عقيدة أهل السنة والجماعة

عقيدة أهل السنة والجماعة

مطوية مختصرة توضح مبادئ العقيدة الإسلامية على منهج أهل السنة والجماعة. يشرح الشيخ العثيمين فيها أسس الإيمان بالله، وملائكته، وكتبه، ورسله، واليوم الآخر، والقدر خيره وشره، مع تقديم الأدلة من القرآن الكريم والسنة النبوية. يركز الشيخ على توضيح توحيد الربوبية، والألوهية، والأسماء والصفات، وبيان الفرق بين أهل السنة والجماعة وغيرهم من الفرق. تتميز المطوية بالأسلوب الواضح والمبسط، مما يجعلها مرجعًا قيمًا للطلاب والعلماء وجميع المسلمين الراغبين في فهم عقيدتهم بشكل صحيح ومتعمق.

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अहले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा

लेखक फ़ज़ीलतुश शैख़ अल्लामा

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

अल्लाह तआला उनकी तथा उनके माता-पिता और समस्त मुसलमानों की मग़्फ़िरत फ़रमाये

*

अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं बेहद दयावान है।

प्रस्तावना: समाहतुश शैख़

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

समस्त प्रशंसा केवल अल्लाह के लिए है, तथा दया और शांती (दरूद व सलाम) अवतरित हो उनपर जिनके पश्चात कोई नबी नहीं आने वाला है, तथा उनके परिवार-परिजन और सहाबा पर,अम्मा बाद।

मैं अक़ीदा (विश्वास) संबंधी इस मूल्यवान संक्षिप्त पुस्तक से अवगत हुआ, जिसे हमारे भाई माननीय महान विद्वान मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन ने संकलन किया है।मैं ने इस पुस्तक को शुरू से अन्त तक पढ़वाकर सुना, तो इसे अल्लाह की तौहीद तथा उसके नामों और गुणों के अध्याये में, और फ़रिश्तों, पुस्तकों, रसूलों, आख़िरत (परलोक) के दिन और भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान के अध्यायों में‘ अहले सुन्नत वल जमाअत के अक़ीदे के अनुसार प्रस्तुत एक संग्रह पाया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि लेखक महोदय ने बड़ी उत्तमता से इसे एकत्र किया एवं उपयोगी बनाया है । इस पुस्तक में उन्होंने उन चीज़ों का उल्लेख किया है, जो एक विद्यार्थी एवं साधारण मुसलमान के लिए अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, किताबों, रसूलों, अंतिम दिन और भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान के संबंध में आवश्यक होती हैं, तथा इसके साथ-साथ उन्होंने अक़ीदा सम्बन्धी ऐसी बहुत सारी लाभजनक बातों का भी वर्णन किया है, जो कभी-कभी अक़ीदे के बारे में लिखी गई बहुत सारी पुस्तकों में नहीं मिलतीं।

अल्लाह तआला लेखक महोदय को इसका अच्छा बदला दे, तथा उनके ज्ञान और हिदायत (मार्गदर्शन) मेें वृद्धि करे । इस पुस्तक तथा उनकी अन्य पुस्तकों को लोगों के लिए हितकर एवं लाभदायक बनाए, तथा उन्हें, हमें और हमारे सभी भाइयों को हिदायत पाने वालों,शुद्ध मार्ग की ओर मार्गदर्शन करने वालों और ज्ञान के साथ, लोगों को उस का संदेश देने वालों में से बनाये ।निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला एवं अत्यन्त निकट है।

ऊपर लिखित बातों को अल्लाह तआला का मोहताज अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ (रहिमहुल्लाह) ने लिखवाया है, अल्लाह तआला उनको माफ करे, तथा दया और शांती (दरूद व सलाम) अवतरित हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, तथा उनके परिवार-परिजन और सहाबा किराम पर।

महाध्यक्ष

इस्लामी वैज्ञानिक अनुसंधान, इफ़्ता, दावह तथा मार्गदर्शन संस्थान, (रियाद, सऊदी अरब)

*

अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं बेहद दयावान है।

समस्त प्रशंसा सारे संसार के पालनहार के लिए है,तथा अन्तिम सफलता अल्लाह से डरने वालों के लिए है और आक्रामकता का व्यवहार केवल अत्याचारियों के साथ ( उन के अत्याचार के अनुरूप) दुरुस्त है। और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य मअबूद (पूज्य) नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, वह मलिक (बादशाह) है, हक़्क़ (सत्य) है, मुबीन (प्रकट करने वाला) है । और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसके दास तथा उसके रसूल (संदेष्टा) हैं, जो समस्त नबियों में अन्तिम हैं और सदाचारियों के अगुवा हैं । अल्लाह तआला की कृपा नाज़िल हो उनपर, उनके परिवार-परिजन पर, उनके साथियों (सहाब) पर और बदले के दिन तक भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वालों पर ।

अम्मा बाद! अल्लाह तआला ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को हिदायत (मार्गदर्शन) तथा सत्य धर्म देकर, सम्पूर्ण जगत के लिए रहमत (कृपा), अच्छे कर्म करने वालों के लिए आदर्श तथा तमाम बन्दों पर हुज्जत (प्रमाण) बनाकर भेजा ।आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़रिया तथा आप पर अवतरित पुस्तक (क़ुर्आन) औरहिक्मत (हदीस) द्वारा अल्लाह तआला ने वह सब कुछ बयान कर दिया, जिसमें बन्दों के लिए कल्याण तथा उनके सांसरिक एवं धार्मिक मामलों की भलाई निहित है।जैसे सही अक़ायद, पुण्य के कर्म, उत्तम व्यवहार तथा उच्चतम शिष्टाचार।

सो प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत को उसउज्जवल मार्ग पर छोड़कर इस संसार से गये हैं, जिसकी रात भी दिन की तरह प्रकाशमान है, केवल नाशवान ही इस मार्ग से भटक सकता है।

चुनांचे इस मार्ग का अनुसरण दृढ़ता के साथ आपकी उम्मत के उन लोग ने किया, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आहवान को स्वीकार किया। वह सहाबए किराम, ताबेईने इज़ाम और सुचारु रूप से उनका अनुसरण करने वालों की जमाअत थी। वे सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ एवं शुद्ध आत्मा वाले थे।उन्होंने प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत के अनुसार कर्म किये, तथा सुन्नत को दृढ़ता से थामे रखा औरअ दृढ़ता के साथ, अक़ीदा, उपासना (इबादत) तथा व्यवहार और आचरण मेें इस का अनुसरण किया। इसी लिए वे, वह दल घोषित हुए, जो सदा सत्य पर स्थिर रहेंगे, उनका विरोध एवं निन्दा करने वाले उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकते, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ जाए और वह उस समय भी इसी मार्ग पर क़ायम रहेंगे।

और हम भी -अल हम्दु लिल्लाह- उन्हीं के मार्ग पर चल रहे हैं तथा उनके तरीक़े को अपनाये हुए हैं, जिसे अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत का समर्थन प्राप्त है। हम इसकी चर्चा अल्लाह की नेमत को बयान करने के लिए और उस मार्ग की स्पष्टीकरण के लिए कर रहे हैं कि जिस का अनुयायी होना हर मोमिन (ईमान वाले) के लिये आवश्यक है।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि हमें तथा हमारे मुसलमान भाइयों को लोक-परलोक में कलमए तौहीद पर दृढ़ता के साथ क़ायम रखे तथा हमें अपनी कृपा से सम्मानित करे । निःसंदेह वह सब से बडा दाता है ।

और इस विषय के महत्व को सामने रखकर और इस बारे में लोगों की प्रवृत्ति की विभक्ति के कारण मैंने बेहतर समझा कि अहले सुन्नत वल-जमाअत के अक़ीदे को, जिस पर हम चल रहे हैं, संक्षिप्त तौर पर उपलब्ध कर दूँ। और अहले सुन्नत वल-जमाअत का अक़ीदा यह है: अल्लाह तआला, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, क़यामत के दिन एवं भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान लाना। मैं अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि वह इस कार्य को सिर्फ अपने लिए करने का सामर्थ्य दे, तथा इस को अपनी पसंद केअनुसाार और अपने बन्दों के लिए लाभदायक बनाये।

संग्रह-कर्ता

*

हमारा अक़ीदा (विश्वास)

हमारा अक़ीदा: अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, आख़िरत के दिन और तक़दीर की भलाई-बुराई पर ईमान लाना है।

हम अल्लाह तआला की रुबूबियत पर ईमान रखते हैं । अर्थात इस बात पर विश्वास रखते हैं कि केवल वही पालने वाला, पैदा करने वाला, हर चीज़ का स्वामी तथा सभी कार्यों का व्यवस्था करने वाला है ।

और हम अल्लाह तआला की उलूहियत (अर्थात उसके पूज्य होने) पर ईमान रखते हैं। अर्थात इस बात पर विश्वास रखते हैं कि वही सच्चा मअबूद है और उसके अतिरिक्त तमाम मअबूद असत्य हैं।

और अल्लाह तआला के नामों तथा उसके गुणों पर भी हमारा ईमान है । अर्थात इस बात पर हमारा विश्वास है कि अच्छे से अच्छे नाम और उच्चतम तथा पूर्णतम गुण उसी के लिए हैं ।

और हम इन मामलों में उसकी वहदानियत (एकत्ववाद) पर ईमान रखते हैं । अर्थात इस बात पर ईमान रखते हैं कि उसकी रुबूबियत, उलूहियत तथा असमा व सिफ़ात (नाम व गुण) में उसका कोई शरीक नहीं । अल्लाह तआला ने कहा: {رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا فَاعْبُدْهُ وَاصْطَبِرْ لِعِبَادَتِهِ هَلْ تَعْلَمُ لَهُ سَمِيًّا} “ वह आकाशों एवं धरती का तथा जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबका प्रभू है, इस लिए उसी की उपासना करो तथा उसी की उपासना पर दृढ़ रहो । क्या तुम उसका कोई समकछ जानते हो? ” (सूरह मर्यम :65)

और हमारा ईमान है कि: {اللّهُ لاَ إِلَـهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيم} [البقرة:255].अल्लाह तआला ही सत्य मअबूद है, उसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं।वह जीवित और सब को स्थिर रखने वाला है। उसे ऊँघ तथा निद्रा नही आती है। जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, उसी का है। कौन है, जो उसकी अनुमती के बिना उसके सामने किसी की अनुशंसा (शफाअत) कर सके? जो कुछ लोगों के सामने (भविषय मेें) होने वाला है तथा जो कुछ उनके पीछे (अतीत में) हो चुका है, वह सब को जानता है। वह उसके ज्ञान मेे से वही जान सकते हैं जिसे वह चाहे। उसकी कुर्सी की परिधि ने आकाश एवं धरती को घेरे में ले रखा है। तथा उन दोनों की रक्षा उसे नही थकाती। वह सर्वोच्च एवं महान है।” (सूरह अल-बक़रा: 255)

और हमारा ईमान है क: {هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ هُوَ الرَّحْمَنُ الرَّحِيمُ هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْمَلِكُ الْقُدُّوسُ السَّلَامُ الْمُؤْمِنُ الْمُهَيْمِنُ الْعَزِيزُ الْجَبَّارُ الْمُتَكَبِّرُ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ هُوَ اللَّهُ الْخَالِقُ الْبَارِئُ الْمُصَوِّرُ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى يُسَبِّحُ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ} [الحشر:22-24].वह अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई सत्य मअबूद नहीं। वह प्रोक्ष तथा प्रत्यक्ष का जानने वाला है। वह बहुत बड़ा दयावान एवं अति कृपालु है। वह अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं ।वह स्वामी, अत्यंत पवित्र, सभी दोषों से मुक्त, शान्ति परदान करने वाला, निगरानी करने वाला, बलवंत जो आप्राजित हो, बलपूर्वक आदेश लागु करने वाला,बडाई वााला है। लोग जो साझीदार बनाते हैं, अल्लाह उससे पाक एवं पवित्र है। वही अल्लाह सृष्टिकर्ता, आविष्कारक, रूप देने वाला है। अच्छे-अच्छे नाम उसी के लिए हैं। आकाशों एवं धरती में जितनी चीज़ें हैं, सब उसकी तस्बीह (पवित्रता) बयान करती हैं और वही प्रभावशाली एवं हिक्मत वाला है।” (सूरह अल-हश्र: 22-24)

और हमारा ईमान है कि आकाशों तथा धरती का राजत्व उसी के लिए है : {يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ يَهَبُ لِمَنْ يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَنْ يَشَاءُ الذُّكُورَ أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَاثًا وَيَجْعَلُ مَنْ يَشَاءُ عَقِيمًا إِنَّهُ عَلِيمٌ قَدِيرٌ} [الشورى:49-50]. “ वह जो चाहे पैदा करता है, जिसे चाहता है बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है बेटा देता है, या उनको बेटे और बेटियाँ दोनों प्रदान करता है और जिसे चाहता है निःसंतान रखता है । निःसंदेह वह सब कुछ जानने वाला तथा शक्ति वाला है । ” (सूरह अश्-शूरा : 49-50)

और हमारा ईमान है कि : { لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ لَهُ مَقَالِيدُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَقْدِرُ إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ} [الشورى:11-12] “ उस जैसी कोई चीज़ नहीं, वह सब कुछ सुनने वाला, देखने वाला है। आकाशों एवं धरती की कुंजियाँ उसी के पास हैं। वह जिसके लिए चाहता है, जीविका विस्तृत कर देता है तथा (जिसके लिए चाहता है) थोड़ा कर देता है । निःसंदेह वह प्रत्येक वस्तु का जानने वाला है। ” (सूरह अश्-शूरा: 11-12)

और हमारा ईमान है कि : {وَمَا مِن دَابَّةٍ فِي الأَرْضِ إِلاَّ عَلَى اللّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا كُلٌّ فِي كِتَابٍ مُّبِين} [هود:6]. “ धरती पर कोई चलने-फिरने वाला नहीं, मगर उसकी जीविका अल्लाह के ज़िम्मे है । वही उनके रहने-सहने का स्थान भी जानता है तथा उनको अर्पित किये जाने का स्थान भी । यह सब कुछ खुली किताब (लौहे महफ़ूज़) में मौजूद है । ” (सूरह हूद : 6)

और हमारा ईमान है कि : عنده مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لاَ يَعْلَمُهَا إِلاَّ هُوَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلاَّ يَعْلَمُهَا وَلاَ حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الأَرْضِ وَلاَ رَطْبٍ وَلاَ يَابِسٍ إِلاَّ فِي كِتَابٍ مُّبِين } [الأنعام:59]. “ तथा उसी के पास परोक्ष की कुंजियाँ हैं, जिनको उसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता। तथा उसे थल एवं जल की तमाम चीज़ों का ज्ञान है। तथा कोई पत्ता भी झड़ता है तो वह उसको जानता है। तथा धरती के अन्धेरों में कोई अन्न नहीं गिरता है तथा गीली या सूखी चीज़ नहीं गिरती है, मगर उसका उल्लेख खुली किताब (लौहे महफ़ूज़) में है। ” (सूरह अल्-अन्आम : 59)

और हमारा ईमान है कि : “ निःसंदेह अल्लाह ही के पास क़यामत (महाप्रलय) का ज्ञान है । तथा वही वर्षा देता है, तथा जो कुछ गर्भाशय में है (उसकी वास्तविकता) वही जानता है, तथा कोई नहीं जानता कि कल क्या कमायेगा, तथा कोई जीवधारी नहीं जानता कि धरती के किस क्षेत्र में उसकी मृत्यु होगी । निःसंदेह अल्लाह ही पूर्ण ज्ञान वाला एवं सही ख़बरों वाला है । ” (सूरह लुक़्मान : 34)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला जो चाहे, जब चाहे तथा जैसे चाहे,बात करता है। {وَكَلَّمَ اللّهُ مُوسَى تَكْلِيمًا} [النساء:164]، “ और अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से बात की । ” (सूरह निसा : 164) {وَلَمَّا جَاء مُوسَى لِمِيقَاتِنَا وَكَلَّمَهُ رَبُّهُ} [الأعراف:143]، “ और जब मूसा अलैहिस्सलाम हमारे समय पर (तूर पहाड़ पर) आये और उनके रब ने उन से बातें कीं । ” (सूरह अल्-आराफ़ : 143) {وَنَادَيْنَاهُ مِن جَانِبِ الطُّورِ الأَيْمَنِ وَقَرَّبْنَاهُ نَجِيًّا} [مريم:52]. “ और हमने उनको (अर्थात मूसा अलैहिस्सलाम को) तूर के दायें ओर से पुकारा और गुप्त बात कहते हुए उन को निकट कर लिया। ” (सूरह मर्यम : 52)

और हमारा ईमान है कि : {لَّوْ كَانَ الْبَحْرُ مِدَادًا لِّكَلِمَاتِ رَبِّي لَنَفِدَ الْبَحْرُ قَبْلَ أَن تَنفَدَ كَلِمَاتُ رَبِّي} [الكهف:109]، “ यदि समुद्र मेरे प्रभु की बातों को लिखने के लिए स्याही बन जाये, तो पूर्व इसके कि मेरे प्रभु की बातें समाप्त हों, समुद्र समाप्त हो जाये । ” (सूरह अल्-कह्फ़ : 109) {وَلَوْ أَنَّمَا فِي الأَرْضِ مِن شَجَرَةٍ أَقْلاَمٌ وَالْبَحْرُ يَمُدُّهُ مِن بَعْدِهِ سَبْعَةُ أَبْحُرٍ مَّا نَفِدَتْ كَلِمَاتُ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيم} [لقمان:27]. “ और यदि ऐसा हो कि धरती पर जितने वृक्ष हैं, सब क़लम हों तथा समुद्र स्याही हो तथा उसके बाद सात समुद्र और स्याही हो जायें, फिर भी अल्लाह की बातें समाप्त नहीं हो सकतीं । निःसंदेह अल्लाह प्रभावशाली एवं हिक्मत वाला है । ” (सूरह लुक़्मान : 27)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की बातें सूचनाओं के एतबार से पूर्णतः सत्य, विधि-विधान के एतबार से न्याय संगत तथा सब बातों से सुन्दर हैं । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ صِدْقًا وَعَدْلاً} [الأنعام:115]، “ तथा तुम्हारे प्रभु की बातें सत्य एवं न्याय से परिपूर्ण हैं । ” (सूरह अल्-अन्आम : 115) और फ़रमाया : {وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ اللّهِ حَدِيثًا} [النساء:87]. “ तथा अल्लाह से बढ़कर सत्य बात कहने वाला कौन है ? ” (सूरह अन्-निसा : 87)

तथा हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि क़ुर्आन करीम अल्लाह का शुभ कथन है। निःसंदेह उसने इसे बोला और इसे जिब्रील अलैहिस्सलाम को दिया, फिर इस को लेकर जिब्रील अलैहिस्सलाम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दिल तक पहुंचाने के लिये उतरे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {قُلْ نَزَّلَهُ رُوحُ الْقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِالْحَقِّ} [النحل:102]، “ कह दीजिए, उसको रूहुल क़ुदुस (जिब्रील अलैहिस्सलाम) तुम्हारे प्रभु की ओर से सत्यता के साथ लेकर आये हैं । ” (सूरह अन्-नहल : 102) { وَإِنَّهُ لَتَنْزِيلُ رَبِّ الْعَالَمِينَ نَزَلَ بِهِ الرُّوحُ الْأَمِينُ عَلَى قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ الْمُنْذِرِينَ بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُبِينٍ} [الشعراء:192-195]. “ और यह (पवित्र क़ुर्आन) सारे जहान के पालनहार की ओर से अवतरित किया हुआ है, जिसे लेकर रूहुल अमीन (जिब्रील अलैहिस्सलाम) आये, तुम्हारे दिल में डाला, ताकि तुम लोगों को डराने वालों में से हो जाओ । (यह क़ुर्आन) स्वच्छ अरबी भाषा में है । ” (सूरह अश्-शुअरा : 192-195)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला अपनी ज़ात और गुणों में अपनी सृष्टि से ऊँचा है । क्यों की उसने स्वयं फ़रमाया : {وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيم} [البقرة:255]، “ वह बहुत उच्च एवं बहुत महान है । ” (सूरह अल्-बक़रा : 155) और फ़रमाया : {وَهُوَ الْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِ وَهُوَ الْحَكِيمُ الْخَبِير} [الأنعام:18]. “ तथा वह अपने बन्दों पर प्रभावशाली है, और वह बड़ी हिक्मत वाला और पूरी ख़बर रखने वाला है । ” (सूरह अल्-अन्आम : 18)

और हमारा ईमान है कि उसने : {خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ يُدَبِّرُ الأَمْرَ} [يونس:3]، “ आकाशों तथा धरती को छः दिनों में बनाया, फिर अर्श पर उच्च हुआ, वह प्रत्येक कार्य की व्यवस्था करता है । ” (सूरह यूनुस : 3) अल्लाह तआला के अर्श पर उच्चय होने का अर्थ यह है कि अपनी ज़ात के साथ उस पर बुलन्द व बाला हुआ, और उस का यह उच्च होना उसकी शान तथा महानता के अनुरूप है, जिसकी स्थिति का विवरण उसके अतिरिक्त किसी को मालूम नहीं ।

और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि अल्लाह तआला अर्श पर रहते हुए भी (अपने ज्ञान और सामर्थ्य के माध्यम से) अपनी सृष्टि के साथ होता है। उनकी स्थिति को जानता है, उनकी बातों को सुनता है, उनके कार्यों को देखता है तथा उनके सभी उनके मामलों का उपाय करता है, दरिद्र को जीविका प्रदान करता है, निर्बल को शक्ति एवं बल देता है, जिसे चाहे रााज्य देता है और जिसे से चाहे राज्य छीन लीता है, जिसे चाहे सम्मान देता है और जिसे चाहे अपमानित करता है, उसी के हाथ में कल्याण है और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है।

और जिसकी यह शान हो, वह अर्श पर रहते हुए भी हक़ीक़त में अपनी सृष्टि के साथ रहता है । {لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ وَهُوَ السَّمِيعُ البَصِير} [الشورى:11]. “ उस जैसी कोई चीज़ नहीं । वह सब कुछ सुनने वाला, देखने वाला है । ” (सूरह अश्-शूरा : 11)

लेकिन हम हुलूलिया समुदाय,जो जहमिया तथा कुुुछ दुसरे सम्प्रदायों मेें पाये जाते हैं, की तरह यह नहीं कहते कि वह धरती में अपनी सृष्टि के साथ है। हमारा विचार यह है कि जो व्यक्ति ऐसा कहे, वह या तो गुमराह है या फिर काफ़िर। क्योंकि उसने अल्लाह तआला को ऐसे अपूर्ण गुणों के साथ विशेषित कर दिया, जो उसकी शान के योग्य नहीं हैं।

और हमारा, प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई इस बात पर भी ईमान है कि अल्लाह तआला हर रात के आख़िरी तिहाई भाग में, पहले आकाश पर नाज़िल होता है और कहता है : “ कौन है, जो मुझे पुकारे कि मैं उसकी पुकार सुनूँ ? कौन है, जो मुझसे माँगे कि मैं उसको दूँ ? कौन है, जो मुझसे माफ़ी तलब करे कि मैं उसे माफ़ कर दूँ ? ”

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला क़यामत के दिन बन्दों के बीच फ़ैसला करने के लिए आयेगा । अल्लाह तआला ने फ़रमाया: {ك كَلَّا إِذَا دُكَّتِ الْأَرْضُ دَكًّا دَكًّا وَجَاءَ رَبُّكَ وَالْمَلَكُ صَفًّا صَفًّا وَجِيءَ يَوْمَئِذٍ بِجَهَنَّمَ يَوْمَئِذٍ يَتَذَكَّرُ الْإِنْسَانُ وَأَنَّى لَهُ الذِّكْرَى} [الفجر:21-23].“ निःसंदेह जब धरती कूट-कूट कर समतल कर दी जायेगी, तथा तुम्हारा रब (प्रभु) आयेगा और फ़रिश्ते पंक्तिबद्ध होकर आयेंगे, तथा उस दिन नरक लायी जायेगी, उस दिन मनुष्य सावधान हो जाायेगा किन्तु सावधानी लाभ-दायक न होगी (सूरह अल्-फ़ज्र: 21-23)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला : {فَعَّالٌ لِّمَا يُرِيد} [هود:107]. “ जो चाहे उसे कर देने वाला है । ” (सूरह हूद : 107)

और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि उसके इरादे की दो क़िस्में हैं :

1- इरादए कौनिया : इसी से अल्लाह तआला की इच्छा अमल में आती है । अल्बत्ता यह ज़रूरी नहीं कि यह उसे पसन्द भी हो । यही इरादा है, जो मशीयते इलाही अर्थात ईश्वरी इच्छा कहलाती है । जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है : {وَلَوْ شَاء اللّهُ مَا اقْتَتَلُواْ وَلَـكِنَّ اللّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيد} [البقرة:253]، “ और यदि अल्लाह चाहता, तो यह लोग आपस में न लड़ते, किन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है । ” (अल्-बक़रा : 253) {إِن كَانَ اللّهُ يُرِيدُ أَن يُغْوِيَكُمْ هُوَ رَبُّكُمْ} [هود:34]. “ यदि अल्लाह की इच्छा तुम्हें भटकाने की हो । वही तुम सबका प्रभु है । ” (सूरह हूद : 34)

2- इरादए शरईया : आवश्यक नहीं कि यह प्रकट ही हो जाये । और इसमें उद्दिष्ट विषय अल्लाह को प्रिय ही होता है । जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {وَاللّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيْكُمْ} [النساء:27]. “ और अल्लाह तआला चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़बूल करे । ” (सूरह अन्-निसा : 27)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला का इरादा चाहे कौनी हो या शरई, उसकी हिक्मत के अधीन है । अतः हर वह कार्य, जिसका फ़ैसला अल्लाह तआला ने अपनी इच्छानुसार लिया अथवा उसकी सृष्टि ने शरई तौर पर उस पर अमल किया, वह किसी हिक्मत के कारण तथा हिक्मत के मुताबिक़ होता है । चाहे हमें उसका ज्ञान हो अथवा हमारी बुद्धि उसको समझने में असमर्थ हो । {أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِين} [التين:8]. “ क्या अल्लाह समस्त हाकिमों का हाकिम नहीं है ? ” (सूरह अत्-तीन : 8) {وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُون} [المائدة:50]. “ तथा जो विश्वास रखते हैं, उनके लिए अल्लाह से बढ़कर उत्तम निर्णय करने वाला कौन हो सकता है । ” (सूरह अल्-माइदा : 50)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला अपने औलिया से मुहब्बत करता है तथा वह भी अल्लाह से मुहब्बत करते हैं । {قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللّهُ} [آل عمران:31]، “ कह दीजिए कि यदि तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा । ” (सूरह आले-इम्रान : 31) {فَسَوْفَ يَأْتِي اللّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ} [المائدة:54]، “ तो अल्लाह तआला ऐसे लोगों को पैदा कर देगा, जिनसे वह मुहब्बत करेगा तथा वह उससे मुहब्बत करेंगे । ” (सूरह अल्-माइदा : 54) {وَاللّهُ يُحِبُّ الصَّابِرِين} [آل عمران:146]، “ और अल्लाह धैर्य रखने वालों से मुहब्बत करता है । ” (सूरह आले-इम्रान : 146) {وَأَقْسِطُوا إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِين} [الحجرات:9]، “तथा न्याय से काम लो, निःसंदेह अल्लाह न्याय करने वालों से मुहब्बत करता है । ” (सूरह अल्-हुजुरात : 9) {وَأَحْسِنُوَاْ إِنَّ اللّهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِين} [البقرة:195]. “ और एहसान करो, निःसंदेह अल्लाह एहसान करने वालों से मुहब्बत करता है । ” (सूरह अल्-बक़रा : 195)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने जिन कर्मों तथा कथनों को धर्मानुकूल किया है, वह उसे प्रिय हैं और जिनसे रोका है, वह उसे अप्रिय हैं । {إِن تَكْفُرُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمْ وَلاَ يَرْضَى لِعِبَادِهِ الْكُفْرَ وَإِن تَشْكُرُوا يَرْضَهُ لَكُمْ} [الزمر:7]، “ यदि तुम कृतघ्नता व्यक्त करोगे, तो अल्लाह तुमसे निस्पृह है । वह अपने बन्दों के लिए कृतघ्नता पसन्द नहीं करता है, और यदि कृतज्ञता करोगे, तो वह उसको तुम्हारे लिए पसन्द करेगा । ” (सूरह अज़्-ज़ुमर : 7) {وَلَـكِن كَرِهَ اللّهُ انبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُواْ مَعَ الْقَاعِدِين} [التوبة:46]. “ परन्तु, अल्लाह तआला ने उनके उठने को प्रिय न माना, इस लिए उन्हें हिलने-डोलने ही न दिया और उनसे कहा गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे ही रहो । ” (सूरह अत्-तौबा : 46)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ईमान लाने वालों तथा नेक कार्य करने वालों से प्रसन्न होता है। {رَّضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ذَلِكَ لِمَنْ خَشِيَ رَبَّه} [البينة:8]. “ अल्लाह उनसे प्रसन्न हुआ तथा वह अल्लाह से प्रसन्न हुए । यह उसके लिए है, जो अपने प्रभु से डरे । ” (सूरह अल्-बय्यिना : 8)

और हमारा ईमान है कि कुफ्फार और जो दुसरे क्रोध के पात्र हैं, अल्लाह उनपर क्रोध प्रकट करता है । {الظَّانِّينَ بِاللَّهِ ظَنَّ السَّوْءِ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ} [الفتح:6]، “ जो लोग अल्लाह के सम्बन्ध में बुरे गुमान रखने वाले हैं, उन्हीं पर बुराई का चक्र है तथा अल्लाह उनसे क्रोधित हुआ । ” (सूरह अल्-फ़त्ह : 6) {وَلَـكِن مَّن شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِّنَ اللّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيم} [النحل:106]. “ परन्तु, जो लोग खुले दिल से कुफ़्र करें, तो उनपर अल्लाह का क्रोध है तथा उन के लिए बहुत बड़ी यातना है । ” (सूरह अन्-नह्ल : 106)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह का मुख है, जो महिमा और सम्मान के साथ वर्णित है । {وَيَبْقَى وَجْهُ رَبِّكَ ذُو الْجَلاَلِ وَالإِكْرَام} [الرحمن:27]. “ तथा तेरे प्रभु का मुख जो महान एवं सम्मानित है, बाक़ी रहेगा । ” (सूरह अर्-रहमान : 27)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला के महान एवं कृपा वाले दो हाथ हैं । {بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ يُنفِقُ كَيْفَ يَشَاء} [المائدة:64]، “ बल्कि उसके दोनों हाथ खुले हुए हैं । वह जिस प्रकार चाहता है, ख़र्च करता है । ” (सूरह अल्-माइदा : 64) {وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَالسَّماوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُون} [الزمر:67]. “ तथा उन्होंने अल्लाह का जिस प्रकार सम्मान करना चाहिए था, नहीं किया । क़यामत के दिन सम्पूर्ण धरती उसकी मुट्ठी में होगी तथा आकाश उसके दायें हाथ में लपेटे होंगे, वह उन लोगों के शिर्क से पवित्र एवं सर्वोपरि है । ” (सूरह अज़्-ज़ुमर : 67)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की दो वास्तविक आँखें हैं । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {وَاصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا} [هود:37]، “ तथा एक नाव हमारी आँखों के सामने और हमारी वह्य (वाणी) से बनाओ । ” (सूरह हूद : 37) और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : «حجابه النّور، لو كشفه لأحرقت سبحات وجهه ما انتهى إليه بصره من خلقه». “ अल्लाह तआला का पर्दा नूर (ज्योति) है, यदि उसे उठा दे, तो उसके मुख की ज्योतियों से उसकी सृष्टि जलकर राख हो जाये । ”

तथा सुन्नत का अनुसरण करने वालों का इस बात पर एकमत हैं कि अल्लाह तआला की आँखें दो हैं। जिसकी पुष्टि दज्जाल के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फ़र्मान से होती है : «إنّه أعور، وإنّ ربّكم ليس بأعور». “ दज्जाल काना है तथा तुम्हारा प्रभु काना नहीं है । ”

और हमारा ईमान है कि : {لاَّ تُدْرِكُهُ الأَبْصَارُ وَهُوَ يُدْرِكُ الأَبْصَارَ وَهُوَ اللَّطِيفُ الْخَبِير} [الأنعام:103]. “ निगाहें उसका परिवेष्टन नहीं कर सकतीं तथा वह सब निगाहों का परिवेष्टन करता है, और वह सूक्ष्मदर्शी तथा सर्वसूचित है । ” (सूरह अल्-अन्आम : 103)

और हमारा ईमान है कि ईमान वाले क़यामत के दिन अपने प्रभु को देखेंगे । { وُجُوهٌ يَوْمَئِذٍ نَاضِرَةٌ إِلَى رَبِّهَا نَاظِرَةٌ} [القيامة:22-23]. “ उस दिन बहुत-से मुख प्रफुल्लित होंगे, अपने प्रभु की ओर देख रहे होंगे । ” (सूरह अल्-क़यामा : 22-23)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह के गुणों के परिपूर्ण होने के कारण, उसका समकक्ष कोई नहीं है । {لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ وَهُوَ السَّمِيعُ البَصِير} [الشورى:11]. “ उस जैसी कोई चीज़ नहीं। वह सब कुछ सुनने वाला, देखने वाला है । ” (सूरह अश्-शूरा: 11)

और हमारा ईमान है कि : {لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ} [البقرة:255]. “ उसे न ऊँघ आती है और न ही निद्रा। ” (सूरह अल्-बक़रा : 255) क्योंकि उसमें जीवन तथा स्थिरता का गुण परिपूर्ण है ।

और हमारा ईमान है कि वह अपने पूर्ण न्याय एवं इन्साफ़ के गुणों के कारण किसी पर अत्याचार नहीं करता । तथा उसकी निगरानी एवं परिवेष्टन की पूर्णता के कारण वह अपने बन्दों के कर्मों से अज्ञात नहीं है ।

और हमारा ईमान है कि उसके पूर्ण ज्ञान एवं क्षमता के कारण आकाश तथा धरती की कोई चीज़ उसे लाचार नहीं कर सकती । {إِنَّمَا أَمْرُهُ إِذَا أَرَادَ شَيْئًا أَنْ يَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُون} [يس:82]. “ उसकी शान यह है कि वह जब किसी चीज़ का इरादा करता है, तो कह देता है कि हो जा, तो हो जाती है । ” (सूरह यासीन : 82)

और हमारा ईमान है कि उसकी शक्ति की पूर्णता के कारण, उसे कभी लाचारी एवं थकावट का सामना नहीं करना पड़ता है । {وَلَقَدْ خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ وَمَا مَسَّنَا مِن لُّغُوب} [ق:38] “ और हमने आकाशों एवं धरती को तथा उनके अन्दर जो कुछ है, सबको, छः दिन में पैदा कर दिया और हमें ज़रा भी थकावट नहीं हुई । ” (सूरह क़ाफ़ : 38) अर्थात : न कोई थकावट हुई और न कोई परेशानी ।

और हमारा ईमान अल्लाह तआला के उन नामों एवं गुणों पर है, जिनका प्रमाण स्वयं अल्लाह तआला के कलाम अथवा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों से मिलता है । किन्तु हम दो बड़ी त्रुटियों से अपने आपको बचाते हैं, जो यह हैं : समानता और अवस्था ।

समानता का अर्थ है: दिल या ज़ुबान से यह कहना कि अल्लाह तआला के गुण सृष्टि के गुणों के समान हैं।

अवस्था का अर्थ है: दिल या ज़ुबान से यह कहना कि अल्लाह तआला के गुणों की वर्णन इस प्रकार है।

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला उन सब गुणों से पाक एवं पवित्र है, जिन्हें अपनी ज़ात के सम्बन्ध में उसने स्वयं या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अस्वीकार किया है। ध्यान रहे कि इस अस्वीकृति में, सांकेतिक रूप से उनके विपरीत पूर्ण गुणों का प्रमाण भी मौजूद है । और हम उन गुणों के विषय में चुप्पी धारण करते हैं, जिनके बारे में अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ नही कहा है।

और हम समझते हैं कि इसी मार्ग पर चलना अनिवार्य है । इसके बिना कोई चारा नहीं । क्योंकि जिन चीज़ों को स्वयं अल्लाह तआला ने अपने लिए साबित किया या जिनका इन्कार किया, वह ऐसी सूचना है, जो उसने अपने सम्बन्ध में दी है । और अल्लाह अपने बारे में सबसे ज़्यादा जानने वाला, सबसे ज़्यादा सच बोलने वाला है और सबसे उत्तम बात करने वाला है । जबकि बन्दों का ज्ञान उसका परिवेष्टन कदापि नहीं कर सकता ।

तथा अल्लाह के लिए उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिन चीज़ों को साबित किया या जिनका इन्कार किया है, वह भी ऐसी सूचना है जो आपने अल्लाह के सम्बन्ध में दी है । और आप अपने प्रभु के बारे में लोगों में सबसे ज़्यादा जानकार, सबसे ज़्यादा शुभचिंतक, सबसे ज़्यादा सच बोलने वाले और सबसे ज़्यादा विशुद्धभाषी हैं ।

अतः अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कलाम में ज्ञान, सच्चाई तथा विवरण की पूर्णता है । इस लिए उसे अस्वीकार करने या उसे मानने में हिचकिचाने का कोई कारण नहीं ।

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अध्याय

अल्लाह तआला के वह सभी गुण, जिनकी चर्चा ,चाहे विस्तृत रूप से या संक्षेप में अथवा प्रमाणिक करके या अस्वीकृत करके,हमने पिछले पृष्ठों में की है, इस बाबत हम अपने प्रभु की किताब (क़ुर्आन) तथा अपने प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत (हदीस) पर आश्रित हैं, और इस विषय में उम्मत के सलफ़ तथा उनके बाद आने वाले इमामों के तरीक़े पर चलते हैं।

और हम ज़रूरी समझते हैं कि हम इस संबंध में कुरान और सुन्नत (हदीस) की इबारतों को, उनके ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) अर्थ में लिया जाये और उनको उस हक़ीक़त पर महमूल किया जाये (यानी प्रकृतार्थ में लिया जाये), जो अल्लाह तआला के लिए उचित तथा मुनासिब है।

हम फेर-बदल करने वालों के तरीक़ों से ख़ुद को अलग करते हैं,जिन्होंने अल्लाह तआला के नामों और गुणों से समबंधित किताब व सुन्नत की इबारतों को , वह अर्थ दिया, जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इच्छा के विपरीत है।

और हम अल्लाह तआला के गुणों का इन्कार करने वालों के पथ को भी अस्वीकार करते हैं, जिन्होंने अल्लाह तआला के नामों और गुणों से समबंधित किताब व सुन्नत के शब्दों को उन अर्थों से हीन कर दिया, जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इछा के अनुसार हैं।

और हम इन शब्दों के साथ अतिरंजन (गुलू) करने वालों की शैली को भी अस्वीकार करते हैं, जिन्होंने इन शब्दों को समानता के अर्थ में लिया है, अथवा उन का कोई वर्णन किया है।

हमें यक़ीनी तौर पर मालूम है कि जो कुछ अल्लाह की किताब तथा उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में मौजूद है, वह सत्य है । उसमें पारस्परिक टकराव नहीं है । इसलिए कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: {أَفَلاَ يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ اللّهِ لَوَجَدُواْ فِيهِ اخْتِلاَفًا كَثِيرًا} [النساء:82] “ भला यह लोग क़ुर्आन में ग़ौर क्यों नहीं करते ? यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता, तो इसमें बहुत ज़्यादा पारस्परिक टकराव पाते । ” (सूरह अन्-निसा : 82)

और इसलिए भी क्योंकि सूचनाओं में पारस्परिक टकराव,उन को मिथ्या साबित करता है । जबकि यह बात अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के द्वारा दी गई सूचनाओं में असम्भव है ।

तथा जो व्यक्ति यह दावा करे कि अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत या उन दोनों में पारस्परिक टकराव है, तो उसका यह दावा, उसके कुधारणा तथा उसके दिल के टेढ़ेपन का प्रमाण है । इसलिए उसे अल्लाह तआला से क्षमा याचना करना चाहिए तथा विचलन अथवा पथभ्रष्टता से मुक्ति प्राप्त करना चाहिए।

जो व्यक्ति इस भ्रम में है कि अल्लाह की किताब, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत या उन दोनों में पारस्परिक टकराव है, तो यह उसके ज्ञान की कमी, समझने में असमर्थता अथवा ग़ौर व फ़िक्र की कोताही का प्रमाण है । अतः उसके लिए आवश्यक है कि ज्ञान अर्जित करे और ग़ौर व फ़िक्र की सलाहियत पैदा करे, ताकि सत्य स्पष्ट हो सके । और अगर सत्य स्पष्ट न हो पाये, तो मामला उसके जानने वाले को सौंप दे, भ्रम की स्थिति से बाहर आये और कहे, जिस तरह पूर्ण एवं दृढ़ ज्ञान वाले कहते हैं : {آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا} [آل عمران:7]، “ हम उसपर ईमान लाये, यह सब कुछ हमारे प्रभु के यहाँ से आया है । ” (सूरह आले इम्रान : 7) और जान ले कि न किताब में, न सुन्नत में और न इन दोनों के बीच कोई भिन्नता और टकराव है ।

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अध्याय

हम अल्लाह तआला के फ़रिश्तों पर ईमान रखते हैं और यह कि वे : {عِبَادٌ مُكْرَمُونَ لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُمْ بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ} [الأنبياء:26-27]. “ सम्मानित बन्दे हैं, उसके समक्ष बढ़कर नहीं बोलते और उसके आदेशों पर कार्य करते हैं । ” (सूरह अल्-अम्बिया : 26-27)

अल्लाह तआला ने उन्हें ज्योति से उत्पन्न किया, तो ये उसकी उपासना में लग गए तथा उस की आज्ञा पालन के लिए पूर्णरूपेण समर्पणहो गए। {لاَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَلاَ يَسْتَحْسِرُون * يُسَبِّحُونَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لاَ يَفْتُرُون } [الأنبياء:19-20]. “ वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नही करते हैं और न ही थकते हैं।वे दिन-रात उसकी पवित्रता का वर्णन करते हैं और ज़रा सी भी सुस्ती नहीं करते। ” (सूरह अल्-अम्बिया: 19-20) अल्लाह तआला ने उन्हें हमारी नज़रों से ओझल रखा है, इसलिए हम उन्हें देख नहीं सकते । अल्बत्ता, कभी-कभी अल्लाह तआला अपने कुछ बन्दों के लिए उन्हें प्रकट भी कर देता है । जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिब्रील अलैहिस्सलाम को उनके असली रूप में देखा । उनके छः सौ पंख थे, जो क्षितिज को ढाँपे हुए थे। इसी प्रकार जिब्रील अलैहिस्सलाम, मरयम अलैहस्सलाम के पास सम्पूर्ण आदमी का रूप धारण करके आये, तथा दोनों ने आपस में वार्तालाप किया। और एक बार प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास सहाबा किराम मौजूद थे कि जिब्रील अलैहिस्सलाम एक मनुष्य का रूप धारण करके आ गये, जिन्हें न कोई पहचानता था और न उनपर यात्रा का कोई प्रभाव दिखाई दे रहा था। कपड़े बिल्कुल उजले और बाल बिल्कुल काले थे। वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बैठ गये, अपना घुटना आप के घुटनेे से मिला लिया और अपने दोनों हाथों को आपके दोनों जांघों पर रखक लिया,तत्पश्चात जिब्रील अलैहिस्सलाम औरनबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आपस में बात किया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके जाने के पश्चात सहाबा को बताया कि वह जिब्रील अलैहिस्सलाम थे।

और हमारा ईमान है कि फ़रिश्तों के ज़िम्मे कुछ काम लगाये गये हैं ।

उनमें से एक जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं, जिनको वह्य (ईश्वरी वाणी) का कार्यभार सौंपा गया है, जिसे वह अल्लाह के पास से ले कर अंबिया एवं रसूलों के पास उतरते हैं।

तथा उनमें से एक मीकाईल अलैहिस्सलाम हैं, जिनको वर्षा एवं वनस्पति की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है ।

तथा उनमें से एक इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम हैं, जिन्हें क़यामत आने पर पहले लोगों की बेहोशी के लिए फिर दोबारा उन्हें ज़िन्दा करने के लिए सूर फूँकने का कार्यभार दिया गया है ।

तथा एक मलकुल-मौत हैं, जिन्हें मृत्यु के समय प्राण निकालने का काम सौंपा गया है ।

तथा उनमें से एक मलकुल-जिबाल (पहाड़ों का फ़रिश्ता) हैं, जिन्हें पहाड़ों से सम्बन्धित कार्य दिये गये हैं ।

तथा उनमें से एक मालिक हैं, जो जहन्नम के दारोग़ा हैं ।

तथा कुछ फ़रिश्ते माँ के कोख में पल रहे बच्चों से संबंधित कार्यों पर नियुक्त किए गये हैं। तथा कुछ फ़रिश्ते मनुष्यो की रक्षा के लिए नियुक्त हैं । तथा कुछ फ़रिश्तों के ज़िम्मे मनुष्यो के कर्मों का लेखन क्रिया है । हरेक व्यक्ति पर दो फ़रिश्ते नियुक्त हैं। {عَنِ الْيَمِينِ وَعَنِ الشِّمَالِ قَعِيدٌ مَا يَلْفِظُ مِنْ قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيبٌ عَتِيدٌ } [ق:17-18]. “ जो दायें-बायें बैठे हैं, वह नही बोलता कोई बात,मगर उसे लिखने के लिये उसके पास ऐक निरीछक तैयार रहता है। ” (सूरह क़ाफ़ : 17-18)

उनमें से एक गिरोह मृत से सवाल करने पर नियुक्त है । जब मृत को प्राणहीनता के पश्चात उस के ठिकाने पर पहुँचा दिया जाता है, तो उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं और उससे उसके प्रभु, उसके दीन तथा उसके नबी के सम्बंध में प्रश्न करते हैं, तो : {يُثَبِّتُ اللّهُ الَّذِينَ آمَنُواْ بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الآخِرَةِ وَيُضِلُّ اللّهُ الظَّالِمِينَ وَيَفْعَلُ اللّهُ مَا يَشَاء} [إبراهيم:27]. “ अल्लाह तआला ईमान वालों को पक्की बात पर दृढ़ रखता है सांसारिक जीवन में भी तथा परलोकिक जीवन में भी । तथा अल्लाह तआला अन्याय करने वालों को भटका देता है । और अल्लाह तआला जो चाहता है, करता है । ” (सूरह इब्राहीम : 27)

और उनमें से चंद फ़रिश्ते जन्नतियों के यहाँ नियुक्त हैं । { يَدْخُلُونَ عَلَيْهِمْ مِنْ كُلِّ بَابٍ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ بِمَا صَبَرْتُمْ فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ} [الرعد:23-24]. “ फ़रिश्ते हरेक द्वार से उनके पास आयेंगे और कहेंगे: तुम पर शांती हो, उस धैर्य के कारण जो तुम ने किया, परलोकिक घर क्या ही अच्छा है। ” (सूरह अर-रअद : 23-24)

तथा प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि आकाश में बैतुल मामूर है, जिसमें रोज़ाना सत्तर हज़ार फ़रिश्ते प्रवेश करते हैं - एक रिवायत के अनुसार : उसमें नमाज़ पढ़ते हैं- और जो एक बार प्रवेश कर जाते हैं, उनकी बारी दोबारा कभी नहीं आती ।

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अध्याय

हमारा ईमान है कि जगत पर हुज्जत क़ायम करने तथा अमल करने वालों को रास्ता दिखाने के लिए अल्लाह तआला ने अपने रसूलों पर किताबें नाज़िल फ़रमाईं । पैग़म्बर इन किताबों के द्वारा लोगों को धर्म की शिक्षा देते तथा उनके दिलों की सफाई करते थे।

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने हर रसूल के साथ एक किताब नाज़िल फ़रमाई । इसकी दलील अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : {لَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِالْبَيِّنَاتِ وَأَنزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْمِيزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ وَأَنزَلْنَا} [الحديد:25]، “ निःसंदेह हमने अपने पैग़म्बरों को खुली निशानियाँ देकर भेजा और उनपर किताब तथा तराजू (न्याय) नाज़िल की, ताकि लोग न्याय पर क़ायम रहें । ” (सूरह अल्-हदीद : 25) हमें उनमें से निम्नलिखित किताबों का ज्ञान है :

1- तौरात : इसे अल्लाह तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया और यह किताब बनी इस्राईल में सबसे मुख्य किताब थी । {فِيهَا هُدًى وَنُورٌ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُواْ لِلَّذِينَ هَادُواْ وَالرَّبَّانِيُّونَ وَالأَحْبَارُ بِمَا اسْتُحْفِظُواْ مِن كِتَابِ اللّهِ وَكَانُواْ عَلَيْهِ شُهَدَاء} [المائدة:44].जिस (अर्थात तौरात) में मार्गदर्शन एवं परकाश है। इसी तौरात के साथ अल्लाह तआला के मानने वाले अम्बिया (अलैहिमुस्सलाम), अल्लाह वाले और उलेमा,यहूदियों में, फ़ैसले करते थे । क्योंकि उन्हें अल्लाह की इस किताब की रक्षा करने का आदेश दिया गया था और वह इसपर गवाह थे। ” (सूरह अल्-माइदा : 44)

2- इन्जील : इसे अल्लाह तआला ने ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया, और यह तौरात की पुष्टि करने वाली एवं सम्पूरक थी । {وَآتَيْنَاهُ الإِنجِيلَ فِيهِ هُدًى وَنُورٌ وَمُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِين} [المائدة:46] “ और हमने उनको (ईसा अलैहिस्सलाम को) इन्जील प्रदान की, जिसमें मार्गदर्शन एवं परकाश है तथा वह अपने से पूर्व किताब तौरात की पुष्टि करती है तथा अल्लाह से डरने वालों के लिए मार्गदर्शन एवं सदुपदेश है।” (सूरह अल्-माइदा: 46)

{وَلأُحِلَّ لَكُم بَعْضَ الَّذِي حُرِّمَ عَلَيْكُمْ} [آل عمران:50]. “ और मैं इसलिए भी आया हूँ कि कुछ चीज़ें, जो तुम पर हराम कर दी गई थीं, तुम्हारे लिए हलाल कर दूँ । ” (सूरह आले इम्रान : 50)

3- ज़बूर : इसे अल्लाह तआला ने दाऊद अलैहिस्सलाम पर उतारा ।

4- इब्राहीम अलैहिस्सलाम और मूसा अलैहिस्सलाम के सहीफ़े ।

5- क़ुर्आन मजीद : इसे अल्लाह तआला ने अपने आख़री नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल किया । {هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ} [البقـرة:185]. “ जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है, तथा मार्गदर्शन एवं सत्य तथा असत्य में अन्तर करने का खुले परमााण रखता है । ” (सूरह अल्-बक़रा: 185) {مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ} [المائدة:48]. “ जो अपने से पूर्व की किताबों की पुष्टि करने वाला तथा उन सबका संरछक है।” (सूरह अल्-माइदा: 48).

अल्लाह तआला ने पवित्र क़ुर्आन के द्वारा पिछली तमाम किताबों को निरस्त (मन्सूख़) कर दिया, तथा उसे दुरुपयोग करने वालों की दुरुपयोग से एवं फेर-बदल करने वालों के टेढ़ेपन से सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी स्वयं ली है। {إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُون} [الحجر:9]؛ “ निःसंदेह हमने ही इस क़ुर्आन को उतारा है तथा हम ही इसके रक्षक हैं । ” (सूरह अल्-हिज्र : 9) क्योंकि यह क़यामत तक तमाम सृष्टि पर हुज्जत बनकर मौजूद रहेगा ।

जहाँ तक पिछली आसमानी किताबों का संबंध है, तो वह एक निर्धारित समय तक के लिए थीं, और उस समय तक बाक़ी रहती थीं, जब तक उन्हें निरस्त (मन्सूख़ ) करने वाली तथा उनमें होने वाले फेर-बदल को स्पष्ट करने वाली किताब न आ जाती थी । इसी लिए पवित्र क़ुर्आन से पूर्व की कोई किताब फेर-बदल तथा कमी-बेशी से सुरक्षित न रह सकी ।

{مِّنَ الَّذِينَ هَادُواْ يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِ} [النساء:46]. “ यहूदियों में से कुछ ऐसे हैं, जो शब्दों को उनके उचित स्थान से फेर देते हैं । ” (सूरह अन्-निसा : 46)

{فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ يَكْتُبُونَ الْكِتَابَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَـذَا مِنْ عِندِ اللّهِ لِيَشْتَرُواْ بِهِ ثَمَناً قَلِيلاً فَوَيْلٌ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌ لَّهُمْ مِّمَّا يَكْسِبُون } [البقرة:79].“ तो सर्वनाश है उन लोगों के लिए, जो अपने हाथों की लिखी हुई किताब को अल्लाह तआला की ओर से उतरी हुई कहते हैं ताकि उस के द्वारा कुछ माल उन के हाथ आजाये, उनके हाथों की लिखाई और उनकी कमाई के लिए बर्बादी और अफ़्सोस है।” (सूरह अल्-बक़रा: 79)

{قُلْ مَنْ أَنزَلَ الْكِتَابَ الَّذِي جَاء بِهِ مُوسَى نُورًا وَهُدًى لِّلنَّاسِ تَجْعَلُونَهُ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا} [الأنعام:91]. “ कह दीजिए कि वह किताब किसने नाज़िल की है, जिसको मूसा अलैहिस्सलाम लाये थे, जो लोगों के लिए प्रकाश तथा मार्गदर्शक है, जिसे तुमने उन अलग-अलग पेपरों में रख छोड़ा है, जिन में से कुछ वयक्त करते हो और बहुत सी बातों को छुपाते हो । ” (सूरह अल्-अन्आम : 91)

{ وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُمْ بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَنْ يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِي مِنْ دُونِ اللَّهِ} [آل عمران:78- 79]. “ अवश्य उनमें से ऐसा गिरोह भी है, जो किताब पढ़ते हुए अपनी जीभ मोड़ लेता है, ताकि तुम उसको किताब ही का लेख समझो, हालाँकि वह किताब में से नहीं है, और यह कहते भी हैं कि वह अल्लाह की ओर से है, हालाँकि वह अल्लाह की ओर से नहीं, वह तो जान-बूझकर अल्लाह पर झूठ बोलते हैं । किसी ऐसे पुरुष को, जिसे अल्लाह किताब, निर्णय शक्ति और नुबुव्वत प्रदान करे, यह उचित नहीं कि फिर भी वह लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़कर मेरे भक्त बन जाओ । ” (सूरह आले इम्रान : 78-79)

“हे अहले किताब! तुम्हारे पास हमारे रसूल (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आ गये, जो बहुत सी वह बातें बता रहे हैं, जो किताब की बातें तुम छुपा रहे थे, तथा बहुत सी बातों को छोड़ रहे हैं। तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से ज्योति तथा खुली किताब (पवित्र क़ुर्आन) आ चुकी है। जिसके द्वारा अल्लाह उन्हें शान्ति का पथ दिखाता है, जो उसकी प्रसन्नता का अनुसरण करें। तथा उन्हें अन्धकार से, अपनी कृपा से प्रकाश की ओर निकाल लाता है तथा उन्हें सीधा मार्ग दर्शाता है। निःसंदेह वह लोग काफ़िर हो गये, जिन्होंने कहा कि मर्यम का पुत्र मसीह अल्लाह है । ” (सूरह अल्-माइदा : 15-17)

*

अध्याय

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने अपनी सृष्टि की ओर रसूलों को भेजा । {رُّسُلاً مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلاَّ يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى اللّهِ حُجَّةٌ بَعْدَ الرُّسُلِ وَكَانَ اللّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا } [النساء:165]. “ शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाकर भेजा, ताकि लोगों के लिए कोई बहाना एवं अभियोग, रसूलों के (भेजने के) पश्चात न रह जाये, तथा अल्लाह तआला शक्तिमान एवं पूर्ण ज्ञानी है । ” (सूरह अन्-निसा : 165)

और हमारा ईमान है कि सबसे प्रथम रसूल नूह अलैहिस्सलाम तथा अन्तिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं । {إِنَّا أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ كَمَا أَوْحَيْنَا إِلَى نُوحٍ وَالنَّبِيِّينَ مِن بَعْدِهِ} [النساء:163]، “ हमने आपकी ओर उसी प्रकार वह्य भेजी, जिस प्रकार नूह एवं उनके बाद के नबियों के पस भेजी थी । ” (सूरह अन्-निसा : 163) { مَا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِنْ رِجَالِكُمْ وَلَكِنْ رَسُولَ اللَّهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ} [الأحزاب:40]. “ मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसे के पिता नहीं हैं, बल्कि अल्लाह के संदेष्टा (रसूल) तथा समस्त नबियों में अन्तिम हैं । ” (सूरह अल्-अहज़ाब : 40)

और हमारा ईमान है कि उन में सब से श्रेष्ठ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम हैं, फिर मूसा अलैहिस्सलाम, फिर नूह अलैहिस्सलाम एवं ईसा बिन मर्यम अलैहिस्सलाम हैं । इन्हीं पाँच रसूलों का विशेष रूप से इस आयत में वर्णन है : {وَإِذْ أَخَذْنَا مِنَ النَّبِيِّينَ مِيثَاقَهُمْ وَمِنكَ وَمِن نُّوحٍ وَإِبْرَاهِيمَ وَمُوسَى وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ وَأَخَذْنَا مِنْهُم مِّيثَاقًا غَلِيظًا} [الأحزاب:7]. “ और जब हमने समस्त नबियों से वचन लिया तथा आपसे तथा नूह से तथा इब्राहीम से तथा मूसा से तथा मर्यम के पुत्र ईसा से, और हमने उन सब से पक्का वचन लिया । ” (सूरह अल्-अहज़ाब : 7)

और हमारा विश्वास है कि मर्यादा के साथ विशेषित इन रसूलों की शरीअतों के सारे गुण, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत में मौजूद हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया: {شَرَعَ لَكُم مِّنَ الدِّينِ مَا وَصَّى بِهِ نُوحًا وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَى وَعِيسَى أَنْ أَقِيمُوا الدِّينَ وَلاَ تَتَفَرَّقُوا فِيهِ} [الشورى:13]. “ अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित कर दिया है, जिसको स्थापित करने का उसने नूह अलैहिस्सलाम को आदेश दिया था, और जिसको वह्य (इश्वरीवाणी) के द्वारा हमने तेरी ओर भेज दिया है, तथा जिसका विशेष आदेश हमने इब्राहीम तथा मूसा एवं ईसा (अलैहिमुस्सलाम) को दिया था कि धर्म को स्थापित रखना तथा इसमें फूट न डालना । ” (सूरह अश्-शूरा : 13)

और हमारा ईमान है कि सभी रसूल मनुष्य तथा सृष्टि थे । उनके अन्द रप्रभु तथा ईश्वर होने ( रुबूबियत) की विशेषताओं में से कोई भी विशेषता नहीं पाई जाती थी । अल्लाह तआला ने प्रथम रसूल नूह अलैहिस्सलाम की कही बात को बयान करते हुए कहा: {وَلاَ أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَائِنُ اللّهِ وَلاَ أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلاَ أَقُولُ إِنِّي مَلَكٌ} [هود:31]، “ न तो मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ । ” (सूरह हूद : 31) तथा अल्लाह तआला ने अन्तिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आदेश दिया कि वह लोगों से कह दें : {لاَّ أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَائِنُ اللّهِ وَلا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلا أَقُولُ لَكُمْ إِنِّي مَلَكٌ} [الأنعام:50]. “ न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, न यह कि मैं परोक्ष जानता हूँ और न ही यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ । ” (सूरह अल्-अन्आम : 50)

और यह भी कह दें: {لاَّ أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلاَ ضَرًّا إِلاَّ مَا شَاء اللّهُ} [الأعراف:188] “ मैं स्वयं अपने लिए किसी लाभ का अधिकार नहीं रखता और न किसी हानि का, किन्तु उतना ही, जितना कि अल्लाह तआला ने चाहा हो। ” (सूरह अल्-आराफ़: 188) और यह भी कह दें: { قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا قُلْ إِنِّي لَنْ يُجِيرَنِي مِنَ اللَّهِ أَحَدٌ وَلَنْ أَجِدَ مِنْ دُونِهِ مُلْتَحَدًا} [الجن:21-22].“ निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए किसी हानि का अधिकार नहीं रखता, न सीधी राह पर लगा देने क, यह भी कह दीजिए कि: मुझे अल्लाह से कदापि कोई नहीं बचा सकता, तथा मैं कदापि उसके अतिरिक्त कोई शरणागार नहीं पा सकता।” (सूरह अल्-जिन्न: 21-22)

और हमारा ईमान है कि रसूल अल्लाह के बन्दे थे । अल्लाह ने उन्हें दूतत्व (रिसालत) से सम्मानित किया । अल्लाह तआला ने उन्हें गौरव और प्रतिष्ठा के स्थानों तथा प्रशंसा के प्रसंग में दासत्व के विशेषण से विशेषित किया है । चुनांचे प्रथम दूत नूह अलैहिस्सलाम के सम्बंध में फ़रमाया : {ذُرِّيَّةَ مَنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍ إِنَّهُ كَانَ عَبْدًا شَكُورًا} [الإسراء:3]، “ ऐ उन लोगों की संतान, जिनको हमने नूह अलैहिस्सलाम के साथ (नाव में) सवार किया था । निःसंदेह वह अत्यधिक कृतज्ञ भक्त था । ” (सूरह अल्-इस्रा : 3) और सबसे अन्तिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में फ़रमाया : {تَبَارَكَ الَّذِي نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَى عَبْدِهِ لِيَكُونَ لِلْعَالَمِينَ نَذِيرًا} [الفرقان:1]. “ अत्यंत शुभ है वह (अल्लाह तआला), जिसने अपने भक्त पर फ़ुर्क़ान (क़ुर्आन) अवतरित किया, ताकि वह जगत के लिए सतर्क करने वाला बन जाए । ” (सूरह अल्-फ़ुर्क़ान : 1)

तथा अन्य रसूलों के सम्बंध में फ़रमाया : {وَاذْكُرْ عِبَادَنَا إبْرَاهِيمَ وَإِسْحَقَ وَيَعْقُوبَ أُوْلِي الأَيْدِي وَالأَبْصَار} [ص:45] “ तथा हमारे भक्तों इब्राहीम, इस्हाक़ एवं याक़ूब को भी याद करो, जो हाथों एवं आँखों वाले थे । ” (सूरह साद : 45) {وَاذْكُرْ عَبْدَنَا دَاوُودَ ذَا الأَيْدِ إِنَّهُ أَوَّاب } [ص:17] “ तथा हमारे भक्त दाऊद को याद करें, जो अत्यंत शक्तिशाली था । निःसंदेह वह बहुत ध्यानमग्न था । ” (सूरह साद : 17) {وَوَهَبْنَا لِدَاوُودَ سُلَيْمَانَ نِعْمَ الْعَبْدُ إِنَّهُ أَوَّاب} [ص:30]، “ तथा हमने दाऊद को सुलैमान नामी पुत्र प्रदान किया, जो अति उत्तम भक्त था तथा अत्यधिक ध्यान लगाने वाला था । ” (सूरह साद : 30) और मर्यम के पुत्र ईसा के सम्बंध में फ़रमाया : {إِنْ هُوَ إِلاَّ عَبْدٌ أَنْعَمْنَا عَلَيْهِ وَجَعَلْنَاهُ مَثَلاً لِّبَنِي إِسْرَائِيل} [الزخرف:59]. “ वह तो हमारे ऐसे भक्त थे, जिसपर हमने उपकार किया तथा उसे बनी इस्राईल के लिए उदाहरण बनाया । ” (सूरह अज़्-ज़ुख़रुफ़ : 59)

और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दूतत्व का सिलसिला समाप्त कर दिया, तथा आपको सम्पूर्ण मानवता के लिए रसूल बनाकर भेजा । अल्लाह तआला ने फ़रमाया: {قُلْ يَاأَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ لا إِلَـهَ إِلاَّ هُوَ يُحْيِـي وَيُمِيتُ فَآمِنُواْ بِاللّهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الأُمِّيِّ الَّذِي يُؤْمِنُ بِاللّهِ وَكَلِمَاتِهِ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُون} [الأعراف:158].“ आप कह दीजिए: कि ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का भेजा हुआ हूँ (अर्थात उसका रसूल हूँ), जिसके लिए आकाशों एवं धरती का राजत्व है, उसके अतिरिक्त कोई भी उपासना के योग्य नहीं, वही जीवन प्रदान करता है तथा वही मृत्यु देता है, इसलिए इईमान ले आओ अल्लाह पर तथा उसके उम्मी (निरक्षर, अनपढ़) दूत पर, जो अल्लाह और उसके सभी कलाम पर ईमान रखता है,और इस (दूत) का अनुसरण करो, ताकि तुम सत्य मार्ग पा जाओ। ” (सूरह अल्-आराफ़ : 158).

और हमारा ईमान है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शरीअत ही इस्लाम धर्म है, जिसे अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिए पसन्द किया है । अतः किसी से इस दीन के अतिरिक्त कोई दीन क़बूल नहीं करेगा । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللّهِ الإِسْلاَمُ} [آل عمران:19] “ निसंदेह, अल्लाह के यहाँ इस्लाम ही धर्म है । ” (सूरह आले-इम्रान : 19) {الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الإِسْلاَمَ دِينًا} [المائدة:3]. “ आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूण कर दिया, तथा तुम पर अपना पुरस्कार पूरा कर दिया है, एवं तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म स्वरूप स्वीकार कर लिया।” (सूरह अल्-माइदा : 3)

{وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الإِسْلاَمِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِين} [آل عمران:85]. “ तथा जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की खोज करे, उसका धर्म कदापि मान्य नहीं होगा तथा वह परलोक में क्षतिग्रस्तों में होगा । ” (सूरह आले-इम्रान : 85)

हमारा अक़ीदा है कि जो इस्लाम धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म जैसे यहूदियत अथवा नसरानियत आदि को स्वीकार योग्य समझे, वह काफ़िर है । और अगर पहले मुसलमान था तो उसे तौबा करने के लिए कहा जायेगा । यदि वह तौबा कर ले, तो ठीक है, नहीं तो धर्मत्यागी होने कारण उस की सजा कतल है, क्योंकि वह क़ुर्आन को झुठलाने वाला है ।

हमारा यह भी अक़ीदा है कि जिस व्यक्ति ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सम्पूर्ण मानवता की ओर रिसालत अथवा दूत बनकर आने का इन्कार किया, तो निःसंदेह वह सभी रसूलों का इंकार करने वााला हो गया, यहाँ तक कि उस रसूल का भी, जिसके अनुकरण तथा जिसपर ईमान का उसे दावा है । क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ الْمُرْسَلِين} [الشعراء:105]. “ नूह (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया । ” (सूरह अश्-शुअरा : 105)

इस पवित्र आयत ने उन्हें सारे रसूलों को झुठलाने वाला ठहराया, हालाँकि नूह अलैहिस्सलाम से पूर्व कोई रसूल नहीं गुज़रा । अल्लाह तआला ने दूसरी जगह फ़रमाया : { إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ وَيُرِيدُونَ أَنْ يُفَرِّقُوا بَيْنَ اللَّهِ وَرُسُلِهِ وَيَقُولُونَ نُؤْمِنُ بِبَعْضٍ وَنَكْفُرُ بِبَعْضٍ وَيُرِيدُونَ أَنْ يَتَّخِذُوا بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلًا أُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ حَقًّا وَأَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ عَذَابًا مُهِينًا } [النساء:150-151]. “ जो लोग अल्लाह तआला तथा उसके रसूलों के प्रति अविश्वास रखते हैं, और चाहते हैं कि अल्लाह तथा उसके रसूलों के मध्य अलगाव करें, तथा कहते हैं कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते,और इसके बीच रास्ता बनाना चाहते हैं, विश्वास करो कि यह सभी लोग शुद्ध काफ़िर हैं । और काफ़िरों के लिए हमने आपमानकारी यातना तैयार कर रखी है। ” (सूरह अन्-निसा : 150-151)

और हम ईमान रखते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद कोई नबी नहीं । अतः आपके बाद जिस किसी ने नुबुव्वत का दावा किया या नुबुव्वत के दावेदार की पुष्टि की, वह काफ़िर है । क्योंकि वह अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को एवं मुसलमानों के एकमत (इजमा) को झुठलाने वाला है ।

और हम ईमान रखते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ ख़ुलफ़ाये राशेदीन (अर्थात सत्य मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़े ) हैं । उन्होंने उम्मत को आपके बाद ज्ञान, दअवत तथा शासन-प्रशासन के मामले में प्रतिनिधित्व प्रदान की । और हम इस पर भी ईमान रखते हैं कि ख़ुलफ़ा में श्रेष्ठतम और ख़िलाफ़त के सबसे हक़दार अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, फिर उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु, फिर अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ।

और इस परकार श्रेष्ठता में उन में से हरेक का जो स्थान था ,उसी क्रमानुसार वह खलीफा भी बने । अल्लाह तआला का कोई काम हिक्मत से ख़ाली नहीं होता,इसलिए उसकी शान से यह बात बहुत परे है कि वह सब से श्रेष्ठ लोगों पर किसी ऐसे व्यक्ति को शासक बनादेता, कि जिस से बेहतर तथा ख़िलाफ़त का अधिक योग्य कोई और उपस्थित हो।

और हमारा ईमान है कि उपरोक्त चारो ख़ुलफ़ा में से कोई कभी अपने से श्रेष्ठ खलीफा से किसी विशिष्टता में श्रेष्ठतर हो सकता है, लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह अपने से श्रेष्ठ से हर विषय में श्रेष्ठतर होगया, क्योंकि श्रेष्ठता के कारण अनेक तथा विभिन्न प्रकार के होते हैं ।

और हमारा ईमान है कि यह उम्मत अन्य उम्मतों से उत्तम है तथा अल्लाह के यहाँ इसका सम्मान एवं प्रतिष्ठा अधिक है । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللّهِ} [آل عمران:110]. “ तुम सर्वश्रेष्ठ उम्मत हो, जो लोगों के लिए पैदा की गयी हैو कि तुम सत्कर्मों का आदेश देते हो और कुकर्मों से रोकते होو और अल्लाह तआला पर ईमान रखते हो । ” (सूरह आले-इम्रान : 110)

और हमारा ईमान है कि उम्मत में सबसे उत्तम सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम थे, फिर ताबेईन और फिर तबा-ताबेईन रहेमहुमुल्लाह । और हमारा ईमान है कि इस उम्मत में से एक जमाअत विजयी बनकर सदैव सत्य पर क़ायम रहेगी । उनका विरोध करने वाला या उन का साथ न देने वाला कोई व्यक्ति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, यहाँ तक कि अल्लाह का हुक्म आ जाये ।

सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के बीच जो मतभेद हुए, उनके सम्बन्ध में हमारा विश्वास यह है कि वह इजतिहादी मतभेद थे । अतः उनमें से जो सही दिशा को पहुँच पाये, उनके लिए दोहरा अज्र है और जो सही दिशा को नहीं पहुँच पाये, उनके लिए एक अज्र है तथा उनकी भूल क्षमायोग्य है ।

हमें इस पर भी विश्वास है कि उनकी अप्रिय बातों की आलोचना करने से पूर्णतः बचना अनिवार्य है । केवल उनकी उत्तम बातों की प्रशंसा करनी चाहिए जिसके वह हक़दार हैं । तथा उनमें से हरेक के सम्बन्ध में हमें अपने दिलों को वैर एवं कपट से पवित्र रखना चाहिए, क्योंकि उन के सम्बन्ध में अल्लाह तआला का कथन है : {لاَ يَسْتَوِي مِنكُم مَّنْ أَنفَقَ مِن قَبْلِ الْفَتْحِ وَقَاتَلَ أُوْلَئِكَ أَعْظَمُ دَرَجَةً مِّنَ الَّذِينَ أَنفَقُوا مِن بَعْدُ وَقَاتَلُوا وَكُلاًّ وَعَدَ اللَّهُ الْحُسْنَى} [الحديد:10].“तुममें से जिन लोगों ने विजय से पूर्व अल्लाह के मार्ग में ख़र्च किया तथा धर्मयुद्ध किया, वह (दूसरों के) समतुल्य नहीं, अपितु उनसे अत्यंत उच्च पद के हैं, जिन्होंने विजय के पश्चात दान किया तथा धर्मयुद्ध किया । हाँ, भलाई का वचन तो अल्लाह तआला का उनसब से है । ” (सूरह अल्-हदीद : 10)

और क्योंकि हमारे सम्बन्ध में अल्लाह तआला का कथन है : {وَالَّذِينَ جَاؤُوا مِن بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالإِيمَانِ وَلاَ تَجْعَلْ فِي قُلُوبِنَا غِلاًّ لِّلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَؤُوفٌ رَّحِيم} [الحشر:10]. “ तथा (उनके लिए) जो उनके पश्चात आये, जो कहेंगे कि हे हमारे प्रभु ! हमें क्षमा कर दे, तथा हमारे उन भाईयों को भी, जो हमसे पूर्व ईमान ला चुके हैं, तथा ईमान वालों के बारे में हमारे हृदय में कपट न डाल । हे हमारे प्रभु ! निःसंदेह तू प्रेम एवं दया करने वाला है । ” (सूरह अल्-हश्र : 10)

*

अध्याय

हमारा ईमान आख़िरत के दिन पर है । वह क़यामत का दिन है । उसके पश्चात कोई दिन नहीं । उस दिन अल्लाह तआला लोगों को दोबारा जीवित करके उठायेगा । फिर या तो वे सदैव के लिए स्वर्ग में रहेंगे, जहाँ अच्छी-अच्छी चीज़ें होंगी, या नरक में, जहाँ कठोर यातनायें होंगी ।

सो हमारा ईमान मृत्यु के पश्चात मुर्दों को जीवित किये जाने पर है । अर्थात इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम जब दोबारा सूर फूकेंगे, तो अल्लाह तआला तमाम मुर्दों को जीवित कर देगा । {وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَمَن فِي الأَرْضِ إِلاَّ مَن شَاء اللَّهُ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُم قِيَامٌ يَنظُرُون} [الزمر:68]. “ तथा जब नरसिंघा में फूँक मारी जायेगी, तो जो लोग आकाशों एवं धरती में हैं, सब बेहोश होकर गिर पड़ेंगे, परन्तु वह जिसे अल्लाह चाहे, फिर पुनः नरसिंघा में फूँक मारी जायेगी, तो सब तुरन्त खड़े होकर देखने लग जायेंगे । ” (सूरह अज़्-ज़ुमर : 68)

अब लोग अपनी-अपनी क़ब्रों से उठकर संसार के प्रभु की ओर जायेंगे । उस समय वह नंगे पाँव बिना जूतों के, नंगे बदन बिना कपड़ों के एवं बिना ख़तनों के होंगे । {كَمَا بَدَأْنَا أَوَّلَ خَلْقٍ نُّعِيدُهُ وَعْدًا عَلَيْنَا إِنَّا كُنَّا فَاعِلِين} [الأنبياء:104]. “ जिस प्रकार हमने (संसार को) पहले पैदा किया था, उसी प्रकार दोबारा पैदा कर देंगे । यह हमारा वादा है, हम ऐसा अवश्य करने वाले हैं । ” (सूरह अल्-अम्बिया : 104)

और हमारा ईमान नामए-आमाल (कर्मपत्र) पर भी है, उसे दायें हाथ में दिया जायेगा, या पीछे की ओर से बायें हाथ में । { فَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَسِيرًا وَيَنْقَلِبُ إِلَى أَهْلِهِ مَسْرُورًا وَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ وَرَاءَ ظَهْرِهِ فَسَوْفَ يَدْعُو ثُبُورًا وَيَصْلَى سَعِيرًا } [الانشقاق:7-12]. “ तो जिसका कर्मपत्र उसके दायें हाथ में दिया जायेगा, उससे सरल हिसाब लिया जायेगा तथा वह अपने घर वालों में प्रसन्न होकर लौटेगा । तथा जिसका कर्मपत्र पीठ के पीछे से दिया जायेगा, वह मृत्यु को पुकारेगा तथा भड़कती हुई आग में डाल दिया जायेगा । ” (सूरह अल्-इन्शिक़ाक़ : 7-12)

{ وَكُلَّ إِنْسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كِتَابًا يَلْقَاهُ مَنْشُورًا اقْرَأْ كِتَابَكَ كَفَى بِنَفْسِكَ الْيَوْمَ عَلَيْكَ حَسِيبًا} [الإسراء:13-14]. “ तथा हमने हरेक मनुष्य के भाग्य को उसके गले में डाल दिया है, तथा महाप्रलय के दिन हम उसके कर्मपत्र को निकालेंगे, जिसे वह खुला हुआ पायेगा । लो, स्वयं ही अपना कर्मपत्र पढ़ लो । आज तो तुम स्वयं अपना हिसाब लेने के लिये परयाप्त हो। ” (सूरह अल्-इस्रा : 13-14)

तथा हम तुले (मवाज़ीन) पर भी ईमान रखते हैं, जो क़यामत के दिन स्थापित किये जायेंगे । फिर किसी पर कोई अत्याचार नहीं होगा । { فَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ} [الزلزلة:7-8]. “ तो जिसने कण भर भी नेकी की होगी, वह उसको देख लेगा, तथा जिसने कण भर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा । ” (सूरह अज़्-ज़ल्ज़ला : 7-8) {فَمَنْ ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ وَمَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ فِي جَهَنَّمَ خَالِدُونَ تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ النَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَالِحُونَ} [المؤمنون:102-104] “ जिनके तराज़ू के पलडे भारी होंगे , वही सफल होने वाले हैंं।।तथा जिनके तराज़ू के पलडे हल्के होंगे, ये हैं वे, जिन्होंने अपनी हानि स्वयं कर ली, जो सदैव के लिए नरक में चले गये । उनके मुखों को आग झुलसाती रहेगी । वे वहाँ कुरूप बने हुए होंगे । ” (सूरह अल्-मोमिनून : 102-104) {مَن جَاء بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا وَمَن جَاء بِالسَّيِّئَةِ فَلاَ يُجْزَى إِلاَّ مِثْلَهَا وَهُمْ لاَ يُظْلَمُون} [الأنعام:160]. “ जो व्यक्ति पुण्य का कार्य करेगा, उसे उसका दस गुना मिलेंगे । तथा जो कुकर्म करेगा, उसे उसके समान दण्ड मिलेगा, तथा उन पर अत्याचार न होगा । ” (सूरह अल्-अन्आम : 160)

हम महान अनुशंसा (शफ़ाअते उज़्मा) पर ईमान रखते हैं, जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए ख़ास है । जब लोग असहनीय दुःख एवं कष्ट में ग्रस्त होंगे, तो पहले आदम अलैहिस्सलाम के पास, फिर नूह अलैहिस्सलाम के पास, फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास, फिर मूसा अलैहिस्सलाम के पास, फिर ईसा अलैहिस्सलाम के पास और अन्त में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास जायेंगे, तो आप अल्लाह की आज्ञा से उसके समक्ष सिफ़ारिश करेंगे, ताकि वह अपने बन्दों के दरमियान फ़ैसला कर दे ।

और हमारा ईमान है कि अहले ईमान में से जो अपने गुनाहों के कारण नरक में प्रवेश कर जायेंगे, तो वहाँ से उन्हें निकालने के लिए भी अभिस्ताव होगा, तथा उसका सम्मान नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके अतिरिक्त अन्यों (जैसे अम्बिया, ईमान वालों एवं फ़रिश्तों) को भी प्राप्त होगा । और हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला ईमान वालों में से कुछ लोगों को बिना अभिस्ताव के केवल अपनी दया एवं अनुकम्पा के आधार पर नरक से निकालेगा ।

हम प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हौज़ पर भी ईमान रखते हैं । उसका पानी दूध से बढ़कर सफ़ेद, शहद से ज़्यादा मीठा तथा कस्तूरी से बढ़कर सुगन्धित होगा । उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई एक मास की यात्रा के समान होगी । तथा उसके पानी पीने के प्याले सुन्दरता एवं अधिकता में आसमान के तारों की तरह होंगे । आप की उम्मत में से ईमान वाले ही उस तक पुहंच पायेंगे। तथा जिसने वहाँ से एक बार पी लिया, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी ।

और हमारा ईमान है कि नरक पर पुल सिरात की स्थापना होगी । लोग अपने कर्मों के अनुसार उस पर से गुज़रेंगे । पहली श्रेणी के लोग बिजली की तरह गुज़र जायेंगे, फिर क्रमानुसार, कुछ हवा की सी तेज़ी से, कुछ पक्षियों की तरह, तथा कुछ तेज़ दौड़ने वाले पुरुषों की तरह गुज़रेंगे । और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पुल सिरात पर खड़े होकर दुआ माँग रहे होंगे : “ ऐ अल्लाह ! इन्हें सुरक्षित रख ! इन्हें सुरक्षित रख ! ”

यहाँ तक कि लोगों के कर्म विवश हो जायेंगे, चुनांचे कुछ लोग पेट के बल रेंगते हुए गुज़रेंगे । और पुल सिरात की दोनों ओर कुंडियाँ लटकी होंगी, जिनके सम्बन्ध में आदेश होगा, उन्हें पकड़ लेंगी । कुछ लोग उनकी ख़राशों से ज़ख़्मी होकर मुक्ति पा जायेंगे तथा कुछ लोग नरक में गिर पड़ेंगे ।

किताब तथा सुन्नत में उस दिन की जो सूचनाएं एवं भयावहता बातें उल्लेखित हैं, उन सब पर हमारा ईमान है । अल्लाह तआला उनमें हमारी सहायता करे और उन को हमारे लिये अपनी कृपा से आसान बनादे।

हमारा ईमान है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जन्नतियों के स्वर्ग में प्रवेश के लिए अभिस्ताव करेंगे, जो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ख़ास होगा ।

जन्नत एवं जहन्नम (स्वर्ग-नरक) पर भी हमारा ईमान है ।

जन्नत नेमतों का वह घर है, जिसे अल्लाह तआला ने परहेज़गार मोमिनों के लिए तैयार किया है, उसमें ऐसी-ऐसी नेमतें हैं, जो न किसी आँख ने देखी है, न किसी कान ने सुना है और न किसी मनुष्य के दिल में उनका ख़्याल ही आया है । {فَلاَ تَعْلَمُ نَفْسٌ مَّا أُخْفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍ جَزَاء بِمَا كَانُوا يَعْمَلُون} [السجدة:17]. “ कोई नफ़्स नहीं जानता, जो कुछ हमने उनकी आँखों की ठंडक उनके लिए छुपा रखी है । वह जो कुछ करते थे यह उसका बदला है । ” (सूरह सज्दा : 17)

तथा जहन्नम कठिन यातना का वह घर है, जिसे अल्लाह तआला ने काफ़िरों तथा अत्याचारियों के लिए तैयार कर रखा है । वहाँ ऐसी भयानक यातना है, जिसका कभी किसी के दिल में खटका भी नहीं हुआ होगा। {إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا وَإِن يَسْتَغِيثُوا يُغَاثُوا بِمَاء كَالْمُهْلِ يَشْوِي الْوُجُوهَ بِئْسَ الشَّرَابُ وَسَاءتْ مُرْتَفَقًا} [الكهف:29]. “निश्चय हमने अत्याचारियों के लिए वह आग तैयार कर रखी है, जिसकी परिधि उन्हें घेर लेगी ।और यदि वह (जल के लिये) गुहार करेंगे, तो उनकी सहायता उस पानी से की जायेगी, जो तलछट जैसा होगा, जो चेहरे भून देगा, बड़ा ही बुरा पानी है तथा बड़ा बुरा विश्राम स्थल (नरक) है । ” (सूरह अल्-कह्फ़ : 29)

हमारा ईमान है कि स्वर्ग और नरक इस समय भी मौजूद हैं एवं वे सदैव रहेंगे । कभी नाश नहीं होंगे । {وَمَن يُؤْمِن بِاللَّهِ وَيَعْمَلْ صَالِحًا يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا قَدْ أَحْسَنَ اللَّهُ لَهُ رِزْقًا} [الطلاق:11] “ तथा जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान लाये तथा सत्कर्म करे, अल्लाह उसे ऐसे स्वर्ग में प्रवेश कर देगा, जिसके नीचे नहरें प्रवाहित हैं, जिसमें वे सदैव-सदैव रहेंगे । निःसंदेह अल्लाह ने उसे सर्वोत्तम जीविका प्रदार कर रखी है । ” (सूरह अत्-तलाक़ : 11) { إِنَّ اللَّهَ لَعَنَ الْكَافِرِينَ وَأَعَدَّ لَهُمْ سَعِيرًا خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِي النَّارِ يَقُولُونَ يَالَيْتَنَا أَطَعْنَا اللَّهَ وَأَطَعْنَا الرَّسُولَا} [الأحزاب:64-66]. “ अल्लाह ने काफ़िरों पर धिक्कार भेजी है, तथा उनके लिए भड़कती हुई अग्नि तैयार कर रखी है, जिसमें वे सदैव रहेंगे, वह कोई पक्षधर एवं सहायता करना वाला न पायेंगे । जिस दिन उनके मुख आग में उल्टे-पल्टे जायेंगे । (पश्चाताप तथा खेद से) कहेगे: कि काश ! हम अल्लाह तथा रसूल की आज्ञा का पालन करते ! ” (सूरह अल्-अह्ज़ाब : 64-66)

तथा हम उन लोगों के स्वर्ग में जाने की गवाही देते हैं, जिनके लिए किताब एवं सुन्नत में नाम लेकर या विशेषताएं बताकर स्वर्ग की गवाही दी गयी है ।

जिनका नाम लेकर स्वर्ग की गवाही दी गई है, उनमें अबू बक्र, उमर, उस्मान एवं अली रज़ियल्लाहु अन्हुम आदि शामिल हैं, जिन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जन्नती बताया है ।

और विशेषता के आधार पर स्वर्ग की गवाही देने का उदाहरण: हरेक ईमान वाले और अल्लाह से डरने वाले के लिये स्वर्ग की गवाही देना है।

हम उनसब लोगों के नारकीय होने की गवाही देते हैं, जिनका नाम लेकर या अवगुण बयान करके किताब एवं सुन्नत ने उन्हें नारकीय घोषित किया है ।

जिनका नाम लेकर नरक की गवाही दी गई है, उनमें अबू लहब, अम्र बिन लुहै अल्-ख़ुज़ाई आदि शामिल हैं ।

तथा अवगुणों के आधार पर नरक की गवाही देने का उदाहरण" हर काफ़िर, मुशरिक अथवा मुनाफ़िक़ (द्वयवादी) के लिए नरक की गवाही देना है ।

और हम क़ब्र की विपत्ति एवं परीक्षा अर्थात मिर्त से उसके प्रभु, उसके दीन तथा उसके नबी के बारे में पूछे जाने वाले प्रश्नों पर भी ईमान रखते हैं । {يُثَبِّتُ اللّهُ الَّذِينَ آمَنُواْ بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الآخِرَةِ} [إبراهيم:27] “ अल्लाह तआला ईमानदारों को पक्की बात पर दृढ़ रखता है सांसारिक जीवन में भी तथा परलोकिक जीवन में भी । तथा अल्लाह तआला अन्याय करने वालों को भटका देता है । और अल्लाह तआला जो चाहता है, करता है । ” (सूरह इब्राहीम : 27) मोमिन तो कहेगा कि मेरा प्रभु अल्लाह है, मेरा दीन इस्लाम है, तथा मेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं । परन्तु, काफ़िर और मुनाफ़िक़ उत्तर देंगे कि मैं नहीं जानता! मैं ने तो लोगों को जो कुछ कहते हुए सुनता था, वही कह देता था ।

और हमारा ईमान है कि क़ब्र में मोमिनों को नेमतों से सम्मानित किया जायेगा । {الَّذِينَ تَتَوَفَّاهُمُ الْمَلائِكَةُ طَيِّبِينَ يَقُولُونَ سَلامٌ عَلَيْكُمُ ادْخُلُواْ الْجَنَّةَ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُون} [النحل:32]. “ वे जिनके प्राण फ़रिश्ते ऐसी अवस्था में निकालते हैं कि वह स्वच्छ तथा पवित्र हों, कहते हैं कि तुम्हारे लिए शान्ति ही शान्ति है, अपने उन कर्मों के बदले स्वर्ग में जाओ, जो पहले तुम कर रहे थे । ” (सूरह अन्-नह्ल : 32)

और हमारा ईमान है कि अत्याचारियों और काफ़िरों को क़ब्र में यातनायें दी जायेंगी । {وَلَوْ تَرَى إِذِ الظَّالِمُونَ فِي غَمَرَاتِ الْمَوْتِ وَالْمَلائِكَةُ بَاسِطُواْ أَيْدِيهِمْ أَخْرِجُواْ أَنفُسَكُمُ الْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَقُولُونَ عَلَى اللّهِ غَيْرَ الْحَقِّ وَكُنتُمْ عَنْ آيَاتِهِ تَسْتَكْبِرُون} [الأنعام:93]. “ यदि आप अत्याचारियों को मौत की घोर यातना में देखेंगे, जब फरिश्ते अपने हाथ फैलाये होते हैं (और कहते हैं) कि अपने प्राण निकालो । आज तुम्हें अल्लाह पर अनुचित आरोप लगाने तथा अभिमानपूर्वक उसकी आयतों का इन्कार करने के कारण अपमानकारी प्रतिकार दिया जायेगा । ” (सूरह अल्-अन्आम : 93)

इस सम्बन्ध में बहुत सारी हदीसें भी हैं जो मालूम हैं।

इसलिए ईमान वालों पर अनिवार्य है कि इन परोक्ष की बातों से सम्बन्धित, जो कुछ किताब एवं सुन्नत में उल्लेख है, उस पर बिना किसी आपत्ति अभियोग के ईमान ले आयें,तथा सांसारिक मामलात पर क़यास करते हुए उनका विरोध न करें । क्योंकि आख़िरत के मामलात का सांसारिक मामलात से तुलना करना उचित नहीं है । दोनों के बीच बड़ा अन्तर है ।

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अध्याय

हम भाग्य पर ईमान रखते हैं । अच्छे तथा बुरे दोनों पर । दर असल भाग्य, अल्लाह तआला का, अपने ज्ञान तथा हिक्मत के अनुसार, विश्व के सम्बन्ध में निर्धारण है ।

भाग्य की चार श्रेणियाँ हैं :

1- इल्म (ज्ञान) : हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला अपने अनादिकाल एवं सर्वकालिक ज्ञान के द्वारा, हर चीज़ के सम्बन्ध में सब कुछ जानता है,अर्थात जो हो चुका है उस को भी जानता है और जो होने वाला है उस को भी जानता है एवं भविष्य में होने वाला किस प्रकार होगा, इस का भी वह ज्ञाता है। इस कथन का तथ्य यह है कि उस का ज्ञान, न तो अज्ञानता के बाद प्राप्त होता है, और न ही वह ज्ञान के बाद विस्मरण का शिकार होता है ।

2- लिपिबद्ध करना : हमारा ईमान है कि क़यामत तक जो कुछ होने वाला है, अल्लाह तआला ने उसे लौहे महफ़ूज़ में लिपिबद्ध कर रखा है । {أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاء وَالأَرْضِ إِنَّ ذَلِكَ فِي كِتَابٍ إِنَّ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِير} [الحج:70]. “ क्या आपने नहीं जाना कि आकाश तथा धरती की प्रत्येक वस्तु अल्लाह के ज्ञान में है । यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है । अल्लाह के लिए यह कार्य अत्यन्त सरल है । ” (सूरह हज्ज : 70)

3- मशीअत (ईश्वरेच्छा) : हमारा ईमान है कि जो कुछ आकाशों एवं धरती में है, सब अल्लाह की इच्छा से वजूद में आया है । कोई वस्तु उसकी इच्छा के बिना नहीं होती । अल्लाह तआला जो चाहता है, होता है, और जो नहीं चाहता,वह नहीं होता ।

4- ख़ल्क़ (रचना) : हमारा ईमान है कि : {خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ لَهُ مَقَالِيدُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ} [الزمر:62-63]. “ अल्लाह समस्त वस्तुओं का रचयिता है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है । आकाशों तथा धरती की चाबियों का वही स्वामी है । ” (सूरह अज़्-ज़ुमर : 62-63)

भाग्य की इन चारों श्रेणियों में वह सब कुछ आ जाता है, जो स्वयं अल्लाह की ओर से अथवा बन्दों की ओर से होता है । अतः बन्दे जो कुछ अन्जाम देते हैं, चाहे वह कथनात्मक हो, कर्मात्मक हो या उस का संबंध अक्रियता से हो , सब अल्लाह के ज्ञान में है एवं उसके पास लिपिबद्ध है । अल्लाह तआला ने उन्हें चाहा तथा उनकी रचना की । { لِمَنْ شَاءَ مِنْكُمْ أَنْ يَسْتَقِيمَ وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ} [التكوير:28-29] “ (विशेष रूप से) उसके लिए जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे । तथा तुम बिना समस्त जगत के प्रभु के चाहे, कुछ नहीं चाह सकते । ” (सूरह अत्-तकवीर : 28-29) {وَلَوْ شَاء اللّهُ مَا اقْتَتَلُواْ وَلَـكِنَّ اللّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيد} [البقرة:253] “ और यदि अल्लाह तआला चाहता, तो यह लोग आपस में न लड़ते, किन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है । ” (सूरह अल्-बक़रा : 253) {وَلَوْ شَاء اللّهُ مَا فَعَلُوهُ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُون} [الأنعام:137] “ और अगर अल्लाह चाहता, तो वे ऐसा नहीं करते, इसलिए आप उनको तथा उनकी मनगढ़ंत बातों को छोड़ दीजिए । ” ( सूरह अन्-आम : 137) {وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُون} [الصافات:96]. “ हालाँकि तुमको और जो तुम करते हो उसको, अल्लाह ही ने पैदा किया है । ” (सूरह साफ़्फ़ात : 96)

लेकिन इसके साथ-साथ हमारा यह भी ईमान है कि अल्लाह तआला ने बन्दों को एख़्तियार तथा शक्ति दी है, जिसके आधार पर ही कर्म संघटित होते हैं । और इस बात की दलील कि बन्दे का कर्म उसके एख़्तियार तथा उसकी शक्ति से होता है, कुछ बातें हैं :

1- अल्लाह तआला का फ़र्मान है : {فَأْتُواْ حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة:223].“ अपनी खेतियों में जिस प्रकार चाहो, आओ। ” (सूरह अल्-बक़रा : 223)

और उसका फ़र्मान है : {وَلَوْ أَرَادُواْ الْخُرُوجَ لأَعَدُّواْ لَهُ عُدَّةً} [التوبة:46] “ अगर वह निकलना चाहते, तो उसके लिए संसाधन तैयार करते । ” (सूरह अत्-तौबा 46) अल्लाह तआला ने (पहली आयत में) “आने” को (और दूसरी आयत में) “तैयारी” को बन्दे के इच्छाधीन साबित किया है ।

2- बन्दे को आदेश-निषेध का निर्देश: अगर बन्दे को एख़्तियार तथा शक्ति न होती, तो आदेश-निषेध का निर्देश उन भारों में से शुमार किया जाता, जो ताक़त से बाहर हैं। जबकि अल्लाह तआला की हिक्मत, रहमत तथा उसकी सत्य वाणी इसका खण्डन करती है । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {لاَ يُكَلِّفُ اللّهُ نَفْسًا إِلاَّ وُسْعَهَا} [البقرة:286]. “ अल्लाह किसी व्यक्ति को उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं देता । ” (सूरह अल्-बक़रा : 286)

3- सदाचार करने वाले की, उसके सदाचार पर प्रशंसा एवं दुराचार करने वाले की, उसके दुराचार पर निंदा तथा उन दोनों में से प्रत्येक को उनके कर्मानुसार बदला देना: यदि बन्दे का कर्म उसके एख़्तियार तथा इच्छा से न होता, तो सदाचारी की प्रशंसा करना निरर्थक होता एवं दुराचारी को सज़ा देना अत्याचार होता । जबकि अल्लाह तआला निरर्थक कामों एवं अत्याचार से पवित्र है ।

4- अल्लाह तआला का रसूलों को भेजना । {مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلاَّ يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى اللّهِ حُجَّةٌ بَعْدَ الرُّسُلِ} [النساء:165]، “ (हमने इन्हें) शुभसूचक एवं सचेतकर्ता रसूल बनाया, ताकि लोगों को कोई बहाना तथा अभियोग रसूलों को भेजने के पश्चात अल्लाह पर न रह जाये । ” (सूरह अन्-निसा : 165) अगर बन्दे का कर्म उसके एख़्तियार एवं इच्छा से न होता, तो रसूल को भेजने से उसका बहाना तथा अभियोग निरर्थक न होता ।

5-हर काम करने वाला व्यक्ति को यह बोध हिता है, कि विवशता के किसी संज्ञान के बिना, वह कार्य करता है या कार्य रहित होता है।सो वह केवल अपने इरादे से उठता-बैठता, आता-जाता तथा यात्रा एवं निवास करता है । उसे यह अनुभव नहीं होता कि कोई उसे इस पर विवश कर रहा है । बल्कि वह उन कामों में, जो अपने एख़्तियार से करता है और उन कामों में, जो किसी के विवश करने से करता है, वास्तविक अन्तर कर लेता है । इसी तरह शरीअत ने भी इन दोनों अवस्थाओं के दरमियान हिक्मत से भरा हुआ अन्तर किया है । अतः मनुष्य यदि अल्लाह के अधिकार सम्बन्धी कार्यों को विवश होकर कर जाये, तो उसकी कोई पकड़ नहीं होगी।

हमारा अक़ीदा है कि पापी को अपने पाप को सही ठहराने के लिए, भाग्य को हुज्जत बनाने का कोई अधिकार नहीं है । क्योंकि वह अपने एख़्तियार से पाप करता है और उसे इसका बिल्कुल ज्ञान नहीं होता कि अल्लाह तआला ने उसके भाग्य में यही लिख रखा है । क्योंकि किसी कार्य के होने से पूर्व कोई नहीं जान सकता कि अल्लाह तआला ने उसे उसके भाग्य में लिख रखा है । {وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَّاذَا تَكْسِبُ غَدًا} [لقمان:34]. “ कोई भी नहीं जानता कि वह कल क्या कमायेगा । ” (सूरह लुक़मान : 34)

जब मनुष्य कोई क़दम उठाते समय जिस हुज्जत को जानता ही नहीं, तो फिर सफ़ाई देते समय उसका इसे पेश करना कैसे सही हो सकता है ? अल्लाह तआला ने इस हुज्जत को निराधार ठहराते हुए फ़रमाया : {سَيَقُولُ الَّذِينَ أَشْرَكُواْ لَوْ شَاء اللّهُ مَا أَشْرَكْنَا وَلاَ آبَاؤُنَا وَلاَ حَرَّمْنَا مِن شَيْءٍ كَذَلِكَ كَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم حَتَّى ذَاقُواْ بَأْسَنَا قُلْ هَلْ عِندَكُم مِّنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَا إِن تَتَّبِعُونَ إِلاَّ الظَّنَّ وَإِنْ أَنتُمْ إَلاَّ تَخْرُصُون} [الأنعام:148]. “ जो लोग शिर्क करते हैं, वह कहेंगे कि यदि अल्लाह चाहता, तो हम तथा हमारे पूर्वज शिर्क नहीं करते और न हम किसी चीज़ को हराम ठहराते । इसी प्रकार उन लोगों ने झुठलाया, जो उनसे पहले थे, यहाँ तक कि हमारे प्रकोप का मज़ा चखकर रहे । कह दो, क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है तो उसे हमारे सामने व्यक्त करो । तुम कल्पना का अनुसरण करते हो तथा मात्र अनुमान लगाते हो । ” (सूरह अल्-अन्आम : 148)

तथा हम भाग्य को आधार बनाकर पाप करने वाले पापियों से कहेंगे : तुम पुण्य का काम यह समझकर क्यों नहीं करते कि अल्लाह तआला ने तुम्हारे भाग्य में यही लिखा है ? अज्ञानता में कार्य के होने से पहले पाप एवं आज्ञापालन में इस आधार पर कोई अन्तर नहीं है ।

यही कारण है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम को यह सूचना दी कि तुममें से हरेक का ठिकाना स्वर्ग या नरक में तय कर दिया गया है, और उन्होंने निवेदन किया कि क्या हम कर्म को छोड़कर उसी पर भरोसा न कर लें ? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “ नहीं, तुम कार्य करते रहो, क्योंकि जिसको जिस तरह के कार्य के लिए पैदा किया गया है, उसे उसी का सामर्थ्य दिया जाता है । ”

तथा अपने पापों पर भाग्य से हुज्जत पकड़ने वालों से कहेंगे: यदि तुम्हारा इरादा मक्का की यात्रा का हो, तथा उसके दो मार्ग हों, और तुम्हारा कोई विश्वासी व्यक्ति यह बताये कि उनमें से एक मार्ग बहुत ही भयंकर एवं कष्टदायक तथा दूसरा बहुत ही सरल एवं शान्तिपूर्ण है, तो तुम निश्चय ही दूसरा मार्ग चुनोगे। यह असंभव है कि तुम पहले वाले भयंकर मार्ग पर यह कहते हुए चल निकलो: कि मेरे भाग्य में यही लिखा है।और अगर तुम ऐसा करोगे, तो तुम को जनता भ्रष्ट बुद्धि वाला मानेगी।

और हम उस से यह भी कहेंगे कि यदि तुम को दो नौकरियों का प्रस्ताव दिया जाये और उनमें से एक का वेतन अधिक हो, तो तुम निश्चित रूप से कम वेतन वाली नौकरी की बजाये अधिक वेतन वाली नौकरी को चुनोगे। तो फिर परलौकिक कर्मों के मामले में तुम क्यों कमतर को चुनकर भाग्य की दुहाई देते हैं ।

और हम उस से यह भी कहेंगे कि जब तुम किसी शारीरिक रोग में ग्रस्त होते हो, तो अपने उपचार के लिए हर डाक्टर का दरवाज़ा खटखटाते हो और आप्रेशन की पीड़ा एवं कड़वी दवा पूरे धैर्य के साथ सहन करते हो।

तो फिर अपने दिल पर पापों के रोग के आक्रमण की स्थिति में ऐसा क्यों नहीं करते ?

हमारा ईमान है कि अल्लाह तआला की परिपूर्ण कृपा एवं हिक्मत के चलते बुराई का सम्बन्ध उससे जोड़ा नहीं जायेगा । नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : «والشّرّ ليس إليك» رواه مسلمٌ. “ तथा बुराई तुझ से सम्बन्धित नही है।” (मुस्लिम)

क्योंकि अल्लाह तआला के आदेशों में स्वयं कभी बुराई नहीं होती। इस लिये कि वह उसकी कृपा एवं हिक्मत से जारी होते हैं । बल्कि बुराई उस के निर्णय से उत्पन्न वस्तुओं में होती है । क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हसन रज़ियल्लाहु अन्हु को दुआये क़ुनूत की शिक्षा देते हुए फ़रमाया : «وقني شرّ ما قضيت» “और (ऐ अल्लाह) मुझे अपने निर्णय से उत्पन्न वस्तुओं के अनिष्ट से सुरक्षित रख । ” इसमें अनिष्ट का सम्बन्ध अल्लाह के निर्णय (कज़ा) से जोड़ा गया है । इसके बावजूद उस के निर्णय से उत्पन्न वस्तुओं में सिर्फ़ बुराई ही नहीं होती, बल्कि उनमें एक कोण से बुराई होती है तो दूसरे कोण से भलाई अथवा एक स्थान पर बुराई होती है तो दूसरे स्थान पर अच्छाई ।

चुनांचे ज़मीन में विकार जैसे अकाल, बीमारी, फ़क़ीरी तथा भय आदि बुराई हैं । किन्तु इनमें भलाई का पक्ष भी मौजूद है । अल्लाह तआला ने फ़रमाया : {ظَهَرَ الْفَسَادُ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِي النَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ الَّذِي عَمِلُوا لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُون} [الروم:41]. “ जल और थल में लोगों के कुकर्मों के कारण दूषण फैल गया, ताकि उन्हें उनके कुछ कर्तूतों का फल अल्लाह तआला चखा दे, (बहुत) मुमकिन है कि वह रुक जायें । ” (सूरह अर्-रूम : 41)

तथा चोर का हाथ काटना एवं बियाहता व्याभिचारी को संगसार करना, चोर और व्याभिचारी के लिए तो अनिष्ट है, क्योंकि एक का हाथ नष्ट होता है तो दूसरे की जान जाती है, परन्तु दूसरे कोण से यह उनके लिए उपकार है, क्योंकि इससे पापों का निवारण होता है । तथा अल्लाह तआला उनके लिए लोक-परलोक की सज़ा इकट्ठी नहीं करेगा । तथा दूसरे स्थान पर यह इस कोण से भी उपकार है कि इससे लोगों की सम्पत्तियों, प्रतिष्ठाओं एवं गोत्रों की रक्षा होती है ।

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अध्याय

इन महान नियमों पर आधारित यह उच्च अक़ीदा अपने मानने वालों के लिए अति श्रेष्ठ प्रतिफल एवं परिणामों का वाहक है ।

अल्लाह तआला की ज़ात तथा उसके नामों और गुणों पर ईमान से बन्दे के दिल में अल्लाह की मुहब्बत एवं उसका सम्मान उत्पन्न होता है, जिसके परिणाम स्वरूप वह उसके आदेशों के पालन के लिए तैयार रहता है तथा निषिद्ध चीज़ों से बचने लगता है । अल्लाह तआला के आदेशों के पालन तथा निषिद्ध कार्यों से बचे रहने में व्यक्ति एवं समाज के लोक-परलोक का पूर्ण कल्याण है । {مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُواْ يَعْمَلُون} [النحل:97]. “ जो पुण्य का कार्य करे, नर हो अथवा नारी, और वह ईमान वाला हो, तो हम उसे निःसंदेह सर्वोत्तम जीवन प्रदान करेंगे तथा उनके पुण्य के कार्यों का उत्तम बदला भी अवश्य देंगे । ” (सूरह अन्-नह्ल : 97)

फ़रिश्तों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिफल:

1- उनके सृष्टा की महानता, शक्ति एवं आधिपत्य का ज्ञान ।

2- अल्लाह तआला की अपने बन्दों के साथ विशेष कृपा पर उसका शुक्र अदा करना। क्योंकि अल्लाह ने कुछ फ़रिश्तों को बन्दों के साथ लगा रखा है, जो उनकी रक्षा करने तथा उनके कर्मों को लिखने आदि कार्यों में व्यस्त रहते हैं ।

3- फ़रिश्तों से मुहब्बत करना, इस बिना पर कि वह यथोचित रूप से अल्लाह की उपासना करते हैं तथा मोमिनों के लिए क्षमा याचना (इस्तिग़्फ़ार) करते हैं ।

किताबों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिफल :

1- सृष्टि पर अल्लाह तआला की कृपा एवं मेहरबानी का ज्ञान । क्योंकि उसने हर क़ौम के लिए वह किताब उतारी, जो उन्हें सत्य मार्ग की ओर अग्रसर करती है ।

2- अल्लाह तआला की हिक्मत का ज़ाहिर होना । क्योंकि उसने इन किताबों में हर उम्मत के लिए वह शरीअत निर्धारित की, जो उनके लिए मुनासिब थी । इन किताबों में अन्तिम किताब पवित्र क़ुर्आन है, जो क़यामत तक तमाम सृष्टि के लिए प्रत्येक युग तथा प्रत्येक स्थान में मुनासिब है ।

3- इसके लिए अल्लाह तआला की अनुग्रह पर आभार प्रकट करना।

रसूलों पर ईमान के लाभ एवं प्रतिफल :

1-अपनी सृष्टि पर, अल्लाह की कृपा एवं दया का ज्ञान । क्योंकि उसने इन रसूलों को अपनी सृष्टि की ओर उनके मार्गदर्शन तथा निर्देशन के लिए भेजा है ।

2- अल्लाह तआला की इस महा अनुग्रह पर उसका आभार व्यक्त करना ।

3-रसूलों से मुहब्बत, उनकी श्रद्धा और उनकी ऐसी प्रशंसा करना, जिसके वह योग्य हैं । क्योंकि वह अल्लाह के रसूल (दूत) तथा उसके बन्दों मेंं श्रेष्ठतम हैं । उन्होंने अल्लाह तआला की इबादत करने, उसके संदेश को पहुँचाने और उसके बन्दों के शुभ चिन्तन के कर्तव्य को बख़ूबी निभाया, तथा इस महानतम कार्य कि वजह से आने वालों कष्टों पर धैर्य का प्रदर्शन किया ।

आख़िरत पर ईमान के लाभ एवं प्रतिफल :

1- उस दिन के पुरस्कार की उम्मीद रखते हुए पूरे मन से अल्लाह तआला की आज्ञापालन करना, एवं उस दिन की सज़ा से डरते हुए उसकी अवज्ञा से दूर रहना ।

2- यह मोमिन के लिए, दुनिया की उन नेमतों एवं माल-अस्बाब से सांत्वना का कारण है, जो उसे प्राप्त नहीं हो पातीं । क्योंकि उसे परलोकिक नेमतों तथा प्रतिफलों की आषा रहती है ।

भाग्य पर ईमान के लाभ एवं प्रतिफल :

1- साधनों को एख़्तियार करते समय अल्लाह तआला पर भरोसा करना । क्योंकि साधन तथा परिणाम दोनों अल्लाह तआला के फ़ैसले तथा उसकी इच्छा पर आश्रित हैं।

2- आत्मा की राहत तथा दिल की शान्ति । क्योंकि बन्दा जब जान ले कि यह अल्लाह तआला के फ़ैसले से हुआ है तथा अप्रिय विषय निश्चय घटित होने वाले हैं, तब आत्मा को राहत तथा दिल को शान्ति मिल जाती है एवं वह प्रभु के फ़ैसले से संतुष्ट हो जाता है । जो व्यक्ति भाग्य पर ईमान लाता है उससे बढ़कर सुखप्रद जीवन तथा सुकून एवं चैन किसी को प्राप्त नहीं होता ।

3-उद्देश्य प्राप्त होने पर स्व प्रशंसा से बचाव । क्योंकि उद्देश्य की प्राप्ति अल्लाह तआला की ओर से वरदान है, जिस की पूर्ति अल्लाह तआला, भलाई और सफलता के कारणों को, सरल बनाकर करता है । अतः बंदा इस पर अल्लाह तआला का आभार प्रकट करता है एवंस्व प्रशंसा से परहेज़ करता है ।

4- उद्देश्य की पराप्ति न होने या अप्रिय वस्तु के घटन पर, चिंता और ऊब से छुटकारा । क्योंकि यह उस अल्लाह का निर्णय है, जो आकाशों एवं धरती का स्वामी है तथा यह हर अवस्था में होकर रहेगा । अतः वह इस पर सब्र करता है एवं अच्छे बदले की उम्मीद रखता है । अल्लाह तआला इसी ओर संकेत करते हुए फ़रमाता है : { مَا أَصَابَ مِنْ مُصِيبَةٍ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي أَنْفُسِكُمْ إِلَّا فِي كِتَابٍ مِنْ قَبْلِ أَنْ نَبْرَأَهَا إِنَّ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ لِكَيْلَا تَأْسَوْا عَلَى مَا فَاتَكُمْ وَلَا تَفْرَحُوا بِمَا آتَاكُمْ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ} [الحديد:22-23]. “ न कोई कठिनाई (संकट) संसार में आती है न (ख़ास) तुम्हारी जानों में, मगर इससे पूर्व कि हम उसको पैदा करें, वह एक ख़ास किताब में लिखी हुई है । निःसंदेह यह (कार्य) अल्लाह पर (बिल्कुल) आसान है । ताकि अपने से छिन जाने वाली वस्तु पर दुखी न हो जाया करो, न प्रदान की हुई वस्तु पर गर्व करने लगो, तथा गर्व करने वाले अहंकारियों को अल्लाह पसन्द नहीं फ़रमाता । ” (सूरह अल्-हदीद : 22-23)

अंत में हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें इस अक़ीदे पर दृढ़ प्रतिज्ञा वाला बनाये रखे, इससे लाभन्वित होने की तौफ़ीक़ अता करे, अपने अनुकंपाओं से सम्मानित करे, हिदायत के बाद हमारे दिलों को टेढ़ा न करे और अपने पास से हमें कृपा प्रदान करे । निःसंदेह वह परम दाता है । सारी प्रशंसा जगत के प्रभु अल्लाह के लिए है ।

तथा दया और शांती (दरूद व सलाम) अवतरित हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, तथा आप के परिवार-परिजन और आपके साथियों (सहाबा) और भलाई के साथ सहाबा का अनुसरण करने वालों पर ।

यह किताब अपने अंत को पहुँची । इसके लेखक हैं :

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

30 शौवाल 1404 हिजरी

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