صفة الوضوء والصلاة (مرئي)
PROJ-187
मैं वज़ू कैसे करूँ?
क्रमांक
आवाज़
1
अज़ान की आवाज़...
2
(हे ईमान वालों! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने मुँह तथा कोहनियों सहित अपने हाथों को धो लिया करो और अपने सिर का मसह कर लो, तथा अपने पैर टखनों सहित धो लो।)
[सूरा अल-माइदा : 6]
3
बिना वज़ू के नमाज़ नहीं होती, बिना नीयत के वज़ू नहीं होता और बिना आंतरिक परिशुद्धता के नीयत नहीं होती। नीयत का स्थान दिल है, ज़बान नहीं।
4
"بسم الله" (शुरू करता हूँ मैं अल्लाह के नाम से।)
वज़ू के आरंभ में बिस्मिल्लाह पढ़ना है... हम अल्लाह का नाम लेकर ही वज़ू शुरू करेंगे... फिर, हो सके तो मुँह की सफ़ाई के लिए मिस्वाक का प्रयोग करेंगे...
5
हम दोनों हथेलियों को तीन बार धोएँगे। उँगलियों के किनारों से आरंभ कर हथेली के जोड़ तक धोएँगे...
6
दोनों हथेलियों को दोनों कलाइयों तक लगातार तीन बार धोएँगे।
7
हथेलियों को धोने का आरंभ भी दाईं हथेली से करेंगे। पहले उसे तीन बार धोएँगे और फिर बाईं हथेली को तीन बार धोएँगे।
8
जबकि पहले दाईं हथेली और फिर बाईं हथेली, फिर दाईं हथेली और फिर बाईं हथेली, फिर दाईं हथेली और फिर बाईं हथेली को धोना भी जायज़ है।
9
साथ ही इस बात की पुष्टि हो जानी चाहिए कि हमारी उँगलियों के बीच पानी पहुँच चुका है।
10
फिर हम कुल्ली करेंगे और नाक में पानी दाखिल करेंगे...
11
कुल्ली करने से अभिप्राय मुँह में पानी डालकर उसे मुँह के अंदर हिलाना और फिर बाहर निकाल देना है।
12
जबकि नाक में पानी दाखिल करने से अभिप्राय साँस के द्वारा नाक में पानी चढ़ाना और फिर बाएँ हाथ से नाक झाड़कर उसे बाहर निकाल देना है।
13
सुन्नत यह है कि यदि हम रोज़े से न हों या फिर हानि का भय न हो, तो इन दोनों कामों को ख़ूब अच्छी तरह किया जाए...
14
कुल्ली करने तथा नाक में पानी चढ़ाने के दो तरीक़े हैं :
15
दोनों कार्यों को एक साथ करना। इसका तरीक़ा यह है कि हम एक चुल्लू पानी लेकर उसके आधे भाग से कुल्ली करें और शेष आधे भाग को नाक में चढ़ाएँ...
हम मुँह के पानी को हिलाएँगे और फिर बाहर फेंक दें गे। फिर नाक में चढ़ाए हुए पानी को अपने बाएँ हाथ से झाड़ देंगे...
ऐसा हम तीन बार करेंगे और इसके लिए तीन चुल्लू पानी लेंगे।
16
कुल्ली तथा नाक में पानी डालने के लिए अलग-अलग पानी लेना। इसका तरीक़ा यह है कि हम एक चुल्लू पानी लेकर उसे अपने मुँह में डालें, मुँह के अंदर उसे हिलाएँ और फिर फेंक दें। फिर दूसरा चुल्लू लेकर नाक में पानी डालें और बाएँ हाथ से नाक झाड़ें...
17
कुल्ली तथा नाक झाड़ने के बाद चेहरे को धोया जाएगा...
18
चेहरे की सीमा, लंबाई में सर के बाल उगने के नियमित स्थान से ठुड्डी के अंतिम भाग तक तथा चौड़ाई में एक कान से दूसरे कान तक है।
19
चेहरे को धोते समय उसके सारे बालों, जैसे हल्की दाढ़ी के बालों, मूँछों, दोनों भौं,और पलकों के बालों तथा निचले होंठ के नीचे उगे हुए बालों को धोना वाजिब है...
20
चेहरे को धोने के दो तरीक़े हैं :
21
पहला : हम दोनों हाथों से पानी लेकर उनसे चेहरे को, सर के बाल उगने के नियमित स्थान से ठुड्डी के अंतिम भाग तक और दाएँ कान से बाएँ कान तक धोएँगे। यदि दाढ़ी घनी हो तो ठुड्डी के निचले भाग में पानी पहुँचाना और दाढ़ी का खिलाल करना सुन्नत है।
हम ऐसा तीन बार करेंगे, जो कि संपूर्णतम संख्या है। या फिर दो बार या एक बार करेंगे। कम से कम एक बार करना वाजिब है।
22
दूसरा : हम केवल दाएँ हाथ से पानी लेकर चेहरे पर डाल देंगे और उपर्युक्त तरीक़े ही की तरह चेहरे को दोनों हाथों से धोएँगे... ऐसा तीन बार करेंगे...
23
वज़ू के अंगों को धोने में क्रम का ख़याल रखना वाजिब है तथा उनको धोने या उनका मसह करने का काम लगातार करना भी जिब है। न हम किसी अंग के स्थान पर दूसरे अंग को आगे ले जाएँगे और न किसी अंग के बाद दूसरे अंग तक आने में देर करेंगे...
24
चेहरा धोने के बाद हम दोनों हाथों को धोएँगे।
25
दोनों हाथ, जिनको धोना वाजिब है, उनकी सीमा उँगलियों के किनारों से कोहनी तक है। दोनों कोहनियों को धोना भी अनिवार्य है।
26
हम पहले दाएँ हाथ को उँगलियों के किनारों से धोना शुरू करेंगे, दोनों हाथों की उँगलियों को एक-दूसरे के अंदर घुसाकर उनका ख़िलाल करेंगे और फिर कोहनियों तक पानी पहुँचाएँगे
27
...फिर बाएँ हाथ को उँगलियों के किनारों से धोना शुरू करेंगे, उँगलियों का खिलाल करेंगे और कोहनियों तक धोएँगे...
28
उसके बाद सर का मसह करेंगे... इसके लिए पहले नए पानी से दोनों हाथों को भिगाएंगे, फिर दोनों तर हाथों को सर के अगले भाग पर रखेंगे, उन्हें गुद्दी तक ले जाएँगे और फिर उसी स्थान तक वापस ले आएँगे जहाँ से शुरू किया था... सर की इस सीमा के संबंध में गंजे तथा बाल वाले के बीच कोई अंतर नहीं है...
29
फिर सर का मसह करने के बाद हाथ में बचे हुए पानी से दोनों कानों का मसह करेंगे। सर तथा कानों का मसह एक ही बार करेंगे...
30
कानों के मसह का तरीक़ा यह है कि हम दोनों शहादत की उँगलियों को दोनों कानों के छेदों में घुसाकर उनका मसह करें और दोनों अंगूठों से कानों के बाहरी भागों का मसह करें। इस तरह कान के भीतरी तथा बाहरी दोनों भागों का मसह हो जाएगा...
31
फिर हम दोनों पैरों को धोएँगे। दोनों पैरों, जिनको धोना वाजिब है, उनकी सीमा उँगलियों के किनारों से दोनों टखनों तक है। अतह दोनों एड़ियों को धोना भी वाजिब है।
32
पहले हम दाएँ पाँव को धोएँगे। पाँव की उँगलियों का ख़िलाल करेंगे और दोनों एड़ियों तथा क़दमों के ऊपरी भाग को धोने का खास खयाल रखेंग...
33
फिर दाएँ पाँव की तरह ही बाएँ पाँव को धोएँगे और उँगलियों का खिलाल करने तथा संपूर्ण तरीक़े से एड़ियों को धोने और दोनों टखनों तक पानी के पहुंचने पर खास ध्यान देंगे।
34
"أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، وأشهدُ أنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे तथा रसूल हैं।)
35
वज़ू पूरा करने के बाद यह ज़िक्र तथा दुआ सुन्नत है।और सुन्नत है कि इसके बाद इस दुआ को भी पढ़ ले :
36
"اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي مِنَ التَوَّابِينَ، واجْعَلْني مِنَ المُتَطَهِّرِينَ" (ऐ अल्लाह, मुझे बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों में से बना और ख़ूब साफ़-सुथरा रहने वालों में से बना।)
37
या फिर यह दुआ पढ़े :
"سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وبِحَمْدِكَ، أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلاَّ أنْتَ، أسْتَغْفِرُكَ وأتُوبُ إِلَيْكَ" (ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौटकर आता हूँ।)
क्रमांक
स्क्रीन पर लिखा हुआ
1
मैं वज़ू कैसे करूँ?
2
{يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قُمْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ فَاغْسِلُوا وُجُوهَكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ إِلَى الْمَرَافِقِ وَامْسَحُوا بِرُءُوسِكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ إِلَى الْكَعْبَيْنِ} (हे ईमान वालों! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने मुँह तथा कोहनियों सहित अपने हाथों को धो लिया करो और अपने सिर का मसह कर लो, तथा अपने पैर टखनों सहित धो लो।)
[सूरा अल-माइदा, आयत संख्या : 6]
3
दोनों हथेलियों को धोना
4
कुल्ली करना तथा नाक में पानी डालना
5
दोनों को एक साथ करना
6
दोनों को अलग-अलग करना
7
चेहरे को धोना
8
पहला
9
दूसरा
10
नीयत करना तथा बिस्मिल्लाह कहना
11
दोनों हथेलियों को धोना
12
कुल्ली करना
13
नाक में पानी चढ़ाना
14
चेहरे को धोना
15
दोनों हाथों को कोहनियों के साथ धोना
16
सर तथा कानों का मसह करना
17
दोनों पैरों को टखनों के साथ धोना
18
दोनों हाथों को धोना
19
सर का मसह करना
20
सिर का आरंभिक भाग = पेशानी के ऊपर का भाग एवं बाल उगने के नियमित स्थान का आरंभिक भाग...
21
सर का अंतिम स्थान = गुद्दी का वह स्थान जहाँ बाल उगना बंद हो जाता है...
22
दोनों कानों का मसह करना
23
दोनों पैरों को धोना
24
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :
"एड़ियों के लिए आग का विनाश है। वज़ू संपूर्ण तरीक़े से किया करो।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
25
"أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، وأشهدُ أنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है तथा गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे तथा रसूल हैं।)
इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
26
"اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي مِنَ التَوَّابِينَ، واجْعَلْني مِنَ المُتَطَهِّرِينَ" (ऐ अल्लाह, मुझे बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों में से बना और ख़ूब साफ़-सुथरा रहने वालों में से बना।)
इसे तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।
27
"سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وبِحَمْدِكَ، أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلاَّ أنْتَ، أسْتَغْفِرُكَ وأتُوبُ إِلَيْكَ" (ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौट कर आता हूँ।)
इसे नसई ने अपनी किताब "अमल अल-यौम व अल-लैला" में रिवायत किया है।
मैं नमाज़ कैसे पढ़ूँ?
तकबीर से सलाम तक नमाज़ का संपूर्ण तरीक़ा...
क्रमांक
आवाज़
1
नमाज़ की इक़ामत की आवाज़...
2
इक़ामत की आवाज़ जारी है...
नियत यानी दिल को उपस्थित रखना। यह नमाज़ी का पहला काम है और इसका स्थान दिल है।
3
हम क़िबला की ओर चेहरा करेंगे। यदि हम इमाम हों अथवा अकेले नमाज़ पढ़ रहे हों, तो अपने सामने सुतरा रख लेंगे।
4
अल्लाहु अकबर...
यह तकबीर-ए-एहराम है। इसी के ज़रिए हम नमाज़ में प्रवेश करते हैं। इसे ज़बान से कहना ज़रूरी है...
5
तकबीर कहते समय हम अपने दोनों हाथों को अपने कंधों के बराबर उठाएँगे और अपनी उँगलियों के भीतरी भाग को क़िबला की ओर कर लेंगे...
या फिर
हम उन्हें उक्त पद्धति से दोनों कानों के बराबर उठाएँगे...
6
तकबीर के बाद दोनों हाथों को सीने पर, सीने के नीचे तथा नाभि के ऊपर या फिर नाभि के नीचे रख लेंगे। तीनों रूप सही हैं...
अपने दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की हथेली पर रखेंगे
या दाएँ हाथ की हथेली से बाएँ हाथ की हथेली के बाहरी भाग को पकड़ लेंगे...
या फिर दाएँ हाथ की हथेली से बाएँ हाथ की हाथ की कलाई को पकड़ लेंगे...
7
" اللّهُم بَاعِد بَيْنِي وبَيْنَ خَطاياي كما بَاعَدْت بين المَشْرِق والمِغرب، اللَّهم نَقِّنِيَ من خطاياي كما يُنَقَّى الثوب الأبيض من الدَّنَس، اللَّهم اغْسِلْنِي من خَطَاياي بالثَّلج والماء والبَرد" (ऐ अल्लाह, मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह, मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह, मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।)
तकबीर-ए-एहराम तथा क़िरात से पहले दुआ-ए-इसतिफ़ताह (नमाज़ आरंभ करने की दुआ) पढ़ेंगे। नमाज़ आरंभ करने की अन्य दुआएँ भी आई हैं। सुन्नत यह है उनमें से कभी किसी को पढ़ा जाए तो कभी किसी को...
8
"أعوذُ باللهِ منَ الشَّيطانِ الرَّجيم" (मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।)
दुआ-ए-इसतिफ़ताह के बाद "أعوذُ باللهِ منَ الشَّيطانِ الرَّجيم" और उसके बाद सूरा फ़ातिहा पढ़ी जाएगी...
9
हम एक-एक आयत को पूर्ण विनम्रता तथा इत्मीनान के साथ पढ़ते जाएँगे।
10
आमीन...
आमीन कहना सुन्नत है, आदमी चाहे इमाम हो या मुक़तदी हो या फिर अकेले नमाज़ पढ़ रहा हो। आमीन सूरा फ़ातिहा की आयत नहीं, बल्कि दुआ है और इसका अर्थ है : ऐ अल्लाह! ग्रहण कर ले।
11
सूरा फ़ातिहा के बाद हम क़ुरआन का जितना भाग संभव हो, पढ़ेंगे। चाहे पूरी सूरा हो कि उसका कुछ भाग। तिलावत पूरी होने के बाद, रुकू में जाने से पहले हम कुछ देर ख़ामोश रहेंगे।
12
अल्लाहु अकबर
हम क़याम की अवस्था से रुके में जाने की तकबीर कहेंगे।
यह नमाज़ का दूसरा स्थान है, जहाँ अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने दोनों हाथों को उठाया करते थे। अत: इस अवसर पर दोनों हाथों को कंधों या कानों तक उठाना सुन्नत है।
13
हम दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखेंगे, अपनी उँगलियों को एक-दूसरे से अलग रखेंगे और हथेलियों को घुटनों पर इस तरह मज़बूती से रखेंगे, जैसे उन्हें पकड़े हुए हों।
हम इतमीनान से रूकू करेंगे। इस अवस्था में अपने हाथों को अपने पहलुओं से अलग रखेंगे और किसी एक ओर मायल होकर (झुक कर) अपना गाल नहीं दिखाएँगे।
14
पीठ कमानी की तरह न होकर सीधी रहेगी और सर पीठ के बराबर रहेगा। हम सर को न तो पीठ से ऊँचा रखेंगे और न उससे नीचा।
15
"سبحانَ ربِّيَ العظيم" (मेरा महान रब पवित्र है।)
हम इस तसबीह को तीन बार कहेंगे, जो कि संपूर्णता की निम्नतम संख्या है। जबकि एक बार कहना भी काफ़ी है। हम चाहें तो तीन से अधिक बार भी कह सकते हैं। हम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित अलग-अलग तसबीहों में से कभी एक को तो कभी दूसरी को पढ़ लिया करेंगे।
16
रुकू में कहने के लिए कई अज़कार वर्णित हैं।
17
"سَمِعَ اللهُ لمَنْ حَمِدَه" (अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।)...
इसे हम रुकू में खड़े होते समय उस परिस्थिति में पढ़ेंगे, जब हम अकेले नमाज़ पढ़ रहे हों या फिर हममें से कोई इमाम हो...
18
हम अपने दोनों हाथों को कंधों अथवा कानों तक उठाएँगे। यह तीसरा स्थान है, जहाँ हम अपने हाथों को उठाते हैं।
19
फिर हम सीधे खड़े हो जाएँगे और कहेंगे :
"رَبَّنَا ولكَ الحَمْدُ" (ऐ हमारे पालनहार, सारी प्रशंसा तेरी ही है।)
20
रुकू से उठने के बाद हम अपने हाथों को छोड़कर भी रख सकते हैं और उन्हें बाँध भी सकते हैं...
21
रूकू से उठने के बाद देर तक खड़े रहना और इतमीनान से खड़े रहना सुन्नत है।
22
अल्लाहु अकबर...
फिर हम क़याम से सजदे की तरफ़ जाने की तकबीर कहते हुए ज़मीन की तरफ़ झुकेंगे।
अपने हाथों को घुटनों से पहले या घुटनों को हाथों से पहले रखेंगे। दोनों में वही करेंगे, जो हमारे लिए अधिक आसान हो।
23
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षा के अनुसार सात अंगों पर सजदा करना वाजिब है :
नाक के साथ पेशानी, दोनों हथेलियाँ, दोनों क़दम और दोनों घुटने।
24
हम दोनों क़दमों की उँगलियों के किनारों का मुँह क़िबला की ओर रखेंगे और दोनों पैरों को खड़ा रखेंगे।
दोनों रानों को एक-दूसरे से अलग और पेट को उन दोनों से अलग रखेंगे।
यदि हम जमात से नमाज़ न पढ़ रहे हों और आस-पास के लोगों को कष्ट देने का डर न हो, तो दोनों हाथों को ज़मीन से ऊँचा और पहलू से अलग रखेंगे।
दोनों हथेलियों को कंधों अथवा कानों के बराबर रखेंगे...
25
"سبحانَ ربِّي الأعلى" (मेरा सर्वोच्च पालनहार पवित्र है।)
हम इस तसबीह को तीन बार कहेंगे, जो कि संपूर्णता की निम्नतम संख्या है। जबकि एक बार कहना भी काफ़ी है। हम चाहें तो तीन से अधिक बार भी कह सकते हैं। हम अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित अलग-अलग तसबीहों में से कभी एक को तो कभी दूसरी को पढ़ लिया करेंगे और दुनिया तथा आख़िरत की जो भलाइयाँ चाहेंगे, माँगेंगे।
26
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः, तुम उसमें ख़ूब दुआएँ किया करो।"
27
अल्लाहु अकबर...
तकबीर कहते हुए हम रुकू से सर उठाएँगे...
बाएँ पाँव को बिछा देंगे और उसपर इतमीनान से बैठ जाएँगे। दाएँ पाँव को खड़ा रखेंगे और उसकी उँगलियों को क़िबला की ओर मोड़ देंगे।
या फिर...
दोनों क़दमों को खड़ा रखेंगे और दोनों एड़ियों पर बैठ जाएँगे...
दाईं हथेली को दाईं रान पर और बाईं हथेली को बाईं रान पर घुटने के निकट या घुटने पर रख देंगे।
28
"ربِّي اغفر لي" (ऐ मेरे पालनहार, मुझे क्षमा कर।)...
इस दुआ को दोनों सजदों के बीच इतमीनान से बैठकर पढ़ेंगे...
29
अल्लाहु अकबर
तकबीर कहते हुए दूसरे सजदे के लिए झुकेंगे। दूसरे सजदे का तरीक़ा और दुआएँ पहले सजदे के समान ही हैं।
30
अल्लाहु अकबर...
फिर हम दूसरी रकात उसी तरह अदा करेंगे, जिस तरह पहली रकात अदा की थी :
दोनों हाथों को बाँधेंगे, सूरा फ़ातिहा पढ़ेंगे तथा क़ुरआन की कोई आयत अथवा कुछ आयतें पढ़ेंगे...
फिर रूकू करेंगे...
अल्लाहु अकबर...
और खड़े होंगे...
"سَمِعَ اللهُ لمَنْ حَمِدَه" (अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।)...
फिर सजदे के लिए जाएँगे।
अल्लाहु अकबर...
दो सजदे करेंगे। फिर तशह्हुद के लिए बैठेंगे...
अल्लाहु अकबर...
अल्लाहु अकबर...
अल्लाहु अकबर...
31
दूसरी रकात पूरी करने के बाद तशह्हुद के लिए बैठना है। इस बैठक में बाएँ पाँव को बिछाकर बैठेंगे...
32
बाएँ पाँव को बिछाकर बैठने की विधि से दो रकात वाली नमाज़ों, जैसे सुबह, जुमा और दोनों ईदों की नमाज़ों में बैठा जाता है। तीन तथा चार रकात वाली नमाज़ों के पहले तशह्हुद में और दो सजदों के बीच भी इसी तरह बैठा जाता है...
33
जो भारी शरीर या पाँव में कष्ट आदि के कारण बायाँ पाँव बिछाकर न बैठ सकता हो, वह जिस विधि से चाहे बैठ सकता है...
34
तशह्हुद में, हम दाएँ हाथ को दाईं रान पर रखेंगे और शहादत की उँगली को छोड़ शेष उँगलियों से मुट्ठी बाँधे रहेंगे तथा शहादत की उँगली से इशारा करते रहेंगे...
35
या फिर अंगूठा तथा मध्यमा का घेरा बना लेंगे और शहादत की उँगली से इशारा करते रहेंगे...
36
रही बात बाएँ हाथ की, तो उसे या तो बाईं रान पर रख देंगे या उससे घुटने को पकड़े रहेंगे।
तशह्हुद की अवस्था में नज़र को दाएँ हाथ की शहादत की उँगली पर रखना मुसतहब है।
37
"التَّحِيَّاتُ للهِ والصَّلواتُ والطَّيِّباتُ، السلامُ عليكَ أيُّها النبيُّ ورحمةُ اللهِ وبرَكاتُه، السلامُ علَينا وعلى عِبادِ اللهِ الصَّالِحِين، أشهدُ أن لا إلهَ إلَّا اللهُ، وأشهدُ أنَّ محمَّدًا عبدُهُ ورسولُه" (हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं साक्षी देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।)
यदि नमाज़ तीन अथवा चार रकात वाली हो, तो हम केवल पहला तशह्हुद ही पढ़ेंगे।
लेकिन यदि दो रकात वाली हो, जैसे सुबह, जुमा अथवा दोनों ईदों की नमाज़ें, तो तशह्हुद को दरूद-ए-इबराहीमी द्वारा पूरा करेंगे...
"اللهُمَّ صلِّ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما صَلَّيتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد، اللهمَّ بارِكْ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما باركتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد" (हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।)
38
"السلامُ عليكُم ورحمةُ اللهِ" (तुमपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो)...
"السلامُ عليكُم ورحمةُ اللهِ" (तुमपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो)...
तशह्हुद तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस में वर्णित दुआएँ पढ़ने के बाद सलाम फेर देंगे... लेकिन ऐसा दो रकात वाली नमाज़ों में करेंगे...
39
हम हल्के से सुनाकर अल्लाहु अकबर कहेंगे...
लेकिन यदि नमाज़ तीन रकात वाली जैसे मग़्रिब या चार रकात वाली जैसे ज़ुहर, अस्र या इशा की हो,
40
तो तशह्हुद के बाद खड़े हो जाएँगे, ताकि मग़्रिब पढ़ने की स्थिति में एक रकात एवं ज़ुह्र, अस्र एवं इशा पढ़ने की स्थिति में दो रकात पढ़ सकें। शेष रकातों के क़याम में हम सूरा फ़ातिहा पढ़ेंगे और साथ ही सारे कार्य करेंगे और दुआएँ पढ़ेंगे, जिनका विवरण रुकू, सजदा, क़याम एवं बैठक के अंतर्गत आ चुका है...
41
अल्लाहु अकबर...
42
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो तशह्हुद वाली हर नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में तवर्रुक करके बैठते थे...
43
अतः, केवल तीन तथा चार रकात वाली नमाज़ों के अंतिम तशह्हुद में ही तवर्रुक की अवस्था में बैठा जाएगा। ज्ञात हो कि तवर्रुक के एक से अधिक रूप हैं :
44
उसका एक रूप है बाएँ पाँव को बिछाना, दाएँ पाँव को खड़ा रखना, उन दोनों को दाएँ जानिब से बाहर निकाल देना एवं दोनों चूतड़ों को धरती पर रखना।
या फिर :
दोनों क़दमों को बिछा देना और दोनों को दाएँ जानिब से निकाल देना।
या फिर :
दाएँ पाँव को बिछा देना और बाएँ पाँव को दाएँ पाँव की रान और पिंडली के बीच घुसा देना।
45
अंतिम तशह्हुद की बैठक में हम तशह्हुद पढ़ेंगे और फिर उसके बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजेंगे।
46
सलाम से पहले और तशह्हुद पाठ करने के बाद हम निम्नलिखित चार चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगेंगे : जहन्नम की यातना से, क़ब्र की यातना से, जीवन तथा मृत्यु के फ़ितने से और काना दज्जाल की बुराई से...
फिर दुनिया एवं आख़िरत की जितनी भलाइयाँ चाहें, माँगेंगे...
47
"السلامُ عليكُم ورحمةُ اللهِ" (तुमपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो)...
"السلامُ عليكُم ورحمةُ اللهِ" (तुमपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो)...
नमाज़ पूरी करने और उससे बाहर निकलने के लिए सलाम फेरना ज़रूरी है...
48
सलाम फेरते ही हम अपनी नमाज़ पूरी कर लेंगे।
"أسْتَغْفِرُ الله" (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ)..."أسْتَغْفِرُ الله" (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ)..."أسْتَغْفِرُ الله" (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ)...
49
सुन्नत यह है कि नमाज़ी सलाम फेरने के बाद अल्लाह से तीन बार क्षमा माँगे और उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित अज़कार के ज़रिए अल्लाह का स्मरण करे...
क्रमांक
स्क्रीन पर लिखा हुआ
1
आप इमाम हों या फिर अकेले नमाज़ पढ़ रहे हों
2
तकबीर-ए-एहराम
3
हम दोनों हाथों को दोनों कंधों तक उठाएँगे
4
या फिर हम उन्हें उक्त पद्धति से दोनों कानों के बराबर उठाएँगे...
5
हम दोनों हाथों को सीने पर रखेंगे
6
या नाभि के ऊपर
7
या नाभि के नीचे
8
हम अपने दाएँ हाथ को बाएँ हाथ की हथेली पर रखेंगे
9
या फिर दाएँ हाथ की हथेली से बाएँ हाथ की हाथ की कलाई को पकड़ लेंगे...
10
नमाज़ आरंभ करने की दुआ
11
" اللّهُم بَاعِد بَيْنِي وبَيْنَ خَطاياي كما بَاعَدْت بين المَشْرِق والمِغرب، اللَّهم نَقِّنِيَ من خطاياي كما يُنَقَّى الثوب الأبيض من الدَّنَس، اللَّهم اغْسِلْنِي من خَطَاياي بالثَّلج والماء والبَرد" (ऐ अल्लाह, मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह, मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह, मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।) इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
12
इन्हें पढ़ने के मामले में विविधता रखना सुन्नत है
13
शरण माँगना
14
"أعوذُ باللهِ منَ الشَّيطانِ الرَّجِيم" (मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।)
15
सूरा अल-फातिहा
16
"الحمد لله رب العالمين الرحمن الرحيم مالك يوم الدين إياك نعبد وإياك نستعين اهدنا الصراط المستقيم صراط الذين أنعمت عليهم غير المغضوب عليهم ولا الضالين" (सब प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं। जो सारे संसार का पालनहार है। जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। जो प्रतिकार (बदले) के दिन का मालिक है। हे अल्लाह, हम केवल तुझी को पूजते हैं और केवल तुझी से सहायता माँगते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा। उनका मार्ग जिनपर तूने पुरस्कार किया। उनका मार्ग नहीं जिनपर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनका जो गुमराह हो गए।)
17
क़बूल कर
18
यह एक दुआ है, जिसका अर्थ है : ऐ अल्लाह, तू ग्रहण कर
19
हम क़ुरआन का जितना भाग हो सके, पढ़ेंगे
20
रुकू...
21
अल्लाह सबसे बड़ा है
22
पीठ कमानी की तरह नहीं, सीधी रहे...
23
"سبحانَ ربِّيَ العظيم" (मेरा महान रब पवित्र है।)
24
रुकू के कुछ वर्णित अज़कार
25
"سُبُّوحٌ قُدُّوسٌ، ربُّ الملائكةِ والرُّوح" (ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है)...
26
"سُبحانَكَ ربَّنا وبحمدِك، اللهمَّ اغفِرْ لي" (ऐ हमारे रब, तू पाक है तथा तेरी प्रशंसा है। ऐ अल्लाह, मुझे क्षमा कर)...
27
"سَمِعَ اللهُ لمَنْ حَمِدَه" (अल्लाह ने उस बंदे की सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की।)
28
"ربَّنا ولكَ الحمدُ، حمدًا كثيرًا طيِّبًا مُبارَكًا فيه" (ऐ हमारे रब, तेरी ही प्रशंसा है, अत्याधिक, पवित्र तथा बरकत वाली प्रशंसा।)
29
हम अपने दोनों हाथों को खुला छोड़ देंगे
30
या उन्हें बाँध लेंगे
31
सजदा
32
पेशानी नाक के साथ
33
दोनों हथेलियाँ
34
दोनों घुटने
35
दोनों क़दम
36
"سُبحانَ ربِّيَ الأعلى" मेरा सर्वोच्च पालनहार पवित्र है...
37
"बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः, तुम उसमें ख़ूब दुआएँ किया करो।" इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
38
बाएँ पाँव को बिछाकर बैठने का आसन...
39
नमाज़ में कुछ मकरूह आसन जैसे कुत्ते का आसन
40
"ربِّ اغفِرْ لي" (ऐ मेरे पालनहार, मुझे क्षमा कर) (इसे तीन बार कहे)
41
"اللهمَّ اغفِرْ لي، وارحَمني، واجبُرني، واهدِني، وارزُقني" (ऐ अल्लाह, मुझे क्षमा कर, मुझपर दया कर, मेरी कमज़ोरी दूर कर, मेरा मार्गदर्शन कर और मुझे रोज़ी दे)...
42
सुबह
43
जुमा
44
दोनों ईद
45
ज़ुह्र
46
अस्र
47
मग़्रिब
48
इशा
49
"التَّحِيَّاتُ للهِ والصَّلواتُ والطَّيِّباتُ، السلامُ عليكَ أيُّها النبيُّ ورحمةُ اللهِ وبرَكاتُه، السلامُ علَينا وعلى عِبادِ اللهِ الصَّالِحِين، أشهدُ أن لا إلهَ إلَّا اللهُ، وأشهدُ أنَّ محمَّدًا عبدُهُ ورسولُه" (हर प्रकार का सम्मान, समस्त दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे। मैं साक्षी देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल हैं।)
50
"اللهُمَّ صلِّ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما صَلَّيتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد، اللهمَّ بارِكْ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما باركتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد" (हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।)
51
जुह्र - अस्र - मग़्रिब - इशा
52
सुबह - जुमा - दोनों ईद.
53
"اللهُمَّ صلِّ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما صَلَّيتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد، اللهمَّ بارِكْ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما باركتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد" (हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी आल की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है।)
54
"السَّلامُ عليكُم ورحمةُ الله" (तुमपर सलामती और अल्लाह की रहमत हो।)
55
"तथा जब अंतिम रकात में बैठते, तो अपने बाएँ पाँव को आगे कर देते, दाएँ पाँव को खड़ा रखते और नितंब के बल पर बैठते।" इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
56
तवर्रुक के साथ बैठने का आसन
57
"اللَّهُمَّ إنِّي أَعُوذُ بِكَ مِن عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ عَذَابِ القَبْرِ، وَمِنْ فِتْنَةِ المَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ المَسِيحِ الدَّجَّالِ" (हे अल्लाह मैं तेरी शरण चाहता हूँ, नरक के दण्ड से और कब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फितने से, और मसीह दज्जाल के फितने से।) इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है।
58
"اللَّهمَّ إنِّي ظلَمتُ نَفسي ظلمًا كثيرًا، ولا يغفرُ الذُّنوبَ إلَّا أنتَ، فاغفِر لي مغفرةً من عندِكَ وارحَمني إنَّكَ أنتَ الغفورُ الرَّحيمُ" (ऐ अल्लाह! मैंने अपने आप पर बड़ा अत्याचार किया है और तेरे सिवा कोई पापों को क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए मुझे अपनी ओर से क्षमा प्रदान कर और मुझपर दया कर। निःसंदेह तू अत्यंत क्षमा करने वाला, अति दयालु है।)
59
"أستَغفِرُ اللهَ" (मैं अल्लाह से क्षमा माँगता हूँ।) (तीन बार कहे)।
60
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुना है : "क़यामत के दिन इनसान के जिस अमल का हिसाब सबसे पहले होगा, वह नमाज़ है। यदि नमाज़ ठीक रही, तो वह कामयाब एवं सफल रहा। परन्तु यदि नमाज़ ठीक नहीं रही, तो वह नाकाम एवं असफल हो गया।" इस हदीस को अबू दाऊद, तिरमिज़ी और नसई ने रिवायत किया है।