نبذة في العقيدة الإسلامية (شرح أصول الإيمان)

نبذة في العقيدة الإسلامية (شرح أصول الإيمان)

رسالة لطيفة تتناول أصول العقيدة الإسلامية بأسلوب مبسط وميسر. تبدأ بمقدمة حول أهمية علم التوحيد، كونه أشرف العلوم وأجلّها، ثم تتناول مفهوم الدين الإسلامي وأركانه الخمسة: الشهادتان، والصلاة، والزكاة، والصوم، والحج. كما يشرح الإيمان بالله، وملائكته، وكتبه، ورسله، واليوم الآخر، ويؤكد على أهمية التوحيد في بناء دين المسلم بشكل سليم. الكتاب يهدف إلى تعزيز الفهم الصحيح للعقيدة الإسلامية وتطبيقها في حياة المسلم اليومية.

Language: lang_hi
Prepared by: मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन
Version: 1.2
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इस्लामी अक़ीदा (आस्था) संक्षिप्त में

लेखक महान विद्द्वान शेख

मुहम्मद बिन सालिह अल-उसैमीन

अल्लाह तआला उन्हें, उनके माता-पिता तथा तमाम मुसलमानों को क्षमा करे।

अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान है।

प्रस्तावना

निस्संदेह सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। हम उसकी प्रशंसा करते हैं, उससे सहायता माँगते हैं, उससे क्षमा याचना करते हैं और उसी की ओर लौटते हैं। हम अपने नफ़्सों (आत्माओं) की बुराइयों से तथा अपने बुरे कर्मों से अल्लाह की शरण माँगते हैं, जिसे अल्लाह हिदायत दे उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं है, और जिसे वह गुमराह करे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, और उसका कोई साझी नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि मुह़म्मद अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं, अल्लाह की रह़मत हो उन पर, उनके परिवार पर, उनके साथियों पर और उन पर जिन्होंने अच्छाई के साथ उनका अनुसरण किया तथा उनको पूर्ण शांति मिले।

स्तुतिगान के पश्चातः तौहीद शास्त्र (एकेश्वरवाद का ज्ञान) सब से अधिक प्रतिष्ठित, अतिश्रेष्ठ और अति आवश्यक ज्ञान है, क्योंकि इस ज्ञान का सम्बंध अल्लाह तआला की ज़ात (अस्तित्व), उसके अस्मा (नामों) व सिफ़ात (गुणों) और मनुष्यों पर उसके अधिकारों से है। और इसलिए भी कि यह अल्लाह तक पहुंचाने वाले मार्ग का प्रारम्भिक बिंदु (कुंजी) और उसकी ओर से उतारे गए समस्त धर्म-शास्त्रों का मूल आधार है।

यही कारण है कि तौहीद की ओर आमन्त्रण देने पर तमाम नबियों और रसूलों की सहमती रही है, अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो"। [सूरा अल-अंबिया : 25]

और अल्लाह तआला ने स्वयं अपनी वहदानियत (अकेले उपासना योग्य होने) की गवाही दी है, और उसके फ़रिश्तों ने और ज्ञानियों ने भी उसके लिए इसकी गवाही दी है, अल्लाह तआला ने फरमाया : "अल्लाह ने गवाही दी कि निःसंदेह उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा फ़रिश्तों और ज्ञान वालों ने भी, इस हाल में कि वह न्याय को क़ायम करने वाला है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है"। [सूरा आल-इमरान : 18]

जब तौहीद की यह प्रतिष्ठा और महानता है तो प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है कि वह ध्यान के साथ इस ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करे, इसकी शिक्षा दे, इसके अन्दर चिंतन करे, और इस पर विश्वास रखे, ताकि वह अपने धर्म की स्थापना उचित आधार और संतोष तथा स्वीकृति और प्रसन्नता पर करे और उसके प्रतिफल और परिणामों से लाभान्वित हो।

अल्लाह तआ़ला ही सुयोग एवं क्षमता देने वाला है।

लेखक

इस्लाम धर्म

इस्लाम धर्म: वह धर्म है जिसके साथ अल्लाह तआला ने मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा, उसी धर्म के द्वारा अल्लाह तआला ने सारे धर्मों की समाप्ति कर दी, अपने बन्दों के लिए उसे पूरा कर दिया, उसी के द्वारा उन पर अपनी नेमतें सम्पूर्ण कर दीं और उनके लिए उसी धर्म को पसंद कर लिया, अब किसी भी व्यक्ति से उसके अतिरिक्त कोई अन्य धर्म स्वीकार नहीं करेगा, अल्लाह तआला का कथन हैः "मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु को भली-भाँति जानने वाला है।" [सूरा अल-अहज़ाब :40]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः "आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर पसंद कर लिया"। [सूरा अल-माइदा : 3]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः "निःसंदेह दीन (धर्म) अल्लाह के निकट इस्लाम ही है..." [सूरा आल-ए-इमरान : 19]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः "और जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [सूरा आल-ए-इमरान : 85]

अल्लाह तआला ने सारे लोगों पर यह बात अनिवार्य कर दिया है कि वह इसी इस्लाम धर्म के द्वारा अल्लाह की उपासना और आज्ञापालन करें,अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को संबोधित करते हुए फ़रमाया: "(ऐ नबी!) आप कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! निःसंदेह मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाशों तथा धरती का राज्य है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। वही जीवन देता और मारता है। अतः तुम अल्लाह पर और उसके उम्मी (अर्थात जो लिखना पढ़ना नहीं जानता है ) रसूल नबी पर ईमान लाओ, जो अल्लाह पर और उसकी सभी वाणियों (पुस्तकों) पर ईमान रखता है और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम सीधा मार्ग पाओ"। [सूरा अल-आराफ़: 158]

एवं सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "क़सम है उस ज़ात की जिसके हाथ में मोहम्मद की जान है, मेरे विषय में इस उम्मत का जो व्यक्ति भी सुने, चाहे वह यहूदी हो या ईसाई, फिर वह उस चीज़ पर ईमान न लाए, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ, तो वह जहन्नमी होगा।"[1] [1] इसे मुस्लिम ने "किताबुल-ईमान", बाब वुजूबुल-ईमान बि-रिसालिते नबिय्यिना मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इला जमी'इन्नास व नस्खिल-मिललि बि-मिल्लतिह, हदीस संख्या: 153 में रिवायत किया है।

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर ईमान लाने का अर्थ यह है कि :आप की लाइ हुई शरीअत (धर्म शास्त्र) को सच्चा जानने के साथ ही उसे स्वीकार किया जाए और उसे मान लिया जाए, केवल उसको सच्चा जानना काफी नहीं है, यही कारण है कि अबू तालिब मोमिन नहीं घोषित हुये जबकि वह आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की लाई हुई शरीअत को सच्चा जानते थे और यह गवाही देते थे की वह सब से उत्तम धर्म है।

इस्लाम धर्म : उन समस्त हितों, भलाइयों और अच्छाइयों को सम्मिलित है जो पिछले धर्मों में पाई जाती थीं, तथा उसको उन पर यह विशेषता प्राप्त है कि वह प्रत्येक युग, प्रत्येक स्थान और प्रत्येक क़ौम (समुदाय) के लिए उचित है, अल्लाह तआला ने अपने रसूल -सल्लाल्लाहु अलैहि व सल्लम- को संबोधित करते हुए फ़रमाया : "और (ऐ नबी!) हमने आपकी ओर यह पुस्तक (क़ुरआन) सत्य के साथ उतारी, जो अपने पूर्व की पुस्तकों की पुष्टि करने वाली तथा उनकी संरक्षक है..." [सूरा अल-माइदा : 48]

और इस्लाम के प्रत्येक युग, प्रत्येक स्थान, प्रत्येक क़ौम (समुदाय) के लिए उचित होने का अर्थ यह है कि इस धर्म को ग्रहण करना और उसकी पाबन्दी करना किसी भी युग किसी भी स्थान पर उम्मत (लोगों) के हितों के विपरीत नहीं हो सकता, बल्कि इसमें उसकी भलाई और कल्याण है, उसका यह अर्थ नहीं है कि इस्लाम प्रत्येक युग और प्रत्येक स्थान और प्रत्येक उम्मत की इच्छा के अनुकूल होगा, जैसा की कुछ लोगों का विचार है।

इस्लाम धर्म ही वह सच्चा धर्म है जिसको सुदृढ़ता से पकड़े रहने वाले के लिए अल्लाह तआला ने सहायता और सहयोग तथा उसे दूसरे लोगों पर विजय और अधिपत्य प्रदान करने का दायित्व लिया है, अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन तथा सत्धर्म (इस्लाम) के साथ भेजा, ताकि उसे प्रत्येक धर्म पर प्रभुत्व प्रदान कर दे, भले ही बहुदेववादियों को बुरा लगे"। [सूरा अस-सफ़्फ़: 9]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः "अल्लाह ने उन लोगों से, जो तुममें से ईमान लाए तथा उन्होंने सुकर्म किए, वादा किया है कि वह उन्हें धरती में अवश्य ही अधिकार प्रदान करेगा, जिस तरह उन लोगों को अधिकार प्रदान किया, जो उनसे पहले थे, तथा उनके लिए उनके उस धर्म को अवश्य ही प्रभुत्व प्रदान करेगा, जिसे उसने उनके लिए पसंद किया है, तथा उन (की दशा) को उनके भय के पश्चात् शांति में बदल देगा। वे मेरी इबादत करेंगे, मेरे साथ किसी चीज़ को साझी नहीं बनाएँगे। और जिसने इसके बाद कुफ़्र किया, तो वही लोग अवज्ञाकारी हैं"। [सूरा अल-नूर : 55]

इस्लाम धर्म: अकीदा (श्रद्धा, आस्था) और शरीअत (धर्म शास्त्र) का नाम है, और वह अकीदा और शरीअत दोनों में अति परिपूर्ण है, चुनांचे वह:

1- अल्लाह तआला की तौहीद (एकेश्वरवाद) का आदेश देता है और शिर्क (अनेकेश्वरवाद) से रोकता है।

2- सत्यवादिता का आदेश देता है और झूठ से रोकता है।

3- अद्ल अर्थात न्याय का आदेश देता है और अत्याचार से रोकता है। अद्ल की परिभाषा : सदृश्य (एक जैसी) चीजों के बीच समानता और बराबरी पैदा करने और विभिन्न चीजों के बीच भिन्नता पैदा करने का नाम अद्ल है। अद्ल अर्थात न्याय का अर्थ सामान्यतः बराबरी और समानता नहीं है अर्थात समस्त चीजों के बीच समानता और बराबरी स्थापित करने का नाम अद्ल नहीं है, जैसा कि कुछ लोगों का दावा है, वह कहते हैं कि इस्लाम सामान्य रूप से समानता और बराबरी का धर्म है, हालांकि विभिन्न और विपरीत चीजों के बीच बराबरी एक अत्याचार है जो इस्लाम की शिक्षा नहीं है, और न ही ऐसा करने वाला इस्लाम की दृष्टि में सराहनीय है।

4- अमानत का आदेश देता है और ख़यानत (ग़बन) से रोकता है।

5- प्रतिज्ञा पालन का आदेश देता है और विश्वास घात तथा प्रतिज्ञा भंग करने से मना करता है।

6- माता पिता के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देता है और उनके साथ बुरे व्यवहार से रोकता है।

7- खूनी रिश्तेदारों (संबंधियों) के साथ नाता और सम्बंध जोड़ने का आदेश देता है और सम्बंध-विच्छेद से रोकता है।

8- पडोसियों के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देता है और दुर्व्यवहार से रोकता है।

सामान्य रूप से कहा जा सकता है किः इस्लाम हर अच्छे आचरण का आदेश देता है और हर बुरे आचरण से मना करता है। इसी प्रकार, इस्लाम हर अच्छे कार्य का आदेश देता है और हर बुरे कार्य से मना करता है।

महान अल्लाह का कथन है: "निःसंदेह अल्लाह न्याय और उपकार और निकटवर्तियों को देने का आदेश देता है और अश्लीलता और बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम नसीहत हासिल करो"। [सूरा अन-नह्ल : 90]

इस्लाम के स्तंभ

इस्लाम के स्तंभ: यह वे बुनियादी तत्व हैं जिन पर इस्लाम की संरचना आधारित है, और ये पाँच हैं: यह अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर रखी गई है, पहली यह है कि अल्लाह को एक माना जाए (केवल उसी की इबादत की जाए) - और एक रिवायत में है: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसके बंदे और रसूल हैं,- नमाज़ क़ाइम करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना और हज करना। एक व्यक्ति ने पूछा : हज और रमज़ान महीने के रोज़े? उन्होंने फ़रमाया : नहीं, रमज़ान का रोज़ा और हज। मैंने यह हदीस इसी तरह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सुनी है। [2] [2] इस हदीस को बुख़ारी ने "किताब अल-ईमान", हदीस संख्या : 8, और मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", "बाब: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन: 'इस्लाम पाँच चीज़ों पर आधारित है'", हदीस संख्या : 16 में रिवायत किया है।

1- इस्लाम के प्रथम स्तम्भ अर्थात केवल अल्लाह तआला के वास्तविक उपास्य होने और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अल्लाह का बंदा और संदेशवाहक होने की गवाही (साक्ष्य) देने का अर्थ यह है कि: मुख से जिस बात की गवाही दी जा रही है उस पर ऐसा दृढ़ विश्वास रखा जाए कि मानो बंदा उसे देख रहा हो। इस स्तम्भ में एक से अधिक बातों की शहादत होने के बावजूद उसे एक ही स्तम्भ माना गया है उसका कारण:

या तो यह हो सकता है कि चूंकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह की ओर से सन्देश पहूंचाने वाले हैं, अतः आप के लिए अल्लाह का बन्दा (उपासक) एवं रसूल (संदेशवाहक) होने की गवाही देना अल्लाह के वास्तविक उपास्य होने की गवाही देने का पूरक है।

या इसलिए कि ये दोनों गवाहियाँ (शहादतैन) किसी भी काम की सत्यता और स्वीकृति की आधारशिला हैं; क्योंकि किसी भी कार्य की सत्यता और स्वीकृति केवल अल्लाह तआला के प्रति निष्ठा और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के अनुसरण के द्वारा ही संभव है।

अल्लाह के प्रति निष्ठा से "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं" की गवाही पूर्ण होती है, और रसूलुल्लाह के अनुकरण से "मुहम्मद अल्लाह के बंदे " की गवाही सही ठहरती है।

इस गवाही के कुछ महान प्रतिफल यह हैं कि : इस के द्वारा मनुष्य की दासता (गुलामी) और पैगम्बरों के अतिरिक्त किसी के अनुसरण (पैरवी) से हृदय और प्राण मुक्त हो जाते हैं।

2- नमाज़ स्थापित करने का मतलब यह है कि : नमाज़ को उसके ठीक समय और सटीक पद्धति (तरीके) के अनुसार उचित और सम्पूर्ण रूप से अदा करके अल्लाह की इबादत की जाए।

नमाज़ के कुछ प्रतिफल यह हैं कि : इस से हृदय को प्रफुल्लता और आँखों को ठंडक प्राप्त होती है, और आदमी बुराईयों तथा अनुचित कामों से दूर होता है।

3- ज़कात (अनिवार्य धार्मिक-दान) देने का अर्थ यह है किः जिन संपत्तियों में ज़कात ज़रूरी है उनमे से ज़कात की निर्धारित मात्रा निकाल के अल्लाह तआला की उपासना (इबादत) की जाए।

इसके कुछ प्रतिफल यह हैं कि इसके द्वारा आत्मा घटिया और तुच्छ स्वभाव (कंजूसी) से पवित्र हो जाती है, और इस्लाम तथा मुसलमानों की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।

4- रमज़ान का रोज़ा (व्रत) रखने का अर्थ यह है कि: रमज़ान के दिनों में रोज़ा तोड़ने वाली चीजों से रुक कर अल्लाह तआला की इबादत करना।

इसके प्रतिफलों में से एक प्रतिफल यह है कि : इससे अल्लाह तआला की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए नफ्स (आत्मा) को प्रिय चीजों के त्यागने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

5- अल्लाह तआला के घर (काबा) का हज्ज करने का अर्थ यह है कि : अल्लाह तआला की उपासना और आराधना में हज्ज के शआइर (खास कार्यो) को अदा करने के लिए अल्लाह के पवित्र घर की ज़ियारत करना।

हज्ज का एक प्रतिफल यह है कि: इससे अल्लाह तआला के आज्ञापालन में आर्थिक एवं शारीरिक बलिदान पेश करने पर आत्मा का अभ्यास होता है, यही कारण है कि हज्ज को अल्लाह के मार्ग में जिहाद का एक भाग बताया गया है।

इन नींवों के जिन प्रतिफलों का हमने उल्लेख किया है और जिनका उल्लेख नहीं किया है, वे इस समुदाय को एक पवित्र और शुद्ध इस्लामी समुदाय बना देते हैं, जो अल्लाह के सच्चे धर्म की पाबंदी करती है और सृष्टि के साथ न्याय और सच्चाई के साथ व्यवहार करती है। क्योंकि इस्लाम की अन्य सभी शिक्षाएँ इन आधारों की सुधार पर निर्भर करती हैं, और समुदाय की स्थिति उनके धर्म की सही स्थिति पर निर्भर करती है, और उनकी स्थिति में जितनी कमी होती है, वह उनके धर्म की स्थिति में कमी के बराबर होती है।

जो इस बात का अधिक स्पष्टीकरण चाहता हो उसे अल्लाह तआला का यह कथन पढ़ना चाहिए : "और यदि इन बस्तियों के वासी ईमान ले आते और डरते, तो हम अवश्य ही उनपर आकाश और धरती की बरकतों के द्वार खोल देते, परन्तु उन्होंने झुठला दिया। अतः हमने उनकी करतूतों के कारण उन्हें पकड़ लिया। क्या फिर इन बस्तियों के वासी इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना रात के समय आ जाए, जबकि वे सोए हुए हों? और क्या नगर वासी इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर हमारी यातना दिन चढ़े आ जाए और वे खेल रहे हों? तो क्या वे अल्लाह के गुप्त उपाय से निश्चिंत हो गए हैं? तो (याद रखो!) अल्लाह के गुप्त उपाय से वही लोग निश्चिंत होते हैं, जो घाटा उठाने वाले हैं"। [सूरा अल-आराफ़ : 96-99]

इसी प्रकार स्पष्टीकरण चाहने वाले को पिछली उम्मतों के इतिहास में भी विचार और चिंतन करना चाहिए, क्योंकि इतिहास बुद्धिमान लोगों के लिए पथ और उपदेश तथा जिसके हृदय पर पर्दा न पड़ा हो उसके लिए नसीहत है, और अल्लाह तआला ही सहायक है।

इस्लामी अक़ीदा (श्रद्धा) के मूल आधार

इस्लाम धर्मः -जैसा कि पूर्व में हम स्पष्ट कर चुके हैं कि- अक़ीदा (आस्था) और शरीअत (धर्म शास्त्र) का नाम है, और हम उसके कुछ आदेशों की ओर पिछली पंक्तियों में संकेत कर चुके हैं और उस के उन स्तंभों का भी उल्लेख कर चुके हैं जो इस्लाम के आदेशों के लिए आधार समझे जाते हैं।

इस्लामी अक़ीदा के मूल आधार यह हैं: अल्लाह पर ईमान लाना, अल्लाह के फ़रिश्तों पर ईमान लाना, उसकी उतारी हुई किताबों पर ईमान लाना, उसके रसूलों पर ईमान लाना, आख़िरत के दिन पर ईमान लाना, और तक़दीर पर चाहे अच्छी हो या बुरी ईमान लाना।

इन मूल आधारों पर अल्लाह तआला की पुस्तक (क़ुरआन) और उस के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत में पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।

क़ुरआन -ए- करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है: "नेकी केवल यही नहीं कि तुम अपने मुँह पूर्व और पश्चिम की ओर फेर लो! बल्कि असल नेकी तो उसकी है, जो अल्लाह और अंतिम दिन (आख़िरत) और फ़रिश्तों और पुस्तकों और नबियों पर ईमान लाए..." [सूरा अल-बक़रा : 177] और तकदीर (भाग्य) के विषय में अल्लाह तअला फ़रमाता है : "निःसंदेह हमने प्रत्येक वस्तु को एक सटीक नाप के साथ पैदा किया है। और हमारा आदेश तो केवल एक ही बात होता है (कि हो जा), जैसे आँख की एक झपक"। [सूरा-क़मर : 49-50]

और रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत से यह बात प्रमाणित है कि आपने ईमान के विषय में जिबरील -अलैहिस्सलाम- के प्रश्न के उत्तर में फ़रमाया : "ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा अच्छे एवं बुरे भाग्य पर ईमान लाओ।" [3] [3] इसे मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", हदीस संख्या: 8 में, और अबू दाऊद ने "किताब अस-सुन्नह", "बाब: फ़ि-अल-क़दर", हदीस संख्या: 4695 में रिवायत किया है।

अल्लाह तआला पर ईमान लाना

अल्लाह पर ईमान लाने में चार चीजें सम्मिलित हैं:

पहली बात: अल्लाह तआला के वजूद (अस्तित्व) पर ईमान रखनाः

अल्लाह तआला के वजूद (अस्तित्व) को फितरत (प्रकृति), बुद्धि, शरीअत और हिस्स (इन्द्रिय-ज्ञान, चेतना) सभी तर्क प्रमाणित करते हैं।

अल्लाह के वजूद पर फितरत (प्रकृति) की दलालत (तर्क) यह है कि: प्रत्येक मख़लूक़ (प्राणी वर्ग) बिना किसी पूर्व सोच विचार या शिक्षा के प्राकृतिक रूप से अपने ख़ालिक़ (स्रष्टा) पर ईमान रखता है, इस प्राकृतिक तकाजे से वही व्यक्ति विमुख हो सकता है जिसके हृदय पर उसके विमुख होने वाला बाहरी प्रभाव अधिकार जमा ले। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "हर बच्चा फ़ितरत (इस्लाम) पर पैदा होता है, फिर उसके माता-पिता उसे यहूदी बना देते हैं, या ईसाई बना देते हैं, या मजूसी बना देते हैं।" [4] [4] सहीह बुख़ारी, किताब अल-जनाइज़, बाब इज़ा अस्लम अस-सबी फ-मात, हल युसल्ला अलैहि, व हल युअरजु अला अस-सबी अल-इस्लाम, हदीस संख्या 1292 तथा सहीह मुस्लिम, किताब अल-क़दर, बाब मअना कुल्लु मोलूदिन यूलदु  अला अल-फ़ित्रह, व हुक्मु मौत अत्फ़ाल अल-कुफ़्फ़ार व अत्फ़ाल अल-मुस्लिमीन, हदीस संख्या 2658।

2- अल्लाह तआला के अस्तित्व पर बुद्धि की दलालत (तर्क) यह है कि: सारे पिछले और आगामी जीव जंतु के लिए ज़रूरी है कि उनका एक उत्पत्तिकर्ता हो जिसने उनको पैदा किया हो, क्योंकि ऐसा संभव नहीं है कि जीव प्राणी अपने आपको वजूद में लाएं, और यह भी असम्भव है कि वह सहसा पैदा हो जाएं।

कोई प्राणी स्वयं अपने आपको इस लिए पैदा नहीं कर सकता क्योंकि कोई वस्तु अपने आपको स्वयं पैदा नहीं करती है, क्योंकि अपने अस्तित्व से पूर्व वह स्वयं अस्तित्व-हीन थी, फिर स्रष्टा (ख़ालिक़) कैसे हो सकती है?!

और यह संयोगवश नहीं हो सकता, क्योंकि हर घटना के लिए एक कारण का होना आवश्यक है, और क्योंकि यह अनोखे प्रणाली, सम्पूर्ण समन्वय, और कारणों और परिणामों के बीच तथा तमाम प्राणियों के बीच अटूट संबंध तालमेल पर आधारित है, अतः यह पूरी तरह से असंभव है कि यह संयोगवश हुआ हो, क्योंकि जो चीज़ संयोग से अस्तित्व में आती है, वह अपने मूल अस्तित्व में व्यवस्थित नहीं होती, तो उसकी निरंतरता और विकास में कैसे व्यवस्थित हो सकती है?

और जब इस प्राणी वर्ग का स्वयं अपने आपको पैदा करना संभव नहीं है, इसी प्रकार इस का सहसा पैदा होना भी असंभव है, तो यह बात निश्चित हो जाती है कि उसका कोई उत्पत्तिकर्ता और सरष्टा  है, और वह अल्लाह रब्बुल आलमीन (सर्वसंसार का रब अर्थात: स्रष्टा, स्वामी और प्रबंधक) है।

अल्लाह तआला ने इस तर्कसंगत प्रमाण और निर्णायक प्रमाण का उल्लेख सूरा त़ूर में किया है, अल्लाह तआला का फ़रमान है: "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं"? [सूरा तूर : 35] अर्थातः वे बिना किसी निर्माता के अस्तित्व में नहीं आए हैं, तथा न ही उन्होंने स्वयं को ख़ुद से बनाया है, इसलिए निश्चित रूप से उनका निर्माता कल्याणकारी एवं सर्वोच्च अल्लाह है। तथा इसी कारण जब जुबैर बिन मुत़इम रज़ियल्लाहु अन्हु ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सूरा त़ूर की तिलावत करते हुए सुना और जब आप इन आयतों पर पहुंचे: "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते। या उनके पास आपके रब के ख़ज़ाने हैं, या वही अधिकार चलाने वाले हैं?" [सूरा तूर : 35-37]

तथा उस समय जुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु मुशरिक (बहुदेववादी) थे, उन्होंने कहा : "मेरा हृदय उड़ने को हो गया, और यही वह प्रथम अवसर था जब मेरे हृदय में ईमान का स्थापन हुआ।"[5] [5] सहीह बुख़ारी : सूरह वत्-तूर, हदीस संख्या : 4854।

और चलिए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जो इस बात को स्पष्ट करता है: यदि कोई व्यक्ति आपको एक भव्य महल के बारे में बताता है, जिसे बाग-बगीचों ने घेर रखा है, जिसके बीच में नदियाँ प्रवाहित हो रही हैं, और जो फर्नीचर तथा बिस्तरों से भरा हुआ है, और जिसे विभिन्न प्रकार की सजावट से अलंकृत किया गया है, और यदि वह आपसे कहे: यह महल और इसमें जो भी पूर्णता है, उसने स्वयं अपने आप को उत्पन्न किया है, या यह बिना किसी कारण के संयोगवश अस्तित्व में आया है, तो आप तुरंत इसे अस्वीकार कर देंगे और उसे झूठा कहेंगे, और उसकी बातों को मूर्खता समझेंगे। क्या इसके बाद यह संभव है कि यह विशाल ब्रह्मांडः जिसमें धरती, आकाश, तारामंडल, इसकी विभिन्न अवस्थाएँ और शानदार व्यवस्था शामिल हैं, ने स्वयं को उत्पन्न किया हो, या यह संयोगवश बिना किसी कारण के अस्तित्व में आया हो?!

3- जहाँ तक शरीअत द्वारा अल्लाह तआला के अस्तित्व के प्रमाण की बात हैः तो सभी आकाशीय ग्रंथ इसकी पुष्टि करते हैं, और उनके द्वारा लाई गई न्यायपूर्ण विधियाँ, जो सृष्टि के हितों को समाहित करती हैं, इस बात का साक्ष्य हैं कि ये एक ज्ञानी और हिकमत वाले रब की ओर से हैं, जो अपनी सृष्टि के हितों से भली-भांति परिचित है, तथा इस में जो ब्रह्मांडीय समाचार हैं जिस की सच्चाई को वास्तविकता ने प्रमाणित किया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वे एक ऐसे रब की ओर से हैं जो जिन चीज़ों की सूचना देता है, उन्हें अस्तित्व में लाने की क्षमता रखता है।

4- और जहाँ तक अल्लाह के अस्तित्व पर ह़िस्स (इन्द्रियों) के प्रमाण की बात है, तो यह दो दृष्टिकोण से हैः

प्रथम: हम सुनते हैं और देखते हैं कि प्रार्थना करने वालों की प्रार्थनाओं का उत्तर मिलता है, और संकटग्रस्त लोगों की सहायता की जाती है, जो अल्लाह तआला के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण है। पवित्र अल्लाह ने फरमाया हैः "तथा नूह को (याद करो) जब उन्होंने इससे पहले (अल्लाह को) पुकारा, तो हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली..." [सूरा अल-अंबिया : 76] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "जब तुम अपने रब  से मदद माँग रहे थे, तो उसने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली..." [सूरा अल-अनफ़ाल: 9]

तथा सहीह बुख़ारी में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं : "एक देहाती जुमा के दिन मस्जिद में आया, उस समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खुत्बा दे रहे थे। उसने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल, माल बर्बाद हो गया और बच्चे भूखे मरने लगे, अल्लाह से हमारे लिए दुआ करें। तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाए और दुआ की, तो बादल पहाड़ों जैसे जमा हो गए, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अभी मिम्बर से नीचे भी नहीं उतरे थे कि मैंने बारिश को उनकी दाढ़ी से टपकते हुए देखा"।[6] [6] इसे बुख़ारी ने किताब अल-जुमा, बाब अल-इस्तिस्क़ा फ़िल-ख़ुतबह यउमल-जुमु'अह (हदीस संख्या : 891) में रिवायत किया है।

और दूसरे जुमा को, वही देहाती अथवा कोई और खड़ा हुआ और बोला: हे अल्लाह के रसूल, निर्माण ढह गया है और सम्पत्ति डूब गई है, अल्लाह से हमारे लिए दुआ करें। तब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ उठाए और कहा: "ऐ अल्लाह! हमारे आस-पास बारिश बरसा, हमपर नहीं"। आप जिस ओर भी संकेत करते उस दिशा से बादल छट जाता। [7] [7] सहीह बुख़ारी, किताबुल-जुमुअह, बाब अल-इस्तिस्क़ा फ़िल-ख़ुतबह यउमल-जुमु'अह, हदीस संख्या 891 तथा सहीह मुस्लिम, किताब सलात अल-इस्तिस्क़ा, बाब अद-दुआ फ़िल-इस्तिस्क़ा, हदीस संख्या 897.

आज भी यह बात देखी जाती है और स्वत: सिद्ध है कि सच्चे दिल से अल्लाह की ओर ध्यान मग्न होने वालों और दुआ की स्वीक्रति के शर्तों की पूर्ति करने वालों की प्रार्थना स्वीकार होती है।

द्वितीय दृष्टिकोणः पैग़म्बरों की निशानियां जिसको मोजिज़ात (चमत्कार) के नाम से जाना जाता है, और जिनको लोग देखते हैं या उसके विषय में सुनते हैं, यह मोजिज़ात भी उन पैग़म्बरों को भेजने वाली ज़ात अर्थात अल्लाह तआला के वजूद पर निश्चित और अटल प्रमाण हैं, क्योंकि यह मोजिज़ात मानव जाति की ताक़त की सीमा से बाहर होते हैं, जिनको अल्लाह तआला अपने रसूलों की पुष्टि तथा उनकी सहायता और सहयोग के लिए प्रकट करता है।

इसका एक उदाहरणः मूसा -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की आयत (चमत्कार) है, जब अल्लाह तआला ने उनको आदेश दिया कि समुद्र पर अपनी लाठी मारें, और उन्हों ने लाठी मारी तो समुद्र में बारह सूखे मार्ग बन गए और पानी उनके किनारे पर्वत के समान खड़ा हो गया, अल्लाह तआला का फ़रमान है: "तो हमने मूसा की ओर वह़्य की कि अपनी लाठी को सागर पर मारो। (उसने लाठी मारी) तो वह फट गया और हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की तरह हो गया"। [सूरा- शुअरा : 63]

दूसरा उदाहरण: ईसा अलैहिस्सलाम की आयत (चमत्कार) है, वह अल्लाह की आज्ञा से मृतकों को जीवित करते थे और उनको उनकी समाधियों से निकाल कर खड़ा कर देते थे, उनके विषय में अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः "...और मुर्दों को जीवित कर देता हूँ अल्लाह की अनुमति से..." [सूरा आल-ए-इमरान: 49] और कहा: "...और जब तू मुर्दों को मेरी अनुमति से निकाल (जीवित) खड़ा करता था।... [सूरा अल-माइदा : 110]

तीसरा उदाहरणः हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का (मोजिज़ा -चमत्कार-) है, क़ुरैश ने आप से निशानी (चमत्कार) की माँग की तो आप ने चाँद की ओर इशारा किया जिस से वह दो टुकड़े हो गया, जिसको लोगों ने देखा, इसी का वर्णन करते हुए अल्लाह तआला फ़रमाता है: "क़ियामत बहुत निकट आ गई और चाँद फट गया। और यदि वे कोई निशानी देखते हैं, तो मुँह मोड़ लेते हैं और कहते हैं कि यह तो लगातार चलने वाला जादू है"। [सूरा-क़मर : 1-2]

यह अनुभव की जाने वाली निशानियां जिनको अल्लाह तआला अपने रसूलों की सहायता और सहयोग के लिए प्रस्तुत करता है, यह अल्लाह तआला के मौजूद होने को निश्चित और अटल रूप से प्रमाणित करती हैं।

द्वितीय बात: जो अल्लाह पर ईमान लाने को शामिल है वह अल्लाह  की रुबूबियत पर ईमान लाना है, अल्ला तआला की रुबूबियत पर ईमान लाने का अर्थ इस बात का वचन देना है कि अकेला अल्लाह ही रब (स्रष्टा, स्वामी और प्रबंधक) है, इसमें कोई उसका साझी और सहायक नहीं।

और रब वह हैः जिसके लिए विशिष्ट हो स्रष्टा होना, स्वामी होना और हाकिम (शासक) होना, अतः अल्लाह के अतिरिक्त कोई स्रष्टा(ख़ालिक़) नहीं, उसके अतिरिक्त कोई स्वामी नहीं और उसके अतिरिक्त कोई शासक नहीं, सर्वोच्च अल्लाह फरमाता हैः "सुन लो! सृष्टि करना और आदेश देना उसी का काम है"। [सूरा अल-आराफ़ : 54] और कहा: "वही अल्लाह तुम्हारा रब है। उसी का राज्य है। तथा जिन्हें तुम उसके सिवा पुकारते हो, वे खजूर की गुठली के छिलके के भी मालिक नहीं हैं"। [सूरा फ़ातिर : 13]

और यह ज्ञात नहीं है कि किसी भी मख़लूक़ (सृष्टि, रचना) ने अल्लाह की रुबूबियत (उसके स्रष्टा, स्वामी और प्रबंधक होने) का इंकार किया हो, सिवाय इसके कि वह हठ धर्मी और अपने कहे पर विश्वास न रखने वाला हो, जैसे कि फिरऔन ने अपने समुदाय से कहा थाः "तो उसने कहा : मैं तुम्हारा सबसे ऊँचा रब हूँ"। [सूरा अन-नाज़ि'आत: 24], और फ़रमाया: "ऐ प्रमुखो! मैंने अपने सिवा तुम्हारे लिए कोई पूज्य नहीं जाना"। [सूरा-क़स़स़ : 38], किन्तु यह कथन विश्वास के आधार पर नहीं था। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा उन्होंने अत्याचार एवं अभिमान के कारण उनका इनकार कर दिया। हालाँकि उनके दिलों को उनका विश्वास हो चुका था"। [सूरा नमल: 14] और मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन से कहा, जैसा कि अल्लाह तआला ने उनके बारे में बयान किया है : "निःसंदेह तुम जान चुके हो कि इन (निशानियों) को आकाशों और धरती के रब ही ने (समझाने के लिए) स्पष्ट प्रमाण बनाकर उतारा है। और निश्चय मैं जानता हूँ कि ऐ फ़िरऔन! तेरा विनाश हुआ"। [सूरा अल-इसरा : 102] और यही कारण है कि मुश्रिक (अनेकेश्वरवादी) लोग अल्लाह तआला की उलूहियत (उपासना) में शिर्क करने के उपरान्त उसकी रुबूबियत को स्वीकार करते थे, जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया हैः "(ऐ नबी!) उनसे कह दें : यह धरती और इसमें जो कोई भी है किसका है, यदि तुम जानते हो? वे कहेंगे : अल्लाह का। (ऐ नबी!) कह दें : तो क्या तुम नसीहत नहीं लेते? (ऐ नबी!) कह दें : सातों आसमानों का और महान अर्श का रब कौन है? वे कहेंगे : अल्लाह का। (ऐ नबी!) कह दें : तो क्या तुम डरते नहीं? (ऐ नबी!) कह दें : किसके हाथ में हर चीज़ का साम्राज्य है और वह पनाह देता है और उसके विरुद्ध कोई पनाह नहीं दी जा सकती, यदि तुम जानते हो? वे कहेंगे : अल्लाह का। (ऐ नबी!) कह दें : तो फिर तुम पर जादू कैसे कर दिया जाता है?" [सूरा अल-मोमिनून : 84-89]

तथा अल्लाह का कथन है : "और निःसंदेह यदि आप उनसे पूछें कि आकाशों तथा धरती को किसने पैदा किया? तो निश्चय अवश्य कहेंगे कि उन्हें सब पर प्रभुत्वशाली, सब कुछ जानने वाले ने पैदा किया है। [सूरा-ज़ुख़रुफ़ : 9]

एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है : "और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया? तो वे अवश्य कहेंगे : अल्लाह ने। तो फिर वे कहाँ बहकाए जाते हैं?" [सूरा-ज़ुख़रुफ़ : 87]

और अल्लाह का आदेश शरई और कौनी (धार्मिक तथा ब्रह्माण्डीय) दोनों प्रकार के आदेशों पर व्यापक है, जैसे कि वह ब्रह्मांड का प्रबंधक है और इसमें जो चाहता है, अपनी हिकमत (तत्वदर्शिता) के अनुसार फैसला करता है, वैसे ही वह इसमें इबादत के शरई आदेशों और व्यापारिक नियमों का हाकिम भी है, जो उसकी हिकमत के अनुसार होता है, अतः जो कोई भी अल्लाह के साथ किसी और को इबादत में विधि-निर्माता, या लेन-देन में हाकिम मानता है, उसने अल्लाह के साथ शिर्क किया और ईमान को सिद्ध नहीं किया।

तृतीय मामला जो अल्लाह  पर ईमान लाने को शामिल है वह  उसकी उलूहियत (उसी के पूज्य होने) पर ईमान लाना: अल्लाह तआला की उलूहियत पर ईमान लाने का अर्थ इस बात का वचन देना है कि अकेला अल्लाह ही सच्चा पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं, "इलाह" का शब्द "मालूह" अथवा "माबूद" के अर्थ में है, अर्थात जिसकी प्रेम और सम्मान तथा प्रतिष्ठा के साथ इबादत की जाए।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और तुम्हारा पूज्य (मा'बूद) एक ही पूज्य (मा'बूद) है, उसके सिवा कोई पूज्य (मा'बूद) नहीं, अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है"। [सूरा अल-बक़रा : 163] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "अल्लाह ने गवाही दी कि निःसंदेह उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा फ़रिश्तों और ज्ञान वालों ने भी, इस हाल में कि वह न्याय को क़ायम करने वाला है। उसके सिवा कोई सच्चा पूज्य  नहीं, सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है"। [सूरा आलि-इमरान : 18] अल्लाह के साथ जिस चीज़ को भी पूज्य ठहराकर उसके अतिरिक्त उसकी इबादत की जाएगी, तो उसकी उलूहियत (उपासना) असत्य है, अल्लाह तआला फरमाता हैः "यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है, और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य है, और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा है"। [सूरा अल-हज्ज : 62]। अल्लाह के अतिरिक्त असत्य पूजा पात्रों का नाम पूज्य (माबूद) रख लेने से उन्हें उलूहियत (उपासना) का अधिकार नहीं प्राप्त हो जाता, चुनाँचे अल्लाह तआला ने "लात", "उज्जा" और "मनात" के विषय में फ़रमाया: "ये (मूर्तियाँ) कुछ नामों के सिवा कुछ भी नहीं हैं, जो तुमने तथा तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने इनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है"। [सूरा अल-नज्म : 23]

तथा हूद अलैहिस्सलाम के संबंध में फरमाया कि उन्होंने अपने समुदाय के लोगों से कहाः "क्या तुम मुझसे उन नामों के विषय में झगड़ते हो, जो तुमने तथा तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं, जिनका अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा है"? [सूरा अल-आराफ़ : 71]

और यूसुफ अलैहिस्सलाम के विषय में फ़रमाया कि उन्होंने अपने जेल के साथियों से कहा: "ऐ मेरे जेल के दोनों साथियो! क्या अलग-अलग अनेक रब बेहतर हैं या एक प्रभुत्वशाली अल्लाह? तुम लोग उसके सिवा जिनकी पूजा करते हो, वे केवल नाम हैं जिन्हें तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने गढ़ लिया है, अल्लाह ने उनके लिए कोई प्रमाण नहीं उतारा है"। [सूरा यूसुफ़ : 39-40]

इसी लिए समस्त पैग़म्बर -अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम- अपनी-अपनी क़ौम से यही कहते थे: "अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं"। [सूरा अल-आराफ़: 59] किन्तु मुश्रिकों ने उस आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और अल्लाह के अतिरिक्त उन्होंने पूजा पात्र बना लिए, जिनकी वह पवित्र अल्लाह के साथ पूजा करते, उनसे सहायता मांगते और उन से फरियाद करते थे।

अल्लाह तआला ने मुश्रिकों के अल्लाह के अतिरिक्त अन्य लोगों को पूजा पात्र बनाने को दो बौद्धिक तर्कसंगत प्रमाणों से असत्य घोषित किया है:

पहला प्रमाण : जिन देवताओं को उन्होंने पूज्य बना रखा है, उनके अंदर ऐसी विशेषताएँ नहीं पाई जातीं, जो पूज्य के अंदर होनी चाहिए। ये सृष्टि एवं रचना हैं, न किसी को पैदा करते हैं, न अपने उपासकों को कोई लाभ पहुँचाते हैं, न उनसे कोई हानि दूर करते हैं, न उनके लिए जीवन और मृत्यु का अधिकार रखते हैं, और न ही आकाशों में किसी चीज़ के मालिक या उसके भागीदार हैं।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और उन्होंने उसके अतिरिक्त अनेक पूज्य बना लिए, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते और वे स्वयं पैदा किए जाते हैं और न वे अधिकार रखते हैं अपने लिए किसी हानि का और न किसी लाभ का, तथा न अधिकार रखते हैं मरण का और न जीवन का और न पुनः जीवित करने का"। [सूरा अल-फ़ुरक़ान: 3]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "(ऐ नबी) आप कह दें : उन्हें पुकार कर देखो, जिन्हें तुमने अल्लाह के सिवा (पूज्य) समझ रखा है। वे आकाशों और धरती में कणभर भी अधिकार नहीं रखते, और न उन दोनों में उनकी कोई साझेदारी है और न उनमें से कोई उस (अल्लाह) का सहायक ही है। और उसके पास सिफ़ारिश लाभदायक नहीं होती, सिवाय उसकी सिफारिश के जिसे वह अनुमति दे..." [सूरा सबा: 22-23] और अल्लाह ने कहा: "क्या वे उन्हें (अल्लाह का) साझी बनाते हैं, जो कोई चीज़ पैदा नहीं करते और वे स्वयं पैदा किए जाते हैं? और वे न तो उनकी सहायता कर सकते हैं और न ही अपनी सहायता कर सकते हैं"। [सूरा अल-आराफ़ : 191-192]।

उन पूज्यों का अगर यह हाल है, तो उन्हें पूज्य मानना सबसे बड़ी मूर्खता और सबसे बड़ा झूठ है।

द्वितीय प्रमाण: यह मुश्रिक इस बात को स्वीकार करते थे कि अल्लाह तआला ही अकेला रब और स्रष्टा है जिसके हाथ में प्रत्येक चीज़ का अधिकार और प्रभुत्व है, वही शरण देता है उसके विरुद्ध कोई शरण नहीं दे सकता, यह सब इस बात को अनिवार्य कर देता है कि जिस प्रकार वह अल्लाह तआला की रुबूबियत (स्रष्टा, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी होने) में वहदानियत (एकता) को स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार उलूहियत (एक मात्र पूज्य होने) में भी अल्लाह की वहदानियत को स्वीकार करें, जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है: "ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना बनाया और आकाश को छत बनाया और आकाश से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा तुम्हारे लिए फल पैदा किए। अतः अल्लाह के साथ किसी को साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो"। [सूरा अल-बक़रा : 21-22]।

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया? तो वे अवश्य कहेंगे: अल्लाह ने। तो फिर वे कहाँ बहकाए जाते हैं?" [सूरा-ज़ुख़रुफ़ : 87]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "कहो: वह कौन है जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? या फिर कान और आँख का मालिक कौन है? और कौन जीवित को मृत से निकालता और मृत को जीवित से निकालता है? और कौन है जो हर काम का प्रबंध करता है? तो वे ज़रूर कहेंगे: ''अल्लाह'', तो कहो: फिर क्या तुम डरते नहीं? तो वही अल्लाह तुम्हारा सच्चा रब है। फिर सत्य के बाद क्या है सिवाय पथभ्रष्टता के? तो तुम कहाँ फेरे जा रहे हो?" [सूरा यूनुस : 31-32]

चतुर्थ मामला जो अल्लाह तआला पर ईमान लाने को सम्मिलित हैः वह अल्लाह के अस्मा व सिफ़ात (नामों और गुणों) पर ईमान लाना हैः

अर्थात: अल्लाह ने अपने लिए अपनी किताब में या अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में जो नाम और गुण अपने लिए निर्धारित किए हैं, उन्हें उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए जैसे वे हैं, बिना किसी परिवर्तन, विरूपण, क़ैफ़ियत या तुलना के, अल्लाह तआला ने फरमाया: "और सबसे अच्छे नाम अल्लाह ही के हैं। अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नामों के बारे में सीधे रास्ते से हटते हैं। उन्हें शीघ्र ही उसका बदला दिया जाएगा, जो वे किया करते थे।" [सूरा अल-आराफ़: 180] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "तथा आकाशों और धरती में सर्वोच्च गुण उसी का है। और वही प्रभुत्वशाली, हिकमत वाला है।" [सूरा अर-रूम : 27] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा : 11]

इस विषय में दो सम्प्रदाय पथ-भ्रष्ट (गुमराह) हो गए हैं:

पहला सम्प्रदाय: (मुअत्तिला) का है, जिन्होंने अल्लाह के तमाम अस्मा व सिफ़ात (नामों और गुणों) या उन में से कुछ को अस्वीकार किया है, उनका विचार यह है कि अल्लाह के लिए अस्मा व सिफ़ात प्रमाणित करने से (सदृश्य और समानता) लाज़िम आती है, अर्थात अल्लाह को मख़्लूक़ (सृष्टि) के सदृश्य और समान कर देना लाज़िम आता है, किन्तु उनका यह भ्रम कई कारणों से असत्य है, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

पहला: यह गलत परिणामों की ओर ले जाता है, जैसे कि पवित्र अल्लाह के कथनों में विरोधाभास, क्योंकि अल्लाह तआला ने अपने लिए नाम और गुण (अस्मा व सिफात) साबित किए हैं, और यह भी कहा है कि उसके जैसी कोई चीज़ नहीं है, और यदि उन्हें साबित करने का अर्थ तुलना करना होता, तो अल्लाह के शब्दों में विरोधाभास उत्पन्न होता और कुछ हिस्सों का कुछ अन्य हिस्सों से खंडन होता।

दूसरा: यह आवश्यक नहीं है कि दो चीजें यदि एक जैसे नाम या गुण वाले हों तो वे एक समान ही हों। उदाहरण के लिए; आप देखते हैं कि दो व्यक्ति इस बात में एक जैसे हैं कि दोनों इंसान हैं, सुनने वाले हैं, देखने वाले हैं, बोलने वाले हैं, किंतु इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि वे दोनों मानवीय अर्थों में, सुनने में, देखने में, और बोलने में एक समान होंगे।

तथा आप देखते हैं कि जानवरों के पास हाथ (अगले पैर), पैर , और आँखें होती हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन सभों के हाथ, पैर, और आँखें एक समान होती हैं।

जब अस्मा व सिफ़ात (नामों और गुणों) में समान होने के विषय में मख़्लूक़ात (सृष्टि) के बीच में इतना अन्तर और मतभेद है, तो ख़ालिक़ और मख़्लूक़ (सृष्टिकर्ता एवं सृष्टि) के बीच में कहीं अधिक और प्रत्यक्ष अन्तर और भेद होगा।

दूसरा सम्प्रदाय : (मुशब्बिहा) का है, जिन्होंने अल्लाह तआला के लिए अस्मा व सिफ़ात को साबित माना, किन्तु अल्लाह तआला को उसके मख़्लूक़ के समान और बराबर करार दिया, उनका विचार यह है कि (किताब व सुन्नत के) नुसूस (पाठ) की दलालत का यही तकाज़ा (मांग) है, क्यों कि अल्लाह तआला बन्दों को उसी चीज के द्वारा संबोधित करता है जिसे वह समझ सकें, यह विचार धारा भी कई कारणों से असत्य है, जिन में से कुछ कारण निम्नलिखित हैं :

प्रथम कारण: यह है कि अल्लाह तआला को उसके मख़्लूक़ के समान करार देना असत्य है, जिसका बुद्धि और शरीअत दोनों हीं खंडन करते हैं, और यह असंभव है कि किताब व सुन्नत के नुसूस (पाठ) की मांग कोई असत्य चीज हो।

दूसरा कारणः यह है कि अल्लाह तआला ने बन्दों को उसी चीज़ के द्वारा संबोधित किया है जिसे वह मूल अर्थ के एतबार से समझ सकें, किन्तु जहाँ तक उसकी ज़ात और गुणों से संबंधित अर्थों की वास्तविकता और यथार्थता का संबंध है तो इसके ज्ञान को अल्लाह तआला ने अपने साथ विशेष कर रखा है।

जब अल्लाह तआला ने अपने लिए यह सिद्ध किया है कि वह 'समीअ' अर्थात सुनने वाला है तो सम्अ् (सुनने) का मूल अर्थ ज्ञात है, (और वह है आवाज़ -स्वर- का जानना), किन्तु अल्लाह तआला के लिए सुनने की वास्तविकता मालूम नहीं है क्योंकि सुनने की वास्तविकता मख़्लूक़ात में भी भिन्न होती है, तो ख़ालिक़ और मख़्लूक़ के मध्य यह भिन्नता और अंतर अधिक स्पष्ट और बहुत ही ज़्यादा होगी।

और जब अल्लाह तआला अपने बारे में यह बताता है कि वह अपने अर्श पर मुस्तवी (अपने सिंहासन के ऊपर) है, तो उस इस्तिवा (ऊपर और बुलंद होने) का मूल अर्थ तो ज्ञात है, किंतु अल्लाह के अर्श पर मुस्तवी होने की वास्तविकता हमारे लिए ज्ञात नहीं है, क्योंकि मुस्तवी होने की वास्तविकता प्राणियों के संदर्भ में भिन्न होती है, तो किसी स्थिर कुर्सी पर मुस्तवी होना, किसी कठिन और अवज्ञाकारी ऊंट की पीठ पर मुस्तवी होने के जैसा नहीं है, जब यह प्राणियों के संदर्भ में भिन्न होता है, तो यह अंतर खालिक और मखलूक (रचना एवं रचनाकार) के संदर्भ में और भी स्पष्ट और ज़्यादा है।

अल्लाह तआला पर, हमारे बतलाए हुए तरीके के अनुसार , विश्वास करने से मोमिनों को कई महत्वपूर्ण लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं:

पहला: अल्लाह की तौहीद को इस प्रकार से सिद्ध करना कि उसके पश्चात बंदा आशा और भय में अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य से संबंध ना रखे, और ना ही अल्लाह के अतिरिक्त किसी की उपासना करे।

दूसरा: अल्लाह तआला से पूर्ण प्रेम और उसके महान नामों और सर्वोच्च गुणों के अनुसार उसका आदर करना।

तीसराः अल्लाह तआला की पूर्ण रूप से इबादत, वह इस प्रकार कि बंदा अल्लाह तआला के आदेशों का पालन करे और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचे।

*

फ़रिश्तों पर ईमान

फ़रिश्ते: एक अदृश्य दुनिया के निवासी हैं, जो अल्लाह तआला के आज्ञाकारी उपासक हैं और जिनमें रब और देवत्व की विशेषताएँ नहीं हैं। अल्लाह तआला ने उन्हें नूर (प्रकाश) से उत्पन्न किया है और उन्हें अपने आदेश के पालन के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण और उसे लागू करने की शक्ति दी। अल्लाह तआला ने फरमाया: "और जो (फ़रिश्ते) उसके पास हैं, वे न उसकी इबादत से अभिमान करते हैं और न ज़रा भर थकते हैं। वे रात और दिन उसकी तस्बीह करते रहते हैं, बिना थके।" [सूरा-अंबिया : 19-20]

फ़रिश्तों की संख्या अत्यधिक है, अल्लाह तआला के सिवा कोई उन्हें गिन नहीं सकता। सहीहैन (बुख़ारी व मुस्लिम) में अनस -रज़ियल्लाहू अन्हु- की हदीस में मेराज की घटना के संदर्भ में प्रमाणित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को आकाश में बैतुल मामूर दिखाया गया, जिसमें प्रति दिन सत्तर हज़ार फ़रिश्ते नमाज़ पढ़ते हैं, और जब वे उससे बाहर आते हैं तो फिर पुनः उसमें जाने की उनकी बारी नहीं आती।

फ़रिश्तों पर ईमान लाने में चार चीजें सम्मिलित हैं:

पहला: उनके अस्तित्व पर ईमान लाना।

दूसराः उन में से जिन के नाम हमें ज्ञात हैं (उदाहरणतः जिब्रील -अलैहिस्सलाम-) उनपर उनके नाम के साथ ईमान लाना, और जिन के नाम ज्ञात नहीं हैं उन पर संक्षिप्त रूप से ईमान रखना।

तीसराः उनकी जिन विशेषताओं को हम जानते हैं उन पर ईमान लाना, (उदाहरण स्वरूप जिबरील -अलैहिस्सलाम-) की विशेषता के विषय में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह सूचना दी है कि आप ने उनको उनकी उस आकृति (रूप) में देखा है जिस पर उनकी रचना हुई है, उस समय उनके छः सौ पंख थे, जो क्षितिज (उफ़ुक़) पर छाए हुए थे।

फ़रिश्ता कभी-कभी अल्लाह के आदेश से मानव का रूप भी धारण कर सकता है, जैसा कि (जिब्रील -अलैहिस्सलाम- के साथ) पेश आया, जब अल्लाह तआला ने उन्हें मरियम के पास भेजा तो वह उनके सामने समूचित मनुष्य के रूप में उपस्थित हुए, और जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा (साथियों) के बीच बैठे हुए थे तो यही जिब्रील आप के पास एक एसे व्यक्ति के रूप में आए जिसके कपड़े अत्यंत सफेद और बाल अत्यंत काले थे, उन पर यात्रा के चिन्ह भी प्रकट नहीं हो रहे थे और सहाबा में से कोई उन से परिचित भी नहीं था, वह आकर बैठ गए और अपने दोनों घुटनों को आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घुटने से लगा लिए और अपने दोनों हाथ अपनी दोनों रानों पर रख दिए, और आप से इस्लाम, ईमान, एहसान और क़यामत तथा उसके प्रमाणों (चिन्हों) के विषय में प्रश्न किए और आप ने उनके प्रश्नों का उत्तर दिया, फिर वह चले गए। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "यह जिब्रील थे जो तुम को तुम्हारा धर्म सिखलाने आए थे।"[8] [8] इसे मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", "ईमान, इस्लाम और इहसान का बयान तथा अल्लाह सुब्हानहु व तआला की तक़दीर पर ईमान लाने की आवश्यकता'' के अनुच्छेद में, हदीस संख्या: 8 में रिवायत किया है।

इसी प्रकार जिन फ़रिश्तों को अल्लाह तआला ने इब्राहीम और लूत -अलैहिमुस्सलाम- के पास भेजा वह भी मानव रूप में थे।

चौथी बात: जो फ़रिश्तों पर ईमान लाने से संबंधित है, वह यह किः अल्लाह तआला के आदेश से फ़रिश्ते जो कार्य करते हैं उन में से जिन कार्यों का हम को ज्ञान है उन पर ईमान लाना, उदाहरण स्वरूप (फ़रिश्तों का) अल्लाह तआला की (पवित्रता) बयान करना और किसी उदासीनता और आलस्य के बिना, रात-दिन उसकी उपासना में लगे रहना।

कुछ फ़रिश्तों के विशेष कार्य होते हैं।

उदाहरण स्वरूपः विश्वसनीय जिब्रील -अलैहिस्सलाम-, अल्लाह तआला की वह्य (प्रकाशना) पहुँचाने के लिए नियुक्त हैं, अल्लाह उन्हें वह्य दे कर अपने नबियों व रसूलों के पास भेजता है।

तथा जैसे: मीकाईल, जो बारिश एवं पौधों के प्रभारी हैं।

इसी प्रकारः इस्राफील -अलैहिस्सलाम-, क़यामत के समय और मख्लूक़ के पुनर्जीवन के समय सूर फूंकने पर नियुक्त हैं।

तथा एक मलक उल मौत हैं, जिन्हें मृत्यु के समय प्राण निकालने का काम सौंपा गया है।

और जैसे: मालिक, जो आग (जहन्नम) के प्रभारी हैं, तथा वह आग के संरक्षक हैं।

इसी प्रकार गर्भाशय (माँ के पेट) में गर्भस्थ पर नियुक्त फ़रिश्ते हैं, जब माँ के पेट में शिशु चार महीने का हो जाता है तो अल्लाह तआला उसके पास एक फ़रिश्ता भेजता है और उसकी जीविका, उसके जीवन की अवधि, उसका कर्म और उसके भाग्यशाली अथवा अभागा होने के विषय में लिखने का आदेश देता है।

इसी प्रकारः मनुष्यों के कर्मों को लिखने और उनका संरक्षण करने पर नियुक्त फ़रिश्ते हैं, प्रत्येक व्यक्ति के पास इस कार्य के लिए दो फ़रिश्ते हैं, एक दाहिने ओर और दूसरा बाएं ओर।

तथाः मुर्दे से प्रश्न करने के लिए नियुक्त फ़रिश्ते हैं, मुर्दा जब क़ब्र में रख दिया जाता है तो उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं जो उससे उसके रब, उसके धर्म और उसके नबी के विषय में प्रश्न करते हैं।

फ़रिश्तों पर ईमान लाने से कई महत्वपूर्ण लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ ये हैं:

पहलाः इस से अल्लाह तआला की महानता, शक्ति और सत्ता का ज्ञान प्राप्त होता है, क्योंकि सृष्टि की महानता उसके रचयिता की महानता को प्रमाणित करती है।

दूसराः मनुष्यों पर अल्लाह तआला की कृपा और नेमत का आभारी होने का अवसर प्राप्त होता है, कि उस ने मनुष्य की सुरक्षा करने और उनके कर्मों का लेख तैयार करने तथा उनके अन्य हितों और भलाइयों के लिए फ़रिश्ते नियुक्त किए हैं।

तीसराः फ़रिश्तों के निरंतर अल्लाह तआला की उपासना में लगे रहने पर उन से प्रेम उत्पन्न होता है।

कुछ पथ भ्रष्ट और भटके हुए लोगों ने फ़रिश्तों के शारीरिक अस्तित्व को अस्वीकार किया है, वह कहते हैं कि फ़रिश्तों से तात्पर्य मनुष्यों के भीतर भलाई की गुप्त शक्ति है, किन्तु यह अल्लाह की पुस्तक और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत तथा मुसलमानों के इजमाअ् (मतैक्य) का खंडन है।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो आकाशों तथा धरती का पैदा करने वाला है, (और) दो-दो, तीन-तीन, चार-चार परों वाले फ़रिश्तों को संदेशवाहक बनाने वाला है।" [सूरा फ़ातिर : 1]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और यदि आप देखें, जब फ़रिश्ते काफ़िरों के प्राण निकालते हैं, उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते हैं..." [सूरा अल-अनफ़ाल : 50]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "...और यदि (ऐ नबी!) आप देखें जब अत्याचारी मौत की कठिनाइयों में होते हैं और फ़रिश्ते अपने हाथ फैलाए हुए होते हैं, (कहते हैं) : निकालो अपने प्राणों को!..." [सूरा-अन्आम : 93]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "...यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर दी जाती है, तो वे (फ़रिश्ते) कहते हैं : तुम्हारे रब ने क्या कहा? वे कहते हैं : सत्य (कहा) तथा वह सर्वोच्च, बहुत महान है।" [सूरा सबा : 23]

और जन्नती के बारे में कहा है : "फ़रिश्ते प्रत्येक द्वार से उनके पास आएँगे। (कहेंगे) सलाम हो तुम पर, तुम्हारे धैर्य के कारण। तो क्या ही उत्तम है इस घर का परिणाम।" [सूरा अर-राद : 23-24]।

सहीह बुखारी में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब अल्लाह तआला किसी बंदे से मुहब्बत करता है, तो जिब्राईल अलैहिस्सलाम को पुकार कर कहता है: निश्चय ही अल्लाह फलां से मुहब्बत करता है, तो तुम भी उससे मुहब्बत रखो; तो जिब्राईल अलैहिस्सलाम उससे मुहब्बत करने लगते हैं। फिर जिब्राईल अलैहिस्सलाम आसमान वालों में ऐलान करते हैं: निश्चय ही अल्लाह फलां से मुहब्बत करता है, तो तुम लोग भी उससे मुहब्बत रखो; तो आसमान वाले भी उससे मुहब्बत करने लगते हैं। फिर ज़मीन में भी उसकी मक़बूलियत रख दी जाती है"।[9] [9] सहीह बुख़ारी: किताब बद्अुल-ख़ल्क़, बाब ज़िक्रुल-मलाइका, हदीस संख्या : 3037; तथा सहीह मुस्लिम: किताब अल-बिर्र वस्सिला वल-आदाब, बाब: यदि अल्लाह किसी बन्दे से प्रेम करे, तो उसे अपने बन्दों के दिलों में प्रिय बना देता है, हदीस संख्या : 2637।

इस विषय में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से यह भी भी वर्णित है, वह कहते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "जुमा के दिन मस्जिद के हर द्वार पर फ़रिश्ते होते हैं, जो क्रम के अनुसार हर आने वाले का नाम लिखते जाते हैं, फिर जब इमाम मिम्बर पर बैठ जाता है तो वे अपने रजिस्टर बंद कर देते हैं और ख़ुत्बा सुनने लगते हैं।"[10] [10] सहीह बुख़ारी, किताब अल-जुमु'अह, बाब अल-इस्तिमाअ इला अल-ख़ुतबह, हदीस संख्या 887 तथा सहीह मुस्लिम, किताब अल-जुमु'अह, बाब फ़ज़्ल अल-तहजीर यौम अल-जुमु'अह, हदीस संख्या 850.

यह नुसूस (आयतें और हदीसें) इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि फ़रिश्तों का शारीरिक अस्तित्व है, वह कोई निराकार शक्ति नहीं हैं, जैसा कि कुछ पथ भ्रष्ट लोगों का मानना है, और इन्हीं स्पष्ट नुसूस के आधार पर मुसलमानों का इस विषय पर इजमाअ (मतैक्य) है।

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ग्रंथों पर ईमान

(कुतुब) बहुवचन है (किताब) का और (मक्तूब) के अर्थ में है, अर्थात लिखी हुई वस्तु।

यहां पर पुस्तकों से अभिप्राय वह आसमानी पुस्तकें हैं, जिन को अल्लाह तआला ने मनुष्यों पर अनुकम्पा (रहमत) की वजह से और उनके मार्गदर्शन के लिए अपने रसूलों (संदेशवाहकों) पर उतारा है, ताकि इनके द्वारा वह लोक और परलोक में कल्याण (सौभाग्य) प्राप्त करें।

ग्रंथों पर ईमान लाने में चार चीज़ें सम्मिलित हैं :

प्रथमः इस बात पर ईमान लाना कि वह पुस्तकें वास्तव में अल्लाह की ओर से अवतरित हुई हैं।

द्वितीयः उन किताबों पर ईमान रखना जिनके नाम हमें ज्ञात हैं: जैसे कि क़ुरआन जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल किया गया और तौरेत जो मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया गया। और इंजील जो ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल किया गया। और ज़बूर जो दाऊद अलैहिस्सलाम को दिया गया था। तथा जिन पुस्तकों का नाम हमें ज्ञात नहीं है, हम उन पर संक्षिप्त रूप से ईमान लाते हैं।

तृतीयः उन पुस्तकोंं की सही (सत्य एवं शुद्ध) सूचनाओं की पुष्टि करना, जैसा कि क़ुरआन की सारी सूचनाएं तथा पिछली पुस्तकोंं की परिवर्तन और हेर-फेर से सुरक्षित सूचनाएं।

चतुर्थः इन किताबों के उन आदेशों पर अमल करना जो निरस्त (मन्सूख़) नहीं किए गए हैं, और उन्हें प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लेना, चाहे उनकी हिक्मत (तत्वज्ञान) हमारी समझ में आए या न आए, पिछली समस्त आसमानी पुस्तकें महान क़ुरआन के द्वारा निरस्त हो चुकी हैं, उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: और (ऐ नबी!) हमने आपकी ओर यह पुस्तक (क़ुरआन) सत्य के साथ उतारी, जो अपने पूर्व की पुस्तकों की पुष्टि करने वाली तथा उनकी संरक्षक है। [सूरा- माइदा : 48] यानी : उसके संबंध में फ़ैसला देने वाला (कि कौनसा विधान निरस्त किया जाएगा, पूर्व की किताबों में क्या परिवर्तन हुआ आदि)।

इस आधार परः पिछली आसमानी पुस्तकों में जो आदेश हैं उन में से केवल उसी पर अमल करना वैध (जाईज़) है जो सही हो और क़ुरआन करीम ने उसकी पुष्टि की हो।

अल्लाह द्वारा अवतरित पुस्तकों पर ईमान लाने के बहुत बड़े लाभ हैं, जिन में से कुछ यह हैं:

पहलाः बन्दों पर अल्लाह तआला की कृपा और अनुकम्पा का ज्ञान होता है कि उस ने प्रत्येक उम्मत के लिए पुस्तक अवतरित की ताकि उसके द्वारा उन्हें मार्ग दर्शन प्रदान करे।

दूसरा: अल्लाह तआला की शरीअत में हिकमत (बुद्धिमत्ता) का ज्ञान, क्योंकि उसने हर क़ौम के लिए उनकी स्थिति के अनुसार शरई (धार्मिक) कानून बनाए हैं, जैसा की अल्लाह ताआला ने फ़रमाया: "हमने तुममें से हर (समुदाय) के लिए एक शरीयत तथा एक मार्ग निर्धारित किया है।...." [सूरा- माइदा : 48].

तीसराः इस विषय में अल्लाह तआला की अनुकम्पा का आभारी (शुक्रगुज़ार) होना।

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रसूलों पर ईमान

रुसुलः बहुवचन है (रसूल) का और (मुरसल) के अर्थ में है, अर्थात वह व्यक्ति जिसे किसी चीज़ को पहुंचाने के लिए भेजा गया हो।

इस स्थान पर रसूल से अभिप्रायः वह मनुष्य है जिस पर शरीअत की वह्य (प्रकाशना) की गयी हो और उसे उसके प्रसार का आदेश दिया गया हो।

सबसे पहले रसूल नूह अलैहिस्सलाम और अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) निःसंदेह हमने आपकी ओर वह़्य भेजी, जैसे हमने नूह़ और उनके बाद (दूसरे) नबियों की ओर वह़्य भेजी।..." [सूरा अन-निसा :163]

तथा सहीह बुख़ारी में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित शफ़ाअत की हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उल्लेख किया कि: "लोग (प्रलय के दिन) आदम के पास आएंगे ताकि वह उनकी सिफारिश (अनुशंसा) करें, तो वह विवशता प्रकट कर देंगे और कहेंगे कि नूह के पास जाओ जो अल्लाह के सर्व प्रथम रसूल हैं"। तथा आपने पूरी ह़दीस़ का वर्णन किया।[11] [11] इसे बुख़ारी ने "किताबुत-तौहीद", बाब: "अल्लाह तआला का यह कथन: ﴾لِمَا خَلَقْتُ بِيَدَيَّ﴿", हदीस संख्या : 7410 में, और मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", बाब: "जन्नत में सबसे कम दर्जे वाले का स्थान", हदीस संख्या : 193 में रिवायत किया है।

और अल्लाह तआला ने हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विषय में फ़रमाया: "मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। बल्कि वह अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक हैं।" [सूरा अल-अहज़ाब].

कोई भी समुदाय (उम्मत) रसूल से ख़ाली नहीं रहा, अल्लाह तआला ने उसकी ओर या तो स्थायी शरीअत दे कर कोई रसूल भेजा, या पूर्व शरीअत के साथ किसी नबी को भेजा ताकि वह उसका नवीनीकरण (तजदीद) करे, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "और निःसंदेह हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो।" [सूरा अन-नह्ल : 36]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "...और कोई समुदाय ऐसा नहीं, जिसमें कोई डराने वाला न आया हो।" [सूरा फ़ातिर: 24]

और अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह हमने तौरात उतारी, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था। उसके अनुसार वे नबी जो आज्ञाकारी थे यहूदियों में फ़ैसला करते थे..." [सूरा-माइदा : 44]

रसूल मानव और मख़्लूक़ होते हैं, रुबूबियत और उलूहियत की विशेषताओं में से कुछ भी उनके अन्दर नहीं होता, अल्लाह तआला ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विषय में, जो समस्त रसूलों के नायक और अल्लाह के निकट सबसे महान पद वाले हैं, फ़रमाया: "आप कह दें कि मैं अपने लिए किसी लाभ और हानि का मालिक नहीं हूँ, परंतु जो अल्लाह चाहे। और यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता होता, तो अवश्य बहुत अधिक भलाइयाँ प्राप्त कर लेता और मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।" [सूरा अल-आराफ़ : 188]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "आप कह दें : निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए न किसी हानि का अधिकार रखता हूँ और न किसी भलाई का। आप कह दें : निःसंदेह मुझे अल्लाह से कोई बचा नहीं सकता और न मैं उसके सिवा कोई शरणस्थल पा सकता हूँ।" [सूरा अल-जिन्न : 21-22]

रसूलों को मानवीय विशेषताओं से पाला पड़ता हैः जैसे बीमारी, मृत्यु और खान-पान की आवश्यकता आदि, अल्लाह तआला ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम के विषय में फ़रमाया कि उन्हों ने अपने रब के गुणों का वर्णन करते हुए कहा : "और वही जो मुझे खिलाता है और मुझे पिलाता है। और जब मैं बीमार होता हूँ तो वही मुझे ठीक करता है। और वही जो मुझे मारता है फिर मुझे जीवित करता है।" [सूरा अश्-शु'अरा: 79-81].

और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "मैं तुम जैसा एक इंसान हूं, मैं भी भूल जाता हूं जैसे तुम भूलते हो, इसलिए जब मैं भूल जाऊं, तो मुझे याद दिला दो।" [12]. [12] सहीह बुख़ारी, अबवाब अल-क़िब्लह, बाब अत-तवज्जुह नह्व अल-क़िब्लह हैसु कान, हदीस संख्या 392 तथा सहीह मुस्लिम, किताब अल-मसाजिद व मवाज़े'इस-सलाह, बाबुस-सह्व फ़िस-सलाति वस-सुजूदि लह, हदीस संख्या 572.

अल्लाह तआला ने उन्हें उनकी उच्चतम स्थिति में अपनी बंदगी के साथ वर्णित किया है, तथा ऐसा उनकी प्रशंसा के संदर्भ में किया है, तथा सर्वोच्च अल्लाह ने नूह़ अलैहिस्सलाम के संबंध में कहा हैः "निःसंदेह वह बहुत आभार प्रकट करने वाला बंदा था।" [सूरा अल-इसरा : 3], और हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विषय में फ़रमाया: "बहुत बरकत वाला है वह (अल्लाह), जिसने अपने बंदे पर फ़ुरक़ान उतारा, ताकि वह समस्त संसार-वासियों को सावधान करने वाला हो।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 1]।

तथा इब्राहीम, इस्ह़ाक़ एवं याक़ूब अलैहिमुस्सलाम के संबंध में फ़रमायाः : "तथा हमारे बंदों इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब को याद करो, जो हाथों (शक्ति) वाले और आँखों (अंतर्दृष्टि) वाले थे। निस्संदेह हमने उन्हें एक विशेषता; आखिरत की याद के साथ विशिष्ट बना दिया। और निस्संदेह वे हमारे पास चुने हुए नेक लोगों में से हैं।" [सूरा साद : 45-47]

एवं ईसा इब्न मरयम -अलैहिस्सलाम- के बारे में कहा है : "वह तो केवल एक बंदा है, जिसपर हमने उपकार किया तथा हमने उसे बनी इसराईल के लिए निशान ए क़ुदरत बना दिया।" [सूरा-ज़ुख़रुफ़ : 59]

रसूलों पर ईमान लाने में चार चीजें सम्मिलित हैं:

प्रथमः इस बात पर ईमान कि उनकी रिसालत (पैगम्बरी) अल्लाह की ओर से सत्य है। अतः जिसने उनमें से किसी एक की रिसालत  को अस्वीकार किया, उसने समस्त रसूलों के साथ कुफ़्र किया, जैसा की अल्लाह ताआला ने फ़रमाया: "नूह़ की जाति ने रसूलों को झुठलाया।" [सूरा अश्-शुअरा : 105] अतः अल्लाह ने उन्हें सभी रसूलों को झुठलाने वाला ठहरा दिया, जबकि उस समय जब उन्होंने नूह़ -अलैहिस्सलाम- को झुठलाया था, वहाँ उनके सिवा कोई और रसूल नहीं था, इस तरह देखा जाए, तो ईसाई, जिन्होंने अंतिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाया और आपकी अवमानना की, वे ईसा -अलैहिस्सलाम- को भी झुठलाने वाले और उनकी अवमानना करने वाले ठहरे। खास तौर से इसलिए भी कि उन्होंने मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का सुसमाचार सुनाया था और उस सुसमाचार का अर्थ यही था कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रसूल बनकर आएँगे तथा लोगों को गुमराही से निकालकर सीधे मार्ग पर लगाने का काम करेंगे।

द्वितीय: उन पैगंबरों पर ईमान लाना जिनके नाम हमें ज्ञात हैं, जैसे: मुहम्मद, इब्राहीम, मूसा, ईसा, और नूह़ अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम। और ये पांचों बड़े दृढ़-संकल्प वाले रसूल हैं, तथा अल्लाह तआला ने उन्हें क़ुरआन के दो स्थानों में उल्लेख किया है, एक  अपने इस कथन में: "तथा (याद करो) जब हमने नबियों से उनका वचन लिया। तथा (विशेष रूप से) तुझसे और नूह, इबराहीम, मूसा और मरयम के पुत्र ईसा से। और हमने उनसे दृढ़ वचन लिया।" [सूरा अल-अहज़ाब : 7] और  दूसरा अपने इस कथन में : "उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है, जिसका आदेश उसने नूह़ को दिया और जिसकी वह़्य हमने तेरी ओर की, तथा जिसका आदेश हमने इबराहीम तथा मूसा और ईसा को दिया, (यह कहते हुए) कि इस धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ। बहुदेववादियों पर वह बात भारी है जिसकी ओर तुम उन्हें बुलाते हो। अल्लाह जिसे चाहता है, अपने लिए चुन लेता है और अपनी ओर मार्ग उसी को दिखाता है, जो उसकी ओर लौटता है।" [सूरा अश-शूरा : 13]

लेकिन जिन रसूलों का नाम हम नहीं जानते, हम उन पर संक्षेप रूप से ईमान रखेंगे। उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है: "तथा (ऐ नबी!) हम तुमसे पहले बहुत-से रसूलों को भेज चुके हैं, जिनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका हाल हम तुमसे वर्णन कर चुके हैं तथा उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके हाल का वर्णन हमने तुमसे नहीं किया है।" [सूरा ग़ाफ़िर : 78]

तृतीय: उन पैगंबरों की सच्ची खबरों की पुष्टि करना, जो उनके बारे में प्रमाणित हैं।

चतुर्थः जो रसूल हमारे पास भेजा गया है, उसकी शरीअत पर अमल किया जाए। हमारी ओर भेजे गए रसूल का नाम मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- है, जिनको तमाम लोगों की ओर रसूल बनाकर भेजा गया था। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है: "तो (ऐ नबी!) आपके रब की क़सम! वे कभी ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक अपने आपस के विवाद में आपको निर्णायक न बनाएँ, फिर आप जो निर्णय कर दें, उससे अपने दिलों में तनिक भी तंगी महसूस न करें और उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें।" [सूरा -निसा : 65]

रसूलों पर ईमान के बहुत से बड़े-बड़े फ़ायदे हैं। कुछ फ़ायदे इस प्रकार हैं:

पहलाः अल्लाह की इस अनुकंपा एवं कृपा का ज्ञान कि उसने बंदों की ओर रसूलों को भेजा, ताकि वे उन्हें अल्लाह का सीधा मार्ग दिखाएं, तथा उन को अल्लाह की इबादत करने का तरीक़ा बताएँ, क्योंकि मानव विवेक अकेले इसे मालूम नहीं कर सकता।

दूसराः उच्च एवं महान अल्लाह की इस विशाल नेमत (अनुग्रह) पर उसका शुक्र अदा करना।

तीसराः रसूलों -अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम- से प्रेम, उनका सम्मान और इस बात पर उनकी उचित प्रशंसा कि वे अल्लाह के रसूल हैं, उन्होंने अल्लाह की इबादत की, उसका संदेश पहुँचाया और उसके बंदों का भला चाहा।

कुछ शत्रुता वाली प्रवृति के लोगों ने अपने रसूलों को यह कहकर झुठलाया कि उच्च एवं महान अल्लाह के रसूल इन्सान नहीं होते। अल्लाह ने उनके इस दावे को निराधार बताते हुए कहा है: और जब लोगों के पास मार्गदर्शन आ गया, तो उन्हें केवल इस बात ने ईमान लाने से रोक दिया कि उन्होंने कहा : क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है? कह दो : यदि धरती में फ़रिश्ते इत्मीनान से चल-फिर रहे होते, तो हम उन पर आसमान से किसी फ़रिश्ते को रसूल बनाकर उतारते। [सूरा अल-इसरा : 94-95]

अतः अल्लाह ने इस दावा को अस्वीकार किया कि पैगंबर का मनुष्य होना आवश्यक है, क्योंकि वह मनुष्यों के पास भेजे गए हैं जो धरती पर निवास करते हैं। यदि धरती पर निवास करने वाले फ़रिश्ते होते, तो अल्लाह आकाश से एक फ़रिश्ता को ही भेजता, ताकि वह उन्ही जैसा हो, और इस प्रकार, सर्वशक्तिमान अल्लाह ने उन लोगों की बातों को उद्धृत किया जो पैगंबरों को झुठलाते थे, कि उन लोगों ने कहा: "तुम तो हमारे ही जैसे इनसान हो। तुम चाहते हो कि हमें उससे रोक दो, जिसकी पूजा हमारे बाप-दादा करते थे। तो तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लाओ। उनके रसूलों ने उनसे कहा : हम तो तुम्हारे ही जैसे इनसान हैं, लेकिन अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, उस पर अनुग्रह करता है। और हमारे लिए यह संभव नहीं कि हम तुम्हारे पास कोई प्रमाण लाएँ, सिवाय अल्लाह की अनुमति के।" [सूरा इबराहीम : 10-11]

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अंतिम दिन (आख़िरत के दिन) पर ईमान

यौम -ए- आख़िरत (आखरी दिन): क़यामत का दिन है जिस दिन लोगों को हिसाब-किताब और उसके अनुसार प्रतिफल देने के लिए उठाया जाएगा।

उसे आख़िरत का दिन अर्थात आखरी दिन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उसके बाद कोई दिन नहीं होगा। उस दिन जन्नत वाले जन्नत में और जहन्नम वाले जहन्नम में अपने ठिकाने ग्रहण कर लेंगे।

आख़िरत के दिन पर ईमान के अंदर तीन बातें आती हैं:

प्रथमः दोबारा जीवित करके उठाए जाने पर ईमान: होगा यूँ कि जब सूर में दूसरी बार फूँक मारी जाएगी, तो लोग सारे संसार के रब (सरष्टा, स्वामी और प्रबंधक) के सामने, नंगे पाँव, निर्वस्त्र होकर और बिना ख़तना की हुई अवस्था में उपस्थित हो जाएँगे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "जिस तरह हमने प्रथम सृष्टि का आरंभ किया, (उसी तरह) हम उसे लौटाएँगे। यह हमारे ज़िम्मे वादा है। निश्चय हम इसे पूरा करने वाले हैं।" [सूरा अल-अम्बिया : 104]

अल् बअस़ अर्थातः पुनर्वजीवित किया जानाः दोबारा जीवित होकर उठना सत्य एवं साबित है। यह अल्लाह की कितबा क़ुरआन, उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत एवं मुसलमानों के मतैक्य से प्रमाणित है।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर निःसंदेह तुम इसके पश्चात् अवश्य मरने वाले हो। फिर निःसंदेह तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे।" [सूरा अल-मोमिनून : 15-16]।

और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''लोगों को क़यामत के दिन नंगे पाँव, नंगे बदन तथा बिना ख़तना के एकत्र किया जाएगा''[13]। बुखारी व मुसलिम। [13] इसे इमाम मुस्लिम ने किताबु-जन्नह व सिफ़तु नईमिहा व अहलिहा, बाब फ़नाइद-दुन्या व बयानिल-हश्र यौमल-क़ियामह (हदीस संख्या : 2859) में रिवायत किया है।

दोबारा उठाए जाने के मसले पर समस्त मुसलमान सहमत हैं कि यह सत्य है, और यह बुद्धिमत्ता के अनुसार है, क्योंकि यह आवश्यक है कि ईश्वर इस सृष्टि के लिए एक पुनरुत्थान स्थान बनाए, जहां उन्हें उनके द्वारा भेजे गए दूतों के माध्यम से दी गई शिक्षाओं के अनुसार पुरस्कृत या दंडित किया जाएगा। अल्लाह तआला ने कहा हैः "तो क्या तुमने समझ रखा था कि हमने तुम्हें उद्देश्यहीन पैदा किया है और यह कि तुम हमारी ओर नहीं लौटाए जाओगे?" [सूरा अल-मोमिनून : 115] तथा अल्लाह ने अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा है: "निःसंदेह जिसने आपपर इस क़ुरआन को अनिवार्य किया है, वह अवश्य आपको एक (महान) लौटने के स्थान की ओर वापस लाने वाला है।" [सूरा अल-क़सस : 85]।

द्वितीयः आख़िरत के दिन पर ईमान के अंदर शामिल दूसरी बात हिसाब-किताब और प्रतिफल पर ईमान हैः बंदों के कर्मों का हिसाब लिया जाएगा और उन्हें उसके अनुरूप बदला भी दिया जाएगा। यह बात अल्लाह की किताब क़ुरआन, उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत और मुसलमानों के मतैक्य से साबित है।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह हमारी ही ओर उनका लौटकर आना है। फिर निःसंदेह हमारे ही ऊपर उनका हिसाब लेना है।" [सूरा अल-ग़ाशिया : 25-26] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "जो (क़ियामत के दिन) एक नेकी लेकर आएगा, उसे उसका दस गुना बदला मिलेगा और जो एक बुराई लेकर आएगा, उसे उसका बस उतना ही बदला दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा।" [सूरा अल-अन्आम: 160] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "और हम क़ियामत के दिन न्याय के तराज़ू रखेंगे। फिर किसी पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। और अगर राई के एक दाने के बराबर (भी किसी का) कर्म होगा, तो हम उसे ले आएँगे। और हम हिसाब लेने के लिए काफ़ी हैं।" [सूरा अल-अंबिया : 47]

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह मोमिन को निकट लाएगा, उस पर अपना पर्दा डाल कर उसे छिपा लेगा फिर उससे पूछेगा: क्या तुम इस पाप को जानते हो? क्या तुम इस पाप को जानते हो? वह कहेगा: हाँ, ऐ मेरे रब। फिर जब उसे उसके पाप कबूल करवा लेगा और बंदा सोचेगा कि वह बर्बाद हो गया, तो अल्लाह तआला कहेगा: मैंने इन पापों को दुनिया में छुपाया था और आज मैं इन्हें क्षमा करता हूँ। फिर उसे उसके अच्छे कर्मों की किताब सौंपी जाएगी। और रही बात काफिरों और मुनाफिकों की, तो उन्हें सबके सामने पुकारा जाएगा: ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठ बोला। याद रखो, अत्याचारियों पर अल्लाह की लानत हो।" [14] बुखारी व मुसलिम। [14] सहीह बुख़ारी, किताब अल-मज़ालिम, बाब क़ौलिल्लाहि तआला: «أَلَا لَعۡنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلظَّٰلِمِينَ», हदीस संख्या (2309) तथा सहीह मुस्लिम, किताबुत-तौबा, बाब क़बूल तौबतिल-क़ातिल वइन कसुर क़तलुह, हदीस संख्या (2768).

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक सहीह हदीस में है : "जिसने किसी सत्कर्म का इरादा किया और उसे कर लिया, अल्लाह उसे अपने यहाँ दस से सात सौ गुना, बल्कि उससे भी अधिक नेकियों के रूप में लिख देता है, और जिसने किसी बुराई का इरादा किया और उसे कर लिया, अल्लाह उसे केवल एक ही बुराई के रूप में लिखता है।"[15] [15] इसे मुस्लिम ने "किताब अल-ईमान", बाब इज़ा हम्मल-अब्दु बिहसनह कुतिबत वा इज़ा हम्म बिसय्यिअह लम् तुकतब, हदीस संख्या : 131 में रिवायत किया है।

मुसलमान इस बात पर एकमत हैं कि कर्मों का हिसाब और इनका प्रतिफल सत्य है, और यह हिकमत एवं बुद्धि के अनुसार है। अल्लाह ने किताबें उतारीं, रसूल भेजे और बंदों पर उन शिक्षाओं को स्वीकार करने तथा उनका पालन करने को अनिवार्य ठहराया। उन लोगों से लड़ाई का आदेश दिया जो इसके विरोधी थे और उनके खून, उनकी संतान, उनकी औरतें और उनकी संपत्ति को हलाल ठहराया, यदि हिसाब और इनाम ना होता, तो यह एक बेकार की बात होती जो ह़कीम (तत्वज्ञानी) रब के योग्य नहीं होती। इस बात की ओर इशारा करते हुए अल्लाह ने फरमाया: "तो निश्चय हम उन लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिनके पास रसूल भेजे गए तथा निश्चय हम रसूलों से (भी) ज़रूर पूछेंगे। फिर हम उन्हें ज्ञानपूर्वक अवश्य सुनाएँगे और हम अनुपस्थित नहीं थे।" [सूरा अल-आराफ़ : 6-7]

तृतीयः जन्नत और जहन्नम (स्वर्ग और नरक) पर ईमान रखना और यह कि वे सृष्टि के लिए अनंत गंतव्य हैं।

जन्नत वह आनंद का घर है जिसे अल्लाह तआला ने उन मोमिनों और परहेज़गारों के लिए तैयार किया है, जिन्होंने उन बातों पर विश्वास रखा, जिन पर विश्वास रखना अल्लाह ने अनिवार्य किया है, और अल्लाह तथा उसके रसूल की आज्ञा का पालन किया, अल्लाह के प्रति निष्ठावान रहे और उसके रसूल का अनुसरण किया। उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की नेमतें हैं। "ऐसी-ऐसी चीज़ें, जिन्हें न किसी आँख ने देखा है, न उनके बारे में किसी कान ने सुना है और न उनकी कल्पना किसी इन्सान के दिल ने की है।" [16], अल्लाह तआला ने फरमाया है : "निःसंदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने सत्कर्म किए, वही लोग सबसे अच्छे प्राणी हैं। उनका प्रतिदान उनके रब के पास सदाबहार बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, वे उनमें सदैव रहेंगे। अल्लाह उनसे प्रसन्न है और वे उससे प्रसन्न हैं। यह उसके लिए है जो अपने रब से डरता है।" [सूरा अल-बय्यिनह : 7-8] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "तो कोई प्राणी नहीं जानता कि उनके लिए आँखों की ठंढक में से क्या कुछ छिपाकर रखा गया है, उसके बदले के तौर पर, जो वे (दुनिया में) किया करते थे।" [सूरा अस-सजदा: 17] [16] इसे बुख़ारी ने: किताबुत-तफ़्सीर, बाब: ﴾فَلَا تَعۡلَمُ نَفۡسٞ مَّآ أُخۡفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعۡيُنٖ﴿, हदीस संख्या (4501); तथा मुस्लिम ने: किताबुल-जन्नह व सिफ़तु नअीमिहा व अहलिहा, हदीस संख्या (2824) में रिवायत किया है।

रही बात जहन्नम की, तो वह यातना का घर है, जिसे अल्लाह ने अत्याचारी काफ़िरों के लिए तैयार कर रखा है, जिन्होंने उसके प्रति अविश्वास जताया और उसके रसूलों को झुठलाया। उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की ऐसी यातनाएँ हैं, जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती, उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा उस आग से डरो (बचो), जो काफ़िरों के लिए तैयार की गई है।" [सूरा आलि-इमरान : 131] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "आप कह दें : यह सत्य तुम्हारे रब की ओर से है। अब जो चाहे, ईमान लाए और जो चाहे कुफ़्र करे। निःसंदेह हमने अत्याचारियों के लिए ऐसी आग तैयार कर रखी है, जिसकी दीवारें उन्हें घेरे हुए होंगी। और यदि वे फ़र्याद करेंगे, तो उन्हें ऐसा जल दिया जाएगा, जो तेल की तलछट जैसा होगा, जो चेहरों को भून डालेगा। वह क्या ही बुरा पेय है और वह क्या ही बुरा विश्राम स्थान है!" [सूरा अल-कहफ़: 29] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "निःसंदेह अल्लाह ने काफ़िरों को धिक्कार दिया है और उनके लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है। वे उसमें सदैव रहेंगे, न उन्हें कोई सहायक मिलेगा और न कोई मददगार। जिस दिन उनके चेहरे आग में उलट-पलट किए जाएंगे, वे कहेंगे, 'हाय, काश हमने अल्लाह की आज्ञा मानी होती और रसूल की आज्ञा मानी होती।" [सूरा अल-अहज़ाब : 64-66]

आख़िरत के दिन पर ईमान रखने के बहुत-से बड़े-बड़े फ़ायदे हैं। कुछ फ़ायदे इस प्रकार हैं:

प्रथमः इससे उस दिन मिलने वाले सवाब एवं पुण्य की आशा में अच्छे कर्म करने की चाहत पैदा होती है।

द्वितीयः इससे उस दिन के दंड के भय से पाप करने और उसमें संतोष पाने से डर पैदा होता है।

तृतीयः यह मोमिन के लिए, दुनिया की उन नेमतों से सांत्वना का कारण है, जो उसे प्राप्त नहीं हो पातीं। क्योंकि उसे पारलौकिक नेमतों तथा प्रतिदानों की आशा रहती है।

काफ़िरों ने मौत के बाद दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार इस कारण से किया कि उन्हें लगता है कि यह संभव नहीं है।

लेकिन उनका यह दावा निराधार है। इसके आधारहीन होने की पुष्टि शरीअत، ह़िस्स (अनुभव) तथा अक़्ल तीनों से होती है।

जहाँ तक शरीअत की बात है, तो उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "काफ़िरों ने समझ रखा है कि वे कदापि पुनर्जीवित नहीं किए जाएँगे। आप कह दें : क्यों नहीं? मेरे रब की क़सम! निश्चय तुम अवश्य पुनर्जीवित किए जाओगे। फिर निश्चय तुम्हें अवश्य बताया जाएगा कि तुमने (संसार में) क्या किया है तथा यह अल्लाह के लिए अति सरल है।" [सूरा अत्-तग़ाबुन: 7] इस बात पर सारे आसमानी ग्रंथों का मतैक्य भी है।

जहाँ तक ह़िस्स (अनुभव) की बात है, तो अल्लाह ने इस दुनिया में भी अपने बंदों को मुर्दों को जीवित करने का उदाहरण दिखा दिया है, सूरा बक़रह में इसके पाँच उदाहरण मौजूद हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं:

पहला उदाहरण: मूसा -अलैहिस्सलाम- की क़ौम ने उनसे कहा: "...हम कदापि तुम्हारा विश्वास नहीं करेंगे, यहाँ तक कि हम अल्लाह को खुल्लम-खुल्ला देख लें..." [ सूरा अल-बक़रा: 55] तो अल्लाह तआला ने उन्हें मार दिया, फिर उन्हें जीवित किया। तथा इस बारे में अल्लाह तआला ने बनी इस्राईल को संबोधित करते हुए कहा: "तथा (वह समय याद करो) जब तुमने कहा : ऐ मूसा! हम कदापि तुम्हारा विश्वास नहीं करेंगे, यहाँ तक कि हम अल्लाह को खुल्लम-खुल्ला देख लें! तो तुम्हें बिजली की कड़क ने पकड़ लिया और तुम देख रहे थे। फिर हमने तुम्हारे मरने के बाद तुम्हें जीवित किया, ताकि तुम कृतज्ञता प्रकट करो।" [सूरा अल-बक़रा: 55-56]

दूसरा उदाहरणः जब बनी इस्राईल के एक व्यक्ति का वध कर दिया गया और उसके बारे में बनी इस्राईल का मतभेद हो गया, तो अल्लाह ने उन्हें एक गाय ज़बह कर उसके एक अंग से उसे मारने का आदेश दिया, ताकि मारा गया व्यक्ति यह बता दे कि उसकी हत्या किसने की है? इसके बारे में उच्च एवं महान अल्लाह  फ़रमाता हैः "और (वह समय याद करो) जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर तुमने उसके बारे में झगड़ा किया और अल्लाह उस बात को निकालने वाला था, जो तुम छिपा रहे थे। फिर हमने कहा, उसके (अर्थात: गाय के) कुछ हिस्से से उसे मारो। इसी प्रकार अल्लाह मृतकों को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझो।" [सूरा अल-बक़रा: 72-73]

तीसरा उदाहरणः अल्लाह ने कुछ लोगों का क़िस्सा बयान करते हुए कहा है कि हज़ारों की संख्या में अपने घरों से मौत के भय से निकल गए, तो अल्लाह ने उन्हें मार दिया और उसके बाद फिर जीवित किया। इस विषय में उच्च एवं महान अल्लाह कहता है: "(ऐ नबी!) क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो मौत के भय से अपने घरों से निकले, जबकि वे कई हज़ार थे, तो अल्लाह ने उनसे कहा कि मर जाओ, फिर उन्हें जीवित कर दिया। निःसंदेह अल्लाह लोगों पर बड़े अनुग्रह वाला है, लेकिन अधिकांश लोग शुक्रिया अदा नहीं करते।" [सूरा अल-बक़रा: 243]

चौथा उदाहरणः अल्लाह ने एक व्यक्ति का क़िस्सा बयान किया है कि वह एक मृत बस्ती के निकट से गुज़रा, तो उसे लगा कि इसे अल्लाह जीवित नहीं कर सकता। अतः अल्लाह ने उसे सौ सालों के लिए मौत दे दी और उसके बाद फिर जीवित किया। इसके संबंध में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "अथवा उस व्यक्ति की तरह, जो एक बस्ती के पास से गुज़रा और वह अपनी छतों पर गिरी हुई थी? उसने कहा : अल्लाह इसे इसके मरने के बाद कैसे जीवित करेगा? तो अल्लाह ने उसे सौ वर्ष तक मृत्यु दे दी। फिर उसे जीवित किया। फरमाया : तू कितनी देर (मृत्यु अवस्था में) रहा? उसने कहा : मैं एक दिन अथवा दिन का कुछ हिस्सा रहा हूँ। (अल्लाह ने) कहा : बल्कि, तू सौ वर्ष रहा है। सो अपने खाने और अपने पीने की चीज़ें देख कि प्रभावित (ख़राब) नहीं हुईं तथा अपने गधे को देख, और ताकि हम तुझे लोगों के लिए एक निशानी बना दें, तथा (गधे की) हड्डियों को देख हम उन्हें कैसे उठाकर जोड़ते हैं, फिर उनपर मांस चढ़ाते हैं? फिर जब उसके लिए ख़ूब स्पष्ट हो गया, तो उसने कहा : मैं जानता हूँ कि निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।" [सूरा अल-बक़रा: 259]।

पाँचवां उदाहरणः जबकि अल्लाह के परम मित्र इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- के क़िस्से में है कि जब उन्होंने अल्लाह से पूछा कि वह मरे हुए लोगों को कैसे जीवित करता है; तो अल्लाह ने उन्हें आदेश दिया कि चार पक्षियों को ज़बह करें और उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके आस-पास के पहाड़ों में फ़ेंक दें और उनको पुकारें। उनके सारे अंग एक-दूसरे से जुड़कर पक्षी बन जाएँगे और वे दौड़ती हुई इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- के पास आ जाएँगी। इस क़िस्से को बयान करते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "तथा (याद करें) जब इबराहीम ने कहा : ऐ मेरे रब! मुझे दिखा कि तू मरे हुए लोगों को कैसे ज़िंदा करेगा? (अल्लाह ने) कहा : क्या तुमने विश्वास नहीं किया? उसने कहा : क्यों नहीं? लेकिन इसलिए कि मेरे दिल को (पूर्ण) संतोष हो जाए। (अल्लाह ने) कहा : फिर चार पक्षी लो और उन्हें अपने से परचा लो। फिर हर पर्वत पर उनका एक हिस्सा रख दो। फिर उन्हें बुलाओ। वे तुम्हारे पास दौड़े चले आएँगे। और यह (अच्छी तरह) जान लो कि निःसंदेह अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।" [सूरा अल-बक़रा: 260]

यह पाँच महसूस एवं अनुभव की जाने वाली घटनाएँ हैं, जो मुर्दों के जीवित होने की संभावना को प्रमाणित करती हैं। हम इससे पहले इशारा कर आए हैं कि अल्लाह ने ईसा बिन मर्यम -अलैहिस्सलाम- को यह  मो'जिज़ा (चमत्कार) प्रदान किया था कि वह अल्लाह की अनुमति से मरे हुए लोगों को जीवित तथा उन्हें उनकी क़ब्रों से निकाल सकते थे।

रही बात अक़्ल (बुद्धि) की, तो यह दो तरह से इसे प्रमाणित करती है:

प्रथमः अल्लाह आकाशों एवं धरती तथा दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों का रचयिता और उन्हें प्रथम बार पैदा करने वाला (सृजनकारी) है, और ज़ाहिर सी बात है कि किसी चीज़ को प्रथम बार बनाने वाला दोबारा उसे बनाने से विवश नहीं हो सकता, सर्वोच्च अल्लाह फ़रमाता हैः "तथा वही है, जो उत्पत्ति का आरंभ करता है। फिर वही उसे पुनः पैदा करेगा। और यह उसके लिए अधिक सरल है"। [सूरा अर-रूम : 27] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "जिस तरह हमने प्रथम सृष्टि का आरंभ किया, (उसी तरह) हम उसे लौटाएँगे। यह हमारे ज़िम्मे वादा है। निश्चय हम इसे पूरा करने वाले हैं।" [सूरा अल-अम्बिया: 104] उच्च एवं महान अल्लाह ने सड़ी-गली हड्डियों को जीवित करने की संभावना का इनकार करने वाले का खंडन करते हुए कहा है: "आप कह दें : उन्हें वही (अल्लाह) जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है।" [सूरा यासीन: 79]

दूसराः हम देखते हैं कि धरती मृत एवं बंजर होती है। उसमें पेड़-पौधे नहीं होते। लेकिन जैसे ही बारिश होती है, तो वह जीवंत हो उठती है , उसमें चहुँ ओर हरियाली फैल जाती है और उसमें सभी प्रकार के सुंदर पौदे उग आते हैं। सच पूछिए तो जो अल्लाह इस मृत भूमि को जीवित कर सकता है, वह मरे हुए लोगों को भी जीवित कर सकता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है:फिर वह हरा और जीवंत हो उठता है, उसमें सभी प्रकार के सुंदर जोड़े होते हैं। "तथा उसकी निशानियों में से है कि आप धरती को सूखी हुई (बंजर) देखते हैं। फिर जब हम उसपर बारिश बरसाते हैं, तो वह हरित हो जाती है और बढ़ने लगती है। निःसंदेह जिस (अल्लाह) ने उसे जीवित किया, वह मुर्दों को अवश्य जीवित करने वाला है। निःसंदेह वह हर चीज़ पर समार्थ्यवान् है।" [सूरा फ़ुस्सिलत: 39] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "तथा हमने आकाश से बहुत बरकत वाला पानी उतारा, फिर हमने उसके द्वारा बाग़ तथा काटी जाने वाली (खेती) के दाने उगाए। और ऊँचे खजूर के पेड़ जिनके गुच्छे एक के ऊपर एक लगे होते हैं। यह सब बंदों के लिए रोज़ी है। और हमने उसके द्वारा निर्जीव नगर को जीवन प्रदान किया। इसी प्रकार पुनरुत्थान होगा।" [सूरा क़ाफ़: 9-11]

और अंतिम दिन पर ईमान (विश्वास) में शामिल है: मृत्यु के बाद होने वाली सभी चीजों पर ईमान, जैसे:

(क) क़ब्र की आज़माइश: यह मृतक से उसके दफनाने के बाद पूछे जाने वाले सवाल हैं, उसके रब, उसके धर्म और उसके नबी के बारे में। अल्लाह उन ईमान वालों को सच्चे उत्तर के साथ स्थिरता प्रदान करता है। वे जवाब देते हैं: मेरा रब अल्लाह है, मेरा धर्म इस्लाम है, और मेरे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। और अल्लाह अत्याचारियों को भटका देता है, तथा काफिर कहता है: आह, आह, मुझे नहीं पता, और मुनाफिक या संदेही कहता है: मुझे नहीं पता, मैंने लोगों को कुछ कहते सुना और वही दोहरा दिया।

(ख) क़ब्र की यातना और उसकी नेमत: मुनाफ़िकों एवं काफ़िरों जैसे अत्याचारियों को क़ब्र के अंदर यातना का सामना करना पड़ेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "...और काश! (ऐ नबी!) आप देखें जब अत्याचारी लोग मौत की कठिनाइयों में होते हैं और फ़रिश्ते अपने हाथ फैलाए हुए होते हैं, (कहते हैं) : निकालो अपने प्राण! आज तुम्हें अपमानजनक यातना दी जाएगी, इस कारण कि तुम अल्लाह पर अनुचित (झूठ) बातें कहते थे और तुम उसकी आयतों (को मानने) से अभिमान करते थे।" [सूरा अल-अन्आम : 93]

अल्लाह ने फ़िरऔन के अनुयायियों के बारे में फ़रमाया : "वे सुबह और शाम आग पर प्रस्तुत किए जाते हैं, तथा जिस दिन क़ियामत क़ायम होगी, (तो आदेश होगा) कि फ़िरऔनियों को सबसे कठोर यातना में डाल दो।" [सूरा ग़ाफ़िर: 46].

सहीह मुस्लिम में ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यदि यह डर न होता कि तुम एक-दूसरे को दफनाना बंद कर दोगे, तो मैं अल्लाह से दुआ करता कि वह तुम्हें क़ब्र के अज़ाब से संबंधित कुछ चीज़ें सुना दे जो मैं सुनता हूँ।" फिर आपने हमें संबोधित करते हुए फ़रमाया : "आग (नरक) के अज़ाब से अल्लाह की शरण में आओ।" सहाबा ने कहा: हम अल्लाह तआला की पनाह मांगते हैं नरक की यातना से। आपने फरमाय: "क़ब्र की यातना से अल्लाह की शरण माँगो।" सहाबा ने कहा : हम अल्लाह की पनाह मांगते हैं क़ब्र की यातना से। आपने फ़रमाया : "अल्लाह की शरण माँगो तमाम फितनों से चाहे वे प्रकट हों या छिपे हों।" सहाबा ने कहा : तमाम फितनों से चाहे वे प्रकट हों या छिपे हों हम अल्लाह की शरण में आते हैं, आपने फ़रमाया : "दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह की शरण माँगो।" उन्होंने कहा: हम मसीह दज्जाल के फ़ितने से अल्लाह की शरण चाहते हैं। [17] [17] सहीह मुस्लिम : किताबुल-जन्नह व सिफ़तु नईमिहा व अहलिहा, अध्याय: मय्यित के जन्नत या आग (जहन्नम) के ठिकाने को उसके सामने पेश किया जाना, और क़ब्र के अज़ाब को सिद्ध करना तथा उससे पनाह माँगना; हदीस संख्या : 2867.

कब्र की नेमतें: सच्चे ईमान वालों के लिए हैं, अल्लाह तआला ने फरमाया: "निःसंदेह जिन लोगों ने कहा : हमारा रब केवल अल्लाह है, फिर उसपर मज़बूती से जमे रहे, उनपर (मौत के समय) फ़रिश्ते उतरते हैं कि भय न करो और न शोकाकुल हो तथा उस जन्नत से खुश हो जाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 30]

और अल्लाह तआला ने फरमायाः "फिर क्यों नहीं जब वह (प्राण) गले को पहुँच जाता है। और तुम उस समय देखते रहते हो। और हम तुमसे भी अधिक उसके निकट होते हैं, परन्तु तुम देख नहीं सकते। फिर क्यों नहीं, यदि तुम्हारा हिसाब नहीं होगा, उसे लौटा लाते यदि तुम सच्चे हो। फिर यदि वह निकटवर्ती लोगों में से हो, तो उसके लिए दया, खुशी और सुखदायी बाग़ होगा। [सूरा वाक़ि'अह : 83-89]

बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मोमिन के संबंध में फ़रमाया कि जब वह अपनी क़ब्र में दो फ़रिश्तों के सवालों का जवाब देता है: "आकाश से एक पुकारने वाला पुकारता है: मेरे बन्दे ने सच कहा, उस के लिए जन्नत का बिस्तर बिछाओ, उसे जन्नत का कपड़ा पहनाओ और उसके लिए जन्नत की ओर एक दरवाज़ा खोलो, तो उस तक जन्नत की हवा और सुगंध आती है और उसकी क़ब्र उसकी दृष्टि की सीमा तक विस्तृत कर दी जाती है।" इसे अहमद और अबू दाऊद ने एक लंबी हदीस में रिवायत किया है[18]। [18] इसे अबू दाऊद ने ''किताबुस-सुन्नह'', ''बाब अल-मसअला फ़िल-क़ब्र व अज़ाबिल-क़ब्र'' (हदीस संख्या : 4753) तथा अहमद ने ''मुस्नद अल-कूफ़ीयीन'', ''हदीस अल-बराअ बिन आज़िब'' (हदीस संख्या : 18534) में वर्णन किया है।

कुछ पथभ्रष्ट लोगों ने क़ब्र की यातना एवं नेमतों का इनकार किया है और कहा है कि यह संभव नहीं है, क्योंकि यह वास्तविकता के विपरीत है। उनका कहना है कि अगर क़ब्र खोद कर मुर्दे को देखा जाए, तो मिलेगा कि क़ब्र जैसी थी, वैसी ही है, न विस्तारित हुई है और न तंग।

लेकिन उनका यह दावा निराधार है। इसका निराधार होना शरीअत, ह़िस्स (अनुभव) और अक़्ल से साबित है:

जहाँ तक शरीअत से इसके निराधार होने की बात हैः तो इससे पहले हम क़ब्र की यातना तथा नेमतों को सिद्ध करने वाली क़ुरआन की आयतें और हदीसें बयान कर आए हैं।

और सह़ीह़ बुख़ारी में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, कहते हैं: "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना के किसी बाग़ से गुज़रे, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो व्यक्तियों की आवाज़ सुनी जो अपनी क़ब्रों में अज़ाब भुगत रहे थे।" फिर उन्होंने हदीस का उल्लेख किया, जिस में यह है: "कि इन दोनों में से एक व्यक्ति पेशाब से बचने पर ध्यान नहीं देता था।" एक रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं : "अपने पेशाब से।" "जबकि दूसरा व्यक्ति लगाई-बुझाई करता फिरता था।" और सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "वह पेशाब से अपने आप को पवित्र नहीं रखता था।" [19]. [19] बुखारी: किताब -अल वज़ू, बाब मा जाअ फी गुस्लिल्बौल, हदीस संख्या (215)।

जहाँ तक ह़िस्स (इन्द्रियों और अनुभव) की बात है: तो सोने वाला अपने सपने में देखता है कि वह एक विस्तृत और खुशहाल स्थान में है, जहाँ वह आनंदित होता है, या फिर वह एक संकीर्ण और भयावह स्थान में है, जहाँ उसे कष्ट होता है, और कभी-कभी वह उस देखे हुए से जाग भी जाता है, इसके बावजूद, वह अपने बिस्तर पर अपने कमरे में वैसा ही होता है जैसा होता है, और नींद मृत्यु का भाई है, इसलिए अल्लाह ने इसे "वफ़ात" (मृत्यु) कहा। अल्लाह तआला ने फरमाया: "अल्लाह ही प्राणों को उनकी मौत के समय क़ब्ज़ करता है, तथा जिसकी मौत का समय नहीं आया, उसकी नींद की अवस्था में। फिर (उसे) रोक लेता है, जिसके बारे में मौत का निर्णय कर दिया हो तथा अन्य को एक निर्धारित समय तक के लिए भेज देता है..." [सूरा अज़-ज़ुमर : 42]

जहाँ तक बुद्धि की बात है: तो सोने वाला अपने सपने में ऐसी सच्ची चीज़ें देखता है जो वास्तविकता के अनुरूप होती हैं, तथा हो सकता है कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनके असली स्वरूप में देखे, और जिस ने उन्हें उनके वास्तविक विशेषताओं के साथ देखा, मानो उसने वास्तव में उन्हें देखा। इसके बावजूद, सोने वाला अपने बिस्तर पर अपने कमरे में होता है, उन चीज़ों से दूर जो उसने देखी हैं, अगर यह दुनिया के हालात में मुमकिन है, तो क्या आख़िरत के हालात में मुमकिन नहीं होगा?!

जहाँ तक क़ब्र की यातना एवं नेमत का इनकार करने वालों के इस दावे की बात है कि अगर क़ब्र को खोला जाए, तो नज़र आता है कि वह जैसी थी, वैसी ही है, न कुशादा हुई है और न तंग। तो इसका उत्तर कई तरह से दिया जा सकता है:

सबसे पहली बात यह है कि शरीयत की बताई हुई बातों के मुक़ाबले में इस तरह के संदेहों को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, जिनपर अच्छे से चिंतन करने से उनका निराधार होना सिद्ध हो जाता है। अरबी की एक कहावत है कि:

कितने ही लोग सही बात पर भी आपत्ति जताते हैं।

जबकि उसकी मूल समस्या विकृत समझ होती है।

दूसराः बरज़ख़ के हालात का संबंध ग़ैब की बातों से है, जो एहसास के दायरे में नहीं आते। अगर ये एहसास के दायरे में आ जाते, तो ग़ैब पर ईमान का फ़ायदा न रह जाता और ग़ैब पर ईमान रखने वाले एवं उसकी पुष्टि न करने वाले बराबर हो जाते।

तीसरा: अज़ाब, नेमत, क़ब्र की चौड़ाई और तंगी को मृत व्यक्ति ही महसूस करता है, अन्य लोग नहीं। यह इसी प्रकार है जैसे सोने वाला सपने में देखता है कि वह एक संकीर्ण, भयावह स्थान में है या एक विस्तृत, खुशी देने वाले स्थान में है, जबकि उसके आस-पास के लोग इसे नहीं देख सकते और न ही महसूस कर सकते हैं। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास उनके स़ह़ाबा (साथियों) के बीच वह्य (प्रकाशना) आती थी, तो आप उसे सुनते थे, लेकिन स़ह़ाबा नहीं सुनते थे, और कभी-कभी फ़रिश्ता एक पुरुष के रूप में आप के पास आता और आप से बात करता, किंतु स़ह़ाबा फ़रिश्ते को नहीं देख पाते और न ही सुन पाते थे।

चौथाः सृष्टियाँ उन्हीं बातों को महसूस कर सकती है, जिनको महसूस करने की शक्ति अल्लाह ने उनको प्रदान की है। वे हर मौजूद चीज़ को महसूस कर लें, यह संभव नहीं है। चुनांचे सातों आकाश, धरती, उनके अंदर मौजूद सारी सृष्टियाँ और सारी चीज़ें अल्लाह की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करती हैं, जिसे कभी-कभी अल्लाह अपनी कुछ सृष्टियों को सुना देता है, लेकिन हम सुन नहीं सकते, इसी बात को बयान करते हुए सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह कहता है: "सातों आकाश तथा धरती और उनके अंदर मौजूद सभी चीज़ें उसकी पवित्रता का वर्णन करती हैं। और कोई चीज़ ऐसी नहीं है जो उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का गान न करती हो। लेकिन तुम उनकी तस्बीह को नहीं समझते।..." [सूरा अल-इसरा : 44] इसी तरह धरती पर शैतानों और जिन्नों का आना-जाना लगा रहता है। जिन्नात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, खामोशी के साथ आपकी क़िरात सुनी और अपनी जाति के पास जाकर उनको सावधान किया। लेकिन उनकी यह सारी गतिविधियाँ हमसे छिपी रहती हैं। इसी के बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "ऐ आदम की संतान! ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें लुभाए, जैसे उसने तुम्हारे माता-पिता को जन्नत से निकाल दिया; वह दोनों के वस्त्र उतारता था, ताकि दोनों को उनके गुप्तांग दिखाए। निःसंदेह वह तथा उसकी जाति, तुम्हें वहाँ से देखते हैं, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। निःसंदेह हमने शैतानों को उन लोगों का मित्र बनाया है, जो ईमान नहीं रखते।" [सूरा अल-आराफ़ : 27] अतः जब इन्सान हर मौजूद चीज़ का एहसास नहीं कर सकता, तो उनके लिए ग़ैब की उन साबित बातों का इनकार करना उचित नहीं होता, जिन्हें वे महसूस नहीं कर सकते।

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तक़दीर पर ईमान

अल-क़दर का अर्थ हैः ब्रह्मांड के संबंध में अल्लाह तआला का वह निर्धारण और निर्णय जिस का ज्ञान अल्लाह को पहले से है एवं उसकी हिकमत के अनुसार है।

तथा तक़दीर पर ईमान के अंदर चार बातें शामिल हैं:

प्रथमः इस बात पर ईमान कि अल्लाह अनादिकाल से अनंतकाल तक हर चीज़ को संक्षिप्त एवं विस्तृत रूप से जानता है। चाहे इसका संबंध उसके कार्यों से हो या उसके बंदों के कार्यों से।

द्वितीयः इस बात पर ईमान कि अल्लाह ने इन सारी बातों को लौह-ए-महफ़ूज़ (सुरक्षित किताब) में लिख रखा है, इन दो बातों के बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह जानता है, जो आकाश तथा धरती में है? निःसंदेह यह एक किताब में (अंकित) है। निःसंदेह यह अल्लाह के लिए अति सरल है।" [सूरा अल-हज्ज: 70]

सहीह मुस्लिम में अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह कहते हुए सुना : "अल्लाह ने सृष्टियों की तक़दीरें आकाशों एवं धरती की रचना से पचास हज़ार वर्ष पहले लिख दिया था।"[20] [20] इसे इमाम मुस्लिम ने किताबुल क़दर, बाबः आदम व मूसा अलैहिमस्सलाम की बहस (हदीस संख्या : 2653) में रिवायत किया है।

तृतीयः इस बात पर ईमान (विश्वास) कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ होता है, अल्लाह के इरादे (इच्छा) से होता है। चाहे उसका संबंध अल्लाह के कार्य से हो या सृष्टियों के कार्य से, उच्च एवं महान अल्लाह ने उन चीज़ों के बारे में कहा है, जिनका संबंध उसके कार्य से है: "और आपका रब जो चाहता है पैदा करता है और चुन लेता है..." [सूरा अल-क़सस : 68] और कहा: और अल्लाह जो चाहता है, करता है। [सूरा इबराहीम : 27] और कहा: "वही है जो गर्भाशयों में तुम्हारे रूप बनाता है, जिस तरह चाहता है।" [सूरा आलि-इमरान: 6], तथा अल्लाह ने सृष्टियों के कर्मों के संबंध में फ़रमायाः "...और यदि अल्लाह चाहता, तो उन्हें तुमपर हावी कर देता, फिर वे तुमसे ज़रूर युद्ध करते।..." [सूरा अन-निसा : 90]। और कहा: "और यदि आपका रब चाहता, तो वे ऐसा न करते। तो आप उन्हें छोड़ दें और जो वे झूठ गढ़ते हैं (उसे भी छोड़ दें)।" [सूरा-अन्आम : 112]

चतुर्थ: यह ईमान (विश्वास) रखना कि सभी सृष्टियाँ अपनी स्वभाव, गुणों और गतिविधियों सहित अल्लाह तआला की बनाई हुई हैं। अल्लाह तआला ने फरमाया: "अल्लाह ही प्रत्येक वस्तु का पैदा करने वाला है तथा वही प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है।" [सूरा अज़-ज़ुमर : 62] एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है : "तथा उसने प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति की और उसे यथोचित आकार प्रदान किया।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 2] तथा अल्लाह तआला ने अपने नबी इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बारे में कहा है कि उन्होंने अपनी जाति से कहा: "हालाँकि अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया तथा उसे भी जो तुम करते हो।" [अस-साफ़्फ़ात : 96]

लेकिन तक़दीर पर ईमान का मतलब कदापि यह नहीं है कि बंदे की अपने कर्मों में कोई इच्छा न हो और वह उसकी शक्ति न रखता हो, क्योंकि शरीअत एवं वास्तविकता दोनों से बंदे की इच्छा तथा उसकी शक्ति सिद्ध होती है।

जहाँ तक शरीअत की बात है, तो उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "अतः जो चाहे अपने रब की ओर लौटने की जगह (ठिकाना) बना ले।" [सूरा अन-नबअ: 39] और कहा: "...सो अपनी खेती में जिस तरह चाहो आओ..." [सूरा अल-बक़रा : 223] और क़ुदरत (शक्ति) के विषय में कहा: "अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके, तथा सुनो और आज्ञापालन करो..." [सूरा तग़ाबुन : 16] और कहा: "अल्लाह किसी प्राणी पर भार नहीं डालता परंतु उसकी क्षमता के अनुसार। उसी के लिए है जो उसने (नेकी) कमाई और उसी पर है जो उसने (पाप) कमाया।..." [सूरा अल-बक़रा : 286]

और जहां तक वास्तविकता की बात है: तो हर इन्सान यह जानता है कि उसके पास इच्छा एवं शक्ति है। इसी के द्वारा वह कोई कार्य करता है, कोई कार्य छोड़ता है। और उन कामों के बीच जो उसके इरादे से होते हैं जैसे चलना-फिरना आदि और जो उसके इरादे के बिना होते हैं जैसे सिहरन एवं कंपन आदि, अंतर है। लेकिन बंदे की चाहत और उसकी शक्ति धरातल पर अल्लाह की इच्छा और उसकी शक्ति से उतरती है। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है: "उसके लिए, जो तुममें से सीधे मार्ग पर चलना चाहे। और तुम नहीं चाह सकते, सिवाय इसके कि अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है, चाहे।" [सूरा अत-तकवीर: 28-29] साथ ही इसलिए भी कि इस ब्रह्मांड का मालिक अल्लाह है। अतः इसमें उसके ज्ञान एवं अनुमति के बिना कुछ नहीं हो सकता।

ज्ञात हो कि तक़दीर पर ईमान -जैसाकि हम ने उल्लेख किया है- बंदे को अनिवार्य कामों को छोड़ने तथा गुनाहों में पड़ने का प्रमाण नहीं देता। अतः उसका इसे प्रमाण बनाना कई कारणों से निराधार है:

पहला : अल्लाह तआला का फ़रमान है : "बहुदेववादी अवश्य कहेंगे कि यदि अल्लाह चाहता, तो हम तथा हमारे पूर्वज (अल्लाह का) साझी न बनाते और न हम किसी चीज़ को हराम ठहराते। ऐसे ही इनसे पहले के लोगों ने भी झुठलाया था, तो उन्हें हमारी यातना का स्वाद चखना पड़ा। (ऐ नबी!) उनसे पूछिए कि क्या तुम्हारे पास (इस विषय में) कोई ज्ञान है, जिसे तुम हमारे समक्ष प्रस्तुत कर सको? तुम तो केवल अनुमान पर चलते हो और केवल अटकल से काम लेते हो।" [सूरा अल-अन्आम: 148] यदि तक़दीर पर ईमान उनके लिए प्रमाण बन पाता, तो अल्लाह उन्हें अपने प्रकोप का मज़ा नहीं चखाता।

दूसरा : उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन : "ऐसे रसूल जो शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे। ताकि लोगों के पास रसूलों के बाद अल्लाह के विरुद्ध कोई तर्क न रह जाए। और अल्लाह सदा से सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।" [सूरा अन-निसा : 165] अगर तक़दीर ही विरोधियों का प्रमाण होती, तो रसूलों को भेजे जाने से यह समाप्त न होती। क्योंकि उनके भेजे जाने के बाद विरोध अल्लाह के निर्णय अनुसार हुआ।

तीसरा: जिसे बुखारी और मुस्लिम -और शब्द बुखारी के हैं- ने अली इब्न अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "तुम में से कोई भी ऐसा नहीं है जिसका ठिकाना, चाहे वह नरक हो या स्वर्ग, पहले ही न लिखा गया हो।" तो लोगों में से एक व्यक्ति ने कहा : क्या हम भरोसा न कर लें, ऐ अल्लाह के रसूल? आपने फ़रमाया : "नहीं, तुम कार्य करते रहो, क्योंकि प्रत्येक के लिए आसानी की गई है।" फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "फिर जिसने (दान) दिया और (अल्लाह से) डरा।" [सूरा अल-लैल : 5]. जबकि सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "जिसको जिस तरह के कार्य के लिए पैदा किया गया है, उसको उसके लिए आसान कर दिया गया है।" [21] इसतरह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अमल करने का आदेश दिया और तक़दीर पर भरोसा करके बैठ जाने से मना किया। [21] सहीह बुख़ारी, किताबुल क़दर, बाब व-कान अम्रुल्लाह क़दरम मक़दूरा, हदीस संख्या 6605 तथा सहीह मुस्लिम, किताबुल क़दर, बाब कैफ़ियत ख़लक़ अल-आदमी फ़ी बत्नि उम्मिहि व किताबति रिज़्किही व अजलिही व अमलिही व शक़ावतिही व सआदतिह, हदीस संख्या 2647।

चौथाः उच्च एवं महान अल्लाह ने बंदे को आदेश भी दिया है और मना भी किया है और उसपर केवल उसी काम का बोझ डाला है, जिसे वह कर सकता हो। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "अतः अल्लाह से डरते रहो, जितना तुमसे हो सके, तथा सुनो और आज्ञापालन करो..." [सूरा अत-तग़ाबुन: 16] और कहा: "अल्लाह किसी प्राणी पर भार नहीं डालता परंतु उसकी क्षमता के अनुसार।...." [सूरा अल-बक़रा : 286] अगर बंदा कर्म पर विवश होता, तो वह ऐसी चीज़ का पाबंद होता, जिससे वह छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। यही कारण है कि जब अनजाने में, भूलवश या मजबूरी की वजह से उससे कोई अवज्ञा होती है, तो उसे कोई गुनाह नहीं होता। क्योंकि उसके पास उचित शरई कारण होता है।

पाँचवांः अल्लाह का निर्णय एक छिपा हुआ भेद है, जिसे धरातल पर उतरने से पहले कोई जान नहीं सकता। जबकि किसी काम का इरादा उसे करने से पहले किया जाता है। ऐसे में उसकी ओर से किया गए  काम का इरादा अल्लाह के निर्णय के ज्ञान पर आधारित नहीं होता। लिहाज़ा तक़दीर को प्रमाण बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। क्योंकि इन्सान जिस चीज़ को जानता न हो, उसे प्रमाण नहीं बना सकता।

छठाः हम देखते हैं कि इन्सान दुनिया की ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने के प्रयास में रहता है जो उसके लिए उपयुक्त हैं और उन्हें प्राप्त कर लेता है। ऐसा नहीं होता कि वह उपयुक्त चीज़ों को छोड़कर अनुपयुक्त चीज़ों की ओर झुके और इसके लिए तक़दीर को प्रमाण स्वरूप पेश करे। फिर धर्म के मामलों में वह लाभदायक चीज़ों से हटकर हानिकारक चीज़ों की ओर क्यों झुकता है और तक़दीर को प्रमाण स्वरूप पेश करता है? क्या दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं?!

इसे एक उदाहरण से समझिए:

यदि मनुष्य के सामने दो रास्ते हों: एक जो उसे एक ऐसे शहर की ओर ले जाता है जहाँ पूरी तरह से अराजकता, हत्या, लूटपाट, अपमान, डर और भूख है। और दूसरा जो उसे एक ऐसे शहर की ओर ले जाता है जहाँ पूरी तरह से व्यवस्था, सुरक्षित, समृद्धि और जीवन में सम्मान है। तो वह किस रास्ते का चयन करेगा?

वह निश्चित रूप से उस दूसरे रास्ते को चुनेगा जो उसे व्यवस्था और सुरक्षा वाले शहर की ओर ले जाता है, और कोई भी समझदार व्यक्ति कभी भी अराजकता और डर वाले शहर के रास्ते पर नहीं जाएगा, यह कहते हुए कि यह उसकी क़िस्मत है। तो फिर क्यों वह आख़िरत के मामले में जन्नत के बजाय जहन्नम का रास्ता चुने और किस्मत का हवाला दे?

एक और उदाहरण: हम देखते हैं कि बीमार व्यक्ति को दवा लेने का आदेश दिया जाता है, तो वह उसे पीता है, जबकि उसका मन नहीं चाहता, और उसे उन खाद्य पदार्थों से बचने का आदेश दिया जाता है जो उसे नुकसान पहुँचाते हैं, तो वह उन्हें छोड़ देता है, जबकि उसका मन उन्हें चाहता है। यह सब स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए होता है, और वह दवा पीने से इनकार नहीं कर सकता, या वह नुकसानदायक भोजन नहीं खा सकता और क़िस्मत का हवाला नहीं दे सकता। तो फिर क्यों इंसान वह चीज़ें छोड़ देता है जिनका अल्लाह और उसके रसूल ने आदेश दिया है या वह काम करता है जिनसे अल्लाह और उसके रसूल ने मना किया है और फिर तक़दीर का हवाला देता है?

सातवाँ: जो व्यक्ति अपनी छोड़ी गई ज़िम्मेदारियों या किए गए पापों के लिए तक़दीर का हवाला देता है, अगर उस पर कोई व्यक्ति हमला करे, उसकी संपत्ति ले ले, या उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाए, फिर क़िस्मत का हवाला दे और कहे: मुझे दोष मत दो, क्योंकि मेरा हमला अल्लाह की तक़दीर के अनुसार था, तो वह स्वयं उसकी दलील को स्वीकार नहीं करेगा। तो फिर क्यों वह तक़दीर का हवाला दूसरे के द्वारा किए गए आक्रमण के लिए स्वीकार नहीं करता, जबकि वह स्वयं तक़दीर का हवाला अपने द्वारा अल्लाह तआला के अधिकारों पर किए गए आक्रमण के लिए देता है?

बताया जाता है कि अमीरुल मोमिनीन उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु के पास एक चोर लाया गया, जिसका हाथ काटा जाना था। जब उन्होंने हाथ काटने का आदेश दिया, तो उसने कहा : अमीरुल मोमिनीन ज़रा रुकिए। मैंने जो चोरी की है, इसे अल्लाह ने मेरी तक़दीर में लिख रखा था। यह सुन उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने फ़रमाया : हम जो तुम्हारा हाथ काटने जा रहे हैं, इसे भी अल्लाह ने तक़दीर में लिख रखा है।

तक़दीर पर ईमान के बहुत से बड़े-बड़े फ़ायदे हैं, कुछ फ़ायदे इस प्रकार हैं:

पहला: किसी भी कार्य के कारण को करने में अल्लाह पर भरोसा करना, इस प्रकार कि कारण पर भरोसा न हो, क्योंकि हर चीज़ अल्लाह तआला की तक़दीर से होती है।

दूसरा: जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त कर ले, तो उसे अपने आप पर अभिमान नहीं करन चाहिए, क्योंकि उसे प्राप्त करना सर्वशक्तिमान अल्लाह  की ओर से, उसके द्वारा नियुक्त भलाई और सफलता के माध्यम से प्राप्त होने वाली एक नेमत और 'कृपाहै। अपने आप पर अभिमान करने से वह इस नेमत के लिए कृतज्ञता व्यक्त करना भूल जाएगा।

तीसराः इससे इन्सान को अल्लाह के निर्णयों को सुकून और आतंरिक संतुष्टि के साथ सहन करने की शक्ति मिलती है। वह किसी प्रिय वस्तु से वंचित होने पर परेशान नहीं होता और किसी अप्रिय वस्तु के सामने आने पर व्याकुल नहीं होता। क्योंकि यह उस अल्लाह का निर्णय है जो आकाशों एवं धरती का मालिक है और इसे हर हाल में होना था। इसी के बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "धरती में तथा तुम्हारे प्राणों पर जो भी विपदा आती है, वह एक किताब में अंकित है, इससे पहले कि हम उसे पैदा करें। निश्चय यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। ताकि तुम उस पर दुखी न हो जो तुम्हारे हाथ से निकल गया और न ही उस पर इतराओ जो उसने तुम्हें दिया है। और अल्लाह किसी भी घमंडी, डींग मारने वाले को पसंद नहीं करता।" [सूरा अल-हदीद : 22-23] तथा अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमाते हैं : "मोमिन का मामला भी बड़ा अजीब है। उसके हर काम में उसके लिए भलाई है। जबकि यह बात मोमिन के सिवा किसी और के साथ नहीं है। यदि उसे ख़ुशहाली प्राप्त होती है और वह शुक्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है, और अगर उसे तकलीफ़ पहुँचती है और सब्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है।"[22] [22] सहीह मुस्लिम : किताबुज़-ज़ुह्दि वर रक़ाइक़, बाब: मोमिन का हर मामला भलाई ही है, हदीस संख्या 2999.

तक़दीर के विषय में दो सम्प्रदाय पथ-भ्रष्ट (गुमराह) हो गए हैं:

इन में से एक सम्प्रदाय: जबरिय्या है, जिन्होंने कहा कि बंदा अपने कार्यों के लिए मजबूर है, और उसमें उसकी कोई इच्छा या क्षमता नहीं है।

दूसरा सम्प्रदाय: क़दरिय्या का है, जिनका कहना है कि; बंदा खुद अपने इरादे तथा शक्ति से सब कुछ करता है। उसके काम पर अल्लाह के इरादे एवं शक्ति का कोई प्रभाव नहीं होता।

पहले समुदाय यानी जबरिय्या का खंडन शरीअत तथा वास्तविकता दोनों से:

जहाँ तक शरीअत की बात हैः तो अल्लाह ने बंदे के लिए इरादे एवं चाहत को साबित किया है और कर्म का संबंध उससे जोड़ा है। उसका फ़रमान है: "तुममें से कुछ लोग दुनिया चाहते थे तथा कुछ लोग आख़िरत के इच्छुक थे।..." [सूरा आलि इमरान : 152]، और अल्लाह तआला ने फरमायाः "आप कह दें : यह सत्य तुम्हारे रब की ओर से है। अब जो चाहे, ईमान लाए और जो चाहे कुफ़्र करे। निःसंदेह हमने अत्याचारियों के लिए ऐसी आग तैयार कर रखी है, जिसकी दीवारें उन्हें घेरे हुए होंगी।..." [सूरा अल-कहफ़: 29] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "जो व्यक्ति अच्छा कर्म करेगा, तो वह अपने ही लाभ के लिए करेगा और जो बुरा कार्य करेगा, तो उसका दुष्परिणाम उसी पर होगा और आपका रब बंदों पर तनिक भी अत्याचार करने वाला नहीं है।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 46]

जहाँ तक वास्तविकता की बात हैः तो हर व्यक्ति उन कामों के बीच जिन्हें वह अपनी इच्छा से करता है, जैसे खाना, पीना, खरीदना और बेचना आदि और उन कामों जो उसके इरादे के बिना ही हो जाया करते हैं, जैसे बुख़ार से काँपना और छत से गिर जाना आदि, के बीच अंतर को जानता है। प्रथम प्रकार के कार्य वह स्वयं करता है और उसके इरादे से होते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के कार्य में उसका कोई इख्तियार नहीं होता है और न ही वह उसके इरादे से होते हैं।

दूसरे समुदाय यानी क़दरिय्या का खंडन शरीयत तथा अक़्ल (बुद्धि) दोनों से:

जहाँ तक शरीअत की बात हैः तो अल्लाह प्रत्येक वस्तु का रचयिता है और हर चीज़ उसके इरादे से होती है। अल्लाह ने अपनी किताब पवित्र क़ुरआन में इस बात का उल्लेख किया है कि बंदों के कर्म उसके इरादे से हुआ करते हैं। उसका फ़रमान है: "और यदि अल्लाह चाहता, तो उनके बाद आने वाले लोग उनके पास खुली निशानियाँ आ जाने के पश्चात आपस में न लड़ते। परंतु उन्होंने मतभेद किया, तो उनमें से कोई तो वह था जो ईमान लाया और उनमें से कोई वह था जिसने कुफ़्र किया। और यदि अल्लाह चाहता, तो वे आपस में न लड़ते, लेकिन अल्लाह जो चाहता है, करता है।" [सूरा अल-बक़रा : 253] और अल्लाह तआला ने फरमायाः "और यदि हम चाहते, तो प्रत्येक प्राणी को उसका मार्गदर्शन प्रदान कर देते। लेकिन मेरी ओर से बात निश्चित हो चुकी कि मैं जहन्नम को जिन्नों तथा इनसानों, सबसे से ज़रूर भरूँगा।" [सूरा अस-सजदा: 13]

जहाँ तक अक़्ल (बुद्धि) की बात हैः तो सारा ब्रह्मांड अल्लाह के अधीन है। चूँकि इन्सान भी इस ब्रह्मांड का अंग है, इसलिए वह भी अल्लाह के अधीन है। जबकि हम जानते हैं कि कोई अधीन व्यक्ति मालिक की किसी वस्तु में उसकी अनुमति एवं इरादे के बिना उसमें कुछ अमल दखल नहीं रखता है।

*

इस्लामी अक़ीदे के उद्देश्य

अरबी शब्द "अल-हदफ़" के कई अर्थ हैं। इसका एक अर्थ है वह चीज़ जिसे निशाना लगाने के लिए रखा जाए। इसी तरहः हर उस चीज़ को हदफ़ कहते हैं, जिसका इरादा किया जाए।

इस्लामी अक़ीदे के उद्देश्यः इसके अनेक मक़्सद एवं पवित्र लक्ष्य हैं, जो उनको थामे रहने पर प्राप्त होते हैं, जो अलग-अलग तरह के और बहुत सारे हैं। यहाँ हम उनमें से कुछ लक्ष्य बयान कर रहे हैं:

पहलाः अल्लाह के प्रति पूर्ण निष्ठा तथा केवल उसी की इबादत। क्योंकि वही सरष्टा है और इसमें उसका कोई साझी नहीं है। अतः इरादा भी उसी के लिए होना चाहिए और इबादत भी उसी की होनी चाहिए।

दूसराः बुद्धि एवं विचार को उस अराजक भ्रम से आज़ाद करना, जो हृदय के इस अक़ीदे से खाली होने के कारण पैदा होता है। क्योंकि जिसका हृदय इस अक़ीदे से खाली होता है, वह या तो हर अक़ीदे से खाली और एहसास के दायरे में आने वाले भौतिकवाद का उपासक है या फिर विभिन्न अक़ीदों एवं अंधविश्वासों की गुमराहियों में भटकता रहता है।

तीसराः फिर न दिल में कोई बेचैनी रहती है और न विचार में बिखराव होता है। क्योंकि यह अक़ीदा इन्सान को उसके स्रष्टा से जोड़ता है और वह उसे संसार का संचालन करने वाला प्रभु और विधान प्रदान करने वाला शासक मान लेता है। अतः उसका दिल उसके निर्णय से संतुष्ट और उसका सीना इस्लाम से राज़ी हो जाता है। जिसके नतीजे में वह इस्लाम का कोई विकल्प नहीं खोजता।

चौथाः इससे इन्सान का इरादा एवं अमल, अल्लाह की इबादत और लोगों के साथ व्यवहार में किसी बिगाड़ से सुरक्षित हो जाता है, क्योंकि इसकी एक बुनियाद रसूलों पर ईमान है, जिसमें रसूलों के तरीक़े का अनुसरण भी शामिल है, जो हर इरादे एवं अमल को सुरक्षित रखता है।

पाँचवांः सारे कामों में इस हद तक दृढ़ता एवं गंभीरता कि जब भी अच्छे काम का कोई अवसर मिले, इन्सान उससे सवाब की आशा में लाभ उठाए और जब भी गुनाह का कोई मौक़ा देखे दंड के भय से उससे दूर हो जाए। क्योंकि इस्लामी अक़ीदे की एक बुनियाद दोबारा उठाए जाने और कर्मों के प्रतिफल पर विश्वास भी है।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके कर्म के अनुसार पद हैं। और आपका रब लोगों के कर्मों से अनभिज्ञ नहीं है।" [सूरा अल-अन्आम : 132] तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस कथन में इस उद्देश्य पर तरगीब दी है : “शक्तिशाली मोमिन कमज़ोर मोमिन के मुकाबले में अल्लाह के समीप अधिक बेहतर तथा प्रिय है, किंतु प्रत्येक के अंदर भलाई है। जो चीज तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसके प्रति तत्पर रहो और अल्लाह से मदद मांगो तथा असमर्थता न दिखाओ। फिर यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि अल्लाह ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है; क्योंकि ‘अगर’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।” इसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है। [23] [23] सहीह मुस्लिम, किताबुल क़दर, बाब, शक्ति प्राप्त करने, असमर्थता को छोड़ने, अल्लाह से मदद माँगने और मुक़द्दरों को अल्लाह के सुपुर्द करने के बारे में, हदीस संख्या : 2664।

छठाः एक ऐसे सशक्त समुदाय का गठन, जो अपने धर्म को सुदृढ़ बनाने और उसके सुतूनों (स्तंभों) को मज़बूत बनाने के लिए सब कुछ न्योछावर करने पर तैयार रहे और इस मार्ग में आने वाले कष्टों की कोई परवाह न करे। इसी के बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "निःसंदेह मोमिन तो वही लोग हैं, जो अल्लाह तथा उसके रसूल पर ईमान लाए, फिर उन्होंने संदेह नहीं किया तथा उन्होंने अपने धनों और अपने प्राणों से अल्लाह की राह में जिहाद किया। यही लोग सच्चे हैं।" [सूरा अल-हुजुरात : 15]।

सातवांः व्यक्तियों एवं दलों में सुधार लाकर दुनिया एवं आख़िरत की खुशी प्राप्त करना तथा सवाब एवं नेमतें प्राप्त करना। इसी के बारे में उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: "जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगे। और निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे।" [सूरा अन-नह्ल : 97]

यह इस्लामी अक़ीदे के कुछ उद्देश्य थे, (जो हमने बयान किए)। दुआ है अल्लाह उन्हें हमारे तथा तमाम मुसलमानों के लिए पूरे करे। निस्संदेह वह दानशील और कृपालु है। अंत में सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो सारे संसार का रब है।

अल्लाह की दया और शांति की जल-धारा बरसे हमारे नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके परिजनों और सभी साथियों पर।

यह किताब अपने अंत को पहुँची । इसके लेखक हैं:

मुहम्मद सालेह अल-उसैमीन