صفة العمرة لابن باز
उमरा का तरीक़ा
उमरा का तरीक़ा
लेखक
अबदुल अज़ीज़ बिन अबदुल्लाह बिन बाज़
सारी प्रशंसा अल्लाह की है। इसके बाद मूल विषय पर आते हैं।
यह उमरा के दौरान किए जाने वाले कार्यों का संक्षिप्त विवरण है। आइए बात शुरू करते हैं :
जब कोई व्यक्ति उमरा के इरादे से मीक़ात पहुँचे, तो मुसतहब यह है कि स्नान कर ले और साफ़-सुथरा हो जाए। महिला भी यही करेगी। माहवारी या निफ़ास की अवस्था में हो, तब भी। अलबत्ता, वह पाक होने और स्नान करने से पहले काबा का तवाफ़ नहीं कर सकती।
पुरुष अपने शरीर में खुशबू भी लगा ले। लेकिन एहराम के कपड़ों में नहीं। अगर मीक़ात में स्नान करना संभव न हो, तब भी कोई बात नहीं है। ऐसे में हो सके, तो मक्का पहुँचने के बाद तवाफ़ से पहले स्नान कर लेना वांछित है।
पुरुष सभी सिले हुए कपड़े उतार कर केवल लुंगी एवं चादर पहन ले। दोनों कपड़ों का सफ़ेद एवं साफ़-सुथरा होना मुसतहब है।
महिला अपने साधारण कपड़े (नक़ाब, बुरक़ा 1 और दस्ताने छोड़कर। इन्हें उतार देगी और अपने चहरे तथा दोनों हथेलियों का ग़ैर-महरमों से पर्दा अन्य कपड़ों द्वारा करेगी) पहनकर एहराम बाँधेगी, जो शृंगार से खाली हों और आकर्षण का कंद्र न बनते हों।
फिर दिल में उमरा की नीयत करे और ज़बान से ( मैं उमरा के लिए उपस्थित हूँ) या (ऐ अल्लाह! मैं उमरा के लिए उपस्थित हूँ) कहे। अगर एहराम बाँध रहे व्यक्ति को इस बात का डर हो कि बीमारी या दुश्मन के भय के कारण एहराम के कार्य पूरे नहीं कर पाएगा, तो एहराम के समय शर्त रख सकता है और कह सकता है : अगर कोई रुकावट आ गई, तो मैं वहीं हलाल हो जाऊँगा, जहाँ रुकावट आ जाए। इसका प्रमाण ज़बाआ बिंत ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अनहा की हदीस है। [1] बैहक़ी की अल-सुनन अल-कुबरा, हदीस संख्या - 10117.
फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सिखाया हुआ तलबिया कहा। आपका सिखाया हुआ तलबिया यह है : "में उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।" काबा पहुँचने तक ज़्यादा से ज़्यादा तलबिया पढ़ता रहे और अल्लाह का ज़िक्र तथा उससे दुआ करता रहे। "में उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।" इस तलबिया को ज़्यादा से ज़्यादा पढ़े, अल्लाह का ज़िक्र और दुआएँ खूब करे। यह सिलसिला अल्लाह के घर काबा पहुँचने तक जारी रहे।
इस दौरान पुरुष की आवाज़ ऊँची रहे और महिला की धीमी। सहाबा ने ऐसा ही किया था।
काबा के पास पहुँचने के बाद तलबिया बंद कर दे, फिर हजर-ए-असवद के पास जाए, उसके सामने खड़े हो, उसे दाएँ हाथ से छूए और आसानी से संभव हो तो चूम ले। अगर आसानी से चूमना संभव न हो, तो भीड़ लगाकर लोगों को कष्ट न दे। चूमते समय "मैं अल्लाह के नाम से चूमता हूँ और अल्लाह सबसे बड़ा है" कहे। अगर चूमना कठिन हो, तो हाथ या लाठी आदि से छू ले और जिससे छुआ है उस वस्तु को चूम ले। अगर छूना भी कठिन हो, तो उसकी ओर इशारा करे और "अल्लाह सबसे बड़ा है" कहे तथा जिस चीज़ से इशारा किया है, उसको न चूमे।
तवाफ़ के सही होने के लिए तवाफ़ करने वाले का छोटी और बड़ी दोनों नापाकियों से पाक होना ज़रूरी है। क्योंकि तवाफ़ भी नमाज़ ही की तरह है। अंतर बस इतना है कि तवाफ़ में बात करने की छूट है।
तवाफ़ शुरू करते समय काबा को अपने बाएँ ओर रखे, और उसके बाद सात चक्कर लगाए। रुक्न-ए-यमानी के निकट पहुँचने पर हो सके तो उसे दाएँ हाथ से छूए और "मैं अल्लाह के नाम से छूता हूँ और अल्लाह सबसे बड़ा है" कहे, उसको न चूमे। अगर छूना कठिन हो, तो छोड़ दे और तवाफ़ जारी रखे। न उसकी ओर इशारा करे और न तकबीर कहे। क्योंकि ऐसा करना अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित नहीं है।
लेकिन जहाँ तक हजर-ए-असवद की बात है, तो उसके सामने पहुँचने पर हर बार उसे छूए, चूमे या उसकी ओर इशारा करे और तकबीर कहे। जैसा कि हमने अभी-अभी बताया है। तवाफ़-ए-क़दूम के पहले तीन चक्करों में विशेष रूप से पुरुषों के लिए छोटे-छोटे क़दमों के साथ तेज़ चलना मुसतहब है। तवाफ़-ए- कुदूम के पहले तीन चक्करों में विशेष रूप से पुरुषों के लिए छोटे-छोटे क़दमों के साथ तेज़ चलना मुसतहब है।
पुरुषों के लिए तवाफ़-ए-क़ुदूम के सभी चक्करों में ओढ़े हुए चादर के मध्य भाग को दाएँ कंधे के नीचे से निकालकर उसके दोनों किनारों को बाएँ कंधे पर डाले रखना मुसतहब है। जबकि इज़तिबा कहते हैं चादर के बीच वाले भाग को दाएँ बग़ल के नीचे से गुज़ार लेने और दोनों किनारों को बाएँ कंधे के ऊपर रख लेने को।
तवाफ़ के दौरान अधिक से अधिक ज़िक्र एवं दुआ में व्यस्त रहना मुसतहब है।
तवाफ़ की कोई ख़ास दुआ या ज़िक्र नहीं है। जो भी अज़कार और दुआएँ हो सके, पढ़ता रहे। जबकि दोनों रुक्नों के बीच कहे : ''ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और आख़िरत में भी भलाई प्रदान कर और हमें आग की यातना से बचा।'' [सूरा बक़रा : 201] यह दुआ हर चक्कर में पढ़े। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ऐसा करना साबित है।
सातवें चक्कर का अंत हो सके तो हजर-ए-असवद को छुने एवं चूमने या फिर उसकी ओर इशारा करने एवं अल्लाहु अकबर कहने पर करे। उसी विवरण के अनुसार जो अभी-अभी गुज़रा है। यह तवाफ़ पूरा हो जाए, तो चादर इस तरह ओढ़ ले कि चादर दोनों कंधों पर रहे और उसके दोनों किनारे सीने पर।
फिर दो रकात नमाज़ हो सके तो मक़ाम-ए-इब्राहीम के पीछे पढ़े। अगर संभव न हो, तो मस्जिद के किसी भी स्थान पर पढ़ ले। इसकी पहली रकात में सूरा अल-फ़ातिहा के बाद सूरा अल-काफ़िरून और दूसरी रकात में सूरा अल-इख़लास पढ़े। यह बेहतर तरीक़ा है। वैसे, अन्य सूरतें भी पढ़ी जा सकती हैं। दो रकातें पढ़ लेने के बाद हो सके तो दोबारा हजर-ए-असवद के पास जाए। "कह दीजिए, ऐ काफ़िरो" [सूरा काफ़िरून : 1] पहली रकात में, एवं "कह दीजिए, अल्लाह एक है" [सूरा इखलास : 1] दूसरी रकात में। यही बेहतर है। अन्य सूरतें पढ़ ले, तब भी कोई बात नहीं है। दो रकात नमाज़ पढ़ लेने के बाद हजर-ए-असवद के पास जाए और हो सके, तो उसे दाएँ हाथ से छूए। तवाफ़ की दो रकातें पढ़ लेने के बाद हो सके तो ज़मज़म का पानी पीना सुन्नत है।
फिर सफ़ा की ओर निकल पड़े और उसके ऊपर चढ़े या उसके पास खड़ा हो। संभव हो, तो चढ़ना उत्तम है। वहाँ यह आयत पढ़े : (निश्चय ही सफ़ा एवं मर्वा अल्लाह की निशानियों में से हैं...।) [सूरा अल-बक़रा : 158]
यहाँ क़िबला की ओर मुँह करके खड़े होकर अल्लाह की प्रशंसा एवं बड़ाई बयान करना और यह दुआ पढ़ना मुसतहब है : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है तथा उसी की समस्त प्रशंसा है, वह हर चीज़ पर सक्षम है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपने वादे को पूरा किया, अपने बंदे की सहायता की, तथा अकेले सेनाआों को परास्त कर दिया।" फिर दोनों हाथों को उठाकर जो दुआ हो सके, करे। इस दुआ तथा अन्य दुआओं को तीन-तीन बार दोहराए। "अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, सारी प्रशंसा अल्लाह की है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है तथा उसी की समस्त प्रशंसा है, वह हर चीज़ पर सक्षम है। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपने वादे को पूरा किया, अपने बंदे की सहायता की, तथा अकेले सेनाआों को परास्त कर दिया।" [2] फिर जो दुआ हो सके, करे। इस ज़िक्र तथा अन्य दुआओं को तीन-तीन बार दोहराए। यही सुन्नत तरीक़ा है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़िबला की ओर मुँह करके यही किया था। फिर उतरकर पहले चिह्न की ओर पैदल जाए। पुरुष तेज़ चलकर दूसरे चिह्न तक जाए। [2] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या-1218.
लेकिन महिला तेज़ न चले, क्योंकि वह संपूर्ण छुपाने की वस्तू है। फिर आगे बढ़े और मर्वा पर्वत के ऊपर चढ़े या उसके पास खड़े हो। संभव हो तो ऊपर चढ़ना ही उत्तम है। फिर मर्वा पर वही कहे और करे, जो सफ़ा पर कहा और किया था। फिर नीचे उतर आए और जहाँ चलना हो वहाँ चले और जहाँ दौड़ना हो, वहाँ दौड़े। इस तरह सफ़ा तक पहुँच जाए। इस तरह सात चक्कर लगाए। जाना एक चक्कर है और लौटना एक चक्कर। यह काम सवार होकर भी किया जा सकता है। विशेष रूप से ज़रूरत होने पर। यह काम सवार होकर भी किया जा सकता है। विशेष रूप से ज़रूरत होने पर। सातों चक्कर लगाते समय अधिक से अधिक ज़िक्र करना चाहिए और जो दुआएँ हो सके, पढ़ना मुसतहब है। छोटी एवं बड़ी दोनों नापाकियों से पाक होना भी मुसतहब है।
सातों चक्कर लगाते समय अधिक से अधिक ज़िक्र करना चाहिए और जो दुआएँ हो सके, पढ़ना मुसतहब है। छोटी एवं बड़ी दोनों नापाकियों से पाक होना भी मुसतहब है, लेकिन इसके बिना भी सई हो सकती है।
जब सातों चक्कर लगाने का कार्य पूरा हो जाए, तो पुरुष अपने सिर मुंडवा ले या सिर के बाल छोटे करवा ले। वैसे, मुंडवाना ही उत्तम है। लेकिन यदि मक्का पहुँचना हज के समय के निकट हुआ हो, तो छोटे करवाना ही उत्तम है, ताकि बचे हुए बालों को हज में मुंडवाया जा सके। जबकि औरत अपने बालों को जमा करके उंगली के एक पोर के बराबर या उससे कुछ कम काट लेगी। एहराम किए हुए व्यक्ति ने जब ऊपर बयान किए गए सारे काम कर लिए, तो उसका उमरा पूरा हो गया और एहराम के कारण हराम होने वाली सारी चीज़ें अब उसके लिए हलाल हो गईं। (अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उमरा पूरा करने के बाद दो रकात नमाज़ नहीं पढ़ी है, इसलिए जिसे आपसे प्रेम हो, वह आपके पद्चिह्नों पर चले।) "निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।" [सूरा अहज़ाब : 21]
दुआ है कि अल्लाह हमें और हमारे तमाम मुसलमान भाइयों को दीन को जानने एवं समझने तथा उसपर सुदृढ़ रहने का सुयोग प्रदान करे और हम सब की इबादतें स्वीकार करे। निश्चित रूप से वह बड़ा दाता एवं उपकारी है।
दरूद व सलाम हो अल्लाह के बंदे तथा उसके रसूल, हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तथा आपके परिजनों, साथियों और क़यामत के दिन तक आपके बताए हुए मार्ग पर चलने वालों पर।
यह उमरा के दौरान किए जाने वाले कार्यों का संक्षिप्त विवरण है, जो शैख़ इब्ने बाज़ के कार्यालय से 13/2/1426 हिजरी को निर्गत हुआ है। (मजमू फ़तावा व मक़ालात शैख़ इब्ने बाज़ 17/425)