هل سألت نفسك؟ من خلقك؟ ولماذا؟ وماذا بعد الموت؟
كتاب: هل سألت نفسك ؟ من خلقك؟ ولماذا ؟ وماذا بعد الموت؟ كتاب مختصر يتحدث عن إجابة أسئلة الإنسان الوجودية ويحرك الفطرة بضرب بعض الأمثلة والحجج العقلية وبيان دلائل الإسلام بأسلوب مختصر.
क्या आपने स्वयं अपने आप से कभी पूछा है? आपको किसने पैदा किया? और क्यों? और मृत्यु के बाद क्या होगा?
अध्ययन समिति, अंतर्गत बहुभाषी इस्लामी सामग्री सेवा संगठन
आपको किसने पैदा किया, हे मनुष्य? यदि आप अपने शरीर को सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखें, तो आप सूक्ष्मता और चमत्कार का एक संसार देखेंगे। आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका में जटिल कोडों पर आधारित आनुवंशिक जानकारी होती है। क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है कि इन कोडों को किसने लिखा? और इन्हें सही स्थान पर किसने रखा?
हर ऊँची इमारत और हर साधारण घर अपने निर्माता की कहानी कहता है; क्या यह समझदारी की बात है कि यह विशाल ब्रह्मांड अपनी सुंदरता, सूक्ष्मता और व्यवस्थित विवरणों के साथ बिना किसी निर्माता के अस्तित्व में आ गया हो?!
हे मानव, जैसे तुम्हारा विवेक यह स्वीकार नहीं करता कि एक परिपूर्ण रूप से निर्मित स्मार्टफोन अचानक बिना किसी डिज़ाइनर या निर्माता के प्रकट हो गया, या यह कि उपकरणों का एक जटिल नेटवर्क बिना किसी प्रोग्रामर या पर्यवेक्षक के तालमेल और सटीकता से कार्य कर रहा है, वैसे ही विवेक यह स्वीकार नहीं करता कि यह विशाल ब्रह्मांड, अपनी समस्त व्यवस्था, सृजनशीलता, सटीक नियमों और परिपूर्ण प्रणाली के साथ, बिना किसी रचयिता के अस्तित्व में आया?!
इस ब्रह्माण्ड का हर अंश, सबसे छोटे परमाणु से लेकर सबसे बड़ी आकाशगंगा तक, अपने स्रष्टा की महानता की ओर संकेत करता है; यह तार्किक तौर पर असंभव है कि यह सूक्ष्म प्रणाली अराजकता से उत्पन्न हुई हो। बुद्धि यह स्वीकार नहीं करती कि यह ब्रह्माण्ड शून्य से उत्पन्न हुआ है, या कि यह अद्भुत जटिल प्रणाली एक अंधे संयोग का परिणाम है!
जैसे सही विवेक और शुद्ध फ़ितरत इनसान को ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता के अस्तित्व पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं, वैसे ही वे हमें इस सृष्टिकर्ता के गुणों और हमारे ऊपर उसके अधिकारों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।
इस सृष्टिकर्ता के गुणों पर चिंतन करना हमारे लिए गहरी समझ के यह द्वार खोलता है, कि इस सृष्टिकर्ता का पूर्ण पूर्णता से विशेषित होना और हर प्रकार की कमी से पाक होना आवश्यक है।
इसका अर्थ यह है कि सृष्टिकर्ता में सुंदरता और महानता के सभी गुण विद्यमान हैं।। वह हर चीज़ पर क़ाबू रखने वाला, हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला और अपनी हर रचना और निर्णय में हिकमत वाला है। यह पूर्णता केवल एक संभावना नहीं बल्कि एक बौद्धिक आवश्यकता है (यानी ऐसा होना आवश्यक है), क्योंकि उसकी विशेषताओं में कोई कमी सृष्टि और संचालन में गड़बड़ी का कारण बनेगी, जो इस ब्रह्मांड में देखी जाने वाली सुदृढ़ता के विपरीत है।
इसी तरह कमी से पाक होना यह दर्शाता है कि सृष्टिकर्ता अपनी सृष्टियों से बेनियाज़ है, उसे किसी की ज़रूरत नहीं है, लिकिन सभी अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए उसी के मोहताज हैं। वह साझेदार और संतान से पाक है; क्योंकि ये दोनों कमी और असमर्थता के प्रतीक हैं, और सर्वशक्तिमान तथा महान अल्लाह इन सबसे पाक है।
तो जब अल्लाह ही महान सृष्टिकर्ता है, जो पूर्णता और महानता के गुणों से युक्त है, जो हमें और इस ब्रह्मांड को अनस्तित्व से अस्तित्व में लाया है, जो इसके अंदर मौजूद सारी चीज़ों का मालिक है, जो हमें रोज़ी देता है और अपनी दया से हमें घेरे हुए है, जो हर चीज़ का प्रबंधक और संचालक है; तो क्या हमें उसका शुक्रिया अदा नहीं करना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि हम उसकी प्रसन्नता कैसे प्राप्त करें तथा हम उसके प्रति अपने कर्तव्य को कैसे पूरा करें और उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कैसे काम करें जिसके लिए हमें पैदा किया गया है?!
क्या यह तर्कसंगत है कि अल्लाह ने हमें पैदा किया और फिर यह नहीं बताया कि वह हमसे क्या चाहता है? हम यहाँ क्यों हैं? हमारे जीवन में अस्तित्व का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है? मौत के बाद हमारे साथ क्या होगा?
कल्पना करो कि यदि कोई व्यक्ति एक शानदार महल बनाता है और उसे नवीनतम तकनीकी साधनों से सुसज्जित करता है, और फिर बिना किसी कारण के अचानक उसे पूरी तरह से ध्वस्त कर देता है। क्या हम ऐसे व्यक्ति को हिकमत और तत्त्व ज्ञान वाला कह सकते हैं? क्या यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा कार्य व्यर्थ और बुद्धिमान व्यक्ति के लिए अनुपयुक्त माना जाए?
तो अगर यह कार्य किसी इंसान के से स्वीकार्य नहीं है, तो हम कैसे सोच सकते हैं कि अल्लाह, जो हिकमत वाला और सब कुछ जानने वाला है, उसने इस अद्भुत ब्रह्मांड को सृजनशीलता और सटीकता से बनाया और फिर उसे बिना किसी उद्देश्य या हिकमत के नष्ट कर देगा?
अल्लाह ने इंसानों को एक महान हिकमत के तहत पैदा किया है, और वह हिकमत है केवल उसी की इबादत करना, उसका कोई साझी न बनाना। उसने उन्हें इस दुनिया में आज़माने के लिए पैदा किया है और उनके लिए एक समय निर्धारित किया है जब वे क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाएँगे ताकि उनके कर्मों का हिसाब लिया जा सके। जो अल्लाह पर ईमान लाया और उसकी दावत को स्वीकार किया, उसके लिए जन्नत की नेमतें हैं, जिसमें वह हमेशा रहेगा। और जो सत्य से मुँह मोड़ेगा, वह जहन्नम वालों में से होगा।
इबादत हमारा अनिवार्य कर्तव्य है क्योंकि यह हमारे अस्तित्व का उद्देश्य है। यह अल्लाह की प्रभुता और पूज्यता को स्वीकार करने और उसके प्रति आभार प्रकट करने का प्रमाण है।
ध्यान दो कि अल्लाह ही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें सुनने और देखने की क्षमता प्रदान की, और तुम्हें अनगिनत नेमतों से नवाज़ा। वही है जो तुम्हारी नसों में खून बहाता है, और तुम्हें पानी और हवा की जीविका प्रदान करता है, और तुम्हें हर पल उसकी आवश्यकता है। उसकी रहमत और देखभाल के बिना, तुम नष्ट हो जाते और तुम्हारी शक्ति समाप्त हो जाती। बल्कि, वही है जिसने तुम्हारे लिए तुम्हारी माँ के पेट में, जब तुम एक असहाय भ्रूण थे और अपने मामले में कुछ भी नहीं कर सकते थे, जीविका की व्यवस्था की।
क्या यह महान सृष्टिकर्ता इस बात का हक़दार नहीं है कि उसकी इबादत उसी तरह की जाए, जैसा वह चाहता है, न कि जैसा आप चाहते हैं? सोचिए, अगर आप अपनी माँ को कोई उपहार देना चाहें, तो क्या आप वही चुनेंगे जो आपको पसंद है, या आप यह जानने की कोशिश करेंगे कि उन्हें क्या पसंद है ताकि आप उन्हें वह दे सकें जो उनके लिए उपयुक्त हो? इसी तरह, अल्लाह की इबादत भी हमारे मनमुताबिक़ या हमारी परंपरागत आदतों के अनुसार नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसी तरह होनी चाहिए जैसा उसने चाहा है और जिस तरह से उसने हमें आदेश दिया है।
इबादत केवल अल्लाह तआला के लिए विशुद्ध होनी चाहिए, जिसका कोई साझी नहीं। इंसान के लिए यह उचित नहीं है कि वह अपने सृष्टिकर्ता के सिवा किसी और की इबादत करे। सबसे बड़ा गुनाह जो सदैव के लिए नरक का कारण बनता है, वह किसी को अल्लाह का साझी बनाना है। अर्थात इंसान अल्लाह के सिवा उसकी मखलूकात में से किसी की इबादत करे, जैसे मूर्तियों, सूरज, चाँद, इंसान, जानवर या किसी नेक व्यक्ति की इबादत करना। यह सब शिर्क और कुफ्र के प्रकार हैं। और जो इस स्थिति में मर गया, उसका अंजाम जहन्नम की आग में सदैव के लिए रहना है।
अल्लाह ने बहुत से नबी और रसूल भेजे ताकि वे हमें इस दुनिया में हमारे अस्तित्व के उद्देश्य और जीवन के लक्ष्य के बारे में बताएं। सभी रसूलों का संदेश एक ही था, और वह था इस्लाम का संदेश और केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाना, जिसका कोई साझी नहीं। लेकिन कुछ लोगों ने पूर्ववर्ती रसूलों के लाए हुए संदेश में परिवर्तन और विकृति कर दी। इसलिए अल्लाह ने अंतिम रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भेजा और उन पर मानवता के लिए अंतिम संदेश, पवित्र क़ुरआन, उतारा। बहुत से बौद्धिक और वैज्ञानिक प्रमाण हैं जो साबित करते हैं कि क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, और यह एकमात्र किताब है जो विकृति और परिवर्तन से सुरक्षित है। अल्लाह ने क़ुरआन में हमें बताया है कि वह इस्लाम के अलावा किसी और धर्म को स्वीकार नहीं करेगा और सभी रसूलों का संदेश एक ही था, जो कि एकेश्वरवाद की ओर बुलाना और केवल एक अल्लाह की इबादत करना था, जिसका कोई साझी नहीं। अल्लाह ने क़ुरआन में यह भी बताया है कि ईमान वालों के लिए जन्नत और अनंत सुख होगा, और जो अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करेगा या इस्लाम में प्रवेश करने से इंकार करेगा, उसके लिए आग और दर्दनाक यातना होगी।
इस्लाम को अन्य धर्मों से जो बात अलग करती है, वह यह है कि केवल मुसलमान ही तर्कसंगत प्रमाण और वैज्ञानिक तथ्यों को प्रस्तुत करने में सक्षम हैं, विश्वसनीय ज्ञान के स्रोतों पर भरोसा करते हुए, यह साबित करने के लिए कि आज उनके हाथों में जो पवित्र क़ुरआन है, वह सृष्टिकर्ता अल्लाह की वाणी है, जो परिवर्तन और विकृति से सुरक्षित है।
अतः पवित्र क़ुरआन ही वह ग्रंथ है जिसे अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा है। अल्लाह ने इसे लेकर मानव जाति को चौदह सौ से अधिक वर्षों से चुनौती दी है कि वे इसके जैसी कोई किताब या उसके जैसी एक सूरत ही लाकर दिखाएँ, लेकिन वे ऐसा करने में असमर्थ रहे हैं। यह चुनौती आज भी क़ायम है और कोई भी इसकी वाक्पटुता, स्पष्टता, चमत्कारिकता और विधि-विधान के समान कुछ प्रस्तुत नहीं कर सका है। युगों-युगों से कोई भी इसके समान या इससे मिलता जुलता भी कुछ नहीं ला सका है। क़ुरआन का चमत्कार केवल उसकी भाषा में नहीं है, जो वाक्पटुता और स्पष्टता की चरम सीमा पर है, बल्कि इसमें ऐसे तार्किक और वैज्ञानिक प्रमाण भी शामिल हैं जो यह पुष्टि करते हैं कि यह अल्लाह की वाणी है। यदि पवित्र क़ुरआन में स्पष्ट प्रमाण हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि यह अल्लाह की वाणी है, तो तर्कसंगत और बुद्धिमानी यही है कि इस पर विश्वास किया जाए और इसमें जो कुछ आया है उसका पालन किया जाए, बजाय उन पुस्तकों पर निर्भर रहने के जो मानव हस्तक्षेप से प्रभावित हुई हैं।
इस प्रकार, सही विवेक हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि उस महान स्रष्टा की वाणी, जिसने इस ब्रह्मांड की रचना की और उसके नियमों को पूर्णता से स्थापित किया, सत्य को जानने का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। जब हम क़ुरआन में भाषा का यह चमत्कार, वैज्ञानिक सत्य, और संपूर्ण विधानों को पाते हैं, साथ ही यह भी देखते हैं कि यह सदियों से विकृति से सुरक्षित है, तो इसे अल्लाह का वचन मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
इसलिए क़ुरआन में जो कुछ आया है उसपर ईमान लाना केवल एक आस्था का विकल्प नहीं है, बल्कि यह सच्चाइयों की खोज के तर्क के साथ मेल खाता एक विवेकपूर्ण निर्णय है।
और अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम में स्पष्ट कर दिया है कि उसने हमें व्यर्थ नहीं पैदा किया, बल्कि केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।
अल्लाह ने हमें क़ुरआन में बताया है कि यह सांसारिक जीवन जो हम जी रहे हैं, एक अस्थायी चरण है जो शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा, लेकिन वास्तविक और शाश्वत जीवन आख़िरत में होगा जब ईमान वाले जन्नत में प्रवेश करेंगे और काफ़िर आग में प्रवेश करेंगे।
अतः जिसने हमें शून्य से उत्पन्न किया, वह निश्चित रूप से हमें मृत्यु के बाद पुनर्जीवित करने में सक्षम है। हमारे चारों ओर ब्रह्मांड में अल्लाह की निशानियों में, हम अल्लाह की असीम शक्ति का ठोस प्रमाण देखते हैं कि वह मृत को पुनर्जीवित कर सकता है। जैसे अल्लाह हरे पेड़ से आग निकालता है, सूखी धरती से फसल और फल निकालता है और माँ के गर्भ में वीर्य से भ्रूण की रचना करता है, वैसे ही वह मृतकों को पुनर्जीवित करने और उन्हें क़ब्रों से उठाने में सक्षम है ताकि क़यामत के दिन उन्हें बदला दिया जा सके। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर समार्थ्यवान है। और यह अन्याय और अत्याचार होगा कि अत्याचारी और पीड़ित का जीवन बिना हिसाब या बदले के समाप्त हो जाए।
इन्सान यह सवाल कर सकता है कि इस्लाम ही क्यों, अन्य धर्म क्यों नहीं?
मनुष्य को अन्य सृष्टियों से सबसे अधिक जो विशेष बनाता है, वह है बुद्धि, और इसकी भूमिका है विचार करना और सच्चाइयों की खोज करना।
इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो स्वस्थ विवेक एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुकूल है, यह जीवन के बड़े अस्तित्व संबंधी प्रश्नों के लिए तार्किक उत्तर प्रस्तुत करता है: हम यहाँ क्यों हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? और मृत्यु के बाद हमारा अंजाम क्या होगा?
इस्लाम का आधार सृष्टिकर्ता की एकमात्र इबादत को मान्यता देना और 'ला इलाहा इल्लल्लाह' की गवाही देना है। यह पहली गवाही है और इस्लाम में ईमान की असल बुनियाद है, जिसका अर्थ है कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।
इस गवाही में शामिल हैं:
तौहीद : अर्थात इस बात पर ईमान लाना कि केवल एक अल्लाह इबादत के योग्य है, उसका कोई साझी नहीं, न उसकी कोई संतान है और न ही उसका कोई समकक्ष है।
शिर्क से अलग होना: अर्थात् इंसानों द्वारा बनाए गए सभी बुतों और देवताओं का खंडन।
इस्लाम सभी रसूलों पर ईमान लाना अनिवार्य करता है। मुसलमान इस बात पर ईमान रखते हैं, जैसा कि अल्लाह ने क़ुरआन में बताया है, कि ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं और वह अल्लाह के बेटे नहीं हैं, क्योंकि महान अल्लाह इससे पवित्र है कि उसकी कोई पत्नी या संतान हो, वह इनसे और हर चीज़ से बेनियाज़ है। अल्लाह ने हमें क़ुरआन में यह सूचना दी है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) नबी थे जिनको अल्लाह ने बहुत से मोजिज़े (चमत्कार) प्रदान किए थे, और अल्लाह ने उन्हें इसलिए भेजा था कि अपने समुदाय के लोगों को केवल एक अल्लाह की पूजा करने का आमंत्रण दें, जिसका कोई साझी नहीं है। तथा अल्लाह ने हमें यह सूचना दी है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) ने लोगों को अपनी पूजा करने के लिए नहीं कहा था, बल्कि वह स्वयं अपने सृष्टिकर्ता (अल्लाह) की पूजा करते थे। यदि आप ईसा (अलैहिस्सलाम) पर उस सच्चाई के साथ ईमान लाना चाहते हैं जो अल्लाह को पसंद है, तो आपको इस्लाम में प्रवेश करना होगा।
अल्लाह ने हमें क़ुरआन में बताया है कि ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को केवल अल्लाह की इबादत करने का आदेश दिया और उन्हें शिर्क से सावधान किया।
क्या यह तर्कसंगत है कि विवेकी इन्सान अपने ही जैसे किसी सृष्टि की इबादत करे, जो भूख और प्यास का शिकार होती है और अपने लिए मौत या नुक़सान को टालने की ताक़त नहीं रखती?! कैसे तू, ऐ इन्सान, ईसा इब्न मरियम की इबादत करता है, जो एक इन्सान थे और जिन्हें खाने-पीने की ज़रूरत होती थी, और जो अपने सृष्टिकर्ता की इबादत में नमाज़ पढ़ते थे?! क्या विवेक इस बात की कल्पना कर सकता है कि ईश्वर अपने लिए नमाज़ पढ़े?! क्या अल्लाह वह नहीं है जो महानता से विभूषित है, अपनी पूर्णता में अद्वितीय है, और किसी भी समानता और समकक्षता से पाक है और ब्रह्माण्ड की हर चीज़ उसकी शक्ति और अधिकार के अधीन है ? क्या यह संभव है कि आकाशों और धरती का सृष्टिकर्ता एक बच्चे के रूप में जन्म ले, फिर अपने सृजितों को अपने ऊपर सूली चढ़ाने के लिए सौंप दे? जो सूली पर चढ़ाए जाते हैं और मारे जाते हैं, वे नश्वर मनुष्य हैं, जबकि सृष्टिकर्ता वह है जो जीवित है और कभी नहीं मरता, वह हर चीज़ को सँभालने वाला है, जिसे न ऊँघ आती है और न नींद। क्या यह उसकी महानता और महिमा की पूर्णता नहीं है कि वह ऐसी बातों से पाक हो?
अल्लाह ने हमें क़ुरआन करीम में बताया है कि सभी रसूल एक ही संदेश लेकर आए, जो उनके समुदायों को केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाने में निहित था, जिसका कोई साझी नहीं। लेकिन समय के साथ, कुछ लोगों ने इस शाश्वत संदेश को विकृत कर दिया, और उन नबियों द्वारा लाए गए एकेश्वरवाद के प्रकाश को धूमिल कर दिया। इसलिए अल्लाह ने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा और उनपर क़ुरआन करीम उतारा ताकि वे उन सभी रसूलों द्वारा पहले लाई गई एकेश्वरवाद के संदेश को पुनर्जीवित कर सकें।
और अंत में, हम तुमसे कहते हैं, हे मनुष्य:
इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो तर्क एवं प्रवृत्ति के अनुकूल है, और यह एकमात्र धर्म है जिसे महान स्रष्टा (अल्लाह) ने मानवता के लिए विधान बनाया है। इसलिए प्रत्येक तर्कसंगत व्यक्ति को फ़ौरन इस्लाम में प्रवेश करना चाहिए, अर्थात अल्लाह को अपना रब (उत्पत्तिकार, स्वामी, प्रबंधक) मानना, इस्लाम को अपना धर्म मानना और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपना रसूल (दूत) मानना चाहिए। यह एक ऐसा मामला है जिसमें व्यक्ति के पास इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि क़यामत के दिन अल्लाह उससे पूछेगा कि उसने रसूलों को क्या जवाब दिया। यदि वह मोमिन होगा तो महान सफलता एवं समृद्धि प्राप्त होगी, और यदि वह काफ़िर (अविश्वासी) होगा तो उसे गंभीर हानि होगी।
यदि आप दुनिया में सच्चा सुख और आख़िरत में सफलता चाहते हैं, तो जान लें कि आपके जीवन का सबसे महान निर्णय इस्लाम में प्रवेश करना है। इसके लिए आपको बस इन शब्दों को सच्चे दिल से और ईमान के साथ कहना होगा: "أشهد أن لا إله إلا الله، وأشهد أن محمدًا رسول الله" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं।) इसके बाद अपने दीन को सीखना शुरू करें और उन बातों पर अमल करें जो इन गवाहियों द्वारा अनिवार्य होती हैं, जैसे अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाना और इस्लाम के स्तंभों का पालन करना।
इसे अभी कहो, और संकोच मत करो; क्योंकि मौत अचानक आ सकती है, इसलिए इतने महत्वपूर्ण निर्णय को टालो मत। शैतान को यह अवसर मत दो कि वह तुम्हें भलाई से रोक सके। साहसी बनो, और प्रकाश और हिदायत की राह पर चलना शुरू करो।
अभी अपना निर्णय लें, और एक नए जीवन की शुरुआत करें जो शांति और संतोष से भरा होगा।
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं।