من الأحكام الفقهية في الطهارة والصلاة والجنائز

من الأحكام الفقهية في الطهارة والصلاة والجنائز

جمع المؤلف في هذا المؤلف ما تيسر كتابته مختصرًا من الأحكام الفقهية في أبواب الطهارة والصلاة والجنائز، معتمدًا فيه على ما جاء في كتاب الله تعالى وما صح عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.

Language: lang_hi
Prepared by: मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन
Version: 2.0
Translations 13
Bengali English Persian French +9
Attachments 7
PDF
Audio
Video
+3

तहारत, नमाज़ और जनाज़े से संबंधित कुछ फिक़्ही अहकाम

लेखक: आदरणीय शेख़ अल्लामा

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

अल्लाह तआला उनकी तथा उनके माता-पिता और समस्त मुसलमानों की मग़्फ़िरत फ़रमाये

भूमिका

सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। हम उसकी प्रशंसा करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं, उसी से क्षमा माँगते हैं और उसी की ओर लौटते हैं। हम अपनी आत्मा की बुराइयों और अपने दुष्कर्मों से अल्लाह की शरण में आते हैं। जिसे अल्लाह मार्गदर्शन दे, उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं है, और जिसे वह गुमराह कर दे, उसे कोई मार्गदर्शन देने वाला नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। उनपर, उनके परिवारजनों पर, उनके सहाबियों पर और उनके अनुसरण करने वालों पर, अल्लाह की अनगिनत रहमत एवं शांति अवतरित हो। तत्पश्चात:

इबादत पूरी नहीं होती और न ही स्वीकार की जाती है जब तक कि वह दो बुनियादी बातों पर आधारित न हो, और वे हैं: महान और शक्तिमान अल्लाह के लिए निष्ठा और उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का अनुकरण। अल्लाह तआला ने फरमाया : "हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना (इबादत) करें..." [सूरा अल-बय्यिना : 5] अल्लाह के लिए इख़लास़ (निष्ठा) यह है कि अपने कार्य को अल्लाह तआला की प्रसन्नता और उसके आदेश के पालन के लिए अंजाम दिया जाए। और रसूलुल्लाह का अनुसरण यह है कि अपने कार्य को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्राप्त हिदायत के अनुसार बिना किसी कमी या अधिकता के अंजाम दिया जाए। और यह तब तक पूर्ण हो सकता है कि जब तक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की जानकारी हो।

इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति अपनी सभी इबादतों को अल्लाह तआला की किताब और उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत के प्रमाण पर आधारित रखे; ताकि वह समझ-बूझ के साथ अल्लाह की इबादत करने वाला बने, अपनी इबादत की पद्धति की सुरक्षा पर संतुष्ट रहे, अपने कार्य में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की इमामत (मार्गदर्शक होने) को ध्यान में रखे, और यह कि वह उनका अनुयायी है, ताकि उसकी अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत बढ़े, और इस कार्य के द्वारा अल्लाह तआला के करीब होने का एहसास हो। "हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें..." [सूरा अल-बय्यिना : 5]

और यह जान ले कि कुछ इबादतें कई तरह से अदा की जाती हैं, विशेषकर वे इबादतें जो बार-बार की जाती हैं, जैसे वुज़ू, ग़ुस्ल और नमाज़।

इसमें - और अल्लाह बेहतर जानता है - कई हिकमतें हैं:

पहली: मुकल्लफ के लिए सहूलत पैदा करना ताकि वह विभिन्न प्रकारों में से चयन कर सके और जो भी प्रकार वह अपनाए और चुने, उसमें वह अनुसरण करने वाला हो।

दूसरी- एक ही ढंग से उपासना करने के कारण उत्पन्न होने वाली ऊब और उकताहट को दूर करना।

तीसरी: दिल में इबादत के इरादे का पैदा होना; क्योंकि जब वह एक ही प्रकार की इबादत करता रहता है, तो वह उसके लिए एक आदत बन जाती है, इसलिए आप देखेंगे कि जब वह कोई इबादत लगातार करता रहता है, तो कभी कभी उसे बिना महसूस किए कहता या करता है। लेकिन जब वह एक प्रकार से दूसरे प्रकार की ओर जाता है, तो दिल में इबादत की इच्छा पैदा होती है और इनसान अल्लाह के लिए अपनी बंदगी और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी के जज़बे को सिद्ध करने में सक्रिय होता है।

इस प्रकार की इबादतों के बारे में उलमा रह़िमहुमुल्लाह के अलग-अलग मत हैं: क्या बेहतर यह है कि एक ही प्रकार पर कायम रहे, और उसमें से सबसे संपूर्ण या सबसे सही को चुने और उस पर स्थिर रहे? या फिर यह बेहतर है कि कभी एक प्रकार को अपनाए और कभी दूसरे प्रकार को?

मज़बूत राय यह है कि कभी इस तरह किया जाए और कभी उस तरह, ताकि दोनों पर अमल हो और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का पूर्ण अनुसरण हो, लेकिन यदि विविधता (इबादत के दोनों प्रकारों में से) किसी एक में किसी विशेष स्थिति के कारण हो, तो उस विशेष स्थिति में केवल उसी प्रकार को अपनाया जाए जो उस (स्थिति) के अनुकूल हो, जैसे: कुछ प्रकार की ख़ौफ़ की नमाज़ें।

पवित्रता के कई मसायल, नमाज़ की कुछ स्थितियां, और उसके कुछेक कथन कई तरह से वर्णित हुए हैं एवं उपर्युक्त नियम के अंतर्गत आते हैं।

तहारत, नमाज़ और जनाज़े के अध्यायों में आने वाले कुछ मसायल में से जितना लिखना अथवा संपादन करना संभव हुआ है, इस पुस्तिका में एकत्र किया गया है, जिसमें हम अल्लाह तआला की किताब या रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित हदीसों पर निर्भर हैं।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमारे इस अमल को अपनी प्रसन्नता के लिए विशुद्ध बनाए, अपनी शरीयत की हिफाज़त का माध्यम बनाए और अपने बन्दों के लिए लाभदायक बनाए; वह निस्संदेह बड़ा दानशील और तमाम गुणों में सर्वश्रेष्ठ है।

तमाम प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है। दरूद व सलाम और बरकतें नाज़िल हों उसके बंदे और रसूल, हमारे नबी मुहम्मद पर, और उनके परिवारजनों, साथियों और क़यामत के दिन तक उनका अनुसरण करने वालों पर।

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

प्रथम अध्याय : तहारत

वुज़ू।

स्नान।

तयम्मुम

मोज़ों पर मसह

पगड़ी पर मसह।

पट्टी पर मसह।

वुज़ू

वुज़ू: चारों अंगों को एक विशिष्ट तरीके से धोकर सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए इबादत को बजा लाना।

यह हर उस मुहदिस (जो वुज़ू की हालत में न हो) पर वाजिब है जो नमाज़ पढ़ना चाहता है; अल्लाह तआला के इस फ़रमान के अनुसार: "ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने चेहरों को और अपने हाथों को कुहनियों समेत धो लो और अपने सिरों का मसह़ करो तथा अपने पाँवों को टखनों समेत (धो लो)। [सूरा अल-माइदा : 6]

यह नमाज़ की सटीकता और स्वीकार्यता के लिए शर्त है; जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है: "जब तुममें से किसी का वुज़ू टूट जाए, तो जब तक वुज़ू न कर ले, अल्लाह उसकी नमाज़ ग्रहण नहीं करता।" इसे बुख़ारी वगैरा ने अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) की हदीस से रिवायत किया है [1]। [1] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताब अल-हियल”, अध्याय : नमाज़, हदीस संख्या : 6954 और मुस्लिम ने “किताब अत-तहारा”, अध्याय : नमाज़ के लिए वुज़ू की अनिवार्यता, हदीस संख्या : 225 में रिवायत किया है।

वुज़ू की फ़ज़ीलत के बारे में कुछ हदीसें:

उमर रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ''तुममें से जो भी सम्पूर्ण तरीक़े से वुज़ू करेगा और कहेगा: "अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अन्ना मुहम्मदन अब्दुल्लाहि व रसूलुहु" (मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा रसूल हैं) उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएँगे। वह जिससे चाहेगा, प्रवेश करेगा।[2]'' [2] इसे मुस्लिम ने किताबुत-तहारह, वुज़ू के बाद पसंदीदा ज़िक्र के बाब में, हदीस संख्या : 234 में वर्णित किया है, लेकिन इसमें यह नहीं है : "ऐ अल्लाह, मुझे बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों में से बना और ख़ूब साफ़-सुथरा रहने वालों में से बना।" इसे तिर्मिज़ी ने किताबुत-तहारह, वुज़ू के बाद कहे जाने वाले ज़िक्र के बाब में, हदीस संख्या : 55 में वर्णित किया है।

उस़मान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो अच्छी तरह वुज़ू करता है, उसके जिस्म से उसके पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं।" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। इसे मुस्लिम ने किताब अत-तहारह, बाब ख़ुरूज अल-ख़ताया म'अ माअ अल-वुज़ू में रिवायत किया है, हदीस नंबर (245)।

अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "परेशानियों के बावजूद अच्छी तरह वुज़ू करना, मस्जिद की ओर कदम बढ़ाना और नमाज़ के बाद अगली नमाज़ की प्रतीक्षा करना, गुनाहों को धो देता है।" [4] इसे अबू याला (1/379) हदीस संख्या : 488, बज़्ज़ार (2/161) हदीस संख्या : 528 और हाकिम ने 'अल-मुस्तद्रक' (1/132) में रिवायत किया है।

वुज़ू का तरीका

1- जिस इबादत के लिए वुज़ू करना होता है जैसे नमाज़ उसके लिए अपवित्रता दूर करने या वुज़ू करने की दिल में नीयत करे - नीयत के शब्द ज़बान से न बोले; क्योंकि अल्लाह तआला दिल की बात जानता है, और क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने वुज़ू, नमाज़ या किसी भी इबादत में नीयत के शब्द नहीं बोले।

2- फिर कहे: "बिस्मिल्लाह"।

3- फिर दोनों हथेलियों को तीन बार धोए।

4- फिर तीन चुल्लू पानी लेकर तीन बार कुल्ली करे, नाक में पानी डाले और नाक झाड़े।

5- फिर अपने चेहरे को तीन बार धोए। चेहरा लंबाई में सर के बाल उगने के साधारण स्थान से दाढ़ी और ठुड्डी के निचले भाग तक और चौड़ाई में एक कान से दूसरे कान तक के भाग को कहते हैं।

6- फिर दाहिने हाथ को, फिर बाएं हाथ को, उंगलियों के सिरों से लेकर कोहनियों समेत तीन बार धोए। कोहनियाँ धोने में शामिल हैं।

7- फिर अपने हाथों से एक बार अपने सर का मसह करे, हाथों को गीला करे, और अपने सर के अगले भाग से मसह का आरंभ करे और गुद्दी तक ले जाए, फिर हाथों को वहीं वापस ले आए, जहाँ से आरंभ किया था। सर के अंतर्गत आगे की ओर चेहरे की सीमा तथा बाल उगने के स्थान से लेकर गर्दन के ऊपरी भाग तक और दाएँ-बाएँ दोनों कानों के बीच का भाग आता है।

8- फिर अपने दोनों हाथों से एक बार कानों का मसह करे, और अपनी तर्जनी उंगलियों को कानों के छिद्रों में डाले और अपने अंगूठों से उनके बाहरी हिस्से का मसह करे।

9- फिर अपने दाहिने पैर को, फिर बाएं पैर को, उँगलियों के किनारों से टखनों तक तीन बार धोए। टखने धोने में शामिल हैं और ये पिंडली के नीचे की दो उभरी हुई हड्डियाँ हैं।

यह जायज़ है कि जिन अंगों को तीन-तीन बार धोया जाता है, उन्हें एक ही बार धोया जाए, और दो बार धोने पर भी बस किया जा सकता है।

स्नान

ग़ुसल : अल्लाह तआला की इबादत के उद्देश्य से पूरे शरीर को पवित्र करना। यह हर उस व्यक्ति पर वाजिब है जिस के पास जनाबत या ग़ुसल के अन्य कारणों में से कोई कारण मौजूद हो; अल्लाह के इस आदेश के अनुसार: "...और यदि तुम जनाबत की हालत में हो, तो स्नान कर लो...।" [सूरा अल-माइदा : 6]

ग़ुस्ल का तरीक़ा:

1- दिल में निय्यत करे बिना नीयत के शब्द ज़बान से उच्चारण किए, बड़े अपवित्रता को दूर करने या उस कार्य के लिए ग़ुस्ल करने की निय्यत करे जिसके लिए ग़ुस्ल करना शरई है, जैसे जुम्मे की नमाज़।

2- फिर कहे: "बिस्मिल्लाह"।

3- फिर दोनों हथेलियों को तीन बार धोए।

4- फिर अपने गुप्तांग को धोए।

5- फिर नमाज़ के वुज़ू की तरह पूरा वुज़ू करे।

6- फिर अपने सिर को धोए। पानी ले और उसे अपने बालों की जड़ों तक पहुंचाए। फिर तीन बार सिर पर पानी बहाए।

7- फिर अपने पूरे शरीर पर पानी डाले।

और यदि उसके शरीर के किसी हिस्से में हड्डी टूटी हो या घाव हो, जिस पर पट्टी लगाने की आवश्यकता हो, तो वह पट्टी लगाए और उसके नीचे के हिस्से को धोने के बजाय उस पर मसह करे; क्योंकि जब पट्टी के कारण धोना संभव नहीं है, तो उस पर मसह करना पर्याप्त है; क्योंकि अल्लाह तआला ने फरमाया है: "...अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके..." [सूरत अत्-तग़ाबुन: 16] यह आवश्यक्ता के कारण किया जाने वाला मसह है, इसलिए इसका क्षेत्र और समय आवश्यक्ता के अनुसार निर्धारित किया जाएगा, अतः पट्टी आवश्यकता से अधिक नहीं बढ़ाई जाएगी, और जब टूटन या घाव ठीक हो जाए; तो उसे हटा दिया जाएाग।

और यदि उसके शरीर के किसी हिस्से में हड्डी टूटी हो या घाव हो, जिससे धोने से हानि पहुँच सकती हो और उस पर कोई आवरण न हो, तो धोने के बजाय उसपर मसह करे। यदि मसह करने से भी हानि का डर हो, तो तयम्मुम करे; क्योंकि अल्लाह तआला ने फरमाया है: "...अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके..." [सूरह अत्-तग़ाबुन: 16] और फरमाया: "...उसी ने तुम्हें चुना है। और धर्म के मामले में तुमपर कोई तंगी नहीं रखी।..." [सूरतुल-हज्ज : 78]

यह मसह - चाहे वह आवरण पर हो या बीमार अंग पर - ग़ुस्ल के स्थान पर होता है, इसलिए इससे तहारत पूरी हो जाती है और उज़्र समाप्त होने के बाद इसे दोबारा धोने की आवश्यकता नहीं है।

यदि पानी इतना हो कि केवल शरीर के कुछ हिस्से के लिए पर्याप्त हो तो उतना इसतेमाल करने के बाद बाकी शरीर के लिए तयम्मुम करले।

तयम्मुम

तयम्मुम: एक इबादत है, जिसमें पाक मिट्टी से पवित्रता प्राप्त की जाती है, इसमें चेहरे और हाथों का मसह किया जाता है, जब पानी का प्रयोग असंभव हो, चाहे पानी की अनुपलब्धता के कारण या बीमारी या अन्य किसी कारण से पानी के प्रयोग में हानि हो।

यह पानी के द्वारा प्राप्त पवित्रता का विकल्प है, चाहे वह 'हदस-ए-असग़र' (छोटे अपवित्रता) के लिए हो या बड़े अपवित्रता 'हदस-ए-अकबर' के लिए, अल्लाह तआला फ़रमाता है: "ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने चेहरों को धो लो..." अल्लाह के इन शब्दों तक : "...तथा यदि तुम बीमार हो, अथवा यात्रा में हो, अथवा तुममें से कोई शौचकर्म से आया हो, अथवा तुमने स्त्रियों से सहवास किया हो, फिर कोई पानी न पाओ, तो पाक मिट्टी का क़सद करो और उससे अपने चेहरों तथा हाथों पर मसह कर लो। अल्लाह नहीं चाहता कि तुमपर कोई तंगी करे। लेकिन वह चाहता है कि तुम्हें पाक करे और ताकि अपनी नेमत तुमपर पूरी करे, ताकि तुम शुक्र करो।" [सूरा अल-माइदा : 6]

और तयम्मुम के द्वारा प्राप्त तहारत एक पूर्ण तहारत है जो नापाकी को समाप्त करती है जब तक कि पानी प्राप्त न हो सके; जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है: "...लेकिन वह चाहता है कि तुम्हें पाक करे..." [सूरा अल-माइदा : 6] और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: "पूरी धरती को मेरे लिए मस्जिद और पवित्रता प्राप्त करने का साधन बनाया गया है, और मेरी उम्मत का जो भी व्यक्ति जहाँ भी नमाज़ का समय पाए, वह नमाज़ पढ़ ले।" इसे बुखारी ने रिवायत किया है[5], और अत़-त़हूर: वह है जिससे तहारत (पवित्रता) हासिल होती है। [5] इसे बुखारी ने किताबुत-तयम्मुम में अल्लाह के इस कथन के अध्याय में वर्णित किया है: "...फिर तुम्हें पानी न मिले, तो पवित्र मिट्टी से तयम्मुम कर लो; उसे अपने चेहरे तथा हाथों पर फेर लो...", हदीस संख्या (335), और मुस्लिम ने किताबुल-मसाजिद में वर्णित किया है, हदीस संख्या (521), इस हदीस को रिवायत करने वाले जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु हैं ।

और इस आधार पर, यदि किसी ने नफ़्ल नमाज़ के लिए तयम्मुम किया है, तो वह उससे फ़र्ज़ नमाज़ भी पढ़ सकता है। नमाज़ के समय से पहले तयम्मुम करना सही है और समय निकल जाने से वह तयम्मुम नहीं टूटता। यदि किसी ने छोटी नापाकी के लिए तयम्मुम किया है, तो वह तयम्मुम तब तक नहीं टूटेगा जब तक कोई नई नापाकी न हो। और यदि किसी ने बड़ी नापाकी के लिए तयम्मुम किया है, तो वह तयम्मुम तब तक नहीं टूटेगा जब तक कोई नई बड़ी नापाकी न हो।

लेकिन उज़्र (बाधा) समाप्त हो जाए तो तयम्मुम भी टूट जाता है। अतः जब पानी मिल जाए तो तयम्मुम टूट जाता है, और जब बीमारी ठीक हो जाए तो तयम्मुम टूट जाता है, चाहे वह छोटी नापाकी से पाकी के लिए किया गया हो या बड़ी नापाकी से। इसलिए छोटी नापाकी के लिए वज़ू करना होगा जिसके लिए तयम्मुम किया गया था और बड़ी नापाकी के लिए ग़ुस्ल करना होगा जिसके लिए पहले तयम्मुम किया गया था।

हर प्रकार की ज़मीन से तयम्मुम करना सही है, चाहे वह मिट्टी वाली हो, रेतीली हो या पथरीली, और उससे जुड़ी हुई उसके प्रकार की चीज़ों से जैसे दीवार से भी; क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: ''पूरी धरती को मेरे लिए मस्जिद और पवित्रता प्राप्त करने का साधन बनाया गया है।'' [6] [6] इसका हवाला पिछले स्थान पर गुज़र चुका है।

अबू जूहैम बिन ह़ारिस बिन सिम्मा अन्सारी -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से एक आदमी मिला और सलाम किया, लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसका जवाब न दिया । यहां तक कि आप एक दीवार के पास आये और (उससे) अपने मुंह और हाथों का मसह किया। फिर उसके सलाम का जवाब दिया।" इन दोनों हदीसों को इमाम बुखारी ने रिवायत किया है।[7] [7] इस हदीस़ को बुख़ारी ने किताबुत-तयम्मुम, बाब : तयम्मुम फ़िल-हज़र इज़ा लम यजिद अल-माअ, हदीस संख्या : 337 में रिवायत किया है, तथा मुस्लिम ने किताबुल-हैज़, बाब: तयम्मुम, हदीस संख्या : 369 में इसका उल्लेख तालीक़ के रूप में किया है।

तयम्मुम का तरीका:

अपने दिल में नीयत करे कि वह नमाज़ या अन्य कार्यों के लिए, जिनके लिए तयम्मुम की अनुमति है, हदस को दूर कर रहा है। फिर कहे: "बिस्मिल्लाह" और अपनी दोनो हथेलियों को एक बार ज़मीन पर मारे, फिर उनसे अपने चेहरे और दोनों हथेलियों का मसह करे।

मोज़ों पर मसह

"ख़ुफ़ैन" शब्द का तात्पर्य चमड़े या इसी तरह की सामग्री से बने मोज़े हैं।

और 'जवारिब' का तात्पर्य कपास या इसी तरह की सामग्री से बने मोज़े हैं। जिसे अब 'शुर्राब' कहा जाता है।

चमड़े एवं कपड़े आदि के मोज़ों पर मसह का हुक्म:

इन दोनों प्रकार के मोज़ों पर मसह करना सुन्नत है जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है। इसलिए जिसके पैरों में मोज़े हों, उसके लिए मोज़ों को उतारकर पैर धोने के बजाय उनपर मसह करना बेहतर है।

इसका प्रमाण: मुगीरा बिन शोबा रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस है कि, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने वुज़ू किया। मुग़ीरा ने कहा: मैंने आपके (खुफ़) मोज़े उतारने के लिए हाथ बढ़ाए, तो आपने फ़रमायाः "इन्हें रहने दो; क्योंकि मैंने इन्हें वुज़ू की हालत में पहने थे।" फिर आपने उनपर मसह किया[8]। [8] इस हदीस़ को बुख़ारी ने किताब अल-वुज़ू में, बाब: इज़ा अदखल रिजलैहि व हुमा ताहरितैन, हदीस संख्या : 206 में और मुस्लिम ने किताब अल-तहारा में, बाब: मोज़ों पर मसह करना, हदीस संख्या : 274/79 में रिवायत किया है।

मोज़ों (खुफ्फैन) पर मसह की अनुमति अल्लाह की किताब और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में साबित है।

जहां तक ​​अल्लाह की किताब की बात है, तो अल्लाह के इस कथन में है : "ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने चेहरों को और अपने हाथों को कुहनियों समेत धो लो और अपने सिरों का मसह़ करो तथा अपने पाँवों को टखनों समेत (धो लो)।" [सूरा अल-माइदा : 6] अल्लाह तआला का कथनः (...वअरजुलकु...) "...और अपने पाँवों को..." इसमें दो सहीह सबई (सात क़ारियों से संबंधित) क़िराअतें हैं, जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित हैं।

पहली: ﴾وَأَرۡجُلَكُمۡ﴿ को ﴾وُجُوهَكُمۡ﴿ पर अत्तफ़ करके लाम पे ज़बर के साथ पढ़ा गया है, इसके अनुसार पैरों को धोया जाएगा।

दूसरी:  ﴾وَأَرْجُلِكُمْ﴿  को  ﴾بِرُءُوسِكُمۡ﴿ पर अ़त्फ़ कर लाम के ज़ेर के साथ पढ़ा गया है, जिसके अनुसार पाँवों पर मसह किया जाएगा[9]। [9] ज़बर के साथ नाफ़े, इब्न आमिर और हफ़स ने आसिम और क़िसाई से रिवायत करते हुए पढ़ा है, और ज़ेर के साथ इब्न कसीर, अबू अम्र, और शोबा ने आसिम और हम्ज़ा से रिवायत करते हुए पढ़ा है, जैसा कि ''अल-कश्फ अ़न वुजूह अल-क़िराआत अस-सबअ'' (1/406) में है।

और पैर पर मसह किया जाए या उन्हें धोया जाए; यह हदीसों से स्पष्ट हुआ। चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब उनके पैर खुले होते तो उन्हें धोते, और जब मोज़ों से ढके होते तो उनपर मसह कर लेते।

और जहाँ तक इस पर सुन्नत की दलील का सवाल है, तो यह सुन्नत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुतवातिर तौर पर साबित है। इमाम अहमद रहमतुल्लाह अलैहि ने कहा: "मसह के बारे में मेरे दिल में कोई शक नहीं है, इस पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके सहाबा से चालीस हदीसें हैं।"

इस बारे में जो नज़में लिखी गई हैं इन में से एक (का अनुवाद) इस प्रकार है[10]:

कुछ मुतवातिर हदीसें इस प्रकार हैंः «जिसने जान-बूझकर मुझपर झूठ बोला» *** और «जो अल्लाह के लिए एक घर बनाता है, और सवाब की नीयत रखता है»

और (अल्लाह के) दर्शन, (क़यामत के दिन) सिफ़ारिश, और हौज़*** और मोज़ों पर मसह (की हदीसें), और ये (उन में से) कुछ (हदीसें) हैं [10] यह नज़म तावुदी इब्न सौदा की है जैसा कि उन्होंने अपने सहीह बुख़ारी के हाशिए में उल्लेख किया है (1/125)।

मोज़ों पर मसह की शर्तें:

ख़ुफ़्फैन (मोज़ों) पर मसह के लिए चार शर्तें हैं:

पहली शर्त यह है कि उन्हें पवित्र अवस्था में पहना जाए, और इसका प्रमाण है: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का मुगीरा बिन शु'बा से फ़रमाना: "इन्हें रहने दो; क्योंकि मैंने इन्हें वुज़ू की हालत में पहना था।" [11]. [11] इसका हवाला दिया जा चुका है (पृष्ठ 180).

दूसरी शर्त यह है कि मोज़े या जुराबें पवित्र हों, यदि वे नापाक हों, तो उनपर मसह करना जायज़ नहीं है, और इसका प्रमाण यह है कि: "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक दिन अपने साथियों के साथ नमाज़ पढ़ी और आपके पैरों में जूतियां थीं, तो आपने नमाज़ के दौरान उन्हें उतार दिया और बताया कि जिब्रील ने आपको सूचना दी कि उनमें गंदगी या नापाकी है" [12]। यह दर्शाता है कि जिस वस्त्र में गंदगी हो उसमें नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं है, और क्योंकि गंदगी पर पानी डालने से साफ़ करने वाला गंदगी से दूषित हो जाता है, इसलिए ऐसा मसह पवित्र करने वाला नहीं हो सकता। [12] इसे अबू दाऊद ने किताबुस-सलात, बाब: नाल (जूती) में नमाज़, हदीस संख्या : 650, तथा अहमद ने 3/20 में अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत से वर्णन किया है।

तीसरी शर्त: मोज़ों पर मसह छोटी नापाकी में हो, न कि जनाबत या उस नापाकी में जिसमें ग़ुस्ल वाजिब होता है। इसका प्रमाण सफवान बिन अस्साल रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है, उन्हों ने कहा: "हमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आदेश दिया कि जब हम सफ़र में हों तो तीन दिन और तीन रात पेशाब, पाखाना और नींद की वजह से अपने मोज़े न उतारें। हाँ, मगर जनाबत की बात और है" [13]। अतः मसह केवल छोटी नापाकी के समय किया जा सकता है, बड़ी नापाकी के समय मसह करना जायज़ नहीं है; इस हदीस की वजह से जिसको अभी हम ने बयान किया है। [13] इसे तिरमिज़ी ने "किताब अत-तहारह" में "बाब अल-मसह अलल-खुफ़्फ़ैन" (हदीस संख्या : 96) तथा नसाई ने "किताब अत-तहारह" में "बाब अत-तवक़ीत फिल-मसह अलल-खुफ़्फ़ैन" (हदीस संख्या : 127) एवं इब्न-ए-माजा ने "किताब अत-तहारह" में "बाब अल-वुज़ू मिन-अन-नौम" (हदीस संख्या : 478) में तथा अहमद ने (4/239) में रिवायत किया है।

चौथी शर्त: मसह शरई तौर पर निर्धारित समय में किया जाए, जो गैर मुसाफिर के लिए एक दिन एवं एक रात है, तथा मुसाफिर के लिए तीन दिन एवं तीन रातें; जैसा कि अली बिन अबी तालिब (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, उन्होंने कहा: नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने गैर मुसाफिर के लिए एक दिन और एक रात तक, तथा मुसाफिर के लिए तीन दिन और तीन रातों तक (मोज़ा पर मसह करने) की अनुमति दी है। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है[14]। [14] सहीह मुस्लिम, किताबुत-तहारह, बाब: मोज़ों पर मसह करने की मुद्दत, हदीस संख्या : 276।

यह अवधि नापाकी के पश्चात पहली बार मसह करने से शुरू होती है और गैर मुसाफिर के लिए चौबीस घंटे और मुसाफिर के लिए बहत्तर घंटे में समाप्त होती है। यदि हम मान लें कि कोई (गैर मुसाफिर) व्यक्ति मंगलवार को फ़ज्र की नमाज़ के लिए पवित्र हुआ और अपनी पवित्रता पर बना रहा जब तक कि उसने बुधवार की रात की इशा की नमाज़ नहीं पढ़ ली, और फिर सो गया, फिर बुधवार को फ़ज्र की नमाज़ के लिए उठा और पांच बजे मसह किया; तो अवधि की शुरुआत बुधवार सुबह पांच बजे से हो कर गुरुवार सुबह पांच बजे समाप्त होगी। तो यदि मान लिया जाए कि उसने गुरुवार को पाँच बजे से पहले मसह किया; तो वह इस मसह के साथ फ़ज्र की नमाज़ -यानी गुरुवार की फ़ज्र- पढ़ सकता है, और जब तक वह पाक है, जितनी चाहे नमाज़ें पढ़ सकता है; क्योंकि प्रबल मत के अनुसार (मसह की) अवधि पूरी होने से वुज़ू नहीं टूटता, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पाकी की अवधि निर्धारित नहीं की, बल्कि मसह की अवधि निर्धारित की है, तो जब अवधि पूरी हो जाए; तो मसह नहीं किया जाएगा, लेकिन यदि वह पाक है तो उसकी पाकी बनी रहेगी; क्योंकि यह पाकी एक शरई दलील के अनुसार साबित हुई है, और जो शरई दलील के अनुसार साबित हो, वह केवल शरई दलील से ही समाप्त होता है, और मसह की अवधि पूरी होने से वुज़ू के टूटने की कोई दलील नहीं है, और क्योंकि मूल यह है कि जो था वह बना रहता है अपनी मूल हालत पर जब तक उसका समाप्त होना स्पष्ट न हो जाए। ये वे शर्तें हैं जो मोज़ों पर मसह के लिए आवश्यक हैं, और कुछ अन्य शर्तें भी हैं जिनका कुछ विद्वानों ने उल्लेख किया है, मगर उनमें से कुछ पर संदेह है।

खुफ़्फ़ैन (मोज़ों), पगड़ियों और पट्टी पर मसह से संबंधित कुछ प्रश्न

सभी प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है। दुरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद पर, उनके परिजनों, साथियों और उन अनुगामियों पर जो क़यामत के दिन तक उनका अनुसरण करते रहें।

तत्पश्चात; मैंने इन प्रश्नों के उत्तर सुने, जो खुफ़्फ़ैन(मोज़ों), इमामे और जबीरा (पट्टी) के मसायल में मुझसे पूछे गए थे, तो मैंने इन्हें (जो अभी पुस्तिका में हैं) मेरे रिकार्ड किए गए उत्तरों के मुवाफिक़ पाया। मैंने इनमें कुछ मामूली संशोधन किए हैं, और मैंने इसके मुद्रण के लिए अनुमति दी है, बशर्ते कि मुद्रण में गलतियों को ठीक किया जाए, और कोई भी अपने लिए या किसी और के लिए मुद्रण अधिकार सुरक्षित न रखे।

अल्लाह से दुआ है कि वह सभी को तौफ़ीक़ एवं स्वीकार्यता प्रदान करे।

लेखकः

मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन

19/5/1410 हिजरी

मोज़ों पर मसह

प्रश्न 1: कुछ फुक़हा द्वारा रखी गई यह शर्त कहां तक सही है कि मोज़े उस भाग को ढ़ांपने वाले हों जिसे धोना फर्ज़ है?

जवाब: यह शर्त सही नहीं है; क्योंकि इसकी कोई दलील नहीं है; जब तक "ख़ुफ़" या "जौरब" का नाम बाक़ी होगा, तब तक उनपर मसह करना जायज़ होगा; क्योंकि सुन्नत ने ख़ुफ़ पर मसह करने की अनुमति दी है बिना किसी बंदिश के, और जिसे शरीयत ने मुतलक़ रखा हो, उसे कोई भी तब मुक़य्यद नहीं कर सकता जब तक कि उसके पास शरीयत से कोई स्पष्ट प्रमाण या कोई शरई नियम न हो जो उस क़ैद को स्पष्ट करे।

इस आधार पर, फटे हुए मोज़ों पर मसह करना जायज़ है, और पतले मोज़ों पर भी मसह करना जायज़ है; क्योंकि मोज़ों का मकसद त्वचा को ढांकना नहीं है, बल्कि मोज़ों का मकसद पैरों को गर्म रखना और उनके लिए फायदेमंद होना है।

मोज़ों पर मसह की इजाज़त इसलिए दी गई है क्योंकि उन्हें उतारना मुश्किल होता है। इसमें पतले और मोटे मोज़ों के बीच कोई फर्क नहीं है, न ही फटे हुए और सही-सलामत मोज़ों के बीच। महत्वपूर्ण यह है कि जब तक मोज़े का नाम बाक़ी है, तब तक उनपर मसह करना जायज़ है।

प्रश्न (2): एक व्यक्ति ने तयम्मुम किया और मोज़े पहने, तो क्या उसके लिए यह जायज़ है कि जब उसे पानी मिल जाए तब भी वह मोज़ों पर मसह करे, स्पष्ट हो कि उसने उन्हें पाकी की हालत में पहना था?

जवाब: अगर तहारत तयम्मुम की हो, तो मोज़ों पर मसह करना जायज़ नहीं है; क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "क्योंकि मैंने इन्हें पवित्र पैरों में पहना था।" और तयम्मुम की पवित्रता का संबंध पैरों से नहीं है, यह केवल चेहरे और दोनों हाथों तक सीमित है। [15] इसका हवाला दिया जा चुका है (पृष्ठ: 180).

इसी लिए, यदि किसी व्यक्ति के पास पानी न हो, या वह बीमार हो और वुज़ू के लिए पानी का प्रयोग न कर सके, तो वह बिना पवित्रता के भी मोज़े पहन सकता है और वे उसके पैरों में तब तक बाकी रह सकते हैं जब तक कि उसे पानी न मिल जाए या वह अपने रोग से स्वस्थ न हो जाए; क्योंकि पैर का तयम्मुम से कोई संबंध नहीं है।

प्रश्न (3): क्या निय्यत अनिवार्य है, अर्थात् जब कोई मोज़े या जूते पहनना चाहे तो यह निय्यत करे कि वह उन पर मसह करेगा, और इसी तरह यह निय्यत कि वह मुकीम के तौर पर मसह करेगा या मुसाफिर के तौर पर, या यह अनिवार्य नहीं है?

जवाब: यहाँ निय्यत वाजिब नहीं है; क्योंकि यह एक ऐसा कार्य है जिसके केवल पाए जाने से ही हुक्म संबंधित है, इसलिए इसमें निय्यत की आवश्यकता नहीं है, जैसे कि यदि कोई कपड़ा पहनता है; तो यह आवश्यक नहीं है कि वह इसे अपनी नमाज़ में अपनी शर्मगाह ढाकने की निय्यत से पहने, इसी प्रकार मोज़े पहनने में यह शर्त नहीं है कि वह निय्यत करे कि वह उन पर मसह करेगा, और न ही अवधि की निय्यत की आवश्यकता है; बल्कि यदि वह मुसाफिर है; तो उसके लिए तीन दिन हैं, चाहे उसने निय्यत की हो या न की हो, और यदि वह मुक़ीम है; तो उसके लिए एक दिन और एक रात है, चाहे उसने निय्यत की हो या न की हो।

प्रश्न (4): वह दूरी या यात्रा क्या है जो मोज़ों पर तीन दिन एवं तीन रातें मसह करने की अनुमति देती है?

उत्तर: जिस यात्रा में नमाज़ को क़सर करना जायज़ है, उसीमें मोज़ा पर मसह की अवधि तीन दिन और तीन रात होती है; क्योंकि सफवान बिन अस्साल की हदीस, जिसका हमने उल्लेख किया है, कहती है: ''जब हम यात्रा में होते'' [16]। अतः जब इंसान यात्री है और नमाज़ क़स्र कर रहा है, तो वह तीन दिन तक मसह कर सकता है। [16] इसका हवाला दिया जा चुका है (पृष्ठ: 20).

प्रश्न (5): यदि यात्री (घर) पहुँचे या मुक़ीम यात्रा पर निकले, और उसने मसह शुरू कर दिया हो, तो उसकी अवधि की गणना कैसे की जाएगी?

उत्तर: यदि उसने मसह किया हो जब वह मुक़ीम था, फिर वह यात्रा पर निकला; तो वह मुसाफिर के मसह की अवधी पूरी करेगा, यही प्रबल मत है। और यदि वह मुसाफिर था, फिर वापस आया; तो वह मुक़ीम के मसह की अवधी पूरी करेगा, यही प्रबल मत है।

कुछ अहल-ए-इल्म ने कहा है: अगर किसी ने घर पर (अपने इलाक़े में रहते हुए) मसह किया, फिर सफर किया, तो वह मुक़ीम के मसह की अवधी पूरी करेगा। लेकिन प्रबल मत वही है जो हमने पहले कही; क्योंकि इस व्यक्ति के मसह की अवधि में कुछ समय बाकी था जब उसने सफर किया, इसलिए जब इस स्थिति में सफर किया तो मुसाफिरों में शामिल हो गया जो तीन दिन मसह कर सकते हैं।

प्रश्न (6): यदि कोई व्यक्ति मसह के आरंभ के समय को लेकर शंका में हो, तो उसे क्या करना चाहिए?

उत्तर: इस स्थिति में यक़ीन पर अमल करेगा। यदि संदेह हो कि उसने ज़ुहर की नमाज़ के लिए मसह किया था या अस्र की नमाज़ के लिए, तो वह अस्र की नमाज़ से अवधि की शुरुआत मानेगा, क्योंकि मसह न करना ही असल है।

और इस उसूल का प्रमाण - जो यह है कि (असल यह है कि जो जिस अवस्था में था, वह उसी अवस्था में रहेगा) और (असल है चीज़ों का न होना) - यह है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से यह शिकायत की गई कि कभी-कभी आदमी को ऐसा लगता है कि वह नमाज़ में कुछ महसूस कर रहा है, तो फ़रमायाः ''वह (नमाज़ छोड़ कर) न निकले, जब तक आवाज़ न सुने या दुर्गंध महसूस न करे।'' [17] [17] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताबुल-वुज़ू'' अध्याय : "शक से वुज़ू नहीं करना चाहिए जब तक यकीन न हो", (हदीस संख्या : 137) में तथा मुस्लिम ने “किताबुल-हैज़'' अध्याय : "इस बात का प्रमाण कि जो व्यक्ति अपनी पवित्रता के बारे में यकीन रखता है और फिर उसे नापाकी का शक होता है, तो वह अपनी पवित्रता के आधार पर नमाज़ पढ़ सकता है", (हदीस संख्या : 361) में, अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।

प्रश्न (7): एक व्यक्ति ने मसह की अवधि समाप्त होने के बाद मसह किया, फिर नमाज़ पढ़ी, तो उसकी नमाज़ का क्या हुक्म है?

उत्तर: यदि किसी ने मसह की अवधि समाप्त होने के बाद मसह किया - चाहे वह मुक़ीम हो या मुसाफिर - तो इस प्रकार की पवित्रता के साथ पढ़ी गई नमाज़ अमान्य होगी; क्योंकि उसका वुज़ू अमान्य है; चूंकि मसह की अवधि समाप्त हो चुकी है, इसलिए उसे नए सिरे से पूरा वुज़ू करना पड़ेगा जिसमें वह अपने पैरों को धोए, और उन नमाज़ों को दोबारा पढ़नी होगी जो उसने इस वुज़ू से पढ़ी थीं जिसमें मसह अवधि समाप्त होने के बाद किया था।

प्रश्न (8): यदि इन्सान वुज़ू की हालत में मोज़े उतार दे, फिर वुज़ू टूटने से पहले उन्हें वापस पहन ले, तो क्या उनपर मसह करना जायज़ होगा?

उत्तर: यदि उसने मोज़े उतार दिए, फिर वुज़ू की हालत ही में उन्हें वापस पहन लिया, और यह उसका पहला वुज़ू था - अर्थात् मोज़े पहनने के बाद उसका वुज़ू नहीं टूटा था - तो इसमें कोई हर्ज नहीं कि वह उन्हें फिर से पहन ले और वुज़ू करते समय उनपर मसह करे।

और अगर यह वुज़ू ऐसा है जिसमें उसने अपने मोज़ों पर मसह किया है, तो उसके लिए यह जायज़ नहीं है कि वह उन्हें उतारकर फिर से पहने और उनपर मसह करे; क्योंकि मोज़ों को पहनने से पहले पानी से तहारत होना ज़रूरी है, जबकि यह मसह के द्वारा हासिल तहारत है। यही बात अहल-ए-इल्म के कथनों से समझ में आती है।

लेकिन अगर कोई विद्वान कहे कि अगर वह इसे पाकी की हालत में दोबारा पहने - चाहे वह पाकी मसह के द्वारा ही प्राप्त हुई हो- तो उसके लिए मसह करना जायज़ है जब तक कि अवधि बाकी है, तो यह भी एक मजबूत राय होगी, लेकिन मुझे नहीं पता कि किसी ने ऐसा कहा है, इसलिए मेरे ऐसा न कहने का कारण यह है कि मैंने किसी को ऐसा कहते हुए नहीं देखा है। अगर किसी विद्वान ने ऐसा कहा है, तो यही मेरे नज़दीक सही है; क्योंकि मसह की पाकी पूरी पाकी है, इसलिए यह कहा जाना चाहिए कि अगर इनसान उस मोज़े पर मसह कर सकता है जिसे उसने पैर धोने के बाद पहना है; तो वह उस पर भी मसह कर सकता है जिसे उसने मसह की पाकी पर पहना है, लेकिन मैंने किसी को ऐसा कहते हुए नहीं देखा है।

प्रश्न 9: तो हम यह नहीं कह सकते कि ख़ुफ़्फ़ का उतारना मसह करने से रोकता है?

जवाब: यदि मोज़ा उतार दे तो उसकी तहारत नहीं टूटती, लेकिन ऐसी स्थिति में मसह नहीं किया जा सकता। यदि वह दोबारा मोज़ा पहन ले और उसका वुज़ू टूट जाए, तो उसे मोज़ा उतारकर पैरों को धोना पड़ेगा।

महत्वपूर्ण यह है कि हम जानें कि मोज़ा पहनने से पहले पैरों को धोकर पवित्रता प्राप्त करना आवश्यक है, जैसा कि हमने विद्वानों के कथनों से जाना।

प्रश्न (10): एक व्यक्ति पहली बार जूते पर मसह करता है, फिर दूसरी बार जूते उतारकर मोज़ों पर मसह करता है, तो क्या उसका मसह सही है, या पैर धोना अनिवार्य है?

उत्तर: इस विषय में मतभेद है, कुछ विद्वानों का मानना है कि यदि किसी ने एक मोज़े पर मसह कर लिया - चाहे ऊपरी हो या निचला - तो हुक्म उसी पर लागू होता है और दूसरे मोज़े पर नहीं जाता।

और कुछ विद्वानों का मानना है कि जब तक अवधि बाकी है, दूसरे मोज़े पर भी मसह करना जायज़ है। उदाहरण के लिए, अगर किसी ने जूते पर मसह किया, फिर उन्हें उतार दिया और वुज़ू करना चाहा; तो उसके लिए यह जायज़ है कि मोज़ों पर मसह करे, जो कि प्रबल राय है। इसी तरह, अगर किसी ने मोज़ों पर मसह किया, फिर उन पर दूसरे मोज़े या जूते पहने और ऊपरी पर मसह किया; तो सही राय के अनुसार इसमें कोई हर्ज नहीं है, जब तक अवधि बाकी है। लेकिन अवधि की गणना पहले के मसह से की जाएगी, न कि दूसरे के मसह से।

प्रश्न 11: लोग अक्सर सही तरीके से मसह करने की विधि और मसह के स्थान के बारे में पूछते हैं।

उत्तर: मसह का तरीक़ा यह है कि हाथ को पैर की उंगलियों के सिरे से लेकर पिंडली तक फेरे, अर्थात् मसह केवल मोज़े के ऊपरी भाग पर किया जाए। मसह दोनों हाथों से दोनों पैरों पर एक साथ किया जाएगा, अर्थात् एक ही साथ दाएं हाथ से दाएं पैर का मसह करेगा और बाएं हाथ से बाएं पैर का मसह करेगा, जैसे कानों का मसह किया जाता है; क्योंकि यही हदीस का ज़ाहिरी अर्थ है, जैसा कि मुगीरा बिन शो'बा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: "और उन दोनों पर मसह किया" [18], और यह नहीं कहा कि दाएँ से शुरू किया, बल्कि कहा: "उन दोनों पर मसह किया", तो सुन्नत का ज़ाहिरी मतलब यही है। हाँ, अगर मान लिया जाए कि किसी का एक हाथ काम नहीं करता, तो वह बाएं पैर के बजाए दाएं पैर से पहले शुरू करे। [18] इसका हवाला दिया जा चुका है (पृष्ठ: 180).

बहुत से लोग दोनों हाथों से दाएं पैर का मसह करते हैं और दोनों हाथों से बाएं पैर का मसह करते हैं, और जहां तक मुझे पता है, इसका कोई आधार नहीं है। विद्वान कहते हैं: दाएं हाथ से दाएं पैर का मसह करेगा और बाएं हाथ से बाएं पैर का मसह करेगा।

प्रश्न 12: हमने कुछ लोगों को नीचे और ऊपर से मसह करते देखा है, तो इनके मसह का हुक्म क्या है? और इनकी नमाज़ का क्या हुक्म है?

उत्तर: उनकी नमाज़ सही है, और उनका वुज़ू सही है, लेकिन उन्हें यह बताया जाए कि नीचे से मसह करना सुन्नत नहीं है। "सुनन" में अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से यह हदीस वर्णित है कि उन्होंने कहा: "अगर दीन राय पर आधारित होता तो मोज़े के नीचे का हिस्सा मसह के लिए ज़्यादा योग्य होता बनिस्बत ऊपर के हिस्से के, लेकिन मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मोज़ों के ऊपर के हिस्से पर मसह करते देखा है।"[19]، यह दर्शाता है कि केवल ऊपरी भाग का मसह किया जाएगा। [19] सुनन अबू दाऊद, किताब अत-तहारह, बाब कैफ अल-मसह?, हदीस संख्या : 162।.

सवाल (13): इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा के कथन का क्या अर्थ है: ''रसूल ने 'माइदा' के बाद मसह नहीं किया''[20], और जो अली रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है: "मोज़ों (पर मसह की बात) से पहले कुरआन की आयत (जिसमें धोने का हुक्म है) नाज़िल हुई" [21]? [20] इसे इमाम अहमद ने ''मुसनद'' (1/323) में रिवायत किया है। [21] इसे इब्ने अबी शैबा ने ''अल-मुस़न्नफ़'' (1/186) में रिवायत किया है, और देखें: ''अस-सुनन अल-कुबरा'' बैहक़ी (1/272)।

जवाब: मुझे नहीं पता: क्या यह बात उन दोनों से सही है, या नहीं? और मैंने इससे पहले ज़िक्र किया है कि अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु उन लोगों में से हैं जिन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मोज़ों पर मसह की हदीसें रिवायत की हैं, और आपकी वफात के बाद भी इसे बयान किया, और यह स्पष्ट किया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसकी मुद्दत तय की थी[22], और यह इस बात का प्रमाण है कि यह हुक्म आपकी वफात के बाद भी उनके नज़दीक साबित था, और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वफात के बाद नस्ख़ नहीं हो सकता। [22] इसका हवाला दिया जा चुका है (पृष्ठ: 21).

प्रश्न 14: क्या दोनों ख़ुफ़्फ़ पर मसह के नियम महिलाओं पर भी उसी तरह लागू होते हैं जैसे पुरुषों पर? और क्या इसमें (मर्द व औरत के बीच) कोई अंतर है?

उत्तर: इस मामले में पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई अंतर नहीं है, और एक क़ायदा समझना चाहिए, और वह यह है: "मूल रूप से जो कुछ पुरुषों के लिए सिद्ध है, वह महिलाओं के लिए भी सिद्ध है, और जो कुछ महिलाओं के लिए सिद्ध है, वह पुरुषों के लिए भी सिद्ध है, सिवाय इसके कि कोई प्रमाण (किसी विषय में) उनके बीच अंतर को दर्शाए"।

प्रश्न (15): मोज़े या उसके कुछ हिस्से को उतारकर पैर के कुछ भाग को खुजलाना या पैर से कोई चीज़, जैसे छोटा पत्थर आदि निकालना कैसा है?

जवाब: यदि कोई व्यक्ति अपने हाथों को मोज़ों (जोराब) के नीचे से डालता है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर उसने मोज़ों को उतार दिया, तो देखा जाएगा: अगर उसने थोड़ा सा हिस्सा उतारा है, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर उसने इतना उतार दिया कि ज़्यादातर क़दम दिखाई देने लगे, तो भविष्य में उनपर मसह करना अमान्य हो जाएगा।

सवाल (16): आम लोगों में यह मशहूर है कि वे सिर्फ पाँच नमाज़ों के लिए खुफ़ पर मसह करते हैं, फिर उसके बाद दोबारा पहनते हैं।

जवाब: हाँ, यह आम लोगों में मशहूर है, वे समझते हैं कि केवल पाँच नमाज़ों के लिए मसह किया जाता है, जबकि यह सही नहीं है, बल्कि समय सीमा एक दिन और एक रात की है, अर्थात् उसे एक दिन और एक रात के लिए मसह करने की अनुमति है, चाहे वह पाँच नमाज़ें पढ़े या अधिक।

और अवधि की शुरुआत मसह से होती है जैसा कि पहले बताया गया है, तो वह दस या उससे अधिक नमाज़ें पढ़ सकता है। यदि कोई व्यक्ति सोमवार को फज्र की नमाज़ के लिए खुफ पहनता है और अपनी पवित्रता बनाए रखता है यहाँ तक कि मंगलवार की रात सो जाता है, फिर मंगलवार को फज्र की नमाज़ के लिए पहली बार खुफ पर मसह करता है, तो वह बुधवार की फज्र की नमाज़ तक मसह कर सकता है। इस प्रकार उसने सोमवार को फज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, और इशा की नमाज़ें खुफ पहनकर पढ़ीं, ये पूरी अवधि उसके लिए नहीं गिनी जाएगी क्योंकि ये मसह से पहले की है। फिर उसने मंगलवार को फज्र की नमाज़ पढ़ी और मसह किया, ज़ुहर पढ़ी और मसह किया, अस्र पढ़ी और मसह किया, मग़रिब पढ़ी और मसह किया, इशा पढ़ी और मसह किया। इसी तरह वह बुधवार की नमाज़ के लिए मसह कर सकता है यदि उसने अवधि समाप्त होने से पहले मसह किया हो, जैसे: उसने मंगलवार को फज्र की नमाज़ के लिए सुबह पाँच बजे मसह किया, और बुधवार को पाँच बजे से पंद्रह मिनट पहले मसह किया, और अपनी पवित्रता बनाए रखी यहाँ तक कि गुरुवार की रात इशा की नमाज़ पढ़ी। इस प्रकार वह इस वुज़ू से बुधवार की फज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, और इशा की नमाज़ें पढ़ सकता है। इस प्रकार उसने जब से खुफ पहना तब से पंद्रह नमाज़ें पढ़ीं; क्योंकि उसने सोमवार को फज्र की नमाज़ के लिए खुफ पहना, अपनी पवित्रता बनाए रखी, और मंगलवार को सुबह पाँच बजे फज्र की नमाज़ के लिए मसह किया, और बुधवार को पाँच बजे से पंद्रह मिनट पहले मसह किया, और अपनी पवित्रता बनाए रखी यहाँ तक कि इशा की नमाज़ पढ़ी, इस प्रकार उसने पंद्रह नमाज़ें पढ़ीं।

प्रश्न (17): यदि कोई व्यक्ति वुज़ू करे और मोज़ों पर मसह करे, और मसह की अवधि के दौरान, जैसे कि अस्र की नमाज़ से पहले, मोज़े उतार दे, तो क्या वह नमाज़ पढ़ सकता है और उसकी नमाज़ सही होगी, या मोज़े उतारने से उसका वुज़ू टूट जाएगा?

जवाब: अहल-ए-इल्म की रायों में से सबसे प्रबल राय, जिसे शेखुल-इस्लाम इब्न तैमिय्या और अहल-ए-इल्म के एक समूह ने अपनाया है, यह है कि वुज़ू मोज़े उतारने से नहीं टूटता[23]। यदि किसी ने मोज़े पर मसह किया हो और फिर उसे तहारत की अवस्था में उतार दे, तो उसका वुज़ू नहीं टूटेगा; क्योंकि जब उसने मोज़े पर मसह किया, तो उसकी तहारत एक शरई दलील के अनुसार पूरी हो गई। जब वह मोज़ा उतारता है, तो यह तहारत जो शरई दलील के अनुसार साबित हुई है, उसे किसी शरई दलील के बिना नहीं तोड़ा जा सकता। और मोज़े या जुराबें उतारने से वुज़ू टूटने की कोई दलील नहीं है। इस आधार पर उसका वुज़ू बाकी रहेगा। लेकिन अगर वह मोज़ा दोबारा पहनता है और भविष्य में उस पर मसह करना चाहता है, तो नहीं, जैसा कि अहल-ए-इल्म की बातों से मुझे मालूम है। [23] "अल-फ़ुरू'अ" भाग : 1, पृष्ठ : 218 ।

पगड़ियों पर मसह

प्रश्न 18: क्या पगड़ी पर मसह करना जायज़ है? और इसकी सीमाएँ क्या हैं?

जवाब: पगड़ी पर मसह करना उन चीज़ों में से है जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से साबित हैं, इसलिए पगड़ी पर मसह करना जायज़ है। पगड़ी के पूरे हिस्से या अधिकतर हिस्से पर मसह किया जा सकता है। इसके अलावा, यह भी सुन्नत है कि सिर के खुले हिस्से जैसे कि माथे, सिर के किनारे और दोनों कानों पर भी मसह किया जाए।

प्रश्न (19): क्या पुरुष का शिमाग़ और महिला का सिर ढाकने वाला वस्त्र पगड़ी के अंतर्गत आता है?

उत्तर: पुरुष का शिमाग़ और टोपी किसी भी प्रकार से पगड़ी में शामिल नहीं होते, और सर्दियों के दिनों में जो टोपी सिर और कानों को ढाकती है, और जिसका निचला भाग गर्दन पर लपेटा होता है, तो यह पगड़ी के समान है; क्योंकि इसे उतारने में कठिनाई होती है, इसलिए इसपर मसह किया जा सकता है।

इमाम अहमद रहमतुल्लाह अलैहि के मशहूर मत के अनुसार औरतें अपने दुपट्टों पर मसह कर सकती हैं, यदि वे उनके गले के नीचे लिपटे हुए हों [24]; क्योंकि यह कुछ सहाबिया रज़ियल्लाहु अन्हुन्ना से वर्णित है। [24] "अल-इन्साफ़" जो "अल-मुक़ने" और "अश-शरह अल-कबीर" के साथ है, (1/387), "मुन्तहा अल-इरादात" जो "शरह अल-बहूती" के साथ है, (1/122) ।

प्रश्न (20): तुरबूश (एक प्रकार की टोपी) सिर पर तथा सिर से जुड़े गर्दन के हिस्से पर होती है, क्या उसपर मसह किया जा सकता है?

जवाब: ज़ाहिर यह है कि यदि "तुरबूश" उतारने में कोई कठिनाई न हो, तो उसपर मसह करना जायज़ नहीं है; क्योंकि यह कुछ मामलों में "टोपी" के समान है, और असल यह है कि सिर का मसह करना वाजिब है, जब तक कि इंसान को किसी चीज़ के बारे में यह स्पष्ट न हो जाए कि उस पर मसह करना जायज़ है।

पट्टी पर मसह

प्रश्न 21: 'जबीरा' (पट्टी) और उसके समान चीज़ों पर मसह करने का क्या हुक्म है? और इसकी वैधता का प्रमाण किताब और सुन्नत से क्या है?

उत्तर: 1- पहले यह जानना आवश्यक है कि जबीरा क्या है?

अल-जबीरा का मूल अर्थ: वह चीज़ जिससे हड्डी को जोड़ा जाता है, और फुक़हा की परिभाषा में इसका मतलब: वह चीज़ जो किसी ज़रूरत के तहत पवित्रता के स्थान पर लगाई जाती है, जैसे: हड्डी पर लगाया जाने वाला जिप्स, या घाव पर लगाई जाने वाली पट्टी, या पीठ के दर्द पर लगाई जाने वाली पट्टी या जो भी चीज़ इनसे मिलती जुलती हो, तो उस पर मसह करना काफ़ी है, धोना आवश्यक नहीं।

तो यदि हम मान लें कि वुज़ू करने वाले की बांह पर एक पट्टी है जो घाव के लिए आवश्यक है; तो वह धोने के बजाय उसपर मसह करेगा, और यह पाकी पूरी मानी जाएगी। इसका अर्थ यह है कि यदि यह व्यक्ति इस पट्टी को हटा भी दे, तो उसकी पाकी बनी रहेगी और वह टूटेगी नहीं; क्योंकि यह पाकी शरीयत के अनुसार पूरी हुई है, और पट्टी हटाने से पाकी टूटने का कोई प्रमाण नहीं है।

जबीरा के मामले में कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जो विरोध से मुक्त हो, इसमें केवल कुछ कमजोर हदीसें हैं जिनकी ओर कुछ विद्वानों ने रुख किया है, और कहा है कि यह सब मिलकर प्रमाण के स्तर पर पहुंच जाती हैं।

जबकि कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि इन हदीसों की कमजोरी के कारण इनपर भरोसा नहीं किया जा सकता। फिर इनमें भी मतभेद है, इनमें से कुछ कहते हैं कि जबीरा की जगह को पाक करने की अनिवार्यता ख़त्म हो जाएगी क्योंकि वह इसमें असमर्थ है। जबकि कुछ कहते हैं कि उसपर मसह नहीं करेगा बल्कि उसके लिए तयम्मुम करेगा।

लेकिन नियमों के सबसे करीब राय - इस संद्रभ में वर्णित हदीसों को देखे बिना - यह है; कि मस्ह किया जाए, यह मस्ह तयम्मुम से बेनियाज़ कर देता है अतः तयम्मुम की कोई ज़रूरत नहीं। इस आधार पर हम कह सकते हैं: यदि पवित्रता के अंगों में कोई घाव हो तो उसके कई स्तर हैं:

पहला स्तर: घाव खुला हो, और उसे धुलने से कोई नुकसान न हो, तो इस स्थिति में उसे धोना अनिवार्य है।

दूसरा स्तर: घाव खुला हो, और धोने से नुकसान का डर हो मसह से नहीं, तो इस स्थिति में उसपर मसह करना वाजिब है, धोना नहीं।

तीसरा स्तर: यह है कि घाव खुला हो, और उसे धोने या मसह करने से नुकसान का डर हो, तो उसके लिए तयम्मुम किया जाएगा।

चौथा स्तर: घाव पट्टी आदि से ढका हुआ हो, तो इस स्थिति में उसपर मसह करेगा और अंग को धोने के बजाय यह उसके लिए काफ़ी होता है।

प्रश्न 22: यदि पट्टी आवश्यकता से अधिक हो तो क्या उसपर मसह करने के लिए कुछ शर्तें हैं?

उत्तर: पट्टी पर मसह केवल आवश्यकता के समय ही किया जाएगा, इसलिए पट्टी (जबीरा) आवश्यकता के अनुसार ही होना ज़रूरी है। और आवश्यकता केवल दर्द या घाव के स्थान में नहीं होती, बल्कि जबीरा (पट्टी) को मज़बोती के साथ बांधने के लिए शरीर के जिस हिस्से की भी आवश्यकता हो, वह भी आवश्यकता में शामिल है।

प्रश्न (23): क्या इसके अर्थ में लपेटी जाने वाली चीज़ें, जैसे शाश (एक प्रकार की पट्टी) आदि शामिल हैं?

उत्तर: हाँ, शामिल है। फिर ज्ञात हो कि पट्टी का मसह मोज़ों के मसह की तरह निर्धारित अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि जब तक उसकी आवश्यकता रहे, तब तक उसपर मसह किया जा सकता है। इसी प्रकार, छोटी नापाकी और बड़ी नापाकी दोनों में उसपर मसह किया जा सकता है, जबकि मोज़ों के मामले में ऐसा नहीं है जैसा कि पहले बताया जा चुका है। जब स्नान करना अनिवार्य हो, तब भी उसपर मसह किया जा जाएगा, जैसे वुज़ू में मसह किया जाता है।

प्रश्न 24: जबीरा पर मसह करने का तरीका क्या है? क्या पूरे पर मसह करना होगा, या इसके कुछ हिस्से पर मसह किया जाए? कृपया विस्तार से बताएं।

उत्तर: हाँ, पूरे पर मसह करना होगा; क्योंकि क़ायदा यह है कि विकल्प का वही हुक्म होता है जो मूल का होता है जब तक कि सुन्नत इसके विपरीत न हो। यहाँ मसह धोने का विकल्प है, जैसे पूरे अंग को धोना आवश्यक है, वैसे ही पूरी पट्टी पर मसह करना आवश्यक है। और जहाँ तक खुफ्फैन पर मसह का सवाल है, तो वह एक रुख़्सत (छूट) है, और सुन्नत में खुफ्फैन के कुछ हिस्से पर मसह करने की अनुमति दी गई है।

दूसरा अध्याय: नमाज़

नमाज़ की महत्त्व और फ़ज़ीलत

नमाज़ का तरीक़ा (विधि)

सह्व (विस्मृति) के सज्दे

तिलावत के सजदा

यात्री की नमाज़ और उसका रोज़ा

मरज़ और वह बातें जिनका ध्यान मरीज़ को रखना चाहिए

बीमार व्यक्ति कैसे तहारत हासिल करे, नमाज़ पढ़े और रोज़ा रखे?

नफ़ल नमाज़

नमाज़ के निषिद्ध समय

नमाज़ छोड़ने वाले का हुक्म

तौबा

नमाज़

नमाज़ की परिभाषा:

कुछ अज़कार के साथ विशेष रूप से खड़े होने, बैठने, रुकू और सजदा करने के द्वारा अल्लाह की इबादत करने का नाम नमाज़ है। नमाज़ में प्रवेश करने से पहले कुछ शर्तों को पूरा करना आवश्यक है, जैसे पवित्रता, लज्जा के अंगों को ढकना, समय का प्रवेश - यदि नमाज़ समयबद्ध हो - आदि।

नमाज़ का महत्व और फ़ज़ीलत:

नमाज़: इस्लाम के पांच स्तंभों में दूसरा स्तंभ है, और यह शहादतैन (अल्लाह के एक होने एवं मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ‎के दूत होने की गवाही) के बाद इस्लाम के स्तंभों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। जो कोई इसकी अनिवार्यता का इनकार करे, वह काफिर है; क्योंकि वह अल्लाह, उसके रसूल और मुसलमानों की सर्वसम्मति को झुठलाने वाला है।

और जो व्यक्ति इसकी अनिवार्यता को स्वीकार करता है, लेकिन लापरवाही में नमाज़ नहीं पढ़ता, उसके हुक्म में उलमा का मतभेद है। प्रबल मत यह है कि वह काफिर है, दीन से खारिज है।

नमाज़ बंदे और उसके रब के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "जब तुम में से कोई नमाज़ पढ़ता है तो अपने रब से मुनाजात (चुपके चुपके बात) करता है।" [25] तथा अल्लाह तआला का हदीस कुदसी में एक और फ़रमान है : "मैंने नमाज़ को अपने तथा अपने बंदे के बीच आधा-आधा बाँट दिया है, तथा मेरे बंदे के लिए वह सब कुछ है, जो वह माँगे। जब बंदा {ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ} (हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है।) कहता है, तो महान अल्लाह कहता है कि मेरे बंदे ने मेरी प्रशंसा की। जब वह {ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ} (जो अत्यंत दयावान्, असीम कृपालु है।) कहता है, तो महान अल्लाह कहता है कि मेरे बंदे ने मेरी तारीफ़ की। जब बंदा {مَٰلِكِ يَوۡمِ ٱلدِّينِ} (जो बदले के दिन का मालिक है।) कहता है, तो अल्लाह कहता है कि मेरे बंदे ने मेरी बड़ाई बयान की है। जब बंदा {إِيَّاكَ نَعۡبُدُ وَإِيَّاكَ نَسۡتَعِينُ} (ऐ अल्लाह! हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं।) कहता है, तो अल्लाह कहता है कि यह मेरे तथा मेरे बंदे के बीच है और मेरे बंदे के लिए वह सब कुछ है, जो वह माँगे। फिर जब बंदा {ٱهۡدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلۡمُسۡتَقِيمَ، صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنۡعَمۡتَ عَلَيۡهِمۡ غَيۡرِ ٱلۡمَغۡضُوبِ عَلَيۡهِمۡ وَلَا ٱلضَّآلِّينَ} (हमें सीधे मार्ग पर चला। उन लोगों के मार्ग पर, जिनपर तूने अनुग्रह किया। उनके मार्ग पर नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनके रास्ते पर, जो गुमराह हैं।) कहता है, तो अल्लाह कहता है कि यह मेरे बंदे के लिए है और मेरे बंदे के लिए वह सब कुछ है, जो वह माँगे।" [26] [25] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताब मवाक़ीत अस-सलात'', अध्याय : नमाज़ी अपने रब से मुनाजात करता है, (हदीस संख्या : 531) में, तथा मुस्लिम ने “किताब अल-मसाजिद'', अध्याय : मस्जिद में थूकने की मनाही, (हदीस संख्या : 551) में, अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है। [26] इसे इमाम मुस्लिम ने सहीह मुस्लिम, किताबुस सलाह, अध्याय : सूरा फ़ातिहा पढ़ने की अनिवार्यता, हदीस संख्या : (395/38) में हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

नमाज़ इबादतों का एक बाग़ है, जिसमें हर प्रकार के सुंदर जोड़े हैं: तकबीर के साथ नमाज़ का आरंभ होता है, क़ियाम में नमाज़ी अल्लाह का कलाम पढ़ता है, रुकू में रब की महिमा करता है, रुकू से उठने की स्थिति अल्लाह की प्रशंसा से भरी होती है, सजदे में अल्लाह की महानता के वर्णन के साथ उसकी पकी बयाना करता है और उससे दुआ करता है, बैठकर दुआ और तशह्हुद करता है, और अंत सलाम के साथ होता है।

नमाज़ मुश्किलात में मदद का कारण है, तथा बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया : "तथा सब्र और नमाज़ से मदद प्राप्त करो..." [सूरा अल-बक़रा : 45] और फ़रमायाः "आप उस पुस्तक को पढ़ें, जो आपकी ओर वह़्य (प्रकाशना) की गई है तथा नमाज़ क़ायम करें। निःसंदेह नमाज़ निर्लज्जता और बुराई से रोकती है..." [सूरा अल-अनकबूत : 45]

नमाज़ ईमान वालों के लिए उनकी क़ब्रों और महशर में नूर होगी, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: «नमाज़ नूर है»[27], और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: ''जो इसकी रक्षा करेगा, उसके लिए यह क़यामत के दिन नूर, प्रमाण और मुक्ति का कारण बनेगी।'' [28] [27] सहीह मुस्लिम, किताब : तहारत, बाब : वुज़ू की फ़ज़ीलत, हदीस संख्या : 223, हदीस अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है। [28] इसे इमाम अहमद ने ''मुसनद'' (2/169) में अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है।

नमाज़ ईमान वालों की खुशी और उनकी आँखों की ठंडक है, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''मेरी आँखों की ठंडक नमाज़ में रखी गई है।'' [29] [29] इसे नसाई ने किताब 'इशरतुन्निसा', बाब 'हुब्बुन्निसा', हदीस संख्या : 3392 में, और अहमद ने मुसनद 3/128 में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

नमाज़ के द्वारा ख़ताएँ मिटाई जाती हैं और गुनाहों का कफ़्फ़ारा किया जाता है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा: "तुम्हारा क्या विचार है कि यदि तुममें से किसी के द्वार पर नहर प्रवाहित हो और वह उसमें प्रत्येक दिन पाँच बार स्नान करता हो, तो क्या उसके शरीर में मैल या गंदगी का कोई अंश बचेगा?" सहाबा ने कहा: उसके शरीर में मैल का कोई अंश नहीं बचेगा। तो फ़रमाया: "यही उदाहरण है पाँच नमाज़ों का। इनके ज़रिए अल्लाह गुनाहों को मिटा देता है" [30]। [30] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताब मवाक़ीत अस-सलाह'', अध्याय : पांच नमाज़ें कफ्फ़ारा हैं, (हदीस संख्या : 528) में, और इमाम मुस्लिम ने “किताब अल-मसाजिद'', अध्याय : नमाज़ की ओर चलने से गुनाहों का माफ़ होना, (हदीस संख्या : 667) में, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस से रिवायत किया है।

और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "पाँच नमाज़ें, एक जुमा दूसरे जुमे तक, इनके बीच में होने वाले गुनाहों का कफ़्फ़ारा- प्रायश्चित- बन जाते हैं, जब तक कि बड़े गुनाह न हों" [31]। [31] सहीह मुस्लिम, किताब: पवित्रता, अध्याय: पाँच नमाज़ें और एक जुमा दूसरे जुमा तक, बीच के गुनाहों का कफ़्फ़ारा हैं, हदीस संख्या: 233, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत।

जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है। इसे अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत किया है [32]। [32] इसे इमाम बुखारी ने “किताब अल-अज़ान'', अध्याय : जमाअत का महत्व, (हदीस संख्या : 645) में तथा मुस्लिम ने “किताब अल-मसाजिद'', अध्याय : जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने का महत्व, (हदीस संख्या : 650) में रिवायत किया है।

और अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्ह ने कहा: "जो व्यक्ति यह चाहता है कि वह कल अल्लाह से मुसलमान के रूप में मिले, तो उसे इन नमाज़ों की हिफ़ाज़त करनी चाहिए जब और जहां इनकी ओर बुलाया जाए। क्योंकि अल्लाह ने तुम्हारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए हिदायत के तरीक़े निर्धारित किए हैं, और ये नमाज़ें हिदायत के तरीक़ों में से हैं। और यदि तुम अपने घरों में नमाज़ पढ़ोगे जैसे यह पीछे रहने वाला अपने घर में पढ़ता है, तो तुम अपने नबी की सुन्नत को छोड़ दोगे, और यदि तुम अपने नबी की सुन्नत को छोड़ दोगे, तो तुम गुमराह हो जाओगे। और कोई भी व्यक्ति जो वुज़ू करता है तो अच्छी तरह से वुज़ू करता है, फिर इन मस्जिदों में से किसी मस्जिद की ओर जाता है, तो अल्लाह उसके हर क़दम के बदले में उसके लिए एक नेकी लिखता है, उसे एक दर्जा ऊँचा करता है और उसके एक गुनाह को मिटा देता है। और हमने देखा है कि हमारे बीच नमाज़ से केवल वही व्यक्ति पीछे रहता था जो स्पष्ट रूप से मुनाफ़िक़ होता था। और आदमी को दो व्यक्तियों के बीच सहारा देकर लाया जाता था यहाँ तक कि उसे सफ़ में खड़ा किया जाता था।" [33] सहीह मुस्लिम, किताब: मसाजिद, अध्याय : जमा'अत के साथ नमाज़ हिदायत की सुन्नत (रास्ता) है, हदीस संख्या: 654।

नमाज़ में ख़ुशू'अ - जो दिल की उपस्थिति है - और उसकी पाबंदी करना सफलता और स्वर्ग में प्रवेश पाने के कारणों में से है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "निश्चय सफल हो गए ईमान वाले। जो अपनी नमाज़ में विनम्रता अपनाने वाले हैं। और जो व्यर्थ चीज़ों से मुँह मोड़ने वाले हैं। तथा जो ज़कात अदा करने वाले हैं। और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले हैं। सिवाय अपनी पत्नियों या उन महिलाओं के जो उनके स्वामित्व में हैं, तो निःसंदेह वे निंदित नहीं हैं। फिर जो इसके अलावा तलाश करे, तो वही लोग सीमा का उल्लंघन करने वाले हैं। और जो अपनी अमानतों तथा अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखने वाले हैं। तथा जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं। यही लोग हैं, जो वारिस (उत्तराधिकारी) हैं। जो फ़िरदौस के वारिस होंगे, वे उसमें हमेशा रहने वाले हैं।" [सूरा अल-मोमिनून : 1-11]

नमाज़ के कबूल होने की दो मुख्य शर्तें हैं: उसमें अल्लाह के लिए इखलास होना, और उसे सुन्नत के अनुसार अदा करना। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहा: "सभी कार्यों का आधार नीयतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नीयत के अनुरूप ही परिणाम मिलेगा।" [34] और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा: ''तुम उसी प्रकार नमाज़ पढ़ो, जिस प्रकार मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो।'' [35] [34] इसे इमाम बुख़ारी ने किताब बदउल वह्य, अध्याय : कैसे वह्य की शुरुआत हुई, हदीस संख्या : 1 में तथा मुस्लिम ने किताब अल-इमारा, अध्याय : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का कथन : "सारे कर्मों का आधार नीयतों पर है", हदीस संख्या : 1907 में, उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- की हदीस से रिवायत किया है। [35] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताब अल-अज़ान'', अध्याय : अल-अज़ान लिल-मुसाफिर इज़ा कानू जमाअह, हदीस संख्या : 631, में मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

नमाज़ का तरीक़ा:

जब ये शर्तें पूरी हो जाएं और वह नमाज़ के लिए तैयार हो जाए; तो वह निम्नलिखित कार्य करे:

1- अपने पूरे शरीर के साथ सीधी तरह क़िबला रुख हो, बिना किसी विचलन या मोड़ के।

2- फिर जो नमाज़ पढ़ना चाहे, दिल में उसकी नीयत करे। नीयत के शब्द ज़बान से न बोले।

3- फिर तकबीर-ए-तहरीमा अर्थात ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधों तक या कानों की लोब तक, या उनके ऊपरी हिस्से तक उठाए।

4- फिर अपनी छाती के ऊपर अपने दाहिने हाथ की हथेली को अपने बाएं हाथ की हथेली के ऊपर रखे।

5- फिर नमाज़ शुरू करने की दुआ पढ़े, और कहे: "ऐ अल्लाह! मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी तूने पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।" [36] [36] इसे इमाम बुखारी ने सहीह बुख़ारी, किताबुल अज़ान, अध्याय : तकबीर के बाद क्या कहा जाए (हदीस क्रमांक : 744) में, और इमाम मुस्लिम ने सहीह मुस्लिम, किताबुल मसाजिद, अध्याय : तकबीर-ए-इहराम और क़िरात के बीच क्या कहा जाए (हदीस क्रमांक : 598) में, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

6- या फिर यह दुआ पढ़े : "सुबहानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका, व तबारकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा गैरुका" (तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है)।" [37] [37] इसे अबू दाऊद ने अपनी सुनन में, किताबुस सलाह, अध्याय : नमाज़ के आरंभ में सुबहानका अल्लाहुम्मा व बिहमदिका वाली दुआ पढ़ना (हदीस क्रमांक : 775) के अन्तर्गत, तिरमिज़ी ने अपनी सुनन में, किताबुस सलाह, अध्याय : नमाज़ आरंभ करते समय की दुआ (हदीस क्रमांक : 242) के अन्तर्गत, नसाई ने अपनी सुनन में, किताबुल इफ्तिताह, अध्याय: नमाज़ के आरंभ और क़िराअत के बीच के ज़िक्र का एक और प्रकार (हदीस क्रमांक : 900) के अन्तर्गत, इब्ने माजा ने अपनी सुनन में, किताब इकामतुस सलाह, अध्याय : नमाज़ आरंभ करने का बयान (हदीस क्रमांक : 804) के अन्तर्गत, और अहमद (3/50) ने, अबू सईद रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस से रिवायत किया है। और इसे अबू दाऊद ने पूर्वोक्त स्थान पर (हदीस क्रमांक : 776), तिरमिज़ी ने पूर्वोक्त स्थान पर (हदीस क्रमांक : 243), और इब्ने माजा ने पूर्वोक्त स्थान पर (हदीस क्रमांक : 806), आइशा रज़ियल्लाहु अनहा की हदीस से रिवायत किया है। इसे मुस्लिम ने अपनी सहीह की किताबुस सलाह, अध्याय : ज़ोर से बिस्मिल्लाह न कहने वालों का प्रमाण (हदीस क्रमांक : 399) में उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अनहु के अमल पर मौक़ूफ़ (सहाबी का कथन) के तौर पर रिवायत किया है, और इसकी सनद में एक इल्लत (दोष) है।

7- फिर तअव्वुज़ पढ़े, अर्थात यों कहेः "मैं धिक्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण चाहता हूँ।"।

8- फिर बिस्मिल्लाह कहे एवं सूरा फ़ातिहा पढ़े, अर्थात यों कहेः (अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान, असीम दया वाला है। हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। अत्यंत दयावान, असीम कृपालु जो बदले के दिन का मालिक है। (ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं। हमें सीधे मार्ग पर चला उन लोगों का मार्ग, जिनपर तूने अनुग्रह किया। उनका नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनका, जो गुमराह हैं।) [सूरा अल-फ़ातिहा: 1-7], फिर कहेः ''आमीन'' अर्थात: हे अल्लाह! तू क़बूल कर ले।

9- फिर क़ुरआन से जो भी याद हो पढ़े, सुबह की नमाज़ में अधिक क़ुरआन पढ़े।

10- फिर रुकूअ करे, अर्थात अल्लाह के सम्मान में पीठ झुकाए, एवं रुकूअ करते समय तकबीर कहे तथा अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधों के बराबर उठाए। सुन्नत यह है कि अपनी पीठ को सीधी रखे, सिर को उसके बराबर रखे, एवं अपने दोनों होथों को उनकी उंगलियों को फैलाए हुए दोनों घुटनों पर रखे।

11- रुकूअ में तीन बार कहे: ''سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ'' (मैं अपने महान रब की पाकी बयान करता हूं) और यदि इसके साथ नीचे की यह दुआएं भी पढ़े। "मैं तेरी पाकी बयान करता हूँ, ऐ अल्लाह! ऐ हमारे रब! तेरी प्रशंसा के साथ। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।"।" [38], "पवित्र, पाक, फ़रिश्तों एवं रूह (जिबरील) का रब।" [39] तो उत्तम है [38] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 761 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 484। [39] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 487 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 872।

12- फिर रुकूअ से ''سمع الله لمن حمده'' कहते हुए अपना सिर उठाए और अपने हाथों को अपने दोनों कंधों तक उठाए।

13- मुक़तदी ''سمع الله لمن حمده'' न कहे, बल्कि उसकी जगह पर ''ربنا ولك الحمد'' कहे।

14- फिर सिर उठाने के बाद कहे: "ऐ हमारे रब, तेरी ही प्रशंसा है, आकाशों की समाई के बराबर, धरती की समाई के बराबर, और इसके बाद तू जो कुछ चाहे, उसकी समाई के बराबर।" [40] और यदि यह भी जोड़ते हुए कहे : «हमद तथा प्रशंसा के अधिकारी, बंदे की सबसे सच्ची बात है - और हम सब तेरे बंदे हैं-: जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है, और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।» [41] तो यह उत्तम हागा। [40] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : (471), अबू दाऊद हदीस संख्या : (760)। [41] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 477 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 847 ।

15- फिर अल्लाह के लिए विनम्रता के साथ पहला सजदा करे, और सजदा करते समय "अल्लाहु अकबर" कहे। सजदा अपने शरीर के सात अंगों पर करे: नाक के साथ पेशानी, दोनों हथेलियाँ, दोनों घुटने, और दोनों पैरों के किनारे। अपनी दोनों बाहों को अपने पहलुओं से अलग रखे, और अपने दोनों हाथों को ज़मीन पर न फैलाए, और अपनी उँगलियों के सिरों को क़िबला की ओर रखे।

16- और अपने सज्दे में तीन बार कहे: ''سُبْحَانَ رَبِّيَ الَأعْلَى'' (मैं अपने उच्च रब की पाकी बयान करता हूं) और यदि इसके साथ यह भी जोड़ेः "मैं तेरी पाकी बयान करता हूँ, ऐ अल्लाह! ऐ हमारे रब! तेरी प्रशंसा के साथ। ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे।" [42] ""पवित्र, पाक, फ़रिश्तों एवं रूह (जिबरील) का रब।" [43] तो उत्तम है। [42] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 761 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 484। [43] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 487 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 872।

17- फिर सज्दा से अपना सिर ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए उठाए।

18- फिर दोनों सज्दों के बीच अपने बाएं पैर पर बैठे एवं दायां पैर खड़ा रखे, अपना दायां हाथ अपनी दाईं जाँघ के किनारा जो घुटने से मिले हुआ हो उसपर रखे, अनामिका एवं कनिष्ठा को मुट्ठी के आकर में कर ले (समेट ले), तर्जनी को खड़ी कर ले एवं दुआ कहते हुए उससे इशारा करे एवं अंगूठा तथा मध्यमा से एक दायरा बनाए। और अपना बायां हाथ अपनी दाईं जाँघ के किनारा जो घुटने से मिला हुआ हो उसपर रखे, उंगलियों को फैलाते हुए रखे।

19- दोनों सज्दों के बीच की बैठक में यह दुआ पढ़ेः «رَبِّ اغْفِرْ لِي، وَارْحَمْنِي، وَاهْدِنِي، وَارْزُقْنِي، وَاجْبُرْنِي، وَعَافِنِي» (अर्थात : ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर, मुझपर रहम कर, मुझे सीधा रास्ता दिखा, मुझे रोज़ी दे, मेरी ज़रूरतें पूरी कर (सहारा दे) और मुझे स्वस्थ तथा सुरक्षित रख।) [44] [44] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 2697 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 850।

20- फिर अल्लाह के लिए खुशू'अ के साथ पहले सज्दे की तरह दूसरा सज्दा करे, तथा इसमें वही कहे एवं करे जो पहले में कहा तथा किया था, एवं तकबीर कहते हुए सजदा करे।

21- फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए दूसरे सजदे से खड़ा हो और कहने और करने में दूसरी रक'अत पहली रक'अत ही की तरह पढ़े। अंतर बस इतना है कि दूसरी रक'अत में नमाज़ आरंभ करने की दुआ नहीं पढ़ेगा।

22- फिर दूसरी रक'अत समाप्त करने के बाद तकबीर कहते हुए बैठे, उसी प्रकार जिस प्रकार दोनों सजदों के बीच बैठा था।

23- इस बैठक में तशह्हुद पढ़े, अतः यों कहे: "बोलकर की जाने वाली सारी इबादतें और सारी जिस्मानी और माली इबादतें सिर्फ़ अल्लाह के लिए हैं, ऐ अल्लाह के नबी! आपपर शांति हो और अल्लाह की रहमत और बरकत हो आपपर , और हमपर और अल्लाह के सभी नेक बंदों पर शांति हो। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे और रसूल हैं। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार पर वैसे ही रहमत भेज जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के परिवार पर रहमत भेजी थी। बेशक, तू तारीफ़ और इज़्ज़त के लायक है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार पर वैसे ही रहमत भेज जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के परिवार पर रहमत भेजी थी। बेशक, तू तारीफ़ और इज़्ज़त के लायक है। हे अल्लाह, मैं जहन्नम के अज़ाब से, कब्र के अज़ाब से, ज़िंदगी और मौत की आज़माइश से और काना दज्जाल की आज़माइश से तेरी पनाह मांगता हूँ।

24- फिर दुनिया और आखिरत की भलाई में से जो उसे पसंद हो, उसकी अल्लाह से प्रार्थना करे।

25- फिर अपनी दायीं ओर ''السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللَّه'' कहते हुए सलाम फेरे, और उसी प्रकार बायीं ओर सलाम फेरे।

26- यदि नमाज़ तीन या चार रक्अतों वाली हो, तो पहले तशह्हुद के अन्त पर रुक जाएगा, और वह है: '' मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, "और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे और रसूल हैं"।

27- फिर ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए खड़ा हो जाए और अपने दोनों हाथों को कंधों के बराबर तक उठाए।

28- फिर दूसरी रक्अत की तरह ही शेष नमाजों को पढ़ेगा, परन्तु ध्यान रहे कि इन रक्अतों में केवल सूरा फ़ातिहा ही पढ़ेगा।

29- फिर तवर्रुक करते हुए बैठेगा, और वह इस तरह कि अपने बाएं पैर को दायीं पिंडली के नीचे से निकालेगा एवं धरती पर नितंब रख कर बैठेगा और अपने हाथों को जांघों के ऊपर उसी प्रकार से रखेगा जिस प्रकार से पहले तशह्हुद में रखा था।

30- इस बैठक में पूरा तशह्हुद पढ़ेगा।

31- फिर अपनी दायीं ओर ''السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ الله'' कहते हुए सलाम फेरेगा, और उसी प्रकार बायीं ओर।

* नमाज़ में कुछ नापसंद (मकरूह) चीज़ों का वर्णन:

1- नमाज़ में सिर या आँखें घुमाना मकरूह है, लेकिन आसमान की तरफ नज़र उठाना हराम है।

2- नमाज़ में बेकार की हरकतें और बिना ज़रूरत के हिलना-डुलना मकरूह है।

3- नमाज़ में मकरूह है: ऐसा सामान साथ रखना जो ध्यान भटकाए, जैसे भारी चीज़ या ऐसा रंगीन सामान जो नज़र को खींचे।

4- नमाज़ में मकरूह है: पहलू (कमर) पर हाथ रखना।

* नमाज़ को बातिल (अमान्य) करने वाली चीजें:

1- जानबूझकर थोड़ी सी भी बात करने से नमाज़ बातिल (अमान्य) हो जाती है।

2- तथा पूरे शरीर को क़िबला से मोड़ लेने पर नमाज़ बातिल हो जाती है।

3- नमाज़ हवा के पीछे से निकलने से बातिल हो जाती है, और उन सभी चीज़ों से जो वुज़ू या स्नान को अनिवार्य करती हैं।

4- और नमाज़ बहुत अधिक लगातार हरकतें करने से, जब कोई ज़रूरत न हो, बातिल हो जाती है।

5- और नमाज़ हंसने से बातिल हो जाती है, चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो।

6- नमाज़ बातिल हो जाती है यदि कोई जान-बूझकर उसमें रुकूअ, सजदा, क़याम या बैठक ज़्यादा कर दे।

7- और इमाम से जान-बुझ कर आगे बढ़ने से नमाज़ बातिल हो जाती है।

8- और नमाज़ को तोड़ने वाली चीज़ों में से एक और है: ऐसे कपड़ों में नमाज़ पढ़ना जो त्वचा को दिखाते हैं, (जैसा कि अगले प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट रूप से आया है):

फ़ज़ीलतुश् शैख़/ मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन,

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू, कृपया इस प्रश्न का उत्तर दें:

बहुत से लोग हल्के (पतले) कपड़े पहनकर नमाज़ पढ़ते हैं, जो त्वचा को दिखाते हैं, और इन कपड़ों के नीचे छोटे पायजामे पहनते हैं जो आधी जांघ से लम्बे नहीं होते, जिसके कारण कपड़े के पीछे से जांघ का मध्य भाग दिखाई देता है। ऐसे लोगों की नमाज़ का क्या हुक्म है?

व अलैकुमुस्सलामु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू

इन लोगों की नमाज़ का हुक्म उन लोगों के समान है जो बिना कपड़े के केवल छोटे पायजा पहन कर नमाज़ पढ़ते हैं; क्योंकि पारदर्शी कपड़े जो त्वचा को दिखाते हैं, वे पर्दा नहीं करते, और उनका होना न होने के बराबर है। इसी आधार पर, विद्वानों के सही मत के अनुसार उनकी नमाज़ सही नहीं है और यही इमाम अहमद -रहमतुल्लाहि अलैहि- का मशहूर मत है[45]; क्योंकि पुरुषों के लिए नमाज़ में नाभि से लेकर घुटनों तक का पर्दा करना आवश्यक है, और यह शक्तिशाली और महान अल्लाह के इस कथन का न्यूनतम अनुपालन हैः "ऐ आदम की संतान! प्रत्येक नमाज़ के समय अपनी शोभा धारण करो..." [सूरा अल-आ'राफ़ : 31] [45] "अल-इन्साफ़" जो "अल-मुक़ने" और "अश-शरह अल-कबीर" के साथ है, (3/200), "मुन्तहा अल-इरादात" जो "अल-बहूती की व्याख्या" के साथ है : (1/298) ।

ऐसे लोगों पर दो में से एक कार्य अनिवार्य है: या तो वे ऐसे पायजामे पहनें जो नाभि और घुटने के बीच के भाग को ढकें या फिर इन छोटे पायजामों के ऊपर एक मोटा कपड़ा पहनें जो त्वचा को न दिखाए।

यह कार्य जो प्रश्न में उल्लिखित है, ग़लत और गंभीर है। अतः उनपर फ़र्ज है कि वे अल्लाह तआला से तौबा करें और नमाज़ में जितना ढ़ांकना उनपर अनवार्य है उतना पूर्ण रूप से ढ़ांकने पर ध्यान दें।

हम अल्लाह तआला से हमारे लिए तथा हमारे मुसलमान भाइयों के लिए मार्गदर्शन एवं तौफ़ीक़ की दुआ करते हैं उस काम के लिए जो उसे पसंद है और जिससे वह राज़ी होता है। निःसंदेह वह बड़ा दाता एवं सम्मानित है।

लेख:

मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन

5 रमज़ान, सन 1408 हिजरी।

फर्ज़ नमाज़ से सलाम फेरने के बाद के अज़कार

नमाज़ पढ़ने वाले को यह अज़कार कहने चाहिएं:

"मैं अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ, मैं अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ, मैं अल्लाह से क्षमा याचना करता हूँ। ऐ अल्लाह! तू ही सुरक्षा प्रदान करने वाला तथा त्रुटियों से मुक्त है और तेरी ही ओर से सुरक्षा एवं शांति प्राप्त होती है। हे महानता और भलाई वाले ! तू बड़ी बरकतों वाला है।" [46] [46] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या: 591 तथा सुनन अबू दाऊद, हदीस संख्या : 1512।

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोकने की क्षमता रखता है। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा उपास्य नहीं है, हम केवल उसी की उपासना करते हैं, उसी की सब नेमतें हैं और उसी का सब पर उपकार है और उसी के लिए समस्त अच्छी प्रशंसाएँ हैं। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, हम उसी के लिए धर्म को शुद्ध करते हैं, चाहे ये बात काफिरों को नागवार लगती हो।" [47] [47] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 594, तथा नसाई, हदीस संख्या : 1340।

"अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए समस्त प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है, और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है, तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती।" [48] [48] सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6862 तथा सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 593।

साथ ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस विषय में (फर्ज़ नमाज़ के बाद) जो तस्बीह, तहमीद और तकबीर के शब्द आए हैं, उनको ध्यानपूर्वक पढ़े। ये सब कई तरीकों से आई हैं। लिहाज़ा बेहतर यह है कि कभी इसे पढ़े और कभी उसे।

पहला: यूं कहेगा: ''सुब्हानल्लाह'' तैंतीस बार, ''अल-हमदु लिल्लाह'' तैंतीस बार, और ''अल्लाहु अकबर'' तैंतीस बार, और अंत में कहेगा: "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का राज्य है, उसी की सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" [49] [49] इसे इमाम मुस्लिम ने "किताब अल-मसाजिद" में, "नमाज़ के बाद ज़िक्र के मुसतहब होने" के बाब में, हदीस संख्या : 597, हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

दूसरा: यूं कहेगा: ''सुब्हानल्लाह'' तैंतीस बार, ''अल-हमदु लिल्लाह'' तैंतीस बार, और ''अल्लाहु अकबर'' चौंतीस बार।" [50] [50] इसे इमाम मुस्लिम ने "किताब अल-मसाजिद" में, "नमाज़ के बाद ज़िक्र की मुसतहबियत" के बाब में, हदीस संख्या : 596, हज़रत का'ब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

तीसरा: यूं कहेगा: ''सुब्हानल्लाह'' दस बार, ''अल-हमदु लिल्लाह'' दस बार, और ''अल्लाहु अकबर'' दस बार।" [51] [51] इसे बुख़ारी ने अपनी सहीह, किताबुद द'अवात, अध्याय : नमाज़ के बाद की दुआ (हदीस क्रमांक : 6329) में अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- की हदीस से रिवायत किया है। इसी तरह इसे अबू दाऊद ने अपनी सुनन, किताब अल-अदब, अध्याय : सोते समय तस्बीह पढ़ने का बयान (हदीस क्रमांक : 5065) में, तिरमिज़ी ने अपनी सुनन, किताबुद द'अवात, अध्याय : सोते समय तस्बीह, तकबीर और तहमीद का बयान (हदीस क्रमांक : 3410) में, नसाई ने अपनी सुनन, किताब अस-सहव, अध्याय : सलाम के बाद तस्बीह की संख्या (हदीस क्रमांक : 1349) में, तथा अहमद ने (2/160) में अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- की हदीस से रिवायत किया है।

चौथा: ''सुब्हानल्लाह, वल-हम्दु लिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर'' पच्चीस बार कहना। [52] इसे तिरमिज़ी ने, किताबुद द'अवात, अध्याय: सोने से पहले तस्बीह, तकबीर और तहमीद के बारे में, (हदीस संख्या : 3413) में, और नसाई ने, किताब अस-सहव, अध्याय: तस्बीह की संख्या का एक और प्रकार, (हदीस संख्या : 1351) में, तथा अहमद ने (5/184) में ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है। इसी तरह नसाई ने किताब अस-सहव, अध्याय: तस्बीह की संख्या का एक और प्रकार, (हदीस संख्या : 1352) में इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से रिवायत किया है।

इसी तरह उसे आयतुल कुर्सी भी पढ़ेनी चाहिए और यह सूरतें भीः "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है" [सूरा इख़्लास़: 1] , "(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।" सूरा अल-फ़लक़: 1 और "(ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।" [सूरा अन्-नास: 1]

सह्व (विस्मृति) के सज्दे के अहकाम

सजदा-ए-सह्व के तीन कारण होते हैं: ज़्यादा करना, कमी करना, और संदेह होना।

अधिकताः

उदाहरण के लिए: कोई व्यक्ति अपनी नमाज़ में रुकू'अ बढ़ा दे, यानी एक रकात में दो बार रुकूअ करे, या सजदा बढ़ा दे और तीन बार सजदा करे, या क़याम (खड़ा होना) बढ़ा दे और चार रकात की नमाज़ में पाँचवीं रकात के लिए खड़ा हो जाए, फिर उसे याद आए और वह वापस लौट आए।

तो अगर यह सजदा-ए-सह्व इस कारण से हो, तो सजदा सलाम के बाद होगा, अर्थात: आप तशह्हुद पढ़ेंगे और सलाम फेरेंगे, फिर दो सजदे करेंगे, और सलाम फेरेंगे। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐसा ही किया जब उन्होंने पाँच रकअतें पढ़ लीं और उन्हें सलाम के बाद याद दिलाया गया तो उन्होंने सलाम के बाद सजदा किया[53]। [53] सहीह बुख़ारी, “किताबुस-सलात”, अध्याय : क़िबला के बारे में, (हदीस संख्या : 404) तथा सहीह मुस्लिम, “किताब अल-मसाजिद”, अध्याय : नमाज़ में भूल और उसके लिए सजदा, (हदीस संख्या : 572), हदीस इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से।

और यह नहीं कहा जा सकता कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यहाँ ज़रूरत के कारण सलाम के बाद सजदा किया; क्योंकि उन्हें सलाम के बाद ही पता चला। बात सही है, लेकिन हम कहते हैं कि अगर हुक्म उनके किए गए अमल से अलग होता, तो वे (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उन्हें बताते कि अगर सलाम फेरने से पहले ज़्यादा पढ़ने का पता चल जाए, तो उसके लिए सलाम से पहले सजदा कर लो। जब उन्होंने ऐसा नहीं कहा तो मालूम हुआ कि ज़्यादा पढ़ने पर सजदा-ए-सह्व सलाम के बाद होगा।

इस बात का प्रमाण यह है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ज़ोहर या अस्र की नमाज़ की दो रकअतें पढ़ने के बाद सलाम फेरा, फिर जब आपको याद दिलाया गया, तो आपने अपनी नमाज़ पूरी की, फिर सलाम फेरा, फिर दो सजदे किए, फिर सलाम फेरा। क्योंकि नमाज़ के दौरान सलाम फेरना एक अतिरिक्त कार्य था, इसलिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इसके लिए सलाम के बाद सजदा किया। [54] इसे बुख़ारी ने किताबुस सलाह, अध्याय : मस्जिद, अंगुलियों को जोड़ने का बयान, (हदीस क्रमांक : 482) में और मुस्लिम ने किताबुल मसाजिद, अध्याय : नमाज़ में भूल और उसके लिए सजदा करने का बयान, (हदीस क्रमांक : 573) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस से वर्णित किया है। इसी तरह मुस्लिम ने पूर्वोक्त स्थान पर, (हदीस क्रमांक : 574) में इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से वर्णित किया है, सिवाय इसके कि उन्होंने कहा: "(नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने) तीन रकात में सलाम फेर दिया"।

और जैसे कि यह हदीस का तकाज़ा है, वैसे ही यह अक्ल का भी तकाज़ा है। क्योंकि अगर नमाज़ में कुछ बढ़ा दिया जाए और हम कहें कि सलाम फेरने से पहले सजदा-ए-सह्व करेगा, तो नमाज़ में दो ज़्यादतियाँ हो जाएंगी। और अगर हम कहें कि सलाम के बाद सजदा करेगा, तो उसमें एक ही ज़्यादती होगी जो भूलवश हुई है।

कमी

इसके लिए सजदा-ए-सह्व सलाम से पहले होगा, जैसे: अगर कोई भूलवश तशह्हुद-ए-अव्वल छोड़ कर खड़ा हो जाए या सजदे में 'सुब्हान रब्बियल अ'ला' कहना भूल जाए, या रुकू में 'सुब्हान रब्बियाल अज़ीम' कहना भूल जाए, तो वह सलाम फेरने से पहले सजदा-ए-सह्व करेगा; क्योंकि इस स्थिति में नमाज़ में कमी रह गई है इस वाजिब को छोड़ने की वजह से, इसलिए हिकमत का तकाज़ा है कि वह सलाम फेरने से पहले सजदा-ए-सह्व करे, ताकि नमाज़ समाप्त करने से पहले इस कमी की भरपाई हो सके।

और इसके लिए प्रमाण है : अब्दुल्लाह बिन बुहैना की हदीस कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें ज़ुहर की नमाज़ पढ़ाई, और दो रकअतों के बाद बैठने के बजाय खड़े हो गए। जब नमाज़ पूरी कर ली और लोग आपके सलाम फेरने की प्रतीक्षा करने लगे, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बैठे-बैठे 'अल्लाहु अकबर' कहा और दो सजदे किए, फिर सलाम फेरा[55]। [55] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताबुल -अज़ान'', अध्याय : जिसने पहले तशह्हुद को वाजिब नहीं माना, (हदीस संख्या : 829), में, तथा सहीह मुस्लिम ने “किताबुल-मसाजिद'', अध्याय : नमाज़ में भूल और उसके लिए सजदा, (हदीस संख्या : 570) में रिवायत किया है।

ज़्यादती या कमी में संदेह:

जब संदेह हो जाए: कि चार रक'अत पढ़ी है या तीन? तो इसके दो हालात हैं:

पहली स्थिति: जब किसी एक पक्ष का ग़ालिब गुमान हो जाए, चाहे ज़्यादती का हो या कमी का। तो अपने ग़ालिब गुमान के अनुसार अमल करेगा और सलाम के बाद सह्व के सजदे करेगा, जैसा कि इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है: "जब तुममें से किसी को नमाज़ में संदेह हो जाए, तो सटीक को जानने का प्रयास करे और उसी के अनुसार नमाज़ पूरी करे। फिर सलाम फेरे और उसके बाद दो सजदे करे।" इसी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा या यह उनके कथन का अर्थ है। [56]। [56] सहीह बुख़ारी “किताबुस-सलात”, अध्याय : क़िबला की ओर रुख करना जहाँ भी हो, हदीस संख्या : 401 तथा सहीह मुस्लिम “किताबुल-मसाजिद”, अध्याय : नमाज़ में भूल और उसके लिए सज्दा, हदीस संख्या : 572, यह हदीस इब्ने मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की गयी है।

दूसरी स्थिति: जब किसी को रकातों की संख्या में वृद्धि या कमी के बारे में संदेह हो और किसी एक पक्ष पर यक़ीन न हो, तो वह यक़ीन के आधार पर -जो कि कमी है- आगे बढ़ेगा और कमी को पूरा करेगा, फिर सलाम फेरने से पहले दो सजदे करेगा। इसी तरह सुन्नत अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से आई है[57]। [57] इसे इमाम मुस्लिम ने "किताबुल-मसाजिद" के "सजदा सहव" अध्याय में (हदीस संख्या : 571) अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।

सह्व (विस्मृति) के सज्दे के कुछ अहकाम:

1- यदि नमाज़ी जान-बूझ कर नमाज़ पूरी होने से पहले सलाम फेर दे, तो उसकी नमाज़ बातिल हो जाती है।

2- यदि नमाज़ पढ़ने वाला जान-बूझकर अपनी नमाज़ में क़याम, बैठक, रुकू या सजदा अधिक कर दे, तो उसकी नमाज़ व्यर्थ हो जाती है।

3- अगर किसी ने नमाज़ के अरकान (स्तंभों) में से किसी रुक्न को छोड़ दिया, और वह तकबीर-ए-तहरीमा है, तो उसकी नमाज़ नहीं होगी, चाहे उसने इसे जान-बूझकर छोड़ा हो या भूलवश; क्योंकि उसकी नमाज़ शुरू ही नहीं हुई। और अगर छोड़ा गया रुक्न तकबीर-ए-तहरीमा के अलावा है और उसने उसे जान-बूझकर छोड़ा, तो उसकी नमाज़ बातिल हो जाएगी।

4- यदि किसी ने नमाज़ के वाजिबात (अनिवार्य कार्यों) में से किसी वाजिब को जान-बूझ कर छोड़ दिया, तो उसकी नमाज़ बातिल हो जाएगी।

5- यदि सजदा-ए-सहव सलाम के बाद हो, तो उसके बाद एक बार फिर सलाम फेरना ज़रूरी है।

सह्व (विस्मृति) के सज्दे के अहकाम का सारांश:

मसअला/ 1- नमाज़ पूरी होने से पहले सलामः

अगर नमाज़ी भूलवश नमाज़ पूरी होने से पहले सलाम फेर दे

इस स्थिति में यदि उसे लंबे समय के बाद याद आए, तो वह नमाज़ को नए सिरे से शुरू करेगा।

और यदि थोड़े समय बाद -जैसे पाँच मिनट- याद आ जाए, तो वह अपनी नमाज़ पूरी करेगा और सलाम फेरेगा।

सजदे का स्थान/ सहव के लिए सलाम के बाद दो सजदे करेगा, और दोबारा सलाम फेरेगा।

****

मसअला/ 2- नमाज़ में वृद्धि

यदि नमाज़ पढ़ने वाला अपनी नमाज़ में क़याम, या बैठक, या रुकू या सजदा अधिक कर दे

अगर ज़्यादा करने के बाद याद आए, तो उसपर सिर्फ़ सजदा-ए-सह्व करना वाजिब है।

और यदि वृद्धि के दौरान उसे याद आए, तो उस वृद्धि से वापस लौटना अनिवार्य है।

सज्दे का स्थान/ सलाम के बाद सजदा करेगा और दोबारा सलाम फेरेगा।

****

मसअला/3 - अरकान को छोड़ना अगर पहली तकबीर के अतिरिक्त नमाज़ का कोई स्तंभ भूलवश छोड़ दे,

तो यदि वह अगली रक'अत में छूटे हुए रुक्न के स्थान पर पहुँच जाए, तो पिछली रक'अत बातिल होगी और अगली रक'अत उसकी जगह ले लेगी।

और यदि वह बाद वाली रकात में उस रुक्न के स्थान पर न पहुँचे, तो उसे छोड़े गए रुक्न के स्थान पर लौटना अनिवार्य है, और उसे और उसके बाद का काम पूरा करेगा। सजदा करने का स्थान/ दोनों स्थितियों में सह्व (विस्मृति) के सज्दे करना आवश्यक है, और इसका स्थान: सलाम के बाद है।

****

मसअला/4- नमाज़ में शक़

जब रक'अतों की संख्या में संदेह हो जाए: क्या उसने दो रकात पढ़ी हैं या तीन? तो दो स्थितियों में से एक हो सकती है।

पहली स्थिति: जब उसे दोनों में से एक पक्ष पर गालिब गुमान हो जाए, तो उसी पर अमल करे और अपनी नमाज़ पूरी करे, फिर सलाम फेरे।

दूसरी स्थिति: जब उसके सामने दोनों में से कोई एक पक्ष प्रबल न हो; तो वह यक़ीन का ऐतबार करेगा, जो कि कम संख्या है, फिर नमाज़ पूरी करेगा।

सजदा करने का स्थान/ पहली स्थिति में सलाम के बाद सह्व का सजदा करेगा।

दूसरी स्थिति में, सलाम फेरने से पहले सह्व (विस्मृति) के सजदे करेगा।

****

मसअला/5- पहले तशह्हुद को भूलवश छोड़ देना।

और दूसरे वाजिबात का वही हुक्म होगा जो पहले तशह्हुद का हुक्म है।

अगर उसे याद तब आए जब वह पूरी तरह खड़ा हो चुका हो, तो वह अपनी नमाज़ जारी रखेगा और तशह्हुद के लिए वापस नहीं लौटेगा।

यदि खड़ा होने के बाद, और पूरी तरह से खड़ा होने से पहले उसे याद आ जाए, तो वह वापस लौटेगा, बैठ कर तशह्हुद पढ़ेगा और अपनी नमाज़ पूरी करेगा।

यदि उसे खड़ा होते हुए जांघों के पिंडलियों से अलग होने से पहले याद आ जाए (कि उसे तशह्हुद के लिए बैठना है), तो वह वापस बैठ जाएगा और तशह्हुद पढ़ेगा, फिर अपनी नमाज़ पूरी करेगा, और सह्व (विस्मृति) के लिए सजदा नहीं करेगा; क्योंकि उससे न कोई वृद्धि हुई है और न कोई कमी।

सज्दा करने का स्थान/ सलाम से पहले सह्व के सजदे करे गा।

तिलावत का सजदा

इसका कारण: जब कोई व्यक्ति ऐसी आयत से गुज़रे जिसमें सजदा है, - और क़ुरआन ए करीम में मौजूद सजदे ज्ञात हैं, और यह मुसहफ़ के हाशिये में चिन्हित हैं-। जब कोई व्यक्ति सजदे वाली आयत से गुज़रे तो उसके हक में यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि वह सजदा करे। बल्कि कुछ उलमा ने कहा है कि तिलावत का सजदा वाजिब है। लेकिन सही यह है कि यह वाजिब नहीं है; क्योंकि अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने एक दिन जुमा के खुत्बे में सूरा नह्ल की सजदा वाली आयत पढ़ी और सजदा किया, फिर दूसरी जुमा में इसे पढ़ा और सजदा नहीं किया, फिर उन्होंने कहा: ''अल्लाह ने हम पर सजदा अनिवार्य नहीं किया, सिवाय इसके कि हम स्वयं चाहें।'' [58] यहां पर अपवाद लगातार नहीं हैं यानी उमर रज़ियल्लाहु अनहु की बात 'इल्ला अन-नशा' का अर्थ है; कि अगर हम चाहें तो सजदा करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि यदि हम चाहें तो अल्लाह तआला इसे हम पर फर्ज़ कर देगा; क्योंकि फर्ज़ होना हमारी इच्छा पर आधारित नहीं है। और उमर रज़ियल्लाहु अनहु ने सहाबा की मौजूदगी में ऐसा किया और किसी ने उनका विरोध नहीं किया, जबकि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम गलत चीज़ों का विरोध करने में बड़े तत्पर थे। अतः इस महान सभा में सहाबा का खलीफ ए राशिद उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अनहु के इस कार्य पर सहमति जताना, यह दर्शाता है कि तिलावत का सजदा वाजिब नहीं है, और यही सही है, चाहे यह तिलावत नमाज़ में हो या नमाज़ के बाहर। [58] इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने “किताब सुजुदुल-क़ुरआन'', अध्याय : जो यह मानता है कि अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल ने सजदा वाजिब नहीं किया, में रिवायत किया है, हदीस संख्या : 1077 ।

तिलावत के सजदे का तरीक़ा:

तकबीर कहेगा और -नमाज़ के सजदे की तरह- सात अंगों पर सजदा करेगा और कहेगा: «سُبْحَانَ رَبِّيَ الَأعْلَى» (मैं अपने उच्च रब की पाकी बयान करता हूँ), «سُبْحَانَكَ الْلَّهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، الْلَّهُمَّ اغْفِرْ لِي» (मैं तेरी पाकी बयान करता हूँ, हे अल्लाह हमारे रब, तेरी प्रशंसा के साथ, हे अल्लाह, मुझे क्षमा कर), और यह प्रसिद्ध दुआ भी पढ़े: "ऐ अल्लाह! मैंने तुझे सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तुझपर भरोसा किया। मेरा चेहरा अल्लाह के लिए सजदे में गया, जिसने उसे पैदा किया और उसे आकृति दी, तथा अपने सामर्थ्य एवं शक्ति से उसमें सुनने और देखने के अंग बनाए। ऐ अल्लाह! तू अपने यहाँ मेरे लिए इस सजदे का प्रतिफल लिख ले, इसके बदले में मेरा गुनाह मिटा दे, इसे अपने यहाँ मेरा कोश बना दे और इसे मेरी ओर से उसी तरह ग्रहण कर ले, जैसे तूने अपने बंदे दाऊद की ओर से ग्रहण किया था।" [59] फिर बिना तकबीर और सलाम के खड़ा हो जायेगा (सजदा समाप्त करेगा)। [59] सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 771 तथा सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 760।

परन्तु जब नमाज़ में यह सजदा करे, तो सजदा करते समय "अल्लाहु अकबर" कहेगा, और सिर उठाते समय भी "अल्लाहु अकबर" कहेगा; क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ का वर्णन करने वाले सभी लोग बताते हैं कि वे जब भी सिर उठाते और झुकते, तो "अल्लाहु अकबर" कहते थे। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ में तिलावत के सजदे करते थे, जैसा कि अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़े ईशा में "जब आकाश फट जाएगा।" [सूरा अल-इंशिक़ाक़: 1], यह सूरत पढ़ी तो सजदा किया [61] [60] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताब अल-अज़ान'' अध्याय : इतमामुत-तकबीर फ़िर-रुकू'अ, (हदीस संख्या : 785) में, तथा इमाम मुस्लिम ने “किताबुस-सलाह'' अध्याय : इस़बातुत-तकबीर फ़ी कुल्लि ख़फ़्ज़ व रफ़'अ, (हदीस संख्या : 392) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है। [61] इसे इमाम बुखारी ने सहीह बुख़ारी, किताबुल अज़ान, अध्याय : इशा की नमाज़ में सूरा सजदा की तिलावत (हदीस क्रमांक : 768) में, और इमाम मुस्लिम ने सहीह मुस्लिम, किताबुल मसाजिद, अध्याय: सजदे की तिलावत (हदीस क्रमांक : 578) में रिवायत किया है।

जो लोग नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नमाज़ में तकबीर का वर्णन करते हैं, वे इससे सजदा-ए-तिलावत को अलग नहीं करते। इससे यह सिद्ध होता है कि नमाज़ में सजदा-ए-तिलावत नमाज़ के मूल सजदे के समान है, कि सजदा करते और सजदे से सिर उठाते समय तकबीर कहेगा।

इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि सजदा आखिरी आयत पर हो (तिलावत के अंत में) या तिलावत के दौरान, सजदा करते समय तकबीर कहेगा और उठते समय भी तकबीर कहेगा। फिर रुकू'अ के लिए झुकते समय तकबीर कहेगा। दो तकबीरों के लगातार होने में कोई हर्ज नहीं; क्योंकि दोनों के कारण अलग-अलग हैं।

और जो कुछ लोग करते हैं जब नमाज़ में सजदा की आयत पढ़ते हैं और सजदा करते हैं, तो सजदे के लिए तकबीर कहते हैं लेकिन उठने के लिए नहीं, तो मुझे इसका कोई आधार नहीं मालूम। सजदा-ए-तिलावत से उठते समय तकबीर कहने के बारे में जो मतभेद है, वह केवल उस सजदे के बारे में है जो नमाज़ के बाहर होता है। लेकिन अगर सजदा नमाज़ के दौरान हो, तो उसे नमाज़ के सजदे का हुक्म दिया जाएगा, यानी सजदा करते समय तकबीर कहेगा और सजदे से उठते समय भी तकबीर कहेगा।

यात्री की नमाज़ और उसका रोज़ा

यात्री की नमाज़ दो रक'अतें है जब से वह अपने शहर से निकले यहां तककि वापस आ जाए; क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने कहा: "जब सबसे पहले नमाज़ फ़र्ज़ की गई तो दो रकअतें फ़र्ज़ की गई, फिर सफर की नमाज़ अपनी असली हालत में क़ायम रखी गई और घर (गैर सफर की हालत) की नमाज़ को पूरा किया गया।"[62] एक अन्य रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं : "घर की नमाज़ में इज़ाफ़ा किया गया" [63]। [62] इसे इमाम बुख़ारी ने किताबुत-तक़्सीर, बाबः यक़सुरु इज़ा ख़रज मिन मौज़ि'इह, (हदीस नंबर 1090) में और मुस्लिम ने किताबु सलातिल-मुसाफिरीन व क़सरिहा, (हदीस नंबर 685/3) में रिवायत किया है। [63] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताुस-सलात'', अध्याय : कैसे इसरा में नमाज़ फर्ज़ की गई?, हदीस संख्या : 350 में और इमाम मुस्लिम ने “किताबु सलातिल-मुसाफिरीन व क़सिरहा'', हदीस संख्या : 685/1 में रिवायत किया है।

अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : "हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मदीना से मक्का तक गये, तो आपने दो दो रकअत नमाज़ पढ़ी, यहां तक कि हम मदीना लौट आये।" [64] [64] इसे बुख़ारी ने किताबुत-तक़्सीर, बाब मा जा फ़ित-तक़्सीर, (हदीस नंबर 1081) में, और मुस्लिम ने किताबु-सलातिल-मुसाफिरीन व क़सिरहा, (हदीस नंबर 693) में रिवायत किया है।

लेकिन अगर वह किसी पूरी नमाज़ पढ़ने वाले इमाम के साथ नमाज़ पढ़े तो चार रक्अतें पढ़ेगा, चाहे उसे पूरी नमाज़ मिली हो या उसका कुछ हिस्सा छूट गया हो; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आम फ़रमान है: "जब तुम इक़ामत की आवाज़ सुनो तो नमाज़ के लिए सुकून और गंभीरता के साथ चलो, और जल्दी न करो। फिर जितनी नमाज़ इमाम के साथ मिले पढ़ो, और जो छूट जाए उसे पूरा कर लो।" [65] यहाँ आप के इन शब्दों: «जो तुम पाओ, उसे पढ़ो और जो छूट जाए, उसे पूरा करो» की सामान्य बात में वे यात्री भी शामिल हैं जो चार रक'अत पढ़ने वाले इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ता है और अन्य लोग भी शामिल हैं। अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से पूछा गया: यात्री दो रकअत क्यों पढ़ता है जब अकेला होता है, और चार रकात क्यों पढ़ता है जब मुक़ीम के पीछे नमाज़ पढ़ता है? तो उन्होंने कहा: «यही सुन्नत है»[66]. [65] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताब अल-अज़ान'', अध्याय : 'नमाज़ के लिए दौड़कर न जाना', (हदीस संख्या 636) में, और 'आदमी का कहना: हमारी नमाज़ छूट गई', (हदीस संख्या 635) में, और इमाम मुस्लिम ने “किताब अल-मसाजिद'', अध्याय : 'नमाज़ को संजीदगी और सुकून के साथ अदा करने का सुन्नत होना', (हदीस संख्या 602, 603) में, अबू हुरैरा और अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से रिवायत किया है, और यह अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के शब्द हैं। [66] इसे इमाम अहमद ने ''मुसनद'' (1/216) में वर्णन किया है।

और मुसाफ़िर से भी जमाअत की नमाज़ माफ़ नहीं होती; क्योंकि अल्लाह तआला ने युद्ध की स्थिति में भी इसका हुक्म दिया है, फ़रमाया : "तथा (ऐ नबी!) जब आप (युद्ध के मैदान में) उनके साथ मौजूद हों और उनके लिए नमाज़ क़ायम करें, तो उनका एक गिरोह आपके साथ खड़ा हो जाए और वे अपने हथियार लिए रहें और जब वे सजदा कर लें (नमाज़ पूरी करलें), तो तुम्हारे पीछे हो जाएँ तथा दूसरा गिरोह आए, जिसने नमाज़ नहीं पढ़ी है और वे तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़े..." [सूरा अन-निसा : 102] पूरी आयत देखें।

और इस आधार पर, यदि कोई मुसाफिर अपने शहर से बाहर किसी अन्य स्थान पर हो, तो उसपर वाजिब है कि वह मस्जिद में जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने के लिए उपस्थित हो, यदि वह अज़ान सुनता है, सिवाय इसके कि वह दूर हो या उसे अपने साथियों के छूट जाने का डर हो; क्योंकि अज़ान या इक़ामत सुनने वाले पर जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की अनिवार्यता पर आम प्रमाण मौजूद हैं।

जहां तक नफ़्ल नमाज़ों का सवाल है, तो यात्री ज़ुहर, मग्रिब और इशा की रातिब (मुअक्कद) सुन्नतों के अलावा सभी नफ़्ल नमाज़ें पढ़ सकता है। वित्र, तहज्जुद, चाश्त की नमाज़, फ़ज्र की सुन्नत और अन्य नफ़्ल नमाज़ें जो रातिब (मुअक्कद) में शामिल नहीं हैं, पढ़ सकता है।

अगर सफर में हो, तो बेहतर है कि ज़ुहर और अस्र की नमाज़ को, और मग़रिब और इशा की नमाज़ को एक साथ पढ़े, चाहे जमअ तक़दीम करे या जमअ ताखीर, जो उसके लिए आसान हो। और जो आसान हो, वही बेहतर है। अगर ठहरा हुआ हो, तो बेहतर है कि नमाज़ों को अलग-अलग पढ़े, लेकिन अगर मिलाकर पढ़े तो कोई हर्ज नहीं; क्योंकि दोनों तरीक़े अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सही सूत्र से साबित हैं।

रमज़ान में मुसाफिर का रोज़ा रखना बेहतर है, लेकिन यदि वह रोज़ा तोड़ दे तो कोई हर्ज नहीं है। उसे उन दिनों की गिनती पूरी करनी होगी, जिनमें उसने रोज़ा नहीं रखा, सिवाय इसके कि रोज़ा न रखना उसके लिए आसान हो, तो रोज़ा न रखना बेहतर है। क्योंकि अल्लाह तआला चाहता है कि उसकी दी हुई छूटों को अपनाया जाए। और सब प्रशंसा अल्लाह, सारे जहानों के रब के लिए है।

लेख: मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन

5/12/1409 हिजरी

विमान में यात्रा करने वाला कैसे नमाज़ पढ़े?

1- नफ़ल नमाज़ हवाई जहाज़ में अपनी सीट पर बैठकर पढ़ सकता है, चाहे हवाई जहाज़ का मुँह जिधर भी हो। रुकू और सजदा इशारे से करे, और सजदा को अधिक झुककर करे।

2- फ़र्ज़ नमाज़ हवाई जहाज़ में तभी पढ़ सकता है जब वह पूरी नमाज़ के दौरान क़िबला की दिशा में रह सके, और रुकूअ, सजदा, क़याम (खड़ा होना) और क़ुऊद (बैठक) भी कर सके।

3- यदि वह ऐसा करने में सक्षम न हो, तो वह नमाज़ को तब तक विलंबित करेगा जब तक कि वह नीचे नहीं उतर जाता, और फिर ज़मीन पर नमाज़ पढ़ेगा। यदि उसे समय निकल जाने का डर हो, तो वह नमाज़ को दूसरी नमाज़ के समय तक विलंबित कर देगा, यदि यह उन नमाज़ों में से है जिन्हें एक साथ पढ़ा जा सकता है, जैसे कि ज़ुहर के साथ अस्र, और मग़रिब के साथ इशा। यदि उसे दूसरी नमाज़ का समय भी निकल जाने का डर हो, तो वह दोनों नमाज़ें हवाई जहाज़ में ही समय निकलने से पहले पढ़ लेगा, और नमाज़ की शर्तों, स्तंभों एवं अनिवार्य कार्यों में जितने का पालन कर सकेगा, करेगा।

उदाहरण के लिए, यदि विमान सूर्यास्त से पहले उड़ान भरता है, और उसके आकाश में रहते हुए सूर्यास्त हो जाता है; तो वह मग़रिब की नमाज़ नहीं पढ़ेगा जब तक कि विमान हवाई अड्डे पर उतर न जाए, और वह ज़मीन पर न आ जाए, फिर वह मग़रिब की नमाज़ पढ़ेगा। यदि उसे मग़रिब का समय निकल जाने का डर हो; तो वह उसे इशा के समय तक विलंबित कर सकता है, और उतरने के बाद दोनों नमाज़ें एक साथ जमअ ताख़ीर के रूप में पढ़ेगा। यदि उसे इशा का समय निकल जाने का डर हो - जो कि आधी रात तक होता है - तो वह समय निकलने से पहले विमान में ही दोनों नमाज़ें पढ़ लेगा।

4- हवाई जहाज में फर्ज़ नमाज़ पढ़ने का तरीका: खड़ा हो, क़िबला की ओर रुख करे, फिर "अल्लाहु अकबर" कहे, सूरा फ़ातिहा पढ़े और उससे पहले की दुआ-ए-इस्तिफ़ताह या (यानी और) उसके बाद क़ुरआन का जो हिस्सा पढ़ना सुन्नत है, पढ़े। फिर रुकू करे, फिर रुकू से उठे और स्थिर होकर खड़ा हो, फिर सजदा करे, फिर सजदे से उठे और स्थिर होकर बैठे, फिर दूसरा सजदा करे, फिर अपनी शेष नमाज़ में भी ऐसा ही करे।

यदि सजदा करने की क्षमता न हो, तो बैठकर नमाज़ पढ़े और बैठे बैठे सजदे का इशारा करे। और अगर क़िबला का ज्ञान न हो और कोई विश्वसनीय व्यक्ति उसे क़िबला के बारे में बता भी न सके, तो वह अपनी समझ और प्रयास के अनुसार दिशा का निर्धारण करे और उसी दिशा में नमाज़ पढ़े।

5- यात्री की नमाज़ हवाई जहाज़ में क़स्र के साथ होगी, इसलिए वह चार रकअत वाली नमाज़ को दो रकअत पढ़ेगा; जैसे अन्य यात्री पढ़ते हैं।

विमान में यात्रा करने वाला व्यक्ति कैसे हज और उमरे का इहराम बाँधे?

1- वह अपने घर में स्नान करे, और अपने सामान्य वस्त्रों में रहे, तथा यदि चाहे तो एहराम के वस्त्र पहन ले।

2- जब विमान मीक़ात के समीप पहुंचे, तो वह इहराम के कपड़े पहने, अगर उसने पहले से नहीं पहने हैं।

3- जब विमान मीकात के समकक्ष हो; तो इबादत (हज या उमरे) में प्रवेश की नीयत करे, और हज या उमरा जिसकी नीयत की हो, उसके अनुसार तलबिया पुकारे।

4- अगर कोई भूल जाने या ग़ाफ़िल हो जाने के डर से एहतियात के तौर पर मीकात के पास पहुँचने से पहले ही एहराम बाँध ले (एहराम की नीयत कर ले), तो इसमें कोई हर्ज नहीं है।

इन शब्दों को मुहम्मद सालिह अल-उसैमीन ने लिखा है।

2/5/1409 हिजरी को, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो सारे जहानों का पालनहार है।

मरज़; और मरीज़ को क्या ध्यान में रखना चाहिए

बीमारी: स्वास्थ्य में कमी, और शरीर का प्राकृतिक संतुलन से बाहर निकलना।

बीमार व्यक्ति को चाहिए कि कुछ बातों का ध्यान रखे:

1. यह विश्वास रखना कि जो कुछ भी उसे पहुंचा है, वह अल्लाह के निर्णय और तक़दीर के अनुसार है। क्योंकि उसके महान रब ने इसे निर्धारित किया है, और वही उसका सृष्टिकर्ता और मालिक है। इस विश्वास से दिल को संतोष प्राप्त होता है, और वह राज़ी होकर समर्पण कर देता है।

दूसरा: इस बात पर विश्वास रखना कि यह सब कुछ लिखा हुआ था और लिखे हुए में कोई बदलाव संभव नहीं है।

3- इस पर धैर्य रखना; क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा धैर्य रखो, निःसंदेह अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है।" [सूररा अल-अनफ़ाल : 46]

4- अपने दिल को अपने रब से जोड़े और उससे आसानी व राहत की प्रतीक्षा करे, क्योंकि हदीस कुदसी में अल्लाह तआला ने फरमाया: "मैं अपने बंदे के मेरे प्रति गुमान के अनुसार हूँ।" [67] तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : "और जान लो कि राहत आपदा के साथ (संयुक्त) है, और निश्चय कठिनाई के साथ आसानी भी (संयुक्त) है।"[68] [67] यह हदीस सहीह बुख़ारी, किताबुत-तौहीद में, अल्लाह तआला के कथन: ﴾وَيُحَذِّرُكُمُ ٱللَّهُ نَفۡسَهُۥ ﴿ के बाब में, हदीस संख्या : 7405 के तहत, तथा सहीह मुस्लिम, किताबुज़-ज़िक्र वद-दु'आ में, अल्लाह तआला के ज़िक्र पर प्रोत्साहन के बाब में, हदीस संख्या : 2675, के तहत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है। [68] मुसनद-ए-अहमद 1/307, वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- हैं।

5- अपने खाली समय का लाभ उठाते हुए अल्लाह का अधिकाधिक ज़िक्र, क़ुरआन की तिलावत, तौबा और इस्तिग़फ़ार करे।

6- अपनी बीमारी की शिकायत किसी से न करे, सिवाय अपने सृष्टिकर्ता के, जो उसकी बीमारी को दूर करने की शक्ति रखता है। हाँ, बीमारी की जानकारी देने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन शिकायत के रूप में नहीं।

7. अल्लाह तआला की सेहत की नेमत के महत्व को पहचाने, और अपने बीमार भाइयों पर रहम करे।

8. यह जानना कि रोग के कारण अल्लाह तआला पापों को लुप्त करता है और गुनाहों को मिटाता है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित है कि उन्होंने कहा: "किसी मुसलमान को कोई कष्ट पहुँचती है, बीमारी के रूप में हो या किसी अन्य रूप में, तो अल्लाह उसके कारण उसके गुनाह उसी तरह गिरा देता है, जिस तरह पेड़ से पत्ते झड़ते हैं।" [69] तथा यह भी कथन आप से साबित है : "मुसलमान को जो भी आपदा पहुँचती है, तो उसके ज़रिए अल्लाह उससे मिटा देता है।"[70] यानी उसके गुनाहों को मिटा देता है। [69] इसे बुख़ारी ने "किताबुल-मरज़ा" में, अध्याय : "वज़अ अल-यद 'अलल-मरीज़", हदीस संख्या : 5660 के तहत, तथा मुस्लिम ने "किताबुल-बिर्र वस-सिलह" में, अध्याय : "सवाबुल-मु'मिन फीमा युसीबुह", हदीस संख्या : 2571 के तहत, हज़रत इब्न मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। [70] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताबुल-मरज़ा'' अध्याय : बीमारी के कफ्फारा के बारे में, हदीस संख्या : 5640 में, तथा इमाम मुस्लिम ने “किताबुल-बिर्र वस-सिलह'' अध्याय : "सवाबुल-मु'मिन फीमा युसीबुह", हदीस संख्या : 2572 में हज़रत आ'इशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है।

बीमार व्यक्ति कैसे तहारत हासिल करेगा?

1- बीमार व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह पानी से पवित्रता प्राप्त करे, 'हदस-ए-असग़र' से वुज़ू करे, और 'हदस-ए-अकबर' से स्नान करे।

2- यदि वह पानी से पवित्रता प्राप्त करने में असमर्थ हो; अपनी अक्षमता के कारण, या बीमारी बढ़ने के डर से, या उसके ठीक होने में देरी के कारण; तो वह तयम्मुम करेगा।

3- तयम्मुम का तरीक़ा यह है कि अपने दोनों हाथों को पवित्र ज़मीन पर एक बार मारे, फिर दोनों हाथों से पूरे चेहरे का मसह करे, और फिर दोनों हथेलियों का एक दूसरी से मसह करे।

4- यदि वह स्वयं से पवित्रता प्राप्त करने में असमर्थ हो; तो कोई अन्य व्यक्ति उसे वुज़ू या तयम्मुम कराएगा।

5- यदि वुज़ू के किसी अंग पर घाव हो, तो उसे पानी से धोए। यदि पानी से धोने पर घाव पर असर पड़ता हो, तो उसपर मसह करे। इसके लिए हाथ को पानी से गीला कर उसपर फेर ले। यदि मसह करने से भी असर पड़ता हो, तो उसके लिए तयम्मुम कर ले।

6- अगर उसके किसी टूटे हुए अंग पर प्लास्टर या पट्टी बंधी हो, तो उसे धोने के बजाय उसपर पानी से मसह करेगा। तयम्मुम की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मसह धोने का विकल्प है।

7- यह जायज़ है कि तयम्मुम दीवार पर या किसी अन्य पवित्र वस्तु पर (हाथ मार कर) करे जिसमें धूल हो। यदि दीवार पर कोई ऐसी चीज़ लगी हो जो धरती के तत्व से न हो, जैसे पेंट, तो उस पर तयम्मुम न करे, सिवाय इसके कि उसमें धूल हो।

8- यदि धरती, या दीवार या किसी अन्य धूलयुक्त वस्तु पर तयम्मुम करना संभव न हो, तो कोई हर्ज नहीं कि किसी बर्तन या रूमाल में मिट्टी रखी जाए और उससे तयम्मुम किया जाए।

9- यदि उसने एक नमाज़ के लिए तयम्मुम किया, और उसकी पवित्रता दूसरी नमाज़ के समय तक बनी रही; तो वह पहले तयम्मुम से दूसरी नमाज़ पढ़ेगा, और दूसरी नमाज़ के लिए तयम्मुम नहीं दोहराएगा; क्योंकि उसकी पवित्रता बाक़ी है, और उसे खत्म करने वाली कोई चीज़ नहीं पाई गई। और यदि उसने जनाबत के लिए तयम्मुम किया; तो वह इसके लिए तयम्मुम नहीं दोहराएगा जब तक कि उसे दूसरी जनाबत न हो, लेकिन इस अवधि में छोटे हदस के लिए तयम्मुम करेगा।

10- बीमार व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने शरीर को गंदगी से पाक करे, अगर वह ऐसा नहीं कर सकता तो अपनी स्थिति में नमाज़ पढ़े, और उसकी नमाज़ सही होगी, और उसे नमाज़ दोहराने की ज़रूरत नहीं।

11- बीमार व्यक्ति पर अनिवार्य है कि वह पाक वस्त्र पहनकर नमाज़ पढ़े। यदि उसके वस्त्र अपवित्र हो जाएँ, तो उन्हें धोना या पाक वस्त्रों से बदलना वाजिब है। यदि यह संभव न हो, तो वह अपनी स्थिति में ही नमाज़ पढ़ेगा और उसकी नमाज़ सही होगी, और उसे दोबारा पढ़ने की आवश्यकता नहीं।

12- बीमार व्यक्ति को किसी पवित्र वस्तु पर ही नमाज़ पढ़नी होगी। यदि उसका स्थान अपवित्र हो जाए, तो उसे धोना या किसी पवित्र वस्तु से बदलना आवश्यक होगा, या उस पर कोई पवित्र वस्त्र बिछाना पड़ेगा। यदि यह संभव न हो, तो वह उसी स्थिति में नमाज़ पढ़ेगा, और उसकी नमाज़ सही मानी जाएगी, और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं होगी।

13- बीमार व्यक्ति के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह पवित्रता में असमर्थता के कारण नमाज़ को उसके समय से विलंबित करे। बल्कि जितना संभव हो सके उतनी पवित्रता प्राप्त करे, फिर समय पर नमाज़ पढ़े, चाहे उसके शरीर, कपड़े या स्थान पर ऐसी नजासत हो जिसे वह हटाने में असमर्थ हो। अल्लाह तआला ने फरमाया: "अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके..." [सूरा अत-तग़ाबुन : 16]

इन शब्दों को अल्लाह के मुहताज मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन ने लिखा है।

9/1/1403 हिजरी

बीमार कैसे नमाज़ पढ़े?

1- रोगी के लिए अनिवार्य है कि वह फ़र्ज़ नमाज़ खड़ा होकर पढ़े, चाहे आगे की ओर झुका हुआ हो या दीवार या छड़ी का सहारा लेना पड़े।

2- यदि खड़ा होने की क्षमता न हो तो बैठकर नमाज़ पढ़े, और बेहतर यह है कि खड़ा होने और रुकूअ की जगह पर चौकड़ी मारकर बैठे।

3- अगर वह बैठकर नमाज़ पढ़ने की क्षमता नहीं रखता, तो पहलू के बल लेटकर क़िबला की तरफ़ रुख करके नमाज़ पढ़े, और दायां पहलू बेहतर है। अगर क़िबला की तरफ़ रुख करने की भी क्षमता न हो, तो जिस दिशा में हो, उसी में नमाज़ पढ़े। उसकी नमाज़ सही होगी और उसे दोबारा पढ़ने की ज़रूरत नहीं।

अगर वह पहलू के बल लेटकर नमाज़ नहीं पढ़ सकता, तो पीठ के बल लेटकर नमाज़ पढ़े, इस अवस्था में कि उसके पैर क़िबला की ओर हों। अगर वह अपने पैरों को क़िबला की ओर नहीं कर सकता, तो जिस दिशा में हों, उसी दिशा में नमाज़ पढ़े और उसे नमाज़ दोहराने की ज़रूरत नहीं।

5- बीमार व्यक्ति को अपनी नमाज़ में रुकू और सजदा करना होगा। अगर वह ऐसा करने में असमर्थ हो, तो सिर से इशारा करे और सजदा को रुकू से अधिक झुककर करे। अगर वह रुकू कर सकता हो लेकिन सजदा नहीं, तो रुकू की स्थिति में रुकू करे और सजदा के लिए सिर से इशारा करे। अगर वह सजदा कर सकता हो लेकिन रुकू नहीं, तो सजदा की स्थिति में सजदा करे और रुकू के लिए सिर से इशारा करे।

6- यदि वह रुकूअ और सजदा में सिर से इशारा करने में असमर्थ हो, तो अपनी आँखों से इशारा करे। रुकूअ के लिए थोड़ा आँखें बंद करे और सजदा के लिए अधिक बंद करे। जहाँ तक उंगली से इशारा करने की बात है, जैसा कि कुछ बीमार लोग करते हैं, तो यह सही नहीं है। मुझे इसके लिए न तो किताब और सुन्नत में और न ही विद्वानों के कथनों में कोई आधार मालूम है।

7- यदि वह सिर से इशारा करने या आँखों से संकेत करने में असमर्थ हो, तो दिल से नमाज़ पढ़े। "अल्लाहु अकबर" कहे और दिल में पढ़े, और रुकूअ, सजदा, खड़े होने और बैठने की नीयत दिल में करे। हर व्यक्ति को वही मिलेगा जिसकी उसने नीयत की।

8- बीमार व्यक्ति पर आवश्यक है कि वह हर नमाज़ को उसके समय पर पढ़े, और उसमें (नमाज़ में) जितना कर सके उतना करे। अगर हर नमाज़ को उसके समय पर पढ़ना उसके लिए मुश्किल हो, तो उसके लिए जायज़ है कि वह ज़ुहर और अस्र की नमाज़ को जमा कर ले, और मग़रिब और इशा की नमाज़ को जमा कर ले। या तो जमअ तक़दीम के तौर पर, जिसमें अस्र को ज़ुहर के साथ और इशा को मग़रिब के साथ पढ़े, या जमअ ताखीर के तौर पर, जिसमें ज़ुहर को अस्र के साथ और मग़रिब को इशा के साथ विलंब कर पढ़े, जैसा उसके लिए आसान हो। लेकिन फज्र की नमाज़ को न उसके पहले की नमाज़ के साथ और न उसके बाद की नमाज़ के साथ जमा किया जा सकता है।

9- यदि कोई बीमार व्यक्ति अपने देश से बाहर इलाज के लिए यात्रा कर रहा हो, तो वह चार रकअत वाली नमाज़ों को क़स्र करेगा। वह ज़ुहर, अस्र और इशा की नमाज़ें दो-दो रकअत पढ़ेगा, जब तक कि वह अपने देश वापस न लौट आए, चाहे उसकी यात्रा की अवधि लंबी हो या छोटी।

बीमार कैसे रोज़ा रखे?

1- बीमार व्यक्ति के लिए रोज़ा रखने की तीन हालतें हैं:

पहली हालत: रोज़ा रखना उसके लिए कठिन न हो और न ही उसे हानि पहुँचाए; तो उस पर रोज़ा रखना अनिवार्य है।

दूसरी हालत: रोज़ा रखना कठिन हो जाए; तो उसके लिए रोज़ा रखना मकरूह है; क्योंकि उसने अल्लाह की दी हुई रुख़्सत (छूट) को स्वीकार नहीं किया।

तीसरी हालत: रोज़ा उसे नुक़सान पहुँचाए; तो उस पर रोज़ा रखना हराम है, और रोज़ा रखने पर वह गुनाहगार होगा; अल्लाह तआला का यह फ़रमान है: "तथा अपने आपको क़त्ल न करो। निःसंदेह अल्लाह तुमपर अति दयावान है।" [सूरा अन-निसा : 29], तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : ''निश्चय तुम्हारे नफ़्स का भी तुम पर हक़ है।'' यह एक लंबी हदीस का अंश है जिसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है[71]। [71] सहीह बुख़ारी, किताबुत-तहज्जुद, हदीस संख्या : 1153, तथा सहीह मुस्लिम, किताब अल-सियाम, बाब : दहर के रोज़े से मना करने के बारे में, हदीस संख्या : 1159/182-186, इस हदीस के वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं।

2- बीमार व्यक्ति को चाहिए कि जब अल्लाह तआला उसे शिफ़ा दे, तो वह अपने रोज़े की क़ज़ा कर ले, और उसे दूसरे रमज़ान तक न टाले।

3- यदि वह भविष्य में रोज़े की क़ज़ा नहीं कर सकता; क्योंकि उसकी बीमारी ऐसी है जिसके ठीक होने की संभावना न हो; तो रमज़ान में हर दिन के बदले एक ग़रीब को खाना खिलाए, महीने के दिनों की संख्या के अनुसार, चाहे हर दिन के बदले हर दिन, या महीने के आखिरी दिन में, इस तरह से कि वह महीने के दिनों की संख्या के अनुसार ग़रीबों को खाना खिला दे, या हर दस दिन के बाद दस ग़रीबों को खाना खिलाए।

4- यदि रमज़ान के बाद मरीज़ ठीक हो जाए, और रोज़ा रख सकता हो, लेकिन उसने रोज़ा नहीं रखा और मर गया; तो उसका वली (करीबी रिश्तेदार) उसकी तरफ़ से रोज़ा रखेगा, यदि वह ऐसा नहीं करता; तो उसकी विरासत से हर दिन के लिए एक मिस्कीन को खाना खिलाया जाएगा, और यदि उसका वली स्वेच्छा से खाना खिला दे; तो भी कोई हर्ज नहीं।

नफ़ल नमाज़

नफ़ल नमाज़ की फ़ज़ीलत:

अल्लाह की दया का एक पहलू यह है कि उसने हर प्रकार की फ़र्ज़ इबादत के लिए एक नफ़्ल इबादत निर्धारित की है। नमाज़ के लिए नफ़्ल नमाज़ें हैं जो फ़र्ज़ ही की तरह होती हैं, ज़कात के लिए नफ़्ल सदक़ात हैं जो ज़कात की तरह होती हैं, रोज़े के लिए नफ़्ल रोज़े हैं जो फर्रज़ ही की तरह होते हैं, और इसी तरह हज के लिए भी। यह अल्लाह की दया है ताकि बंदे अधिक सवाब और अल्लाह के करीब हो सकें, और फ़र्ज़ में होने वाली कमी को पूरा कर सकें; क्योंकि क़यामत के दिन नफ़्ल इबादतों से फ़र्ज़ इबादतों की पूर्ति की जाएगी।

कुछ नफ़ल नमाज़ें इस प्रकार हैं:

1- फ़र्ज़ नमाज़ों के साथ जुड़ी हुई मुअक्कद सुन्नतें:

जोकि: ज़ुहर से पहले चार रकअत दो सलामों के साथ, जो ज़ुहर की नमाज़ का समय शुरू होने के बाद पढ़ी जाएंगी, पहले नहीं, और ज़ुहर के बाद दो रकअत, तो ये कुल छह रकअतें हुईं, जो ज़ुहर की सुन्नत ए मुअक्कदा हैं। अस्र के लिए कोई सुन्नत ए मुअक्कदा नहीं है। मग्रिब की नमाज़ के बाद दो रकअत, इशा के बाद दो रकअत, और फ़ज्र से पहले दो रकअत हैं।

फ़ज्र की सुन्नत की विशेषताएं इस प्रकार हैंः

इसे हलका पढ़ना अफ़ज़ल है।

इस में यह सूरतें पढ़ी जाएंगी "(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!" [सूरा अल-काफ़िरून: 1] पहली रकअत में, और "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।" [सूरा इखलास : 1] दूसरी रकअत में, या यह आयत: "(ऐ मुसलमानो!) तुम कह दो : हम अल्लाह पर ईमान लाए और उसपर जो हमारी ओर उतारा गया..." [सूरा अल-बक़रा : 136] पहली रक्अत में, "(ऐ नबी!) कह दीजिए : ऐ किताब वालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान है..." [सूरा आल-ए-इमरान : 64] दूसरी रक्अत में।

फ़ज्र की सुन्नत की एक विशेषता यह भी है कि यह हज़र (घर) और सफर दोनों में पढ़ी जाएगी।

और इसकी बड़ी फ़ज़ीलत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसके बारे में फ़रमाया: ''फ़ज्र की दो रकअतें दुनिया और उसकी तमाम चीज़ों से उत्तम हैं।'' [72] [72] सहीह मुस्लिम, किताब: मुसाफिरों की नमाज़, अध्याय: फज्र की सुन्नत की दो रकअतों का मुस्तहब्ब होना, हदीस संख्या : 725, यह हदीस आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है।

2- वित्र की नमाज़:

यह अधिकतम महत्वपूर्ण नफ़्ल नमाजों में से है, यहाँ तक कि कुछ उलमा ने इसे वाजिब (अनिवार्य) कहा है, और इस बारे में इमाम अह़मद रह़मतुल्लाह अलैहि कहते हैं : "जिसने वित्र छोड़ दी, वह बुरा व्यक्ति है, उसकी गवाही स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।" [73] [73] देखिए : मसाइल इमाम अहमद, उनके पुत्र अबुल-फज़ल की रिवायत, (पृष्ठ : 53) संख्या : 159, शोध: तारिक़ अवज़ुल्लाह।

रात की नमाज़ का अंत वित्र से किया जाता है। अतः जिसे यह डर हो कि वह रात के अंतिम भाग में नहीं उठ पाएगा, उसे चाहिए कि सोने से पहले वित्र पढ़ ले। और जिसे यह उम्मीद हो कि वह रात के अंतिम भाग में उठ जाएगा, उसे चाहिए कि अपनी नफ़्ल नमाज़ों को समाप्त करने के बाद रात के अंतिम भाग में वित्र पढ़े। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः ''तुम लोग अपनी रात की अंतिम नमाज़, वित्र को बनाओ।'' [74] [74] इसे इमाम बुख़ारी ने किताबुल-वित्र, बाब : 'लियज'अल आख़िर सलातिही वितरन', हदीस संख्या : 998 में और मुस्लिम ने किताबु सलातिल-मुसाफिरीन, बाब : 'सलातुल-लैल मस़ना मस़ना', हदीस संख्या : 751 में इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है।

वित्र कम से कम एक रक्अत है, और सबसे अधिक: ग्यारह रकअत, और न्यूनतम पूर्णता: तीन रकअत है।

तो अगर वह तीन रकअत के साथ वित्र पढ़े, तो उसे छूट है, चाहे तो एक तशह्हुद के साथ लगातार पढ़े, और चाहे तो दो रकअत के बाद सलाम फेर दे, फिर एक रकअत पढ़े।

और अगर कोई व्यक्ति वित्र की नमाज़ भूल जाए या सो जाए, तो वह दिन में उसे जोड़ा पढ़ेगा, न कि विषम। उदारण के तौर पर अगर उसकी आदत तीन रकअत वित्र पढ़ने की है, तो वह चार रकअत पढ़ेगा, और अगर उसकी आदत पाँच रकअत वित्र पढ़ने की है, तो वह छह रकअत पढ़ेगा और इसी के अनुसार आगे भी। क्योंकि सहीह हदीस में यह प्रमाणित है कि जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नींद या बीमारी के कारण रात की नमाज़ नहीं पढ़ पाते, तो दिन में बारह रकअतें पढ़ते [75]। [75] सहीह मुस्लिम, किताबु सलातिल-मुसाफिरीन, बाब : जामेअ सलातिल-लैल, हदीस संख्या : 746, यह हदीस हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है।

3- चाश्त की नमाज़:

यह नमाज़ कम से कम दो रकअत है और ज़्यादा की कोई सीमा नहीं है; क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम चाश्त की नमाज़ चार रकअत पढ़ते थे और अल्लाह जितनी चाहता ज़्यादा करते। [76] इसे सहीह मुस्लिम में किताबु सलातिल-मुसाफिरीन, बाब : इस्तिहबाब सलातिज़-ज़ुहा, हदीस संख्या : 719 में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस से वर्णित किया है।

इसका समय: सूरज के एक नेज़े के बराबर ऊपर उठने से - यानी सूरज निकलने के लगभग पंद्रह मिनट बाद से - लेकर सूरज के ढ़लने से लगभग दस मिनट पहले तक है।

और इसके शरई होने का प्रमाण: अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है, वह कहते हैं: "मेरे परममित्र ने मुझे तीन बातों की वसीयत की है : प्रत्येक महीना तीन दिन के रोज़ा रखने, चाश्त की दो रकअत नमाज़ पढ़ने और सोने से पहले वित्र पढ़ने की" [77]। [77] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताबुत-ततव्वु'अ'', अध्याय : सलातुज़-ज़ुहा फिल-हज़र, हदीस संख्या (1178) में और मुस्लिम ने “किताबु सलातिल-मुसाफिरीन'', अध्याय : इस्तिहबाबु सलातिज़-ज़ुहा, हदीस संख्या (721) में रिवायत किया है।

और अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "हर दिन तुम्हारे हर एक जोड़ पर स़दक़ा है, (और वह इस प्रकार अदा हो सकता है कि) हर एक तसबीह एक स़दक़ा है, हर प्रशंसा स़दक़ा है, हर बार ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' कहना स़दक़ा है, हर एक तकबीर (बड़ाई बयान करना) स़दक़ा है, भलाई का आदेश देना स़दक़ा है, बुराई से रोकना स़दक़ा है, और इन तमाम कामों की ओर से चाश्त की दो रकअत नमाज़ काफ़ी है" [78]। [78] सहीह मुस्लिम, किताबु सलातिल-मुसाफिरीन, बाब: इस्तिहबाब सलातिज़-ज़ुहा, हदीस संख्या : 720।

निषिद्ध समय

वे समय जिनमें शरीअत ने नफ़ल नमाज़ों, यानी बिना सबब वाली नफ़ल नमाज़ों की मनाही की है।

मनाही के समय तीन हैं:

पहला समय: फज्र की नमाज़ के बाद से लेकर सूरज के एक नेज़े के बराबर ऊपर उठने तक, अर्थात सूरज निकलने के लगभग पंद्रह मिनट बाद तक। और फज्र की नमाज़ का मापदंड: हर व्यक्ति की अपनी (फज्र की) नमाज़ है।

दूसरा समय: जब दोपहर के समय सूरज बीच आसमान में हो यहां तक कि ढल जाए। और यह समय सूरज ढलने से लगभग दस मिनट पहले शुरू होता है।

तीसरा समय: अस्र की नमाज़ के बाद से सूर्यास्त तक, और यह हर व्यक्ति की अपनी नमाज़ पर निर्भर है, अतः जब कोई व्यक्ति अस्र की नमाज़ पढ़ ले; तो उस पर सूरज डूबने तक नमाज़ हराम हो जाती है।

लेकिन इससे अपवाद है:

1- फ़र्ज़ नमाज़ें, जैसे: किसी व्यक्ति की कोई नमाज़ छूट जाए, जो उसे इन निषिद्ध समयों में से किसी समय याद आए, तो वह यह नमाज़ पढ़ेगा; क्योंकि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आम कथन है: "जो व्यक्ति सो जाए और उसकी नमाज़ छूट जाए या भूल जाए, तो उसे याद आते ही वह नमाज़ पढ़नी है" [79]। [79] इसे इमाम बुखारी ने 'किताबु मवाक़ीतिस-सलाह', 'बाब : जो नमाज़ भूल जाये', हदीस संख्या : 597 में और मुस्लिम ने 'किताब अल-मसाजिद', 'बाब : नमाज़ क़ज़ा', हदीस संख्या : 684 में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है, और बुखारी ने नींद का ज़िक्र नहीं किया है।

2- और सही राय के अनुसार इससे जो नफ़ल नमाज़ें किसी कारण से जुड़ी हों, वे भी अपवाद हैं; क्योंकि ये नमाज़ें जिनके कारण होते हैं, अपने कारण के साथ जुड़ी होती हैं, और उसी कारण पर इन नमाज़ को आधारित किया जाता है, जिससे वह हिकमत समाप्त हो जाती है जिसके लिए मना किया गया था। उदाहरण के लिए: अगर आप असर की नमाज़ के बाद मस्जिद में दाखिल होते हैं तो आप दो रकअतें पढ़ेंगे; क्योंकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "जब तुममें से कोई मस्जिद में प्रवेश करे, तो दो रकअत नमाज़ पढ़ने से पहले न बैठे"[80]। और इसी प्रकार यदि आप फ़ज्र की नमाज़ के बाद या सूर्य के ढलने के समय मस्जिद में प्रवेश करें। [80] इस हदीस को इमाम बुखारी ने “किताबुत-तहज्जुद'', अध्याय : नफ्ल नमाज़ दो-दो रकअत करके पढ़ने का बयान, (हदीस संख्या : 1163) में, तथा इमाम मुस्लिम ने “किताबुस-सलात'', अध्याय : मस्जिद में प्रवेश पर तहिय्यतुल मस्जिद पढ़ने का मुस्तहब्ब होना, (हदीस संख्या : 714) में अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

इसी तरह यदि अस्र की नमाज़ के बाद सूर्य ग्रहण हो जाए, तो वह सूर्य ग्रहण की नमाज़ पढ़ेगा क्योंकि यह एक कारण वाली नमाज़ है।

और इसी तरह अगर कोई इन्सान क़ुरआन पढ़े और सजदा की आयत पर पहुँचे, तो उसे सजदा करना चाहिए, चाहे निषिद्ध समय ही में क्यों न हो; इसलिए कि यह भी एक कारण है।

नमाज़ छोड़ने वाले का हुक्म

प्रश्न: यदि व्यक्ति अपने परिवार को नमाज़ का आदेश दे, लेकिन वे उसकी बात न सुनें, तो क्या वह उनके साथ रहे और उनके साथ मेलजोल रखे, या घर से बाहर निकल जाए?

उत्तर: यदि ये लोग कभी भी फ़र्ज़ नमाज़ नहीं पढ़ते हैं; तो वे काफ़िर और मुरतद हैं, इस्लाम से बाहर हैं, और उनके साथ रहना जायज़ नहीं है।

लेकिन उसे चाहिए कि वह उन्हें नमाज़ की ओर बुलाने का प्रयास करे और बार-बार प्रयास करे, हो सकता है कि अल्लाह उन्हें हिदायत दे दे; क्योंकि नमाज़ छोड़ने वाला काफ़िर है - अल्लाह की पनाह - किताब, सुन्नत, सहाबा के कथनों और सही दृष्टिकोण के प्रमाण के अनुसार, और यह इस घृणित कार्य से सावधान रहने की आवश्यकता को दर्शाता है।

जहाँ तक क़ुरआन का संबंध है, तो अल्लाह तआला ने मुशरिकों के बारे में कहा है : "अतः यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें, तो धर्म में तुम्हारे भाई हैं..." [सूरा अत- तौबा : 11] आयत का विपरीत अर्थ यह है; कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे हमारे भाई नहीं हैं, और धार्मिक भाइचारा पापों से समाप्त नहीं होता चाहे वे कितने भी बड़े हों, लेकिन इस्लाम से बाहर निकलने पर समाप्त हो जाता है।

जहाँ तक सुन्नत का सवाल है, तो नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का वह कथन जो मुस्लिम ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है: "आदमी और कुफ्र तथा शिर्क के बीच की रेखा नमाज़ छोड़ना है"[81]। तथा सुन्नन में बुरैदा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "हमारे और उनके बीच का वचन: नमाज़ है। जिसने इसे छोड़ दिया, उसने कुफ़्र किया" [82]। [81] इसे मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", बाब : नमाज़ छोड़ने वाले पर कुफ्र का नाम लागू करने का बयान, (हदीस संख्या : 82) में रिवायत किया है। [82] तिर्मिज़ी ने ''किताबुल-ईमान'', ''बाब मा जाअ फ़ी तरक अस-सलात'' (हदीस संख्या : 2621),में, नसाई ने ''किताबुस-सलात'', ''बाब अल-हुक्म फ़ी तारिक अस-सलात'' (हदीस संख्या : 464) में, इब्न-ए-माजा ने ''किताब-इक़ामत अस-सलात'', ''बाब मा जा फ़ीमन तरक अस-सलात'' (हदीस संख्या : 1079) में तथा अहमद (5/346) ने वर्णन किया है।

रही बात सहाबा के कथन की तो अमीरुल मोमिनीन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का यह फरमान है: "जिसने नमाज़ छोड़ दी, उसका इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं।"[83] हज़्ज़: हिस्सा, और यहाँ यह नकारात्मक संदर्भ में अनिश्चित (नकेरा) है, अर्थात: कोई हिस्सा नहीं, न कम और न अधिक। [83]इसे ''अल-मुवत्ता'' -यह्या बिन यह्या की रिवायत में- मालिक ने, ''किताबुस-सलात'', ''बाब अल-अमल फीमन ग़लबहुद-दम'' (1/81) (हदीस़ नंबर: 93) में, अब्दुर्रज़ाक़ ने ''अल-मुसन्नफ'' (1/150) में, इब्ने अबी शैबा ने ''अल-मुसन्नफ'' (11/25) में और ''अल-ज़ुहद'' में अहमद (154) ने रिवायत किया है।

और अब्दुल्लाह बिन शकीक ने कहा : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा किसी भी अमल के छोड़ने को कुफ़्र नहीं मानते थे सिवाय नमाज़ के।"[84] [84] इसे तिरमिज़ी ने "किताब अल-ईमान", "बाब मा जा फ़ी तर्क अस-सलाह", (हदीस संख्या : 2622) में रिवायत किया है।

जहाँ तक सही दृष्टिकोण का सवाल है, तो कहा जाएगा: क्या यह समझ में आता है कि एक व्यक्ति जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान हो, जो नमाज़ की महानता और अल्लाह के इस पर विशेष ध्यान को जानता है, फिर भी इसे पूरी तरह से छोड़ने पर अड़ा रहता हो?! यह बात संभव नहीं है।

मैंने उन प्रमाणों पर विचार किया है जिनका उपयोग यह कहने के लिए किया गया है कि वह (नमाज़ छोड़ने वाला) काफ़िर नहीं होता, और मैंने पाया कि वे पाँच अवस्थाओं से बाहर नहीं हैं :

1-कु छ ऐसे हैं जिनमें कोई प्रमाण ही नहीं है।

2- या उनमें ऐसी विशेषता का उल्लेख है जिसके होते हुए नमाज़ छोड़ना संभव ही नहीं।

3- या यह कि वह प्रमाण ऐसी स्थिति तक सीमत हैं कि जिनमें नमाज़ को छोड़ने पर माज़ूर माना जाता है।

4- या सादारण प्रमाण हैं, इसलिए उन्हें नमाज़ छोड़ने वाले के कुफ्र की हदीसों द्वारा विशेष किया जाएगा।

5- या वे ज़ईफ़ हैं और सही हदीसों का मुक़ाबला नहीं कर सकते।

नसूस में कहीं नहीं है कि नमाज़ छोड़ने वाला मोमिन है, या वह जन्नत में जाएगा, या वह आग से बचेगा आदि, कि हमें नमाज़ छोड़ने वाले पर लगाए गए कुफ्र के अर्थ को कृतघ्नता का कुफ्र, या कुफ्र से कमतर कुफ्र के रूप में व्याख्या करने की आवश्यकता हो।

और जब यह स्पष्ट हो गया कि नमाज़ छोड़ने वाला मुरतद है, तो उसके कुफ़्र पर मुरतद्दों के हुक्म लागू होंगे, जिनमें से निम्नलिखित हैं:

पहला हुक्म: यह कि उसका निकाह कराना सही नहीं होगा। यदि उसका निकाह पढ़ा दिया जाए जबकि वह नमाज़ नहीं पढ़ता, तो निकाह बातिल होगा और उस निकाह से पत्नी उसके लिए हलाल नहीं होगी; क्योंकि अल्लाह तआला ने हिजरत करने वाली स्त्रियों के बारे में फरमाया है। "...फिर यदि वे तुम्हें ईमान वाली मालूम हों, तो उन्हें काफ़िरों की ओर वापस न करो। न ये स्त्रियाँ उन (काफ़िरों) के लिए हलाल हैं और न वे (काफ़िर) इनके लिए हलाल होंगे।" [सूरा अल-मुमतहनह : 10]

दूसरा हुक्म: यदि उसने निकाह के बाद नमाज़ छोड़ दी, तो उसका निकाह निरस्त हो जाएगा, और पत्नी उसके लिए हलाल नहीं रहेगी; उस आयत के अनुसार जिसे हमने पहले उल्लेख किया है, विद्वानों के बीच प्रसिद्ध विवरण के अनुसार, जिसमें प्रवेश से पहले और बाद की स्थिति में अंतर किया गया है।

तीसरा हुक्म: यह व्यक्ति जो नमाज़ नहीं पढ़ता, अगर वह जानवर ज़बह करे तो उसका ज़बह किया हुआ जानवर नहीं खाया जाएगा; क्योंकि वह हराम है। लेकिन अगर कोई यहूदी या ईसाई ज़बह करे तो उसका ज़बह किया हुआ जानवर हमारे लिए हलाल है। तो -अल्लाह की पनाह- उसका ज़बह किया हुआ यहूदियों और ईसाइयों के ज़बह किए हुए से भी अधिक नापाक है।

चौथा हुक्म: उसके लिए मक्का या उसके हरम की सीमाओं में प्रवेश करना हलाल नहीं है; क्योंकि अल्लाह तआला ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! निःसंदेह बहुदेववादी अशुद्ध हैं। अतः वे इस वर्ष के बाद मस्जिद-ए-हराम के पास न आएँ..." [सूरा अत-तौबा: 28]

पाँचवाँ हुक्म: यदि उसके किसी रिश्तेदार की मृत्यु हो जाए तो उसे उसकी विरासत में कोई हक नहीं होगा। यदि कोई मुसलमान व्यक्ति, जो नमाज़ पढ़ता है, मर जाए और उसका एक बेटा हो जो नमाज़ नहीं पढ़ता और एक दूर का चचेरा भाई (जो असबा) हो, तो उसकी विरासत का हकदार कौन होगा?

जवाब: दूर का चचेरा भाई, न कि उसका अपना बेटा; क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसामा की हदीस में फ़रमाया है: "मुसलमान काफ़िर का और काफ़िर मुसलमान का वारिस नहीं हो सकता।" बुख़ारी एवं मुस्लिम[85]। और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के इस कथन की वजह से भी: ‎“‎फ़र्ज़ (निर्धारित भाग) को उसके हक़दारों तक पहुँचाओ, और जो फ़र्ज़ के बाद बच जाए, वह (मृतक के) निकटतम पुरुष संबंधी के लिए है।‎”‎ [बुख़ारी एवं मुस्लिम][86]। और यह उदाहरण सभी वारिसों पर लागू होगा। [85] इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने किताब अल-फराइज़, अध्याय 'मुस्लिम काफ़िर का वारिस नहीं होता', (हदीस नंबर 6764) में, और इमाम मुस्लिम ने किताब अल-फराइज़, (हदीस नंबर 1614) में वर्णन किया है। [86] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताब अल-फ़राइज़'' अध्याय : मीरास अल-वलदि मिन अबीहि वा उम्मिह, (हदीस संख्या : 6732) में, तथा मुस्लिम ने “किताब अल-फ़राइज़'' अध्याय : अल्हिक़ू अल-फ़राइज़ बि-अहलिहा, (हदीस संख्या :1615) में, इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की हदीस से रिवायत किया है।

छठा हुक्म- यदि वह मर जाए तो उसे ना नहलाया जाएगा, ना कफ़न पहनाया जाएगा, ना उसकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ी जाएगी, और ना ही उसे मुसलमानों के साथ दफ़न किया जाएगा। तो फिर हम उसके साथ क्या करें?

हम उसे रेगिस्तान में ले जाएंगे, उसके लिए गड्ढा खोदेंगे और उसे उसके कपड़ों में ही दफ़न कर देंगे; क्योंकि उसका कोई सम्मान नहीं है। इसलिए, यदि किसी के पास कोई मृतक हो और वह जानता हो कि वह नमाज़ नहीं पढ़ता था, तो उसे मुसलमानों के सामने पेश करना ताकि वे उसकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ें, जायज़ नहीं है।

सातवाँ हुक्म- क़ियामत के दिन उसे फ़िरऔन, हामान, क़ारून और उबय बिन ख़लफ़ के साथ उठाया जाएगा, जो काफ़िरों के नेता थे[87], अल्लाह की पनाह। वह जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, और उसके परिवार में से किसी के लिए उसके लिए रहमत और माफ़ी की दुआ करना जायज़ नहीं है; क्योंकि वह काफ़िर है, इस दुआ का हक़दार नहीं है; जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: "नबी तथा ईमान वालों के लिए मुशरिकों के लिए क्षमा की प्रार्थना करना कदापि जायज़ नहीं है, भले ही वे रिश्तेदार ही क्यों न हों, जबकि उनके लिए यह स्पष्ट हो गया कि निश्चय वे जहन्नम में जाने वाले हैं।" [सूरा तौबा : 113] [87] इसका प्रमाण वह हदीस़ है जिसे इमाम अहमद ने अपनी ''मुसनद'' (2/169) में अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस से रिवायत किया है।

तो यह मसला -मेरे भाइयो- बहुत ही गंभीर है, और अफसोस की बात है कि कुछ लोग इस गंभीर मामले में लापरवाही बरतते हैं।

लेकिन तौबा का दरवाज़ा खुला है - और अल्लाह ही की प्रशंसा है - जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है : "फिर उनके बाद उनके स्थान पर ऐसे अयोग्य उत्तराधिकारी आए, जिन्होंने नमाज़ की उपेक्षा की और अपनी इच्छाओं का पालन किया, तो वे जल्द ही यातना का सामना करेंगे। परंतु जिसने तौबा कर ली और ईमान लाया और अच्छे कर्म किए, तो ये लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे और उनके साथ कोई अन्याय नहीं होगा। सदा निवास के बाग़ो में, जिनका रहमान ने अपने बंदों से (उनके) बिन देखे वादा किया है। निःसंदेह उसका वादा पूरा होकर रहने वाला है। वे उसमें कोई व्यर्थ बात नहीं सुनेंगे, परंतु 'सलाम' सुनेंगे, तथा उनके लिए उसमें सुबह और शाम उनकी जीविका होगी।" [सूरा मरयम : 59-62]

हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि हमें और हमारे मुसलमान भाइयों को ऐसे आज्ञापालन का रास्ता दिखाए, जिसके कारण वह हमसे राज़ी हो। अल्लाह ही बेहतर जानता है। दुरूद एवं सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद, उनके परिवार के लोगों और उनके तमाम साथियों पर।

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

तौबा

तौबा: यह अल्लाह की अवज्ञा से उसके आज्ञापालन की ओर लौटने को कहते हैं।

तौबा हर मोमिन पर वाजिब है, "ऐ ईमान वालो! अल्लाह के आगे सच्ची तौबा करो..." [सूररा अत-तहरीम : 8]

तौबा अल्लाह तआला को प्रिय है, "...निःसंदेह अल्लाह उनसे प्रेम करता है जो बहुत तौबा करने वाले हैं और उनसे प्रेम करता है जो बहुत पाक रहने वाले हैं।" [सूरा अल-बक़रा : 222]

तौबा सफलता के कारणों में से है, "...और ऐ ईमान वालो! तुम सब अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम सफल हो जाओ।" [सूरा अन-नूर: 31]، सफलता से आशय है: कि इंसान को उसका प्रिय लक्ष्य प्राप्त हो और उसे अपने भय से मोक्ष मिल जाए।

तौबा के द्वारा अल्लाह गुनाहों को माफ़ कर देता है, चाहे वे कितने भी बड़े और कितने भी अधिक क्यों न हों। "(ऐ नबी!) आप मेरे उन बंदों से कह दें, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया है कि तुम अल्लाह की दया से निराश न हो। निःसंदेह अल्लाह सब पापों को क्षमा कर देता है। निःसंदेह वही तो अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।" [सूरा अज़-ज़ुमर : 53] हे गुनाहगार भाई, अपने रब की रहमत से मायूस मत हो। तौबा का द्वार उस समय तक खुला है, जब तक सूरज पश्चिम से उदय न हो जाए। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है: ''महान अल्लाह रात में हाथ फैलाता है, ताकि दिन में गुनाह करने वाला तौबा कर ले और दिन में हाथ फैलाता है, ताकि रात में गुनाह करने वाला तौबा कर ले, यहाँ तक कि सूरज उसके डूबने के स्थान से निकल आए।'' [सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 88] [88] मुस्लिम ने किताबुत-तौबा, बाब : गुनाहों से तौबा की क़बूलीयत, (हदीस संख्या : 2759) में अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से वर्णन किया है।

और कितने ऐसे लोग हैं जिन्होंने बहुत से बड़े गुनाहों से तौबा की और अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल कर ली! अल्लाह तआला ने फरमाया: "और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को नहीं पुकारते, और न उस प्राण को क़त्ल करते हैं, जिसे अल्लाह ने ह़राम ठहराया है परंतु हक़ के साथ और न व्यभिचार करते हैं। और जो ऐसा करेगा, वह पाप का भागी बनेगा। क़ियामत के दिन उसकी यातना दुगनी कर दी जाएगी और वह अपमानित होकर उसमें हमेशा रहेगा। परंतु जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किए, तो ये लोग हैं जिनके बुरे कामों को अल्लाह नेकियों में बदल देगा और अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत दयावान है।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 68-70]।

सच्ची तौबा (तौब ए नसूह़) वह है जिसमें पाँच शर्तें इकठ्ठा हों:

पहली शर्त: अल्लाह के लिए इख़्लास़, अर्थात उस तौबे से केवल अल्लाह की संतुष्टि, उसका सवाब तथा उसके अज़ाब से बचना उद्देश्य हो।

द्वितीय शर्त: पाप करने पर पछताना, इस तरह से कि उसके करने पर दुखी हो और कामना करे कि उसने उसे न किया होता।

तीसरी शर्त: गुनाह से तुरंत दूर हो जाना। अगर गुनाह अल्लाह के अधिकार में हो, तो उसे छोड़ देगा अगर वह कोई हराम काम हो, और अगर वह कोई छोड़ा गया फर्ज़ हो, तो उसे तुरंत अदा करेगा। अगर गुनाह किसी मखलूक के अधिकार में हो, तो उससे तुरंत छुटकारा पाने का प्रयास करेगा, या तो उसे उसका हक़ लौटाकर, या उससे माफी मांगकर और उसे राज़ी करके।

चौथी शर्त: भविष्य में उस पाप को न करने का दृढ़ निश्चय करना।

पाँचवी शर्त: तौबा उसके समय के समाप्त होने से पहले होना, तौबा का समय समाप्त हो जाता है मृत्यु के आगमन से, या पश्चिम से सूरज के निकल आने से। अल्लाह तआला ने फरमायाः "और उनकी तौबा स्वीकार्य नहीं, जो बुराइयाँ करते जाते हैं, यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मौत का समय आ जाता है, तो कहने लगता है : "अब मैंने तौबा कर ली!" [सूरा अन-निसा : 18], और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "जिसने सूर्य के पश्चिम से उदय होने से पहले तौबा कर ली, अल्लाह उसकी तौबा को ग्रहण करेगा।" [सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 89] हे अल्लाह! हमें सच्ची तौबा करने की तौफ़ीक़ प्रदान कर और हमारी तौबा को स्वीकार कर; निस्संदेह, तू सब कुछ सुनने-जानने वाला है। [89] मुस्लिम ने, किताबुज़-ज़िक्र, बाब : इस्तेहबाबुल-इस्तिग़फ़ार, (हदीस संख्या : 2703) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से रिवायत किया है।

इन शब्दों को मुहम्मद सालिह अल-उसैमीन ने लिखा है।

17/4/1406 हिजरी

तीसरा अध्याय: जनाज़े

मय्यत को नहलाने के नियम

मय्यत के स्नान की विधि।

मय्यत के कफ़नाने का तरीका

मय्यत पर नमाज़ पढ़ने (जनाज़े की नमाज़) का तरीका

मय्यत को दफ़न करने का तरीका।

मय्यत को नहलाने के नियम

सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है। और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, वह पहले और बाद के सारे लोगों का माबूद है। और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं, नबियों की श्रृंखला की अंतिम कड़ी और परहेज़गारों के इमाम हैं। अल्लाह की रहमत और शांति हो उनपर, उनके परिवारजनों पर, उनके सहाबियों पर और उनपर जो क़यामत तक भलाई के साथ उनका अनुसरण करें। तत्पश्चात:

यह एक संक्षिप्त विवरण है जो मय्यत (मृत) को नहलाने, कफ़न देने और दफ़नाने से संबंधित है, और इससे पहले कि हम मुख्य विषय पर आएं, हम ये अनुच्छेद प्रस्तुत करते हैं:

1- मुसलमान मृतक को स्नान देना, कफ़न पहनाना और दफ़नाना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है। जो व्यक्ति यह कार्य कर रहा है, उसे यह नीयत करनी चाहिए कि वह इस फ़रीज़े को अदा कर रहा है, ताकि उसे अल्लाह तआला की ओर से इसका प्रतिफल और सवाब प्राप्त हो। जहाँ तक काफ़िर का सवाल है, तो उसे नहलाना, कफ़नाना और मुसलमानों के साथ दफ़नाना जायज़ नहीं है।

2- नहलाने वाले को मय्यत के बारे में अमानतदारी बरतने वाला माना जता है, इसलिए उसपर मय्यत को नहलाने आदि में आवश्यक सारे कार्य करना वाजिब है।

3- स्नान देने वाले को मृतक के बारे में अमानतदारी बरतने वाला माना जता है,, इसलिए उस पर वाजिब है कि जो कुछ उसने मृतक में नापसंदीदा देखा हो उसे छुपाए।

4- नहलाने वाला व्यक्ति मय्यत के हक़ में अमानतदार माना जाता है, इसलिए उसे मय्यत के पास किसी को भी उपस्थित होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, सिवाय उसके जिसकी आवश्यकता हो, जैसे कि मय्यत को पलटने, पानी डालने आदि में सहायता के लिए।

5- नहलाने वाला व्यक्ति मृतक के हक में अमानतदार माना जाता है, इसलिए उसे चाहिए कि वह उसके साथ नरमी और सम्मान का व्यवहार करे, और उसके कपड़े उतारते समय या नहलाते समय, या अन्य किसी भी समय उसके प्रति कठोर या द्वेषपूर्ण न हो।

6- कोई पुरुष किसी महिला को स्नान नहीं देगा, सिवाय इसके कि वह उसकी पत्नी हो, और कोई महिला किसी पुरुष को स्नान नहीं देगी, सिवाय इसके कि वह उसका पति हो, सिवाय उन बच्चों के जो सात साल से कम उम्र के हों, उन्हें पुरुष और महिला दोनों स्नान दे सकते हैं, चाहे वह लड़का हो या लड़की।

7- स्नान देने वाले के लिए यह मुस्तहब्ब (वांछित) है कि नहलाने के बाद जनाबत के स्नान की तरह स्नान करे। और यदि वह स्नान नहीं करता है, तो भी कोई हर्ज नहीं।

मय्यत को नहलाने की विधि

मय्यत को नहलाने में आवश्यक है: कि उसके पूरे शरीर को पानी से धोया जाए ताकि वह साफ़ हो जाए, और उत्तम यह है कि निम्नलिखित रूप से किया जाए:

1- मय्यत को उस चीज़ पर रखा जाए जिस पर नहलाना हो और पैर की ओर ढालू हो।

2- मृतक की नाभि से घुटने तक कपड़ा लपेट देगा ताकि कपड़े उतारने के बाद उसकी शरमगाह न देखे।

3- मय्यत के कपड़े नरमी के साथ उतारेगा।

4- स्नान देने वाला अपने हाथों पर कोई कपड़ा लपेट ले, फिर मृतक के गुप्तांग को बिना खोले धोए ताकि वह साफ हो जाए उसके बाद वह कपड़ा हटा देगा।

5- एक कपड़े को पानी में भिगोकर मृतक के दाँतों और नाक की सफ़ाई करेगा।

6- मृतक के चेहरे को धोएगा, उसके दोनों हाथों को कोहनियों तक धोएगा, सर का मसह करवाएगा, और दोनों पैरों को टखनों तक धोएगा। पहले दाहिना हाथ और दाहिना पैर धोएगा।

7- मय्यत के मुँह और नाक में पानी नहीं डालेगा; बल्कि कपड़े से साफ कर देना ही पर्याप्त होगा।

8- मय्यत के पूरे शरीर को तीन, पाँच, सात या उससे अधिक बार धोएगा, सफाई की आवश्यकता के अनुसार।बाएँ से पहले शरीर के दाहिने हिस्से से शुरू करेगा।

9- बेहतर है कि जिस पानी से नहलाया जाए, उसमें बेरी के पत्ते मिलाया जाएं; क्योंकि इससे अधिक सफाई होती है। अतः बेरी के पत्तों के साथ मिले हुए पानी को अपने हाथ से मारे, यहाँ तक कि उसमें झाग उत्पन्न हो जाए। फिर उस झाग से मय्यत के सिर और दाढ़ी को धोएगा और बाकी शरीर को बचे हुए पानी से धोएगा।

10- आख़िरी ग़ुस्ल में कपूर मिलाना बेहतर है, जो एक मशहूर ख़ुशबू है।

11- यदि मृतक के बाल हों, तो उन्हें सँवारा जाए, ना कि किसी चीज़ से चिपकाया जाए, और बालों में से कुछ भी ना काटा जाए।

12- यदि मृतक महिला हो तो उसके बालों को खोला जाए यदि उनकी चोटियां बनाई हुई हों। और जब उन्हें धो लिया जाए और साफ़ कर लिया जाए तो उन्हें तीन चोटियों में गूंथा जाए और उसकी पीठ के पीछे डाल दिया जाए।

13- यदि मृतक के कुछ अंग अलग हो गए हों, तो उन्हें भी धोया जाए और मृतक के साथ मिला दिया जाए।

14- यदि मृतक का शरीर जलने या किसी अन्य कारण से खराब हो गया हो और उसे नहलाना संभव न हो, तो बहुत से विद्वानों के अनुसार उसे तयम्मुम कराया जाएगा। तयम्मुम कराने वाला अपने हाथों को ज़मीन पर मारेगा और उनसे मृतक के चेहरे और दोनों हाथों का मसह करेगा।

मृतक को कफ़न पहनाने का तरीका

मृतक के कफ़न में वाजिब है: एक कपड़ा जो उसके समस्त शरीर को ढँक दे, लेकिन बेहतर यह है कि:

1- तीन सफेद कपड़ों में कफनाया जाए, जिन्हें एक दुसरे के ऊपर रखा जाएगा, फिर मृतक को उन पर रखा जाएगा। फिर पहले कपड़े का उपरी भाग मृतक के दाएं तरफ से उसके सीने पर लपेटा जाएगा, फिर उसका दूसरा किनारा मृतक के बाएं तरफ से। फिर दूसरे कपड़े के साथ भी ऐसा ही किया जाएगा, और तीसरे के साथ भी। फिर कपड़ों के किनारों को उसके सिर और पैरों की ओर से मोड़ा जाएगा और गांठ बांध दी जाएगी।

2- कफ़नों को बुखूर का धुआँ दिया जाएगा, और उनके बीच कुछ हनूत डाला जाएगा। हनूत: मृतकों के लिए बनाया गया सुगंधियों का मिश्रण है।

3- मृतक के चेहरे, उसके गंदे होने वाले गुप्तांगों और सज्दे के स्थानों पर हनूत लगाया जाएगा।

4- उसकी आँखों, नाक और होंठों के ऊपर रुई में कुछ हनूत लगा कर रखा जाएगा।

5- नितंबों के बीच हनूत लगी रूई का एक टुकरा रखा जाएगा और उसपर एक कपड़ा लपेट दिया जाएगा।

महिला को पाँच कपड़ों में कफ़नाया जाएगा: तहबंद, दुपट्टा, कमीज़, तथा दो लपेटने वाले कपड़े। और यदि उसे पुरुष की तरह कफ़नाया जाए तो भी कोई हर्ज नहीं।

7- मय्यत को क़ब्र में रखते समय कफ़न के बंधनों को खोल दिया जाएगा।

जनाज़े की नमाज़ का तरीका

1- मृतक मुसलमान के जनाज़े की नमाज़ पढ़ी जाएगी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, नर हो या नारी।

2- यदि चार महीने का गर्भ गिर जाए, तो उसपर जनाज़े की नमाज़ पढ़ी जाएगी, और उसके साथ वही किया जाएगा जो बड़े के साथ किया जाता है, अर्थात उसे स्नान दिया जाएगा और जनाज़े की नमाज़ से पहले कफ़न पहनाया जाएगा।

अगर भ्रूण चार महीने पूरे होने से पहले गिर जाए, तो उसकी नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी, क्योंकि उसमें रूह नहीं फूंकी गई। उसे ना नहलाया जाएगा, ना कफ़न पहनाया जाएगा, बल्कि उसे किसी भी स्थान पर दफ़न कर दिया जाएगा।

जनाज़े की नमाज़ में इमाम पुरुष के सिर के सामने और महिला के मध्य में खड़ा होगा, और लोग उसके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे।

5- जनाज़े की नमाज़ में चार तकबीरें कहेगा। पहली तकबीर कहने के बाद अऊज़ु बिल्लाह और बिस्मिल्लाह कहकर सूरा फ़ातिहा पढ़ेगा।

दूसरी तकबीर के बाद अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर दुरूद भेजेगा, और कहेगा : हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तू ने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।" [90] [90] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 3370 तथा अबू दाऊद हदीस संख्या : 978।

तीसरी तकबीर के बाद मृतक के लिए दुआ करेगा, और बेहतर यह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से जो दुआ वर्णित है, वही पढ़ी जाए[91], और यदि वह ज्ञात न हो तो जो दुआ ज्ञात हो, वही पढ़ेगा। [91] एक दुआ इस प्रकार हैः ऐ अल्लाह, हमारे जीवित तथा मृत, छोटे तथा बड़े, पुरुष तथा स्त्री और उपस्थित तथा अनुपस्थित सबको क्षमा कर दे। ऐ अल्लाह, हममें से जिसे जीवित रखना हो, उसे इस्लाम पर जीवित रख और हममें से जिसे मारना हो, उसे ईमान की अवस्था में मौत दे। ऐ अल्लाह, उसे क्षमा कर दे, उस पर कृपा कर, उसे समस्त आपदाओं से सुरक्षित रख, उसके पापों को मिटा दे, उसका अच्छा स्वागत-सत्कार करना, उसकी क़ब्र को विस्तारित कर दे, उसे जल, तुषार तथा ओले से स्नान करवा, उसे पापों से उसी प्रकार साफ़ कर दे जिस प्रकार सफ़ेद कपड़े को गंदगी से निर्मल किया जाता है, उसे उसके घर से उत्तम घर प्रदान कर, उसके परिवार से उत्तम परिवार प्रदान कर, उसके जीवन साथी से उत्तम जीवनसाथी प्रदान कर, उसे जन्नत में प्रवेश करा तथा क़ब्र के दंड से मुक्ति दे, ऐ अल्लाह, हमें उसके प्रतिफल से वंचित न कर और हमें उसके बाद पथ-भ्रष्ट मत कर, ऐ रब्बुल आलमीन, हमें और उसे क्षमा कर, उसकी क़ब्र को प्रशस्त एवं ज्योतिर्मय कर दे। और अगर वह छोटा हो तो कहे: "ऐ अल्लाह! इसे अपने माता-पिता के लिए प्रतिफल का कोष, गंतव्य में पहले से पहुँचकर प्रबंध करने वाला, प्रतिफल एवं ऐसा सिफ़ारिशी बना दे, जिसकी सिफ़ारिश ग्रहण की जाती हो। ऐ अल्लाह! इसके ज़रिए उन दोनों के तराज़ू के पलड़े को भारी कर दे, इसके ज़रिए उनका प्रतिफल बड़ा कर दे, इसे सदाचारी मोमिनों के साथ मिला, इबराहीम -अलैहिस्सलाम- की कफ़ालत (अभिभावक्ता) प्रदान कर, और उसे अपनी कृपा से जहन्नम की यातना से बचा।

और चौथी तकबीर के बाद थोड़ी देर ठहरेगा, फिर सलाम कहेगा, और अगर सलाम से पहले कहे: ''ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें आग की यातना से बचा।'' [92] तो कोई हर्ज नहीं। [92] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 6026 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 2690।

मृतक को दफ़न करने की विधि

1- वाजिब यह है कि मय्यत को ऐसी क़ब्र में दफनाया जाए जो उसे दरिंदों से बचाए, और उसका मुख क़िबला की ओर कर दिया जाए, और क़ब्र जितनी गहरी हो सके उतना बेहतर है।

2- बेहतर यह है कि क़ब्र लह़द (बग़ली) हो, अर्थात मृतक के लिए क़ब्र के अंदर क़िबला की दिशा में एक गड्ढा खोदा जाए।

3- यह भी जायज़ है कि क़ब्र को श़क (सीधी क़ब्र) बनाया जाए, अर्थात मृतक के लिए क़ब्र के बीच में एक गड्ढा खोदा जाए यदि आवश्यकता हो, जैसे कि ज़मीन नरम हो।

4- मृतक को उसकी क़ब्र में उसके दाएँ पहलू पर क़िबले की ओर मुख करके लिटाया जाएगा।

5- उस पर ईंटें खड़ी करके रखी जाएंगी, और ईंटों को गीले गारे से बंद कर दिया जाएगा ताकि मिट्टी मृतक पर ना गिरे।

क़ब्र को उसके बाद बंद किया जाएगा, और उसे ऊँचा नहीं किया जाएगा, न ही उसे चूना या किसी अन्य सामग्री से पक्का किया जाएगा।

7- तीन समय ऐसे हैं जिनमें दफ़न करना जायज़ नहीं है:

जब सूर्य निकल रहा हो यहाँ तक कि एक भाले की ऊँचाई तक उठ जाये।

और जब दोपहर के समय बीच आसमान में रुक जाए, जब तक कि वह ढल न जाए।

और सूरज के अस्त होते समय जब केवल एक भाले के बराबर ऊपर रह जाए यहां तककि डूब जाए।

पहले और आखिरी समय की अवधि: लगभग 15 मिनट है, और दूसरे की अवधि: दस मिनट या लगभग दस मिनट है।

8- काफ़िर को मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़न नहीं किया जाएगा; ना उसे नहलाया जाएगा, ना कफ़न पहनाया जाएगा, और ना उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी। बल्कि उसे ऐसी जगह दफ़न किया जाएगा जो किसी की मिल्कियत में ना हो, हां, यदि उसे अपने वतन ले जाया जाए तो अलग बात है।

और सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे जहानों का पालनहार है और दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद और उनके सभी परिवार और साथियों पर।

लेखक: अल्लाह का मुहताज

मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन