेजा, जिसने उनसे उधार ले रखा था, तो वह छुप गया, फिर पाया गया, तो उसने कहा : मैं तंगहाल (दरिद्र) हूँ, तो उन्होंने कहा : अल्लाह की क़सम? तो उसने कहा : अल्लाह की क़सम, तो उन्होंने (अबू क़तादा) कहा : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है: "जो कोई इस बात से प्रसन्न हो कि अल्लाह क़यामत के दिन उसे संकट से बचा ले, तो वह तंगहाल को छूट दे या उसे क्षमा कर दे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1563]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

जिसने किसी मोमिन की दुनिया की कोई परेशानी दूर की, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी परेशानी को दूर करेगा। जिसने किसी अभावग्रस्त व्यक्ति के साथ आसानी बरती, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसके साथ आसानी करेगा। जिसने किसी मुसलमान के किसी अवगुण एवं दोष को छुपाया, अल्लाह दुनिया और आख़िरत में उसके अवगुण को छुपाएगा। अल्लाह उस समय तक बंदे की मदद में रहता है, जब तक बंदा अपने भाई की मदद में रहता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2699]

अबू यसीर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"जिसने किसी तंगहाल (दरिद्र) का ख्याल रखा या उसके बोझ को कम किया, अल्लाह उसे अपने अर्श के नीचे छाया देगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 3006]

रोज़े का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"महान एवं उच्च अल्लाह ने कहा है : आदम की संतान का हर नेक काम उसी के लिए है, परन्तु रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा। वह मेरे लिए सहवास एवं खाना-पीना छोड़ता है। क़सम उस अल्लाह की जिसके हाथ में मुहम्मद की जान है, रोज़ेदार के मुँह की गंध क़यामत के दिन अल्लाह के निकट कस्तूरी की गंध से अधिक सुगंधित होगी। रोज़ेदार के लिए दो ख़ुशियाँ हैं, पहली : जब वह रोज़ा तोड़ता है, तो उस समय वह खाने के कारण खुश होता है। दूसरी : जब वह अपने रब से मिलेगा, तो वह अपने रोज़े से ख़ुश होगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1904 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1151]

सहल -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जन्नत में एक द्वार है, जिसे रय्यान कहा जाता है। क़यामत के दिन उससे रोज़ेदार प्रवेश करेंगे। उनके सिवा कोई उस द्वार से प्रवेश नहीं करेगा। कहा जाएगा : रोज़ेदार कहाँ हैं? अतः, वे उठ खड़े होंगे। उनके सिवा कोई उससे प्रवेश नहीं करेगा। जब वे दाख़िल हो जाएँगे, तो द्वार बंद कर दिया जाएगा और उससे कोई अंदर न आएगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1896 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1152]

रमज़ान का रोज़ा ईमान के साथ एवं नेकी की नीयत से रखने वाले का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए, रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 37 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 759]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3277 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1079]

जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान के साथ एवं नेकी की आशा लेकर रखा, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 37 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 759]

जिसने ईमान के साथ एवं नेकी की आशा लेकर क़दर की रात का क़याम किया, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए, लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) को जाग कर इबादत की, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1901 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 760]

सहरी खाने का प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"तुम लोग सहरी खाया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1923 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1095]

जल्दी इफ़तार करने का प्रतिफल

सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"लोग उस समय तक भलाई में रहेंगे, जब तक इफ़तार करने में जल्दी करते रहेंगे।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1957 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1098]

जिसने रमज़ान के रोज़े के साथ-साथ शव्वाल के छह रोज़े रखे, उसका प्रतिफल

अबू अय्यूब -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने रमज़ान के रोज़े रखने के साथ-साथ शव्वाल के छह रोज़े रखे, मानो उसने पूरे साल के रोज़े रखे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1164]

अरफ़ा के दिन रोज़ा रखने का प्रतिफल

अबू क़तादा से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अरफ़ा के दिन के रोज़े के बारे में पूछा गया, तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "वह एक साल पिछले एवं एक साल अगले गुनाहों को मिटा देता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1162]

आशूरा के दिन रोज़ा रखने का प्रतिफल

अबू क़तादा से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से आशूरा के दिन के रोज़े के बारे पूछा गया, तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "वह पिछले एक साल के गुनाहों को मिटा देता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1162]

अल्लाह के महीने मुहर्रम का रोज़ा रखने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"रमज़ान के बाद सबसे उत्तम रोज़ा अल्लाह के महीने मुहर्रम का रोज़ा है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1163]

शाबान महीने का रोज़ा रखने का प्रतिफल

उसामा बिन ज़ैद -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं : मैं ने कहा : हे अल्लाह के रसूल! मैं आपको दूसरे महीने में इतने रोज़े रखते हुए नहीं देखता हूँ जितने आप शाबान के महीना में रखते हैं!

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "रजब और रमज़ान के बीच वह ऐसा महीना है, जिससे लोग बेपरवाह रहते हैं। वह ऐसा महीना है, जिसमें सारे संसारों के रब के हुज़ूर सबके कार्यों को पेश किया जाता है और मैं चाहता हूँ कि जब मेरे कार्य पेश किए जाएँ, तो मैं रोज़ा की अवस्था में रहूँ।"

[सुनन नसाई हदीस संख्या : 2357]

हर महीने तीन रोज़े रखने वाले का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस़ -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मुझसे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"हर महीने तीन रोज़े रखा करो, यह साल भर के रोज़े हुए या साल भर के रोज़े की तरह हुए।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3419 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1159]

बुख़ारी एवं मुस्लिम की एक रिवायत में है :

"तुम्हारे लिए पर्याप्त होगा कि तुम हर महीने तीन रोज़े रखो। इसलिए कि हर नेकी का बदला दस गुना मिलेगा, इस तरह ये पूरे साल के रोज़े हो जाएँगे।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6134 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1159]

अबू क़तादा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"हर महीने तीन रोज़े रखना एवं रमज़ान के रमज़ान के रोज़े रखना पूरे वर्ष के रोज़े रखने के बराबर है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1162]

सोमवार के दिन रोज़ा रखने का प्रतिफल

अबू क़तादा अंसारी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सोमवार के रोज़े के संबंध में पूछा गया, तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "उस दिन मैं पैदा हुआ, उसी दिन मुझे नबूवत प्रदान हुई या मुझपर पहली वह्य उतरी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1162]

एक दिन रोज़ा रखने एवं एक दिन इफ्तार करने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मुझसे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह के निकट सबसे प्रिय रोज़े दाऊद -अलैहिस्सलाम- के रोज़े हैं। वह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3420 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1159]

हज तथा उमरा का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने अल्लाह के लिए हज किया तथा हज के दिनों में बुरी बात एवं बुरे कार्यों से बचा एवं अवज्ञा से दूर रहा, वह उस दिन की तरह (पवित्र होकर) लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1521 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1350]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक उमरा दूसरे उमरा तक के गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है, तथा स्वीकृत हज का प्रतिफल केवल जन्नत है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1773 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1349]

रमज़ान में उमरा का प्रतिफल

इब्न-ए-अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अंसार की एक औरत, जिसका नाम उम्म-ए-सिनान था, से कहा : "तुम मेरे साथ हज क्यों नहीं करती? उसने कहा : अमुक के अब्बा -अर्थात उसके पति- के पास दो ऊँट थे, एक पर बैठ कर वह और उसका बेटा हज को गए और दूसरे के द्वारा हमारा ग़ुलाम खेतों को सींचता है, तो आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : (यदि तुम्हारे साथ यह समस्या है तो याद रख) "रमज़ान में उमरा करना हज के बराबर या मेरे साथ हज के बराबर है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1782 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1256]

ज़ुल-हिज्जा महीने के पहले दस दिनों में नेकी के कार्य करने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"ज़ुल-हिज्जा के दस दिनों के नेक कार्य दूसरे दिनों में किए गए कार्यों से उत्तम हैं।" सहाबा ने पूछा : जिहाद से भी उत्तम हैं? आपने फरमाया: "हाँ, जिहाद से भी उत्तम हैं, मगर यह कि यदि कोई आदमी अपनी जान एवं माल को हथेली में रखकर अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए निकले और वह उनमें से कुछ भी लेकर वापस न हो, (तो उस प्रकार का जिहाद इन दिनों के नेक कार्यों से भी बेहतर है)।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 969]

मदीने में रहने वालों का प्रतिफल

साद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"काश कि लोगों को पता होता कि मदीना उनके लिए बेहतर है! कोई व्यक्ति यदि अप्रसन्न होकर इसे छोड़ता है, तो अल्लाह उसके स्थान पर उससे बेहतर व्यक्ति को लाकर रख देता है। इसमें मिलने वाले कष्ट एवं कठिनाइयों पर यदि कोई सब्र करेगा, तो क़यामत के दिन मैं उसके लिए सिफ़ारिशी (अभिस्तावक) अथवा गवाह बनुँगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1363]

क़ुरआन सीखने एवं उसकी तिलावत करने का प्रतिफल

अबू मूसा अशअरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"क़ुरआन पढ़ने वाले मोमिन का उदाहरण, उस तुरंज (चकोतरा) फल का है, जिसकी सुगंध अच्छी और जिसका स्वाद भी अच्छा है। क़ुरआन न पढ़ने वाले मोमिन का उदाहरण उस खजूर का है, जिसमें कोई खुश्बू नहीं होती, लेकिन उसका स्वाद मीठा है। क़ुरआन पढ़ने वाले मुनाफ़िक़ (पाखंडी) का उदाहरण उस तुलसी का है, जिसकी गंध तो है लेकिन स्वाद कड़वा है और क़ुरआन न पढ़ने वाले मुनाफ़िक़ (पाखंडी) का उदाहरण उस इन्द्रायण फल का है, जिसके अंदर गंध भी नहीं है और जिसका स्वाद बहुत ही कड़वा है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5020 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 797]

तथा अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"क्या तुममें से किसी व्यक्ति को पसंद है कि जब वह अपने परिवार के पास लौटे, तो उसमें तीन मोटी-ताज़ी गाभिन ऊँटनियाँ पाए?" हमने कहा : अवश्य! तो फ़रमाया : "तुममें से किसी व्यक्ति का अपनी नमाज़ में तीन आयतों का पढ़ना उसके लिए तीन मोटी-ताज़ी गाभिन ऊँटनियों से उत्तम है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 802]

उक़्बा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

हम लोग सुफ़्फ़ा में बैठे हुए थे कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- निकले और फरमाया: "तुममें से कौन पसंद करता है कि वह हर दिन बुतहान या अक़ीक़ जाए और वहाँ से दो मोटी तगड़ी-ऊँटनियाँ लाए, किसी को कोई नुक़सान पहुँचाए या रिश्ता काटे बगैर? हम लोगों ने कहा : हे अल्लाह के रसूल! हम सब इस बात को पसंद करते हैं। आपने फरमाया: "तुम लोगों में से जो मस्जिद जाता है और अल्लाह की किताब की दो आयतें पढ़ता है या सीखता है, तो यह उसके लिए दो ऊँटनियों से उत्तम है, इसी प्रकार तीन आयतें पढ़ना तीन ऊँटनियों से उत्तम है, एवं चार आयतें पढ़ना चार ऊँटनियों से उत्तम है। यानी जितनी आयतें पढ़ी जाएँगी, वह उतनी संख्या में ऊँट से उत्त्म होंगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 803]

उसमान -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"तुम्हारे बीच सबसे उत्तम व्यक्ति वह है, जो खुद क़ुरआन सीखे और उसे दूसरों को सिखाए।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5027]

और उसकी एक रिवायत में है:

"तुम्हारे बीच सबसे उत्तम व्यक्ति वह है, जो खुद क़ुरआन सीखे और उसे दूसरों को सिखाए।"

आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो व्यक्ति क़ुरआन पढ़ता है और वह उसमें निपुण है, वह सम्मानित और नेक फ़रिश्तों के साथ होगा, तथा जो अटक-अटक कर क़ुरआन पढ़ता है और उसे क़ुरआन पढ़ने में कठिनाई होती है, उसके लिए दोहरा सवाब है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 4937 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 798। यहाँ लिए गए शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

अबू उमामा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"क़ुरआन पढ़ो; क्योंकि क़ुरआन क़यामत के दिन अपने पढ़ने वालों के लिए सिफ़ारिशी बनकर आएगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 804]

आमिर बिन वासिला से वर्णित है कि नाफ़े बिन हारिस़ उसफ़ान में उमर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से मिले। उमर ने उनको मक्का में अपना प्रतिनिधि निर्धारित कर रखा था। चुनांचे उमर ने पूछा : तुमने वादी वालों का प्रशासक किसे बनाया है? उन्होंने कहा : इब्न-ए-अबज़ा को, तो उमर ने कहा : इब्न-ए-अबज़ा कौन है? तो उन्होंने कहा : हमारा एक आज़ाद किया हुआ ग़ुलाहम है, तो उमर ने कहा : तुमने उनका प्रशासक एक ग़ुलाम को बना दिया? तो उन्होंने कहा कि वह महान एवं उच्च अल्लाह की किताब का क़ारी (सभी नियमों का पालन करते हुए क़ुरआन पढ़ने वाला) है एवं फ़राइज (मीरास़ को बाँटने का ज्ञान) का जानकार है, तो उमर ने कहा : देखो, तुम्हारे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया है : "अल्लाह इस पुस्तक द्वारा कुछ समुदायों को ऊँचा करेगा तो कुछ को नीचे करेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 817]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब कुछ लोग अल्लाह के किसी घर में अल्लाह की किताब को पढ़ने और उसे सीखने-सिखाने के उद्देश्य से एकत्र होते हैं, तो उनपर शांति की धारा बरसती है, अल्लाह की रहमत उन्हें ढाँप लेती है और अल्लाह उनकी चर्चा अपने निकटवर्ती फ़रिश्तों के बीच करता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2699]

सूरा फ़ातिहा पढ़ने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं :

जिबरील -अलैहिस्सलाम- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास बैठे हुए थे कि ऊपर से एक आवाज़ सुनी। उन्होंने अपना सर उठाया और कहा : "यह आकाश का एक द्वार है, जो आज खोला गया है और इससे पूर्व कभी खोला नहीं गया था और उससे एक फ़रिश्ता उतरा।" आगे कहा : "यह धरती पर उतरने वाला एक फरिश्ता है, जो इससे पूर्व कभी नहीं उतरा था।" उसने (अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को) सलाम किया और कहा : दो नूर की शुभसूचना लीजिए, जो आपको दिए गए हैं। आपसे पहले किसी नबी को नहीं दिए गए थे। दोनों नूर हैं, सूरा फ़ातिहा और सूरा बक़रा की अंतिम आयतें। इनका जो भी शब्द आप पढ़ेंगे, उनके अंदर माँगी गई चीज़ें आपको दी जाएँगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 806]

सूरा बक़रा पढ़ने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अपने घरों को क़ब्रिस्तान नहीं बनाओ, जिस घर में सूरा बक़रा पढ़ी जाती है, शैतान उस घर से भाग जाता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 780]

अबू उमामा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, उन्होंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"सूरा बक़रा पढ़ा करो, क्योंकि उसको अपनाना (पढ़ने, याद करने, समझने, उनकी शिक्षाओं का पालन करने के तौर पर) बरकत है, उसको छोड़ देना मायूसी है और बातिल वाले (जादूगर लोग) इसका पालन नहीं कर सकते।"

मुआविया कहते हैं : मुझे ख़बर मिली है कि ''बतला'' का अर्थ ''जादूगर'' है।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 804]

आयतुल कुर्सी पढ़ने का प्रतिफल

अबू-हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, उन्हों ने कहा:

मुझको अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने रमज़ान की ज़कात की निगरानी के लिए नियुक्त किया, तो एक आदमी आया और अनाज चुनराने लगा। मैंने उसको पकड़ लिया और कहा : मैं तुमको अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास ले जाउँगा। फिर अबू हुरैरा ने पूरी कहानी बयान की, तो उस आदमी ने कहा : जब तुम अपने बिस्तर में आओ तो आयतुल कुर्सी पढ़ लो। इससे सुबह तक अल्लाह की तरफ से तुम्हारे साथ एक निगरानी करने वाला रहेगा और शैतान तुम्हारे निकट नहीं आएगा। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "उसने कहा तो सच है, मगर है वह झूठा। वह शैतान था।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3275]

सूरा बक़रा की आख़री आयतें पढ़ने का प्रतिफल

अबू मस्ऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने किसी रात सूरा बक़रा की आख़री दो आयतों को पढ़ीं, वे उसके लिए काफ़ी होंगी।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5009 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 807]

सूरा बक़रा एवं आल-ए-इमरान को पढ़ने का प्रतिफल

अबू उमामा अल-बाहिली -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह कहते हुए सुना है :

"दोनों रोशनी प्रदान करने वाली सूरतों, सूरा बक़रा एवं सूरा आल-ए-इमरान को पढ़ो, इसलिए कि यह दोनों सुरतें क़यामत के दिन इस तरह आएँगी कि मानो यह दो बादल हों, या दो छाया हों या पर फैलाई हुई एवं एक दूसरे से सटी हुई चिड़ियों के दो झुंड हों। दोनों सूरतों अपने पढ़ने वालों का बचाव कर रही होंगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 804]

नव्वास बिन सम'आन -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"क़यामत के दिन क़ुरआन एवं उसका पालन करने वोलों को लाया जाएगा, जिनका प्रतिनिधित्व सूरा बक़रा एवं सूरा आल-ए-इमरान करेंगी। उन दोनों के लिए अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने तीन उदाहरण दिए, जो मुझे अब तक याद हैं। आपने फरमाया: "मानो यह दो बादल हों, या दो छाया हों या पर फैलाई हुई एवं एक-दूसरे से सटी हुई चिड़ियों के दो झुंड हों। दोनों सूरतें अपने पढ़ने वालों का बचाव कर रही होंगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 805]

सूरा कहफ़ पढ़ने का प्रतिफल

बरा बिन आज़िब -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति सूरा कह्फ़ पढ़ रहा था और उसके निकट ही एक घोड़ा रस्सियों से बंधा हुआ था। अचानक उसको एक बादल ने ढाँप लिया और धीरे-धीरे उसके निकट आने लगा तथा उसका घोड़ा उससे बिदकने लगा। जब सुबह हुई और वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया तथा आपको पूरी घटना बताई, तो आपने फ़रमाया : "यह सकीनत (शांति) थी, जो क़ुरआन के कारण उतरी थी।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5011 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 795]

जो सूरा कहफ़ की आरंभिक दस आयतें याद करेगा, उसका प्रतिफल

अबू दरदा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो सूरा कहफ़ की आरंभिक दस आयतें याद करेगा, दज्जाल से सुरक्षित रहेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 809]

सूरा इख़लास़ (قل هو الله أحد) पढ़ने का प्रतिफल

अबू दरदा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"क्या तुममें से कोई एक रात में क़ुरआन का एक तिहाई पाठ करने में असमर्थ है? सहाबा ने कहा : भला एक तिहाई क़ुरआन कैसे पढ़ा जा सकता है? आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "क़ुल हु अल्लाहु अहद एक तिहाई क़ुरआन के बराबर है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 811]

अल्लाह के ज़िक्र का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मक्का के एक रास्ते में चल रहे थे। आपका गुज़र एक पहाड़ से हुआ, जिसका नाम जुमदान था। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "इस जुमदान पर से चलो, तुमसे पहले यहाँ से मुफ़र्रिदून गुज़र चुके हैं।"

सहाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल, ये मुफ़र्रिदून (विशिष्टता वाले लोग) कौन हैं? तो आपने उत्तर दिया : "अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले पुरुष एवं अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाली स्त्रियाँ।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2676]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"महान अल्लाह कहता है : मैं अपने बंदे की उस सोच के साथ हूँ, जो वह मेरे बारे में सोचता है, तथा जब वह मुझे याद करता है, तो मैं उसके साथ होता हूँ। अगर वह मुझे अपने दिल में याद करता है, तो मैं भी उसे अपने दिल में याद करता हूँ। अगर वह मुझे लोगों के बीच याद करता है, तो मैं उसे ऐसे लोगों में याद करता हूँ, जो उनसे अच्छे हैं। अगर वह मुझसे एक बित्ता क़रीब आता है, तो मैं उससे एक हाथ क़रीब आता हूँ और अगर वह मुझसे एक हाथ क़रीब आता है, तो मैं उससे दोनों हाथों को फैलाकर जितनी दूरी बनती है, उतना क़रीब आता हूँ, और अगर वह मेरे पास चलकर आता है, तो मैं उसके पास दौड़ कर आता हूँ।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 7405, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2675]

ज़िक्र की बैठकों का प्रतिफल

मुआविया -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने साथियों की एक सभा में गए और फरमाया: "तुम लोग क्यों बैठे हुए हो?" उन लोगों ने कहा : हम लोग इसलिए बैठे हैं, ताकि अल्लाह को याद करें और इस बात पर उसकी प्रशंसा करें कि उसने हमें इस्लाम का रास्ता दिखाया और इस्लाम जैसा धर्म प्रदान किया। आपने कहा : "अल्लाह की क़सम तुम लोग इसी के लिए बैठे हो?" उन लोगों ने कहा : अल्लाह की क़सम हम इसी लिए बैठे हैं। आपने फरमाया: "मैं तुमसे क़सम इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि तुमपर कोई आरोप लगाना चाहता हूँ। दरअसल बात यह है कि जिबरील -अलैहिस्सलाम- मेरे पास आए और बताया कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह फ़रिश्तों के निकट तुम लोगों पर गर्व कर रहा है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2701]

अबू हुरैरा और अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह दोनों गवाही दे रहे हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "जब भी लोग अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए बैठते हैं, तो फ़रिश्ते उनपर अपना पर फैला देते हैं, उनको रहमत चारों ओर से घेर लेती है, उनपर शांति बरसती है और अल्लाह अपने निकटवर्ती लोगों के पास उनका ज़िक्र करता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2700]

कलिमा-ए-तौहदी "ला इलाहा इल्लल्लाह" का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, फ़रमाते हैं कि मैंने कहा : ऐ रसूलुल्लाह -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-! कौन लोग क़यामत के दिन आपकी सिफ़ारिश के अधिकारी होंगे, तो आपने फ़रमाया : "अबू हुरैरा! मेरा ख़्याल था कि तुमसे पहले कोई मुझसे यह बात नहीं पूछेगा, क्योंकि मैं देखता हूँ कि तुम हदीस की बड़ी चाहत रखते हो। क़यामत के दिन मेरी शिफ़ाअत के हक़दार वह लोग होंगे, जिसने अपने दिल या साफ़ नीयत से "ला इलाहा इल्लल्लाह" कहा हो।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6570]

"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك، وله الحمد، وهو على كل شيء قدير" (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है) इस ज़िक्र को दिन में सौ बार कहने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने यह दुआ "لا إله إلا الله، وحده لا شريك له، له الملك، وله الحمد، وهو على كل شيء قدير" दिन में सौ बार पढ़ी, उसे दस गुलामों को आज़ाद करने का सवाब मिलेगा, उसके लिए सौ नेकियाँ लिखी जाएँगी, उसके सौ गुनाह मिटा दिए जाएँगे, वह शाम तक पूरा दिन शैतान की शरारत से सुरक्षित रहेगा और उससे बेहतर अमल करने वाला कोई न होगा, सिवाय उसके जिसने इससे अधिक काम किया हो।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3293 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2691]

दिन में सौ बार (سبحان الله وبحمده) कहने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने दिन में सौ बार ''سبحان الله وبحمده'' (अल्लाह के लिए पाकी है उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6405, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2692]

"سبحان الله وبحمده، سبحان الله العظيم" (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ। मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।) कहने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"दो शब्द ऐसे हैं, जो बोलने में ज़बान पर हल्के हैं, तराज़ू में भारी सिद्ध होंगे एवं अल्लाह को बहुत पसंद हैं : और वह हैं "سبحان الله وبحمده، سبحان الله العظيم" (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ, मैं महान अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ।)

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6406, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2694]

"سبحان الله، والحمد لله" कहने का प्रतिफल

अबू मालिक अश्अरी -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"(अल-हम्दु लिल्लाहि) तराज़ू को भर देगा, और (सुब्हान अल्लाह) तथा अल-हम्दु लिल्लाह) आकाश व धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 223]

"सुब्हान अल्लाहि, व अल-हम्दु लिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह व अल्लाहु अकबर" कहने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मेरे निकट "سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلا الله، والله أكبر" (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और अल्लाह सबसे बड़ा है) कहना, उन सारी वस्तुओं से अधिक प्रिय है, जिनपर सूरज निकलता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2695]

समुरा बिन जुन्दुब -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित हैं, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह के निकट सबसे प्रिय वाक्य चार हैं : सुबहान अल्लाह (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ), अल-हम्दु लिल्लाह (सारी प्रशंसा अल्लाह की है), ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है) तथा अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है)। इनमें से किसी भी वाक्य को पहले पढ़ा जा सकता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2137]

तसबीह बयान करने (सुबहान अल्लाह कहने) का प्रतिफल

साद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

हम अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास थे कि आपने फ़रमाया : क्या तुममें से कोई इस बात से विवश है कि प्रत्येक दिन एक हज़ार नेकियाँ प्राप्त करे? आपके पास बैठे लोगों में से एक व्यक्ति ने पूछा : आदमी एक हज़ार नेकियाँ कैसे प्राप्त कर सकता है? आपने फ़रमाया : सौ बार 'सुब्हान अल्लाह' कहने से उसके लिए एक हज़ार नेकियाँ लिखी जाती हैं अथवा उसके एक हज़ार गुनाह मिटा दिए जाते हैं।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2698]

"سبحان الله وبحمده، عدد خلقه، ورضا نفسه، وزنة عرشه، ومداد كلماته" (मैं अल्लाह की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करता हूँ, उसकी सृष्टियों की संख्या के समान, उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति के समान, उसके सिंहासन के वज़न के बराबर और उसके शब्दों की संख्या के बराबर।) कहने का प्रतिफल

जुवैरिया -रज़ियल्लाहु अन्हा- से वर्णित है कि वह नमाज़ पढ़ने के बाद उसी जगह बैठी थीं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उनके पास से सुबह के समय फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने के बाद गुज़रे। फिर सूरज ऊपर चढ़ जाने के बाद लौटे, तो वह उसी जगह बैठी थीं। यह देख आपने कहा : "मैं तुम्हें जिस हाल पर छोड़ गया था, अभी तक तुम उसी हाल पर होॽ" उन्होंने हाँ में जवाब दिया, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहा : "मैंने तुम्हारे पास से जाने के बाद चार शब्द तीन बार कहे हैं। यदि उन्हें आज तुमने जो अज़कार पढ़े हैं, उनसे तौला जाए, तो वे चार शब्द भारी साबित होंगे। वे चार शब्द हैं : "سُبْحَانَ اللهِ وَبِحَمْدِهِ، عَدَدَ خَلْقِهِ وَرِضَا نَفْسِهِ وَزِنَةَ عَرْشِهِ وَمِدَادَ كَلِمَاتِهِ'' (मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ, उसकी रचनाओं की संख्या के बराबर, उसकी प्रसन्नता के बराबर, उसके सिंहासन के वज़न के बराबर और उसके शब्दों को लिखने की रोशनाई के बराबर।)

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2726]

"لا حول ولا قوة إلا بالله" कहने का प्रतिफल

अबू मूसा अश्अरी -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझसे फ़रमाया :

"क्या मैं तुम्हारा मार्गदर्शन स्वर्ग के खज़ाने की ओर न कर दूँ? मैंने कहा : क्यों नहीं? आपने फरमाया: "لا حول ولا قوة إلا بالله".(ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह)।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 7386 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2704]

सय्यदुल इस्तिग़फार (सर्वश्रेष्ठ क्षमायाचना) का महत्व

शद्दाद बिन औस -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

सय्यदुल इस्तिग़फार (सर्वश्रेष्ठ क्षमायाचना) यह है कि तुम यह कहो : "ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कुकृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जो मैंने किया है। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ। तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है।"

जिसने इसे इसपर ईमान रखते हुए दिन में पढ़ा और शाम होने से पहले मर गया, वह जन्नत वालों में से होगा। इसी तरह जिसने इसको इसपर ईमान रखते हुए रात में पढ़ा, और सुबह होने से पहले मर गया, वह जन्नत वालों में से होगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6306]

"أعوذ بكلمات الله التامات من شر ما خلق" कहने का प्रतिफल

ख़ौला बिन्त हकीम सुलामिय्या -रज़ियल्लाहु अन्हा- से वर्णित है, वह कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है: "जिसने किसी जगह पड़ाव डाला और कहा : "أعوذ بكلمات الله التامات من شر ما خلق" (मैं अल्लाह की पैदा की हुई वस्तुओं के दुष्कृत्य से, उसके पूर्ण शब्दों के शरण में आता हूँ'' उसके वहाँ से परस्थान करने तक उसको कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकेगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2708)

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

एक आदमी अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और बोला : हे अल्लाह के रसूल! मैंने कल रात बिच्छू के काटने के कारण बहुत कष्ट पाया है, तो आपने फरमाया: "शाम में तुमको कहना चाहिए था "أعوذ بكلمات الله التامات من شر ما خلق لم تضرك" तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचती।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2709]

सोने से पहले क्या कहा जाए?

बरा बिन आज़िब -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब तुम अपने बिस्तर पर जाओ तो नमाज़ के वज़ू की तरह पूरा वज़ू कर लो, फिर दाएँ करवट पर लेटो, फिर कहो : "اللهم أسلمت وجهي إليك، وفوضت أمري إليك، وألجأت ظهري إليك، رغبة ورهبة إليك، لا ملجأ ولا منجا منك إلا إليك، اللهم آمنت بكتابك الذي أنزلت، وبنبيك الذي أرسلت" (हे अल्लाह! मैंने अपनी आत्मा नींद की अवस्था में तेरे हवाले कर दिया, तुझपर ही भरोसा किया, तेरी शरण में आया गया, और मैंने यह तेरी रहमत की चाह एवं तेरे अज़ाब के डर से किया है, तुझसे भागकर कहीं जगह नहीं मिल सकती है, क्योंकि अंत में तेरी रहमत व क्षमा की ओर लौटना है, मैं तेरी किताब पर ईमान लाया, जो तूने उतारी है और तेरे नबी पर विश्वास किया, जो तूने भेजा है।'' इसके बाद यदि उस रात तू मर गया, तो इस्लाम पर मरेगा, और इनको अपनी ज़बान से निकलने वाले आख़िरी शब्द बना।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 247 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2710]

जो व्यक्ति रात को उठकर वह काम करे, जिसका उल्लेख इस हदीस में है, उसका प्रतिफल

उबादा बिन स़ामित -रज़ियल्लाहु अन्हु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णन करते हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसकी रात में आँख खुल जाए और वह यह दुआ पढ़े : "لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، الحمد لله، وسبحان الله، ولا إله إلا الله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلا بالله", फिर यह दुआ पढ़े : "اللهم اغفر لي" या और कोई दुआ करे, उसकी दुआ कुबूल होती है। अगर वज़ू करके नमाज़ पढ़े, तो उसकी नमाज़ भी कबूल होती है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1154]

हदीस में आए हुए शब्द ''تعار'' का अर्थ है जागना।

फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद जो दुआएँ पढ़ी जाती हैं, उनका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास कुछ ग़रीब मुहाजिर आए और कहने लगे : मालदार लोग उच्च श्रेणी एवं हमेशा रहने वाली नेमतों तक पहुँच गए। आपने कहा : "वो कैसे?" उन लोगों ने कहा : वे भी नमाज़ पढ़ते हैं जिस प्रकार हम नमाज़ पढ़ते हैं, वे भी रोज़े रखते हैं जिस प्रकार हम रोज़े रखते हैं, जबकि वे स़दक़ा करते हैं और हम नहीं कर पाते, वे ग़ुलामों को आज़ाद करते हैं और हम नहीं कर पाते। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "क्या मैं तुमको ऐसी चीज़ न बताऊँ, जिससे तुम उन लोगों के बराबर हो सकते हो, जो तुमसे आगे निकल गए हैं, अपने पीछे वालों से आगे निकल जाओगे, और तुम से उत्तम कोई नहीं होगा, सिवाय उसके जो वही करे, जो तुमने किया हो?" उन लोगों ने कहा : क्यों नहीं, हे अल्लाह के रसूल! आपने फरमाया: "तुम लोग हर नमाज़ के बाद 33 बार सुब्हान अल्लाह कहो, 33 बार अल्लाहु अकबर कहो और 33 बार अल-हम्दु लिल्लाह कहो।"

अबू सालेह कहते हैं : फिर ग़रीब मुहाजिर लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास लौट आए और कहने लगे : हमारे मालदार भाइयों ने सुन लिया और वे भी वही करने लगे जो हम करते हैं! इसपर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "यह अल्लाह का अनुग्रह है, जिसे चाहता है देता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 843 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 595]

काब बिन उजरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद कुछ अज़कार हैं, जिनका कहने या करने वाला कभी असफल नहीं होगा। वह अज़कार हैं, 33 बार सुब्हान अल्लाह, 33 बार अल-हम्दु लिल्लाह एवं 34 बार अल्लाहु अकबर कहना।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 596]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने प्रत्येक नमाज़ के पश्चात तैंतीस बार सुब्हान अल्लाह, तैंतीस बार अल-हम्दु लिल्लाह और तैंतीस बार अल्लाहु अकबर कहा, जो कि कुल निन्यानवे बार हुए, और सौ पूरा करने के लिए ''لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير'' (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत है, उसी के लिए सब प्रशंसाएँ हैं, और उसको हर चीज़ पर सामर्थ्य प्राप्त है) कहा, उसके समस्त पाप माफ़ कर दिए जाते हैं, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 597]

दुआ का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह कहता है : मैं अपने बारे में अपने बंदे की सोच के निकट होता हूँ, तथा मैं उसके साथ होता हूँ, वह जब भी मुझे याद करे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2675]

जिसने अपने भाई के लिए उसकी अनुपस्थिति में दुआ की, उसका प्रतिफल

अबू दरदा -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो मुस्लिम बंदा अपने भाई के लिए उसकी अनुपस्थिति में दुआ करता है, तो फ़रिश्ता कहता है : तुम्हारे लिए भी उसी तरह हो।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2732]

क्षमायाचना का प्रतिफल

अबू ज़र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से बयान करते हैं, और आप सर्वशक्तिमान अल्लाह से रिवायत करते हैं कि उसने कहा है :

"हे मेरे बन्दो! तुम रात-दिन गलती करते हो और मैं सभी गुनाहों को क्षमा कर देता हूँ, अत: तुम मुझसे क्षमा याचना करो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2577]

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने मुझपर एक बार दरूद भेजा, उसके बदले में अल्लाह उसपर दस रहमतें उतारेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 408]

माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन मसउद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि एक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि कौन-सा कार्य सबसे उत्तम है? तो आपने फरमाया : "निर्धारित समय पर नमाज़ पढ़ना एवं माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 7534, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 140]

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस़ -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं :

एक आदमी अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और बोला : मैं आपके हाथ में हाथ देकर हिजरत करने एवं जिहाद करने की शपथ लेता हूँ, और मैं इसके द्वारा अल्लाह से बेहतर बदले की आशा रखता हूँ, तो आपने फरमाया : "क्या तुम्हारे माता-पिता में से कोई जीवित है?" उसने कहा : हाँ, बल्कि दोनों जीवित हैं। आपने कहा : "तुम अल्लाह से प्रतिफल चाहते हो?" उसने कहा : हाँ। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "तुम अपने माँ-बाप की तरफ़ लौट जाओ एवं उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2549]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो, फिर वह व्यक्ति अपमानित हो।" किसी ने पूछा : कौन ऐ अल्लाह के रसूल? फ़रमाया : "जिसने अपने माता-पिता को बुढ़ापे में पाया, चाहे दोनों में से एक को पाया हो या दोनों को, परन्तु (उनकी सेवा करके) जन्नत में दाखिल नहीं हुआ।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2551]

रिश्तेदारी निभाने का प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो चाहता हो कि उसको अधिक से अधिक मात्रा में रोज़ी दी जाए और उसकी आयु बढ़ा दी जाए, वह अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करे।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5986 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2557]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह ने सृष्टि को पैदा किया। जब उसने पैदा करने का काम पूरा कर लिया, तो 'रहिम' (संबंध) ने कहा : यह संबंध तोड़ने से आपकी शरण लेने का स्थान है। अल्लाह ने उत्तर दिया : बात तो ठीक है, लेकिन क्या तू इस बात से खुश नहीं है कि मैं उससे संबंध जोडूँ, जो तुझे जोड़े और उससे संबंध तोड़ूँ, जो तुझे तोड़े? उसने कहा : अवश्य, ऐ मेरे पालनहार! अल्लाह ने कहा : तुझे मैं यह वचन देता हूँ। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "यदि तुम चाहो तो यह आयत पढ़ सकते हो : {فهل عسيتم إن توليتم أن تفسدوا في الأرض وتقطعوا أرحامكم।} (फिर यदि तुम विमुख हुए तो दूर नहीं कि तुम धरती पर उपद्रव फैलाओगे एवं संबंधों को तोड़ोगे।)

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5987, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2554]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे कुछ रिश्तेदार हैं। मैं उनसे रिश्ता निभाता हूँ और वे मुझसे रिश्ता काटते हैं। मैं उनसे अच्छा व्यवहार करता हूँ और वे मेरे साथ बुरा बर्ताव करते हैं। मैं उन्हें सहनशीलता दिखाता हूँ और वे अशिष्टता का प्रदर्शन करते हैं। आपने कहा : "अगर तुम्हारी बातें सही हैं, जो तुम कह रहे हो, तो मानो तुम उनके मुँह में गरम राख ठूँस रहे हो। तुम जब तक इसे जारी रखोगे, अल्लाह की ओर से तुम्हारे साथ उनके विरुद्ध एक सहायक मौजूद रहेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2558]

"अल-मल्ल" का अर्थ होता है गरम राख।

पत्नी एवं बच्चों पर खर्च करने का प्रतिफल

अबू मसउद -रज़ियल्लाहु अन्हु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णन करते हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जब कोई आदमी अपने घर वालों पर, नेकी व सवाब की उम्मीद रखते हुए खर्च करता है, तो यह उसके लिए सदक़ा होता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 55 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1002]

उम्म-ए-सलमा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैं कि मैंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर मैं अबू सलमा -रज़ियल्लाहु अन्हु- के बच्चों पर ख़र्च करूँ, तो क्या मुझे सवाब मिलेगा, जबकि वह मेरे ही बेटे हैं? आपने फरमाया : "तुम उनपर ख़र्च करो। जो कुछ तुम उनपर ख़र्च करोगी, उसका सवाब (प्रतिफल) तुम्हें ज़रूर मिलेगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1467, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1001]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक दीनार जो तुमने अल्लाह के रास्ते में खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी दास को मुक्त करने के लिए खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी निर्धन को दान किया और एक दीनार जो तुमने बाल-बच्चों पर ख़र्च किया, उनमें सबसे अधिक नेकी वाला दीनार वह है, जिसे तुमने अपने परिवार पर खर्च किया।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 995]

साद बिन अबू वक़्क़ास़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह की ख़ुशी प्राप्त करने के लिए तुम जो भी खर्च करते हो, तुम्हें उसका बदला मिलेगा, यहाँ तक कि यदि तुम अपनी पत्नी के मुँह में जो निवाला रखते हो, उसका भी।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 56, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1628]

उस व्यक्ति का प्रतिफल जिसकी दो बेटियाँ या दो बहनें हों और वह उनपर स़ब्र करे एवं उनके साथ अच्छा व्यवहार करे

आइशा -रजि़यल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैं :

मेरे पास एक स्त्री आई, जिसके साथ उसकी दो बेटियाँ थीं। वह मुझसे कुछ माँग रही थी, लेकिन मेरे पास सिवाय एक खजूर के उसे देने के लिए कुछ भी नहीं था। मैंने वह खजूर उसे दिया, तो उसने उसे दोनों बेटियों के बीच बाँट दिया और ख़ुद कुछ नहीं खाया। फिर वह उठकर अपनी बेटियों के साथ चल पड़ी। जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमारे पास आए और हमने आपको यह घटना सुनाई, तो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "जो इन पुत्रियों के द्वारा कुछ आज़माया जाए, फिर वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करे, तो वे उनके लिए जहन्नम की आग से बचाव का माध्यम बन जाएँगी।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1418, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2629]

आइशा -रजि़यल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैं:

मेरे पास एक निर्धन स्त्री आई। उसके साथ उसकी दो बेटियाँ भी थीं। मैंने उसे तीन खजूरें दीं। उसने दोनों बच्चियों को एक-एक खजूर दी। एक खजूर स्वयं खाने के लिए मुँह की ओर ले जा रही थी कि दोनों बच्चियों ने उससे खाने को कुछ और माँग लिया। अतः, उसने जो खजूर खुद खाना चाहती थी, उसके दो टुकड़े करके दोनों को दे दिए। मुझे उसके इस कार्य से बड़ा आश्चर्य हुआ। अतः, उसके इस कार्य का ज़िक्र अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से किया, तो आपने फ़रमाया : "अल्लाह ने उसके लिए, इस कार्य के कारण, जन्नत अनिवार्य कर दी अथवा इस कार्य के कारण उसे जहन्नम से मुक्ति प्रदान कर दी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2630]

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने दो लड़कियों का लालन-पालन किया, यहाँ तक कि वह बड़ी हो गईं, तो क़यामत के दिन वह तथा मैं इस तरह आएँगे।" फिर आपने अपनी ऊँगलियों को मिलाया।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2631]

विधवा एवं निर्धन की सहायता करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"विधवाओं और मिस्कीन (निर्धनों) की सहायता करने वाला, अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने वाले की तरह या फ़रमाया कि रात भर जागकर इबादत करने और दिन में रोज़ा रखने वाले की तरह है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5353 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2682]

यतीम का लालन-पालन करने का प्रतिफल

सह्ल -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मैं और यतीम की देख-रेख करने वाला जन्नत में इस तरह होंगे।" फिर आपने तर्जनी और बीच वाली उंगली से इशारा किया और उनके बीच कुछ अंतर रखा।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5304]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मैं और यतीम की देख-रेख करने वाला, चाहे वह यतीम उसका क़रीबी हो या दूर का, जन्नत में इस तरह होंगे।" फिर मालिक (एक वर्णनकर्ता) ने तर्जनी और बीच वाली उंगली से इशारा किया।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2983]

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कथन "उसका या दूसरे का" का अर्थ है, चाहे वह यतीम उसका निकटम संबंधी हो या अजनबी हो और उसके तथा यतीम के बीच में कोई रिश्ता न हो।

उस व्यक्ति का प्रतिफल, जो अपने किसी दीनी भाई को देखने जाए

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हवाले से नक़ल करते हैं कि एक व्यक्ति अपने भाई से दूसरे गाँव में मिलने गया, तो अल्लाह ने उसकी प्रतीक्षा के लिए रास्ते में एक फ़रिश्ता नियुक्त कर दिया। जब वह व्यक्ति फ़रिश्ते के पास आया, तो फ़रिश्ते ने पूछा : तुम कहाँ जा रहे हो? उसने कहा : मैं इस गाँव में अपने एक भाई के पास जा रहा हूँ। फ़रिश्ते ने पूछा : क्या तुम्हारा उसके ऊपर कोई एहसान है, जिसे तुम चुकाना चाहते हो? उसने कहा : नहीं, बात केवल इतनी है कि मैं उससे अल्लाह के लिए मोहब्बत रखता हूँ। फ़रिश्ते ने कहा : मैं तुम्हारे पास अल्लाह का संदेश लेकर आया हूँ कि अल्लाह तुमसे मोहब्बत रखता है, जैसे तुम अल्लाह के लिए उससे मोहब्बत रखते हो।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2567]

जो अपने मुसलमान भाइयों की ज़रूरतों को पूरा करता है, उसका प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। इसलिए न वो उसपर ज़ुल्म करे और न ही उसे ज़ुल्म के हवाले करे। जो आदमी अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने में लगा रहता है, अल्लाह उसकी मुराद पूरी करने में लगा रहता है, और जो आदमी किसी मुसलमान की मुसीबत दूर करता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी मुसीबत दूर करेगा, और जो आदमी मुसलमान का दोष छुपाएगा, क़यामत के दिन अल्लाह उसक दोषों को छुपाएगा।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2442, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2580]

अबू क़तादा -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है :

"जिसे यह पसंद हो कि अल्लाह उसे क़यामत के दिन की परेशानी से मुक्त कर दे, उसे चाहिए कि किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को मोहलत दे या उसका क़र्ज़ माफ़ कर दे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1563]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने किसी मोमिन की दुनिया की कोई परेशानी दूर की, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी परेशानी को दूर करेगा। जिसने किसी अभावग्रस्त व्यक्ति के साथ आसानी बरती, अल्लाह दुनिया एवं आख़िरत में उसके साथ आसानी करेगा। जिसने किसी मुसलमान के किसी अवगुण एवं दोष को छुपाया, अल्लाह दुनिया और आख़िरत में उसके अवगुण को छुपाएगा, अल्लाह उस समय तक बंदे की मदद में रहता है जब तक बंदा अपने भाई की मदद में रहता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2699]

किसी बीमार को देखने जाने का प्रतिफल

सौबान -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो किसी बीमार को देखने जाता है, वह (जब तक उसके पास बैठा रहता है) स्वर्ग से फल तोड़ रहा होता है। प्रश्न किया गया (इस हदीस में प्रयुक्त शब्द) ''خرفة الجنة'' का अर्थ क्या होता है? तो आपने कहा : "उसके फल तोड़ना।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2568]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह क़यामत के दिन कहेगा : ऐ आदम की संतान! मैं बीमार था, तो तू मेरा हाल जानने नहीं आया। वह कहेगा : ऐ मेरे रब! मैं कैसे तेरा हाल जानने जाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगा : क्या तू नहीं जानता कि मेरा अमुक बंदा बीमार था और तू उसका हाल जानने नहीं गया? क्या तुझे नहीं मालूम कि यदि तू उसका हाल जानने उसके पास जाता, तो मुझे उसके पास पाता? ऐ आदम की संतान! मैंने तुझसे भोजन माँगा, लेकिन तूने मुझे भोजन नहीं कराया। वह कहेगा : ऐ मेरे रब! मैं तुझे कैसे भोजन कराता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगा : क्या तुझे नहीं पता कि मेरे अमुक बंदे ने तुझसे भोजन माँगा था, लेकिन तूने उसे भोजन नहीं कराया? क्या तुझे नहीं पता कि यदि तूने उसे भोजन कराया होता, तो अपने उस कर्म को मेरे पास पाता? ऐ आदम की संतान! मैंने तुझसे पानी माँगा, तो तूने मुझे पानी नहीं पिलाया। वह कहेगा : ऐ मेरे रब! मैं कैसे तुझको पानी पिलाता, जबकि तू समस्त संसार का रब है? अल्लाह कहेगा : क्या तुझे नहीं पता कि मेरे अमुक बंदे ने तुझसे पानी माँगा था, लेकिन तूने उसे पानी नहीं पिलाया? क्या तू नहीं जानता कि यदि तूने उसे पानी पिलाया होता, तो तू अपने उस कर्म को मेरे पास पाता?"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2569]

सच कहने का प्रतिफल

हकीम बिन हिज़ाम -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"क्रेता व विक्रेता दोनों को अपनी ख़रीद व फ़रोख़्त (क्रय विक्रय) उस समय तक फ़स्ख़ (निरस्त) करने का अधिकार प्राप्त है, जब तक वह एक दूसरे से जुदा न हो जाएँ। यदि वे दोनों सच कहें और सब कुछ खोलकर बता दें, तो दोनों की ख़रीद व फ़रोख्त में बरकत होगी तथा यदि वे दोनों झूठ बोलें और छुपाएँ, तो उनकी ख़रीद व फ़रोख्त से बरकत ख़त्म हो जाती है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2079, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1532]

अब्दुल्लाह बिन मस्उद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"सच्चाई को मज़बूती से थाम लो, क्योंकि सच्चाई नेकी (सुकर्म) का मार्ग दिखाती है, और नेकी जन्नत की ओर ले जाती है, और इन्सान सदा सत्य बोलता है तथा सत्य की खोज में लगा रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के निकट सत्यवादी लिख दिया जाता है। तुम झूठ बोलने से बचो, क्योंकि झूठ बुराई की ओर ले जाता है, और बुराई जहन्नम की ओर ले जाता है, और इन्सान सदा झूठ बोलता रहता है तथा झूठ ही की खोज में लगा रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के निकट झूठा लिख दिया जाता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6094 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2607]

क्षमा और विनम्रता का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"सदक़ा और दान देने से किसी का माल कम नहीं होता है, बंदों को क्षमा करने से अल्लाह माफ़ करने वाले के आदर-सम्मान को और बढ़ा देता है और जो व्यक्ति अल्लाह के लिए विनम्रता धारण करता है, सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह उसका स्थान ऊँचा कर देता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2588]

सभी मामलों में नर्मी बरतने का प्रतिफल

आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"ऐ आइशा! बेशक अल्लाह मृदुल है एवं मृदुलता को पसंद करता है, और मृदुलता के बदले में वह कुछ देता है, जो कठोरता और उसके सिवा किसी और बात पर नहीं देता।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2593]

सहीह मुस्लिम ही की एक दूसरी रिवायत में है : "नर्मी जिसमें भी होती है, उसे सुंदर बना देती है और जिससे निकाल ली जाती है, उसे कुरूप कर देती है।"

जिसने अपने मुस्लिम भाई की पर्दा पोशी की, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो व्यक्ति दुनिया में किसी के अवगुण पर पर्दा डालेगा, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी कमियों पर पर्दा डालेगा।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2590]

लोगों के बीच सुलह कराने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"आदमी के हर एक जोड़ पर, हर रोज़ जिसमें सूरज निकलता है, सदक़ा है। दो व्यक्तियों के बीच न्याय करना सदक़ा है। किसी को उसके जानवर पर सवार होने में या उस पर उसका सामान लादने में मदद करना सदक़ा है। अच्छी बात सदक़ा है, नमाज़ की ओर उठने वाला हर क़दम सदक़ा है और रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटाना भी सदक़ा है।"

[सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम]

हदीस के शब्द ''يعدل بين الاثنين'' का अर्थ है, दो व्यक्तियों के बीच न्याय के साथ सुलह कराना।

जिसने मुसलमान की चुगली को नकारा एवं उसके सम्मान की रक्षा की, उसका प्रतिफल

अबू दरदाअ् -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो अपने भाई के सम्मान व आबरू की रक्षा करेगा, क़यामत के दिन अल्लाह जहन्नम की अग्नि से उसकी रक्षा करेगा।"

इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी ने रिवायत किया है और कहा है कि यह हदीस हसन है।

अल्लाह के लिए (किसी से) मुहब्बत का प्रतिफल

अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि एक आदमी ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से क़यामत के बारे में पूछते हुए कहा : क़यामत कब होगी? आपने कहा : "तुमने उसके लिए क्या तैयारी की है?" उसने कहा : कुछ तो नहीं, मगर मैं अल्लाह एवं उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से मुहब्बत रखता हूँ। तो आपने फरमाया : "तू उसके साथ होगा, जिससे मोहब्बत रखता है।"

अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : मुझे किसी चीज़ से उतनी ख़ुशी नहीं हुई, जितनी अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की इस बात से हुई कि "तू उसके साथ होगा, जिससे तू मोहब्बत रखता है।"

अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, अबू बक्र एवं उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से मुहब्बत रखता हूँ, और उनसे मोहब्बत के कारण मैं आशा करता हूँ कि मैं उनके साथ रहूँगा, यद्यपि उनके कार्यों की तरह मेरे कार्य नहीं हैं।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3688 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2639]

अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं :

एक आदमी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और कहा : हे अल्लाह के रसूल! आप उस व्यक्ति के बारे में क्या कहेंगे, जो किसी क़ौम से मोहब्बत करता है, मगर वह उससे मिला नहीं है? अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "आदमी उसके साथ होगा, जिससे वह मोहब्बत करता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6169 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2640]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह तआला क़यामत के दिन कहेगा : "मेरे प्रताप के कारण एक-दूसरे से प्रेम करने वाले कहाँ हैं? आज मैं उन्हें अपनी छाया में जगह दूँगा, जबकि आज मेरी छाया के अतिरिक्त कोई छाया नहीं है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2566]

मुस़ीबत पर स़ब्र करने का प्रतिफल, चाहे वह छोटी ही क्यों न हो

अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया: "जो स़ब्र से काम लेगा, अल्लाह उसका दिल स़ब्र से भर देगा एवं स़ब्र से बढ़कर एवं अच्छा कोई इनाम नहीं है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1469 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1053]

अबू मालिक अश्अरी -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"स़ब्र (धैर्य) रोशनी है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 223]

अता बिन अबू रबाह से वर्णित है, वह कहते हैं कि मुझे अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- ने कहा : क्या मैं तुम्हें एक जन्नती औरत न दिखाऊँ? उऩका कहना है कि मैंने कहा : ज़रूर दिखाएँ। फरमाया : यह काली औरत अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ख़िदमत में हाज़िर हुई और कहने लगी कि मुझे मिर्गी का दौरा पड़ता है और इस हालत में मेरा सत्र (पर्दा) खुल जाता है। लिहाज़ा आप अल्लाह से मेरे लिए दुआ कर दें। आपने फरमाया: "तुम चाहो तो सब्र करो और उसके बदले तुम्हें जन्नत मिलेगी और अगर चाहो तो मैं तुम्हारे लिए दुआ करता हूँ कि अल्लाह तुम्हें इस परेशानी से मुक्ति दे दे।" यह सुन उसने कहा : मैं सब्र करूँगी। फिर कहने लगी : मेरा जो सत्र खुल जाता है, उसके लिए अल्लाह से दुआ कीजिए कि वह न खुले। चुनांचे आपने उसके लिए दुआ कर दी। [सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5652 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2576]

अबू सईद ख़ुदरी एवं अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वे अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से रिवायत करते हैं कि आपने फरमाया : "मोमिन को जो भी बीमारी, मुस़ीबत, मलाल, दुःख अथवा ग़म पहुँचता है, यहाँ तक उसको कोई काँटा भी चुभता है, तो अल्लाह उसके बदले में उसके कुछ गुनाहों को मिटा देता है।" इस हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। सहीह मुस्लिम में है कि आपने फरमाया : "मोमिन को जो भी बिमारी, कष्ट, तकलीफ, ग़म अथवा चिंता पहुँचती है, उसके द्वारा उसके कुछ गुनाह मिटा दिए जाते हैं।"

इस हदीस में आए हुए "अन-नस़ब" का अर्थ परेशानी तथा "अल-वस़ब" शब्द का अर्थ बीमारी है।

आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "मुसलमान को जो भी मुस़ीबत पहुँचती है, यहाँ तक कि उसे एक काँटा भी चुभता है, तो अल्लाह उसके बदले में उसके गुनाहों को मिटा देता है।"

और मुस्लिम की एक रिवायत में है : "मोमिन को एक काँटा भी चुभता है या उससे अधिक कोई कष्ट होता है, तो अल्लाह उसके बदले में उसके कुछ गुनाहों को मिटा देता है।"

एक दूसरी रिवायत में है : "अल्लाह उसके कारण उसका दर्जा ऊँचा कर देता है और उसके गुनाह को मिटा देता है।"

सहीह मुस्लिम की एक दूसरी रिवायत में है : आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- जब मिना में थीं, तो उनके पास क़ुरैश के कुछ नौजवान हँसते हुए आए। यह देख आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा-ने पूछा : तुम लोग किस बात पर हँस रहे हो? उन लोगों ने कहा : अमुक व्यक्ति ख़ीमे की रस्सी पर गिर गया था और उसकी गर्दन या आँख जाते जाते बची। यह सुन आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने कहा : हँसो मत। मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "यदि किसी मुसलमान को एक काँटा भी चुभता है या उससे अधिक कोई कष्ट होता है, तो अल्लाह उसके कारण उसके लिए एक दर्जा लिख देता है और उसका एक गुनाह माफ़ कर देता है।"

तथा अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "किसी मुसलमान को कोई कष्ट पहुँचती है, बीमारी के रूप में हो या किसी अन्य रूप में, तो अल्लाह उसके कारण उसके गुनाह उसी तरह झड़ जाते हैं, जिस तरह पेड़ से पत्ते झड़ते हैं।" इस हदीस को इमाम बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

बुख़ार का प्रतिफल

जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उम्म-ए-साइब अथवा उम्म-ए-मुसैयिब -रज़ियल्लाहु अनहा- के पास गए और फ़रमाया : "ऐ उम्म-ए-साइब अथवा उम्म-ए-मुसैयिब! क्या बात है, काँप रही हो?" उन्होंने कहा : बुख़ार है, अल्लाह उसमें बरकत न दे। आपने फ़रमाया : "बुख़ार को गाली मत दो, क्योंकि वह आदम की संतान के पापों को उसी प्रकार ख़त्म कर देता है, जैसे लोहार की धौंकनी लोहे के ज़ंग को ख़त्म कर देती है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2575]

अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि मैं अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास इस हालत में हाज़िर हुआ कि आप सख़्त बुख़ार में थे। मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-! आपको तो बहुत सख़्त बुख़ार है। ऐसा शायद इस लिए कि आपको दोहरा सवाब मिलना है? आपने फरमाया: "हाँ, बेशक मुसलमान को कोई तकलीफ नहीं पहुँचती, मगर अल्लाह उसकी वजह से उसके गुनाह ऐसे झाड़ देता है, जैसे पेड़ के सूखे पत्ते झाड़े जाते हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5647 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 25717]

जिसने अपनी दृष्टि खो दी और उसपर स़ब्र किया एवं नेकी की उम्मीद रखी, उसका प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

"अल्लाह ने कहा है : जब मैं अपने बंदे को उसकी दो महबूब चीज़ों के द्वारा आज़माता हूँ और वह उस पर सब्र से काम लेता है, तो मैं उन दोनों के बदले में उसे जन्नत प्रदान करता हूँ।"

यहाँ दो महबूब चीज़ों से मुराद दो आँखें हैं।

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5653]

रास्ते से कष्टदायक चीज़ों को हटाने का प्रतिफल

अबूज़र -रज़ियल्लाहु अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णित करते हैं कि आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मेरे आगे मेरी उम्मत के अच्छे और बुरे सब कर्म लाए गए, तो मैंने उसके अच्छे कर्मों से रास्ते से कष्टदायक वस्तु का हटाना भी पाया, और उसके बुरे कर्मों में वह थूक भी पाया, जो मस्जिद में फेंका गया और उसे दफन करके साफ़ नहीं किया गया।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 553]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक व्यक्ति एक रास्ते से चला जा रहा था कि उसने रास्ते में किसी काँटेदार टहनी को देखा। चुनांचे उसने उसे हटा दिया, तो अल्लाह ने उसके उस काम का लिहाज़ करते हुए उसे गुनाह माफ़ कर दिए।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 652, एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1914]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"एक व्यक्ति बीच रास्ते में पड़ी हुई पेड़ की एक शाखा के पास से गुज़रा, तो बोला : अल्लाह की क़सम, में अवश्य इसे हटा दूँगा, ताकि मुसलमानों को कष्ट न हो। चुनाँचे, उसे जन्नत में प्रवेश करने का अवसर प्रदान कर दिया गया।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1914]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मैंने एक व्यक्ति को जन्नत में चलते-फिरते देखा, बीच रास्ते में स्थित एक पेड़ के कारण, जो लोगों को कष्ट दे रहा था और उसने उसे काट दिया था।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1914]

जिसने किसी साँप या छिपकली को मारा, उसका प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने पहले ही वार में किसी छिपकली को मारा, उसके लिए सौ नेकी लिख दी जाती है, और दूसरे वार में मारने पर उससे कम, और तीसरे वार में मारने पर उससे भी कम।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2240]

सच्चे और ईमानादार व्यापारी का प्रतिफल

हकीम बिन हिज़ाम -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"खरीदने तथा बेचने वाले दोनों को अपने क्रय विक्रय उस समय तक निरस्त करने का अधिकार रहता है, जब तक वे एक-दूसरे से जुदा न हो जाएँ। यदि वे सच बोलें और पारदर्शिता रखें, तो उनकी ख़रीद व फ़रोख़्त में बरकत होती है और यदि वे झूठ बोलें और कुछ छुपाने की कोशिश करें, तो उनकी ख़रीद व फ़रोख़्त की बरकत ख़त्म हो जाती है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2110 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1532]

ख़रीद व फ़रोख़्त में नर्मी बरतने का प्रतिफल

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"अल्लाह उस व्यक्ति पर दया करे, जो बेचते, खरीदते और क़र्ज (उधार) वापस लेते समय नर्मी से काम ले।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 2076]

अल्लाह के भय से अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले का प्रतिफल

सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जो मुझे दोनों दाढ़ों के बीच तथा दोनों पैरों के बीच (के अंगों) की गारंटी दे, मैं उसे जन्नत की गारंटी देता हूँ।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6474]

यहाँ हदीस में प्रयुक्त शब्द "दोनों दाढ़ों के बीच की वस्तु" से मुराद ज़ुबान है तथा "दोनों पैरों के बीच की वस्तु" से मुराद गुप्तांग है।

तौबा का प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"बंदा जब अल्लाह के सामने तौबा करता है, तो वह उसकी तौबा से, उससे कहीं अधिक प्रसन्न होता है, जितना तुममें से कोई उस समय प्रसन्न होता है, जब वह किसी रेगिस्तान में अपनी सवारी पर यात्रा कर रहा हो, फिर उसकी सवारी छूट कर भाग जाए और उसके खाने-पीने का सामान भी उसी के ऊपर हो। अतः, वह निराश होकर एक पेड़ के नीचे आए और उसकी छाया में लेट जाए। उसे सवारी वापस मिलने की कोई आशा दिखाई न दे। वह इसी अवस्था में हो कि अचानक अपनी सवारी को अपने पास खड़ा देखे और उसकी लगाम पकड़कर अति उत्साहित होकर कह उठे : ऐ अल्लाह! तू मेरा बंदा है और मैं तेरा रब हूँ, यानी वह अति उत्साह में भूल कर बैठे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2747]

भ्रष्ट युग में सुकर्म करने का प्रतिफल

माक़िल बिन यसार -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"फ़ितने के समय इबादत मेरी ओर हिजरत करने की तरह है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2948]

हदीस में आए हुए श्बद "الهرج" का अर्थ विवाद एवं फ़ितना है।

गरीब और कमज़ोर लोगों का प्रतिफल

इमरान बिन हुस़ैन -रज़ियल्लाहु अन्हु- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णन करते हैं कि आपने फ़रमाया :

"मैंने जन्नत में झाँका, तो देखा कि वहाँ स्थान पाने वाले अधिकतर लोग निर्धन हैं और जहन्नम में झाँका, तो देखा कि वहाँ स्थान पाने वाले अधिकतर लोग स्त्रियाँ हैं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3241 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2737। यह हदीस अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाह अन्हुमा- से वर्णित है।]

उसामा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"मैं जन्नत के दरवाज़े पर खड़ा हुआ, क्या देखता हूँ कि उसमें ज़्यादातर मोहताज और कमज़ोर लोग हैं, और मालदारों को दरवाज़े पर रोक दिया गया था। लेकिन जहन्नम में जाने वालों को तो पहले ही जहन्नम में भेजने का आदेश दे दिया गया था। फिर मैंने जहन्नम के दरवाज़े पर खड़े होकर देखा, तो उसमें ज़्यादातर स्त्रियाँ मौजूद थीं।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 5196 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2736]

स़ौबान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह कहते हैं :

मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास खड़ा था कि आपके पास यहूदी धर्म का ज्ञान रखने वाला एक व्यक्ति आया और कहने लगा : मैं आपसे कुछ पूछने आया हूँ। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "यदि मैं तुम्हें कुछ बातें बताऊँ, तो तुमको उससे कुछ लाभ होगा?" उसने कहा : मैं अपने दोनों कानों से सुनूँगा। यह सुन आपने अपने हाथ में मौजूद एक लकड़ी से ज़मीन कुरेदा और फ़रमाया : "अच्छा तुम पूछो।" यहूदी ने कहा : जिस दिन धरती एवं सातों आकाश उलट-पलट कर दिए जाएँगे, उस दिन लोग कहाँ होंगे?

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "वे पुल पर अंधेरे में होंगे।" उसने कहा : उस पुल से पहले गुज़रने वाले कौन लोग होंगे? आपने फरमाया : "धर्म की रक्षा के लिए वतन छोड़ने वाले निर्धन लोग।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 315]

अबू अब्दुर रहमान हुबुली कहते हैं कि अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस़ -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- के पास तीन लोग आए और कहने लगे : ऐ अबू मुहम्मद! अल्लाह की क़सम, हम लोगों के पास कुछ भी नहीं है, न ख़र्च करने के लिए पैसे, न सवारी और न कोई साज़ व सामान। उन्होंने उनसे कहा : तुम लोग क्या चाहते हो? यदि तुम लोग चाहो तो मेरे पास आ जाओ। जो कुछ हो सकेगा हम तुम्हें देंगे। और अगर तुम चाहो तो हम शासक के सामने तुम्हारी बात रखेंगे। जबकि चाहो तो सब्र भी कर सकते हो। मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "निर्धन मुहाजिर मालदारों से चालीस साल पहले जन्नत जाएँगे।" उन लोगों ने कहा : तब तो हम लोग स़ब्र करेंगे और कुछ नहीं माँगेंगे।

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2979]

हदीस में आए हुए "الجد" शब्द का अर्थ भाग्य और धन है।

अल्लाह के बारे सकारात्मक सोच रखने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"उच्च एवं महान अल्लाह कहता है : मैं बंदे की उस सोच के क़रीब होता हूँ जो वह मेरे बारे सोचता है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 7405 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2675]

सलाम आम करने का प्रतिफल

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "उस अल्लाह की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम जन्नत मेें उस समय तक प्रवेश नहीं कर सकते, जब तक मोमिन न हो दाओ, और तुम उस समय तक मोमिन नहीं हो सकते, जब तक एक-दूसरे से प्रेम न करने लगो। क्या मैं तुम्हारा मार्गदर्शन ऐसे कार्य की ओर न कर दूँ, जिसे यदि तुम करोगे, तो एक-दूसरे से प्रेम करने लगोगे? अपने बीच में सलाम को आम करो।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 93]

अब्दुल्लाह बिन सलाम -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुना है : "ऐ लोगो! सलाम फैलाओ, लोगों को खाना खिलाओ, रिश्तों-नातों का ख़याल रखो, रात में जब लोग सो रहे हों तो उठकर नमाज़ पढ़ो, तुम सुरक्षित रूप से जन्नत में प्रवेश पा जाओगे।"

[सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 2485, तथा तिर्मिज़ी कहते हैं : यह हदीस हसन सहीह है।]

घर वालों पर सलाम करने का प्रतिफल

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझसे फ़रमाया : "ऐ बेटे! जब अपने घर वालों के पास जाओ तो सलाम करो। यह तुम्हारे लिए तथा तुम्हारे घर वालों के लिए बरकत का कारण होगा।" [सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 2698। तिर्मिज़ी कहते हैं : यह हदीस हसन सहीह है।]

रहम करने वालों का प्रतिफल

उसामा बिन ज़ैद -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

''अल्लाह अपने उन बंदों पर रहम करता है, जो रहम करने वाले होते हैं।''

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 1284 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 923]

दूआ क़बूल होने के समय दुआ करने का प्रतिफल

जाबिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फरमाते हुए सुना है :

"रात में एक ऐसा समय है, उस समय कोई भी मुसलमान उच्च एवं महान अल्लाह से दुनिया व आख़िरत की भलाई में से जो कुछ भी माँगता है, वह उसे दिया जाता है, और यह समय हर रात आता है।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 757]

अल्लाह की ओर बुलाने का प्रतिफल

सह्ल बिन साद -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"यदि अल्लाह तुम्हारे द्वारा एक आदमी को भी इस्लाम का रास्ता दिखा दे, तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊँट से भी उत्तम है।"

[सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 3009 एवं सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2406]

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने हिदायत की ओर बुलाया, उसे उतना ही सवाब मिलेगा, जितना उसका अनुसरण करने वालों को मिलेगा। लेकिन इससे उन लोगों के सवाब में कोई कमी नहीं होगी। तथा जिसने गुमराही की ओर बुलाया, उसे उतना ही गुनाह होगा, जितना गुनाह उसका अनुकरण करने वालों को होगा। परन्तु इससे उन लोगों के गुनाह में कोई कमी नहीं होगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2674]

जरीर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया :

"जिसने इस्लाम में कोई अच्छा तरीक़ा जारी किया और उसके बाद उसपर अमल किया गया, तो उसको उतना ही पुण्य मिलेगा, जितना उसपर अमल करने वाले को मिलेगा और इससे अनुसरण करने वाले के पुण्य में कोई कमी नहीं होगी। इसके विपरीत जिसने इस्लाम में कोई बुरा तरीक़ा जारी किया और फिर उसके बाद उसपर अमल किया जाने लगा, तो उसको उतना ही गुनाह होगा, जितना उसपर अमल करने वाले को होगा और इससे अनुसरण करने के गुनाह में कोई कमी नहीं होगी।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1017]

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की बात को दूसरों तक पहुँचाने का प्रतिफल

अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है :

"अल्लाह उस व्यक्ति को ख़ुश व आबाद रखे, जिसने मुझसे कोई बात सुनी और उसे उसी प्रकार दूसरों तक पहुँचा दिया, जिस प्रकार मुझसे सुनी थी। क्योंकि बहुत बार सुनने वाले से वह व्यक्ति अधिक याद रखता है (या अधिक समझदार होता है) जिस तक बात पहुँचाई गई हो।"

[सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 2657। तिर्मिज़ी कहते हैं : यह हदीस हसन सहीह है।]

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "निश्चय अल्लाह बंदे की इस बात से खुश होता है कि बंदा कुछ खाए तो उसपर अल्लाह की प्रशंसा करे और कुछ पिए तो उसपर अल्लाह की प्रशंसा करे।"

[सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 2734]