العقيدة الصحيحة وما يضادها

العقيدة الصحيحة وما يضادها

تكلم المؤلف في هذا الكتيب الصغير عن العقيدة الصحيحة التي تتلخص في: الإيمان بالله، وملائكته، وكتبه، ورسله، واليوم الآخر، وبالقدر خيره وشره، فهذه الأمور الستة هي أصول العقيدة الصحيحة عند أهل السنة والجماعة. وقد شرح الشيخ في الكتاب هذه الأصول الستة مستدلًا بالكتاب والسنة وما عليه سلف هذه الأمة، ثم تكلم عن مسألة الإيمان وقرر أنه قول وعمل يزيد بالطاعة وينقص بالمعصية. ثم ذكر مسألة الولاء والبراء وواجب المسلم تجاه أخيه في الدين. ثم شرع في ذكر المنحرفين عن هذه العقيدة الصحيحة مع ذكر أصنافهم، وذكر شبهة المعاصرين وأنها هي نفس شبهة الأولين، وذكر بعض العقائد الكفرية وما زاده المشركون المتأخرون على الأولين. وأكد الشيخ أن النصر لا يأتي إلا بإخلاص العبادة لوجه الله تعالى وحده لا شريك له، ثم ختم هذا الكتيب بذكر نواقض الإسلام.

Language: lang_hi
Prepared by: अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़
Version: 1.0
Translations 47
Amharic Bulgarian Bosnian Czech +43
Attachments 7
PDF
Audio
Video
+3

शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीजें

लेखक

अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम जो, बड़ा दयालु एवं अति कृपावान है।

भूमिका

सारी प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए है, तथा अल्लाह की दया और शांति (दुरूद व सलाम) अवतरित हो अल्लाह के अंतिम संदेष्टा, उनके परिजनों तथा साथियों पर।

अल्लाह की प्रशंसा एवं दुरूद व सलाम के बाद असल विषय-वस्तु पर आते हैं। चूँकि विशुद्ध अक़ीदा ही इस्लाम धर्म का मूल आधार है, इसलिए आज मैंने उसे ही अपने संबोधन का विषय बनाया है। कुरआन व हदीस के अनगिनत प्रमाणों के आधार पर यह बात सर्वविदित है कि इनसान के कथन एवं कार्य उसी समय सही तथा ग्रहणयोग्य हो सकते हैं, जब उन्हें विशुद्ध आस्था के साथ किया जाए। यदि अक़ीदा सही न हो, तो उसके आधार पर होने वाले कार्य एवं कथन व्यर्थ हो जाते हैं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए अल्लाह तआला ने कहा है : {आज सब स्वच्छ खाद्य तुम्हारे लिए हलाल कर दिए गए हैं। तथा जिन समुदायों को किताब दी गई है उनका भोजन तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा भोजन भी उनके लिए हलाल है। तथा ईमान वाली सतवंती स्त्रियाँ एवं उन समुदायों की सतवंती स्त्रियाँ भी तुम्हारे लिए हलाल हैं, जिन्हें तुमसे पहले पुस्तक दी गई है, जब तुम उनका महर अदा करके उनसे विवाह कर लो (तथा) तुम व्यभिचार करने और प्रेमिका बनाने की राह पर न चलो। तथा जो ईमान को नकार देगा, उसका सत्कर्म व्यर्थ हो जाएगा तथा वह आख़िरत में क्षति उठाने वालों में से होगा।} [सूरा अल- माइदा, आयत संख्या : 5] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : "निःसंदेह आपकी ओर और आपसे पूर्ववर्ती नबियों की ओर यह वह्य की गई है कि यदि आपने शिर्क किया, तो अवश्य ही आपका कर्म व्यर्थ हो जाएगा और आप घाटा उठाने वालों में से हो जाएँगे।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 65] क़ुरआन के अंदर इस आशय की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अल्लाह की स्पष्टवादी पुस्तक और उसके विश्वसनीय संदेष्टा -उनके ऊपर उनके पालनहार की ओर से सर्वश्रेष्ठ दुरूद व सलाम हो- की सुन्नत से पता चलता है कि शुद्ध अक़ीदा का सारांश है : अल्लाह, उसके फ़रिशतों, उसकी किताबों, उसके संदेष्टाओं, अंतिम दिन (परलोक) तथा भली-बुरी तक़दीर पर विश्वास रखना। यही छह चीज़ें उस शुद्ध अक़ीदा के मूल सिद्धांत हैं, जिसके साथ अल्लाह की किताब अवतरित हुई है तथा जिसके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेज़ा है। इन्हीं छह मूल सिद्धांतों से परोक्ष से संबंधित वह सारी चीज़ें तथा अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई वह सारी बातें निकलती हैं, जिनपर ईमान रखना अनिवार्य है। इन छह मूल सिद्धांतों के प्रमाण क़ुरआन एवं हदीस में बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जैसे, पवित्र अल्लाह का फ़रमान है : "सारी अच्छाई पूरब और पश्चिम की ओर मुँह करने में ही नहीं, बल्कि वास्तव में अच्छा वह व्यक्ति है जो अल्लाह पर, आख़िरत के दिन पर, फरिशतों पर, अल्लाह की किताब पर और नबियों पर ईमान रखता हो।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 177] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "रसूल उस चीज़ पर ईमान लाया जो उसकी तरफ़ अल्लाह की ओर से उतारी गई है तथा सब ईमान वाले उसपर ईमान लाए। वे सब अल्लाह, उसके फरिशतों, उसकी सब किताबों और उसके पैगंबरों पर ईमान लाए। (वे कहते हैं :) हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अंतर नहीं करते।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 285] एक और स्थान पर वह कहता है : "ऐ ईमान वालो! अल्लाह, उसके रसूल और उसकी किताबों पर, जो उसने अपने रसूल पर उतारी है, ईमान लाओ। जिसने अल्लाह, उसके फरिशतों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और क़यामत के दिन को नकार दिया, वह बहुत दूर की गुमराही में जा पड़ा।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 136] एक और स्थान पर वह कहता है : "क्या आपने नहीं जाना कि आकाश तथा धर्ती की हर वस्तु अल्लाह के ज्ञान में है? यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। निश्चय अल्लाह के लिए यह अति सरल है।" [सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 70] जहाँ तक इन मूल सिद्धांतों को प्रमाणित करने वाली सहीह हदीसों का संबंध है, तो उनकी संख्या भी बहुत ज़्यादा है, जिनमें वह सुप्रसिद्ध सहीह हदीस भी शामिल है, जिसका वर्णन इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- से किया है। उमर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि एक बार जिबरील -अलैहिस्सलाम- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से ईमान के बारे में पूछा, तो आपने उत्तर दिया : "ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके उसके फरिशतों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और अंतिम दिन तथा अच्छी-बुरी तक़दीर पर विश्वास रखो।" [1] इसे इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से भी रिवायत किया है। इन छह मूल आधारों से ही पवित्र एवं महान अल्लाह की हस्ती, आख़िरत तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी परोक्ष संबंधित विषय निकलते हैं, जिनपर विशावस रखना ज़रूरी है। [1] सहीह मुस्लिम, अल-ईमान (हदीस संख्या : 8), सुनन तिरमिज़ी, अल-ईमान (हदीस संख्या : 2610), सुनन नसई, अल-ईमान (हदीस संख्या : 4990), सुनन अबू दाऊद, अस-सुन्नह (हदीस संख्या : 4695), सुनन इब्न-ए-माजा, अव-मुक़द्दमह (हदीस संख्या : 63) तथा मुसनद अहमद (1/27)।

अल्लाह पर ईमान

इस बात पर विश्वास कि अल्लाह ही एकमात्र सत्य पूज्य तथा वंदनीय है। उसके सिवा कोई वंदना का अधिकार नहीं रखता।

अल्लाह पर ईमान के अंदर इस बात पर विश्वास शामिल है कि वही वास्तविक पूज्य एवं वंदनीय है और उसके सिवा कोई वंदना का हक़दार नहीं है। क्योंकि वही बंदों का स्रष्टा, उनके ऊपर उपकार करने वाला, उनको जीविका प्रदान करने वाला, उनकी खुली तथा छिपी बातों को जानने वाला तथा आज्ञाकारियों को प्रतिफल प्रदान करने और अवज्ञाकारियों को दंड देने की क्षमता रखने वाला है। इसी उपासना के लिए अल्लाह ने जिन्न एवं इनसान को पैदा फरमाया और इसी का उनको आदेश दिया है। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "मैंने जिन्न और इनसान को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी उपासना करें ।" [सूरा अज़-ज़ारियात, आयत संख्या : 56] "न मैं उनसे कोई जीविका चाहता हूँ और न चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ।" [सूरा अज़-ज़ारियात, आयत संख्या : 57] "अल्लाह तो स्वंय ही सब को जीविका प्रदान करने वाला, शक्तिशाली, बलवान है।" [सूरा अज़-ज़ारियात, आयत संख्या : 58] एक अन्य स्थान में पवित्र अल्लाह ने कहा है : "ऐ लोगों, अपने उस पालनहार की इबादत करो, जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया है। इली में तुम्हारा बचाव है।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 21] "जिसने तुम्हारे लिए धर्ती को बिछौना और आकाश को छत बनाया और आकाश से वर्षा बरसा कर उससे फल पैदा करके तुम्हें जीविका प्रदान की। सावधान, जानने के बावजूद अल्लाह के साझी न ठहराओ।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 22] इसी सत्य को बयान करने, इसी की ओर लोगों को बुलाने और इसके विरुद्ध चीज़ों से सावधान करने के लिए अल्लाह ने रसूलों को भेजा और किताबें उतारी हैं। स्वयं अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की वंदना करो और उसके अलावा सभी पूज्यों से बचो।" [सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 36] इसी तरह उसने कहा है : "हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा उसकी और यही वह्य (प्रकाशना) अवतरित की कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अतः तुम सब मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया, आयत संख्या : 25] एक और स्थान में उसने कहा है : "अलिफ़ लाम रा। यह एक ऐसाी किताब है कि इसकी आयतें सुदृढ़ की गई हैं, फिर साफ-साफ बयान की गई है, एक हिकमत वाले (तथा) जानने वाले की ओर से। यह कि अल्लाह के सिवा किसी की उपासना मत करो। मैं तुमको अल्लाह की ओर से डराने वाला और शुभसूचना देने वाला हूँ।" [सूरा हूद, आयत संख्या : 1-2] इस इबादत (उपासना) का वास्तविक अर्थ यह है कि बंदे दुआ, भय, आशा, नमाज़, रोज़ा, क़ुर्बानी और मन्नत आदि हर प्रकार की इबादतें विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए, उसके आगे विनम्रता प्रदर्शित करते हुए, अपने दिल में उसकी चाहत एवं भय रखते हुए, उससे संपूर्ण प्रेम एवं उसकी महानता के आगे अपनी हीनता का प्रदर्शन करते हुए करें। पवित्र क़ुरआन का अधिकांश भाग इसी विशाल सिद्धांत की व्याख्या करता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "अतः अल्लाह की इबादत करो, उसके लिए धर्म को शुद्ध करते हुए। सुन लो, शुद्ध धर्म अल्लाह ही के लिए है।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 2-3] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "और तुम्हारे पालनहार का निर्णय है कि तुम उसके सिवा किसी की इबादत न करो।" [सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 23] इसी तरह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह फ़रमाता है : "तुम अल्लाह को पुकारो, उसके लिए धर्म को विशुद्ध करके। भले ही काफ़िर बुरा मानें।" [सूरा ग़ाफ़िर, आयत संख्या : 14] जब सहीह बुखारी एवं सहीह मुस्लिम में मुआज़ -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "अल्लाह का हक बंदों के ऊपर यह है कि वे उसकी उपासना करें और उसका किसी को साझी न ठहराएँ।" [2] [2] सहीह बुख़ारी, अल-जिहाद व अस-सियर (हदीस संख्या : 2701), सहीह मुस्लिम, अल-ईमान (हदीस संख्या : 30), सुनन तिर्मिज़ी, अल-ईमान (हदीस संख्या : 2543), सुनन इब्न-ए-माजा, अज़-ज़ुह्द (हदीस संख्या : 4296) तथा मुसनद अहमद (5/238)।

अल्लाह की ओर से बंदों पर अनिवार्य किए गए इस्लाम के पाँचों प्रत्यक्ष स्तंभों पर ईमान

अल्लाह पर ईमान के अंदर इस बात पर विश्वास भी शामिल है कि उसके द्वारा बंदों पर फ़र्ज़ किए गए इस्लाम के पाँचों प्रत्यक्ष स्तंभों पर ईमान रखा जाए। इस्लाम के पाँच प्रत्यक्ष स्तंभ हैं : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना और सामर्थ्य रखने वाले पर अल्लाह के पवित्र घर काबा का हज करना। इसी तरह पवित्र इस्लामी शरीयत में अनिवार्य किए गए अन्य चीज़ों पर ईमान रखना भी ज़रूरी है।

इस्लाम के पाँच स्तंभों में सबसे महत्वपूर्ण और महान स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य न होने की गवाही का तक़ाज़ा यह है कि विशुद्ध रूप से केवल उसी की इबादत की जाए और उसके अतिरिक्त किसी की इबादत न की जाए। यही उसका वास्तविक अर्थ है। अतः उसके अतिरिक्त जितने भी इनसान, फ़रिश्ते एवं जिन्नात आदि पूजे जाते हैं, सब के सब असत्य पूज्य हैं और एकमात्र सत्य पूज्य केवल अल्लाह है। स्वयं अल्लाह तआला का फ़रमान है : "यह सब इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है और उसके सिवा जिसे भी यह लोग पुकारते हैं, वह असत्य है।" [सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 62] हम पीछे बयान कर आए हैं कि अल्लाह तआला ने जिन्न और इनसान को इसी महान सत्य को स्थापित करने के लिए पैदा किया है, उनको इसी के अनुपालन का आदेश दिया है, इसी के प्रचार-प्रसार के लिए रसूलों को भेजा है और इसी की व्याख्या के लिए किताबें उतारी हैं। अतः इसे अच्छी तरह समझ लो और इसपर बार-बार सोच-विचार करो, ताकि जान सको कि आज अधिकतर मुसलमान इस मूलभत तथ्य से किस क़दर अनभिज्ञ हैं कि वे अल्लाह के साथ अन्य की इबादत किए जा रहे हैं और उसका शुद्ध अधिकार दूसरों को दिए जा रहे हैं।

इस बात पर विश्वास कि अल्लाह ही संसार का रचयिता, संचालनकर्ता और अपने ज्ञान एवं सामर्थ्य के आधार पर संसारवासियों के बारे में सारे निर्णय लेने वाला है

अल्लाह पर ईमान के अंदर इस बात पर विश्वास भी शामिल है कि अल्लाह ही संसार का रचयिता, संचालनकर्ता और अपने ज्ञान एवं सामर्थ्य के आधार पर संसारवासियों के बारे में जिस तरह का चाहे, निर्णय लेने वाला है। वही लोक तथा परलोक का स्वामी और सारे संसार का पालनहार है। उसके अलावा कोई स्रष्टा और उसके सिवा कोई पालनहार नहीं है। उसने बंदों के सुधार और उन्हें दुनिया एवं आख़िरत में मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए रसूल भेजे और किताबें उतारीं। साथ ही यह कि इन तमाम बातों में उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वही हर चीज़ की देख-भाल करने वाला है।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 62] एक अन्य साथान में उसका फ़रमान है : "तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया। फिर अर्श (सिंहासन) पर स्थित हो गया। वह रात्रि से दिन को ढक देता है। दिन उसके पीछे दौड़ता हुआ आ जाता है। सूर्य तथा चाँद और तारे उसकी आज्ञा के अधीन हैं। सुन लो! वही उत्पत्तिकार है और वही शासक है। वही अल्लाह अति शुभ संसार का पालनहार है।" [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 54]

अल्लाह के सुंदर नामों और उच्च गुणों पर ईमान रखना और उनके साथ छेड़छाड़ करना, उनका इनकार न करना, उनका विवरण न देना और उनका उदाहरण न प्रस्तुत करना

अल्लाह पर ईमान के अंदर क़ुरआन में वर्णित और पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से साबित अल्लाह के अच्छे-अच्छे नामों और सर्वोच्च गुणों पर, उनसे छेड़छाड़ किए बिना, उनका इनकार किए बिना, उनके विवरण में जाए बिना और उनका उदाहरण दिए बिना, हू-ब-हू उसी तरह ईमान भी शामिल है, जैसे वह आए हुए हैं। साथ ही उन नामों एवं गुणों के विशाल अर्थों पर भी ईमान लाना ज़रूरी है, जो दरअसल सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुण हैं और जिनसे उसे उसकी महानता एवं प्रताप के अनुसार सुशोभित करना अनिवार्य है और जिनमें से किसी भी गुण में वह अपनी सृष्टि के समान नहीं है। "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं, वह सुनने और देखने वाला है।" [सूरा अश-शूरा, आयत संख्या : 11] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "अतः तुम अल्लाह के लिए उदाहरण न दो। अल्लाह खूब जानता है और तुम नहीं जानते।" [सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 74] यही अह्ल-ए-सुन्नत व जमात यानी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों का अक़ीदा है, इसी अक़ीदा को इमाम अबुल हसन अशअरी ने अपनी किताब "अल- मक़ालात" में असहाब-ए-हदीस और अहल-ए-सुन्नत से नक़ल किया है तथा इसे ही उनके अलावा अन्य मुस्लिम विद्वानों ने नक़ल किया है।

औज़ाई कहते हैं : ज़ोहरी और मकहूल से अल्लाह के गुणों वाली आयतों के बारे में पूछा गया, तो दोनों ने कहा : "उनको उसी तरह मान लो, जैसे वे आए हुए हैं।" वलीद बिन मुस्लिम कहते हैं कि मालिक, औज़ाई, लैस बिन साद और सुफ़यान सौरी से अल्लाह के गुणों वाली हदीसों के बारे में पूछा गया, तो सब ने कहा : "उन्हें उनके विवरण में जाए बिना उसी तरह मान लो, जिस तरह आई हुई हैं।" औज़ाई कहते हैं : "हम, जबकि ताबेईगण पर्याप्त संख्या में मौजूद थे, कहा करते थे कि अल्लाह अपने सिंहासन (अर्श) के ऊपर है तथा हम हदीस में वर्णित अल्लाह के गुणों पर ईमान रखते हैं।" जब इमाम मालिक के गुरू रबीआ बिन अबू अब्दुर रहमान से "इसतिवा" यानी अल्लाह के अर्श के ऊपर होने के बारे में प्रश्न किया गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : "इसतिवा कोई अज्ञात वस्तु नहीं है, लेकिन उसका विवरण समझ में नहीं आ सकता। संदेश अल्लाह की ओर से आता है, रसूल का काम स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है और हमारा कर्तव्य उसकी पुष्टि करना है।" इसी तरह जब इमाम मालिक से इसके बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया : "इसतिवा एक ज्ञात शब्द है, उसका विवरण अज्ञात है, उसपर ईमान लाना अनिवार्य है और उसके बारे में प्रश्न करना बिदअत है।" फिर उन्होंने पूछने वाले से कहा कि मुझे तो तुम एक बुरे आदमी जान पड़ते है। उसके बाद उन्होंने उसे अपनी सभा से बाहर निकाल देने का आदेश दिया और उसे बाहर निकाल दिया गया।

कुछ इसी से मिलती-जुलती बात मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से भी नक़ल की गई है। जबकि इमाम अबू अब्दुर रहमान अब्दुल्लाह बिन मुबारक कहते हैं : "हम अपने पालनहार को जानते हैं कि वह अपने बनाए हुए आकाशों के ऊपर अपने अर्श (सिंहासन) पर है और अपनी सृष्टि से अलग है।" इस विषय में बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम विद्वानों के कथन मौजूद हैं, जिन्हें इस संबोधन में नक़ल करना संभव नहीं है। जो व्यक्ति अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है, वह इस विषय़ में उलमा-ए-सुन्नत की लिखी हुई पुस्तकों का अध्ययन करे। उदाहरण के तौर पर अब्दुल्लाह बिन इमाम अहमद की किताब "अस-सुन्नह", महान इमाम मुहम्मद बिन खुज़ैमा की किताब "अत-तौहीद", अबुल क़ासिम अल-लालकाई अत-तबरी की किताब "अस-सुन्नह" तथा शैखुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया की ओर से हमात वासियों को दिया गया उत्तर आदि। शैख़ुल इस्लाम का यह उत्तर एक विशाल एवं अति लाभदायक उत्तर है। इसमें शैखुल इस्लाम ने अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है, बहुत-से मुस्लिम विद्वानों के कथन नक़ल किए हैं तथा अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के पक्ष में और उनके विरोधियों के अक़ीदे के खंडन में शरई एवं अक़्ली प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। इसी तरह उनकी पुस्तिका "अत-तदमुरिय्यह" का भी बड़ा महत्व है। इसमें उन्होंने अल्लाह के नामों एवं गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखते हुए अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे को शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के साथ बयान किया है और विरोधियों का खंडन किया है। फिर, यह सब कुछ इस अंदाज़ में किया है कि सही नीयत एवं सत्य से अवगत होने की सच्ची चाहत के साथ पढ़ने वाले के सामने सत्य स्पष्ट होकर आ जाता है और असत्य की अप्रासंगिकता ज़ाहिर हो जाती है। दरअसल जो भी अल्लाह के नामों तथा गुणों के विषय में अह्ल-ए-सुन्नत के अक़ीदे के विरुद्ध गया है, उसे शरई एवं अक़्ली प्रमाणों के विरुद्ध जाना और स्वयं अपनी कही हुई बातों में विरोधाभास का शिकार होना पड़ा है।

इसके विपरीत अहल-ए-सुन्नत व जमात ने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को, जिन्हें उसने अपनी किताब में या फिर उसके संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी हदीस में बयान किया है, बिन किसी चीज़ के समान व समरूप ठहराए साबित किया है तथा पवित्र एवं महान अल्लाह को उसकी सृष्टि के समान व समरूप होने से इस तरह पाक व पवित्र ठहराया है कि उससे उसके नामों और गुणों का अर्थहीन होना लाज़िम नहीं आता। इस तरह वे अंतर्विरोध से सुरक्षित रहे और सभी दलीलों पर अमल भी हो गया। दरअसल अल्लाह का यह नियम है कि जो व्यक्ति उसके रसूलों के लाए हुए सत्य को थामे रहता है और सच्ची लगन से सत्य की तलाश में रहता है, उसे अल्लाह सत्य पर जमे रहने का सुयोग प्रदान करता है और उसके सामने सत्य के प्रमाणों को ज़ाहिर कर देता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "बल्कि हम मारते हैं सत्य से असत्य पर, तो वह उसका सिर कुचल देता है और वह अकस्मात समाप्त हो जाता है। तथा तुम्हारे लिए विनाश है, उन बातों के कारण, जो तुम बनाते हो।" [सूरा अल-अंबिया, आयत संख्या : 18] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "वे आपके पास जो भी मिसाल लाएँगे हम उसका सच्चा उत्तर और उत्तम व्याख्या आपको बता देंगे।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान, आयत संख्या : 33] हाफ़िज़ इब्ने कसीर ने अपनी सुप्रसिध्द तफ़सीर में अल्लाह के फरमान : {إِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ} [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 54] की व्यख्या करते हुए इस विषय में बड़ी अच्छी बात कही है, जिसे उसकी व्यापक लाभ को ध्यान में रखते हुए यहाँ नक़ल कर देना बेहतर मालूम होता है। उन्होंने कहा है : "इस विषय में लोगों के बहुत-से अलग-अलग मत हैं, जिन्हें यहाँ बयान नहीं किया जा सकता। यहाँ हम मालिक, औज़ाई, सुफ़यान सौरी, लैस बिन साद, शाफ़िई, अहमद और इसहाक़ बिन राहवैह आदि सदाचारी पूर्वजों और अन्य पुराने एवं नए मुस्लिम इमामों के मार्ग पर चलेंगे। उनका मार्ग यह है अल्लाह के नामों एवं गुणों पर आधारित आयतों एवं हदीसों को हू-ब-हू उसी तरह मान लिया जाए, जिस तरह वह आई हुई हैं। न नामों एवं गुणों का विवरण प्रस्तुत किया जाए, न समरूपता दिखाई जाए और न उनको अर्थहीन सिद्ध किया जाए। दरअसल, तश्बीह देने वालों के ज़ेहन में सबसे पहले जो बात आती है, वह अल्लाह के बारे में अस्वीक़ार्य है, क्योंकि अल्लाह के समान उसकी कोई सृष्टि नहीं हो सकती। स्वयं उसी का फ़रमान है : "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सुनने वाला देखने वाला है।" अतः सही बात वही है, जो उक्त इमामों ने कही है। इमाम बुख़ारी के गुरू नुएैम बिन हम्माद अल-खुज़ाई कहते हैं : "जिसने अल्लाह को उसकी सृष्टि के समरूप कहा, उसने कुफ़्र किया और जिसने अल्लाह के स्वयं अपने लिए सिद्ध किए हुए किसी गुण का इनकार किया, उसने कुफ़्र किया। अल्लाह के जो गुण स्वयं उसने तथा उसके रसूल ने बताए हैं, उनके अंदर तशबीह जैसी कोई बात नहीं है। अतः जिसने स्पष्ट आयतों और सहीह हदीसों के अंदर वर्णित अल्लाह के नामों एवं गुणों को, उसकी महानता एवं प्रताप के अनुरूप ही उसके लिए साबित किया तथा उसे त्रुटियों एवं कमियों से पाक जाना, वह सत्य के मार्ग पर चलने वाला है।"

फ़रिश्तों पर ईमान

जहाँ तक फ़रिश्तों पर ईमान का संबंध है, तो यह उनपर सार रूप से तथा विस्तृत रूप से ईमान रखने पर आधीरित है। चुनाँचे मुसलमान यह विश्वास रखता है कि अल्लाह के कुछ फरिश्ते हैं, जिनको उसने अपनी आज्ञाकारिता के लिए पैदा किया है और उनके बारे में बताया है कि वे अल्लाह के सम्मानित बंदे हैं, उससे बढ़कर कुछ नहीं बोलते और उसके हर आदेश का पालन करते हैं। फ़रमाया : "वह जानता है, जो उनके सामने है और जो उनसे ओझल है। वह किसी की सिफ़ारिश नहीं करेंगे, उसके सिवा जिससे वह (अल्लाह) प्रसन्न हो तथा वह उसके भय से सहमे रहते हैं।" [सूरा अल-अंबिया, आयत संख्या : 28] फ़रिश्तों के बहुत-से प्रकार हैं। कुछ फ़रिश्ते अर्श को उठाने पर नियुक्त हैं, कुछ स्वर्ग और नरक के दारोगा हैं और कुछ बंदों के कर्मों को लिखने पर नियुक्त हैं। जिन फ़रिश्तों को अल्लाह और उसके पैगंबर ने, उनका नाम लेकर चिह्नित किया है, हम उनपर विस्तार के साथ ईमान रखते हैं। जैसे- जिबरील, मीकाईल, नरक का दारोगा मालिक तथा सूर( नरसिंघा) में फूँक मारने पर नियुक्त फ़रिश्ता इसराफील। इसराफ़ील का उल्लेख सहीह हदीसों में हुआ है। सहीह हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "फ़रिश्ते नूर से पैदा किए गए हैं, जिन्नात दहकती हुई आग से पैदा किए गए हैं और आदम उस चीज़ से पैदा किए गए हैं, जिसका उल्लेख तुम्हारे सामने कर दिया गया है।" [3] इसे इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है। [3] सहीह मुस्लिम, अज़-ज़ुह्द व अर-रिक़ाइक़ (हदीस संख्या : 2996) तथा मुसनद अहमद (6/153)।

ग्रंथों पर ईमान

किताबों पर ईमान को भी इसी तरह समझ लीजिए। सार रूप से इस बात पर ईमान रखना ज़रूरी है कि अल्लाह ने सत्य को स्पष्ट करने और उसकी ओर लोगों को बुलाने के लिए अपने नबियों तथा रसूलों पर कुछ किताबें उतारी हैं। जैसा कि उसका फ़रमान है : "निःसंदेह हमने अपने संदेष्टाओं को खुली दलीलें देकर भेजा और उनके साथ किताबें और मीज़ान (तराज़ू) उतारा, ताकि लोग न्याय पर कायम रहें।" [सूरा अल-हदीद, आयत संख्या : 25] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "वास्तव में लोग एक ही समूह थे, तो अल्लाह ने नबियों को शुभ सूचनाएँ देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा और उनके साथ सच्ची किताबें उतारीं, ताकि लोगों के बीच विवादास्पद चीज़ों का फैसला हो जाए।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 213]

जबकि हमें उन किताबों पर सविवरण ईमान रखना होगा, जिन्हें अल्लाह ने नाम लेकर चिह्नित किया है। जैसे- तौरात, इंजील, ज़बूर और क़ुरआन। क़ुरआन सर्वश्रेष्ठ तथा अंतिम पुस्तक है। क़ुरआन, सब किताबों का संरक्षण और सबकी पुष्टि करने वाली किताब है। क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रमाणित हदीसों का अनुसरण सभी लोगों के लिए अनिवार्य है। क्योंकि अल्लाह ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संदेष्टा के रूप में मनुष्य और जिन्न संप्रदायों की ओर भेजा था और आपपर क़ुरआन उतारा था, ताकि आप उसी के आलोक में सारे निर्णय लें। अल्लाह ने इसे दिलों के लिए रोगनिवारक, हर चीज़ को स्पष्ट करने वाला और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन, दया एवं करूना बनाया है। स्वयं उसी का फ़रमान है : "और यह एक किताब है, जिसे हमने अवतरित किया है। यह बड़ी शुभकारी है। अतः तुम इसका अनुसरण करो और अललाह से डरते रहो, ताकि तुमपर दया की जाए।" [सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 155] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "और हमने आपपर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का स्पष्ट बयान है और जो मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन, दया और शुभ सूचना है।" [सूरा अल-नह्ल, आयत संख्या : 89] एक और जगह वह फ़रमाता है : "(हे नबी!) आप लोगों से कह दें कि हे मानव जाति के लोगो! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाश तथा धरती का राज्य है। उसके सिवा कोई वंदनीय (पूज्य) नहीं है। वही जीवन देता तथा मारता है। अतः अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके उस उम्मी नबी पर, जो अल्लाह पर और उसकी सभी पुस्तकों पर ईमान रखते हैं और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्गदर्शन पा जाओ।" [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 158] क़रुआन के अंदर इस आशय की बेशुमार आयतें मौजूद हैं।

रसूलों पर ईमान

इसी तरह संदेष्टाओं पर भी सार एवं विस्तृत रूप से ईमान लाना अनिवार्य है। हम ईमान रखते हैं कि अल्लाह ने अपने बंदों की ओर उन्हीं में से कुछ लोगों को रसूल के रूप में भेजा है, ताकि लोगों को शुभ सूचना दें, सावधान करें तथा सत्य की ओर बुलाएँ। अब, जो उनके निमंत्रण को स्वीकार करेगा, वह सौभाग्य प्राप्त करेगा और जो उनका विरोध करेगा, वह विफलता एवं पश्चाताप का पात्र बनेगा। इन संदेष्टाओं की अंतिम कड़ी और सर्वश्रेष्ठ संदेष्टा हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया है : "हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की वंदना करो और उसके अलावा सभी पूज्यों से बचोl" [सूरा अल-नह्ल, आयत संख्या : 36] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "ये सभी रसूल शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे, ताकि इन रसूलों के (आगमन के) पश्चात् लोगों के लिए अल्लाह पर कोई तर्क न रह जाए और अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 165] एक और जगह वह कहता है : "मुह़म्मद तुम्हारे पुरुषों मेंसे किसी के पिता नहीं हैं। किन्तु, वे अल्लाह के रसूल और सबसे अंतिम नबी हैं और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का अति ज्ञानी है।" [सूरा अल-अहज़ाब, आयत संख्या : 40] अल्लाह तआला और उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिन पैग़ंबरों का नाम लिया है, हम उनपर विस्तृत रूप से और निर्धारण के साथ ईमान रखते हैं। जैसे नूह, हूद, सालेह, इबराहीम और इनके अलावा अन्य रसूल। उनपर तथा हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सर्वश्रेष्ठ दरूद एवं निर्मल शांति की धारा बरसे।

आख़िरत के दिन पर ईमान

जहाँ तक आख़िरत के दिन पर ईमान का संबंध है,

तो उसके अंदर अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बताई हुई मृत्यु के बाद की सारी घटनाओं, जैसे क़ब्र की परीक्षा, उसकी यातना और उसकी नेमतें और इसी तरह क़यामत के दिन घटित होने वाली सारी घटनाओं, जैसे उस दिन की भयावहता, कठिन परिस्थितियाँ, सिरात पर लोगों का चलना, कर्मों का तोला जाना, हिसाब होना, प्रतिफल दिया जाना, कर्म पत्र दिया जाना, किसी का दाएँ हाथ में, किसी का बाएँ हाथ में और किसी का पीठ के पीछे से कर्म पत्र प्राप्त करना आदि पर विश्वास रखना शामिल है। इसी तरह, उसके अंदर हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को क़यामत के दिन दिए जाने वाले हौज़-ए-कौसर, स्वर्ग एवं नरक, ईमान वालों के अपने पालनहार को देखने और तथा अल्लाह के उनसे बात करने के साथ-साथ उन तमाम बातों पर विश्वास सखना शामिल है, जिनका उल्लेख पवित्र क़ुरआन एवं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह सुन्नत में हुआ है। इन तमाम बातों पर विश्वास रखना और इनकी उसी प्रकार पुष्टि करना अनिवार्य है, जिस प्रकार अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है।

तक़दीर पर ईमान

जहाँ तक तक़दीर पर ईमान की बात है, तो इसके अंदर चार बातों पर ईमान रखना शामिल है :

पहली बात : अल्लाह तआला, जो कुछ हो चुका है उसे भी जानता है और जो कुछ होने वाला है उसे भी जानता है। वह बंदों की हर बात और हर गतिविधि से अवगत है। वह उन्हें प्राप्त होने वाली जीविकाओं, मृत्यु के समय, आयु और कर्मों आदि सारी बातों से अवगत है। इनमें से कोई भी बात उससे नहीं छिपती। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ को भली-भाँति जानता है।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 231] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : "ताकि तुम जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर सक्षम है और अल्लाह ने ज्ञान के एतबार से हर चीज़ को घेर रखा है।" [सूरा अत-तलाक़, आयत संख्या : 12]

दूसरी बात : अल्लाह तआला ने अपनी सारी योजनाओं तथा निर्णयों को लिख रखा है। स्वयं उसी का फ़रमान है : "जमीन जो कुछ इनमें से घटाती है वह हमें पता है और हमारे पास सब याद रखने वाली किताब है।" [सूरा काफ़, आयत संख्या : 4] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "तथा हमने प्रत्येक वस्तु को एक खुली पुस्तक में गिन रखा है।" [सूरा यासीन, आयत संख्या : 12] एक और जगह वह कहता है : "क्या आपने नहीं जाना कि आकाश तथा धर्ती की हर वस्तु अल्लाह के ज्ञान में है? यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। निश्चय अल्लाह के लिए यह अति सरल है।" [सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 70]

तीसरी बात : अल्लाह की सार्वभौमिक इच्छा पर ईमान रखना और विश्वास रखना कि अल्लाह जो चाहेगा, वह होगा और जो नहीं चाहेगा, वह नहीं होगा। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निश्चय ही अल्लाह जो चाहता है, करता है।" [सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 18] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : "वह जब किसी चीज़ का इरादा करता है, तो उसे इतना कह देना काफी है कि "हो जा" और बस वह हो जाती है।" [सूरा यासीन, आयत संख्या : 82] एक और जगह वह कहता है : "और तुम बिना अल्लाह के चाहे कुछ नहीं चाह सकते। निश्चय ही अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हिकमत वाला है।" [सूरा अल-इनसान, आयत संख्या : 30]

चौथी बात : सभी अस्तित्व में आई हुई चीज़ों को अल्लाह ने पैदा फ़रमाया है और उसके अतिरिक्त कोई स्रष्टा एवं पालनहार नहीं है। अल्लाह तआलाल ने फरमाया है : "अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वही हर चीज़ की देख-भाल करने वाला है।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 62] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : "हे मनुष्यो! तुम अपने ऊपर अल्लाह के पुरस्कार को याद करो। क्या अल्लाह कि सिवा कोई उत्पत्तिकर्ता है, जो तुम्हें आकाश तथा धरती से जीविका प्रदान करता हो? उसके सिवा कोई वंदनीय नहीं है। फिर तुम कहाँ फिरे जा रहे हो?" [सूरा फ़ातिर, आयत संख्या : 3] अहल-ए-सुन्नत व जमात के निकट तक़दीर पर ईमान के अंदर इन चारों चीज़ों पर ईमान आ जाता है। यह अलग बात है कि कुछ बिदअतियों ने इनमें से कुछ चीज़ों का इनकार किया है।

ईमान नाम है कथन एवं कर्म का, जो आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है

अल्लाह पर ईमान के अंदर यह विश्वास भी दाख़िल है कि ईमान कथन एवं कर्म का नाम है, जो आज्ञापालन से बढ़ता और अवज्ञा से घटता है। साथ ही यह कि किसी मुसलमान को कुफ़्र एवं शिर्क के अतिरिक्त किसी बड़े से बड़े गुनाह जैसे व्यभिचार, चोरी, सूदखोरी, मदिरापान, माता-पिता की अवज्ञा आदि के कारण काफ़िर नहीं कहा जा सकता, जब तक वह उन्हें जायज़ न समझता हो। क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "निःसंदेह अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और उसके सिवा जिसे चाहे, क्षमा कर देगा।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 48] इसी तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सहाबा और उनके बाद हर ज़माने में बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने यह हदीस नक़ल की है कि अल्लाह जहन्नम से हर उस व्यक्ति को निकाल लेगा, जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा।

अल्लाह के लिए प्रेम और अल्लाह के लिए घृणा तथा अल्लाह के लिए दोस्ती और अल्लाह के लिए दुश्मनी

अल्लाह पर ईमान के अंतर्गत अल्लाह के लिए प्रेम और अल्लाह के घृणा तथा अल्लाह के लिए दोस्ती और अ्ललाह के लिए दुश्मनी भी आती है। अतः एक मोमिन, अन्य मोमिनों से मोहब्बत करेगा और उनसे दोस्ती रखेगा, जबकि काफ़िरों से नफ़रत करेगा और उनसे बैर रखेगा। याद रहे कि इस उम्मत के मोमिनों की सूची में जिन लोगों का नाम सबसे ऊपर है, वह अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथीगण हैं। अतः, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात उनसे मोहब्बत एवं दोस्ती के साथ-साथ यह विश्वास भी रखते हैं कि वे नबियों के बाद सर्वश्रेष्ठ लोग हैं। क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- का फरमान है : "सबसे उत्तम लोग मेरे ज़माने के लोग हैं, फिर वे जो उनके बाद आएँ और फिर वे जो उनके बाद आएँ।"[4] इस सहदीस को इमाम बुख़ारी तथा इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है। उनका विश्वास है कि सहाबा के अंदर सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति अबू बक्र रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद उमर रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद उसमान रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद अली रज़ियल्लाहु अनहु, उनके बाद जन्नत की शुभ सूचना प्राप्त करने वाले दस सहाबा में से शेष छह सहाबा और उनके बाद बाक़ी सारे सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम हैं। अह्ल-ए-सुन्नत, सहाबा के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेदों और विवादों के बारे में बात करने से गुरेज़ करते हैं और विश्वास रखते हैं कि इस संदर्भ में वे मुजतहिद यानी सही निर्णय लेने के लिए शतप्रतिशत प्रयास करने वाले लोग थे। जबकि इस तरह के लोग यदि सही निर्णय लेने में सफल हो जाएँ, तो दोहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं और यदि सफल न हों तो इकहरा प्रतिफल प्राप्त करते हैं। वे अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के मोमिन परिजनों से मोहब्बत करते और उनसे दोस्ती रखते हैं, मोमिनों की माताओं यानी अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नियों से मोहब्बत रखते हैं, उन सभी के लिए अल्लाह की प्रसन्नता की दुआ करते हैं। वे राफ़िज़ियों के तरीक़े से खुद को अलग रखते हैं, जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सहाबा से द्वेष रखते, उनको बुरा-भला कहते और आपके परिजनों के बारे में अतिशयोक्ति से काम लेते हुए उन्हें अल्लाह के प्रदान किए हुए पद से ऊपर ले जाते हैं। इसी तरह वे नासिबियों के तरीके से भी खुद को अलग रखते हैं, जो अपने कथन अथवा कर्म द्वारा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के परिजनों को कष्ट देते हैं। [4] सहीह बुखारी, अश-शहादात (हदीस संख्या : 2509), सहीह मुस्लिम, फ़ज़ाइल अस-सहाबा, (हदीस संख्या : 2533), सुनन तिरमिज़ी, अल-मनाक़बि (हदीस संख्या : 3859), सुनन इब्न-ए-माजा, अल-अहकाम (हदीस संख्या : 2362) तथा मुसनद अहमद (1/434)।

हमने इस संक्षिप्त वक्तव्य में जिन बातों का वर्णन किया है, वह सब उस सही अक़ीदा के अंतर्गत आती हैं, जिनके साथ अल्लाह ने अपने संदेष्टा मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा है। यही इस उम्मत के फ़िरक़ा-ए-नाजिया (मुक्ति प्राप्त करने वाले समुदाय) एवं अह्ल-ए-सुन्नत व जमात का अक़ीदा है, जिसके बारे में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा। उसका साथ छोड़ने देने वाले उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे, यहाँ तक कि अल्लाह का फैसला आ जाए।" [5] इसी तरह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यहूदी इकहत्तर संप्रदायों में विभाजित हो गए थे, ईसाई बहत्तर संप्रदायों में विभक्त हो गए थे और मेरी इस उम्मत के लोग तिहत्तर संप्रदायों में बँट जाएँगे। यह सारे संप्रदाय जहन्नम में जाएँगे, सिवाय एक संप्रदाय के। आपके साथियों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! वह कौन-सा संप्रदाय होगा? आपने उत्तर दिया : वह संप्रदाय जो उसी तरह के मार्ग पर चल रहा होगा, जिसपर मैं और मेरे साथीगण चल रहे हैं।"[6] यही वह अकीदा है, जिसे सदृढ़ता के साथ थामना, उसपर जमे रहना तथा उसके विरुद्ध चीज़ों से बचना ज़रूरी है। [5] सहीह मुस्लिम, अल-इमारह (हदीस संख्या : 1920), सुनन तिरमिज़ी, अल-फ़ितन (हदीस संख्या : 2229), सुनन अबू दाऊद, अल-फ़ितन व अल-मलाहिम (हदीस संख्या : 4252), सुनन इब्न-ए-माजा (हदीस संख्या : 3952) तथा मुसनद अहमद (5/279)। [6] सुनन इब्न-ए-माजा, अल-फितन (हदीस संख्या : 3992)।

इस अक़ीदे से मुँह फेरने वाले और इसके विपरित चलने वालों का वर्णन

उनके विभिन्न प्रकार

जहाँ तक इस अक़ीदे से मुँह फेरने वाले और इसकी विपरीत धारा में चलने वाले लोगों की बात है, तो उनके बहुत-से प्रकार के हैं। उनमें से कुछ लोग मूर्तियों, फरिश्तों, वलियों, जिन्नों, वृक्षों तथा पत्थरों आदि की पूजा करते हैं। इस तरह के लोगों ने न केवल यह कि संदेष्टाओं के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका विरोध किया और उनसे दुश्मनी की। क़ुरैश तथा अरब के विभिन्न क़बीलों के लोगों ने हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ जो कुछ किया, वह इसका जीता जागता सबूत है। यह लोग अपने पूज्यों से ज़रूरत की चीज़ें माँगते, रोग से स्वास्थ्य लाभ की गुहार लगाते और शत्रुओं पर विजय की फ़रियाद करते थे। उनके नाम पर जानवर ज़बह करते थे और उनके लिए मन्नत मानते थे। ऐसे में, जब अल्लाह के पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनके इन कर्मों का खंडन किया और विशुद्ध रूप से एक अल्लाह की इबादत का आदेश दिया, तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया और कहने लगे : "क्या उसने सब पूज्यों को एक पूज्य बना दिया है? यह तो बड़े आश्चर्य का विषय है।" [सूरा साद, आयत संख्या : 5] आप उन्हें निरंतर अल्लाह की ओर बुलाते रहे, शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के बुरे परिणाम से सावधान करते रहे और अपने निमंत्रण की वास्तविकता से अवगत करते रहे, यहाँ तक कि पहले तो कुछ ही लोगों ने आपके आह्वान को स्वीकार किया, लेकिन उसके बाद बड़ी संख्या में लोग इस्लाम ग्रहण करने लगे। इस तरह, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- और पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करने वाले लोगों के निरंतर प्रयास और लंबे संघर्ष के बाद अल्लाह के धर्म इस्लाम का सभी धर्मों पर वर्चस्व हो गया। परन्तु, फिर इसके बाद हालात बदल गए और अधिकतर लोग अज्ञानता के शिकार हो गए। अकसर लोग नबियों और वलियों के सम्मान में अतिशयोक्ति करने लगे, उनको पुकारने लगे, उनसे संकट के समय सहायता माँगने लगे तथा शिर्क के अन्य बहुत-से कार्य करने लगे। इस तरह देखा जाए तो वे एक तरह से दोबारा अज्ञानता काल की ओर लौट गए। उनके अंदर "ला इलाहा इल्लल्लाह" के अर्थ का उतना भी शऊर न रहा, जितना अरब के काफ़िरों के अंदर मौजूद था।

यह शिर्क, धर्म से अज्ञानता एवं नबवी दौर से दूरी के कारण लोगों के अंदर फैलता चला गया और सिलसिला आज भी जारी है।

इस बात का उल्लेख कि बाद के लोग भी उसी भ्रम के शिकार हैं, जिसके शिकार पहले के लोग थे तथा कुफ़्र पर आधारित कुछ धारणाओं का वर्णन

दरअसल आज के शिर्क करने वाले भी उसी भ्रम के शिकार हैं, जो पहले के शिर्क करने वालों ने पाल रखा था। वह कहा करते थे कि हमारे ये पूज्य अल्लाह के पास हमारे सिफ़ारिशी हैं और हम इनकी उपासना केवल इसलिए करते हैं कि ये हमें अल्लाह की निकटता लाभ करवा दें। हालाँकि अल्लाह तआला ने इस भ्रम का खंडन कर दिया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि जिसने उसके अलावा किसी और की उपासना की, चाहे वह कोई भी हो, उसने उसके साथ शिर्क किया और काफ़िर हो गया। उसका फ़रमान है : "और वे अल्लाह के सिवा, उनकी इबादत (वंदना) करते हैं, जो न तो उन्हें कोई हानि पहुँचा सकते हैं और न कोई लाभ और कहते हैं ये अल्लाह के यहाँ हमारे अभिस्तावक (सिफारिशी) हैं।" [सूरा यूनुस, आयत संख्या : 18] उसके बाद अल्लाह ने उनका खंडन करते हुए फ़रमाया : "आप कह दीजिए कि क्या तुम अल्लाह को ऐसी बात की सूचना दे रहे हो, जिसके होने को न वह आकाशों में जानता है और न धरती में? वह पवित्र और उच्च है उस शिर्क (मिश्रणवाद) से, जो वे कर रहे हैं।" [सूरा यूनुस, आयत संख्या : 18] इस आयत के अन्दर अल्लाह तआला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसे छोड़ नबियों, वलियों या किसी और की पूजा करना सबसे बड़ा शिर्क है, भले ही उसमें संलिप्त लोग उसका कोई और नाम रख लें। उसने एक अन्य स्थान में कहा है : "तथा जिन्होंने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं। वे कहते हैं कि हम तो उनकी वंदना इसलिए करते हैं कि वह हमें अल्लाह से समीप कर देंगें।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 3] आगे अल्लाह ने इनका खंडन करते हुए कहा है : "ये लोग जिस विषय में विवाद कर रहे हैं उसका (सच्चा) फैसला अल्लाह (स्वयं) करेगा। निश्चय ही अल्लाह झूठे और अकृतज्ञ लोगों का मार्गदर्शन नहीं करता।" [सूरा अज़-ज़ुमर, आयत संख्या : 3] इस प्रकार अल्लाह तआला ने स्पष्ट कर दिया है कि इन लोगों का उसके अलावा किसी और से कुछ माँगना, उसका भय करना तथा उससे आशा रखना आदि अल्लाह के प्रति अकृतज्ञता (कुफ़्र) व्यक्त करना है। साथ ही उनकी इस बात को भी झूठ क़रार दे दिया है कि उनके पूज्य उनको अल्लाह की निकटता लाभ करवा देंगे।

शुद्ध अक़ीदा एवं संदेष्टाओं की लाई हुई शिक्षाओं के विरुद्ध और कुफ़्र पर आधारित आस्थाओं में वर्तमान युग में मार्क्स व लेलिन तथा इन जैसे अन्य अधर्म एवं नास्तिकता के प्रचारकों के अनुयायियों की वह मान्यता भी शामिल है, जिसे लोग समाजवाद, साम्यवाद, बासवाद तथा इस तरह के अन्य नामों से जानते हैं। इन सारे नास्तिकों का मूल सिद्धांत यह कि किसी पूज्य का कोई अस्तित्व नहीं है और जीवन बस भौतिक संरचना का नाम है। उनके सिद्धांतों में आख़िरत, जन्नत, जहन्नम और सारे धर्मों का इनकार भी शामिल है। जो व्यक्ति उनकी किताबों को देखेगा और उनकी वस्तुस्थिति का अध्ययन करेगा, वह निश्चित रूप से इस वास्तविकता से अवगत हो जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी यह मान्यता सभी आसमानी धर्मों के विरोध करती है और अपने मानने वालों के लिए दुनिया एवं आख़िरत में भयानक परिणाम का सबब बनेगी।

सत्य विरोधी अक़ीदों में कुछ बातिनियों एवं सूफ़ियों का यह अक़ीदा भी शामिल है कि उनके तथाकथित औलिया संसार के संचालन में अल्लाह के साझी हैं और दुनिया के कामों में अपना भी इख़्तियार रखते हैं। इस तरह के लोगों को वे क़ुतुब, वतद और ग़ौस आदि नामों से जानते हैं, जो दरअसल उन्हीं के गढ़े हुए नाम हैं। यह, दरअसल स्वामी एवं पालनहार होने की हैसियत से अल्लाह का साझी ठहराने का सबसे बदतरीन उदाहरण है और अज्ञानता काल के अरबों के शिर्क से भी घिनावना शिर्क है। क्योंकि अरब के काफ़िरों ने किसी को अल्लाह की तरह प्रभु एवं पालनहार नहीं माना था। उन्होंने केवल उपासना में उसका साझी ठहराया था। साथ ही वे केवल ख़ुशहाली के समय अल्लाह का साझी ठहराते थे। जैसे की किसी कठिन परिस्थिति में आते, तो बस एक अल्लाह को पुकारने लगते थे। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "जब यह लोग नाव में सवार होते हैं, तो अल्लाह ही को पुकारते हैं, उसके लिए इबादत को खालिस करके। फिर जब वह उन्हें खुशकी की ओर बचा लाता है, तो उसी मसय शिर्क करने लगते हैं।" [सूरा अल-अनकबूत, आयत संख्या : 65] रही बात प्रभु एवं पालनहार होने की, तो वे मानते थे कि इसका अधिकार केवल अल्लाह को है। अल्लाह तआला ने कहा है : "यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया है, तो वे अवश्य यही उत्तर देंगे कि अल्लाह ने।" [सूरा अज़-ज़ुख़रुफ़, आयत संख्या : 87] एक अन्य स्थान में कहा है : "(हे नबी!) आप उनसे पूछें कि तुम्हें कौन आकाश तथा धरती से जीविका प्रदान करता है? सुनने तथा देखने की शक्तियाँ किसके अधिकार में हैं? कौन निर्जीव से जीव को तथा जीव से निर्जीव को निकालता है? वह कौन है, जो विश्व की व्यवस्था कर रहा है? वे कह देंगे कि अल्लाह! फिर कहो कि क्या तुम (सत्य के विरोध से) डरते नहीं हो?" [सूरा यूनुस, आयत संख्या : 31] क़ुरआन के अंदर इस आशय की आयतें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

वह बातें, जिनमें बाद के मुश्रिक पहले के मुश्रिकों से आगे बढ़ गए

जहाँ तक बाद के अनेकश्वरवादियों की बात है, तो वे दो बातों में पहले के अनेकश्वरवादियों से आगे बढ़ गए हैं। पहली बात : उनमें से कुछ लोगों ने अल्लाह के अतिरिक्त अन्य लोगों को प्रभु एवं पालनहार मान लिया है। दूसरी बात : वे खुशहाली एवं बदहाली दोनों परिस्थितियों में शिर्क करते हैं, जैसा कि उनके साथ रहने वाला और उनके हाल से अवगत हर व्यक्ति जानता है। आख़िर वे मिस्र में हुसैन और बदवी आदि की क़ब्रों के पास, अदन में ईदरोस की क़ब्र के पास, यमन में हादी की क़ब्र के पास, सीरिया में इब्न-ए-अरबी की क़ब्र के पास, इराक में शैख अब्दुल क़ादिर जीलानी की क़ब्र के पास तथा इनके अलावा अन्य प्रसिद्ध कब्रों के पास क्या कुछ नहीं करते!! इनके विषय में आम लोग बड़ी अतिशयोक्ति से काम लेते हैं और सर्वशक्तिमान अल्लाह के बहुत-से अधिकार इनको बेझिझक दिए जा रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, जो इन लोगों को टोकें और इन्हें उस तौहीद से अवगत कराएँ, जो अल्लाह के अंतिम नबी और उनसे पहले के सारे नबीगण लाए थे। हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह इस प्रकार के लोगों को सत्य का मार्ग दिखाए, उनके अंदर बड़ी संख्या में सत्य के प्रचारक पैदा कर दे और मुस्लिम रहनुमाओं को इस शिर्क का मुक़ाबला करने और इसके साधनों को समाप्त करने का सुयोग प्रदान करे। निश्चय ही वह सुनने वाला और निकट है।

सहीह अकीदा के विरुद्ध अकीदों में जहमिया एवं मोतज़िला तथा उनके पद्चिह्नों पर चलने वाले बिदअतियों का अक़ीदा भी शामिल है, जो सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के गुणों का इनकार करते हैं, उसे उसके गुणों से ख़ाली क़रार देते हैं तथा जड़ वस्तुओं की पंक्ति में ला खड़ा करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि अल्लाह उनकी इन बातों बहुत ही ऊँचा है। इसी दायरे में अशायरा जैसे वह लोग भी आ जाते हैं, जो अल्लाह के कुछ गुणों का इनकार करते हैं और कुछ गुणों को मानते हैं। क्योंकि उन्होंने जिन गुणों का इनकार किया और उनके प्रमाणों के गलत अर्थ बताए और इस तरह शरई एवं अक़्ली प्रमाणों की मुख़ालफ़त की एवं स्पष्ट रूप से अंतर्विरोध के शिकार हुए, उनको भी उन गुणों की तरह मानना ज़रूरी है, जिनको उन्होंने सिद्ध किया है। जबकि इन लोगों के विपरीत, अह्ल-ए-सुन्नत व जमात ने अल्लाह के उन सभी नामों एवं गुणों को सिद्ध माना है, जिनको स्वयं अल्लाह या फिर उसके रसूल मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- ने साबित किया है। इसी तरह अल्लाह को उसकी सृष्टि की समानता से इस तरह पाक व पवित्र माना है कि उसे गुणविहीण करने की शंका तक पैदा न होती हो। इस तरह, उन्होंने सारे प्रमाणों पर अमल किया, उनके अर्थ के साथ छेड़छाड़ से गुरेज़ किया, अल्लाह को गुणविहीन बताने से खुद को बचाया और उस विरोधाभास से सुरक्षित रहे, जिसके अन्य लोग शिकार हो गए हैं। दरअसल यही मुक्ति का मार्ग, दुनिया एवं आख़िरत की सफलता का रहस्य और वह सीधा रास्ता है, जिसपर इस उम्मत के सदाचारी पूर्वज एवं इमामगण चलते आए हैं। जबकि इस उम्मत के बाद के लोगों की सफलता उसी मार्ग पर चलने में निहित है, जिसपर उसके पहले दौर के लोगों ने चलकर दिखाया है। वह मार्ग है, क़ुरआन एवं हदीस के अनुसरण एवं उनके विपरीत चीज़ों को छोड़ने का मार्ग।

एक अल्लाह की इबादत के अनिवार्य होने तथा अल्लाह के शत्रुओं पर सफलता प्राप्त करने के साधणों का वर्णन

एक बंदे की सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेवारी यह है कि वह अपने उच्च एवं पवित्र पालनहार की वंदना करे, जो आकाशों एवं धरती और महान अर्श का रब है और जिसने अपनी पुस्तक में कहा है : "तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में बनाया, फिर अर्श (सिंहासन) पर स्थित हो गया। वह रात्रि से दिन को ढक देता है। दिन उसके पीछे दौड़ता हुआ आ जाता है। सूर्य तथा चाँद और तारे उसकी आज्ञा के अधीन हैं। सुन लो! वही उत्पत्तिकार है और वही शासक है। वही अल्लाह अति शुभ, संसार का पालनहार है।" [सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 54] उसने अपनी किताब के एक अन्य स्थान में कहा है कि उसने इनसान एवं जिन्नात को केवल अपनी इबादत के पैदा किया है। उसका फ़रमान है : "मैं ने जिन्न और इनसान को इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी उपासना करें।" [सूरा अज़-ज़ारियात, आयत संख्या : 56] याद रहे कि अल्लाह तआला ने जिस इबादत के लिए इनसान तथा जिन्नात को पैदा किया है, वह यह है कि नमाज़, रोज़ा, रुकू, सजदा, तवाफ, क़ुरबानी, मन्नत, डर, आशा, सहायता माँगना और शरण माँगना आदि इबादत के सारे कार्यों को केवल अल्लाह के लिए किया जाए। इसी तरह, इबादत के दायरे में अल्लाह की किताब एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस में आए हुए अल्लाह के सारे आदेशों का पालन और उसकी तमाम मनाहियों से दूर रहना भी आता है। अल्लाह ने इसी इबादत के लिए सारे इनसानों और जिन्नों की रचना की और उसके बाद उसे बयान करने, उसकी ओर लोगों को बुलाने और उसे विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए करने का आदेश देने के लिए रसूल भेजे और किताबें उतारीं। उसका फ़रमान है : "ऐ लोगों, अपने उस पालनहार की इबादत करो जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, इसी में तुम्हारा बचाव है।" [सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 21] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "और तुम्हारे पालनहार का फ़ैसला है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो और माता-पिता के साथ अच्छा व्यावहार करो।" [सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 23] इस आयत में आए हुए "قَضَى" शब्द का अर्थ है, उसने आदेश दिया है तथा वसीयत की है। एक और जगह वह फ़रमाता है : "और उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे धर्म को शुद्ध रखें और सबको तज कर केवल अल्लाह की उपासना करें, नमाज़ अदा करें और ज़कात दें और यही शाश्वत धर्म है।" [सूरा अल-बय्यिना, आयत संख्या : 5] इस आशय की आयतें पवित्र क़ुरआन की अंदर बड़ी संख्या में मौजूद हैं। चुनांचे उसका फ़रमान है : "और रसूल जो प्रदान कर दे, तुम उसे ले लो और जिससे तुम्हें रोक दे, तुम उससे रुक जाओ तथा अल्लाह से डरते रहो। निश्चय अल्लाह कड़ी यातना देने वाला है।" [सूरा अल-हश्र, आयत संख्या : 7] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "हे ईमान वालो! अल्लाह की आज्ञा का अनुपालन करो और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो तथा अपने शासकों का आज्ञापालन करो। फिर यदि किसी बात में तुम आपस में विवाद (विभेद) कर लो, तो उसे अल्लाह और रसूल की ओर फेर दो, यदि तुम अल्लाह तथा अन्तिम दिन (प्रलय) पर ईमान रखते हो। यह तुम्हारे लिए अच्छा और इसका परिणाम अच्छा है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 59] एक और जगह वह फ़रमाता है : "जो रसूल के आदेश का पालन करता है, वह अल्लाह का आज्ञाकारी है।" [सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 80]

इसी तरह वह कहता है : "हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि (लोगों) केवल अल्लाह की उपासना करो और उसके अलावा सभी पूज्यों से दूर रहोl" [सूरा अन-नह़्ल, आयत संख्या : 36] उसने एक और स्थान में कहा है : "हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा उसकी ओर यही वह्य (प्रकाशना) उतारी कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अतः तुम सब मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया, आयत संख्या : 25] एक और स्थान में कहा है : "अलिफ़ लाम रा। यह एक ऐसाी किताब है कि इसकी आयतें सुदृढ़ की गई हैं, फिर साफ-साफ बयान की गई हैं, एक हिकमत वाले (तथा) जानने वाले की ओर से। यह कि अल्लाह के सिवा किसी की उपासना मत करो। मैं तुमको अल्लाह की ओर से डराने वाला और शुभ सूचना देने वाला हूँ।" [सूरा हूद, आयत संख्या : 1-2]

ये सुदृढ़ आयतें और अल्लाह की किताब में मौजूद इस आशय की अन्य सारी आयतें इस बात को प्रमाणित करती हैं कि सारी इबादतें केवल एक अल्लाह के लिए होनी चाहिए और यही इस्लाम का मूल सिद्धांत और उसकी आधारशिला है। साथ ही इस बात को भी स्पष्ट करती हैं कि इनसान एवं जिन्न की रचना, रसूलों को भेजने और किताबें उतारने का उद्देश्य भी यही है। अतः, सारे मतिमान एवं वयस्क लोगों पर वाजिब है कि एक अल्लाह की इबादत पर विशेष तवज्जो दें, इस मसले को खूब अच्छी तरह समझें और नबियों एवं सदाचारी बंदों के बारे में अतिशयोक्ति, उनकी क़ब्रों पर भवन एवं गुंबद के निर्माण, उनसे मुरादें माँगने, फ़रियाद करने, उनकी शरण लेने, उनसे ज़रूरत की चीज़ें माँगने, परेशानियों से छुटकारा तलब करने, स्वास्थ्य लाभ एवं शत्रुओं पर विजय माँगने जैसे भाँत-भाँत के शिर्क से, जिनमें बहुत-से तथाकथित मुसलमान पड़े हुए हैं, सावधान रहें। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सहीह हदीसों से भी पवित्र क़ुरआन की इन आयतों की पुष्टि होती है। चुनांचे सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे फ़रमाया : "क्या तुझे पता है कि बन्दों पर अल्लाह का क्या अधिकार है और अल्लाह पर बन्दों का क्या अधिकार है? मुआज़ कहते हैं कि मैंने कहा : अल्लाह और उसका रसूल अधिक जानता है। यह सुन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "बन्दों पर अल्लाह का अधिकार यह है कि वे उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ, जबकि अल्लाह पर बन्दों का अधिकार यह है कि जो किसी को उसका साझी न बनाए, वह उसे यातना न दे।" [7] जबकि सहीह बुखारी में अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि वह किसी को अल्लाह का समकक्ष बनाकर उसे पुकार रहा था, तो वह नरक में प्रवेश करेगा।" [8] तथा इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित किया है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी न बनाया होगा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जो उससे इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी ठहराया होगा, वह जहन्नम में प्रवेश करेगा।" [9] हदीस की किताबों में इस आशय की बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं। हों भी क्यों ना! यह मसला है भी तो बड़ा महत्वपूर्ण। अल्लाह तआला ने अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भेजा ही इसलिए था कि लोगों को एकेश्वरवाद की ओर बुलाएँ और अनेकेश्वरवाद से रोकें। फिर, आपने अपने कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा के साथ किया। इस मार्ग में बड़ी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन धैर्य से काम लिया। आपके साथ-साथ आपके साथियों ने भी बड़ी मज़बूती से दुनिया को एकेश्वरवाद का संदेश पहुँचाया। फलस्वरूप अरब प्रायद्वीप बुतपरस्ती से स्वच्छ हो गया, लोग गिरोह दर गिरोह अल्लाह के धर्म में प्रवेश करने लगे, अल्लाह के घर काब के अंदर और बाहर रखे हुए बुत तोड़ दिए गए, लात, उज़्ज़ा एवं मनात ढहा दिए गए, विभिन्न अरब क़बीलों के अलग-अलग बुत भी तोड़ दिए गए और इस तरह, एकेश्वरवाद का वर्चस्व सिद्ध हो गया तथा अरब प्रायद्वीप के अंदर इस्लाम का डंका बजने लगा। इसके बाद आपके साथियों ने अरब प्रायद्वीप के बाहर आह्वान एवं जिहाद का कार्य शुरू किया। अल्लाह ने भी उनकी इन कोशिशों में बड़ी बरकत दी और धरती के अधिकतर भागों में सत्य एवं न्याय का परचम लहराने लगा। अपनी इन सफल कोशिशों के कारण वे मार्गदर्शन के अगुआ, सत्य के पथ-प्रदर्शक तथा न्याय एवं सुधार के अग्रगामी बन गए। फिर उनके अनुयायी और उनके बाद उनके अनुसरणकारी भी सत्य के प्रचारक की भूमिका में अल्लाह के धर्म को फैलाते रहे, लोगों को एकेश्वरवाद का मार्ग दिखाते रहे और अपने प्राण एवं धन के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद करते रहे। उन्होंने अल्लाह के धर्म के प्रचार में किसी की कोई परवाह नहीं की। फलस्वरूप उन्हें अल्लाह का समर्थन प्राप्त हुआ, एक विजय के बाद दूसरी विजय प्राप्त होती गई और इस तरह अल्लाह का वह वचन पूरा हो गया, जो उसने अपने इस कथन में दिया था : "हे ईमान वालो! यदि तुम अल्लाह (के धर्म) की सहायता करोगे, तो वह तुम्हारी सहायता करेगा तथा तुम्हारे पैरों को स्थिरता प्रदान करेगा।" [सूरा मुहम्मद, आयत संख्या : 7] इसी तरह एक अन्य स्थान में उसने कहा था : "और अल्लाह अवश्य उसकी सहायता करेगा, जो उस (के सत्य) की सहायता करेगा। वास्तव में, अल्लाह अति शक्तिशाली, प्रभुत्वशाली है। ये वो लोग हैं कि यदि हम इन्हें धरती में अधिपत्य प्रदान कर दें, तो नमाज़ की स्थापना करेंगे, ज़कात देंगे, भलाई का आदेश देंगे औप बुराई से रोकेंगे। और अल्लाह के अधिकार में है सब कर्मों का परिणाम।" [सूरा अल-हज्ज, आयत संख्या : 40-41] फिर इसके बाद लोग बदल गए, अलग-अलग समुदायों में बँट गए, जिहाद को छोड़ छोड़ बैठे, आराम को तरजीह दी, आकांक्षाओं की पीछे भागने लगे और अपने अंदर बुराइयों को फैलने दिया। फलस्वरूप अल्लाह ने भी परिस्थिति को उनके लिए प्रतिकूल कर दिया और उनपर दुश्मन को हावी बना दिया। दरअसल यह उनके कर्मों ही का नतीजा है। वरना, अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार नहीं करता। उसका फ़रमान है : "अल्लाह का यह नियम है कि वह उस पुरस्कार में परिवर्तन करने वाला नहीं है, जो किसी जाति पर किया हो, जब तक वह स्वयं अपनी दशा में परिवर्तन न कर ले।" [सूरा अल-अनफ़ाल, आयत संख्या : 53] अतः तमाम मुसलमानों को, सरकारें हों कि आम लोग, अनिवार्य रूप से अल्लाह की ओर लौटना चाहिए, विशुद्ध रूप से उसकी इबादत करनी चाहिए, अपनी कोताहियों और गुनाहों से उसके सामने तौबा करनी चाहिए, अल्लाह ने जो चीज़ें फ़र्ज़ की हैं उनका पालन करना चाहिए और जो चीज़ें हराम की हैं उनसे दूर रहना चाहिए, एक-दूसरे को धर्म के पालन का आदेश देना चाहिए और इस संबंध में परस्पर सहयोग करना चाहिए। [7] सहीह बुख़ारी, अल-इसतिज़ान (हदीस संख्या : 5912), सहीह मुस्लिम, अल-ईमान (हदीस संख्या : 30), सुनन तिरमिज़ी, अल-ईमान (हदीस संख्या : 2643), इब्न-ए-माजा, अज़-ज़ुह्द (हदीस संख्या : 4296) तथा मुसनद अहमद (5/238)। [8] सहीह बुख़ारी, तफ़सीर अल-क़ुरआन (दीस संख्या : 4227) सहीह मुस्लिम, ईमान ( हदीस संख्या: 92) तथा मुसनद अहमद (1/374)। [9] सहीह बुख़ारी, अल-इल्म (हदीस संख्या : 129), सहीह मुस्लिम, अल-ईमान (हदीस संख्या : 32) तथा मुसनद अहमद (3/157)।

मुख्य रूप से शरई दंड संहिता को स्थापित करने, जीवन के सभी क्षेत्रों में शरीयत को लागू करने, मानवरचित तथा शरीयत विरोधी संविधानों को निष्प्रभावी बनाने और सभी समुदायों को शरीयत के अनुपालन पर बाध्य करने पर ध्यान देना चाहिए। इसी तरह उलेमा का कर्तव्य है कि लोगों के अंदर धर्म की समझ विकसित करें, उन्हें धर्म के प्रति जागरुक करें, एक-दूसरे को सत्य का पालन करने और उसपर जमे रहने को कहें, भलाई का आदेश दें तथा बुराई से रोकें एवं शासकों को इसके के लिए प्रेरित करें। इसी तरह उनका कर्तव्य है कि साम्यवाद एवं बासवाद आदि विनाशकारी सिद्धांतों का डटकर मुक़ाबला करें और राष्ट्रीयताओं पर आधारित असहिष्णुता जैसे शरीयत विरोधी रुझानों का पूरी ताक़त से सामना करें। यदि ऐसा होता है, तो अल्लाह मुसलमानों की स्थिति सही कर देगा, उनका खोया हुआ गौरव वापस कर देगा, उन्हें श्त्रुओं पर विजय प्रदान करेगा और फिर धरती पर उनका बोलबाला हो जाएगा। अल्लाह तआला ने, जो सबसे सच्चा है, कहा है : "ईमान वालों की सहायता करना हमपर अनिवार्य है।" [सूरा अर-रूम, आयत संख्या : 47] एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "अल्लाह ने तुममें से उन लोगों को वचन दिया है, जो ईमान लाएँ तथा सुकर्म करें कि उन्हें अवश्य ही धरती में अधिकार प्रदान करेगा, जैसे उन लोगों को अधिकार प्रदान किया था, जो इनसे पहले थे तथा अवश्य ही उनके उस धर्म को सुदृढ़ कर देगा, जिसे उनके लिए पसंद किया है तथा उन (की दशा) को उनके भय के पश्चात् शान्ति में बदल देगा। वे मेरी इबादत (वंदना) करते रहें और किसी चीज़ को मेरा साझी न बनाएँ और जो इसके पश्चात कुफ़्र करे, तो इस प्रकार के लोग ही उल्लंघनकारी लोग हैं।" [सूरा अन-नूर, आयत संख्या : 55] एक और जगह वह कहता है : "निःसंदेह हम अपने रसूलों और ईमान वालों की सांसारिक जीवन में सहायता करेंगे और उस दिन भी, जब साक्षी खड़े होंगे।" [सूरा ग़ाफ़िर, आयत संख्या : 51] "जिस दिन अत्याचारियों को उनके बहाने लाभ नहीं पहूँचाएँगे। उनके लिए धिक्कार और बुरा ठिकाना है।" [सूरा ग़ाफ़िर, आयत संख्या : 52]

अल्लाह से दुआ है कि वह मुस्लिम रहनुमाओं और जनसाधारण को सुधार के मार्ग पर लगाए, उन्हें धर्म की समझ प्रदान करे, धर्मशील बनाए, अपने सीधे मार्ग पर चलाए, सत्य के पक्ष में खड़ा करे, उनके द्वारा असत्य का विनाश करे तथा उन्हें भलाई, धर्मशीलता, एक-दूसरे को सत्य का आदेश देने और उसपर सुदृढ़ रहने का सुयोग प्रदान करे। वही है, जिसके पास सुयोग प्रदान की शक्ति एवं क्षमता है। दरूद व सलाम हो अल्लाह के बंदे, उसके रसूल, उसकी श्रेष्ठतम सृष्टि, हमारे नबी एवं इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह, उनके परिजनों, साथियों एवं उनके पद्चिह्नों पर चलने वाले लोगों पर।