الصراط المستقيم

الصراط المستقيم

كتاب "الصراط المستقيم إلى الحقيقة" يُعِدّه القسم العلمي بجمعية خدمة المحتوى الإسلامي، يهدف إلى توجيه الناس إلى الطريق الصحيح الموصل للسعادة الحقيقية والنجاة في الدنيا والآخرة. يقدم الكتاب إجابات شاملة للأسئلة الوجودية الكبرى مثل: من الذي خلقنا؟ ولماذا جئنا؟ وأي دين هو الحق؟ كما يوضح مقومات الطريق المستقيم ويبين النتائج المترتبة على اتباعه أو الانحراف عنه. الكتاب يعتمد على الأدلة العقلية والنقلية لتأكيد وجود الله وربوبيته وألوهيته، مستعرضًا الآيات القرآنية والبراهين الفطرية والعقلية الدالة على ذلك.

Language: lang_hi
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सत्य का सीधा मार्ग

प्रस्तुति :वैज्ञानिक विभाग

अंतर्गत; विभिन्न भाषाओं में इस्लामी सामग्री सेवा संगठन

1445 हिजरी

भूमिका

अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत दयावान है।

सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो सारे संसार का रब है, तथा दया और शांती (दरूद व सलाम) अवतरित हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके तमाम परिजनों एवं साथियों पर। तत्पश्चात :

हमारी कोशिश होगी कि यह किताब सत्य मार्ग की मार्गदर्शक तथा दुनिया एवं आख़िरत की मुक्ति और वांछित ख़ुशी दिलाने वाली सच्चाई तक पहुँचाने का काम करे। इसमें इस मार्ग की निशानियों और इसकी मूल विशेषताओं का वर्णन है, शांति और सुरक्षा की ओर ले जाने वाले सुख के इस मार्ग पर चलने पर इन्सान को प्राप्त होने वाले सुंदर लाभों का ज़िक्र है और इस मार्ग से भटक जाने की स्थिति में सामने आने वाले घातक परिणाम और बड़ी हानि का उल्लेख है।

बात दरअसल यह है कि इन्सान जब माँ के पेट से बाहर आता है, तो उसे कुछ पता नहीं होता। लेकिन अल्लाह ने उसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए सुनने एवं देखने की शक्ति तथा हृदय प्रदान कर रखा होता है और विचार करने तथा समझने की क्षमता दे रखा होता है, ताकि सही मार्ग तलाश करे और सत्य को खोज निकाले। अल्लाह ने उसके स्वभाव में अच्छाई से प्रेम और बुराई से घृणा भी डाल रखी है।

यही कारण है कि वह सोचता रहता है, विभिन्न चीज़ों के बीच तुलना करता रहता है, सामने दिखने वाली चीज़ों को उनके पीछे काम कर रहे कारणों से जोड़ने की कोशिश करता रहता है, परिणामों के सामने आने से पहले ही उनको जानने का प्रयास करता रहता है, ख़तरों से बचना चाहता है, खुद को नुक़सानों से बचाना चाहता है और इस दौरान उसके सामने अस्तित्व से संबंधित हैरान करने वाले बहुत-से प्रश्न आते रहते हैं।

इस किताब में आपको, अल्लाह ने चाहा तो, इन्सान को हैरान करने वाले अस्तित्व संबंधी सभी प्रश्नों का सही उत्तर मिलेगा। जैसे :

हमें किसने पैदा किया?

हमारे चारों ओर के ब्रह्मांड को किसने बनाया?

हम क्यों आए?

हम कैसे आए?

हमें कहाँ जाना है?

क्या किसी धर्म का पालन करना ज़रूरी है?

क्या सत्य सारे धर्मों में मौजूद है या फिर किसी एक ही धर्म में?

सत्य कहाँ है? कौन-सा धर्म सच्चा है? किस धर्म का पालन करने से दुनिया एवं आख़िरत का सुख प्राप्त होगा?

सत्य एवं असत्य धर्म के बीच अंतर कैसे किया जाए?

क्या आज कोई सही आकाशीय ग्रंथ मौजूद है, जो सत्य का वर्णन करता हो, मानव जाति का सही मार्गदर्शन करता हो और उसे अल्लाह का प्रिय धर्म सिखाता हो?

क्या मेरे लिए सच्चे धर्म को जानना और उस तक पहुँचना अनिवार्य है?

इस संसार की रचना किसने की और उसके क्या-क्या गुण हैं?

हम उस तक कैसे पहुँचें और उसकी निकटता कैसे प्राप्त करें?

सुधार का काम करने वाले व्यक्तियों में से कौन-सा व्यक्ति सत्य पर था और किसका मार्ग सीधा मार्ग था?

हम अल्लाह के भेजे हुए सच्चे नबी और नबी होने का दावा करने वाले झूठे लोगों के बीच अंतर कैसे करें?

क्या हमारे द्वारा किए गए अच्छे एवं बुरे कामों का हमारे ऊपर कोई प्रभाव पड़ता है? क्या हमें इन कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा?

क्या इन्सान के कर्मों का हिसाब इसी जीवन के विभिन्न चक्रों में हो जाना है या इस जीवन से अलग एक और जीवन में होना है, जिसे आख़िरत का जीवन कहा जाता है?

इन प्रश्नों के उत्तर विभिन्न दर्शनों एवं धर्मों ने अलग-अलग दिए हैं। लेकिन विकृत एवं मानव रचित धर्मों तथा दर्शनों द्वारा इन प्रश्नों का उत्तर देने के सारे प्रयास सत्य तक पहुँचने में विफल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि सत्य क्या है? इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर क्या हैं?

आशा है कि इस किताब में आपको इन सारे प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जाएँगे। इस किताब का नाम हमने "सत्य का सीधा मार्ग" रखा है। क्योंकि सीधा मार्ग ही सबसे उत्तम मार्ग हुआ करता है, जो कम से कम समय में गंतव्य तक पहुँचा देता है। दूसरी बात यह है कि सत्य तक पहुँचने के लिए इन्सान रसूलों के बताए हुए मार्गों को छोड़ जितने मार्गों पर चलता है, सब टेढ़े-मेढ़े मार्ग हैं।

अब हम सबसे बड़े मुद्दे की ओर बढ़ते हैं, जिसमें पूरे इतिहास में भ्रम की स्थिति रही है। यह मुद्दा एक सर्वशक्तिमान एवं महान रब के अस्तित्व, रचना-प्रभुत्व- प्रबंधन, नामों, गुणों एवं पूज्य होने का मुद्दा है।

दुआ है कि अल्लाह हमें अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल बनाए। सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो सारे संसार का रब है। दरूद एवं सलाम हो अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, जो सारे संसार के लिए दया बनाकर भेजे गए थे।

पहला अनुभाग : रब (प्रभु), उसका आधिपत्य ,रचना और प्रबंधन, उसके नाम, उसके गुण एवं उसका पूज्य होना

पहली परिचर्चा :रब (प्रभु) के अस्तित्व के ऐसे प्रमाण, जो उसके रब (प्रभु) होने को सिद्ध करते हैं

रब का अस्तित्व इतना स्पष्ट है कि उसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इन्सान को अगर रब का अस्तित्व समझने के लिए प्रमाण की आवश्यकता पड़ती है तो यह इस बात का प्रमाण है कि वह इस महत्वपूर्ण विषय को समझ नहीं पा रहा है। क्योंकि रब का अस्तित्व अपरिहार्य है। मतलब यह कि जिस व्यक्ति का आचरण अपनी मूल प्रवृत्ति से डिगा नहीं है वह आवश्यक रूप से अल्लाह पर विश्वास रखेगा और इस विश्वास को वह अपनी अक़्ल एवं दिल से हटा नहीं सकता।

यह एक प्राकृतिक मसला भी है। यह विश्वास मानव जाति की प्रकृति में दाख़िल है। सारे लोग अल्लाह के अस्तित्व और उसके रब (प्रभु) एवं इबादत का हक़दार होने के विश्वास के साथ पैदा किए गए हैं। विचलन से सुरक्षित अक़्लें एक सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) के अस्तित्व पर विश्वास रखती हैं। सच्चाई यह है कि इस ब्रह्मांड की सबसे बड़ी सच्चाई एक सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) का वजूद, उसका सृष्टिकर्ता और बाकी सब का सृष्टि होना है। जबकि इन्सान के द्वारा बोला गया सबसे बड़ा झूठ अल्लाह का कोई साझी होने का दावा करना है और इससे भी बड़ा झूठ सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) का इनकार करना है। लेकिन इसके बावजूद हम सर्वशक्तिमान अल्लाह के अस्तित्व के कुछ प्रमाण प्रस्तुत करने जा रहे हैं। क्योंकि कुछ पाठक इस विषय में समकालीन संस्कृतियों में व्याप्त नास्तिक संदूषण के कारण भ्रम के शिकार हैं। इनमें से कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं :

सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह स्वयं ही अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा एवं महान साक्षी है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ((ऐ नबी!) आप (इन मुश्रिकों से) पूछें कि कौन-सी चीज़ गवाही में सबसे बड़ी है? आप कह दें कि अल्लाह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह है।) [सूरा अल-अनआम : 19] लेकिन जब हृदय एवं आँखें उसे जानने और उसके अस्तित्व एवं रब (प्रभु) होने के जलवे देखने से अंधी हो गई हों, तो अल्लाह को जानने और उसपर विश्वास रखने के कौन-से प्रमाण आप प्रस्तुत करेंगे? यही कारण है कि क़ुरआन के अनुसार रसूलों ने अपनी जातियों से कहा है : (क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह है, जो आकाशों तथा धरती का पैदा करने वाला है?) [सूरा इबराहीम : 10] अतः अल्लाह के मौजूद तथा रब (प्रभु) होने में कोई संदेह नहीं है। इसमें संदेह वही करेगा, जिसकी मूल प्रकृति भ्रष्ट हो चुकी है और विवेक मर चुका हो। हर सृष्टि सृष्टिकर्ता के अस्तित्व का प्रमाण है। हर वस्तु में अल्लाह के रब होने की निशानी मौजूद है। ऐसे में आँखें एवं हृदय हज़ारों साक्ष्यों एवं प्रमाणों को देखने से अंधे कैसे हो सकते हैं?

दूसरा : सृष्टियों का अस्तित्व एक बहुत बड़ा प्रमाण है सृष्टिकर्ता के अस्तित्व का। भला सृष्टि अपनी रचना कैसे कर सकती है? या किसी सृष्टिकर्ता के बिना सृष्टि का अस्तित्व कैसे सामने आ सकता है? किसने उसे इतना रचनात्मक रूप दिया, परिपूर्ण स्वरूप प्रदान किया, बेहतरीन शक्ल व सूरत दी, विवेक, हृदय, कान और आँख दी? क्या यह सब किसी सृष्टिकर्ता एवं रचयिता के बिना हो सकता है? यह बात हर किसी को पता है। हर कोई जानता है कि उसने स्वयं अपनी रचना नहीं की है और किसी सृष्टिकर्ता के बिना उसका अस्तित्व में आना संभव नहीं है। ऐसे में एक ही सत्य शेष रहता है। वह है, एक ऐसे रब (प्रभु) का अस्तित्व, जो इसकी क्षमता रखता हो। ऐसा रब पवित्र एवं उच्च अल्लाह है। इस प्रमाण के महत्व को देखते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने क़ुरआन में इसे स्थापित करते हुए कहा है : (या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।) [सूरा अल-तूर : 35-36] इस आयत में सृष्टिकर्ता के अस्तित्व का इनकार करने वालों से कई निरुत्तर कर देने वाले प्रश्न किए गए हैं। वे प्रश्न हैं :

- क्या इन्सान एवं अन्य सारी सृष्टियाँ बिना किसी उत्पत्तिकर्ता के पैदा की गई हैं?

- क्या इन्सान ही स्वयं अपना उत्पत्तिकार है और ब्रह्मांड की इन सारी चीज़ों की उत्पत्ति उसी ने की है?

- क्या इन्सान ने ही आकाशों एवं धरती की रचना की है?

उत्तर यह है कि नहीं। सच्ची बात यह है कि उसका एक उत्पत्तिकार है। उसी ने उसकी तथा आकाशों एवं धरती की उत्पत्ती की है। वही उतपत्तिकार रब (प्रभु) है जो सर्वशक्तिमान एवं महान है।

यह स्पष्ट सत्य (कि इस सृष्टि का एक रचयिता है) एक आवश्यक सत्य है, जिसे नकारा या जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

तसीरा : रब (प्रभु) के अस्तित्व का एक बहुत बड़ा प्रमाण आकाशों, धरती, उनके अंदर मौजूद अनगिनत बड़ी-बड़ी सृष्टियों तथा उनके बीच उपस्थित एक विशाल दुनिया की उत्पत्ति है, जिसकी खोज करने और जिसे जानने के प्रयास में आज भी इन्सान लगा हुआ है। यही कारण है कि सर्वशक्तिमान एवं महान रब (प्रभु) ने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा है : (सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने आकाशों तथा धरती को पैदा किया और अँधेरों और प्रकाश को बनाया, फिर (भी) वे लोग जिन्होंने कुफ़्र किया, अपने रब के साथ (दूसरों को) बराबर ठहराते हैं।) [सूरा अल-अनआम : 1] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने कहा है : (निश्चय ही आकाशों तथा धरती को पैदा करना, मनुष्य को पैदा करने से अधिक बड़ा (कार्य) है। परंतु अधिकतर लोग नहीं जानते।) [सूरा ग़ाफ़िर: 57] अगर यह सारी बड़ी-बड़ी सृष्टियाँ अल्लाह के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं करतीं, तो अक़्ल को उसके उत्पत्तिकर्ता का वजूद साबित करने के लिए और कैसे प्रमाण चाहिए?

चौथा :इस महान ब्रह्माण्ड को ग़ौर से देखने वाला पाता है कि सर्वशक्तिमान उत्पत्तिकर्ता ने इसे बड़े ही शानदार तरीक़े से पैदा किया है, जो एक सर्वज्ञ, शक्तिशाली और अपनी इच्छा से काम करने वाले रचयिता के अस्तित्व को प्रमाणित करता है। इसी शानदार रचना का उल्लेख करते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (क्या हमने धरती को बिछौना नहीं बनाया? और पर्वतों को खूंटियाँ? तथा हमने तुम्हें जोड़े-जोड़े पैदा किया। तथा हमने तुम्हारी नींद को आराम (का साधन) बनाया। और हमने रात को आवरण बनाया। और हमने दिन को कमाने के लिए बनाया। तथा हमने तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आकाश) बनाए। और हमने एक प्रकाशमान् तप्त दीप (सूर्य) बनाया। और हमने बदलियों से मूसलाधार पानी उतारा। ताकि हम उसके द्वारा अन्न और वनस्पति उगाएँ। और घने-घने बाग़।) [सूरा अल-नबा : 6-16]

इन आयतों में हम पाते हैं कि अल्लाह ने इन्सान को पैदा करने से पहले ही उसके लिए उसके रहने का स्थान तैयार कर दिया था। अल्लाह ने बताया कि उसने धरती को बिछौना बनाया। फिर इन्सान को पैदा करने का ज़िक्र किया। फिर बताया कि उसने नींद द्वारा इन्सान के लिए आराम के द्वार खोल दिए, दिन को कमाने का समय बनाया, उसके रहने के स्थान के ऊपर छत यानी आकाश बनाया और उसमें चमकता सूरज बना दिया। फिर आकाश से पानी उतारा और उसके माध्यम से इन्सान तथा जानवरों के लिए खाने की चीज़ें उतारीं। मालूम हुआ कि अल्लाह ने रहने वाले को पैदा करने से पहले ही रहने का स्थान तैयार कर दिया था। लेकिन इन सारी बातों के बावजूद इन्सान (जिसका आचरण भ्रष्ट हो चुका है) सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) के अस्तित्व का इनकार करता है।

पाँचवाँ : इस ब्रह्मांड की हर वस्तु सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) के अस्तित्व की साक्षी है। यहाँ आपके सामने एक प्रमाण रखा जा रहा है, जो आपके आस-पास से लिया गया है और जिससे आपका वास्ता हर रोज़ा होता है। आप उसके बिना जीवित नहीं रह सकते। यानी आपका भोजन, जिसे आप खाते हैं। ज़रा देखें कि अल्लाह ने मानव विवेक का मार्गदर्शन कैसे भोजन को अस्तित्व में लाने के विवरणों की ओर किया है और इसे अपने अस्तित्व तथा रब होने का साक्ष्य बनाया है? उसने कहा है : (अतः इनसान को चाहिए कि अपने भोजन को देखे। कि हमने ख़ूब पानी बरसाया। फिर हमने धरती को विशेष रूप से फाड़ा। फिर हमने उसमें अनाज उगाया। तथा अंगूर और (मवेशियों का) चारा। तथा ज़ैतून और खजूर के पेड़। तथा घने बाग़। तथा फल और चारा। तुम्हारे लिए तथा तुम्हारे पशुओं के लिए जीवन-सामग्री के रूप में।) [सूरा अबस : 24-32]

ज़रा ग़ौर करें कि आकाश से पानी किसने बरसाया?

किसने धरती को फाड़ा कि उसके अंदर पानी जा सके और पौधा निकल सके?

किस ने उससे विभिन्न प्रकार की फ़सलें तथा फल उगाए, ताकि हमारे और हमारे जानवरों के भोजन का प्रबंध हो सके? क्या होता, अगर अल्लाह ने पानी न उतारा होता? क्या होता अगर अल्लाह ने धरती को इतना सख़्त बना दिया होता कि उसके अंदर न पानी जा पाता और उससे पौधा निकल पाता? क्या होता, अगर धरती का स्वभाव उसमें डाले गए सभी बीजों को नष्ट कर देता? क्या होता, अगर अल्लाह पौधों तथा फ़सलों को फल देने से रोक देता? तो इन्सानों तथा जानवरों को भोजन कहाँ से मिलता? लेकिन अल्लाह ने, जिसकी हर सृष्टि सुंदर है, यह सारा प्रबंध किया। ऐसे में क्या यह शानदार रचना एवं अद्भुत दृश्य सर्वशक्तिमान रब (प्रभु) के अस्तित्व एवं प्रभुत्व का एक कारगर साक्ष्य नहीं हो सकता?

छठा : एक अहंकारी एवं अत्याचारी व्यक्ति ने रब के अस्तित्व को नकारते हुए अल्लाह के नबी इबराहीम अलैहिस्सलाम से बहस की। इस बहस का उल्लेख करते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ((ऐ नबी!) क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा, जिसने इबराहीम से उसके रब के विषय में झगड़ा किया, इस कारण कि अल्लाह ने उसे राज्य दिया था? जब इबराहीम ने कहा : मेरा रब वह है, जो जीवित करता और मृत्यु देता है। उसने कहा : मैं भी जीवित करता और मृत्यु देता हूँ।) [सूरा अल-बक़रा : 258] रब के अस्तित्व का इनकार करने वाले इस अहंकारी व्यक्ति ने रब के अस्तित्व को साबित करने वाले एक स्पष्ट प्रमाण को ठुकरा दिया। स्पष्ट प्रमाण यह था कि अल्लाह वह है, जो जीवन तथा मौत देता है। जवाब में उस अहंकारी व्यक्ति ने कहा कि मैं ही जीवन तथा मौत देता हूँ। वह इस तरह कि एक मौत की सज़ा पाए हुए व्यक्ति को जेल से निकाल कर आज़ाद कर देता हूँ। यह मेरा उसे जीवन देना हुआ। जबकि दूसरे को मार देता हूँ। अतः उसे मौत मैंने ही दी। जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उसकी ज़िद एवं अहंकार को सुना, तो उसके सामने ऐसा प्रमाण रखा, जिसे वह अस्वीकार नहीं कर सकता था। पवित्र क़ुरआन की व्याख्या के अनुसार उन्होंने कहा : (निःसंदेह अल्लाह तो सूर्य को पूरब से लाता है, तो तू उसे पश्चिम से ले आ। (यह सुनकर) वह काफ़िर चकित रह गया और अल्लाह अत्याचारियों को मार्गदर्शन नहीं देता।) [सूरा अल-बक़रा : 258] सीधा सा सवाल कि सूरज को पूरब से कौन लाता है? अगर किसी को उसका इनकार हो, तो वह सूरज को पश्चिम से लाकर दिखाए। और इन पिंडों एवं ग्रहों को किसने बनाया? इनको कौन चलाता है? कौन इनको एक सुदृढ़ व्यवस्था के तहत काम में लगाता है? अगर सूरज निकट आ जाए, तो पृथ्वी जलकर राख बन जाए। दूर हो जाए, तो बर्फ की तरह जम जाए। अगर ये ग्रह एक-दूसरे के निकट आ जाएँ, तो टकरा जाएँ और बिखर जाएँ। हमारे इस ब्रह्मांड की रूप-रेखा ही बदल जाए। इसकी व्यवस्था भ्रष्ट हो जाए और संरचना बिगड़ जाए। सर्वशक्तिमान रब ने ही इस व्यवस्थित संसार की उत्पत्ती की है।

सातवाँ : फ़िरऔन ने ईश्वर होने का दावा किया और अल्लाह के नबी मूसा अलैहिस्सलाम से पूरे अहंकार के साथ एक प्रश्न किया। पवित्र क़ुरआन की व्याख्या के अनुसार उसने कहा : (तुम दोनों का रब कौन है, ऐ मूसा!?) [सूरा ताहा : 49] मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे एक सटीक सा जवाब दिया, जिसे वह ठुकरा नहीं सकता था। उन्होंने कहा : (हमारा रब वह है, जिसने हर चीज़ को उसका आकार और रूप दिया, फिर रास्ता दिखाया।) [सूरा ताहा : 50] मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे प्रमाण देते हुए कहा कि अल्लाह वह है, जिसने हर वस्तु को उसका रूप एवं आकार दिया तथा मार्गदर्शन किया। भला कौन है, जिसने सृष्टि की रचना की और उसे अस्तित्व प्रदान किया? किसने हर सृष्टि को जीने, नस्ल को आगे बढ़ाने, अपनी संख्या अधिक करने, भोजन प्राप्त करने, कष्टदायक चीज़ों से खुद को बचाने और अपने हर काम के प्रबंध का तरीक़ा सिखाया? हम मनुष्यों को छोड़कर सभी सृष्टियों को पूर्ण ज्ञान के साथ जीवन में क़दम रखते हुए देखते हैं। किसने एक पक्षी को अंडे से बाहर निकलना या एक कीड़े को अंडे से निकलना और अपनी माँ को देखे बिना ही अपने सभी काम अपने पूर्वजों की तरह करना सिखाया?

किसने इन्सान को उसकी माँ के पेट से इस अवस्था में निकाला कि वह कुछ नहीं जानता था और उसे ज्ञान प्राप्त करने, आविष्कार करने, रास्ता मालूम करने, दूसरों को रास्ता दिखाने तथा जीवन, उसके उपकरणों एवं संसाधनों को विकसित करने के लिए कान, आँख और दिल दिया? यह सारी चीज़ें उसे उस अल्लाह के अलावा और किसने सिखाईं, जिसने हर वस्तु की रचना की और उसका मार्गदर्शन किया? यह कहाँ का न्याय है कि अल्लाह इन्सान को अपनी हर ज़रूरत पूरी करने का रास्ता बताए और इन्सान अल्लाह का मार्ग प्राप्त करने में असफल हो जाए?

आठवाँ : हर इन्सान कभी न कभी किसी बड़ी विपदा से गुज़रता है, जिसे वह सामान्य तरीक़ों से दूर करने में असमर्थ होता है। मसलन हवाई जहाज़ हवा में हो और आपातकाल की स्थिति घोषित हो जाए या फिर इन्सान पर कोई ऐसी मुसीबत आ जाए, जिसे वह टाल न पाए, उस समय इन्सान खुद को रब की शरण लेने पर मजबूर पाता है। चाहे वह अल्लाह पर ईमान रखता हो या न रखता हो। एक नास्तिक भी जब किसी मुसीबत में पड़ता है, तो अल्लाह की शरण लेता है। यह मनुष्य के आचरण का एक अभिन्न अंग है, जिससे वह खुद को अलग नहीं रख सकता। जब उसे किसी हानि का समाना हो या कोई विपदा आए, तो वह खुद को अल्लाह की शरण लेता हुआ पाता है और उसे इसका एहसास भी नहीं होता। क्या अनैच्छिक शरण की यह कैफ़ियत, जिससे हममें से हर व्यक्ति गुज़रता है, सर्वशक्तिमान रब के अस्तित्व का सबसे बड़ा साक्ष्य नहीं है? ((ऐ नबी!) उनसे पूछिए कि थल तथा जल के अँधेरों में तुम्हें कौन बचाता है? तुम उसे गिड़गिड़ाकर और चुपके-चुपके पुकारते हो कि निःसंदेह यदि वह हमें इससे बचा ले, तो हम अवश्य शुक्र करने वालों में से हो जाएँगे? आप कह दें : अल्लाह ही तुम्हें इससे तथा प्रत्येक संकट से बचाता है। फिर (भी) तुम उसका साझी बनाते हो!) [सूरा अल-अनआम : 63-64]

सर्वशक्तिमान अल्लाह के अस्तित्व के कुछ प्रमाणों का उल्लेख करने के बाद हम उसके रब (प्रभु) होने के कुछ प्रमाण प्रस्तुत करेंगे। दरअसल अल्लाह का अस्तित्व साबित करने वाला हर प्रमाण उसके रब होने को साबित करता है और उसके रब होने को साबित करने वाला हर प्रमाण उसके अस्तित्व को साबित करता है।

हम यहाँ केवल चार प्रमाणों का उल्लेख करेंगे, जो इस प्रकार हैं :

पहला : सर्वशक्तिमान अल्लाह के रब होने का एक बहुत बड़ा प्रमाण तथा साक्ष्य सृष्टि की रचना है। यह सृष्टि साक्ष्य है कि इसका एक रचयिता है। यह सृष्टि साक्ष्य है कि इसका रचयिता सब कुछ जानने वाला, बड़ा ही क्षमतावान्, इच्छावान्, जो चाहे कर गुज़रने तथा जो चाहे निर्णय लेने की क्षमता रखने वाला है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (यह अल्लाह की उत्पत्ति है। तो तुम मुझे दिखाओ कि उन लोगों ने जो उसके अतिरिक्त हैं, क्या पैदा किया है? बल्कि अत्याचारी लोग खुली गुमराही में हैं।) [सूरा लुक़मान : 11] यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। जिसे लगता हो कि अल्लाह के साथ कोई दूसरा उत्पत्तिकार भी है, वह हमें दिखाए कि उसके उस तथाकथित उत्पत्तिकार ने क्या-क्या पैदा किया है? चूँकि इस ब्रह्मांड की सारी चीज़ें अल्लाह की पैदा की हुई हैं और उसके सिवा किसी उत्पत्तिकार की कोई उत्पत्ति दिखाई नहीं देती है, इसलिए यह बात निश्चित हो गई कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई उत्पत्तिकार एवं रब नहीं है। उसके सिवा कोई इबादत का हक़दार नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (तो क्या वह जो (ये सब चीज़ें) पैदा करता है, उसके समान है, जो (कुछ भी) पैदा नहीं करता? फिर क्या तुम उपदेश ग्रहण नहीं करते?) [सूरा अल-नह्ल: 17] यह सृष्टि से सर्वशक्तिमान रब का प्रश्न है। एक सरल सा प्रश्न कि क्या उत्पत्ति करने वाला और उत्पत्ति न करने वाला दोनों बराबर हो सकते हैं? क्या विवेक एवं न्याय यह कहता है कि क्षमतावान् उत्पत्तिकार एवं ऐसे विवश को बराबर क़रार दिया जाए, जो किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं कर सकता? बल्कि उसने स्वयं की उत्पत्ति न की हो! इससे भी दो क़दम आगे यह कि खुद को लाभ पहुँचाने एवं हानि से बचाने की भी क्षमता न रखता हो!

दूसरा : सर्वशक्तिमान अल्लाह ने बताया है कि उसके रब तथा इबादत का हक़दार होने की एक निशानी आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति, लोगों का अलग-अलग भाषाएँ बोलना तथा अलग-अलग रंगों का होना है, जबकि उनका पिता एक यानी आदम है और माता भी एक यानी हव्वा है। उसकी एक और निशानी निद्रा जैसी बहुमूल्य वस्तु है, जिसका प्रबंध एक सब कुछ जानने वाली एवं क्षमतावान् हस्ती ने किया है, जिसे पता है कि इन्सान दुर्बल प्राणी है, वह जागकर पूरी उम्र गुज़ार नहीं सकता। अतः उसने रात को सोने और दिन को रोज़ी-रोटी की तलाश में निकलने का समय बना दिया। क्या यह अद्भुत प्रबंध एक महान, सब कुछ जानने वाले एवं क्षमतावान्, सृष्टिकर्ता को इंगित नहीं करता, जो अकेले ही इबादत का हक़दार हो और इसमें उसका कोई साझी न हो? उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (तथा उसकी निशानियों में से आकाशों और धरती को पैदा करना तथा तुम्हारी भाषाओं और तुम्हारे रंगों का अलग-अलग होना है। निःसंदेह इसमें ज्ञान रखने वालों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ है। तथा उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन को सोना और तुम्हारा उसके अनुग्रह को तलाश करना है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो सुनते हैं।) [सूरा अल-रूम : 22-23]

तीसरा : इन्सान की उत्पत्ति, उसे एक-दूसरे का उत्तराधिकारी बनाना, आकाश को छत तथा धरती को बिछौना बनाना, आसमान से पानी बरसाना और धरती के पेड़-पौधों से बंदों के खाने के लिए फल निकालना अल्लाह के रब एवं एकमात्र इबादत के हक़दार होने की एक बहुत बड़ी दलील है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किए। अतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो।) [सूरा अल-बक़रा : 21-22] यह आयत लोगों को अल्लाह की इबादत का आह्वान करती है, क्योंकि वही उत्पत्तिकार एवं आजीविकादाता है।

चौथा : सर्वशक्तिमान रब का अब तक होने वाली सारी चीज़ों एवं आने वाले समय में होने वाली सारी बातों का संपूर्ण ज्ञान रखना उसके रब होने की सबसे बड़ी दलील है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और उसी (अल्लाह) के पास ग़ैब (परोक्ष) की कुंजियाँ हैं, उन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता। तथा वह जानता है जो कुछ थल और जल में है और कोई पत्ता नहीं गिरता, परंतु वह उसे जानता है। और धरती के अँधेरों में कोई दाना नहीं और न कोई गीली चीज़ है और न कोई सूखी चीज़, परंतु वह एक स्पष्ट पुस्तक में (अंकित) है।) [सूरा अल-अनआम : 59] अल्लाह के ज्ञान के दायरे के अंदर सारी चीज़ें समाहित हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (निःसंदेह हमने मनुष्य को पैदा किया और हम जानते हैं जो कुछ विचार उसके मन में आता है और हम उसके गले की उस नस से भी अधिक क़रीब हैं जो दिल से जुड़ी होती है।) [सूरा क़ाफ़ : 16] यह सारी चीज़ें सर्वशक्तिमान अल्लाह के रब एवं एकमात्र इबादत के हक़दार होने की स्पष्ट दलील और कारगर प्रमाण हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (ताकि तुम जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है और यह कि अल्लाह ने निश्चय प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान के साथ घेर रखा है।) [सूरा अल-तलाक़ : 12] बल्कि इन्सान की संपूर्ण अज्ञानता कि वह बस उतना ही जानता है, जितना अल्लाह ने उसे सिखाया है, सर्वशक्तिमान अल्लाह के ज्ञान का प्रमाण है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माताओं के पेटों से इस हाल में निकाला कि तुम कुछ न जानते थे। और उसने तुम्हारे लिए कान और आँखें और दिल बनाए, ताकि तुम शुक्रिया अदा करो।) [सूरा अल-नह्ल: 78]

दूसरी परिचर्चा : सर्वशक्तिमान रब के गुण तथा सुंदर नाम

क्या सर्वशक्तिमान रब के कुछ गुण, नाम एवं कार्य हैं? ये गुण एवं नाम उसे किसने दिए हैं? क्या हम अपनी ओर से उसका कोई गुण या नाम निर्धारित कर सकते हैं? क्या रब अपनी किसी सृष्टि से प्यार करता है? क्या वह अपनी किसी सृष्टि से घृणा भी करता है? उसके कुछ लोगों से प्यार तथा कुछ लोगों से घृणा करने का कारण क्या है? क्या बंंदों के कर्मों एवं इबादतों से उसका कोई लाभ होता है?

अल्लाह की अनुमति से हम इन प्रश्नों का उत्तर देने जा रहे हैं। हम कहते हैं : सर्वशक्तिमान रब के सर्वोच्च गुण एवं बड़े ही सुंदर-सुंदर नाम हैं। उसके ये नाम सुंदरता की पराकाष्ठा पर हैं। उनसे सुंदर नाम हो नहीं सकते। उसके हर नाम से कुछ गुण एवं कार्य निकलते हैं।

मसलन उसका एक नाम "अल्लाह" है। यानी ऐसा पूज्य, जिसके सिवा कोई पूजा-अर्चना का हक़दार नहीं है, उसके सिवा कोई उत्पत्तिकार नहीं और उसके अतिरिक्त कोई रब नहीं है। हर प्रकार की इबादतों का वही हक़दार है। इसलिए उसका आदेश है कि हम उसके सिवा किसी की इबादत न करें।

उसका एक नाम "अल-रहमान" (दयावान्) तथा एक नाम "अल-रहीम" (दयालु) है। यानी दुनिया एवं आख़िरत में दया तथा कृपा करने वाला। उसने अपने ऊपर दया को अनिवार्य कर रखा है। वह सबसे बड़ा दयालु है। दुनिया की सारी चीज़ें उसकी दया के दायरे के अंदर हैं। उसी दया के कारण सृष्टियाँ एक-दूसरे पर दया करती हैं। यहाँ हम देखते हैं कि "रहीम" (दयालु) अल्लाह का नाम और "रहमत" (दया) उसका गुण है, जबकि कार्य यह है कि अल्लाह अपने बंदों पर "रहम" (दया) करता है तथा उसने बंदों के अंदर "रहमत" डाल रखी है, जिसके कारण वे एक-दूसरे पर दया करते हैं। यह दरअसल अल्लाह की दया का एक प्रभाव है।

उसका एक नाम "अल-अली" तथा एक नाम "अल-आला" है। दोनों का अर्थ यह है कि वह हर चीज़ से ऊँचा है। वह हर चीज़ के ऊपर तथा हर चीज़ उसके नीचे है। वह अपनी हस्ती, गुणों तथा शक्ति एवं सामर्थ्य में अपनी सृष्टि से उच्च है। अतः उसे संपूर्ण ऊँचाई प्राप्त है।

उसका एक नाम "अल-क़ुद्दूस" है, जिसका अर्थ यह है कि वह पूर्णता के गुणों वाला है, हर कमी और असंभव से पवित्र है, तथा इस बात से बहुत उच्च है कि कोई उसका समकक्ष या उसके जैसा हो।

उसका एक नाम "अल-अलीम" है। सारी सूचनाएँ उसके ज्ञान के दायरे के अंदर हैं। बीती हुई भी और आने वाली भी। व्यक्त भी और गुप्त भी। गतिमान भी और स्थिर भी। बड़ी भी और छोटी भी। उसे पहले से ही बंदों की रोज़ी, कर्म, जीवन तथा मृत्यु तथा चलत-फिरत के बारे में सब कुछ पता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और उसी (अल्लाह) के पास ग़ैब (परोक्ष) की कुंजियाँ हैं। उन्हें केवल वही जानता है, तथा जो कुछ थल और जल में है, वह सबका ज्ञान रखता है, और कोई पत्ता नहीं गिरता परन्तु उसे वह जानता है, और न कोई अन्न का दाना जो धरती के अंधेरे में हो और न कोई आर्द्र (भीगा) और न कोई शुष्क (सूखा) है, परन्तु वह एक खुली पुस्तक में अंकित है।) [सूरा अल-अनआम : 59]

उसका एक नाम "अल-लतीफ़" है। यानी अपने बंदों पर अनुग्रहशील। उनको सुरक्षित रखने वाला, उनकी मदद करने वाला, उनको क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला और उनका भला तथा उपकार करने वाला। "लतीफ़" नाम के विस्तृत अर्थ के दायरे के अंदर अल्लाह का तमाम चीज़ों के रहस्यों से अवगत होना भी दाख़िल है। मतलब यह है कि अल्लाह तमाम चीज़ों के विस्तृत एवं सामान्य, छुपे तथा खुले रहस्यों से अवगत है। वह अपनी सृष्टियों के हालात, कथनों एवं कर्मों से अवगत है। उसे पता है कि उसके बंदों ने क्या किया, कैसे किया, कहाँ किया और कब किया? वास्तविकता भी जानात है, कैफ़ियत भी जानता है, स्थान भी जानता है और समय भी जानता है।

उसका एक नाम "अल-हलीम" (सहनशील) है। अतः वह अवज्ञाकारियों को दंड देने के बजाय सलामत रखता है एवं मोहलत देता है, ताकि वे तौबा कर लें और वह उनकी तौबा ग्रहण करे। सच-मुच वह बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला है।

उसका एक नाम "अल-हकीम" (हिकमत वाला) है। वह इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा प्रबंध में हिकमत वाला है कि उसे परिपूर्ण एवं मज़बूत बनाया है, अपने दिए हुए विधि-विधानों एवं निर्णयों में हिकमत वाला है कि वह न्यायसम्मत एवं परोपकार पर आधारित हैं। वह संपूर्ण हिकमत वाला और सम्मोहक तर्क वाला है। वह न्यायकारी है कि उसका हर आदेश न्याय पर आधारित है, उसकी शरीयत न्याय पर आधारित है और उसका हर निर्णय न्याय पर आधारित है।

उसका एक नाम "अल-समद" (बेनियाज़ और महानता में संपूर्ण) है। सारी सृष्टियाँ अपनी ज़रूरतों की पूर्ति एवं समस्याओं के निराकरण के लिए उसी का रुख़ करती हैं। कुछ माँगना हो तो उसी से माँगा जाता है, विपत्तियों के समय उसी को पुकारा जाता है, सबसे अंत में उसी के सामने दामन फैलाया जाता है, सारी ज़रूरतें उसी से माँगी जाती हैं, उसपर कोई विपत्ति नहीं आती, वह ऐसा सरदार है जो अपनी सरदारी में परिपूर्ण है और ऐसा महान है जो अपनी महानता में संपूर्ण है। [1] मआरिज अल-क़ुबूल बि-शर्ह सुल्लम अल-वसूल (1/3-7)

अल्लाह के नाम बस इतने ही नहीं हैं। उसके नाम इतने अधिक हैं कि शुमार मुम्किन नहीं। ये सारे नाम उसके संपूर्णता, महानता एवं प्रताप को प्रदर्शित करते हैं।

सर्वशक्तिमान रब वह है, जिसने अपने सुंदर-सुंदर नाम रखने के साथ-साथ सर्वोच्च गुण भी निर्धारित किए हैं, जिसकी सूचना रसूलों ने अपनी जातियों को दी है। अल्लाह को कोई ऐसा नाम देना जायज़ नहीं है, जो खुद अल्लाह ने या उसके नबियों ने नहीं दिया है। इसी तरह उसका कोई ऐसा गुण बताना जायज़ नहीं है, जो खुद उसने या उसके नबियों ने नहीं बताया है।

रहा यह प्रश्न कि क्या अल्लाह अपनी किसी सृष्टि से प्रेम करता है? अथवा क्या वह अपनी किसी सृष्टि से नफ़रत करता है? अगर हाँ, तो उसके इस प्रेम एवं नफ़रत का कारण क्या है? उत्तर में हम कहेंगे : हाँ, अल्लाह ऐसे ईमान वाले बंदों से प्रेम करता है, जो उसपर ईमान रखते हैं, उसकी इबादत करते हैं और उसके नबियों को सच्चा मानते हैं। वह उपकार करने वालों से प्रेम करता है, बहुत ज़्यादा तौबा करने वालों से प्रेम करता है, पाक-साफ़ रहने वालों से प्रेम करता है, अच्छे काम करने वालों, लोगों का भला चाहने वालों और अच्छे आचरण वालों से प्रेम करता है। अल्लाह इस प्रकार के लोगों से प्रेम करता है, इनको दुनिया एवं आख़िरत में बेहतर बदला देता है और आकाश तथा धरती में स्वीकार्यता प्रदान करता है। जबकि ऐसे अविश्वासियों से घृणा करता है, जो अल्लाह तथा आख़िरत के दिन पर विश्वास नहीं रखते, उसी की इबादत करने की बजाय अन्य पूज्यों की इबादत करते हैं, उसके रसूलों को झुठलाते हैं, अल्लाह की सृष्टि को कष्ट देते हैं और बुरा तथा निंदनीय व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।

क्या अल्लाह को बंदों के कर्मों एवं इबादतों से लाभ होता है? हम कहते हैं : अल्लाह निस्पृह एवं बेनियाज़ है। आज्ञाकारियों से उसकी संपूर्णता एवं प्रताप में वृद्धि नहीं होती, इसी प्रकार अवज्ञाकारियों से उसका नुक़सान एवं हानि भी नहीं होती। बंदों के कर्मों एवं इबादतों का लाभ केवल उन्हीं को मिलता है। एक अवज्ञाकारी इन्सान केवल अपनी ही हानि करता है। अबूज़र रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने उच्च एवं महान अल्लाह से रिवायत करते हुए फ़रमाया है : "ऐ मेरे बंदो! मैंने अत्याचार को अपने ऊपर हराम कर लिया है और उसे तुम्हारे बीच हराम किया है, अतः तुम एक-दूसरे पर अत्याचार न करो। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग पथभ्रष्ट हो, सिवाय उसके जिसे में मार्ग दिखा दूँ, अतः मुझसे मार्गदर्शन मांगा करो, मैं तुम्हें सीधी राह दिखाऊँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग भूखे हो, सिवाय उसके जिसे मैं खाना खिलाऊँ, अतः मुझसे भोजन माँगो, मैं तुम्हें खाने को दूँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम सब लोग नंगे हो, सिवाय उसके जिसे मैं कपड़ा पहनाऊँ, अतः मुझसे पहनने को कपड़े माँगो, मैं तुम्हें पहनाऊँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम रात-दिन त्रुटियाँ करते हो और मैं तमाम गुनाहों को माफ़ करता हूँ, अतः मुझसे क्षमा माँगो, मैं तुम्हें क्षमा करूँगा। ऐ मेरे बंदो! तुम मुझे नुक़सान पहुँचाने के पात्र नहीं हो सकते कि मुझे नुक़सान पहुँचाओ और मुझे नफ़ा पहुँचाने के पात्र भी नहीं हो सकते कि मुझे नफ़ा पहुँचाओ। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा इनसान और जिन्न तुम्हारे अंदर मौजूद सबसे आज्ञाकारी इनसान के दिल पर जमा हो जाएँ, तो इससे मेरी बादशाहत में तनिक भी वृद्धि नहीं होगी। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा तुम्हारे इनसान और जिन्न तुम्हारे अंदर मौजूद सबसे पापी इंसान के दिल पर जमा हो जाएँ, तो भी इससे मेरी बादशाहत में कोई कमी नहीं आएगी। ऐ मेरे बंदो! अगर तुम्हारे पहले और बाद के लोग तथा इनसान और जिन्न एक ही मैदान में खड़े होकर मुझसे माँगें और मैं प्रत्येक को उसकी माँगी हुई वस्तु दे दूँ, तो ऐसा करने से मेरे ख़ज़ाने में उससे अधिक कमी नहीं होगी, जितना समुद्र में सूई डालकर निकालने से होती है। ऐ मेरे बंदो! यह तुम्हारे कर्म ही हैं, जिन्हें मैं गिनकर रखता हूँ और फिर तुम्हें उनका बदला भी देता हूँ। अतः, जो अच्छा पाए, वह अल्लाह की प्रशंसा करे और जो इसके अतिरिक्त पाए, वह केवल अपने आपको कोसे।" [2] [सहीह मुस्लिम : 2577]

अल्लाह के नामों एवं गुणों से संंबंधित कुछ मसायल हैं, जिन्हें बयान कर देना ज़रूरी है। वह मसायल हैं :

1- अल्लाह संपूर्ण, प्रतापी एवं सुंदर गुणों वाला है। उनके अंदर किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं है। वह हर उस संपूर्णता का अधिक हक़दार है, जो किसी भी प्रकार की कमी से खाली हो। रही बात उस संपूर्णता की, जो उससे विशेषित व्यक्ति की ज़रूरतमंदी व्यक्ति करती हो, जैसे पिता के लिए पुत्र एवं पति-पत्नी के लिए एक-दूसरे की ज़रूरत, तो इस प्रकार की संपूर्णता से अल्लाह को विशेषित नहीं किया जाएगा। क्योंकि सृष्टि संतान एवं पति की मोहताज होती है, जबकि इसके विपरीत सर्व शक्तिमान एवं महान अल्लाह सृष्टि से बेनियाज़ है।बल्कि आकाशों एवं धरती की बादशाहत उसी की है।

2- सर्वशक्तिमान अल्लाह के जैसी कोई चीज़ नहीं है। न उसकी ज़ात में, न नामों में और न गुणों में। अल्लाह के सारे नाम सुंदर एवं सारे गुण सर्वोच्च हैं। उसने खुद अपने बारे में कहा है : (उसके जैसी कोई चीज़ नहीं और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है।) [सूरा अल-शूरा : 11] उसके गुण सृष्टियों के गुणों के समान नहीं हैं। उसके नाम भी सृष्टियों के नामों के समान नहीं हैं। क्योंकि सर्वशक्तिमान अल्लाह के समान उसकी सृष्टियाँ नहीं हो सकतीं। वह हर एतबार से संपूर्ण एवं परिपूर्ण है। उसने खुद अपने बारे में कहा है : (तथा वही है, जो उत्पत्ति का आरंभ करता है। फिर वही उसे पुनः पैदा करेगा। और यह उसके लिए अधिक सरल है। तथा आकाशों और धरती में सर्वोच्च गुण उसी का है। और वही प्रभुत्वशाली, हिकमत वाला है।) [सूरा अल-रूम : 27] सर्वशक्तिमान अल्लाह ने न किसी को जना है और न उसे किसी ने जना है। न उसका कोई समकक्ष है और न साझी। वह एक है, अकेला है, बेनियाज़ है और सारी सृष्टियाँ अपनी सारी ज़रूरतों के लिए उसी का रुख़ करती हैं।

3- सर्वशक्तिमान रब हर दृष्टिकोण से ऊँचा है। उसकी हस्ती ऊँची है, उसके गुण ऊँचे हैं और उसकी क्षमता एवं सत्ता ऊँची है। वह अपनी सृष्टि के ऊपर है, अपने अर्श पर विराजमान है और उसका अर्श आकाशों के ऊपर है। वह न तो अपनी सृष्टि से घुलता-मिलता है, न उसमें समाता है, न उसकी कोई सृष्टि उसमें समाती है और न किसी सृष्टि के साथ मुत्तहिद (*) होता है। क्योंकि मुत्तहिद होने वाला उसका मोहताज होता है, जिसके साथ वह मुत्तहिद होता है, जबकि यह बात अल्लाह पर लागू नहीं होती है। अल्लाह तो हर चीज़ से बेनियाज़ है। वह अपने नामों एवं गुणों में बुलंद है। लेकिन इस बुलंदी के बावजूद आकाश एवं धरती की कोई चीज़ उससे छुपती नहीं है। वह दिलों में आने वाली बातों और छुपे हुए भेदों को जानता है। वह बुलंद होने के बावजूद अपने ज्ञान एवं असीम क्षमता के कारण अपनी सृष्टि के निकट है। वह माँगने वाले की झोली भरता है, गुहार लगाने वाले की गुहार सुनता है और परेशानी में पड़े हुए व्यक्ति की परेशानी दूर करता है। वह उच्च एवं महान है।

4- सर्वशक्तिमान रब रचयिता है और उसके सिवा सब रचना। वह सारी सृष्टि का रब है और उसके सिवा सबकी सारी हाजातें उसी से प्राप्त होती हैं। वह बादशाह तथा हर वस्तु का मालिक है और बाक़ी सब उसका स्वामित्व। कोई अपने भले-बुरे का भी मालिक नहीं है। फ़रिश्ते हों या नबी, नेक बंदे हों या अन्य सारे लोग, सब सर्वशक्तिमान रब के बंदे हैं। अपने भले-बुरे के भी मालिक नहीं हैं। सब अल्लाह से डरते हैं, उससे आशा रखते हैं, उसपर भरोसा करते हैं और जब किसी परेशानी में पड़ते हैं, तो उसी से फ़रियाद करते हैं।

5- अल्लाह के अतिरिक्त अन्य सारे पूज्यों के गुणों में आवश्यक रूप से दोष, विवशता और मोहताजगी पाई जाती है। वे इससे पहले कि अल्लाह उनको पैदा करता और सुनने, देखने तथा सोचने-समझने की शक्ति प्रदान करता, कोई उल्लेख योग्य वस्तु नहीं थे। जब उनके जीवन के दिन समाप्त हो जाएँगे, तो उनको मौत दे देगा। अतः सब के सब सृष्टि हैं और सब के सब अल्लाह के मोहताज हैं।

अल्लाह के अतिरिक्त जिस-जिस की इबादत होती है, किसी के पास अपना भला करने, अपनी आयु बढ़ा लेने या अपनी मुसीबत दूर करने की शक्ति नहीं है। अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाले सभों पर मुसीबतें आईं, कभी-कभी उनका वध कर दिया गया, वतन से निकाल दिया गया या दुश्मनों की ओर से यातनाएँ दी गईं और वे खुद को इन विपत्तियों से बचा नहीं सके। वे न तो अपनी पूजा करने वालों को लाभ पहुँचा सके और न फ़रियाद करने वालों से मुसीबत दूर कर सके। सच्चाई यह है कि वे मुर्दा हैं। फ़रियाद करने वाले की फ़रियाद सुन नहीं सकते। अगर इस योग्य होते कि उनकी इबादत की जाए, तो खुद को मौत न आने देते। खुद अपने को तथा उनसे फ़रियाद करने वाले को हर नुक़सान से बचा लेते। लेकिन वे पुकारने वाले की पुकार सुन नहीं सकते। इसलिए उनसे आशा या उनका भय रखना व्यर्थ है।

तीसरी परिचर्चा : संसार के रब (प्रभु) का रब होना उसके इबादत के हक़दार होने को अनिवार्य करता है

पीछे हम सर्वशक्तिमान रब की रुबूबियत के कुछ पक्षों का उल्लेख कर आए हैं। इस परिचर्चा में हम महान रब की रुबूबियत के कुछ अर्थ बताएँगे, जो इन्सान पर एक अल्लाह की इबादत लाज़िम कर देते हैं। इनमें से कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं :

1- सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने ही सृष्टि की रचना की है, उसी ने इन्सान को अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान किया है, वही उनको आजीविका देता है, उसी ने आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों को उनके लिए वशीभूत कर रखा है और सारी बातें मानव प्रकृति में रची बसी हुई हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि आकाशों और धरती को किसने पैदा किया और (किसने) सूर्य और चाँद को वशीभूत किया? तो वे अवश्य कहेंगे कि अल्लाह ने। तो फिर वे कहाँ बहकाए जा रहे हैं? अल्लाह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है जीविका विस्तृत कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ को अच्छी तरह जानने वाला है। 'और निश्चय यदि आप उनसे पूछें कि किसने आकाश से पानी उतारा, फिर उसके द्वारा धरती को, उसके मुर्दा हो जाने के बाद जीवित किया? तो वे अवश्य कहेंगे कि अल्लाह ने। आप कह दें कि सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है। बल्कि उनमें से अधिकतर लोग नहीं समझते।) [सूरा अल-अनकबूत : 61-63] जब यह साबित हो गया कि महान रब ही ने अकेले इस संसार की उत्पत्ति की है और वही अकेले रोज़ी देता है, तो फिर वही एकमात्र पूज्य है और केवल उसी की इबादत होनी चाहिए। इसी तरह जब उसके सिवा कोई किसी चीज़ की उत्पत्ति नहीं करता और किसी को रोज़ी नहीं देता, तो अल्लाह को छोड़कर उसकी इबादत करना या उसे अल्लाह का साझी ठहराना कैसे उचित हो सकता है?

2- सर्वशक्तिमान पालनहार सारी सृष्टियों के सारे मामले देखता है। वही उनका मालिक है। आकाशों एवं धरती की बादशाहत उसी की है। उसके सिवा सब कुछ उसके प्रबंध एवं स्वामित्व के मातहत है। उसके आधिपत्य एवं सत्ता के अधीन है। वही दीन-दुखियों को राहत देता है। वही परेशानी में पड़े हुए लोगों की पुकार सुनता है। वही जीवन तथा मृत्यु देता है। कोई किसी मृत को जीवित नहीं कर सकता। वही जिसे चाहे मृत्यु और जिसे चाहे जीवन देता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (आप कह दें : ऐ लोगो! यदि तुम मेरे धर्म के बारे में किसी संदेह में हो, तो मैं उनकी इबादत नहीं करता, जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर इबादत करते हो, बल्कि मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ, जो तुम्हें मौत देता है और मुझे आदेश दिया गया है कि मैं ईमान वालों में से हो जाऊँ।) [सूरा यूनुस : 104] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: (और अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया। फिर वही तुम्हें मौत देता है।) [सूरा अल-नह्ल: 70]

इसी तरह पवित्र एवं महान रब के सामने इस दुनिया में कोई सृष्टि किसी की सिफ़ारिश नहीं कर सकती। अलबत्ता आख़िरत में नबियों, फ़रिश्तों और सिफ़ारिश के योग्य लोगों को जिसके बारे में चाहेगा, सिफ़ारिश करने की अनुमति प्रदान करेगा। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि महान रब सिफ़ारिश करने वाले को अनुमति दे और जिसके हक़ में सिफ़ारिश की जानी है, उससे प्रसन्न हो। जब यह बात स्थापित हो गई, तो हमने जान लिया कि अल्लाह के भेजे हुए नबियों, निकटवर्ती फ़रिश्तों, पूर्वजों की आत्माओं, नक्षत्रों, सही मायने में या लोगों की धारणा अनुसार सम्मानित सृष्टि या तथाकथित पूज्य आदि, जिन्हें अल्लाह को छोड़कर पूजा जाता है, इनमें से कोई भी न इस संसार का संचालन करता है, न इस जीवन में किसी के हक़ में सिफ़ारिश करता है, न किसी को जीवन अथवा मृत्यु देता है, न किसी की परेशानी दूर करता है, न किसी परेशानी में पड़े हुए व्यक्ति की फ़रियाद सुनता है, न किसी को रोज़ी देता है, न किसी को संतान देता है और न किसी को शांति एवं सुकून देता है। ये सारे काम सर्वशक्तिमान रब के हैं। इस बात से अधिकतर लोग अवगत भी हैं। वही अवगत नहीं है, जो तरबियत एवं आस-पास के माहौल के कारण भ्रम का शिकार हो गया हो। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और यदि आप उनसे पूछें कि आकाशों तथा धरती को किसने पैदा किया है? तो वे अवश्य कहेंगे कि अल्लाह ने। आप कह दीजिए कि तुम बताओ कि जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, यदि अल्लाह मुझे कोई हानि पहुँचाना चाहे, तो क्या ये उसकी हानि दूर कर सकते हैं? या मेरे साथ दया करना चाहे, तो क्या ये उसकी दया को रोक सकते हैं? आप कह दें कि मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है। उसीपर भरोसा करने वाले भरोसा करते हैं।) [सूरत अल-ज़ुमर: 38]

3- हर इन्सान को अपने अंदर धार्मिकता एवं इबादतगुज़ारी की बड़ी इच्छा मिलती है। यह एक प्राकृतिक विषय है। चाहकर भी इसे दूर नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि हर समुदाय किसी न किसी पूज्य की पूजा-अर्चना ज़रूर करता है। क्योंकि हर इन्सान के दिल में सर्वशक्तिमान उत्पत्तिकार की मोहताजगी हुआ करती है, जो चाहता है कि इन्सान सुख-दुख में उसकी ओर झुके। सुख में शुक्र करते हुए तथा अल्लाह से अधिक नेमतें माँगते हुए, जबकि दुख में सामने मौजूद विपत्ति से छुटकारा माँगते हुए। ज़ाहिर सी बात है कि यह उद्देश्य उसी समय पूरा हो सकता है, जब इन्सान सर्वशक्तिमान रब का आश्रय ले। आश्रय लेने का यह जज़्बा और यह मोहताजगी, जिसे हममें से हर व्यक्ति अपने अंदर पाता है, प्रमाण है इस बात का कि सभी सर्वशक्तिमान रब के आधिपत्य के अधीन और उसके मोहताज हैं। चाहे वो अपनी ही जैसी किसी सृष्टि को महान मान लें, जो पहले अस्तित्वहीन था और दोबारा अस्तित्वहीन हो जाएगा। फिर सबको क़यामत के दिन उच्च एवं महान अल्लाह एकत्र करेगा, उनके कर्मों का हिसाब लेगा। उस समय वे आपस में झगड़ने लगेंगे, जिसका उल्लेख हम क़यामत के दिन के बारे में बात करते समय अल्लाह ने चाहा, तो करेंगे।

4- सर्वशक्तिमान अल्लाह ही ने दीन उतारा, उसी ने सृष्टि के लिए विधि-विधान बनाए, वही लोगों को अपने दीन का मार्ग दिखाता है, उसी ने अपने दीन की सत्यता के प्रमाण स्थापित किए हैं, उसी ने सटीक तथा सीधा रास्ता बताया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (यह सभी रसूल शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे, ताकि इन रसूलों के (आगमन के) पश्चात् लोगों के लिए अल्लाह पर कोई तर्क न रह जाए और अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ है।) [सूरा अल-निसा : 165]

अल्लाह अपने आदेशों का पालन करने वाले मोमिनों को दुनिया में बड़ी भलाई और आख़िरत में हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतों का सुसमाचार सुनाता है तथा अपने धर्म एवं शरीयत का उल्लंघन करने से सावधान करता है। वही हलाल को हलाल करता तथा बता देता है और हराम को हराम करता, उससे सावधान करता, उसमें संलिप्त होने या शरीयत का उल्लंघन करने वाले का दंड बयान करता है। अल्लाह तआला का कथन है : (और जिस दिन हम प्रत्येक समुदाय में उनपर उन्हीं में से एक गवाह खड़ा करेंगे। और आपको इन लोगों पर गवाह बनाकर लाएँगे। और हमने आपपर यह पुस्तक (क़ुरआन) अवतरित की, जो प्रत्येक विषय का स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन और दया और आज्ञाकारियों के लिए शुभ सूचना है।) [सूरा अल-नह्ल : 89]

किसी सृष्टि का काम नहीं है कि वह विधि-विधान बनाए या किसी धर्म की स्थापना करे। जिसने कोई दीन जारी किया या किसी धर्म की स्थापना की, उसने बहुत बड़ा पाप किया तथा खुद को सर्वशक्तिमान रब का साझी बना लिया। कोई भी सृष्टि, चाहे जो भी हो, अल्लाह का साझी नहीं है। जिसने खुद को अल्लाह का साझी बताया, उसने अल्लाह के प्रति अविश्वास दिखाया। अल्लाह दुनिया व आख़िरत में उससे इंतिक़ाम (बदला) लेगा और उसे जहन्नम में धकेल देगा, जहाँ वह हमेशा जलता रहेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठ गढ़े? ऐसे लोग अपने रब के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँगे और गवाही देने वाले कहेंगे कि यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब पर झूठ गढ़ा था। सुन लो! अत्याचारियों पर अल्लाह की धिक्कार है।) [सूरा हूद : 18] अल्लाह ने फ़िरऔन तथा उसकी जाति के बारे में सूचना देते हुए फ़रमाया है : (और इस दुनिया में उनके पीछे लानत (धिक्कार) लगा दी गई और क़ियामत के दिन भी। कैसा बुरा पुरस्कार है, जो उन्हें दिया जाएगा!) [सूरा हूद : 99] यानी इस दुनिया में उनके पीछे लानत लगा दी गई और आख़िरत में भी लानत उनकी प्रतीक्षा कर रही है। अल्लाह हम सब को इससे बचाए।

अल्लाह ने ही दीन उतारा है तथा विधि-विधान बनाए हैं। उसका यह अधिकार है कि वह जो चाहे पैदा करे और जिसका चाहे चयन करे। वह जिस स्थान एवं समय को चाहे, चुन ले, महान बना दे तथा इबादत का समय एवं स्थान बना दे। मिसाल के तौर पर मक्का एवं रमज़ान महीने को ले सकते हैं। इसी तरह जिस इन्सान को चाहे अपने दीन के मार्ग पर चला दे और जिसे चाहे, उसके अहंकार, अभिमान और हठधर्मी के कारण अपने दीन के रास्ते से हटा दे। किसी सृष्टि को, चाहे जो भी हो, किसी समय, स्थान, व्यक्ति, कार्य या परिस्थिति को पवित्र घोषित करने का अधिकार नहीं है। क्योंकि सारे लोग बराबर हैं। कोई किसी से उत्कृष्ट नहीं है। यदि है, तो धर्मपरायणता, ईमान एवं सत्कर्म के आधार पर। जिसने सुधार का मार्ग अपनाया और स्वयं को विशुद्ध कर लिया, तो इसका लाभ उसी को मिलेगा और जिसने गुमराही का मार्ग चुना, तो इसका नुक़सान भी उसी को होगा। इससे पता यह चलता है कि जिसने यह दावा किया कि उसके पास धर्म विधान के निर्माण एवं नई इबादतें रचने का अधिकार है या इस प्रकार का दावा किसी दूसरे ने उसके लिए किया, तो वह झूठा एवं ग़लत बयानी करने वाला है।

5- अल्लाह के द्वारा दिए गए विधि-विधानों एवं निर्धारित की गई हुदूद में बड़ी हिकमतें छुपी हुई हैं। उसकी शरीयत बड़ी मज़बूत एवं उत्कृष्ट शरीयत है। उसमें ऐसी तमाम चीज़ें हलाल की गई हैं, जो इन्सान के हित में हैं, मानव वंश की रक्षा के लिए उपयोगी हैं और इन्सान के कंधे पर डाली गई सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी यानी एक अल्लाह की इबादत में सहायक हैं। यहाँ यह याद रहे कि अल्लाह की इबादत के दायरे में धरती को अच्छाई के साथ आबाद करना भी दाख़िल है। इसी तरह इस्लामी शरीयत में अनेकेश्वरवाद, हत्या, बेहयाई के काम, गुनाह, सरकशी एवं अत्याचार आदि ऐसी तमाम चीज़ें हराम की गई हैं, जो इसके विपरीत हैं। शरीयत के ये विधि-विधान एवं हुदूद लोगों के दीन, धन और जान की रक्षा करती हैं, उनकी अक़्ल की सुरक्षा और नस्ल के बाक़ी रहने को सुनिश्चित करती हैं, हर युग और हर स्थान से मेल खाती हैं तथा किसी भेद-भाव के बिना तमाम लोगों पर समान रूप से लागू होती हैं। न किसी धनवान् के धन को देखते हुए उसका पक्ष लेती हैं, न किसी पद वाले व्यक्ति को उसके पद के कारण आसानी देती हैं और न किसी प्रतिष्ठित वंश से संबंध रखने वाले व्यक्ति को उसके वंश के कारण बचाती हैं। सारे लोग अल्लाह की शरीयत तथा उसके निर्णय के सामने बराबर हैं।

आज इन्सान सोचता है कि वह मानवीय पूर्णता के शिखर पर पहुँच चुका है। लेकिन इसके बावजूद हम देखते हैं कि हर देश का अपना-अपना विधान है और कोई देश दूसरे देश के विधान से संतुष्ट नहीं है। लेकिन इन तमाम विधानों ने लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा प्रदान नहीं की। इन्सान के धर्म, वतन, जान, नस्ल, अक़्ल तथा धन की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी। यह दरअसल इस बात की पुष्टि करता है कि इन्सान को एक आकाशीय विधान की आवश्यक्ता है, जो सर्वशक्तिमान रब की ओर से तमाम लोगों के लिए उतारा गया हो। उसे किसी इन्सान ने स्थापित न किया हो, जो दूसरों की क़ीमत पर किसी जाति या समूह का पक्ष लेता हो।

चौथी परिचर्चा : सर्वशक्तिमान रब का इबादत का हक़दार होना

पीछे गुज़र चुका है कि सर्वशक्तिमान रब ही उत्पत्तिकार, संचालनकर्ता तथा आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों का मालिक है। वही जीवन तथा मृत्यु देता है। ज़ाहिर सी बाता है कि जब वही यह सब कुछ करता है, तो वही एकमात्र इबादत का हक़दार है। अल्लाह के अलावा जितनी चीज़ों की इबादत की जाती है, उनमें से कोई इबादत का हक़दार नहीं है। क्योंकि वह न पैदा करता है, न रोज़ी देता है, न दुनिया को चलाता है, न स्थायी रूप से किसी चीज़ का मालिक है, न जीवन तथा मृत्यु देता है और न लाभ तथा नुक़सान कर सकता है। अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली सभी चीज़ों की पूजा निरर्थक है। इससे इन्सान का कोई भला नहीं होने वाला। यह दुनिया एवं आख़िरत दोनों जहानों के लिए घाटे का सौदा है। दुनिया में घाटे का सौदा इसलिए कि इन्सान अपनी उम्र ऐसे कामों में खपाता है, जिनका कोई फ़ायदा नहीं है, अपना धन ऐसे कामों में खर्च करता है, जिनका कोई लाभ नहीं होने वाला और इबादत की बरकत तथा फल से उसका दामन खाली ही रहेगा। जबकि अल्लाह के सिवा की इबादत करने की वजह से आख़िरत में बड़ी सख़्त यातना का सामना करना पड़ेगा।

अल्लाह के एकमात्र इबादत के लायक़ होने के दो अर्थ हैं :

1- इन्सान की सारी इबादतें इस संसार के रब के लिए हों। इबादत का कोई भी अंश अल्लाह के सिवा के लिए न हो। इबादत में किसी को अल्लाह का साझी न बनाया जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ((ऐ नबी!) आप कह दें कि मेरे रब ने निश्चय ही मुझे सीधा रास्ता दिखा दिया हैl वही सीधा धर्म जो एकेश्वरवादी इबराहीम का धर्म है और वह मुश्रिकों (बहुदेववादियों) में से नहीं थे। आप कह दें कि निश्चय ही मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी तथा मेरा जीवन-मरण, सारे संसारों के रब अल्लाह के लिए है। जिसका कोई साझी नहीं तथा मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं अल्लाह को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने वाला (इस उम्मत) का प्रथम व्यक्ति हूं। [सूरा अल-अनआम : 161-163]

2- इस बात का विश्वास रखा जाए कि अल्लाह के अलावा जितनी भी चीज़ों की इबादत हो रही है, सब की इबादत ग़लत है। उसके सिवा कोई इबादत का हक़दार नहीं है। अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करने वाला दरअसल महान अल्लाह का साझी बनाने वाला है।

यानी दोनों अर्थ (ला इलाहा इल्लल्लाह) के अर्थ हैं। यह कलिमा एक तरफ़ कहता है कि अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली सभी चीज़ों में से कोई चीज़ इबादत की हक़दार नहीं है, तो दूसरी तरफ़ यह कहता है कि केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है और इसमें उसका कोई साझी नहीं है। इस कलिमा का अर्थ है : अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (यह इसलिए कि अल्लाह ही सत्य है, और जिसे वे अल्लाह के सिवा पुकारते हैं, वह असत्य हैं, और अल्लाह ही सबसे ऊँचा, सबसे बड़ा है।) [सूरा अल-हज्ज : 62]

इबादत से मुराद वह सारे नेकी के काम एवं कथन तथा कर्म से संबंधित, गुप्त तथा व्यक्त इबादतें हैं, जिनका आदेश अल्लाह ने दिया है। जैसे तौहीद (एकेश्वरवाद), भय, आशा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज, सच बोलना, अमानतदारी, माता-पिता की सेवा, रिश्ते-नाते निभाना और प्रतिज्ञा का पालन करना आदि। इसी तरह उन तमाम चीज़ों से बचना, जिनसे अल्लाह ने मना किया है। जैसे शिर्क (बहुदेववाद), हत्या, अत्याचार, व्यभिचार और धरती में फ़साद मचाना आदि। इबादत में विनति, विनयशीलता एवं अल्लाह से, जो इस संसार का रब है, प्यार झलकना चाहिए। अहंकार तथा विमुखता के साथ इबादत नहीं हो सकती। माबूद (पूज्य) या इबादत से नफ़रत होने पर भी इबादत दुरुस्त नहीं होगी।

जब यह मालूम हो गया कि इबादत प्रेम, विनति एवं विनयशीलता की पराकाष्ठा है, तो स्पष्ट हो गया कि अल्लाह के अतिरिक्त के लिए किसी भी प्रकार की इबादत करने वाला या उसके लिए उच्च एवं पवित्र प्रभुत्व की कुछ विशेषताएँ साबित करने वाला, दरअसल उसे प्रभु एवं पूज्य बनाने वाला है। चाहे उसे पूज्य कहे या न कहे। [3] सियानह अल-इनसान अन वसवसह अल-शैख़ दहलान (451)

इबादत ही उत्पत्ति का मूल उद्देश्य है और इसी के लिए अल्लाह ने जिन्नात एवं इन्सान की रचना की है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।) [सूरा अल-ज़ारियात : 56]

रही बात उन प्रमाणों की कि एक अल्लाह की इबादत ज़रूरी है, तो इसके प्रमाण बेशुमार हैं। क्योंकि मानव विवेक इसी को प्रमाणित करता है, नबियों एवं रसूलों का मतैक्य यही बताता है और क़ुरआन की बहुत सारी आयतों में इसको सिद्ध किया गया है।

जहाँ तक मानव विवेक के एकमात्र अल्लाह की इबादत की अनिवार्यता को प्रमाणित करने की बात है, तो विवेक उसकी इबादत करने को कहता है, जिसके हाथ में रोज़ी हो, जो उत्पत्ति करता हो, जो इस संसार को चलाता हो, जो आकाशों एवं धरती का बादशाह हो, जिसके हाथ में लाभ एवं हानि हो और जो जीवन एवं मृत्यु देता हो। विवेक इस बात को बड़ी सख़्ती से नकारता है कि इन्सान अपने ही जैसे किसी इन्सान, पत्थर, पेड़, जानवर या हज़ारों साल पहले मरे हुए व्यक्ति की पूजा करे, जो न नफ़ा व नुक़सान कर सकता है, न किसी चीज़ का मालिक है, न पुकारने वाले की पुकार सुनता है और न आश्रय लेने वाले की मदद करता है। दूसरों की बात रहने दें, यह तो खुद अपने आपको भी किसी नुक़सान से बचा नहीं सकता। सही विवेक यह कहता है कि इन्सान का दामन इबादत से खाली रहे, यह इस बात से बेहतर है कि वह ग़लत इबादत में संलिप्त हो। क्योंकि ग़लत इबादत दुनिया एवं आख़िरत के घाटे का सौदा है, जैसा कि हम पीछे बयान कर आए हैं।

जहाँ तक एक अल्लाह की इबादत की अनिवार्यता पर नबियों एवं रसूलों के मतैक्य की बात है, तो यह बात सारी उम्मतों को पता है। क्योंकि हर उम्मत के पास इस संसार के रब का रसूल आया, उसे केवल एक अल्लाह की इबादत करने का आदेश दिया तथा उसके सिवा किसी और की इबादत से मना किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने प्रत्येक समुदाय में एक-एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत (वंदना) करो और ताग़ूत (अल्लाह के सिवा पूज्यों) से बचो, तो उनमें से कुछ को, अल्लाह ने सुपथ दिखा दिया और कुछ पर कुपथ सिध्द हो गया। तो धरती में चलो-फिरो, फिर देखो कि झुठलाने वालों का अंत कैसा रहा।" [सूरा अल-नह्ल : 36] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया : 25]

रही बात क़ुरआन से एकमात्र अल्लाह की इबादत की अनिवार्यता के प्रमाणों की बात है, तो इस प्रकार के प्रमाण बेशुमार संख्या में मौजूद हैं, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं :

1- सर्वशक्तिमान रब ही एकमात्र उतपत्तिकार है और बाक़ी सब उत्पत्ति हैं। अब ज़ाहिर सी बात है कि जो उत्पत्तिकर्ता हो, वही इबादत का हक़दार है। जो उत्पत्तिकार होने के बजाय खुद उत्पत्ति हो, उसकी इबादत नहीं हो सकती। दोनों बराबर भी नहीं हो सकते। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तो क्या वह जो (ये सब चीज़ें) पैदा करता है, उसके समान है, जो (कुछ भी) पैदा नहीं करता? फिर क्या तुम उपदेश ग्रहण नहीं करते?" [सूरा अल-नह्ल : 17]

दूसरा : पवित्र एवं उच्च रब ने ही आकाशों, धरती और उनके बीच मौजूद सारी चीज़ों की रचना की है। उसका फ़रमान है : "निःसंदेह तुम्हारा रब अल्लाह ही है, जिसने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में पैदा किया, फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। वह हर चीज़ की व्यवस्था चला रहा है। कोई सिफ़ारिश करने वाला नहीं परंतु उसकी अनुमति के बाद। वही अल्लाह तुम्हारा रब है, अतः उसी की इबादत करो। क्या तुम उपदेश ग्रहण नहीं करते?" [सूरा यूनुस : 3] तथा सर्वशक्तिमान रब ही इबादत का हक़दार है। इन पिंडों और उनके अंदर तथा उनके बीच मौजूद चीज़ों की उत्पत्ति का प्रमाण सबसे स्पष्ट प्रमाण है। यह कैसे हो सकता है कि इन्सान चले तो अल्लाह की धरती पर, उसके आकाश के साया तले जीवन व्यतीत करे तथा उसकी दी हुई रोज़ी खाए और इबादत किसी और की करे? निस्संदेह इन्सान बड़ा अत्याचारी एवं अज्ञान है।

3- अल्लाह ने ही आकश से हमारे पीने के लिए पानी उतारा और उससे हमारे लिए अनाज एवं फल उगाए। उसी ने आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों, रात एवं दिन तथा सूरज एवं चाँद को हमारे काम पर लगा रखा है। उसी ने समुद्र को इन्सान के वश में कर रखा कि इन्सान उसका ताज़ा मांस खाए और उसके ऊपर कश्तियाँ चलाए। अगर अल्लाह चाहता, तो वह डोलता रहता और उसके ऊपर कोई चीज़ ठहर न पाती। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''वह अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए समुद्र को वश में कर दिया, ताकि जहाज़ उसमें उसके आदेश से चलें, और ताकि तुम उसके अनुग्रह में से कुछ खोज सको, और ताकि तुम आभार प्रकट करो। और उसने तुम्हारे लिए जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है सबको अपनी ओर से वश में कर रखा है। निःसंदेह उसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो चिंतन करते हैं।" [सूरा अल-जासिया : 12-13] तथा इन चीज़ों को इन्सान के वश में रखना।

निश्चय ही यह बड़ी-बड़ी निशानियाँ, अद्भुत प्रमाण और ज़रूरत की चीज़ें, जिन्हें अल्लाह ने इन्सान के वश में दे रखा है, इस बात की गवाह हैं कि पाक रब ही केवल इबादत का हक़दार है। उसके सिवा जिनकी इबादत की जाती है, वह लाभ तथा नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, रोज़ी नहीं दे सकते, वशीभूत नहीं कर सकते और कुछ दे अथवा रोक नहीं सकते। तो फिर भला अल्लाह के साथ उनकी इबादत कैसे हो सकती है या उनको अल्लाह का समकक्ष कैसे बनाया जा सकता है? इनकी कही हुई बातों से अल्लाह पाक है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "वही है, जिसने आकाश से कुछ पानी उतारा, जिसमें से तुम पीते हो तथा उसी से पेड़-पौधे उगते हैं, जिनमें तुम (पशुओं को) चराते हो। वह तुम्हारे लिए उससे खेती, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और प्रत्येक प्रकार के फल उगाता है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बड़ी निशानी है, जो सोच-विचार करते हैं। और उसने रात और दिन, सूर्य और चाँद को तुम्हारे लिए कार्यरत कर रखा है, तथा तारे भी उसके आदेश के अधीन हैं। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं। तथा उसने तुम्हारे लिए धरती में जो विभिन्न रंगों की चीज़ें पैदा की हैं (उन्हें भी तुम्हारे वश में किया)। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए निश्चय बड़ी निशानी है, जो शिक्षा ग्रहण करते हैं। और वही है, जिसने सागर को (तुम्हारे) वश में कर दिया, ताकि तुम उससे ताज़ा मांस खाओ और उससे आभूषण निकालो, जिसे तुम पहनते हो। तथा तुम नौकाओं को देखते हो कि उसमें पानी को चीरती हुई चलती हैं, और ताकि तुम उसका कुछ अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम शुक्रिया अदा करो। और उसने धरती में पर्वत गाड़ दिए, ताकि वह (धरती) तुम्हें लेकर डगमगाने न लगे तथा नदियाँ और रास्ते बनाए, ताकि तुम मंज़िल तक पहुँच जाओ। तथा बहुत-से चिह्न (बनाए)। और वे सितारों से रास्ता मालूम करते हैं।" [सूरा अल-नह्ल : 10-16]

उच्च एवं पाक अल्लाह ने इन तारों को वशीभूत करने को इस बात का प्रमाण बनाकर प्रस्तुत किया है कि एकमात्र वही इबादत का हक़दार है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह रात को दिन में दाखिल करता है और दिन को रात में दाखिल करता है, तथा सूर्य और चाँद को वशीभूत कर दिया है, हर एक एक निर्धारित समय तक चल रहा है। और तुम जो कुछ कर रहे हो, अल्लाह उससे भली-भाँति अवगत है। यह इसलिए है कि अल्लाह ही सत्य है, और यह कि उसके सिवा जिसे वे पुकारते हैं, वह असत्य हैं, और यह कि अल्लाह ही सर्वोच्च, सबसे महान है। क्या तुमने नहीं देखा कि नाव समुद्र में अल्लाह के अनुग्रह से चलती है, ताकि वह (अल्लाह) तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाए। निःसंदेह इसमें हर बड़े धैर्यवान, बड़े कृतज्ञ के लिए कई निशानियाँ हैं।" [सूरा लुक़मान : 29-31] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "तथा दो सागर बारबर नहीं हैं। यह (एक) मीठा, प्यास बुझाने वाला, पीने में रुचिकर है, और यह (दूसरा) खारा-कड़वा है। तथा प्रत्येक में से तुम ताज़ा माँस खाते हो तथा आभूषण निकालते हो, जिसे तुम पहनते हो। और तुम उसमें नावों को देखते हो कि पानी को चीरती हुई चलती हैं, ताकि तुम अल्लाह का अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो। वह रात को दिन में दाखिल करता है, तथा दिन को रात में दाखिल करता है, तथा सूर्य एवं चाँद को काम में लगा रखा है। उनमें से प्रत्येक एक निश्चित समय तक चल रहा है।वही अल्लाह तुम्हारा रब है। उसी का राज्य है। तथा जिन्हें तुम उसके सिवा पुकारते हो, वे खजूर की गुठली के छिलके के भी मालिक नहीं हैं। यदि तुम उन्हें पुकारो, तो वे तुम्हारी पुकार नहीं सुन सकते। और यदि सुन भी लें, तो तुम्हें उत्तर नहीं दे सकते। और वे क़यामत के दिन तुम्हारे शिर्क का इनकार कर देंगे। और (ऐ रसूल!) आपको एक सर्वज्ञाता (अल्लाह) की तरह कोई सूचना नहीं देगा।" [सूरा फ़ातिर : 12-14]

4- पवित्र एवं महान अल्लाह ने ही इनसान की रचना की है और उसे अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान किया है। उसका फ़रमान है : "निश्चय इनसान पर ज़माने का एक ऐसा समय भी गुज़रा है, जब वह कोई ऐसी चीज़ नहीं था जिसका (कहीं) उल्लेख हुआ हो। निःसंदेह हमने इनसान को मिश्रित वीर्य से पैदा किया, हम उसकी परीक्षा लेते हैं। तो हमने उसे सुनने वाला, देखने वाला बना दिया। निःसंदेह हमने उसे रास्ता दिखा दिया। (अब) वह चाहे कृतज्ञ बने और चाहे कृतघ्न।" [सूरा अल-इनसान : 1-3] इसलिए मनुष्य की ज़िम्मवारी है कि उसी की इबादत करे, जिसने उसे अस्तित्व प्रदान किया है। यह क़तई उचित नहीं होगा कि उसे पैदा तो उसका रब करे और वह इबादत अपनी ही जैसी किसी रचना की करे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ।" [सूरा अल-बक़रा : 21] यह केवल एक अल्लाह की इबादत करने और उसके अलावा किसी और की इबादत से दूर रहने का स्पष्ट सबूत एवं निर्णायक प्रमाण है।

इस बात के कुछ प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद कि सर्वशक्तिमान रब ही इबादत का हक़दार है, मैं अल्लाह की इबादत के अनिवार्य होने की पुष्टि करने वाले कुछ उदहारण सामने रखूँगा, जिनका उल्लेख पवित्र क़ुरआन के अंदर हुआ है। कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं :

पहला उदाहरण : जो उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में है : ''तथा अल्लाह ने एक (और) उदाहरण दिया है; दो व्यक्ति हैं, जिनमें से एक गूँगा है। वह कुछ करने की योग्यता नहीं रखता और वह अपने मालिक पर बोझ है। वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता। तो क्या यह और वह व्यक्ति बराबर हैं, जो न्याय का आदेश देता है और वह (स्वयं) सीधे मार्ग पर है?'' [सूरा अल-नह्ल : 76] इब्न-ए-जरीर अपनी तफ़सीर में कहते हैं : (यह उदाहरण है, जिसे अल्लाह ने खुद अपना तथा उसके अतिरिक्त पूजे जाने वाले अन्य पूज्यों का अंतर समझाने के लिए प्रस्तुत किया है। उसने कहा है : (तथा अल्लाह ने एक (और) उदाहरण दिया है; दो व्यक्ति हैं, जिनमें से एक गूँगा है। वह कुछ करने की योग्यता नहीं रखता) इससे मुराद बुत है, जो न कुछ सुन सकता है और न बोल सकता है। क्योंकि वह या तो नक़्क़ाशी की हुई लकड़ी है या फिर ढला हुआ पीतल। न लोगों को लाभ पहुँचाने का सामर्थ्य रखता है, न नुक़सान से बचाने की शक्ति। वह अपने मालिक पर बोझ है। आगे अल्लाह ने कहा है कि वह भाइयों, समर्थकों और अभिभावकों पर बोझ है। इसी प्रकार बुत भी अपनी पूजा करने वालों पर बोझ है। उसे उठाने, रखने और उसकी सेवा करने की ज़रूरत होती है। जिस प्रकार कि एक गूँगा व्यक्ति, जो कुछ न कर सकता हो, अपने भाइयों पर बोझ हुआ करता है। (वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता) यानी वह उसे कहीं भी भेजे, कुछ अच्छा करके नहीं आता। क्योंकि वह न तो दूसरे की बात समझता है और न अपनी बात किसी से कह पाता है। बिल्कुल यही हाल बुत का है। न वह उससे कही गई बातों को समझ पाता है कि उसके किसी आदेश का पालन करे और न बोल ही सकता है कि किसी बात का आदेश दे तथा किसी बात से मना करे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : (तो क्या यह और वह व्यक्ति बराबर हैं, जो न्याय का आदेश देता है) यानी क्या यह गूँगा व्यक्ति, जो अपने मालिक पर बोझ है और कहीं भी जाकर कुछ अच्छा करके नहीं आता, एक बोलने वाले व्यक्ति के समान हो सकता है, जो सच्ची बात का आदेश देता हो और उसका आह्वान करता हो? यहाँ दूसरे व्यक्ति द्वारा अल्लाह की ओर इशारा है, जो बंदों को एकेश्वरवाद एवं अपने अनुसरण की ओर बुलाता है। अल्लाह कहता है : अल्लाह की महान ज़ात और बयान किए गए विशेषताओं वाला बुत दोनों बराबर नहीं हो सकते। आगे फ़रमाया : (और वह (स्वयं) सीधे मार्ग पर है) यानी वह न्याय का आदेश देने के साथ-साथ न्याय के आह्वान में सीधे मार्ग पर है। उसका न्याय का आदेश देना दुरुस्त है। वह सत्य से ज़रा भी इधर-उधर नहीं होता। [4] जामे अल-बयान, शोधकर्ता : शाकिर, (17/262)

दूसरा उदाहरण : जो उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में है : "अल्लाह ने एक व्यक्ति का उदाहरण दिया है, जिसमें कई परस्पर विरोधी साझी हैं तथा एक और व्यक्ति का, जो पूरा एक ही व्यक्ति का (दास) है। क्या दोनों की स्थिति समान हैं? सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है। बल्कि उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।" [सूरा अल-ज़ुमर : 29] शैख़ सादी अपनी तफ़सीर में कहते हैं : (फिर शिर्क एवं तौहीद का एक उदाहरण प्रस्तुत किया और फ़रमाया : (अल्लाह ने एक व्यक्ति का उदाहरण दिया है) यानी एक दास का उदाहरण दिया है। (जिसमें कई परस्पर विरोधी साझी हैं) साझियों की संख्या बहुत ज़्यादा है और वह किसी एक बात एवं एक परिस्थिति पर सहमत भी नहीं होते कि उस दास को ज़रा आराम मिल सके। वे उसके बारे में एक-दूसरे का विरोध करते रहते हैं और लड़ते-झगड़ते रहते हैं। एक व्यक्ति कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ और। ऐसे में आप कल्पना करें कि इन लोगों के अधीन रहकर उसका क्या हाल होगा? (तथा एक और व्यक्ति का, जो पूरा एक ही व्यक्ति का (दास) है।) यानी विशुद्ध रूप से उसी का दास है। उसे पता है कि उसका मालिक क्या चाहता है। अतः उसे पूरी राहत हासिल है। (क्या दोनों समान हैं?) यानी यह दोनों व्यक्ति। (स्थिति के मामले में) दोनों बराबर नहीं हो सकते। यही हाल बहुदेववादी का है। उसमें भी कई परस्पर विरोधी साझी हैं। एक ओर यह बुलाता है, तो दूसरी ओर वह। उसे न क़रार है, न सुकून। जबकि एकेश्वरवादी विशुद्ध रूप से अपने रब की इबादत करता है। उसका मालिक बस अल्लाह है। इसलिए उसे पूरा आराम एवं सुकून हासिल है।[5] तैसीर अल-करीम अल-रहमान फ़ी तफ़सीर कलाम अल-मन्नान (724)

आज हम धर्मों की दुनिया में ऐसे लोगों को देखते हैं, जो तीन पूज्यों पर विश्वास रखते हैं। जैसे हिंदू मत एवं ईसाई धर्म की तीन पूज्यों की धारणा। अब प्रश्न यह उठता है कि इस प्रकार के लोगों पर जब विपत्ति आएगी, तो किसके द्वार पर जाएँगे, किससे फ़रियाद करेंगे और किसकी इबादत करेंगे?

तीसरा उदाहरण : जो उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में है : "उन लोगों का उदाहरण जिन्होंने अल्लाह के सिवा अन्य संरक्षक बना रखे हैं, मकड़ी के उदाहरण जैसा है, जिसने एक घर बनाया। हालाँकि, निःसंदेह सब घरों से कमज़ोर तो मकड़ी का घर है, अगर वे जानते होते।" [सूरा अल-अनकबूत : 41] इस उदाहरण का अर्थ : जो व्यक्ति कोई पूज्य बना लेता है और अल्लाह को छोड़कर उसकी इबादत करता है, वह उस मकड़ी की तरह है, जो एक घर बनाकर उसके अंदर सुरक्षित रहना चाहती है, जबकि दुनिया का सबसे कमज़ोर घर मकड़ी का घर है। इसी तरह, जिसने अल्लाह को छोड़कर किसी और को पूज्य बनाया, उसने दरअसल एक कमज़ोर पूज्य बनाया, जो न उसकी मदद कर सकता है और न उसका बचाव कर सकता है।

शैख़ सादी कहते हैं : (मकड़ी एक कमज़ोर प्राणी है और उसका घर सबसे कमज़ोर घरों में से है। ये घर उसकी कमज़ोरी में ही वृद्धि करता है। इसी तरह जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरे लोगों को कारसाज़ बनाते हैं, निर्बल एवं विवश हैं और अल्लाह को छोड़कर अन्य लोगों को कारसाज़ बनाकर अपनी निर्बलता में वृद्धि ही करते हैं। कयोंकि अपने बहुत-से कामों में उनपर भरोसा कर बैठते हैं और उनपर भरोसा करके निश्चितं हो जाते हैं कि अब काम तो होना ही है। लेकिन न काम होता है। और न ही उद्देश्य पूरा होता है। उनको कोई मदद नहीं मिल पाती। ऐसे लोगों को अगर सचमुच अपने और अपने तथाकथित कारसाज़ों का हाल मालूम होता, तो उनको कारसाज़ न बनाते, उनसे खुद को अलग रखते, सर्वशक्तिमान एवं कृपावान रब को कारसाज़ बनाता। जब कोई बंदा उसे कारसाज़ बनाता है और उसपर भरोसा करता है, तो दीन एवं दुनिया की चिंताओं से मुक्त हो जाता है और उसका दिल, शरीर, स्थिति और कार्य सशक्त हो जाते हैं। [6] [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 631]

चौथा उदाहरण : जो उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में है : "ऐ लोगो! एक उदाहरण दिया जा रहा है, ज़रा ध्यान से सुनो। अल्लाह के सिवाय तुम जिन-जिन को पुकारते हो, वे एक मक्खी तक पैदा नहीं कर सकते, अगर सारे के सारे (पूज्य) जमा हो जाएँ तो भी। बल्कि अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ ले भागे, तो वे उसे भी उससे छीन नहीं सकते। बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला और बहुत कमज़ोर है वह, जिससे माँगा जा रहा है।" [सूरा अल-हज्ज : 73] इस उदाहरण का अर्थ यह है कि अल्लाह के अलावा जिन-जिन को पुकारा जाता है, अगर सबके सब एकत्र हो जाएँ और एक दूसरे के सहयोग से एक मक्खी बनाने लगें, जो कि एक बहुत ही छोटी-सी सृष्टि है, तो एक मक्खी तक बना न सकें। उनके निर्बले होने का एक दृश्य यह है कि अगर मक्खी उनसे खाने की कोई चीज़ छीन ले, तो उसे उससे बचा तक नहीं सकते। लिहाज़ा अल्लाह को छोड़कर ऐसी चीज़ों की इबादत कैसे दुरुस्त हो सकती है, जो मक्खी तक से अपने अधिकार की रक्षा नहीं कर सकतीं या मक्खी तक को अपने ऊपर अत्याचार करने से रोक नहीं सकतीं? यह उदाहरण दरअसल अल्लाह के सिवा की इबादत करने वालों की मूर्खता को स्पष्ट करता है। यह कौन सा तर्क है कि आकाशों, धरती एवं इन दोनों में रहने वालों के उत्पत्तिकार, आजीविकादाता और संचालनकर्ता को छोड़कर ऐसों की इबादत की जाए, जिनपर मक्खी जैसी निर्बल सृष्टि हावी हो जाती है?

शैख़ अब्दुर रहमान सादी कहते हैं : (अल्लाह ने यह उदाहरण बुतों की पूजा की ख़ामी और उनकी पूजा करने वालों की बुद्धिहीनता बयान करने के लिए दिया है। (बड़ा कमज़ोर है माँगने वाला) यानी जिसे अल्लाह को छोड़कर पूजा जाता है। (और बहुत कमज़ोर है वह, जिससे माँगा जा रहा है।) यानी मक्खी। इस तरह, दोनों निर्बल हैं। लेकिन इन दोनों से भी निर्बल है इस निर्बल से संबंध जोड़ने वाला और इस संसार के रब के स्थान पर इसे लाकर खड़ा करने वाला है। [7] [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 546] कुछ परिवर्तन के साथ।

पाँचवीं परिचर्चा : सर्वशक्तिमान रब को साझी एवं समकक्ष से पवित्र करार देना तथा उसके सिवा किसी और की इबादत को अमान्य करना

सर्वशक्तिमान रब एक है, अकेला है और बेनियाज़ है। न उसने किसी को जना है, न किसी ने उसे जना है। उसका कोई समकक्ष नहीं है। उसकी रुबूबियत, नामों तथा गुणों एवं उलूहियत में उसका कोई शरीक नहीं है। वह उत्पत्तिकार है और बाक़ी सब उत्पत्ति। उसकी जिन सृष्टियों को हम जानते हैं, उनमें आकाश, धरती एवं ग्रह आदि बड़ी-बड़ी रचनाएँ शामिल हैं। उसकी कुछ सृष्टियाँ बेजान हैं, कुछ पैधों की शक्ल में हैं, कुछ जानदार हैं, और कुछ विवेक वाली सृष्टियाँ हैं, जैसे फ़रिश्ते, इन्सान और जिन्नात। फ़रिश्ते अल्लाह की एक ऐसी सृष्टि हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपनी आज्ञाकारिता के लिए पैदा किया है, जैसा कि आगे आएगा। जबकि इन्सान एवं जिन्नात मुकल्लफ़ सृष्टियाँ हैं। इन्सानों में नबी, रसूल, समाज सुधारक और सत्यवादी लोग हुआ किए हैं। फ़रिश्ते और इन्सान सबसे उत्तम सृष्टि हैं। आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ें महान रब की मोहताज हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने धरती की सारी वस्तुओं को तुम्हारे वश में कर दिया है, तथा नावों को भी, जो सागर में उसके आदेश से चलती हैं और वह आकाश को अपनी अनुमति के बिना धरती पर गिरने से रोकता है? निःसंदेह अल्लाह लोगों के लिए अति करुणामय, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अल-हज्ज : 65] सभी उसके मोहताज हैं, उससे डरते हैं और उससे आशा रखते हैं, जबकि अल्लाह उनको रोज़ी देता है, उनकी रक्षा करता है और उनके लिए सारे प्रबंध करता है। लोग अपने भले-बुरे के मालिक नहीं हैं। पल भर के लिए भी अल्लाह उनपर ध्यान देना छोड़ दे, तो सब हलाक हो जाएँ और वह उन्हें क्षण भर में हलाक करने की क्षमता रखता है। ऐसे में अल्लाह को छोड़कर किसी और को पूज्य बनाने का क्या औचित्य है?

अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली चीज़ों के कई प्रकार हैं। जैसे :

पूज्य कोई ग्रह हो। आधुनिक विज्ञान ने बता दिया है कि सभी स्वतंत्र अथवा समूह में मौजूद ग्रह खुद से नहीं चलते। इनको चलाने तथा इनका प्रबंध करने का काम किसी और के हाथ में है तथा दूसरी चीज़ों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे में कोई व्यक्ति यह धारणा कैसे रख सकता है कि ग्रह या राशियाँ धरती या धरती में रहने वालों पर प्रभाव डालते हैं? कुछ समुदायों का मानना है कि राशियाँ नवजात शिशुओं को प्रभावित करती है और उनको अपनी विशेषताएँ प्रदान करती हैं। लेकिन यह बहुत बड़ा भ्रम है। और यह भ्रम यहाँ आकर धराशाही हो जाता है कि इन राशियों के बारे में इस प्रकार की मान्यता रखने वाले समुदायों ने इन राशियों को कुछ नाम दिए हैं और उसके बाद यह विश्वास कर रखा है कि हर राशि की विशेषताएँ वही हैं, जो विशेषताएँ उनको दिए गए नामों की हैं। वृश्चिक, वृषभ और सिंह आदि। लेकिन इन राशियों के नाम और संख्या अलग-अलग समुदायों के यहाँ अलग-अलग हैं। जैसे चीनियों के यहाँ इनकी संख्या एवं नाम अन्य समुदायों से भिन्न हैं। ऐसा में यह विश्वास कैसे रखा जा सकता है कि इनकी वेशेषताएँ एक हैं और यह सृष्टि पर प्रभाव डालती हैं, जबकि इनके नाम, विशेषताओं एवं संख्या में ही मतभेद मौजूद है?

पूज्य कोई पेड़, गाय, नदी या बुत आदि हो। ऐसे में प्रश्न उठता है कि विवेक रखने वाला इन्सान विवेकहीन पेड़ या जानवर अथवा लकड़ी आदि से बने हुए बुत की इबादत कैसे कर सकता है? अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली इस प्रकार की चीज़ें अन्य पूजी जाने वाली चीज़ों की तुलना में और भी कमतर दर्जे की हैं। सच्ची बात यह है कि जब विवेक विलुप्त हो जाए और अंधविश्वास बड़ी भूमिका निभाने लगे, तो लोग मानने लगते हैं कि मूर्ति लाभ दे सकती है, नदी बरकत एवं रोज़ी के द्वार खोल सकती है या गाय पवित्र एवं पूज्य हो सकती है।

पूजा ऐसे पूज्यों की हो, जिनका कोई अस्तित्व न हो। कुछ लोग समझते हैं कि पूज्य पिता, माता एवं पुत्र पर आधारित पूज्यों के एक समूह से बना हुआ है। यह संख्या नौ भी हो सकती है, जैसा कि फ़िरऔनियों और पुराने चीनियों के यहां देखने को मिलता है और तीन भी, जैसा कि ईसाइयों एवं कुछ पूर्वी धर्मों के मानने वालों के यहाँ पाया जाता है। हालाँकि यह सब पाखंड है। इसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। अल्लाह के अलावा कोई इबादत के योग्य है ही नहीं। होता यह है कि इन्सान कोई झूट गढ़ लेता है, उसे सच मानने लगता है, उसे पूज्य का नाम दे देता है और पवित्र मानने लगता है, जैसा हम शिर्क के खंडन के तहत आगे पढ़ने वाले हैं।

पूज्य कोई इन्सान हो। हम देखते हैं कि कुछ यहूदी उज़ैर की इबादत करते हैं, कुछ ईसाई ईसा अलैहिस्सलाम की इबादत करते हैं, कुछ लोग गौतम बुद्ध की इबादत करते हैं, कुछ लोग ज़रतुश्त्र की इबादत करते हैं और कुछ लोग कन्फ्यूशियस की इबादत करते हैं। मानव इतिहास में इसकी बहुत-सी मिसालें मिल जाती हैं। ये सारे पूज्य इन्सान थे। अल्लाह ने इनको अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान किया था। अपनी माताओं से पेट से इस अवस्था में निकले थे कि कुछ ज्ञान नहीं रखते थे। उन्हें भी अपने जीवन में दूसरे इन्सानों की तरह खुशियों, ग़मों, मुसीबतों और बीमारियों का सामना करना पड़ा। उनपर दुश्मनों का प्रभाव भी पड़ा। अंत में उनको मृत्यु का भी सामना करना पड़ा, जिसे कोई टाल नहीं सकता। इन सारी बातों को सामने रखते हुए प्रश्न उठता है कि उन्हें पूज्य कैसे माना जा सकता है? अल्लाह के स्थान पर उनकी इबादत कैसे की जा सकती है? ख़ुद इनमें से कई पूज्य अपने जीवन में शिर्क से सावधान करते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह उन लोगों ने कुफ़्र किया, जिन्होंने कहा कि निःसंदेह अल्लाह तो मरयम का बेटा मसीह ही है। जबकि मसीह ने कहा : ऐ बनी इसराईल! अल्लाह की इबादत करो, जो मेरा रब तथा तुम्हारा रब है। निःसंदेह सच्चाई यह है कि जो भी अल्लाह के साथ साझी बनाए, तो निश्चय उसपर अल्लाह ने जन्नत हराम (वर्जित) कर दी और उसका ठिकाना आग (जहन्नम) है। तथा अत्याचारियों के लिए कोई मदद करने वाले नहीं।" [सूरा अल-माइदा : 72] ईसा अलैहिस्सलाम की इबादत उनकी मृत्यु के काफ़ी समय बाद शुरू हुई।

स्वच्छ विवेक एवं सही तर्क भी इस बात की इजाज़त नहीं देता कि इन्सान अपने ही जैसे एक इन्सान की इबादत करे, जो आम इन्सानों की तरह मसायल से जूझता है, खाना खाता है और खाना न मिले, तो हलाक हो जाए। सोचने का मक़ाम है कि जो इतना कमज़ोर है, उसकी इबादत कैसे हो सकती है?

मानव इतिहास में इन्सानों द्वारा पूजे गए कुछ उपास्यों का उल्लेख करने के बाद हम कुछ प्रश्न सामने रखना चाहते हैं, जिनका संतोषजनक उत्तर मुश्रिक कभी नहीं दे पाएँगे। ये प्रश्न खुद पवित्र क़ुरआन में उठाए गए हैं। प्रश्न इस प्रकार हैं :

पहला प्रश्न : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) उनसे कह दें : क्या तुमने अपने उन साझियों को देखा, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो? मुझे दिखाओ कि उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है? या उनकी आकाशों (की रचना) में कुछ साझेदारी है? या हमने उन्हें कोई पुस्तक प्रदान की है कि वे उसके किसी स्पष्ट प्रमाण पर (क़ायम) हैं? बल्कि (वास्तविकता यह है कि) अत्याचारी लोग एक-दूसरे को केवल धोखे का वादा करते हैं।" [सूरा फ़ातिर : 40]

प्रश्न : ये पूज्य, जिनको तुम अल्लाह का साझी ठहराते हो, जैसे ब्रह्मा, बुद्ध और मसीह, ज़रा हमें बताओ कि इन्होंने धरती की कौन-सी चीज़ पैदा की है? या फिर क्या ये आकाशों की रचना में अल्लाह के साझी रहे हैं? या फिर अल्लाह ने तुम्हें अपनी ओर से कोई किताब दे रखी है, जो यह सिद्ध करती है कि वे अल्लाह के साझी हैं? तुम्हारे पास उस किताब का कोई प्रमाण मोजूद है? जब इन पूज्यों की इबादत करने वालों ने इनकी पैदा की हुई चीज़ें प्रस्तुत नहीं कीं, वे साबित नहीं कर सके कि ये आकाशों की रचना में अल्लाह के साझी रहे हैं और लोगों के सामने अल्लाह की जानिब से उनकी ओर उतारी गई कोई किताब प्रस्तुत नहीं कर सके, जो उनके किसी को अल्लाह का साझी ठहराने के कृत्य को उचित ठहराती हो, तो इससे निश्चित रूप से साबित हो गया कि उनके ये पूज्य अल्लाह के साझी नहीं हैं, उनकी इबादत ग़लत है और उनकी इबादत करने वाला बड़ी गुमराही पर है।

दूसरा प्रश्न : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "या वह जो सृष्टि का आरंभ करता है, फिर उसे दोहराता है, और जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई (और) पूज्य है? कह दीजिए : लाओ अपना प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो।" [सूरा अल-नम्ल : 64] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : ''(आप उनसे) कह दें : क्या तुम्हारे साझीदारों में से कोई है, जो सृष्टि का आरंभ करता हो, फिर उसे दोबारा बनाए गाॽ आप कह दें : अल्लाह ही सृष्टि का आरंभ करता है, फिर उसे दोबारा बनाए गा, तो तुम कहाँ बहकाए जाते होॽ'' [सूरा यूनुस : 34] इस प्रश्न में अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाले हर पूज्य को यह चुनौती दी गई है कि क्या वह सृष्टि का आरंभ कर सकता है? क्या वह किसी चीज़ को अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान कर सकता है? उनकी पूजा करने वाले दिखाएँ कि उनके पूज्यों ने क्या कुछ पैदा क्या है?

जब कोई व्यक्ति मृत्यु के गाल में समाकर फ़ना हो जाता है, तो क्या उनके यह तथाकथित पूज्य उसे दोबारा जीवन प्रदान कर सकते हैं? क्या यह ख़ुद अपनी पूजा अर्चना करने वालों को मौत के बाद दोबारा जीवित कर सकते हैं? क्या यह उनके पिताओं, माताओं, संतानों या पत्नियों को दोबारा वापस ला सकते हैं, जिनको मौत ने फ़ना कर दिया है? क्या ये उन दादाओं एवं दादियों को जीवित करके दोबारा दुनिया में ला सकते हैं, जिनका उनके अनुयायियों के दिलों में बहुत बड़ा स्थान है?

इस आयत में एक अन्य प्रश्न एवं एक अन्य चुनौती भी मौजूद है। इसमें इन पूज्यों के उपासकों से पूछा गया है कि तुमको रोज़ी कौन देता है? क्या ये पूज्य अपने अनुयायियों को रोज़ी दे सकते हैं? हम देखते हैं कि उनके अनुयायी निर्धनता, भूख एवं दुश्मनों के उत्पीड़न के शिकार रहते हैं। इन परिस्थितियों में क्या ये उनका कुछ साथ दे पाते हैं?

तीसरा प्रश्न : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''क्या वे उन्हें (अल्लाह का) साझी बनाते हैं, जो कोई चीज़ पैदा नहीं करते और वे स्वयं पैदा किए जाते हैं? तथा वे न उनकी कोई सहायता कर सकते हैं और न स्वयं अपनी सहायता करते हैं? और यदि तुम उन्हें सीधी राह की ओर बुलाओ, तो तुम्हारे पीछे नहीं चल सकते। तुम्हारे लिए बराबर है, चाहे उन्हें पुकारो अथवा तुम चुप रहो।" [सूरा अल-आराफ़ : 191-193] इस प्रश्न में एक प्रश्न एवं एक चुनौती है। प्रश्न यह है कि क्या तुम अल्लाह को छोड़ किसी ऐसे पूज्य की इबादत करते हो, जो कोई चीज़ पैदा नहीं कर सकता? वह ख़ुद किसी का पैदा किया हुआ है, कोई और उसकी ज़रूरतें पूरी करता है और वह निर्बल तथा विवश है?

जबकि चुनौती यह है कि वह किसी कष्ट देने वाले से अपना तथा अपने उपासकों का बचाव नहीं कर सकता, तो वह पूज्य कैसा? जो कुछ पैदा नहीं कर सकता, किसी की मदद नहीं कर सकता और अपना बचाव नहीं कर सकता, वह पूज्य कैसा? उसका उपासक ही तो कहीं उससे ज़्यादा संपूर्ण है। इब्न-ए- कषीर रहिमहुल्लाह कहते हैं : (यह अल्लाह की ओर से उन मुश्रिकों का खंडन है, जो अल्लाह को छोड़कर बुतों और थानों की इबादत करते हैं, जो अल्लाह के पैदा किए हुए और बनाए हुए हैं, किसी चीज़ के मालिक नहीं हैं, उनके हाथ में हानि एवं लाभ नहीं है और अपने उपासकों की मदद भी नहीं कर सकते। दरअसल यह बेजान चीज़ें हैं, जो न अपनी जगह से हिल सकती हैं, न सुन सकती हैं और न देख सकती हैं। बल्कि उनके उपासक उनसे ज़्यादा संपूर्ण हैं, जो सुन भी सकते हैं, देख भी सकते हैं और पकड़ भी सकते हैं। यही कारण है कि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या वह अल्लाह का साझी उन्हें बनाते हैं, जो कुछ पैदा नहीं कर सकते और वे स्वयं पैदा किये हुए हैं?" क्या तुम ऐसी चीज़ों को अल्लाह का साझी बनाते हो, जो न तो कुछ पैदा करती हैं और न कर सकती हैं? [8] तफ़सीर इब्ने कषीर (3/529)

चौथा प्रश्न : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तो क्या वह जो प्रत्येक प्राणी के कार्यों का संरक्षक है (वह उपासना के अधिक योग्य है या ये मूर्तियाँ?) और उन्होंने अल्लाह के कुछ साझी बना लिए हैं। आप कहिए कि उनके नाम बताओ। या क्या तुम उसे उस चीज़ की सूचना देते हो, जिसे वह धरती में नहीं जानता, या केवल ऊपर ही ऊपर बातें कर रहे हो? बल्कि उन लोगों के लिए जिन्होंने कुफ़्र किया, उनका छल सुंदर बना दिया गया और वे सीधे रास्ते से रोक दिए गए। और जिसे अल्लाह पथभ्रष्ट कर दे, फिर उसे कोई राह दिखाने वाला नहीं।" [सूरा अल-राद : 33] इमाम तबरी रहिमहुल्लाह कहते हैं : (क्या वह नित्य स्थायी रब, जो कभी फ़ना एवं हलाक नहीं होगा, जो सारी सृष्टियों की आजीविका को संरक्षण प्रदान करता है, सारी सृष्टियों एवं उनके कर्मों से अवगत है, उनकी निगरानी करता है और वे जहाँ भी रहें उनकी कोई बात उससे छुपती नहीं है, वह उसके समान हो सकता है, जिसे हलाक और विनष्ट हो जाना है, जो न देखात है, न सुनता है, न कुछ समझता है, न खुद को तथा अपने उपासकों को किसी नुक़सान से बचाता है और न उनको कोई लाभ पहुँचाता है? मैं ही इन मुश्रिकों को रोज़ी देता हूँ, इनके सब काम बनाता हूँ और इनके कार्यों को संरक्षण प्रदान करता हूँ, लेकिन ये मेरी कुछ सृष्टियों को मेरा साझी बना लेते हैं और मुझे छोड़कर उनकी पूजा करते हैं। ऐ मुहम्मद! इनसे कह दें कि तुम उन लोगों के नाम बताओ, जिनको तुमने अल्लाह की इबादत में साझी बना रखा है। अगर ये उन्हें पूज्य कहते हैं, तो झूठ बोलते हैं। क्योंकि एकमात्र सर्वशक्तिमान अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। (या क्या तुम उसे उस चीज़ की सूचना देते हो, जिसे वह धरती में नहीं जानता) अल्लाह कहता है : क्या तुम उसे बता रहे हो कि धरती में कोई पूज्य है, जबकि धरती एवं आकाश में उसके सिवा कोई पूज्य नहीं है? [9] जामे अल-बयान, शोधकर्ता : शाकिर, (16/362-365)

इस आयत में उठाए गए प्रश्न में अक़्ल को जागृत करने वाली तीन बातें मौजूद हैं :

अक़्ल को जागृत करने वाली पहली बात : अक़्ल को इस बात के लिए जागृत करना कि वह ग़ौर व फ़िक्र और तुलना करे एक सक्षम, बेनियाज़, हर इन्सान के कर्मों का संरक्षण करने वाले महान रब तथा एक विवश पूज्य के बीच। सर्वशक्तिमान रब ने ही इस विवश पूज्य की रचना की है, उसे अस्तित्व प्रदान किया है, वही उसे रोज़ी देता है और वह चाहेगा तो उसे तथा उसकी पूजा करने वाले को हलाक कर देगा। ऐसे में एक समझदार व्यक्ति एक मोहताज और विवश की इबादत कैसे कर सकता है?

अक़्ल को जागृत करने वाली दूसरी बात : अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा है कि उनसे कह दो : तुम इन पूज्यों के नाम बताओ। क्योंकि हक़ीक़त में इनका कोई वजूद है ही नहीं। यानी मेरे अलावा कोई इबादत का वास्तविक हक़दार नहीं है। लिहाज़ा अगर तुम्हारा कुछ साझी होने का दावा है, तो तुम उनके नाम बताओ। लेकिन तुम ऐसे साझियों का दावा कैसे कर सकते हो, जिनको अल्लाह नहीं जानता, जबकि तुम मानते हो कि अल्लाह आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों को जानता है? सारांश यह है कि तुम कुछ साझी बनाकर उनकी इबादत करते हो, हक़ीक़त में उनका कोई वजूद ही नहीं है।

अक़्ल को जागृत करने वाली तीसरी बात : जब ऐसे पूज्यों की कोई हक़ीक़त ही नहीं है, जो इबादत के हक़दार हों, तो साझी ठहराने का दावा बस दावा मात्र है। इसकी न कोई दलील है और न तर्क ही इसे ग्रहण करता है। यह उन दावों की तरह एक दावा है, जिन्हें दावा करने वाले यह जानते हुए भी दोहराते रहते हैं कि वे झूठे हैं।

पाँचवाँ प्रश्न : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उसने तुम्हारे लिए स्वयं तुम्हीं में से एक उदाहरण पेश किया है। हमने जो रोज़ी तुम्हें प्रदान की है, क्या उसमें तुम्हारे दासों में से तुम्हारा कोई साझी है कि तुम उसमें समान हो, उनसे वैसे ही डरते हो, जैसे एक-दूसरे से डरते हो? इसी प्रकार हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर वर्णन करते हैं, जो समझ रखते हैं।" [सूरा अल-रूम : 28] इस उदाहरण का अर्थ यह है कि किसी इन्सान को यह पसंद नहीं है कि वह जिस चीज़ का मालिक है, उसमें कोई उसका भागीदार हो। चाहे उसका पिता या भाई ही क्यों न हो। ऐसे में यह कैसे उचित हो सकता है कि एक ग़ुलाम अपने वास्तविक मालिक का भागीदार हो? जब इन्सान खुद अपने लिए इस बात को पसंद नहीं करता, तो उसे यह कैसे गवारा हो जाता है कि किसी को अल्लाह का साझी ठहराकर उसकी अल्लाह के सात इबादत करे, जबकि वह दरअसल अल्लाह का दास है, बल्कि उसके बंदे और ग़ुलाम हैं? जब इतना पता हो गया, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाली हर वास्तु अल्लाह का दास और उसका बंदा है, जबकि अक़्ल इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि एक बनाई गई सृष्टि की रचना की जाए और सृष्टिकर्ता एवं आजीविकादाता उच्च एवं पवित्र अल्लाह को छोड़ दिया जाए। [10] देखें : तफ़सीर इब्ने कसीर (6/312)

पवित्र क़ुरआन में उल्लिखित अल्लाह के साथ अन्य पूज्यों की इबादत करने वालों से किए गए कुछ प्रश्नों की समीक्षा करने के बाद हम शिर्क का अर्थ बयान करेंगे और उसके बाद शिर्क के बातिल होने के कुछ प्रमाण प्रस्तुत करेंगे।

शिर्क नाम है, किसी को उस अल्लाह का साझी बनाने का जिसने इस संसार की रचना की है। शिर्क नाम है किसी भी इबादत जैसे दुआ, ज़बह करना, मन्नत मानना और अल्लाह के सिवा से ऐसी फ़रियाद करना जिसे पूरा करने की शक्ति अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के पास नहीं है, आदि का कोई भाग अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए करने का। चाहे वह ग़ैर, अल्लाह का निकटवर्ती फ़रिश्ता हो, उसका भेजा हुआ नबी हो, कोई जीवित या मृत सदाचारी बंदा हो, मूर्ति हो, आकाश हो, ग्रह हो या प्राकृतिक शक्तियाँ आदि हों। यह सब बड़े शिर्क के अलग-अलग रूप हैं।

दरअसल अल्लाह का किसी को शरीक बनाने का मतलब यह है कि इन्सान किसी सृष्टि की वैसी ही इबादत करे जैसे अल्लाह की करता है, वैसे ही महिमा करे जैसे अल्लाह की करता है या उसे रुबूबियत, उलूहियत एवं नामों एवं गुणों में अल्लाह के बराबर सफ़ में लाकर खड़ा कर दे।

अनेकेश्वरवाद के ग़लत होने के कुछ प्रमाण :

पहला प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “आप कह दें कि यदि अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य (भी) होते, जैसा कि वे (मुश्रिक) कहते हैं, तो वे अर्श (सिंहासन) वाले (अल्लाह) की ओर (पहुँचने की) अवश्य कोई राह खोजते।" [सूरा अल-इसरा : 42] इस आयत का अर्थ यह है कि जो लोग एकाधिक पूज्यों को मानते हैं और हर पूज्य की कुछ निश्चित विशेषताएँ बताते हैं तथा कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उनके पास जाते हैं और कभी-कभी चाहते हैं कि उनके ये पूज्य उनको विशाल अर्श वाले सर्वशक्तिमान अल्लाह से निकट कर दें, तो उनकी इस धारणा को अल्लाह ने झुठलाया है और बताया है कि यदि इन पूज्यों के पास दूसरों का भला करने और उनको अल्लाह के निकट करने की शक्ति होती, तो खुद अपने आप को विशाल अर्श वाले अल्लाह से निकट कर लेते और अल्लाह के यहाँ अपना ऊँचा एवं बड़ा स्थान बना लेते। लेकिन जब वे खुद अपने लिए ऐसा कर नहीं सके, तो उनकी इबादत करना और उनसे सर्वशक्तिमान अल्लाह की निकटता प्राप्ति के लिए दुआ करना कहाँ की समझदारी है?

दूसरा प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “अल्लाह ने न कोई संतान बनाई और न कभी उसके साथ कोई पूज्य था। उस समय अवश्य प्रत्येक पूज्य, जो कुछ उसने पैदा किया था, उसे लेकर चल देता और निश्चय उनमें से एक, दूसरे पर चढ़ाई कर देता। पवित्र है अल्लाह उससे, जो वे (उसके लिए) बयान करते हैं।'' [सूरा अल-मोमिनून : 91] सर्वशक्तिमान अल्लाह इस बात को तार्किक रूप से ग़लत बता रहा है कि अल्लाह किसी को संतान बनाए एवं उसके साथ कोई अन्य पूज्य हो। अगर इस संसार में एक से अधिक पूज्य होते, तो हर पूज्य अपनी सृष्टियों के साथ अलग-अलग खड़ा हो जाता और दोनों एक-दूसरे पर विजय पाने का प्रयास करते। ऐसे में स्पष्ट बात है कि जो पराजित हो जाता है, वह पूज्य नहीं हो सकता। इब्न-ए-जरीर अपनी तफ़सीर में कहते हैं : अल्लाह की कोई संतान नहीं है। उसके साथ कोई ऐसी हस्ती भी नहीं है, जिसकी इबादत दुरुस्त हो। न आदि काल में थी न चीज़ों के रचना के समय। यदि आदि काल या चीज़ों की रचना के समय दूसरी ऐसी हस्तियाँ, जिनकी इबादत दुरुस्त हो, उपस्थित होतीं, तो सारी हस्तियाँ अपनी-अपनी उत्पत्तियों के साथ अलग-अलग खड़ी हो जातीं। फिर उनके बीच शक्ति प्रदर्शन होता। एक दूसरे से ऊपर रहने का प्रयास करते और बलशाली निर्बल से ऊँचा हो जाता। क्योंकि बलशाली कभी यह नहीं चाहेगा कि निर्बल उससे ऊपर हो जाए। ऐसे में ज़ाहिर है कि निर्बल पूज्य नहीं हो सकता। सुबहानल्लाह! संक्षिप्त में कितना बड़ा प्रमाण प्रस्तुत किया गया है! बस अक़्ल से काम लेने और ग़ौर व फ़िक्र करने की आवश्यता है। [11] जामे अल-बयान, शोधर्ता : शाकिर, (19/66)

शैख़ सादी कहते हैं : (यही कारण है कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने दो पूज्य नहीं हो सकते, इसका तार्किक कारण देते हुए फ़रमाया है : (अगर ऐसा होता तो) यानी इन लोगों के दावा के अनुसार अल्लाह के साथ अन्य पूज्य होते (हर पूज्य अपनी सृष्टियों के साथ अलग-अलग खड़ा हो जाता) तो दोनों पूज्य अपनी-अपनी सृष्टियों के साथ अलग-अलग होकर खड़े हो जाते और एक-दूसरे को नीचा दिखाने और उसपर हावी होने का प्रयास करते। (और निश्चय उनमें से एक, दूसरे पर चढ़ाई कर देता) अतः प्रभुत्वशाली ही पूज्य होगा। अगर ऐसा न होता, तो परस्पर विरोध के कारण न यह संसार अस्तित्व में आता और न यह आश्चर्यजनक व्यवस्था देखने को मिलती। आप सूरज, चाँद, स्थिर ग्रहों और तारों को देख लें। जब से पैदा हुए हैं एक ही व्यस्था के तहत और एक ही कर्म में चल रहे हैं। किसी ताक़त ने इन्हें वशीभूत कर रखा है और सारी सृष्टियों के हितों की पूर्ति में लगा रखा है। ऐसा नहीं है कि ये किसी के हित में हों और किसी के हित में न हों। आपको इनके किसी काम में कोई दोष या विरोधाभास नहीं मिलेगा। क्या यह कल्पना की जा सकती है कि इन सारी चीज़ों की व्यवस्था दो पूज्यों एवं रबों (प्रभूओं) के हाथ में हो?) [12] [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 558]

तीसरा प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अगर इन दोनों में अल्लाह के अलावा कई पूज्य होते तो दोनों नष्ट हो जाते।" [सूरा अल-अंबिया : 22] शैख़ सादी अपनी तफ़सीर में कहते हैं : (इसका विस्तार यह है कि हमें आकाशों एवं धरती की व्यवस्था बहुत ही चुस्त-दुरुस्त एवं सुदृढ़ नज़र आती है। न कोई दोष है न ऐब। न टकराव है और न विरोधाभास। और यह इस बात का प्रमाण है कि इस संसार का संचालक एक ही है। इसका रब एक ही है। इसका पूज्य एक ही है। अगर दो या अधिक संचालक एवं रब होते, तो इसकी व्यवस्था नष्ट हो जाती और इसकी बुनियाद ध्वस्त हो जाती। क्योंकि दोनों एक-दूसरे से टकराते और संघर्ष करते रहते। उदाहरणस्वरुप दोनों में से एक कोई काम करना चाहता और दूसरा उसे होने न देने का इरादा रखता, तो ज़ाहिर सी बात है कि एक साथ दोनों की मुराद पूरी हो नहीं सकती। एक की मुराद पूरी होना और दूसरे की पूरी न होना भी एक के विवश एवं अक्षम होने का प्रमाण है। जबकि हर बात पर दोनों का एकमत हो जाना भी असंभव है। अतः साबित यह हुआ कि ऐसा प्रभुत्वशाली, जिसकी हर मुराद पूरी होती हो, जिसका न कोई विरोध करने वाला हो और न उसे रोकने वाला, वही एकमात्र सर्वशक्तिमान अल्लाह है।) [13] [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 521]

चौथा प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''(ऐ नबी) आप कह दें : उन्हें पुकार कर देखो, जिन्हें तुमने अल्लाह के सिवा (पूज्य) समझ रखा है। वे आकाशों और धरती में कणभर भी अधिकार नहीं रखते, और न उन दोनों में उनकी कोई साझेदारी है और न उनमें से कोई उस (अल्लाह) का सहायक ही है। और उसके यहाँ केवल उस व्यक्ति की सिफ़ारिश लाभ देगी, जिसे अल्लाह अनुमति देगा। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर दी जाती है, तो वे (फ़रिश्ते) कहते हैं : तुम्हारे रब ने क्या कहा? वे कहते हैं : सत्य (कहा) तथा वह सर्वोच्च, बहुत महान है।" [सूरा सबा : 22-23] इस प्रमाण का अर्थ : अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आदेश दिया है कि अल्लाह के साथ अन्य पूज्यों की इबादत करने वाले इन बहुदेववादियों से कह दें : अल्लाह के अतिरिक्त इन पूज्यों को, जो किसी का भला नहीं कर सकते, ज़रा पुकार कर देखो, यदि तुम्हें लगता है कि वे पुकारने वालों का कुछ भला कर सकते हैं। क्या ये आकाशों एवं धरती की किसी चीज़ के स्थायी मालिक हैं? कणभर चीज़ ही के सही?

और ज़रा नीचे उतर आइए। अगर वे किसी चीज़ के मालिक नहीं हैं, तो क्या वे किसी छोटी से छोटी चीज़ में अल्लाह के साझी ही हैं?

जब वे किसी चीज़ के स्थायी मालिक नहीं हैं और अल्लाह के साझी भी नहीं हैं, तो क्या वे अल्लाह के सहयोगी एवं सहायक हैं कि उनकी इस सहायता एवं सहयोग के कारण अल्लाह उनकी दुआ ग्रहण करे? दरअसल इन सारी बातों से अल्लाह बहुत ज़्यादा ऊँचा है।

या फिर अल्लाह के यहाँ अपनी इबादत करने वालों की सिफ़ारिश करें। हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है कि कोई, चाहे कितने ऊँचे स्थान पर विराजमान क्यों न हो, किसी चीज़ का स्थायी मालिक नहीं है, अल्लाह का साझी एवं उसका सहोयगी नहीं है और उसकी अनुमति के बिना उसके यहाँ सिफ़ारिश नहीं कर सकता। जब वस्तुस्थिति यही है तो उसे भला कैसे पुकारा जा सकता है, जो किसी चीज़ का मालिक न हो, किसी चीज़ में साझीदार न हो, किसी चीज़ में सहयोगी न हो और सिफ़ारिशी न हो? इतने विवश, निर्बल, निर्धन और तुच्छ की इबादत कैसे? कोई निर्धन अपने ही जैसे या अपने से अधिक किसी निर्धन की पूजा कैसे करे? [14] देखें : जामे अल-बयान (20/394) तथा तैसीर अल-करीम अल-रहमान, पृष्ठ : 678

हम सब जानते हैं कि जो किसी पूज्य को पुकारता है, वह उसे लाभ प्राप्त करने या हानि से बचने के लिए पुकारता है, क्योंकि इस बात का विश्वास रखता है कि उसके पूज्य के अंदर चार बातों में से एक बात पाई जाती है : वह या तो उस चीज़ का मालिक है, जो बंदे उससे माँग रहे हैं। अगर मालिक नहीं है, तो मालिक का साझीदार है। अगर साझीदार नहीं है, तो सहयोगी एवं सहायक है। अगर सहायक नहीं है, तो उसके यहाँ सिफ़ारिश करने वाला है।

चुनांचे सर्वशक्तिमान अल्लाह ने क्रमबद्ध तरीक़े से उच्चतम से निम्नतम की ओर बढ़ते हुए चारों स्तरों को नकार दिया। उसने स्वामित्व, साझेदारी, सहयोग एवं सिफ़ारिश को नकार दिया। [15] मदारिज अल-सालिकीन (1/351) कुछ परिवर्तन के साथ।

पाँचवाँ प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "वह रात को दिन में दाखिल करता है, तथा दिन को रात में दाखिल करता है, तथा सूर्य एवं चाँद को काम में लगा रखा है। उनमें से प्रत्येक एक निश्चित समय तक चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है। उसी का राज्य है। तथा जिन्हें तुम उसके सिवा पुकारते हो, वे खजूर की गुठली के छिलके के भी मालिक नहीं हैं।" [सूरा फ़ातिर : 13], पिछले प्रमाण में सर्वशक्तिमान रब ने अपने सिवा अतिरिक्त पूजे जाने वालों, जिन्हें बहुदेववादी संसार के रब अल्लाह का साझी बनाते हैं, की निर्धनता एवं विवशता बयान की है, तो इस प्रमाण में अपनी संपूर्णता, महानता और इस संसार के संचालन के कुछ पक्षों को बयान किया है। वही रात को दिन में दाख़िल करता है, दिन को रात में दाख़िल करता है, सूरज और चाँद को काम पर लगाए रखता है, तथा एक निश्चित समय तक गतिमान रखता है, जो उसके हिकमत वाला, क्षमतावान् और सर्वसूचित होने का प्रमाण है। वही ऐसा पूज्य है, जिसके साथ कोई रब नहीं है। उसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। ये इस संसार में सर्वशक्तिमान रब की तदबीर के कुछ उदाहरण हैं। तो फिर अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्यों, जिन्हें बहुदेववादी अल्लाह का साझी बनाते हैं, की तदबीर कहाँ है? फिर अल्लाह ने इन पूज्यों के बारे में अपना निर्णय सुनाया कि ये निर्धन हैं, बल्कि निर्धनता के अंतिम सिरे पर हैं कि खजूर की गुठली के छिलके के भी मालिक नहीं हैं।

फिर सर्वशक्तिमान रब ने उनको ऐसी चुनौती दी कि अक़्ल खुल जाए और अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्य की विवशता सामने आ जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''यदि तुम उन्हें पुकारो, तो वे तुम्हारी पुकार नहीं सुन सकते। और यदि सुन भी लें, तो तुम्हें उत्तर नहीं दे सकते। और वे क़ियामत के दिन तुम्हारे शिर्क का इनकार कर देंगे। और (ऐ रसूल!) आपको सर्वज्ञाता (अल्लाह) की तरह कोई सूचना नहीं देगा।'' [सूरा फ़ातिर : 14], यानी ये पूज्य पुकारने वालों की पुकार नहीं सुनते, क्योंकि ये निर्जीव हैं। इनमें प्राण नहीं है। अगर मान भी लिया जाए कि सुनते हैं, तो पुकारने वालों का जवाब नहीं देते। मुसीबत यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी इबादत की जाती है, वे क़यामत के दिन अपनी इबादत करने वालों से पल्ला झाड़ लेंगे। इस तरह, न दुनिया में लाभदायक साबित हुए और न आख़िरत में लाभदायक साबित होंगे। लिहाज़ा प्रश्न यह उठता है कि बहुदेववादियों को इन पूज्यों से हाथ क्या लगा?

छटा प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के सिवा कुछ नहीं। निश्चय उससे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके और उसकी माँ सिद्दीक़ा (अत्यंत सच्ची) है। दोनों खाना खाया करते थे। देखो, हम उनके लिए किस तरह निशानियाँ स्पष्ट करते हैं। फिर देखो, वे किस तरह फेरे जाते हैं। आप कह दें : क्या तुम अल्लाह के सिवा उसकी इबादत करते हो, जो तुम्हारे लिए न किसी हानि का मालिक है और न लाभ का? तथा अल्लाह ही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।'' [सूरा अल-माइदा : 75-76], ईसाइयों ने ईसा अलैहिस्सलाम के अल्लाह का बेटा होने का दावा किया और सर्वशक्तिमान अल्लाह ही की तरह उनकी इबादत की, लिहाज़ा सर्वशक्तिमान अल्लाह ने इस आयत में कुछ ऐसी बातें बता दीं कि एक विवेकी व्यक्ति उनपर ग़ौर करे, तो वह इस यक़ीन के साथ निकलेगा कि ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के बंदों में से एक बंदे हैं, आम इन्सानों की तरह एक औरत के पेट से पैदा हुए हैं, अन्य सारे इन्सानों की तरह उनको भी खाने तथा पीने की ज़रूरत होती थी। ज़ाहिर-सी बात है कि जिसका यह हाल हो, वह पूज्य एवं पूज्य का बेटा नहीं हो सकता एवं अल्लाह के स्थान पर उसकी इबादत दुरुस्त नहीं हो सकती। क्योंकि खाना-पीना न मिले, तो वह अन्य इन्सानों की तरह हलाक हो जाएगा। फिर सर्वशक्तिमान रब ने बताया कि ईसा अलैहिस्सलाम अपनी इबादत करने वालों को लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकते। अगर वह लाभ पहुँचाने या हानि करने के मालिक होते, तो खुद अपने को लाभ पहुँचाते और यहूदियों की यातनाओं से खुद को बचाते, जो उनकी हत्या करने पर तुले हुए थे।

ईसाइयों को लाजवाब कर देने वाला यह प्रमाण, जिसका न तो वे खंडन कर सकते हैं और न उसे अमान्य कह सकते हैं, लोगों के द्वारा पूज्य बना लिए गए तमाम इन्सानों की इबादत को बातिल कर देता है। वह चाहे उज़ैर हों, बुद्ध हों, कन्फ़्यूशियस हों या कोई और इन्सान, जिसे पूज्य बना लिया गया हो। इन सारे लोगों को उनकी माताओं ने जना है। ये सारे लोग खाते और पीते थे। अपने अनुसरणकारियों के भले-बुरे के मालिक नहीं थे। जैसे ही साबित हो गया कि उनको अपने जीवन को स्थापित रखने के लिए खाने-पीने की ज़रूरत थी, तो स्पष्ट हो गया कि उनकी इबादत उचित नहीं हो सकती। यह कैसे हो सकता है लोग कुछ लोगों को सर्वशक्तिमान रब का साझी बनाकर उनकी इबादत करें और सब कुछ सुनने वाले, सब कुछ जानने वाले तथा नुक़सान से बचाने और लाभ पहुँचाने की क्षमता रखने वाले अल्लाह को छोड़ दें?

सातवाँ प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और यदि आप उनसे पूछें कि आकाशों तथा धरती को किसने पैदा किया है? तो वे अवश्य कहेंगे कि अल्लाह ने। आप कह दीजिए कि तुम बताओ कि जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, यदि अल्लाह मुझे कोई हानि पहुँचाना चाहे, तो क्या ये उसकी हानि दूर कर सकते हैं? या मेरे साथ दया करना चाहे, तो क्या ये उसकी दया को रोक सकते हैं? आप कह दें कि मेरे लिए अल्लाह ही काफ़ी है। उसीपर भरोसा करने वाले भरोसा करते हैं।" [सूरा अल-ज़ुमर : 38], इस आयत में अल्लाह के सिवा की पूजा करने वाले हर व्यक्ति से एक स्पष्ट प्रश्न किया गया है कि आकाशों एवं धरती की रचना किसने की है? निश्चित रूप से उसका उत्तर होगा कि 'अल्लाह ने'। यहीं से एक अन्य प्रश्न भी निकलता है। पूछा गया है : ये पूज्य, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, यदि अल्लाह मुझे शारीरिक हानि पहुंचाना चाहे या मेरी रोज़ी तंग कर देना चाहे या फिर मुझपर दया करना चाहे, जैसे मुझे रोज़ी, धन-दौलत और बाल-बच्चों की परचुरता देना चाहे, तो क्या तुम्हारे ये पूज्य मेरी परेशानी दूर कर सकते हैं या अल्लाह की ओर से प्राप्त होने वाली दया से मुझे वंचित रख सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर, जो इन पूज्यों की इबादत करने वाले हर व्यक्ति को मालूम है, यह है कि ये न लाभ पहुँचा सकते हैं न हानि, न रोक सकते हैं न दे सकते हैं, न परेशानी दूर कर सकते हैं न भलाई से वंचित रख सकते हैं। अब कोई बताए कि जब वस्तुस्थिति यह हो, तो अल्लाह के स्थान पर इनकी इबादत कैसे हो सकती है? सब को पता है कि ऐसा व्यक्ति, जो हानि तथा लाभ न पहुँचा सके और किसी काम की क्षमता न रखे, उसे उसके समानांतर खड़ा नहीं किया जा सकता, जिसके हाथ में सारी भलाइयाँ हों और वह, जो चाहे करने की क्षमता रखता हो। दोनों को समानांतर खड़ा करने की मूर्खता कोई विवेकहीन व्यक्ति ही कर सकता है।

आठवाँ प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''मैंने उन्हें न आकाशों तथा धरती के पैदा करने में उपस्थित किया और न स्वयं उनके पैदा करने में, और न ही मैं पथभ्रष्ट करने वालों को सहायक बनाने वाला था।'' [सूरा अल-कह्फ़ : 51] इब्ने कषीर - उनपर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैं : (अल्लाह कह रहा है : ये लोग, जिन्हें तुमने मेरे स्थान पर कारसाज़ बना रखा है, तुम जैसे बंदे ही हैं। किसी चीज़ के मालिक नहीं हैं। मैंने उन्हें आकाशों एवं धरती की रचना का गवाह नहीं बनाया है, और वह उस समय मौजूद भी नहीं थे। उच्च एवं महान अल्लाह कह रहा है : मैने ही सारी चीज़ों की रचना की है, मैं ही इनका संचालक हूँ और मैं ही इनसे जुड़े हुए सारे निर्णय लेता हूँ। इस मामले में मेरा न कोई साझी है, न मंत्री है, न परामर्शदाता है, न समकक्ष है।) [16] जब ये पूज्य आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति, बल्कि खुद अपनी रचना के समय भी मौजूद नहीं थे, तो इसका मतलब यह है कि एक समय इनका अस्तित्व नहीं था। उनके रब ने उनकी रचना की, तब अस्तित्व में आए। अतः तुम इन्हें अल्लाह के स्थान पर पूज्य कैसे बनाते हो? तफ़सीर इब्ने कषीर (5/153)

नवाँ प्रमाण : अल्लाह ने इस ब्रह्माण्ड की सारी सृष्टियों को आजीविका प्रदान करने की ज़िम्मेवारी ले रखी है। इस तरह वह सृष्टिकर्ता एवं आजीविकादाता है और अन्य सारी चीज़ें सृष्टि एवं आजीविका प्राप्तकर्ता हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "कितने ही जीव हैं, जो अपनी रोज़ी नहीं उठा सकते। अल्लाह ही उन्हें रोज़ी देता है और तुम्हें भी! और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" [सूरा अल-अनकबूत : 60], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : “और धरती पर चलने-फिरने वाला जो भी प्राणी है, उसकी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है। वह उसके ठहरने के स्थान तथा उसके सौंपे जाने के स्थान को जानता है। सब कुछ एक स्पष्ट पुस्तक में (अंकित) है।” [सूरा हूद : 6], अतः कौन हर जानवर, पक्षी एवं अन्य को रोज़ी देता है? क्या ये जानवर खुद ही अपने आपको रोज़ी देते हैं या जहाँ जाते हैं, अपने साथ अपना सामान ले जाते हैं? क्या कोई कह सकता है कि उनके पूज्यों ने इन जानवरों को पैदा किया है तथा उनको रोज़ी देने की ज़िम्मेवारी ले रखी है? अतः जब किसी ने इनको पैदा नहीं किया है और इनको रोज़ी देने की ज़िम्मेवारी नहीं ली है, तो निश्चित हो गया कि सर्वशक्तिमान रब ही इनका आजीविकादाता है और जब वही एकमात्र आजीविकादाता है, तो वही इबादत का हक़दार भी है। इसमें उसका कोई साझी नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने उसमें तुम्हारे लिए जीवन के संसाधन बना दिए। तथा उनके लिए (भी) जिन्हें तुम हरगिज़ रोज़ी देने वाले नहीं।" [सूरा अल-हिज्र : 20, यानी उसने तुम्हारे लिए जीवन के संसाधन, जैसे घर, कपड़े और भोजन आदि बनाए। तुम्हारे तथा तुम्हारे जानवरों के लिए खाने-पीने की चीज़ें पैदा कीं। क्या होता, अगर अल्लाह ने इन जानवरों के लिए भोजन न तैयार किया होता? इन्सान इनसे लाभ कैसे उठाता? क्या इन्सान उनके लिए भोजन पैदा कर पाता? क्या ये पूज्य इन्सान तथा उसके जानवरों को रोज़ी दे सकते हैं? जब रोज़ी दे नहीं सकते, तो उनकी इबादत कैसे हो सकती है?

दसवाँ प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और उन्होंने उसके अतिरिक्त अनेक पूज्य बना लिए, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं करते और वे स्वयं पैदा किए जाते हैं और न वे अधिकार रखते हैं अपने लिए किसी हानि का और न किसी लाभ का, तथा न अधिकार रखते हैं मरण का और न जीवन का और न पुनः जीवित करने का।'' [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 3], इस आयत में अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली अन्य चीज़ों के पूज्य होने को असत्य प्रमाण करने वाले निम्नलिखित बड़े-बड़े प्रमाण मौजूद हैं :

1- अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी इबादत की जाती है, वे कुछ पैदा नहीं कर सकते। खुद सृष्टि हैं। अतः एक सृष्टि के लिए अपनी ही जैसी एक सृष्टि की इबादत का क्या औचित्य है?

2- अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी इबादत की जाती है, वे खुद अपने भले-बुरे के भी मालिक नहीं हैं। दूसरों के भले-बुरे के मालिक कैसे हो सकते हैं और उनको मुसीबत से कैसे बचा सकते हैं?

3- अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी इबादत की जाती है, वे मृत्यु, जीवन तथा मृत्यु के बाद दोबारा उठाए जाने के मालिक नहीं हैं। न किसी मृत को जीवित कर सकते हैं, न किसी जीवित को मार सकते हैं और न क़यामत के दिन सृष्टियों को जीवित करके उठा सकते हैं। जो इतना विवश हो उसकी इबादत कैसे हो सकती है?

ग्यारहवाँ प्रमाण : उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) उनसे कह दें : क्या तुमने अपने उन साझियों को देखा, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो? मुझे दिखाओ कि उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है? या उनकी आकाशों (की रचना) में कुछ साझेदारी है? या हमने उन्हें कोई पुस्तक प्रदान की है कि वे उसके किसी स्पष्ट प्रमाण पर (क़ायम) हैं? बल्कि (वास्तविकता यह है कि) अत्याचारी लोग एक-दूसरे को केवल धोखे का वादा करते हैं।" [सूरा फ़ातिर : 40], शैख़ अब्दुर रहमान सादी रहिमहुल्लाह कहते हैं : "उच्च एवं महान अल्लाह बहुदेववादियों के पूज्यों की विवशता ज़ाहिर करते हुए, उनकी कमी बयान करते हुए और हर प्रकार से उनके शिर्क के ग़लत होने का उल्लेख करते हुए कहता है : {आप कह दें :} ऐ रसूल, उनसे : {क्या तुमने देखा} यानी तुम मुझे अपने साझियों के बारे में बताओ। {जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो?} क्या वे दुआ एवं इबादत के हक़दार हैं तो {मुझे दिखाओ कि उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है?} क्या उन्होंने समुद्र को पैदा किया है? क्या उन्होंने पर्वत पैदा किए हैं? क्या उन्होंने जानवरों को पैदा किया है? क्या उन्होंने बेजान चीज़ों को पैदा किया है? वे निश्चि रूप से इस बात का इक़रार करेंगे कि इन तमाम चीज़ों का स्रष्टा उच्च एवं महान अल्लाह है। क्या उनके साझेदारों की कुछ साझेदारी है {आकाशों में?} यानी आकाशों की रचना एवं तदबीर में? वे निश्चित रूप से उत्तर देंगे कि उनकी कोई साझेदारी नहीं है।

जब उन्होंने कुछ पैदा नहीं किया है और पैदा करने वाले के साझेदार भी नहीं रहे, तो तुम उनकी इबादत क्यों करते हो और उनको क्यों पुकारते हो? अतः इन पूज्यों की इबादत का तार्किक प्रमाण ख़त्म हो गया और स्पष्ट हो गया कि यह ग़लत है।

फिर वह्य से इनकी इबादत के उचित न होने का उल्लेख करते हुए फ़रमाया : {या हमने उन्हें कोई पुस्तक प्रदान की है} जो उनके शिर्क को उचित ठहराती और उनको शिर्क एवं बुतों की पूज का आदेश देती हो। {अतः वे} अपने शिर्क में {प्रमाण पर (क़ायम) हैं?} उनपर उतरने वाली किबात से शिर्क के सही होने के संबंध में? सच्चाई यह है कि ऐसा है हीं। क्योंकि उनपर कोई तिताब उतरी ही नहीं है।" [17] [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 691]

सारांश यह कि मुश्रिकों के पास बुतों की पूजा के सही होने का न कोई तार्किक प्रमाण है और न शरई प्रमाण।

कुछ ऐसे प्रमाणों के उल्लेख के बाद, जो अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्यों, जो चाहे इन्सान के रूप में हों या पत्थर या मूर्ति के रूप में, की इबादत के अनुचित होने को प्रमाणित करते हैं, हम कुछ ऐसी बातें ज़िक्र करने जा रहे हैं, जिनके माध्यम से अल्लाह ने मानव जाति को चुनौती दी, और जिसके द्वारा मानव जाति और अल्लाह के अतिरिक्त पूज्यों की विवशता ज़ाहिर हो गई। ये चुनौतियाँ इस प्रकार हैं :

पहली चुनौती : उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में दी गई है : "(ऐ नबी!) उनसे कहो, भला बताओ तो सही कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना आ जाए, या तुमपर क़यामत आ जाए, तो क्या तुम अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे? यदि तुम सच्चे हो। बल्कि तुम उसी को पुकारोगे, फिर वह दूर कर देगा (उस विपत्ति को) जिसके लिए तुम उसे पुकारोगे, यदि उसने चाहा, और तुम भूल जाओगे जिसे साझी बनाते हो।" [सूरा अल-अनआम : 40-41] इन दो आयतों का अर्थ बताते हुए इब्न-ए-अतिय्या ने कहा है : (ज़रा तुम बताओ कि जब तुम्हें अल्लाह की यातना का डर होता है, विनाश का भय सताता है या क़यामत का डर सामने होता है, तो क्या तुम उस डर से छुटकारा पाने के लिए अपने बुतों को पुकारते हो और उनका शरण लेते हो? इसका उत्तर दो, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि यह तुम्हारे पूज्य हैं। सच्चाई यह है कि तुम ऐसा नहीं करते। तुम पैदा करने वाले और रोज़ी देने वाले अल्लाह को पुकारते हो और अगर वह चाहे तो तुम्हारे भय को दूर करता है। उस समय तुम अपने बुतों को भूल जाते हो। यानी उनको छोड़ देते हो। यहाँ छोड़ने का अर्थ व्यक्त करने के लिए उसके महानतम रूप को चुना गया है, जिसमें छोड़ने के साथ-साथ विस्मृति एवं लापरवाही भी पाई जाती है। अब बताओ कि जिसे तुम कठिन समय में पुकारते नहीं हो, वह पूज्य कैसे हो सकता है?) [18] अल-मुहर्रर अल-वजीज़ फ़ी तफ़सीर अल-किताब अल-अज़ीज़ (2/290)

यह एक ऐसी हक़ीक़त है, जिसका इनकार या जिससे अभिमान करना संभव नहीं है कि जब कोई विपत्ति आती है या कोई दुर्घटना घट जाती है, तो लोग सर्वशक्तिमान रब की शरण लेते हैं और उन पूज्यों को भूल जाते हैं, जिनकी वह इबादत किया करते थे। फिर, अल्लाह ही जब चाहे, उनकी विपत्ति दूर करता है। लेकिन इससे उनकी चेतना जागृत नहीं होती कि वह अपने रब, उत्पत्तिकार और आजीविकादाता की इबादत की ओर लौट जाएँ।

दूसरी चुनौती : उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में दी गई है : "ऐ नबी! आप कह दें कि भला बताओ तो सही कि यदि अल्लाह तुम्हारे सुनने तथा देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर मुहर लगा दे, तो अल्लाह के सिवा कौन-सा पूज्य है, जो तुम्हें ये चीज़ें लाकर दे? देखो, हम कैसे तरह-तरह से आयतें बयान करते हैं, फिर (भी) वे मुँह फेर लेते हैं।" [सूरा अल-अनआम : 46] अतः अल्लाह ही इस सृष्टि का एकमात्र रचयिता है। उसी ने इन्सान को सुनने, देखने और समझने की शक्तियाँ प्रदान की हैं और वह इन शक्तियों को उससे छीन भी सकता है। अब अगर अल्लाह उससे यह शक्तियाँ छीन लेता है, तो क्या कोई उसे यह शक्तियाँ प्रदान कर सकता है? स्पष्ट है कि जब अल्लाह ही देने वाला और वही छीनने की शक्ति रखने वाला है, तो वही इबादत का हक़दार भी है। जब अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाले अन्य पूज्यों ने देखने, सुनने और सोचने-समझने की शक्तियाँ प्रदान नहीं की हैं और इन्हें इन्सान से छीनने की शक्ति भी नहीं रखते हैं, तो अल्लाह के स्थान पर इनकी इबादत कैसे की जा सकती है?

तीसरी चुनौती : उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में दी गई है : "(ऐ नबी!) आप कह दें : क्या तुमने देखा कि यदि अल्लाह क़यामत के दिन तक तुमपर हमेशा के लिए रात कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हारे लिए प्रकाश ला सके? तो क्या तुम नहीं सुनते? आप कह दें : क्या तुमने देखा कि यदि अल्लाह क़यामत के दिन तक तुमपर हमेशा के लिए दिन कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हारे लिए रात ले आए, जिसमें तुम विश्राम कर सको? तो क्या तुम नहीं देखते?" [सूरत अल-क़सस : 71-72] अल्लाह ने मानव समाज को एक ऐसी चीज़ के माध्यम से चुनौती दी है, जो हर रोज़ देखने को मिलती है। यह इस संसार का सबसे बड़ा दैनिक परिवर्तन है। लेकिन परिवर्तन इतना बड़ा होने के बावजूद भी चूँकि हर रोज़ सामने आता है, बहुत कम लोग इसपर ध्यान देते हैं। हालाँकि होना यह चाहिए था कि इसकी पुनरावृत्ति लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती और इस व्यवस्था की उत्पत्ति करने वाले की इबादत का संदेश देती। इस चुनौती का सारांश यह है कि अगर अल्लाह ने रात को क़यामत के दिन तक लम्बा कर दिया होता, तो क्या अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य है, जो दिन ले आता? इसी तरह अगर क़यामत के दिन तक दिन को लम्बा कर देता, तो क्या अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य है, जो रात ले आता, जिसमें हम आराम कर पाते? क्या सारे इन्सान मिलकर और अल्लाह के अतिरिक्त उनके सारे पूज्य मिलकर इस संसार की व्यवस्था को बदल सकते हैं? हम लग-भग हर साल सूरज और चाँद ग्रहण देखते हैं। दुनिया की कोई भी शक्ति सूरज अथवा चाँद को ग्रहण से पहले की अवस्था पर ला नहीं सकती। यह काम बस सर्वशक्तिमान एवं क्षमतावान् रब ही करता है और वही एकमात्र इबादत का हक़दार है।

शैख़ इब्न-ए-आशूर रहिमहुल्लाह कहते हैं : क़ुरआन द्वारा प्रमाण प्रस्तुत किए जाने का एक अद्भुत रूप यह है कि उसने अल्लाह के एक होने को प्रमाणित करने के लिए हर दिन दो-दो बार सामने आने वाले इस परिवर्तन को प्रस्तुत किया है, जिसे हर समझ-बूझ रखने वाला व्यक्ति देख सकता है और जो इस दुनिया का सबसे स्पष्ट परिवर्तन है। यह ऐसा परिवर्तन है, जिससे इस संसार की हर चीज़ प्रभावित होती है। बुतों का शरीर भी रात के अंधेरे में काला बन जाता है और दिन के उजाले में चमकने लगता है। उजाला और अंधेरे के आने-जाने को प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत करना, दोनों में से किसी एक की उत्पत्ति को, अगर वही हमेशा रह जाता, प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत करने से कहीं अधिक प्रबल एवं स्पष्ट है। क्योंकि दो विपरीत चीज़ों के उत्पत्तिकार और उनमें से एक को दूसरे के द्वारा हर दिन निरस्त करने वाले की क्षमता इससे कहीं अधिक स्पष्ट है कि यदि उसने दोनों में से केवल अधिक शक्तिशाली एवं अधिक लाभकारी को ही बनाया होता। दूसरी बात यह है कि दोनों के हमेशा आगे-पीछे आते-जाते रहने की नेमत दोनों में से अधिक उत्कृष्ट एवं अधिक लाभकारी के हमेशा क़ायम रहने की नेमत से बड़ी नेमत है। इस लिए ये अगर हमेशा क़ायम रहती, तो थका देती और कुछ हित प्राप्त होते, तो कुछ छूट भी जाते।) [19] अल-तहरीर व अल-तनवीर (20/168-169) मामूली परिवर्तन के साथ।

इब्न-ए-जरीर ने आयत को इन शब्दों के साथ ख़त्म करने के बारे में बात करते हुए कहा है : {तो क्या तुम नहीं देखते?} (क्या तुम अपनी आँखों से रात और दिन के आने-जाने को नहीं देखते? यह तुमपर अल्लाह की दया है। इससे यह सीखो कि इबादत केवल उसी की दुरुस्त है, जिसने तुम्हें रात और दिन प्रदान किए हैं और जिसके पास इस चक्र को स्थापित करने की शक्ति है।) [20] जामे अल-बयान (19/613)

चौथी चुनौती : उच्च एवं महान अल्लाह के इस कथन में दी गई है : "और हमने आकाश से एक अंदाज़े के साथ कुछ पानी उतारा, फिर उसे धरती में ठहराया और निश्चय हम उसे किसी भी तरह से ले जाने पर सामर्थ्यवान हैं।" [सूरा अल-मोमिनून : 18], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "आप कह दें : भला बताओ तो सही, यदि तुम्हारा पानी गहराई में चला जाए, तो कौन है जो तुम्हारे पास बहता हुआ पानी लाएगा?" [सूरा अल-मुल्क : 30] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और हमने बादलों को पानी से गर्भित करने वाली हवाओं को भेजा, फिर हमने आकाश से पानी उतारा, और उसे तुम्हें पिलाया, तथा तुम हरगिज़ उसे संग्रह करने वाले नहीं।" [सूरा अल-हिज्र : 22], इन आयतों में अल्लाह सृष्टियों पर अपनी एक बड़ी नेमत का उल्लेख कर रहा है। नेमत यह है कि उसने उनके लिए पानी पैदा किया, जिससे हर जीवित चीज़ का जीवन जुड़ा हुआ है। वह इस पानी को ले भी जा सकता है या इतनी गहराई में भेज सकता है कि सृष्टि उसे निकाल न सके। जब इन्सान आकाश से पानी उतार नहीं सकता, उसे धरती से निकाल नहीं सकता और उसे संग्रह करके रख नहीं सकता, तो अल्लाह के द्वारा उसे ख़त्म करने का निर्णय हो जाने पर निश्चित रूप से इन्सान हलाक हो जाएगा। अल्लाह के द्वारा पानी को ख़त्म करने का निर्णय हो जाने पर अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाले अन्य पूज्य इन्सान को पानी दे भी नहीं सकते। ज़ाहिर सी बात है कि जब ये पूज्य अपने उपासकों को पानी दे नहीं सकते, तो वह इबादत के हक़दार भी नहीं हैं। इससे स्पष्ट हो गया कि अल्लाह को छोड़कर इनकी इबादत गुमराही एवं घाटे का सौदा है।

पाँचवीं चुनौती : यह एक बहुत बड़ी चुनैती है। चुनौती यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य पूज्य, जैसे पत्थर, पेड़ या इन्सान आदि की पूजा करने वाला हर व्यक्ति दरअसल यह दावा करता है कि उसके पास अपने पूज्य की पूजा के औचित्य का कोई प्रमाण है। हालाँकि इस प्रकार के लोगों के पास कोई तार्किक या वह्य के माध्यम से प्राप्त होने वाला प्रमाण नहीं है, जो उनके दावा को सही ठहराता हो। उनकी कुल जमा पूंजी बस अनुमान, अंदाज़ा और झूठा गुमान है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या उन्होंने उसके सिवा और भी पूज्य बना लिए हैं? (ऐ नबी!) आप कह दें कि अपना प्रमाण लाओ। यह मेरे साथ वालों की किताब (क़ुरआन) है, और ये मुझसे पहले के लोगों पर उतरने वाली किताबें हैं, (इनमें तुम्हारे लिए कोई प्रमाण नहीं है)। बल्कि उनमें से अधिकतर लोग सत्य का ज्ञान नहीं रखते। इसी कारण, वे मुँह फेरने वाले हैं।" [सूरा अल-अंबिया : 24], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "या वह जो सृष्टि का आरंभ करता है, फिर उसे दोहराता है, और जो तुम्हें आकाश और धरती से जीविका देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई (और) पूज्य है? कह दीजिए : लाओ अपना प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो।" [सूरा अल-नम्ल : 64], मुश्रिक के पास अपने शिर्क को उचित ठहराने का कोई प्रमाण नहीं है। वह अधिक से अधिक कुछ कहानियाँ, किदवंतियाँ और नस्ल दर नस्ल प्राप्त होने वाली अंधविश्वास ही दिखा सकते हैं, जो सत्य के आगे ठहर नहीं सकते। आज हम अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्यों की पूजा करने वाले हर व्यक्ति से कहना चाहते हैं कि तुम इस बात का प्रमाण दिखाओ कि तुम्हारे पूज्य पूजा के हक़दार हैं। लेकिन वह कोई प्रमाम प्रस्तुत कर नहीं सकते। क्योंकि असत्य के पक्ष में कोई सच्चा प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

दूसरा अनुभाग : उत्पत्ति

पहली परिचर्चा : उत्पत्ति के आरंभ तथा पानी, आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति से पहले अस्तित्व का हाल

अल्लाह मौजूद था और उसके साथ कुछ नहीं था। अल्लाह मौजूद था और उससे पहले कुछ नहीं था। अल्लाह ने पानी पैदा किया, फिर आकाशों एवं धरती की रचना की। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या अविश्वासी लोगों ने नहीं देखा कि आसमान और ज़मीन एक साथ मिले हुए थे, फिर हमने उनको अलग किया और हर जीवित चीज़ को हमने पानी से पैदा किया? क्या ये लोग फिर भी ईमान नहीं लाते?" [सूरा अल-अंबिया : 30], इब्ने कषीर - उनपर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैं : सर्वशक्तिमान अल्लाह ने अपनी संपूर्ण शक्ति, वस्तुओं की रचना की अपार क्षमता और सभी सृष्टियों के उसके अधीन होने की ओर इशारा करते हुए कहा है : क्या अविश्वासियों, यानी उसके पूज्य होने का इनकार करने वाले और दूसरों को उसका साझी बनाने वाले नहीं जानते कि अल्लाह ही एकमात्र उत्पत्तिकार और इस संसार का एकमात्र संचालक है? अतः उसके साथ किसी और की इबादत करना और किसी और को उसका साझी बनाना कैसे उचित हो सकता है? क्या उन्होंने नहीं देखा कि आरंभ में आकाश और धरती सब एक साथ मिले हुए थे, एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और एक-दूसरे के ऊपर जमा थे? उसे एक को दूसरे से अलग किया। सात आकाश बना दिए। सात धरती बना दी। निचले आकाश एवं धरती के बीच वायु मंडल बना दिया। [21] तफ़सीर इब्ने कषीर (5/297)

यह हुई आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति के आरंभ की बात। फिर महान रब ने वह समय भी स्पष्ट कर दिया, जो इन सृष्टियों की उत्पत्ति में लगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप कह दें कि क्या तुम उस अस्तित्व का इनकार करते हो, जिसने धरती को दो दिनों में पैदा किया और उसके समकक्ष ठहराते हो? वह तो समस्त संसार का पालनहार है। तथा उस (धरती) में उसके ऊपर से पर्वत बनाए, तथा उसमें बरकत रख दी और उसमें उसके वासियों के आहार चार दिनों में निर्धारित किए, समान रूप से, प्रश्न करने वालों के लिए। फिर उसने आकाश का क़सद किया, जबकि वह धुआँ था। तो उसने उससे और धरती से कहा : तुम दोनों आओ, स्वेच्छा से या मजबूरी से। दोनों ने कहा : हम स्वेच्छा से आ गए। फिर उसने उन्हें दो दिनों में सात आकाश बना दिए और प्रत्येक आकाश में उससे संबंधित काम की वह़्य की। तथा हमने निकटतम (निचले) आकाश को दीपों (चमकदार सितारों) से सुशोभित किया, तथा (उनके द्वारा) उसको सुरक्षित कर दिया। यह अत्यंत प्रभुत्वशाली, सब कुछ जानने वाले (अल्लाह) की योजना है।'' [सूरा फ़ुस्सिलत : 9-12] सर्वशक्तिमान रब ने धरती की रचना की, फिर उसमें उसकी तथा उसमें रहने-सहने एवं जीवन बसर करने वालों की ज़रूरत की चीज़ें रखकर उसे संपूर्ण रूप दिया, फिर आकाश की ओर रुख़ किया, उसकी रचना की और बड़ी सुंदर रचना की।

अल्लाह ने आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति का काम अपने दिनों में से छह दिनों में पूरा किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''जिसने आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उनके बीच है, छह दिनों में पैदा किया, फिर अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। (वह) बहुत दयालु है। अतः उसके बारे में किसी पूर्ण जानकार से पूछिए।'' [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 59]

जब अल्लाह ही इस संसार का उत्पत्तिकार है, उसी ने इसे तैयार किया है और रहने योग्य बनाया है, तो अन्य पूज्यों को उसका साझी कैसे बनाया जा सकता है और लोग उसके साथ दूसरों की इबादत कैसे कर सकते हैं? अल्लाह इससे पाक एवं पवित्र है। अन्य पूज्यों ने इस संसार की कोई छोटी से छोटी चीज़ भी पैदा नहीं की है, इस बात पर सभी लोग एकमत हैं। अतः उसे छोड़कर किसी और की इबादत कैसे उचित हो सकती है?

दूसरी परिचर्चा : फ़रिश्तों की उत्पत्ति

पवित्र एवं महान रब ही उत्पत्तिकार है और इस ब्रह्मांड की सारी चीज़ें उसकी उत्पत्ति हैं। अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि अल्लाह ने फ़रिश्तों को नूर से पैदा किया है। उन्हें अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। इसलिए वे अल्लाह के किसी आदेश की अवहेलना नहीं करते और उसके हर आदेश का पालन करते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा आकाशों एवं धरती में जितने जीवधारी हैं, सब अल्लाह ही को सजदा करते हैं तथा फ़रिश्ते (भी)। और वे अहंकार नहीं करते। वे अपने रब से डरते हैं, जो उनके ऊपर है। और वे वही करते हैं, जो आदेश दिेए जाते हैं।'' [सूरा अल-नह्ल : 49-50], सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फ़रिश्तों के बारे में बताया है : "वे अवज्ञा नहीं करते अल्लाह के आदेश की तथा वही करते हैं, जिसका आदेश उन्हें दिया जाए।" [सूरा अल-तहरीम : 6]

फ़रिश्तों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि उन्हें अल्लाह के अलावा कोई गिन नहीं सकता। अल्लाह ने उनकी रचना में भी भिन्नता रखी है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो आकाशों तथा धरती का पैदा करने वाला है, (और) दो-दो, तीन-तीन, चार-चार परों वाले फ़रिश्तों को संदेशवाहक बनाने वाला है। वह संरचना में जैसी चाहता है अभिवृद्धि करता है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है।" [सूरा फ़ातिर : 1], अल्लाह के यहाँ फ़रिश्तों के विभिन्न स्थान हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हम (फ़रिश्तों) में से जो भी है उसका एक नियत स्थान है। तथा हम ही (आज्ञापालन के लिए) पंक्तिवद्ध हैं। और हम ही तस्बीह़ (पवित्रता गान) करने वाले हैं।" [सूरा अल-साफ़्फ़ात : 164-166], सबसे श्रेष्ठ फ़रिश्ते जिबरील, मीकाईल और इसराफ़ील हैं। जिबरील का काम रसूलों एवं नबियों के पास अल्लाह की वह्य लेकर उतरना है। एक फ़रिश्ता लोगों की आत्मा निकालने का काम करता है। कुछ फ़रिश्ते जन्नत एवं जहन्नम की देखरेख करते हैं। इनके अलावा भी कई बड़े-बड़े काम हैं, जो फ़रिश्तों द्वारा संपन्न होते हैं। ये काम उनको महान रब ने सौंप रखे हैं।

तीसरी परिचर्चा : जिन्नात एवं शैतानों की उत्पत्ति

अल्लाह ने शैतानों एवं जिन्नात को आग की ज्वाला से पैदा किया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और इससे पहले जिन्नों को हमने धुँआ रहित अति गर्म आग से पैदा किया।'' [सूरा अल-हिज्र : 27], एक अन्य स्थान में कहा है : ''तथा जिन्नों को आग की ज्वाला से पैदा किया।'' [सूरा अल-रहमान : 15] जिन्न एक जाति है, जिसे अल्लाह ने पैदा किया और इन्सानों ही की तरह उसे भी अपनी इबादत का आदेश दिया है। इस जाति में भी कुछ लोग अच्छे हैं और कुछ लोग बुरे। कुछ अल्लाह पर विश्वास रखने वाले हैं और कुछ विश्वास न रखने वाले भी। जो विश्वास रखते हैं, मोमिन इन्सानों की तरह उनका ठिकाना भी जन्नत होगा। उनमें से जो लोग अल्लाह के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, उनको शैतान कहा जाता है। सबसे बड़े विद्रोही शैतान का नाम इबलीस है। इबलीस शौतानों का सरग़ना है। बुराई के मार्ग का भी अगुआ है। अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले इन शैतानों का ठिकाना जहन्नम है। अल्लाह ने जब आदम को पैदा किया, तो फ़रिश्तों और इबलीस को आदेश दिया कि वह आदम को सजदा करें। यह सजदा दरअसल अल्लाह ही की इबादत का एक हिस्सा था। क्योंकि इसका आदेश उसी ने दिया था। फ़रिश्तों ने अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए सजदा किया, लेकिन इबलीस ने अभिमान का शिकार होकर सजदा करने से इनकार कर दिया। उसका तर्क था कि वह आदम अलैहिस्सलाम से उत्तम है। क्योंकि अल्लाह ने आदम को मिट्टी से और शैतान को आग से पैदा किया है। इबलीस का मानना था कि आग मिट्टी से उत्तम है और आग से पैदा की हुई सृष्टि मिट्टी से पैदा की हुई सृष्टि से उत्तम है। उसकी इस अवज्ञा से अल्लाह नाराज़ हो गया और उसे अपनी रहमत से दूर कर दिया। चाहिए तो यह था कि वह क्षमा माँगता और अल्लाह के सामने तौबा करता, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। ढीठपन दिखाई। आदम और उसकी औलाद को गुमराह करने और अल्लाह के रास्ते से रोकने की धमकी देने लगा। अल्लाह से क़यामत के दिन तक के लिए मोहलत माँगने लगा। अल्लाह ने भी उसे मोहलत दे दी। उसने आदम की संतान-संतति को पथभ्रष्ट करने की प्रण ले ली। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और निःसंदेह हमने मनुष्य को सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से बनाया है। और इससे पहले जिन्नों को हमने धुँआ रहित अति गर्म आग से पैदा किया। और (याद करो) जब आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा : मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करने वाला हूँ। तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी तरफ से रूह फूँक दूँ, तो तुम उसके आगे सजदा करते हुए गिर जाओ। तो सब के सब फ़रिश्तों ने सजदा किया। इबलीस के सिवा। उसने सजदा करने वालों के साथ होने से इनकार कर दिया। अल्लाह ने पूछा : ऐ इबलीस! तुझे क्या हुआ कि तू सजदा करने वालों में शामिल नहीं हुआॽ उसने कहा : मैं ऐसा नहीं कि एक मनुष्य को सजदा करूँ, जिसे तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती मिट्टी से पैदा किया है। (अल्लाह ने) कहा : फिर तू यहाँ से निकल जा। निःसंदेह तू धुत्कारा हुआ है। और निःसंदेह तुझपर बदले (क़यामत) के दिन तक धिक्कार है। उस (इबलीस) ने कहा : ऐ मेरे रब! तो फिर मुझे उस दिन तक मोहलत दे, जब वे (पुनः जीवित कर) उठाए जाएँगे। (अल्लाह ने) कहा : निःसंदेह तू मोहलत दिए गए लोगों में से है। ज्ञात समय के दिन तक। वह बोला : ऐ मेरे रब! चूँकि तूने मुझे पथभ्रष्ट किया है, मैं अवश्य ही उनके लिए धरती में (पाप को) सुशोभित करूँगा और उन सभी को पथभ्रष्ट कर दूँगा। सिवाय तेरे उनमें से चुने हुए बंदों के। (अल्लाह ने) कहा : यह रास्ता है जो मुझ तक सीधा है। निःसंदेह मेरे बंदों पर तेरा कोई वश नहीं, परंतु जो बहके हुए लोगों में से तेरे पीछे चले। और निश्चय ही उन सब के वादा की जगह जहन्नम है।" [सूरा अल-हिज्र : 26-43] इन आयतों में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने हमें आदम अलैहिस्सलाम और इबलीस को पैदा करने, फ़रिश्तों और इबलीस को सजदा करने का आदेश देने, इबलीस के विद्रोह का मार्ग अपनाने और आदम के वंश को पथभ्रष्ट करने का क़िस्सा सुनाया है। लेकिन आप देख ही रहे हैं कि इबलीस अल्लाह पर सच्चा विश्वास रखने वालों और पूरे निष्ठा से उसकी इबादत करने वालों को राह से डिगा नहीं पाता।

शैतानों की संख्या बहुत ज़्यादा है। सारे शैतान इबलीस के झंडे लते काम करते हैं। इबलीस आदेश देता है और बाक़ी शैतान उसके आदेशों का पालन करते हैं। आदम के वंशज को गुमराह करने के उसके हर आदेश का पालन करते हैं। अतः धरती में हम जो भी अल्लाह के प्रति अविश्वास, किसी को अल्लाह का साझी बनाने का उदाहरण, अत्याचार और बिगाड़ देखते हैं, वह शैतान के बहकावे और उसके द्वारा आदम के वंशज को पथभ्रष्ट करने के लिए लिए गए प्रण का नतीजा है। लेकिन क़यामत के दिन शैतान अपने अनुसरणकारियों से खुद को अलग कर लेगा। वह कहेगा : तुमपर मेरी ओर से कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं थी। मैंने बस आदेश दिया और तुमने बात मान ली। यह बात उस बहस से स्पष्ट हो जाएगी, जो इबलीस और उसके अनुसरणकारियों के बीच क़यामत के दिन जहन्नम के अंदर होगी। यह बहस इस किताब में अल्लाह ने चाहा, तो उस समय पूरी तफ़सील के साथ पवित्र क़ुरआन के वर्णन अनुसार लिखी जाएगी, जब क़यामत के बारे में बात की जाएगी।

चौथी परिचर्चा : अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को मिट्टी से और उनके वंश को एक तुच्छ पानी से पैदा किया है

जब सर्वशक्तिमान रब ने इन्सान को पैदा करने का निर्णय लिया, तो फ़रिश्तों को बताया कि वह इस धरती पर फ़रिश्तों से भिन्न एक प्राणी की रचना करना चाहता है, जो इस धरती पर उसकी इबादत करेगा, इसे आबाद करेगा और उसके बाद उसके वंश की संख्या बढ़ती ही चली जाएगी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''जब आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा : निःसंदेह मैं मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करने वाला हूँ। तो जब मैं उसे पूरा बना चुकूँ और उसमें अपनी तरफ से आत्मा फूँक दूँ, तो तुम उसके सामने सजदा करते हुए गिर जाओ। तो सब के सब फ़रिश्तों ने सजदा किया। सिवाय इबलीस के। उसने अभिमान किया और काफ़िरों में से हो गया।" [सूरा साद : 71-74]

सर्वशक्तिमान रब ने हमें बताया है कि उसने आदम अलैहिस्सलाम के लिए उन्हीं से उनका जोड़ा बनाया और उन दोनों से उनके वंश को फैला दिया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "लोगो! अपने उस रब से डरो जिसने तुम्हें एक प्राण से पैदा किया और उसी से उसका जोड़ा उत्पन्न किया। फिर उन दोनों से अनेकों नर-नारी पैदा करके फैला दिए। उस अल्लाह से डरो जिसकी दुहाई देकर तुम एक-दूसरे से अपने अधिकार माँगते हो और नाते-रिश्तों के संबंधों को मत तोड़ो। जान रखो, अल्लाह तुम सब पर निरीक्षक है।" [सूरा अल-निसा : 1]

अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में हमें बता दिया है कि उसने किस उद्देश्य के तहत इन्सान की रचना की, उसे इस धरती के लिए कैसे तैयार किया, कैसे ज्ञान दिया एवं परीक्षा में डाला कि इन्सान अपने रब की इबादत का तौर-तरीक़ा सीख ले और जान ले कि गलती होने पर तौबा कैसे करे और इस धरती को आबाद कैसे करे? उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (ऐ नबी! याद कीजिए) जब आपके रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं धरती में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ। उन्होंने कहा : क्या तू उसमें उसको बनाएगा, जो उसमें उपद्रव करेगा तथा बहुत रक्तपात करेगा, जबकि हम तेरी प्रशंसा के साथ तेरा गुणगान करते और तेरी पवित्रता का वर्णन करते हैं। (अल्लाह ने) फरमाया : निःसंदेह मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते। और उस (अल्लाह) ने आदम को सभी नाम सिखा दिए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के समक्ष प्रस्तुत किया, फिर फरमाया : मुझे इनके नाम बताओ, यदि तुम सच्चे हो। उन्होंने कहा : तू पवित्र है। हमें कुछ ज्ञान नहीं परंतु जो तूने हमें सिखाया। निःसंदेह तू ही सब कुछ जानने वाला, पूर्ण हिकमत वाला है। (अल्लाह ने) फरमाया : ऐ आदम! उन्हें इनके नाम बताओ। तो जब उस (आदम) ने उन्हें उनके नाम बता दिए, तो अल्लाह ने कहा : क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि निःसंदेह मैं ही आकाशों तथा धरती की छिपी बातों को जानता हूँ तथा जानता हूँ जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो। और जब हमने फ़रिश्तों से कहा : आदम को सजदा करो, तो उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलीस के। उसने इनकार किया और अभिमान किया और काफ़िरों में से हो गया। और हमने कहा : ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में निवास करो और दोनों उसमें से जहाँ से चाहो वहाँ से (आराम और) बहुतायत से खाओ। और तुम दोनों इस वृक्ष के क़रीब न जाना, अन्यथा तुम दोनों अत्याचारियों में से हो जाओगे। तो शैतान ने दोनों को उससे फिसला दिया, चुनाँचे उन्हें उससे निकाल दिया, जिसमें वे दोनों थे और हमने कहा : उतर जाओ, तुम एक-दूसरे के शत्रु हो और तुम्हारे लिए धरती में एक समय तक ठहरना तथा लाभ उठाना है। फिर आदम ने अपने रब से कुछ शब्द सीख लिए, तो उसने उसकी तौबा क़बूल कर ली। निश्चय वही है जो बहुत तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान् है। हमने कहा : सब के सब इससे उतर जाओ। फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन आए, तो जिसने मेरे मार्गदर्शन का पालन किया, तो उनपर न कोई डर है और न वे शोकाकुल होंगे।'' [सूरा अल-बक़रा : 30-38], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और निःसंदेह हमने इससे पहले आदम को ताकीद की, फिर वह भूल गया और हमने उसमें कोई दृढ़ संकल्प नहीं पाया। तथा जब हमने फ़रिश्तों से कहा : आदम को सजदा करो। तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इबलीस के, उसने इनकार किया। तो हमने कहा : निःसंदेह यह तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का दुश्मन है, इसलिए कहीं तुम दोनों को जन्नत से न निकलवा दे कि तुम मुसीबत में पड़ जाओगे। निःसंदेह तुम्हारे लिए यह है कि तुम इसमें न भूखे होगे और न नग्न होगे। और यह कि निश्चय ही तुम इसमें न प्यासे होगे और न धूप खाओगा।" [सूरा ताहा : 115-119]

यह आयतें बताती हैं कि सर्वशक्तिमान अल्लाह ने आदम तथा उनकी पत्नी को शैतान की साज़िश के बारे में चेतावनी दे दी थी, लेकिन दोनों उसकी साज़िश के शिकार हो गए और उसके द्वारा डाले गए बुरे ख़यालों से धोखा खा गए। फलस्वरूप दोनों परीक्षा के अनुभव से गुज़रे, बहुत कुछ सीखा, जाना कि अपने गुनाह के प्रभावों से तौबा, अल्लाह की ओर लौटकर और क्षमा याचना के ज़रिए कैसे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। इसके बाद दोनों को जन्नत से, जहाँ वे पैदा किए गए थे, धरती में में उतार दिया, जहाँ के लिए उन्हें पैदा किया गया था।

सर्वशक्तिमान रब ने आदम की संतान को शैतान से सावधान कर दिया और बता दिया कि शैतान उसका दुश्मन है और वह उसे उसी तरह पथभ्रष्ट करने का प्रयास करेगा, जिस तरह उसके पिता को किया था। ''ऐ आदम की संतान! ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें लुभाए, जैसे उसने तुम्हारे माता-पिता को जन्नत से निकाल दिया; वह दोनों के वस्त्र उतारता था, ताकि दोनों को उनके गुप्तांग दिखाए। निःसंदेह वह तथा उसकी जाति, तुम्हें वहाँ से देखते हैं, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। निःसंदेह हमने शैतानों को उन लोगों का मित्र बनाया है, जो ईमान नहीं रखते।'' [सूरा अल-आराफ़ : 27]

आदम अलैहिस्सलाम ने इस धरती पर जीवन बिताया और उनकी नस्ल बढ़ने लगी। शुरू में सब लोग अल्लाह की इबादत करते थे और किसी को उसका साझी नहीं बनाते थे। लेकिन दस नस्लों के बाद शैतान ने आदम की संतान में शिर्क दाख़िल कर दिया। लोग अल्लाह के अतिरिक्त की इबादत करने लगे। भाँत-भाँत के पूज्य सामने आ गए। अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अल्लाह की ओर से सूचना देते हुए बताया है कि उसने कहा है : (मैंने अपने सारे बंदों को एक अल्लाह की वंदना करने वाला बनाकर पैदा किया है। फिर शैतान उनके पास आया और उन्हें उनके धर्म से बहका दिया। उनपर वह चीज़ें हराम कर दीं, जो मैंने उनके लिए हलाल की थीं। उन्हें आदेश दिया कि उन चीज़ों को मेरा साझी ठहराएँ, जिनके साझी होने की कोई दलील मैंने नहीं उतारी है।) [22] अल्लाह ने चाहा तो इस किताब में हमारे सामने दीन, सच्चे दीन और असत्य दीन आदि से संबंधित सारी बातें आएँगी। [सहीह मुस्लिम : 2865]

यह आदम अलैहिस्सलाम की रचना की बात हुई। जहाँ तक उनकी संतान की बात है, तो उसे एक तुच्छ जल से पैदा किया गया है। अल्लाह ने आज से चौदह सौ साल से भी अधिक समय पहले अपनी पुस्तक पवित्र क़ुरआन में माँ के पेट में भ्रूण के विकास के चरणों की सूचना दे दी थी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और निःसंदेह हमने मनुष्य को तुच्छ मिट्टी के एक सार से पैदा किया। फिर हमने उसे वीर्य बनाकर एक सुरक्षित स्थान में रखा। फिर हमने उस वीर्य को एक जमा हुआ रक्त बनाया, फिर हमने उस जमे हुए रक्त को एक बोटी बनाया, फिर हमने उस बोटी को हड्डियाँ बनाया, फिर हमने उन हड्डियों को कुछ माँस पहनाया, फिर हमने उसे एक अन्य रूप में पैदा कर दिया। तो बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो अंदाज़ा लगाने वालों में सबसे अच्छा अंदाज़ा लगाने वाला है।" [सूरा अल-मोमिनून : 12-14], सर्वशक्तिमान रब हमें इन्सान की रचना के बारे में बताता है और इस रचना को इन्सान को दोबारा जीवित करके उठाने का प्रमाण बना रहा है। क्योंकि जिसने इन्सान को तुच्छ पानी की एक बूँद से पैदा किया और उसके लिए आँख, कान और दिल बनाया, वह उसे मौत के बाद दोबारा भी पैदा कर सकता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या मनुष्य ने नहीं देखा कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया? फिर अचानक वह खुला झगड़ालू बन बैठा। और उसने हमारे लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया, और अपनी रचना को भूल गया। उसने कहा : इन अस्थियों को कौन जीवित करेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी? 'आप कह दें : उन्हें वही (अल्लाह) जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है।'' [सूरा यासीन : 77-79] आश्चर्य की बात यह है कि जिस इन्सान को उसके रब ने इस तुच्छ पानी से पैदा किया है, वही अपने रब के मद्द-ए-मुक़ाबिल खड़ा हो जाता है और समझता है कि अल्लाह उसे मौत के बाद दोबारा पैदा करने और उसके कर्मों का हिसाब लेने की शक्ति नहीं रखता।

पाँचवीं परिचर्चा : आत्मा की उत्पत्ति तथा उसकी वास्तविकता

जिस प्रकार इन्सान एक सृष्टि है, उसी प्रकार आत्मा भी एक सृष्टि है। जब गर्भाशय के अंदर वीर्य के पहुँचने को चार महीने हो जाते हैं, तो अल्लाह एक फ़रिश्ते को भेजता है, जो उसमें प्राण फूँक देता है। अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि हमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने, जो सच्चे हैं और जिनके सच्चे होने की गवाही दी गई है, फ़रमाया है : ''तुममें से हर एक की पैदाइश का पदार्थ उसकी माँ के गर्भ में चालीस दिनों के लिए शुक्राणु के रूप में जमा होता है, फिर उतने ही दिनों के लिए जमा हुआ रक्त के रूप में रहता है, फिर उतने ही दिनों तक वह मांस का टुकड़ा बना रहता है। फिर अल्लाह (उसकी ओर) एक फ़रिश्ता भेजता है, जिसे चार चीज़ों का आदेश दिया जाता है। उससे कहा जाता है : उसका कार्य, उसकी जीविका, उसकी जीवन अवधि और उसका अच्छा या बुरा होना, लिख। फिर उसमें रूह फूँकी जाती है।'' [सहीह बुख़ारी : 3208, सहीह मुस्लिम : 2643]

आत्मा क्या है, यह बात बस अल्लाह जानता है। कोई सृष्टि नहीं जानती। यहूदियों ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की परीक्षा लेने के लिए काफ़िरों से कहा था कि उनसे रूह (आत्मा) के बारे में पूछो। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और वे (ऐ नबी!) आपसे 'रूह' (आत्मा) के विषय में पूछते हैं। आप कह दें : 'रूह' मेरे रब के आदेश से है। और तुम्हें बहुत ही थोड़ा ज्ञान दिया गया है।'' [सूरा अल-इसरा : 85]

शरीर की मौत के साथ आत्मा भी मर जाती है। आत्मा की मौत से मुराद है, शरीर से उसका जुदा हो जाना। परन्तु आत्मा का विनाश नहीं होता। इन्सान की मौत और क़यामत के दिन दोबारा जीवित करके उठाए जाने के बीच की अवधि, जिसे बरज़ख़ का जीवन और क़ब्र तथा उसमें मौजूद चीज़ों का जीवन कहते हैं, में आत्मा का शरीर से संपर्क रहता है।अतः जिन चीज़ों से शरीर आनंदित होता है, उनसे आत्मा आनंदित होती है और जिन चीज़ों से शरीर यातना महसूस करता है, उनसे आत्मा भी यातना महसूस करती है। अल्लाह पर विश्वास रखने वाले लोगों की आत्माएं जन्नत में होती हैं, जबकि विश्वास न रखने वालों की आत्माएँ जहन्नम में होती हैं। क़यामत के दिन इन आत्माओं को दोबारा शरीर में लौटा दिया जाएगा और उसके बाद अल्लाह पर विश्वास रखने वाले जन्नत में रहेंगे और विश्वास न रखने वाले लोग जहन्नम में।

इन्सान की मौत तथा उसके क़यामत के दिन उठाए जाने की इस अवधि में मरे हुए इन्सान की आत्मा जीवित लोगों के साथ किसी भी प्रकार से जुड़ती एवं संवाद नहीं करती है। बाप, दादाओं एवं दादियों की आत्माएँ जीवित बाल-बच्चों के साथ न कोई संवाद करती हैं और न किसी प्रकार से जुड़ती हैं। दरअसल वो मोमिन होने की अवस्था में नेमतों में व्यस्त रहती हैं और काफ़िर होने की अवस्था में यातनाओं से त्रस्त रहती हैं। जो यह कहता है कि मरे हुए लोगों की आत्माएँ जीवित लोगों के संपर्क में आती हैं, उनके पास आती हैं या उनपर प्रभाव डालती हैं, तो उनके इस कथन का कोई प्रमाण नहीं है। यह कथन विरासत में मिले मिथकों और किवदंतियों पर आधारित है।

किसी इन्सान के मरने के बाद उसकी आत्मा किसी दूसरी सृष्टि की ओर स्थानांतरित नहीं होती। वह सृष्टि चाहे उससे ऊँचे स्थान की हो या नीचे स्थान की। हर आत्मा की रचना अल्लाह शरीर विशेष के लिए करता है। जीवन भर उसके साथ रहती है। मौत के समय उससे अलग होती है। क़ब्र में रखे जाने के बाद उसकी ओर लौट आती है। फिर क़यामत के दिन दोबारा लौट आती है। यह कहना कि किसी की आत्मा उसके शरीर से अलग होने के बाद किसी दूसरी सृष्टि के शरीर में चली जाती है, ग़लत है। इसका कोई प्रमाण नहीं है। इसका आधार भी विरासत में मिले हुए मिथक एवं किदवंतियाँ हैं।

छठी परिचर्चा : मानव उत्पत्ति का उद्देश्य तथा इस सम्मानित सृष्टि का अल्लाह की इबादत के लिए पैदा होना

हम पीछे बयान कर आए हैं कि अल्लाह ने सृष्टि की रचना अपनी इबादत के लिए की है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और मैंने जिन्नों तथा मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें।'' [सूरा अल-ज़ारियात : 56], यानी केवल एक अल्लाह की इबादत करें। उसके साथ किसी और की इबादत न करें। इसी पाक उद्देश्य के तहत अल्लाह ने आकाशों एवं धरती की रचना की है, आकाश से किताबें उतारी हैं, रसूल एवं नबी भेजे हैं। अल्लाह ने सृष्टि की रचना के बाद उसे उद्देश्यहीन बनाकर छोड़ नहीं दिया। उसे एक महान उद्देश्य के तहत पैदा किया। यह उद्देश्य है, सर्वशक्तिमान अल्लाह की इबादत। स्वभाविक रूप से इन्सान एक सम्मानित सृष्टि है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निश्चय ही हमने आदम की संतान को सम्मान प्रदान किया, और उन्हें थल और जल में सवार किया, और उन्हें अच्छी-पाक चीज़ों की रोज़ी दी, तथा हमने अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों पर उन्हें श्रेष्ठता प्रदान की।" [सूरा अल-इसरा : 70], इन्सान को सम्मान इस तौर पर दिया गया है कि अल्लाह ने उसे लाभदायक एवं हानिकारक चीज़ों के बीच अंतर करने के लिए विवेक दिया है। इन्सान का सर उसके शरीर के ऊपरी भाग में बनाया। उसके दो हाथ बनाए और उनको खाने एवं लेने-देने का साधन बनाया। जबकि जानवर धरती में अपना मुँह लगाकर खाते हैं। इस सम्मान के दायरे में सारे लोग आते हैं। लेकिन इन्सान के लिए इससे भी बड़ा और ख़ास सम्मान यह है कि वह नबियों एवं रसूलों के मार्ग पर चलने वाला मुसलमान बने। मुसलमान इस सृष्टि में से अल्लाह के चयनित लोग हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उसी ने तुम्हें चुना है। और धर्म के मामले में तुमपर कोई तंगी नहीं रखी। यह तुम्हारे पिता इबराहीम का धर्म है। उसी ने इस (क़ुरआन) से पहले तथा इसमें भी तुम्हारा नाम मुसलमान रखा है। ताकि रसूल तुमपर गवाह हों और तुम सब लोगों पर गवाह बनो। अतः नमाज़ क़ायम करो तथा ज़कात दो और अल्लाह को मज़बूती से पकड़ लो। वही तुम्हारा संरक्षक है। तो वह क्या ही अच्छा संरक्षक तथा क्या ही अच्छा सहायक है।" [सूरा अल-हज्ज : 78], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "फिर हमने इस पुस्तक का उत्तराधिकारी उन लोगों को बनाया, जिन्हें हमने अपने बंदों में से चुन लिया। तो उनमें से कुछ लोग अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं, और उनमें से कुछ लोग मध्यमार्गी हैं, और उनमें से कुछ लोग अल्लाह की अनुमति से भलाई के कामों में आगे निकल जाने वाले हैं। यही महान अनुग्रह है।" [सूरा फ़ातिर : 32], इस्लाम पर किसी एक जाति, राष्ट्र या देश की इजारेदारी और एकाधिकार नहीं है। यह तमाम बंदों के लिए अल्लाह का दीन है। अल्लाह ने तमाम लोगों को अपनी इबादत का आह्वान किया है। अल्लाह की इबादत एक व्यक्ति के जीवन में प्राप्त होने वाली सबसे बड़ी पूर्णता है। क्योंकि इन्सान जब अल्लाह की इबादत करता है, तो खुद को ऊँचाई पर लेकर चला जाता है, अपने आपको विशुद्ध कर लेता है और अपने रब के मार्ग पर चलाने लगता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निश्चय वह सफल हो गया, जिसने उसे पवित्र कर लिया। तथा निश्चय वह विफल हो गया, जिसने उसे (पापों में) दबा दिया।" [सूरा अल-शम्स : 9-10], इन्सान किसी न किसी की इबादत ज़रूर करता है। अगर अपने रब, स्रष्टा और आजीविकादाता की इबादत नहीं करता, तो शैतान और आकांक्षाओं की इबादत करता है। हालाँकि शैतान की इबादत करने और उसे अपना कारसाज़ बनाने वाला बहुत बड़े घाटे में पड़ने वाला है।

सातवीं परिचर्चा : इस्लाम में स्त्री का स्थान

इस्लाम में स्त्री पुरुष की जैसी ही है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "बेशक औरतें, मर्दों की (अहकाम में) समकक्ष हैं।।" [24] शरई आदेशों एवं निर्देशों का संबोधन पुरुषों की तरह स्त्रियों को भी हुआ है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह मुसलमान पुरुष और मुसलमान स्त्रियाँ, ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्रियाँ, आज्ञाकारी पुरुष और आज्ञाकारिणी स्त्रियाँ, सच्चे पुरुष और सच्ची स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्यवान स्त्रियाँ, विनम्रता रखने वाले पुरुष और विनम्रता रखने वाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देने वाले पुरुष और सदक़ा देने वाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले पुरुष और रक्षा करने वाली स्त्रियाँ तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह ने इनके लिए क्षमा तथा महान प्रतिफल तैयार कर रखा है।" [सूरा अल-अहज़ाब : 35], उसे क़यामत के दिन अपने कर्मों का पुरुषों के समान ही प्रतिफल मिलेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा जो अच्छे कार्य करेगा, चाहे नर हो या नारी, जबकि वह मोमिन हो, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश पाएँगे और उनका खजूर की गुठली के ऊपरी भाग के गड्ढे के बराबर भी हक़ नहीं मारा जाएगा।" [सूरा अल-निसा : 124], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "जिसने बुरा काम किया, उसे उसी के जैसा बदला दिया जाएगा तथा जिसने अच्छा काम किया, वह नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला (एकेश्वरवादी) हो, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे। वहाँ उन्हें बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी।" [सूरा ग़ाफ़िर : 40] [मुसनद अहम : 23196, सुनन तिरमिज़ी : 113, सुनन अबू दाऊद : 236]

हाँ, इतना ज़रूर है कि स्त्री को उसके स्वभाव से मेल न खाने वाले कुछ शरई आदेशों के दायरे से बाहर रखा गया है, जैसे दुश्मनों से युद्ध करना एवं मस्जिद में पुरुषों की जमात के साथ नमाज़ पढ़ना आदि। लेकिन उसे घर में नमाज़ अवश्य पढ़ना है। अगर मस्जिद जाकर उसके औरतों वाले हिस्से में नमाज़ पढ़ लेती है, तब भी सही है। लेकिन घर में नमाज़ पढ़ने पर अधिक सवाब मिलेगा। ऐसा उसकी विशेष प्रकृति को देखते हुए किया गया है।

इस्लाम में अल्लाह उस व्यक्ति को बहुत बड़ा प्रतिफल प्रदान करता है, जिसे दो या दो से अधिक बेटियाँ दी गईं और उसने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया। उनकी परवरिश जन्नत में प्रवेश का सबब है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (जिसने दो या तीन बेटियों अथवा दो या तीन बहनों को उनके जुदा हो जाने तक (बियाह कर ससुराल चले जाने तक) या अपनी मौत तक पाला-पोसा, वह और मैं क़यामत के दिन इस तरह होंगे। यह कहते हुए आपने शहादत उंगलि और बीच वाली उंगलि से इशारा किया।) [25] (मुसनद अहमद : 12498) यह हदीस सहीह मुस्लिम में इन शब्दों के साथ मौजूद है : "जिसने दो लड़कियों का पालन-पोषण किया, यहाँ तक कि वह वयस्क हो गईं, तो क़यामत के दिन वह तथा मैं इस तरह आएँगे।" फिर आपने अपनी ऊँगलियों को मिलाया। (2631)

इस्लाम में शादी वैसे तो एक साझे की ज़िम्मेवारी है, लेकिन दामपत्य जीवन से संबंधित सारी ज़िम्मेवारियाँ, जैसे रहने के लिए घर, खाना और कपड़ा आदि उपलब्ध कराने का दायित्व पति के सर पर है। इस प्रकार का कोई दायित्व पत्नी पर नहीं है। चाहे वह धनवान ही क्यों न हो। हाँ, अपनी खुशी से खर्च करे, तो बात अलग है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरत को पीटने और उसका हक़ छीनने से मना किया है। आपने बताया है कि औरत का सम्मान सम्मानीय व्यक्ति ही करेगा।

एक महिला की अपनी ज़िम्मेवारी होती है। वह ख़रीद-बिक्री एवं अन्य सभी अनुबंधों में एक पुरुष की तरह ही होती है। यदि वह वयस्क है, तो उसके वित्तीय कार्यों के लिए पुरुष की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

आठवीं परिचर्चा : सब लोग बराबर हैं कि उनके पिता आदम और उनकी माता हव्वा हैं

पिछली परिचर्चा में हम बयान कर आए हैं कि अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को मिट्टी से पैदा किया, उन्हीं से उनकी पत्नी हव्वा को बनाया और उनकी औलाद को नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ने और फलने-फूलने का अवसर दिया। अतः मानव जाति का मूल एक है, अर्थाथ; आदम और हव्वा अलैहिमस्सलाम, और उन दोनों के वंशज दोनों से समान रूप से संबद्ध हैं। मनुष्यों की कोई एक जाति उनसे संबद्ध होने की दूसरी जाति से अधिक हक़दार नहीं है। किसी एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों से बेहतर नहीं हैं। सारे लोग बराबर हैं। सारे लोगों को असलन मिट्टी से पैदा किया गया है। सबके पिता आदम अलैहिस्सलाम हैं। कोई किसी से श्रेष्ठ नहीं है। श्रेष्ठता का आधार केवल धर्मपरायणता और सत्कर्म है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (बेशक अल्लाह ने तुमसे जाहिलीयत (अज्ञानता काल) के अहंकार और अभिमान को दूर कर दिया है और बाप-दादा के नाम पर गर्व करने से रोक दिया है। (अब दो तरह के लोग हैं) एक नेक मोमिन, दूसरा घटिया दुष्ट। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से पैदा किए गए हैं।) [26][27] अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : (ऐ लोगो! सुन लो! तुम्हारा रब एक है और तुम्हारा पिता एक है। सुन लो! न किसी अरब को किसी ग़ैर-अरब पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त है और न कसी ग़ैर-अरब को किसी अरब पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त है। न किसी लाल को किसी काले पर श्रेष्ठता प्राप्त है और न किसी काले को किसी लाल पर श्रेष्ठता प्राप्त है। श्रेष्ठता केवल धर्मपरायणता के आधार पर प्राप्त होती है। [28] सर्वशक्तिमान रब ने इन्सानों को पैदा किया और उनको क़बीलों में बाँट दिया, ताकि एक-दूसरे को पहचान सकें। इसलिए नहीं कि एक-दूसरे पर अभिमान करें। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ मनुष्यो! हमने तुम्हें एक नर और एक मादा से पैदा किया तथा हमने तुम्हें जातियों और क़बीलों में कर दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। निःसंदेह अल्लाह के निकट तुममें सबसे अधिक सम्मान वाला वह है, जो तुममें सबसे अधिक तक़्वा (धर्मपरायणता) वाला है। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ जानने वाला, पूरी ख़बर रखने वाला है।" [सूरा अल-हुजुरात : 13], लोगों को क़बीलों और खानदानों में बाँटने का काम केवल पहचान और आपसी सहयोग के लिए किया गया है। अल्लाह के निकट सबसे सम्मान वाला व्यक्ति वह है, जो सबसे अधिक तक़वा रखता हो। सबसे अधिक तक़वा वाला व्यक्ति वह है, जो अपने रब एवं अपने दीन के ज्ञान के साथ अल्लाह की इबादत करे, अपने दीनी कर्तव्यों का पालन करे, अपने आस-पास के लोगों से जुड़ी हुई ज़िम्मेवारियाँ अदा करे और लोगों को अपनी बुराई से सुरक्षित रखे। हदीस में आए हुए (عُبِّيَّةَ) शब्द का अर्थ है : अभिमान एवं अहंकार। इससे मुराद इस्लाम से पूर्व के अज्ञानता काल में पाया जाने वाला वंश पर अभिमान एवं अहंकार है। (ग़रीब अल-हदीस, लेखक- ख़त्ताबी : 1/290) [मुसनद अहमद : 8736 प्रकाशन- अल-रिसालह, सुनन तिरमिज़ी : 3956, सुनन अबू दाऊद : 5119] [मुसनद अहमद : 23489 प्रकाशन- अल-रिसालह]

जहाँ तक लोगों को वर्गों में इस तरह विभाजित करने की बात है कि हर वर्ग की कुछ सामाजिक, आर्थिक एवं आधिकारिक विशेषताएँ हों, तो इस विभाजन का कोई प्रमाण नहीं है। न शरई, न तार्किक और न मानवीय अनुभव पर आधारित। यह एक झूठ, मानव समाज का अपमान और उसके अधिकारों का हनन है। किसके पास यह अधिकार है कि वह एक वर्ग को सम्मानीय एवं विशिष्ट तथा दूसरे वर्ग को तुच्छ एवं अछूत बना दे? नस्ल, लिंग या देश के आधार पर मानव समाज का हर विभाजन अन्यायपूर्ण विभाजन है। इस प्रकार का विभाजन करने तथा उसका आह्वान करने वाला झूठा है। क्योंकि मूल रूप से सब लोग बराबर हैं। सब को अपने रब की ओर लौटकर जाना है। सब के कर्मों का हिसाब उनका रब लेगा। अल्लाह के सामने नस्ल एवं लिंग आदि चीज़ें कोई मयाने नहीं रखतीं। अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (जिसका कर्म उसे पीछे कर दे, उसका कुल उसे आगे ले नहीं जा सकता।) [29] कुल न किसी को आगे ले जा सकता है और न पीछे कर सकता है। इसके आधार पर किसी को कोई विशिष्टता या अलग पहचान नहीं मिलती। [सहीह मुस्लिम : 2699]

नौवीं परिचर्चा : बंधुत्व एवं दया

अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सारी सृष्टि के लिए दया बनकर आए थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।" [सूरा अल-अंबिया : 107], आप सारे संसार के लिए दया, मार्गदर्शक एवं शुभ सूचना देने वाले हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ नबी! हमने आपको गवाही देने वाला, शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है। तथा अल्लाह की अनुमति से उसकी ओर बुलाने वाला और एक प्रकाशमान दीप (बनाकर भेजा है)। तथा आप ईमान वालों को शुभ सूचना दे दें कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बड़ा अनुग्रह है।" [सूरा अल-अहज़ाब : 45-47], आपका एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि अल्लाह तथा आख़िरत के दीन पर ईमान रखने वालों के बीच भाईचारे का संबंध सबसे बड़ा संबंध है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह ईमान वाले तो भाई ही हैं। अतः अपने दो भाइयों के बीच सुलह करा दो। तथा अल्लाह से बचाओ अपनओ, ताकि तुम पर दया की जाए।" [सूरा अल-हुजुरात : 10], इस बंधुता का तक़ाज़ा यह है कि एक-दूसरे की मदद की जाए, एक-दूसरे की ज़रूरत पूरी की जाए, एक-दूसरे को विपत्ति से बचाया जाए और एक-दूसरे की कमियों पर पर्दा डाला जाए। अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। इसलिए न वो उसपर ज़ुल्म करे और न ही उसे ज़ुल्म के हवाले करे। जो आदमी अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने में लगा रहता है, अल्लाह उसकी मुराद पूरी करने में लगा रहता है, और जो आदमी किसी मुसलमान की मुसीबत दूर करता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी मुसीबत दूर करेगा, और जो आदमी मुसलमान का दोष छुपाता है, क़यामत के दिन अल्लाह उसके दोषों को छुपाएगा।" [30] अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (एक-दूसरे से द्वेष न रखो, एक-दूसरे से ईर्ष्या न करो और न एक-दूसरे से पीठ फेरो। अल्लाह के बंदो! भाई-भाई बनकर रहो। किसी मुसलमान के लिए हलाल नहीं है कि तीन दिन से अधिक समय तक अपने भाई से संबंध विच्छेद रखे।) [31] उस जीवन शैली का सम्मान कीजिए, जो द्वेष, ईर्ष्या, भाइयों से संबंध तोड़ने और तीन दिनों से अधिक समय तक बात-चीत बंद रखने से मना करता हो और मुसलमानों के बीच आम भाईचारा का माहौल बनाए रखने का आदेश देता हो। [सहीह बुख़ारी : 2442, सहीह मुस्लिम : 2580] [सहीह बुख़ारी : 6076, सहीह मुस्लिम : 2558]

इस्लाम ने ग़ैर-मुस्लिमों का ख़याल रखा है, उनके साथ उच्च नैतिकता पर आधारित व्यवहार करने का आदेश दिया है, ईमान वालों को उनके साथ न्याय करने का आदेश दिया है और उनके अधिकार के हनन से रोका है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हे मान वालों, अल्लाह के गवाह हो कर न्याय पर कायम रहो, चाहे वह तुम्हारे विरुद्ध हो, चाहे तुम्हारे माता-पिता और तुम्हारे कुटुम्बियों के विरुद्ध हो, (जिसके विरूद्ध गवाही दे रहे हो) चाहे वह धनी हो या निर्धन, उनपर अल्लाह तआला का तुमसे ज़्यादा हक़ है, इसलिए अपनी इच्छा के अनुसार न चलो कि तुम न्याय न करो, और यदि तुम बिगाड़ करोगे या मुंह फेरोगे, तो जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे अवश्य बहुत अच्छे से जानता है।" [सूरा अल-निसा : 135] इस्लाम ने ग़ैर-मुस्लिमों का भला करने और उनके साथ अच्छा व्यवहार करने का भी आदेश दिया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला। निश्चय अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है।" [सूरा अल-मुमतहना : 8], जब मक्का के अविश्वासियों ने अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने शहर मक्का से निकाल दिया, आप मक्का छोड़कर मदीना चले गए, उसके बाद मक्का में रह रहे अविश्वासियों को अनावृष्टि और अकाल का सामना करना पड़ा, स्थिति इतनी खराब हो गई कि लोग हड्डियाँ तक खाने पर मजबूर हो गए, भूख से नज़र इतनी कमज़ोर हो गई कि जब कोई व्यक्ति आकाश की ओर देखता, तो धरती एवं आकाश के बीच में उसे सब कुछ धुआँ-धुआँ नज़र आता।

ऐसी अवस्था में कोई अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए और कहने लगा: ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह से मुज़र के लिए पानी माँगिए। यह सुन आपने कहा : "मुज़र के लिए? तुम तो बड़े दिलेर मालूम होते हो।" चुनाँचे आपने उनके लिए बारिश माँगी और अल्लाह ने बारिश बरसाई।[32] यहाँ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ुबान से जो शब्द निकले हैं, उनका अर्थ यह है कि तुम मुझसे मुज़र के लिए बारिश की दुआ करने का आग्रह कैसे कर रहे हो, जबकि उन्होंने अल्लाह के प्रति अविश्वास व्यक्त किया, उसके साथ दूसरे पूज्य ठहराए, और अब जब अल्लाह की मार पड़ी है और विश्वास हो चला है कि इस विपत्ति को अल्लाह के सिवा कोई दूर नहीं कर सकता, तो तुम मेरे पास आकर उनके लिए दुआ करने का आग्रह कर रहे हो, जबकि इससे पहले वे यह जानते हुए भी कि मैं अल्लाह का रसूल हूँ, मुझको झुठला चुके हैं। [सहीह बुख़ारी : 4821, सहीह मुस्लिम : 2798]

इस्लाम ने ऐसे ग़ैर-मुस्लिम की हत्या को हराम क़रार दिया है, जिसके साथ मुसलमानों का शांति समझौता हो। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (जो आदमी किसी 'मुआहद' (वह ग़ैरमुस्लिम, जिसके साथ मुसलमानों का शांति समझौता हो) को क़त्ल करेगा, वह जन्नत की ख़ुश्बू तक न पाएगा।) [33] इस दीन को मानने वाले हर मुसलमान का मानना है कि अल्लाह ने हर इन्सान को सम्मानित बनाया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निश्चय ही हमने आदम की संतान को सम्मान प्रदान किया, और उन्हें थल और जल में सवार किया, और उन्हें अच्छी-पाक चीज़ों की रोज़ी दी, तथा हमने अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों पर उन्हें श्रेष्ठता प्रदान की।" [सूरा अल-इसरा : 70] [सहीह बुख़ारी : 3166]

तीसरा अनुभाग : दीन

पहली परिचर्चा : दीन एक मानवीय आवश्यकता है

धार्मिकता एक आवश्यक चीज़ है, जिसकी ओर मानव आत्मा आकर्षित होती है और किसी भी परिस्थिति में इससे विचलित नहीं होती है। पिछले या बाद के समुदायों में कोई ऐसा समुदाय नहीं मिलेगा, जिसके पास कोई धर्म न हो, जिसके प्रतीकों का पालन और जिसका आदर करता हो और जिसके इबादत खानों का निर्माण करता हो। इससे बस एक छोटे-से समूह को अलग किया जा सकता है, जो आजीविका की तलाश एवं विलासिता को ही सब कुछ मान चुका है। इस प्रकार के लोगों का प्रतिशत कुछ ज़्यादा नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) हमने प्रत्येक समुदाय के लिए इबादत की एक विधि निर्धारित की है, जिसके अनुसार वे इबादत करने वाले हैं।" [सूरा अल-हज्ज : 67] इस आयत में आए हुए शब्द "المنسك" से मुराद वह स्थान है, जहां कोई व्यक्ति अच्छे या बुरे के लिए जाता है और उसका आदी होता है। आज भी हम इस चीज़ को देख सकते हैं। पूरे इतिहास काल में बिना चहारदीवारी वाले शहर तो मिल जाएँगे, बिना बाज़ारों वाले शहर तो मिल जाएँगे और बिना अस्पतालों वाले शहर भी मिल जाएँगे, लेकिन बिना इबादत खानों वाले शहर नहीं मिलेंगे। हर शहर में इबादत खाने हुआ करते हैं। जब भी कोई समूह एक शहर से दूसरे शहर में जाकर बसता है, तो इबादत खाने बनाता है और उसपर धन खर्च करता है। यहाँ तक कि आज हवाई अड्डों में भी, जहाँ लोग बहुत कम समय के लिए रुकते हैं, इबादत के लिए निर्दिष्ट स्थान मिल जाते हैं। देखें : जामे अल-बयान (18/679)

इबादत के प्रति यह उत्सुकता और उससे यह हार्दिक लगाव दरअसल उस प्रकृति का अवशेष है, जिसपर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मानव की उत्तपत्ति की है। अल्लाह ने धार्मिकता को मानव स्वभाव का अभिन्न अंग बना रखा है। वैसे भी हर इन्सान व्यक्तिगत रूप से सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का मोहताज है। कोई चीज़ उसे अल्लाह से बेनियाज़ नहीं कर सकती। इस मोहताजगी का उपचार केवल एक अल्लाह की इबादत और दुःख-सुःख में उसी का आश्रय लेना है। हर इन्सान अपनी कमज़ोरी एवं मोहताजगी महसूस करता है और कठिनाइयों तथा परेशानियों से गुज़रता है। उसे खुद को मज़बूत रखने और कठिनाइयों पर विजय पाने के लिए एक मज़बूत सहारे की ज़रूरत होती है। यह मानव प्रकृति का अभिन्न अंग है। वह कठिनाइयों से निकलने और परेशानियों से पार पाने के लिए अपने से अधिक शक्तिशाली का आश्रय लेता है। इसी जज़्बे के तहत वह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का आश्रय लेता है और सच्चाई यह है कि महान अल्लाह शरण लेने के लिए सबसे बेहतर हस्ती है। यह अकाट्य प्रमाण है इस बात का कि इन्सान को धर्म, धार्मिकता एवं धार्मिक प्रतीकों के पालन की ज़रूरत है। आश्रय लेने का यही उपयुक्त एवं उचित तरीक़ा है। कभी-कभी तो इन्सान किसी मूर्ति, मृत व्यक्ति या ऐसी चीज़ का आश्रय लेने लगता है, जिसका कोई वास्तविक वजूद नहीं होता। उसका यह आश्रय लेना (सही हो या गलत) इस बात का प्रमाण है कि उसे आश्रय लेने के लिए एक मज़बूत सहारे की ज़रूरत होती है।

दूसरी परिचर्चा : सर्वशक्तिमान रब ने ही धर्म का निर्माण किया है, उसका पालन करने का आदेश दिया है और वही इस संबंध में हिसाब लेगा

इस विषय को स्पष्ट करने से पहले दिमाग़ को सक्रिय एवं तैयार करने के लिए हम दो प्रश्न पूछना चाहते हैं, ताकि इस विषय को वास्तविक रूप से समझा जा सके। दोनों प्रश्न इस प्रकार हैं :

पहला प्रश्न : धर्म की स्थानपना करने, विधि-विधान का निर्माण करने, सत्य एवं असत्य की कसौटी निर्धारित करने और लोगों के अच्छे-बुरे कार्यों का हिसाब लेने का अधिकार किसके पास है?

उत्तर : धर्म की स्थानपना करने, विधि-विधान का निर्माण करने, सत्य एवं असत्य की कसौटी निर्धारित करने और लोगों के अच्छे-बुरे कार्यों का हिसाब लेने का अधिकार केवल सर्वशक्तिमान एवं महान रब के पास है और इसके निम्नलिखित कारण हैं :

क्योंकि उसी ने इस सृष्टि की रचना की है और रचना करने वाला ही जानता है कि उसकी सृष्टि के लिए कौन-सा धर्म एवं कौन-सी इबादत उपयुक्त है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या वह नहीं जानेगा जिस ने उत्पन्न किया? और वह सूक्ष्मदर्शक सर्व सूचित है?" [सूरा अल-मुल्क : 14], जिसने पैदा न किया हो, वह अपनी जैसी सृष्टि के लिए विधि-विधान कैसे बना सकता है? जिसे सृष्टि की ज़रूरतों का पता ही न हो, वह उसके लिए नियम-क़ानून कैस तय कर सकता है? सच्चाई यह है कि ये तथाकथित विधान निर्माता भी जब संकटों से घिरते हैं, तो खुद को निकाल नहीं पाते। ऐसे में दूसरों के लिए विधान बनाना क्या मायने रखता है?

दूसरी बात यह है कि सर्वशक्तिमान रब ही सच्चा एवं सीधा मार्ग दिखाता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप कह दें कि क्या तुम्हारे साझीदारों में से कोई है, जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे? आप कह दें कि अल्लाह ही सत्य का मार्गदर्शन करता है। तो क्या जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे, वह अधिक हक़दार है कि उसका अनुसरण किया जाए, या वह जो स्वयं रास्ता नहीं पाता सिवाय इसके कि उसे रास्ता बताया जाए? फिर तुम्हें क्या है, तुम कैसे फ़ैसला करते होॽ" [सूरा यूनुस : 35], इब्न-ए-जरीर कहते हैं : "अल्लाह अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कह रहा है : (आप कह दें) ऐ मुहम्मद! इन बहुदेववादियों से : (क्या तुम्हारे साझेदारों में से) जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो। मुराद बहुदेववादियों के पूज्य एवं देवी-देवता हैं, (कोई है, जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे?) यानी जो किसी भटके हुए इन्सान का मार्गदर्शन करे और सीधे मार्ग से हटे हुए व्यक्ति को सीधा रास्ता दिखाए? निश्चित रूप से वे इस बात का दावा नहीं कर सकते कि उनके पूज्य तथा उपास्य किसी भटके हुए इन्सान का मार्गदर्शन करते हैं या किसी सीधी राह से हटे हुए व्यक्ति को सीधी राह पर लाते हैं। अगर वे दावा कर भी लेते हैं, तो अवलोकन उनके इस दावे को झुठला देगा और बता देगा कि उनके अंदर ऐसा करने की क्षमता नहीं है। अगर वे दावा नहीं करते और मान लेते हैं कि उनके पूज्यों एवं उपास्यों के अंदर किसी भटके हुए व्यक्ति को सीधा मार्ग दिखाने की क्षमता नहीं है, तो उनसे कह दें कि अल्लाह ही भटके हुए व्यक्ति को सीधा मार्ग दिखाता है। (तो क्या जो सत्य की ओर मार्गदर्शन करे) यानी किसी भटके हुए इन्सान को सत्य का मार्ग दिखाए और ग़लत राह चलने वाले को सही रास्ता बताए। ( वह अधिक हक़दार है कि उसका अनुसरण किया जाए) यानी उसके आह्वान को स्वीकार किया जाए। (या वह जो स्वयं रास्ता नहीं पाता सिवाय इसके कि उसे रास्ता बताया जाए?) [35] जामे अल-बयान (15/87)

वही अपने बंदों को सत्य एवं असत्य तथा सही एवं ग़लत मार्ग के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! यदि तुम अल्लाह से डरोगे, तो वह तुम्हें (सत्य और असत्य के बीच) अंतर करने की शक्ति प्रदान करेगा तथा तुमसे तुम्हारी बुराइयाँ दूर कर देगा और तुम्हे क्षमा कर देगा। और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 29], शैख़ अब्दुर रहमान सादी अपनी तफ़सीर में कहते हैं : (जो अल्लाह से डरेगा, उसे चार चीज़ें प्राप्त होंगी, जिनमें से हर चीज़ दुनिया एवं उसकी सारी वस्तुओं से उत्तम है। 1- अंतर करने की क्षमता : ऐसा ज्ञान, जिसके द्वारा इन्सान सुपथ एवं कुपथ, सत्य एवं असत्य, हलाल एवं हराम तथा सदाचारी एवं दुराचारी के बीच अंतर कर सके। 2, 3- बुरे कर्मों का प्रायश्चित और पापों की क्षमा ... 4- अल्लाह से डरने और उसकी प्रसन्नता को अपनी आकांक्षाओं पर प्राथमिकता देने वाले को मिलने वाला महान प्रतिफल। [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 319]

जो सत्य का मार्ग दिखाता है, वही धर्म स्थापित करने और लोगों को उसका मार्ग दिखाने का हक़दार है।

क्योंकि रब शक्तिशाली, प्रभावी और प्रभुत्वशाली है, सत्य के मार्ग पर चलने का आदेश देता है तथा इस आदेश का पालन करने वाले को प्रतिफल प्रदान करता है और असत्य से रोकता है तथा इस मनाही का उल्लंघन करने वाले को दंड देता है। अल्लाह पर विश्वास न रखने वाली जातियों का विनाश, जैसे नूह अलैहिस्सलाम की जाति का तूफ़ान, हूद अलैहिस्सलाम और सालेह अलैहिस्सलाम की जातियों का विनाश और अल्लाह के नबी मूसा अलैहिस्सलाम पर अत्याचार करने वाले फ़िरऔन और उसकी सेना को डुबो दिया जाना, इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि जो हस्ती दीन उतारती है और उसके प्रचार-प्रसार की राह अवरुद्ध खड़ा करने वाले को दंड देती है, वही विधि-विधान का निर्माण करने और दंड निर्धारित करने का हक़दार है। अल्लाह के अतिरिक्त जिन इन्सानों, मूर्तियों और तथाकथित पूज्यों की इबादत की जाती है, वह दीन का विरोध करने वालों को सज़ा देना तो दूर खुद अपना बचाव तक नहीं कर सकते।

क्योंकि इस संसार का रब ही रोज़ी देता है और जो रोज़ी देता है, वही विधि-विधान के निर्माण का हक़दार है। जो रोज़ी नहीं देता, उसे विधि-विधान के निर्माण का अधिकार नहीं है। क्योंकि विधान के निर्माण में खाने-पीने की कुछ चीज़ों और संभोग के कुछ रूपों को हलाल तथा कुछ को हराम घोषित करना शामिल है। ऐसे में जो रोज़ी न देता हो, वह कैसे किसी चीज़ो को हराम घोषित कर सकता है, कैसे किसी चीज़ से रोक सकता है, कैसे किसी चीज़ को जायज़ बता सकता है और कैसे किसी चीज़ की अनुमति दे सकता है?

इस संसार का रब सब कुछ सुनने वाला और देखने वाला है। वह आदेश देता और मना करता है। बेकसों और बेबसों की पुकार भी सुनता है। ज़ाहिर सी बात है कि जिसकी यह शान हो, उसी को दीन का निर्माण करने और उसका पालन न करने पर दंड देने का अधिकार है। अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम की जाति का, जब उसने सोने के एक बछड़े को पूज्य बना लिया, खंडन किया है। फ़रमाया है : ''और मूसा की जाति ने उसके (पर्वत पर जाने के) पश्चात् अपने ज़ेवरों से एक बछड़ा बना लिया, जो एक शरीर था, जिसकी गाय जैसी आवाज़ थी। क्या उन्होंने यह नहीं देखा कि वह न तो उनसे बात करता है और न उन्हें कोई राह दिखाता है? उन्होंने उसे (पूज्य) बना लिया तथा वे अत्याचारी थे।'' [सूरा अल-आराफ़ : 148]

चूँकि रब ही ने इन्सान के अंदर इच्छाएँ रखी हैं और उसे विवेक एवं इरादा दिया है। एकमात्र वही इस बात का हक़दार है कि विधान का निर्माण करे, उसका अनुसरण करने वाले को प्रतिफल दे और अवज्ञा एवं विरोध के मार्ग पर चलने वाले को धमकी दे।

चूँकि रब ही ने इन्सान के अंदर सदगुण पैदा किए हैं और चलने के लिए भलाई के रास्ते दिखा दिए हैं और बचने के लिए बुराई के रास्ते बता दिए हैं, इसलिए वही इस बात का हक़दार है कि लोगों को सत्य एवं असत्य तथा हिदायत एवं गुमराही की कसौटी बताए।

चूँकि रब संपूर्ण न्यायकारी है और वह बंदों पर कण भर भी अन्याय नहीं करता, वह बड़ा हिकमत वाला और सब कुछ जानने वाला है, जो सारी चीज़ों को उनके उचित स्थान पर रखता है, इसलिए उसके विधान और उसके दीन से उत्तम एवं संपूर्ण कोई विधान नहीं हो सकती।

चूँकि रब सदा जीवित रहने वाला है, उसे न मृत्यु आनी वाली है और न ही वह सोता है, इसीलिए वह बंदों के कर्मों, गुनाहों, सही एवं ग़लत कामों से अवगत है, क्षण भर के लिए भी सृष्टि से ग़ाफ़िल नहीं होता और बंदों के कर्मों का हिसाब रखता है, इसलिए वही विधान का निर्माण करने, हिसाब लेने तथा सवाब (प्रतिफल) एवं दंड देने का हक़दार है।

दूसरा प्रश्न : क्या किसी व्यक्ति या लोगों के समूह के लिए यह संभव है कि वह लोगों के पालन के लिए एक धर्म की स्थापना करे, उनके लिए कानून बनाए, उनके लिए अपनी ओर से नैतिकता एवं अनैतिकता तथा सही एवं गलत के मानक निर्धारित करे और लोगों के कर्मों की समीक्षा करे?

उत्तर : यह संभव नहीं है कि कोई इन्सान दूसरों के लिए कोई दीन स्थापित करे। क्योंकि उसने उनको पैदा नहीं किया है कि जान सके कि क्या उनके हित में है, उनको रोज़ी नहीं दी है कि इसके आधार पर उनसे अपने दीन के अनुपालन का मुतालबा करे, खुद सत्य एवं सही मार्ग पर चल नहीं रहा है, तो दूसरों का सही मार्गदर्शन कैसे करेगा? इन्सान अत्याचारी एवं अज्ञानी है और हमेशा इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के पीछे भागता रहता है, तो फिर वह दूसरों के लिए क़ानून कैसे बना सकता है? जो इन्सान हिकमत एवं ज्ञान में संपूर्ण नहीं होता, वह दूसरों के लिए विधान का निर्माण कैसे कर सकता है? जो इन्सान संपूर्ण न्याय नहीं कर सकता, उससे अपनी जाति एवं वंश का पक्षपात हो ही जाता है, उसे दीन स्थापित करने और विधान का निर्माण करने का अवसर कैसे दिया जा सकता है? जो इन्सान अचेतना का शिकार होता है, सोता है और मरता है, वह सृष्टियों के कर्मों का ज्ञान कैसे रख सकता है कि उनका हिसाब ले सके?

इससे स्पष्ट है कि दीन स्थापित करना, विधान का निर्माण करना, हिसाब लेना और प्रतिफल देना सर्वशक्तिमान रब ही का काम है । यह इन्सान के बस का रोग नहीं है।

तीसरी परिचर्चा :तौहीद (एकेश्वरवाद) शिर्क (अनेकेश्वरवाद) से पूर्वर्ती है तथा अनेकेश्वरवाद ने मानव समाज को बाद में अपनी चपेट में लिया

आदम अलैहिस्सलाम की रचना के बारे में बात करते समय हमने इस बात का उल्लेख कर दिया है कि उनके वंश के लोग दस नस्लों तक एकेश्वरवाद पर क़ामय थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(आरंभ में) सब लोग एक ही समुदाय थे।" [सूरा अल-बक़रा : 213] यानी तौहीद (एकेश्वरवाद) के मार्ग पर चल रहे थे। फिर नूह अलैहिस्सलाम की जाति में शिर्क (बहुदेववाद) सामने आया। यह धरती में सामने आने वाला पहला शिर्क था। इस शिर्क के आरंभ के क़िस्से को संक्षिप्त में इस प्रकार बयान किया जा सकता है कि नूह अलैहिस्सलाम की जाति से पहले की नस्लों में कुछ सदाचारी लोग थे, जिनकी लोगों के दिलों में बड़ी इज़्ज़त थी। (कुछ लोग उनका अनुसरण भी करते थे। जब उनकी मृत्यु हो गई, तो उनके अनुसरणकारियों ने कहा कि अगर हमने इनकी तस्वीरें बना लीं, तो इनको याद करके हमें इबादत की प्रेरणा अधिक मिलेगी। अतः उन्होंने उनकी तस्वीरें बना लीं। जब यह लोग भी मर गए और दूसरे लोग आए, तो शैतान ने अपना काम शुरू कर दिया। उनसे कहा कि तुम्हारे पूर्वज इन्हीं की इबादत करते थे और इन्हीं से बारिश माँगा करते थे। अतः उन लोगों ने उन्हीं की इबादत शुरू कर दी।) [37] [जामे अल-बयान : 23/639]

यह धरती में शिर्क का आरंभ था। आपने देखा कि शिर्क सदाचारी लोगों के सम्मान के रास्ते से दाख़िल हुआ। सम्मान ने इबादत तक पहुँचा दिया। नूह अलैहिस्सलाम की जाति के बाद शिर्क का यह सिलसिला चल पड़ा। हर जाति ने अल्लाह को छोड़कर अपने-अपने पूज्य बना लिए। आगे चलकर शिर्क ने एक और रूप धारण कर लिया। कुछ लोगों ने कहा कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। अल्लाह की पत्नी एवं संतान है। सच्चाई यह है कि अल्लाह इस प्रकार की बातों से पाक एवं पवित्र है। बाद में शिर्क का एक और रूप देखने को मिला। कुछ लोगों ने एक से अधिक पूज्य होने का दावा किया। कुछ लोगों ने तीन एवं नौ पूज्यों की इबादत शुरू कर दी।

शिर्क के ये सारे रूप ग़लत हैं। शिर्क में कोई भलाई नहीं है। वह्य एवं तर्क दोनों शिर्क से रोकते हैं और उसे बिना प्रमाण का दावा मानते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा उन लोगों ने जिन्नों को अल्लाह का साझी बना दिया है, जब कि उसी ने उनको पैदा किया है। तथा उस अल्लाह के लिये बिना किसी ज्ञान-प्रमाण-के पुत्र तथा पुत्रियां गढ़ लीं, अल्लाह पवित्र और महान है उससे जो यह (उसके बारे में) कह रहे हैं ।" [सूरा अल-अनआम : 100] हमने पिछली परिचर्चा में ऐसे प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं, जो शिर्क से रोकते और उसे ग़लत मानते हैं। वह बंदे पर केवल एक अल्लाह की इबादत करना और किसी को उसका साझी न बनाना अनिवार्य करते हैं।

चौथी परिचर्चा : सच्चा धर्म नबियों का धर्म है

अल्लाह ही ने दीन की स्थापना और विधि-विधान का निर्माण किया और अपने दीन को लोगों तक रसूलों एवं नबियों के माध्यम से पहुँचाया। अल्लाह के दीन का स्तंभ है; केवल एक अल्लाह की इबादत करना, उसके सामने उपसिथित होने पर विश्वास रखना और दोबारा उठाए जाने एवं हिसाब-किताब के दिन पर विश्वास रखना। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि सारे नबी ईमान के बड़े सिद्धाँतों पर विश्वास रखने के बिंदु पर एकमत हैं। ईमान के बड़े सिद्धाँत हैं; अल्लाह पर विश्वास रखना, आकाशीय ग्रंथों, जैसे तौरात, इंजील, ज़बूर (इन तीनों ग्रंथों के विकृत होने से पहले) और क़ुरआन पर विश्वास रखना, तमाम नबियों एवं रसूलों पर विश्वास रखना, अंतिम नबी एवं रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर विश्वास रखना, तक़दीर पर विश्वास रखना और आख़िरत के दिन पर विश्वास रखना। एक बात और याद रखनी चाहिए कि अगर सांसारिक जीवन ही अंत होता, तो जीवन एवं अस्तित्व निरर्थक होता।

अल्लाह के दीन में इस बात का आह्वान किया गया है कि कुछ बड़ी एवं बुनियादी इबादतों द्वारा एक अल्लाह की इबादत की जाए। इस्लाम की एक बुनियादी एवं बड़ी इबादत नमाज़ है। नमाज़ नाम है, खड़े होने, रुकू, सजदा, अल्लाह का ज़िक्र और उसकी प्रशंसा करने तथा उससे दुआ माँगने का। मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ता है। नमाज़ में सारे अंतर समाप्त हो जाते हैं। धनी एवं निर्धन और राजा एवं प्रजा सब एक ही सफ़ (पंक्ति) में खड़े दिखाई देते हैं। दूसरी बुनियादी इबादत ज़कात है। ज़कात दरअसल धन का एक छोटा-सा भा है, जो अल्लाह की निर्धारित की हुई शर्तों के साथ एक निश्चित मात्रा में धनवानों से लेकर निर्धनों तथा अन्य निश्चित लोगों को साल में एक बार दिया जाता है। तीसरी बुनियादी इबादत रोज़ा है। रोज़ा नाम है रमज़ान महीने के दिनों में रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से रुके रहने का। रोज़ा इन्सान की इच्छा शक्ति एवं धैर्य को पोषित करता है। चौथी बुनियादी इबादत हज है। हज नाम है सक्षम एवं सामर्थ्य रखने वाले व्यक्ति का पूरे जीवन काल में एक बार मक्का में स्थित अल्लाह का पवित्र घर जाने का। हज के दौरान सारे लोग समान रूप से अल्लाह से लौ लगाते हैं। इस अवसर पर सारे अंतर और सारी संबद्धताएँ ख़त्म हो जाती हैं। इस्लामी इबादतों की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इनके तरीक़े, समय और शर्तों का निर्धारण सर्वशक्तिमान अल्लाह ने किया है और रसूल के माध्यम से इन्सानों तक पहुँचाया है। आज तक इन्सानों द्वारा इनमें कोई कमी-बेशी नहीं की जा सकी है। एक और ख़ास बात यह है कि इन तमाम बड़ी इबादतों का आह्वान तमाम नबियों ने किया है।

अल्लाह का दीन माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश देता है। चाहे वह ग़ैर-मुस्लिम ही क्यों न हों। बाल-बच्चों की अच्छी तर्बियत और प्रशिक्षण का आदेश देता है। कथन तथा कर्म में न्याय करने का आदेश देता है। सामने दुश्मन ही क्यों न हो, सारी सृष्टि के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश देता है। क्योंकि सच्चा दीन नैतिकता और सदाचार का आह्वान करता है।

अल्लाह का दीन अच्छी आदतों, जैसे सच्चाई, अमानतदारी, पाकबाज़ी, हया, बहादुरी, धन खर्च करना, उदारता, ज़रूरतमंद की मदद करना, विपत्ति में घिर हुए व्यक्ति की पुकार सुनना, भूखे को खाना खिलाना, पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करना, रिश्तों-नातों का ख़्याल रखना और जानवरों के साथ दयापूर्ण व्यवहार करना आदि का आदेश देता है।

अल्लाह के दीन ने अल्लाह का साझी बनाने और उसके प्रति अविश्वास व्यक्त करने, बुतों की पूजा करने, अल्लाह के बारे में जानकारी के बिना कोई बात कहने, संतान की हत्या करने, बेगुनाह की हत्या करने, धरती में फ़साद फैलाने, जादू, गुप्त एवं व्यक्त बेहयाइयों, व्यभिचार, समलैंगिकता और सूद को हराम घोषित किया है। अल्लाह के दीन ने मरे हुए जानवरों, बुतों के लिए एवं थानों में ज़बह होने वाले जानवरों, सूअर के मांस और सारी नापाक एवं गंदी चीज़ों को खाना हराम किया है। उसकी नज़र में यतीम का माल खाना, नाप-तोल में कमी-बेशी करना और रिश्ता-नाता तोड़ना भी हराम है। याद रहे कि इन चीज़ों के हराम होने पर सारे नबी एकमत हैं।

अल्लाह का दीन बुरी आदतों, जैसे झूठ बोलना, धोखा देना, छल करना, ख़ियानत करना, द्वेष, चोरी, सरकशी, अत्याचार और हर गंदी आदत से रोकता है।

अल्लाह के दीन ने अक़्ल का स्थान ऊँचा किया है, उसे शरई ज़िम्मेवारियों का आधार बनाया है और अंधविश्वास एवं मूर्ति पूजा से जुड़ी हुई चीज़ों से मुक्त किया है। अल्लाह के दीन में रहस्य एवं ऐसे नियम नहीं हैं, जो किसी वर्ग विशेष पर लागू होते हों। उसके सारे आदेश-निर्देश एवं विधि-विधान सही विवेक के अनुकूल, न्यायसंगत एवं हिकमत से भरे हुए हैं। उसने अक़्ल को भ्रष्ट करने वाली तमाम चीज़ों से मना किया है। उदाहरण स्वरूप नशीले पदार्थों को ले सकते हैं।

अल्लाह का दीन सही ज्ञान की महिमा करता है, वासना रहित वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है तथा हमें अपने आप और हमारे आस-पास के ब्रह्माण्ड पर विचार और चिंतन करने का आह्वान करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ संसार के किनारों में तथा स्वयं उनके भीतर दिखाएँगे, यहाँ तक कि उनके लिए स्पष्ट हो जाए कि निश्चय यही सत्य है। और क्या आपका रब प्रयाप्त नहीं इस बात के लिए कि निःसंदेह वह चीज़ पर गवाह है?" [सूरा फ़ुस्सिलत : 53] विज्ञान के सही नतीजे भी सही दीन से टकराते नहीं हैं।

चौथी परिचर्चा : एकाधिक धर्म एवं एकाधिक पूज्य

हम पीछे बयान कर आए हैं कि अल्लाह के यहाँ सही धर्म केवल इस्लाम है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह अल्लाह के निकट धर्म केवल इस्लाम है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 19] जिसने इस्लाम के अतिरिक्त किसी और दीन का पालन सत्य मार्ग प्राप्त करने की कोशिश की, उसकी इस कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और जो भी इस्लाम के सिवा (किसी और धर्म) को अपनाएगा, उसे उसकी तरफ़ से कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [सूरा आल-ए-इमरान : 85] आदम अलैहिस्सलाम और उनकी नस्ल के आरंभिक काल के लोग विशुद्ध रूप से एकेश्वरवादी थे। बाद में शिर्क (बहुदेववाद) शुरू हुआ और विभिन्न पूज्य सामने आ गए। कोई किसी पत्थर की इबादत करने लगा। कोई गाय की इबादत करने लगा। कोई इन्सान की पूजा करने लगा। कोई किसी ग्रह की पूजा करने लगा। कोई किसी तारे की पूजा करने लगा। इबादत के नित-नए तरीक़े भी सामने आ गए। कोई जानवरों की बलि दे रहा है। कोई किसी गुफ़ा में जाकर ध्यान में लगा हुआ है। कोई आत्मा की शुद्धि के लिए हलाल इच्छाओं को त्याग रहा है। कोई पवित्र होने के लिए शरीर पर जानवर का मल-मूत्र मल रहा है।

ऐसे में कोई व्यक्ति पूछ सकता है कि इस तरह विभिन्न धर्मों के सामने आने का कारण क्या है? इसके उत्तर में हम कहेंगे : शैतान ने अल्लाह के सामने अभिमान दिखाया और अल्लाह के आदेश के बावजूद आदम को सजदा करने से मना कर दिया, तो द्वेष की आग में जल-भुनकर आदम की संतान को पथभ्रष्ट करने का प्रण ले लिया। क्योंकि आदम तथा उनकी संतान को उसपर फ़ज़ीलत दी गई थी। सर्वशक्तिमान रब ने इसकी सूचना देते हुए कहा है : "(अल्लाह ने) कहा : ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने रोका कि तू उसके लिए सजदा करे जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया? क्या तू बड़ा बन गया, या तू था ही ऊँचे लोगों में से? उसने कहा : मैं उससे बेहतर हूँ। तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया। (अल्लाह ने) कहा : फिर तू यहाँ से निकल जा। निःसंदेह तू धुत्कारा हुआ है। और निःसंदेह तुझपर बदले (क़यामत) के दिन तक मेरी धिक्कार है। उस (इबलीस) ने फरमाया : ऐ मेरे रब! फिर मुझे उस दिन तक के लिए अवसर दे, जिसमें लोग पुनः जीवित किए जाएँगे। (अल्लाह ने) कहा : निःसंदेह तू मोहलत दिए गए लोगों में से है। निर्धारित समय के दिन तक। उसने कहा : तो तेरे गौरव की क़सम! मैं अवश्य उन सबको गुमराह कर दूँगा। सिवाय तेरे उनमें से चुने हुए बंदों के। (अल्लाह ने) कहा : तो सत्य यह है और मैं सत्य ही कहता हूँ। कि मैं अवश्य ही जहन्नम को तुझसे तथा उन लोगों से भर दूँगा, जो उनमें से तेरा अनुसरण करेंगे।) [सूरा साद : 75-85]

जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम उनके विरुद्ध किए गए एक षड्यंत्र के नतीजे में जेल चले गए और उनके साथ दो मुश्रिक (बदुदेववादी) भी जेल गए, तो उन्होंने दोनों से अल्लाह के अलावा पूजे जाने वाले अन्य पूज्यों की हक़ीक़त सामने लाने के लिए एक प्रश्न किया। उन्होंने पूछा : "ऐ मेरे जेल के दोनों साथियो! क्या अलग-अलग अनेक पूज्य बेहतर हैं या एक प्रभुत्वशाली अल्लाह?" [सूरा यूसुफ़ : 39] हम भी आज वही प्रश्न करना चाहेत हैं। प्रश्न यह है कि क्या आज अल्लाह के अतिरिक्त पूजे जाने वाले ये पूज्य बेहतर हैं या प्रभुत्वशाली एक अल्लाह?

अल्लाह ने यहूदियों द्वारा उज़ैर की और ईसाइयों द्वारा मसीह की इबादत का उल्लेख करने के बाद कहा है कि ये लोग अपने ही जैसे इन्सानों की इबादत करके दरअसल अपने से पहले की अल्लाह पर विश्वास न रखने वाली जातियों के कथन को चरितार्थ कर रहे हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा यहूदियों ने कहा कि उज़ैर अल्लाह का पुत्र है और ईसाइयों ने कहा कि मसीह अल्लाह का पुत्र है। ये उनके अपने मुँह की बातें हैं। वे उन लोगों जैसी बातें कर रहे हैं, जिन्होंने इनसे पहले कुफ़्र किया। उनपर अल्लाह की मार हो! वे कहाँ बहकाए जा रहे हैं?" [सूरा अल-तौबा : 30] आयत का अंत अल्लाह ने इन शब्दों द्वारा किया है : "वे कहाँ बहकाए जा रहे हैं?" ये लोग सृष्टिकर्ता एवं आजीविकादाता रब की इबादत से ऐसी सृष्टि की इबादत की ओर कैसे फेर दिए जा रहे हैं, जिसके हाथ में अपना लाभ या हानि भी नहीं है।

धर्मों की बहुलता दरअसल आदम के पुत्रों द्वारा शैतान के बहकाए जाने के प्रयास को सफल बनाने के लिए उठाए जाने वाले क़दम के अलावा और कुछ नहीं है। अन्यथा, एक विवेकी इंसान, जो सुनता है, देखता है और अपनी इच्छानुसार कार्य करता है, वह किसी निर्जीव वस्तु, कब्र, जानवर या मृत की पूजा कैसे कर सकता है, जो न सुन सकता है, न देख सकता है, न हानि पहुँचा सकता है, न लाभ पहुँचा सकता है, न पुकारने वाले की सहायता कर सकता है, न संकटग्रस्त को बचा सकता है। सच्चाई यह है कि लोग अपने पूर्वजों के पद्चिह्नों पर चलते हुए एक दूसरे का अनुकरण किए जा रहे हैं और जो कुछ होता देख आए हैं उसी पर जमे हुए हैं और उसी का बचाव कर रहे हैं। दुआ है कि अल्लाह हमें सत्य को सत्य समझने और उसका अनुसरण करने तथा असत्य को असत्य देखने तथा उससे बचे रहने का सुयोग प्रदान करे।

छठी परिचर्चा : दीन की दृष्टि से लोगों के प्रकार

हम पीछे बता आए हैं कि लोग दस नस्लों तक एकेश्वरवाद पर क़ायम रहे और उसके बाद नूह अलैहिस्सलाम के ज़माने में शिर्क (बहुदेववाद) सामने आया और लोगों के दो प्रकार हो गए :

प्रथम प्रकार : रसूलों के अनुसरणकारी। ये अल्लाह तथा आख़िरत के दिन पर विश्वास रखते थे, ज्ञान के साथ अल्लाह की इबादत करते थे, अल्लाह के दिए हुए विधि-विधान के अनुसार जीवन गुज़ारते थे और उसकी हलाल की हुई चीज़ों को हलाल तथा उसकी हराम की हुई चीज़ों को हराम मानते थे। क्योंकि हलाल वही है, जिसे अल्लाह ने हलाल किया हो और हराम वही है, जिसे अल्लाह ने हराम किया हो। इसी तरह वह बेहयाई के कामों और गुनाहों से दूर रहते हैं तथा अत्याचार तथा अन्याय से बचते हैं। यही लोग दरअसल सच्चे दीनदार एवं सही दीन पर चलने वाले लोग हैं।

द्वितीय प्रकार : ऐसे लोग जिन्होंने रसूलों का अनुसरण नहीं किया। इसका कारण विमुखता भी हो सकती है, अभिमान भी हो सकता है, और रसूलों की शिक्षा से अनभिज्ञता भी हो सकती है कि उनके पास इस्लाम का आह्वान इस तरह नहीं पहुँचा कि सत्य को जान सकते और उसका अनुसरण कर पाते। इसलिए ग़ैबी और परोक्ष से सम्बन्ध रखने वाला चीज़ों के बारे में ऐसे अक़ीदे रखते रहे, जिनकी कोई दलील नहीं है। फलस्वरूप कुफ़्र एवं शिर्क की वादियों में भटकते रहे और जिन-जिन कामों को मन चाहा, धर्म समझकर करते रहे। इस प्रकार के लोग सत्य की तलाश में सर मारते फिरते हैं। कभी इस रास्ते पर चलकर देखते हैं और कभी उस रास्ते पर, और ऐसे ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। सत्य तक पहुँच नहीं पाते।या उनपर अल्लाह की दया दृष्टि होती है और सीधे रास्ते से अवगत हो जाते हैं तथा रसूलों के मार्ग पर चलना शुरू कर देते हैं।

अल्लाह के द्वारा स्थापित किए गए धर्मों के अतिरिक्त जिन धर्मों का पालन इन्सान करता है, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। उनमें से कुछ धर्म तो मूल रूप से नबियों के लाए हुए धर्म थे, इस प्रकार के धर्म दो हैं; यहूदी धर्म एवं ईसाई धर्म, यह दोनों धर्म अपने समय में अल्लाह के धर्म हुआ करते थे, इनको अल्लाह ने अपने रसूलों द्वारा दुनिया में भेजा था। लेकिन यहूदियों एवं ईसाइयों ने अपने धर्मों को विकृत कर डाला, उनकी मूल विशेषताओं को मिटा डाला तथा अपनी किताबों को बदल डाला और नष्ट कर दिया। फलस्वरूप उनके पास सही दीन एवं विश्वसनीय आकाशीय धर्म मौजूद न रहा। इन दोनों धर्मों में बहुत-से रूमी, ईरानी एवं यूनानी आदि अक़ीदे दाख़िल हो गए।

कुछ धर्म ऐसे भी पाए जाते हैं, जो मूल रूप से नबियों की लाई हुई शिक्षाओं पर आधारित नहीं हैं। ये मानव गठित धर्म हैं। इस प्रकार के धर्मों की संख्या बहुत ज़्यादा है। जैसे हिंदू धर्म, कन्फ्यूशीवाद, पारसी धर्म, ताओ धर्म और बौद्ध धर्म आदि।

हम जानते हैं कन्फ्यूशियस, बुद्ध और ज़रतुश्त अपने जीवन काल में महान लोग थे। लेकिन हमें उनके जीवन में, स्रोतों से जो मिला उसके अनुसार, यह नहीं मिलता कि वे ईश्वर और अंतिम दिन में विश्वास करते थे और लोगों को केवल एक अल्लाह की इबादत का आह्वान करते थे। हम जानते हैं कि उन्होंने अपने-अपने समाजों के जीवन को प्रभावित किया, उन्हें अपनी सांसारिक स्थितियों में सुधार लाने, एक-दूसरे का सहयोग करने, निर्धनों एवं निर्बलों के साथ खड़े होने तथा बुरी चीज़ों एवं लोगों पर अत्याचार करने से बचने का और इस प्रकार की अन्य अच्छी बातों का पालन करने का आह्वान किया। यही नहीं, खुद इस मार्ग पर चलकर भी दिखाया। इन लोगों ने अपने अनुयायियों को अपना सम्मान करने, अपने बारे में अतिशयोक्ति करने और अपनी इबादत करने को भी नहीं कहा। इनकी मृत्यु के सदियों बाद ऐसे लोग इनके अनुयायी बन गए, जो इनके मूल संदेश से अवगत नहीं थे। फलस्वरूप अतिशयोक्ति करने लगे और इनको इन्सान के स्थान से ऊपर का स्थान दे दिया। इस अतिशयोक्ति ने कुछ लोगों को उनकी इबादत तक पहुँचा दिया।

व्यक्तियों के बारे में अतिशयोक्ति, धर्म को विकृत करना और उसका विभिन्न चरणों से गुज़रना, सच्चे धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों के बीच एक महत्पूर्ण समानता है। अगर आप इस प्रकार के किसी भी धर्म के इतिहास पर नज़र डालेंगे, तो पाएँगे कि वह विभिन्न चरणों से गुज़रा चुका है।

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो समझते हैं कि सभी धर्म समान हैं। सभी धर्म झूठे हैं। इसलिए नास्तिक बनकर जीवन गुज़ारते हैं। न अपने रब को जानते हैं और न उसके सामने खड़े होने पर विश्वास करते हैं। लेकिन ये उनकी अज्ञानता है। उन्होंने सच्चे धर्म को जाना ही नहीं। सीधे रास्ते को पहचाना ही नहीं। उनके पास नास्तिकता को साबित करने की कोई दलील है ही नहीं। बात बस इतनी है कि सच्चे धर्म का पता लगा नहीं सके, इसलिए समझ लिया कि सारे धर्म झूठे हैं। हाँ, उनका इतना समझना तो सही है कि सारे विकृत धर्म, जैसे यहूदी धर्म, ईसाई धर्म एवं आज का मानवता का धर्म, ये सारे झूठे धर्म हैं, लेकिन उनका ज्ञान अल्लाह के सच्चे धर्म इस्लाम के आलोक से आलोकित न हो सका। इस लिए नास्तिक बनकर जीवन गुज़ारे और समझ बैठे कि वह जिस निर्णय तक पहुँचे हैं, वही सही निर्णय है। जबकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनका यह निर्णय ग़लत भूमिकाओं पर आधारित है, जिनके नतीजे भी ग़लत सामने आए हैं।

सातवीं परिचर्चा : असत्य धर्मों के बीच की समानताएँ

विकृत एवं मूर्ति पूजा पर आधारित धर्मों के बीच में बहुत-सी समानताएँ पाई जाती हैं। कुछ समानताएँ इस प्रकार हैं :

इन धर्मों की स्थापना इन्सान ने की है और इनका विधान इन्सान द्वारा तैयार किया गया है। चूँकि इन्सान कमज़ोर है, इसलिए उसके द्वारा स्थापित धर्म भी कमज़ोर होगा। हम पीछे भी बता चुके हैं कि इन्सान इस बात की योग्यता नहीं रखता कि अपने जैसे इन्सान के लिए धर्म की स्थापना करे।

असत्य धर्मों के अंदर परिवर्तन आता रहता है। वह एक अवस्था में नहीं रहते। हर नस्ल उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन लाना चाहती है। उसे कुछ चीज़ें अच्छी लगने लगती हैं, जिनपर पहले के लोगों का अमल नहीं था। इसी लिए हम देखते हैं कि धर्म विभिन्न चरणों से गुज़रते हैं और हर चरण पूर्ववर्ती चरण से भिन्नत होता है।

असत्य धर्म व्यक्तियों की महिमा मंडन करते हैं। उनको देवता बना देते हैं। उनसे ऐसे कार्यों एवं गुणों को जोड़ देते हैं, जो दरअसल सर्वशक्तिमान रब के साथ ख़ास हैं। जैसे ग़ैब की बात जानना, बारिश बरसाना और मुसीबत दूर करना आदि। उन्हें सर्वशक्तिमान रब का बेटा बना देते हैं। कभी-कभी तो पूज्यों का समूह परिवार के समान दिखने लगते हैं। पिता भी है, माता भी है और बेटा भी। इसके विपरीत अल्लाह के नबी गण अपने अनुयायियों को अपने बारे में अतिशयोक्ति से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने एक भाषण में कहा है : "तुम लोग मेरे प्रति प्रशंसा और तारीफ़ में उस प्रकार अतिशयोक्ति न करो, जिस प्रकार ईसाइयों ने मरयम के पुत्र के बारे में किया है। मैं केवल अल्लाह का बंदा हूँ। अतः मुझे अल्लाह का बंदा और उसका रसूल कहो।" [38] अल्लाह ने यहूदियों एवं ईसाइयों को अतिशयोक्ति से मना करते हुए कहा है : "(ऐ नबी!) कह दो : ऐ अह्ले किताब! अपने धर्म में नाहक़ अतिशयोक्ति न करो और उन लोगों की इच्छाओं के पीछे न चलो, जो इससे पहले पथभ्रष्ट हुए और बहुतों को पथभ्रष्ट किया और सीधे मार्ग से भटक गए।" [सूरा अल-माइदा : 77] [सहीह बुख़ारी : 3445]

असत्य धर्मों का पालन करने वालों को नबियों की लाई हुई शिक्षाओं के अनुसरण से रोकने वाली सबसे बड़ी चीज़ पक्षपात, कोरी तक़लीद (अंधा अनुसरण) और ग़लत का समर्थन है। उच्च एवं महान अल्लाह ने उनके बारे में कहा है : "और जब उनसे कहा जाता है : आओ उसकी ओर जो अल्लाह ने उतारा है और रसूल की ओर, तो कहते हैं : हमें वही काफ़ी है, जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है। क्या अगरचे उनके बाप-दादा कुछ भी न जानते हों और न सहीह रासता पाते हों।" [सूरा अल-माइदा : 104] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "तथा आप उन्हें इबराहीम का समाचार सुनाएँ। जब उसने अपने बाप तथा अपनी जाति से कहा : तुम किसकी पूजा करते हो? उन्होंने कहा : हम कुछ मूर्तियों की पूजा करते हैं, इसलिए उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं। उसने कहा : क्या वे तुम्हें सुनते हैं, जब तुम (उन्हें) पुकारते हो? या तुम्हें लाभ देते हैं, या हानि पहुँचाते हैं? उन्होंने कहा : बल्कि हमने अपने बाप-दादा को पाया कि वे ऐसा ही करते थे।" [सूरा अल-शुअरा : 69-74]

असत्य धर्मों के बीच एक प्रमुख समानता यह है कि इन सभी धर्मों में बड़ी मात्रा में ऐसे अंधविश्वास और किंवदन्तियाँ पाई जाती हैं, जिनको न तो शरीयत ग्रहण करती है और न अक़्ल स्वीकार करते हैं। उनकी पुष्टि कदापि नहीं की जा सकती। लेकिन इन धर्मों के अनुयायियों का दिल इन मिथकों में लग गया है और उन्होंने उनको सत्य भी स्वीकार कर लिया है और उन पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करते हैं।

असत्य धर्म लोगों के बीच वर्गवाद को बढ़ावा देते हैं। कुछ लोगों को उच्च श्रेणी प्रदान करते हैं। इस श्रेणी को ऐसी सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, जो दूसरों को नहीं होतीं। कुछ लोग तो यहाँ तक समझते हैं कि इस वर्ग के अंदर कुछ दैवीय तत्व होते हैं। वर्गीकरण का यह सिलसिला अंतिम पायदान तक चलता रहता है। अंतिम पायदान के लोग अछूत होते हैं, जो शांति से जी भी लें, तो बड़ी बात है। जबकि सच्चा धर्म रब (स्रष्टा, स्वामी, प्रबंधक) के सामने, शरीयत के सामने और सवाब एवं प्रतिफल के मामले में सारे लोगों को बराबर समझता है।

असत्य धर्म धार्मिक नेताओं को कुछ धार्मिक पद और उपाधियाँ प्रदान करते हैं। हर श्रेणी के लोगों को उसके बाद वाली श्रेणी में शामिल होने के लिए कुछ निर्धारित तरीक़ों, निश्चित तरतीबों, ज्ञात बलिदानों और धर्म के नेता के प्रति पूर्ण निष्ठा का पालन करना पड़ता है। किसी भी श्रेणी के लोगों को पता नहीं होता कि उसके ऊपर की श्रेणी के लोग क्या कुछ करते हैं। हर श्रेणी के पास धर्म से संबंधित ऐसे भेद एवं रहस्य होते हैं, जिनसे नीचे की श्रेणी अवगत नहीं होती। असत्य धर्मों का नेतृत्व अपने सारे कार्यों को गोपनीय रखता है, ताकि जनता के बीच प्रतिष्ठा एवं रुतबा क़ायम रहे।

असत्य धर्मों का नेतृत्व प्रयास करता है कि ग़लत तरीक़े से लोगों का माल खाया जाए। लगभग हर विकृत धर्म ने अनुयायियों से लेकर धन एकत्र करने का तंत्र स्थापित कर रखा है। उन्होंने अपने अनुयायियों को विश्वास दिला रखा है कि वे उनपर जितना ज़्यादा खर्च करेंगे, उनको दोनों जहानों में उतना ही सुखमय जीवन प्राप्त होगा।

आठवीं परिचर्चा : निश्चित सत्य

आकाशीय धर्म में विश्वास एक यक़ीनी एवं क़तई सत्य माना जाता है, जो बढ़ते हुए निर्णायक ज्ञान तक पहुँच जाता है, जिसकी पुष्टि अनेकों साक्ष्यों एवं प्रमाणों से होती है। आकाशीय धर्म में विश्वास एक सही, दुरुस्त और सच्चा विश्वास माना जाता है और इसके प्रमाण इतने प्राकृतिक एवं आवश्यक हैं कि मनमानी के जज़्बे, कोरे अनुसरण और हठधर्मी से आज़ाद व्यक्ति इनका इनकार कर नहीं सकता। इसके प्रमाणों का प्राकृतिक होने का अर्थ यह है कि इन्सान की उत्पत्ति अल्लाह के रब (उत्पत्तिकार, स्वामी, प्रबंधक) होने में विश्वास और उसकी शरण लेने के जज़्बे के साथ हुई है। जबकि उनके आवश्यक होने का अर्थ यह है कि एक विवेकी इन्सान अपने मन से अल्लाह के अस्तित्व तथा रब एवं पूज्य होने में विश्वास को बाहर नहीं कर सकता।

इसी तरह सच्चे धर्म पर ईमान के पक्ष में बहुत-से शरई एवं ठोस तार्किक प्रमाण मौजूद हैं। इन प्रमाणों में बड़ी विविधता भी है। ये पवित्र क़ुरआन में जगह-जगह बिखरे हुए हैं। इन्हें तर्क बनाने में भी बड़ी विविधता है। इनमें कुछ प्रमाणों का संबंध स्वयं इन्सान की हस्ती से है, कुछ का संबंध आकाशों, धरती, समुद्रों, पर्वतों और नहरों से है, कुछ प्रमाण तार्किक हैं और कुछ उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें से कुछ का उल्लेख इस किताब की पिछली परिचर्चाओं में हो चुका है। जिसे इस प्रकार के अधिक प्रमाण देखने हों, वह पवित्र क़ुरआन या उसके अर्थों के अनुवाद का अध्ययन करे।

इस निश्चित सत्य की पुष्टि इतिहास भी करता है कि मुसलमान आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से आज तक अमल करते आ रहे हैं। हम देखते हैं कि अल्लाह पर ईमान रखने वाले लोग अपने ईमान पर जमे हुए हैं और अपने अक़ीदों पर मज़बूती से क़ायम हैं। सब लोग एक दृष्टिकोण को मान रहे हैं। आज के मुसलमान अक़ीदा, इबादत, शरीयत और दृष्टिकोण से संबंधित दीन की जिन बातों का पालन कर रहे हैं, उन्हीं का पालन नूह अलैहिस्सलाम और उनके अनुयायी करते थे। उन्हीं का पालन इबराहीम अलैहिस्सलाम और उनके अनुयायी करते थे। उन्हीं का पालन मूसा अलैहिस्सलाम और उनके अनुयायी करते थे। उन्हीं का पालन ईसा अलैहिस्सलाम और उनके अनुयायी करते थे। उन्हीं का पालन अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम करते थे और उनके अनुयायी आज तक कर रहे हैं।

इस निश्चित सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण मुस्लिम समुदाय का इस महान धर्म का विश्वास, प्रयोग और व्यवहार में आज तक पालन करते आना है। आज भी मुसलमान उसी मार्ग पर चल रहे हैं, जिस पर अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके सहाबा ने चलकर दिखाया है। आपको मुसलमानों के अक़ीदों और इबादतों के तौर-तरीक़ों में कोई परिवर्तन नहीं दिखेगा। आज भी इस्लाम का उसी तरह सुरक्षित रूप से बाक़ी रहना, जिस तरह अल्लाह ने उतारा था और मुस्लिम समुदाय का उसकी शिक्षाओं पर आज तक अमल करते आना, उस विषय का सबसे उत्तम प्रमाण है, जिसपर हम बात कर रहे हैं।

ऐसे में एक समझदार इन्सान को अतीत के बंधनों और सामाजिक परंपराओं से मुक्त होकर सच्चे ईश्वरीय धर्म की खोज करनी चाहिए, उसके प्रमाणों पर विचार करना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। यही दोनों दुनियाओं में मुक्ति और सफलता है।

चौथी परिचर्चा : ग़ैबी दुनिया; सम्मानित फ़रिश्ते, जिन्नात एवं शैतान

पिछली परिचर्चा में हमने फ़रिश्तों एवं शैतानों की सृष्टि की बात की है। इस अनुभाग में हम संक्षेप में उनकी प्रकृति, विशेषताओं और कार्यो के बारे में बात करेंगे।

पहली परिचर्चा : फ़रिश्ते, उनका स्वभाव, गुण, संख्या एवं कार्य

फ़रिश्ते अल्लाह की एक सृष्टि हैं। अल्लाह ने उनको अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। अल्लाह की हर बात मानते हैं। किसी बात की अवमानना नहीं करते। वही करते हैं, जो आदेश होता है। उनकी रचना में भिन्नता होती है। फ़रिश्तों के पास तो बहुत शक्ति होती है, उनकी शक्ति का ज्ञान अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के पास नहीं है। इन्सानों की तरह उनकी वासनाएँ नहीं होतीं। उनका एक महत्वपूर्ण कार्य है रसूलों के पास अल्लाह की ओर से वह्य लेकर आना। कुछ फ़रिश्तों को भ्रूण में रूह फूँकने का काम सोंपा गया है। कुछ फ़रिश्ते जन्नत एवं जहन्नम के प्रहरी हैं। कुछ फ़रिश्तों का काम ईमान वालों का सहोयग करना, इबादत में सदाचारी बंदों की मदद करना, इबादत के प्रति उनके अंदर आकर्षण पैदा करना और उनकी इबादतों के समय उपस्थित रहना है। उनकी संख्या अल्लाह के सिवा कोई नहीं जनता। हर रोज़ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते सातवें आकाश में स्थित अल-बैत अल-मामूर में प्रवेश करते हैं, जिनको दोबार प्रवेश करने का अवसर नहीं मिलेगा।

दूसरी परिचर्चा : जिन्नात एवं शैतानों की दुनिया, उनके गुण एवं कार्य

जिन्नात को अल्लाह ने पैदा किया और अपनी इबादत का दायित्व सोंपा है। आज्ञाकारी जिन्नात मोमिन हैं और अवज्ञाकारी जिन्नात शैतान। शैतान के गुणों में अभिमान, सरकशी, अत्याचार और द्वेष आदि शामिल हैं। शैतानों का सबसे बड़ा काम मानव जाति को पथभ्रष्ट करना, बुरे कामों को सुंदर बनाकर दिखाना, ग़लत काम पर उकसाना और ईमान वालों के बीच बेहयाई को आम करना है। शैतानों का रहनुमा इबलीस है। इन्सान जो भी बुरा काम करता है, उसके पीछे शैतान का हाथ होता है। जिस प्रकार जिन्नात में बहुत-से शैतान होते हैं, उसी तरह इन्सान में भी बहुत-से शैतान हुआ करते हैं। ये बिगाड़ के कामों में एक-दूसरे की मदद करते हैं।

चौथी परिचर्चा : ग़ैबी दुनिया के ज्ञान और उसपर ईमान का प्रभाव

इन अदृष्य दुनियाओं और संसारों का ज्ञान, उनमें बसने वालों की संख्या, विशेषताओं और कार्यों का ज्ञान इन्सान के ज्ञान को समृद्ध करता है। एक मोमिन फ़रिश्तों से जुड़ाव महसूस करता है। वह जानता है कि फ़रिश्ते उसके साथ हैं। अल्लाह ने फ़रिश्तों को इबादत में बंदों का सहयोग करने और बंदों के दिलों में अल्लाह का प्रेम जगाने का काम सोंप रखा है। वह जानता है कि फ़रिश्ते अल्लाह के आदेश से कठिनाइयों के समय उसका सहयोग करते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जब तुम अपने रब को (बद्र के युद्ध के समय) गुहार रहे थे। तो उसने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली। (और कहा :) मैं तुम्हारी सहायता के लिए लगातार एक हज़ार फ़रिश्ते भेज रहा हूँ।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 9] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "उस (अल्लाह) के कुछ (फ़रिश्ते) हैं, जो रखवाली करने वाले हैं (मनुष्य की) उसके आगे से तथा उसके पीछे से, जो अल्लाह के आदेश से उसकी रक्षा कर रहे हैं।" [सूरा अल-राद : 11], एक मोमिन फ़रिश्तों से लज्जा करता है। क्योंकि उसे पता है कि उसके साथ कुछ फ़रिश्ते रहते हैं, जो उसके कर्मों को लिखते रहते हैं। वह उससे केवल पेशाब-पाखाना या संभोग के समय ही अलग होते हैं।

शैतान तथा उसके कार्यों का ज्ञान इन्सान को इस बात से सावधान कर देता है कि कहीं वह उसे भी गुमराह न कर दे, जिस तरह उसने बहुत-से इन्सानों और जिन्नात को गुमराह किया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''ऐ आदम की संतान! ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें लुभाए, जैसे उसने तुम्हारे माता-पिता को जन्नत से निकाल दिया; वह दोनों के वस्त्र उतारता था, ताकि दोनों को उनके गुप्तांग दिखाए। निःसंदेह वह तथा उसकी जाति, तुम्हें वहाँ से देखते हैं, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते। निःसंदेह हमने शैतानों को उन लोगों का मित्र बनाया है, जो ईमान नहीं रखते।'' [सूरा अल-आराफ़ : 27] शैतान तथा उसके कार्यों का ज्ञान एक मोमिन को शैतान के षड्यंत्र, फ़रेब और उसके द्वारा डाले गए बुरे ख़्यालों से बचने के लिए अल्लाह की शरण लेने की ओर ले जाता है। एक मोमिन ऐसे कार्यों से प्रेम रखता है, जो उसे शैतान से बचाते और दोनों के बीच की दूरी बढ़ाते हैं। एक मोमिन ऐसे कार्यों से बचता है, जिनके करने पर शैतान का समर्थन प्राप्त होता है। जैसे ग़फ़लत, अल्लाह के प्रति अविश्वास, अल्लाह का साझी ठहराना, जादू, गंदगी, हराम चीज़ें एवं मुर्दार खाना तथा बेहयाई एवं गुनाह के काम करना।

यह बात जान लेनी चाहिए कि फ़रिश्ते और शैतान जो इन्सान से कराना चाहते हैं, उसे उनसे कराने के लिए सीधे उसका हाथ पकड़ते नहीं हैं। फ़रिश्ते नेकी के कामों को सुंदर बनाकर प्रस्तुत करते हैं और उनकी प्रेरणा देते हैं, जबकि शैतान गुनाह करने पर उकसाता और उसके प्रति इन्सान का आकर्षण पैदा करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है तथा निर्लज्जा की प्रेरणा देता है तथा अल्लाह तुम्हें अपनी क्षमा और अधिक देने का वचन देता है तथा अल्लाह विशाल, ज्ञानी है।" [सूरा अल-बक़रा : 268]

इन सृष्टियों के बारे में जानकारी इन्सान को इस बात से आश्वस्त कर देता है कि या तो सृष्टिकर्ता यानी सर्वशक्तिमान रब है, या फिर सृष्टि यानी इन्सान, फ़रिश्ते, जिन्नात, जानवर या निर्जीव चीज़ें हैं। इस विषय का निश्चित ज्ञान, सृष्टिकर्ता के अधिकार की जानकारी, अपने आस-पास मौजूद सृष्टियों की जानकारी तथा उनके दूसरों पर प्रभाव डालने या न डालने की जानकारी इन्सान को इस बात का पूरा इत्मीनान दिला देती है कि सर्वशक्तिमान रब के अतिरिक्त कोई लाभ एवं हानि का मालिक नहीं है, जिससे अल्लाह पर ईमान एवं उसकी बंदगी के जज़्बे में वृद्धि होती है।

इन सृष्टियों का ज्ञान इन्सान को उन मिथकों और किदवंतियों पर ध्यान न देने वाला बनाता है, जिन्हें लोग नक़ल करते और जिनके सहारे जिन्नों, शैतानों, आत्माओं, राशियों और हमारे आस-पास के संसार के कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर बयान करते हैं। उसे महान रब पर ईमान रखने वाला, आडंबरों एवं अज्ञानता से आज़ाद एवं प्रमाण का अनुसार करने वाला इन्सान बनाता है।

पाँचवाँ अनुभाग : आकाशीय ग्रंथ

पहली परिचर्चा : आकाशीय ग्रंथों की वास्तविकता

आकाशीय ग्रंथों से मुराद वह ग्रंथ हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपने रसूलों एवं नबियों पर उतारा है। इनमें सबसे विख्यात ग्रंथ इबराहीम के सहीफ़े, मूसा के सहीफ़े, मूसा पर उतरने वाली तौरात, दाऊद पर उतरने वाली ज़बूर और ईसा पर उतरने वाली इंजील। इन तमाम नबियों पर दरूद एवं सलाम हो। आकाशीय ग्रंथों में सबसे अंतिम एवं श्रेष्ठ ग्रंथ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला ग्रंथ पवित्र क़ुरान है।

आकाशीय ग्रंथ अल्लाह की वाणी एवं वह्य होता है। उसे लेकर अल्लाह के फ़रिश्ते जिबरील उस नबी पर उतरते हैं, जिसकी ओर उस किताब की वह्य होनी होती है। उसमें उस दीन की व्याख्या होती है, जो उस उम्मत को दिया जाता है, जिसकी ओर यह किताब उतारी गई हो।

फ़रिश्ता वह्य के साथ अल्लाह की अनुमति से ही उतरता है। जब फ़रिश्ता वह्य लेकर उतरता है, तो उसके साथ ऐसे फ़रिश्ते उतरते हैं, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपपर उतरने वाली वह्य की सुरक्षा करते हैं। उच्च एवं महन अल्लाह ने कहा है : ''वही ग़ैब (प्रोक्ष) का जानने वाला है। वह अपने ग़ैब (प्रोक्ष) को किसी पर प्रकट नहीं करता। सिवाय किसी रसूल के, जिसे वह पसंद कर ले। तो निःसंदेह वह उसके आगे तथा उसके पीछे पहरेदार नियुक्त कर देता है। ताकि वह जान ले कि उन्होंने वास्तव में अपने रब के संदेश पहुँचा दिए हैं। और उसने उन सभी चीज़ों को घेर रखा है, जो उनके पास हैं और प्रत्येक वस्तु को गिन रखा है।" [सूरा अल-जिन्न : 26-28], इस आयत का अर्थ है : ताकि अल्लाह की ओर से भेजा गया नबी जान ले कि फ़रिश्तों ने अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया है और संदेश की रक्षा की है। [39] तफ़सीर इब्न-ए-कषीर (8/247) कुछ परिवर्तन के साथ।

मुसलमान पिछली तमाम आकाशीय ग्रंथों पर ईमान रखता है। यानी वह गवाही देता है कि अल्लाह ने इन किताबों को उन सम्मानित नबियों पर उतारा है, वह विश्वास रखता है कि इन किताबों पर उनके अवतरण के समय ईमान लाना ज़रूरी था तथा इस बात पर भी विश्वास रखता है कि पवित्र क़ुरआन को छोड़ यह सारे ग्रंथ विकृत एवं नष्ट हो गए। क़ुरआन अंतिम पुस्तक है, जो क़यामत के दिन तक मानव जाति का मार्गदर्शन करेगा।

चौथी परिचर्चा : आकाशीय ग्रंथों की विशेषताएँ

आकाशीय ग्रंथ अल्लाह की वाणी हैं। अल्लाह की वाणी अल्लाह का गुण है। उसमें संपूर्णता है, प्रताप है, सौंदर्य है, ज्ञान है और हिकमत है।

सारे आकाशीय ग्रंथ अल्लाह के अतिरिक्त अन्य चीज़ों की इबादत छोड़कर केवल एक अल्लाह की इबादत करने का आदेश देते हैं। सारे आकाशीय ग्रंथ अल्लाह पर ईमान से संबंधि मूल बातों की पुष्टि करते हैं। उनके अंदर इन्सान की ज़रूरत की सारी बातों का उल्लेख है। उनके अंदर दीन, प्रतिफल एवं सत्कर्म का सुस्पष्ट बयान है और इनके विपरीत चीज़ों से सावधान किया गया है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हमने आपपर यह पुस्तक (क़ुरआन) उतारी, जो उनके सामने पढ़ी जाती है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी दया और उपदेश है, जो ईमान रखते हैं।" [सूरा अल-अनकबूत : 51]

उनके अंदर इन्सान का मार्गदर्शन किया गया है, उसके लिए दयापूर्ण शिक्षाएँ हैं और ग़ैब (परोक्ष), दीन, दोबारा जीवित करके उठाए जाने और प्रतिफल से संबंधित कठिन प्रश्नों का उत्तर है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की, उनके अच्छे काम के लिए बदला के रूप में अनुग्रह को पूरा करने के लिए, तथा प्रत्येक वस्तु के विवरण और मार्गदर्शन एवं दया के लिए। ताकि वे अपने रब से मिलने पर ईमान ले आएँ।" [सूरा अल-अनआम : 154]

उनके अंदर दिलों के लिए ऐसी नसीहतें हैं, जो उन्हें नरम करती हैं और उन्हें उनके रब के निकट लाती हैं, तथा उनका मार्गदर्शन ऐसी बातों की और करती हैं जो उन्हें शुद्ध करती और सुधारती हैं एवं उन्हें ज्ञानता, गुमराही और भ्रम की बीमारियों से ठीक करती हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ लोगो! निःसंदेह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से बड़ी नसीहत और सीनों में जो कुछ (रोग) है उसके लिए पूर्णतया शिफ़ा और ईमान वालों के लिए सर्वथा हिदायत और रहमत आई है।" [सूरा यूनुस : 57]

उनके अंदर ऐसी अंतर्दृष्टि, सबूत, प्रमाण और तर्क मौजूद हैं, जो सत्य की पुष्टि करते हैं, असत्य की कमर तोड़कर रख देते हैं और अविश्वास को मिटा देते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''यह (क़ुरआन) लोगों के लिए अंतर्दृष्टि का ख़ज़ाना है, तथा विश्वास करने वालों के लिए मार्गदर्शन एवं दया का श्रोत है।" [सूरा अल-जासिया : 20] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : ''तथा कहिए कि सत्य आ गया और असत्य ध्वस्त-निरस्त हो गया, वास्तव में, असत्य को धवस्त-निरस्त होना ही है।" [सूरा अल-इसरा : 81]

आकाशीय ग्रंथों की एक विशेषता यह है कि उनसे जुड़ी हुई हर बात यक़ीनी होती है, उनमें शक एवं संदेह की कोई गुंजाइश नहीं होती है, उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "यह (क़ुरआन) वह पुस्तक है, जिसमें कोई संदेह नहीं, परहेज़गारों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है।" [सूरा अल-बक़रा : 2] यानी यह किताब शक एवं संदेह से ऊपर है।

इन आकाशीय ग्रंथों के अंदर सुदृढ़ ज्ञान है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''अलिफ़, लाम, रा। यह ऐसी पुस्तक है जिसकी आयतें सुदृढ़ की गईं फिर सविस्तार वर्णित की गई हैं, उसकी ओर से, जो तत्वज्ञ, सर्वसूचित है।" [सूरा हूद : 1]

आकाशीय ग्रंथों की एक विशेषता यह है कि उनके अंदर विरोधाभास नहीं होता और उनका एक भाग दूसरे भाग से टकराता नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तो क्या वे क़ुरआन के अर्थों पर सोच-विचार नहीं करते हैं? यदि वह अल्लाह के सिवा दूसरे की ओर से होता तो उसमें बहुत सी विसंगतियाँ पाते।" [सूरा अल-निसा : 82]

आकाशीय ग्रंथों की एक विशेषता यह भी है कि ये ईमान वालों को सुसमाचार सुनाते हैं और पथभ्रष्ट अविश्वासियों को सावधान करते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ह़ा मीम। (यह कुरआन) अत्यंत दयावान्, असीम दयालु की ओर से अवतरित हुआ है। (यह ऐसी) पुस्तक है, जिसकी आयतें खोलकर बयान की गई हैं। (यह) क़ुरआन अरबी (भाषा में) है, उन लोगों के लिए जो ज्ञान रखते हैं। वह शुभ सूचना देने वाला तथा सचेत करने वाला है। लेकिन उनमें से अधिकतर ने (उससे) मुँह फेर लिया, तो वे सुनते ही नहीं।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 1-4], एक और स्थान में उसने कहा है : "सब प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जिसने अपने बंदे पर पुस्तक उतारी, और उसमें कोई टेढ़ नहीं रखी। (बल्कि उसे) अति सीधा (बनाया)। ताकि वह (अल्लाह) अपनी ओर से आने वाली कठोर यातना से डराए, और उन ईमान वालों को जो अच्छे कार्य करते हैं, शुभ सूचना सुना दे कि उनके लिए अच्छा बदला है। जिसमें वे हमेशा रहने वाले होंगे। और उन लोगों को डराए, जिन्होंने कहा कि अल्लाह ने कोई संतान बना रखी है।" [सूरा अल-कह्फ़ : 1-4]

आकाशीय ग्रंथों की एक विशेषता यह है कि वह उन नबियों के जीवन के निजी पक्षों पर तवज्जो नहीं देते, जिनपर उन्हें उतारा गया है। उनके नगरों, क़बीलों, खानदानों, माताओं, पिताओं, पत्नियों और बाल-बच्चों के नाम नहीं बताते। उनकी जन्म तिथि एवं मृत्यु तिथि का भी उल्लेख नहीं करते। हाँ, अगर किसी स्थान में उसकी ज़रूरत पड़ जाए, तो बात अलग है। जैसा इबराहीम अलैहिस्सलाम के पिता का उल्लेख हुआ है।

इसके अतिरिक्त भी इन किताबों की कई अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। लेकिन इनका महत्व बताने के लिए बस इतना कह देना काफ़ी है कि ये अल्लाह के उतारे हुए सम्मानित एवं पवित्र ग्रंथ हैं।

यहाँ एक प्रश्न और भी है। प्रश्न यह है कि क्या दूसरे समुदायों, जैसे चीनी समुदाय, भारतीय समुदाय या अफ्रीकी समुदाय पर कोई आकाशीय ग्रंथ उतरा है और उनके बीच उनमें से कोई रसूल आया है?

हम कहते हैं : अल्लाह ने सृष्टि की रचना अपनी इबादत के लिए किया है और उनको दोबारा पैदा करके अच्छा कर्म करने वाले को सवाब और बुरा कर्म करने वाले को दंड देगा। लेकिन सवाब और दंड देना उसी समय उचित होगा, जब हुज्जत क़ायम कर दी गई हो। ख़ुद सर्वशक्तिमान अल्लाह ने हमें बताया है कि उसने अपनी सृष्टि को व्यर्थ नहीं छोड़ा है। बल्कि उसकी ओर रसूल भेजा है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "वास्तव में, हमने आपको सत्य के साथ शुभ सूचक तथा सचेतकर्ता बनाकर भेजा है और कोई ऐसी जाति नहीं, जिसमें कोई सचेतकर्ता न आया हो।" [सूरा फ़ातिर : 24], उसका भेजा हुआ हर रसूल अपनी जाति की भाषा बोलता और उसमें बात करता था। ताकि उनपर हुज्जत क़ायम हो जाए और उन तक सत्य पहुँच जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने कोई रसूल नहीं भेजा परंतु उसकी जाति की भाषा में, ताकि वह उनके लिए खोलकर बयान करे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है, पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता है, मार्गदर्शन प्रदान करता है। और वही सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।" [सूरा इबराहीम : 4] ऐसा भी हुआ है कि किसी समुदाय में कोई रसूल या नबी भेजा गया और लंबी अवधि गुज़र जाने के बाद उसकी शिक्षाओं के निशान मिट गए और बाद में ऐसी नस्लें पैदा हुईं, जिन्हें न उस नबी के बारे में कुछ पता था और न उन्होंने उसके बारे में कुछ सुना था। फलस्वरूप उन्होंने समझ लिया कि उनकी ओर कोई रसूल भेजा ही नहीं गया है।

इन्सान का पिछले समुदायों, जिनका इतिहास मिट चुका हो और जिनके गुज़रने को काफ़ी समय बीत चुका हो, के नबियों से अवगत न होना एक सामान्य बात है। मसलन चीन के लोगों का अफ़्रीकी समुदायों की ओर भेजे गए रसूलों से अवगत न होना और अफ़्रीकी समुदायों का चीनियों की ओर भेजे गए रसूलों से अवगत न होना सामान्य बात है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने भी ज्ञान के इस अभाव का उल्लेख किया है। फ़रमाया है : "(ऐ नबी!) निःसंदेह हमने आपकी ओर वह्य भेजी, जैसे हमने नूह़ और उसके बाद (दूसरे) नबियों की ओर वह्य भेजी। और हमने इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़, याक़ूब और उसकी संतान, तथा ईसा, अय्यूब, यूनुस, हारून और सुलैमान की ओर वह्य भेजी और हमने दाऊद को ज़बूर प्रदान की। कुछ रसूल तो ऐसे हैं, जिनकी चर्चा हम इससे पहले आपसे कर चुके हैं और कुछ की चर्चा आपसे नहीं की है और अल्लाह ने मूसा से वास्तव में बात की।" [सूरा अल-निसा : 163-164], एक अन्य स्थान में कहा है : "तथा (ऐ नबी!) हम आपसे पहले बहुत-से रसूलों को भेज चुके हैं, जिनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका हाल हम आपसे वर्णन कर चुके हैं तथा उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके हाल का वर्णन हमने आपसे नहीं किया है। तथा किसी रसूल के वश में यह नहीं था कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना कोई आयत (मोजिज़ा) ले आए। फिर जब अल्लाह का आदेश आ गया, तो सत्य के साथ निर्णय कर दिया गया और उस समय झूठे लोग घाटे में रहे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 78], हमारा इन रसूलों से अवगत न होने का मतलब यह नहीं है कि इनको भेजा नहीं गया था। मौजूदा नस्लों का उस समुदाय में पहले भेजे गए रसूलों से अवगत न होने का भी मतलब यह नहीं है कि अल्लाह ने उनकी ओर रसूल नहीं भेजा है।

तीसरी परिचर्चा : आकाशीय ग्रंथों के बड़े तथ्य

सभी आकाशीय ग्रंथ इस बात में समान हैं कि उनके अंदर अल्लाह पर ईमान से संबंधित मूल बातों, जैसे अल्लाह पर ईमान, उसके फ़रिश्तों पर ईमान, उसकी किताबों पर ईमान, उसके रसूलों पर ईमान, आख़िरत के दिन पर ईमान और तक़दीर पर ईमान की ओर बुलाया गया है। इन महान मूल बातों का प्रमाण प्रस्तुत किया गया है। कुफ़्र एवं शिर्क से सावधान किया गया है। ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं, जो कुफ़्र एवं शिर्क का खंडन एवं उनको तथ्यहीन साबित करते हों तथा इस मार्ग पर चलने वालों का बुरा अंजाम बयान करते हों।

सारे आकाशीय ग्रंथ इस बात में भी समान हैं कि उनके अंदर अल्लाह की इबादत, इस्लाम की मूल एवं बड़ी-बड़ी इबादतों, जैसे नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और माता-पिता के साथ अच्छा व्यवाहर आदि द्वारा करने का आह्वान किया गया है। सारे आकाशीय ग्रंथ तमाम अधिकारों, अधिकार उत्पत्तिकार के हों या सृष्टि के, को अदा करने का आदेश देते हैं और सदव्यवहार एवं नैतिकता का पालन करने की प्रेरणा देते हैं। उनके अंदर ऐसी हराम चीज़ों, बेहयाई के कामों एवं गुनाहों का उल्लेख है, जिनसे बचना ज़रूरी है। इन हराम कामों की श्रेणियों और उनके नतीजे में दोनों जहानों में मिलने वाले दंड का भी उल्लेख है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है, जिसका आदेश उसने नूह़ को दिया और जिसकी वह्य हमने आपकी ओर की, तथा जिसका आदेश हमने इबराहीम तथा मूसा और ईसा को दिया। यह कि इस धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ। बहुदेववादियों पर वह बात भारी है जिसकी ओर आप उन्हें बुलाते हैं। अल्लाह जिसे चाहता है, अपने लिए चुन लेता है और अपनी ओर मार्ग उसी को दिखाता है, जो उसकी ओर लौटता है।" [सूरा अल-शूरा : 13] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "क्या उसे उन बातों की सूचना नहीं हुई, जो मूसा के ग्रंथों में हैं? और इब्राहीम की, जिसने (अपना वचन) पूरा कर दिया। कि कोई बोझ उठाने वाला दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। और यह कि मनुष्य के लिए वही है, जिसका उसने प्रयास किया। और यह कि उसका प्रयास शीघ्र ही देखा जाएगा। फिर उसे उसका पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा।" [सूरा अल-नज्म : 36-41], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "जो लोग उस रसूल का अनुसरण करते हैं, जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं, जो उन्हें नेकी का आदेश देता है और बुराई से रोकता है, तथा उनके लिए पाकीज़ा चीज़ों को हलाल (वैध) करता और उनपर अपवित्र चीज़ों को हराम (अवैध) ठहराता है और उनसे उनका बोझ और वह तौक़ उतारता है, जो उनपर पड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका समर्थन किया, उसकी सहायता की और उस प्रकाश (क़ुरआन) का अनुसरण किया, जो उसके साथ उतारा गया, वही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं।" [सूरा अल-आराफ़ : 157] अल्लाह ने नबियों द्वारा प्रस्तुत किए गए बड़े सिद्धांतों का उल्लेख करने के बाद कहा है : ''ये तत्वदर्शिता एवं अंतर्ज्ञान की वो बातें हैं, जिनकी वह्य (प्रकाशना) आपकी ओर आपके रब ने की है, और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बना लेना, अन्यथा नरक में निन्दित एवं तिरस्कृत करके फेंक दिए जाओगे।" [सूरा अल-इसरा : 39]

सारे आकाशीय ग्रंथ व्यक्तिगत ज़िम्मेवारी पर बड़ा ज़ोर देते हैं। आकाशीय ग्रंथों के अनुसार इन्सान को अपनी मुक्ति का प्रसाय करना चाहिए और खुद को अल्लाह की प्रसन्नता एवं जन्नत की ओर ले जाने वाले सीधे मार्ग पर चलाना चाहिए। क़यामत के दिन अपने रब के सामने यह कहना प्रयाप्त नहीं होगा कि मैंने अपने पूर्वजों, अपने दीन के बड़े लोगों, अपने समुदाय के लोगों या अपने समाज का अनुसरण किया है। हर इन्सान पर ख़ुद अपनी मुक्ति के लिए काम करने और उसके रब की ओर से उसके पास आने वाले सत्य पर विचार करना चाहिए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप उनसे कह दें कि क्या मैं अल्लाह के सिवा किसी और रब की खोज करूँ? जबकि वह (अल्लाह) प्रत्येक चीज़ का रब है तथा कोई प्राणी, कोई भी कुकर्म करेगा, तो उसका भार उसी के ऊपर होगा और कोई किसी दूसरे का बोझ नहीं उठायेगा। फिर (अंततः) तुम्हें अपने रब के पास ही जाना है। तो जिन बातों में तुम विभेद कर रहे हो वो तुम्हें बता देगा।" [सूरा अल-अनआम : 164] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और हमने हर इनसान के (अच्छे-बुरे) कार्य को उसके गले से लगा दिया है। और क़यामत के दिन हम उसके लिए एक किताब (कर्मपत्र) निकालेंगे, जिसे वह अपने सामने खुली हुई पाएगा। अपनी किताब (कर्मपत्र) पढ़ ले। आज तू स्वयं अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है। जिसने सीधी राह अपनाई, उसने अपने ही लिए सीधी राह अपनाई और जो सीधी राह से भटक गया, उसका (दुष्परिणाम) उसी पर है और कोई दूसरे का बोझ (अपने ऊपर) नहीं लादेगा और हम यातना देने वाले नहीं हैं, जब तक कि कोई रसूल न भेजें।" [सूरा अल-इसरा : 13-15]

इन आकाशीय ग्रंथों में अल्लाह पर विश्वास रखने वालों के लिए सांसारिक जीवन में स्वच्छ जीवन और आख़िरत के जीवन में अनंत नेमतों का सुसमाचार है, जबकि गुनाह एवं कुफ़्र के मार्ग पर चलने वालों के दुनिया में विचलन भरे जीवन एवं क़यामत के दिन कभी ख़त्म न होने वाली यातना की धमकी है।

सभी आकाशीय ग्रंथ पूरी स्पष्टता के साथ बताते हैं कि प्रतिफल, हिसाब-किताब और कर्मों का बदला जैसी चीज़ें इसी दुनिया में संपन्न नहीं हो जातीं। ऐसा भी देखने को मिलता है कि इन्सान अपने अपराधों की सज़ा भुगते बिना ही इस संसार से निकल जाता है। सच्ची बात यह है कि हिसाब, प्रतिफल, सवाब और दंड जैसी चीज़ें संपूर्ण रूप में आख़िरत में देखने को मिलेंगी।

यह बात भी छुपी नहीं है कि इन किताबों के अंदर दर्ज इबादतों, शरई ज़िम्मेवारियों या इबादतों के तौर-तरीक़ों के विवरण के बारे में बड़ी भिन्नता पाई जाती है। कोई चीज़ किसी किताब में संक्षेप में बयान हुई है, तो किसी अन्य किताब में विस्तार से।

इन सारी बातों को जानने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि इन्सान में जो भी अच्छाई से प्रेम और उसे करने का जज़्बा पाया जाता है, वह रसूलों की लाई हुई शिक्षाओं का अवशेष, मानव प्रकृति में डाले गए सत्य का बचा हुआ भाग और शैतान की छेड़-छाड़, पूर्वजों के अंधे अनुसरण और विकृत इबादतों के हाथों से सुरक्षित रह जाने वाला हिस्सा है।

चौथी परिचर्चा : पवित्र क़ुरआन सबसे बड़ी आकाशीय ग्रंथ है

पवित्र क़ुरआन सबसे महान आकाशीय ग्रंथ है। पवित्र क़ुरआन सबसे बाद में उतरने वाला, आकाशीय संदेशों के उद्देश्यों को सबसे संपूर्ण अंदाज़ में बयान करने वाला, दीन एवं दुनिया के हितों को सबसे व्यापक रूप में प्रस्तुत करने वाला और स्पष्टता, वाक्पटुता एवं वाग्मिता की दृष्टि से यह सबसे महान ग्रंथ है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दुश्मन ने, जो मक्का का निवासी था, जब क़ुरआन सुना, तो उसके बारे में अपनी राय इन शब्दों में रखी : (अल्लाह की क़सम, मैंने अभी मुहम्मद से एक वाणी सुनी है, जो इन्सान की वाणी नहीं हो सकती। वह जिन्नात की वाणी भी नहीं हो सकती। उसमें एक मिठास है। उसका एक सौंदर्य है। वह एक सफलता प्रदान करने वाली एवं सुदृढ़ वाणी है। वह हावी होकर रहेगी। उसे परास्त नहीं किया जा सकता।) [40] [तफ़ीसर अल-बग़वी : 8/268]

यह एक ऐसा ग्रंथ है, जो सबसे विस्तृत अंदाज़ में अल्लाह की संपूर्णता, एकता तथा रब एवं पूज्य होने, नामों, गुणों, कार्यों, उसकी इबादत, विशुद्ध रूप से उसी के दीन का पालन करने और दुनिया तथा आख़िरत में मिलने वाले सवाब एवं दंड का उल्लेख करता है। यह सबसे संपूर्ण रूप में सत्य को बयान करने और शिर्क एवं कुफ़्र का खंडन करने वाला ग्रंथ है। इसमें ऐसे-ऐसे सबूत, प्रमाण एवं तर्क मौजूद हैं कि उनको कोई अहंकारी ही अस्वीकार कर सकता है। यही कारण है कि आज भी अगर कोई इंसाफ़पसंद एवं सत्य की खोज में लगा हुआ इन्सान, चाहे वह जिस धर्म का मानने वाला हो, क़ुरआन का अध्ययन करता है, तो इस ग्रंथ, इसके उतारने वाले और इसे लाने वाले नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाने पर मजबूर हो जाता है।

इस आकाशीय ग्रंथ जैसा दूसरा ग्रंथ न तो इससे पहले मानव जाति पर उतरा है और न क़यामत के दिन तक दोबारा उतरेगा। यह नबियों को मिलने वाली निशानियों में से सबसे बड़ी निशानी है। यह ग्रंथ मार्गदर्शन है, शिफ़ा है, शांति है, आलोक है और सारे संसार के लिए दया है। इसमें न्याय की सबसे बड़ी कसौटियाँ बयान की गई हैं। अथिकार बयान किए गए हैं। यह ग्रंथ प्रकाश है, सुसमाचार है, चेतावनी है, हिकमत है, ज्ञान है, शिफ़ा है, बरकत है और सीधा मार्ग है। जिसने इसे पकड़ लिया, उसे सच्चा मार्ग मिल गया और जिसने इसे छोड़ दिया, वह पथभ्रष्ट हो गया। पवित्र एवं महान अल्लाह ने इस ग्रंथ को उतारने की बिना पर अपनी प्रशंसा करते हुए कहा है : ''सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने अपने बंदे पर ये पुस्तक उतारी और उसमें कोई टेढ़ी बात नहीं रखी।" [सूरा अल-कह्फ़ : 1]

इसमें ऐसे तार्किक प्रमाण तथा निर्णायक तर्क मौजूद हैं कि अक़्लें चकित रह जाएँ। इनमें से कुछ प्रमाण सिद्ध करते हैं कि इस ब्रह्मांड का रब अल्लाह है और उसके सिवा किसी की इबादत नहीं होनी चाहिए। जैसे उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या यह लोग बिना किसी पैदा करने वाले के स्वयं पैदा हो गए हैं या यह स्वयं उत्पत्तिकर्ता (पैदा करने वाले) हैं? या उन्होंने ही आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।'' [सूरा अल-तूर : 35-36] इसी प्रकार अल्लाह तआला का कथन है : "न तो अल्लाह ने किसी को बेटा बनाया और न उसके साथ कोई अन्य पूज्य है। यदि ऐसा होता तो प्रत्येक पूज्य अपनी उत्पत्ति को लेकर अलग हो जाता और एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ता। पवित्र है अल्लाह उन बातों से, जो यह लोग बनाते हैं।" [सूरा अल-मोमिनून : 91] इसी प्रकार उसका कथन है : "क्या मनुष्य ने नहीं देखा कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया? फिर अचानक वह खुला झगड़ालू बन बैठा। और उसने हमारे लिए मिसाल बयान की और अपनी असल पैदाइश को भूल गया। कहने लगा कि इन गली-सड़ी हड्डियों को कौन ज़िन्दा कर सकता है? आप कह दें : उन्हें वही (अल्लाह) जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है। जिसने तुम्हारे लिए हरे वृक्ष से अग्नि बना दी, तो तुम उससे आग सुलगाते हो। जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया है, क्या वह इन जैसों के पैदा करने पर सक्षम नहीं है? यकीनन है और वही तो पैदा करने वाला जानने वाला है।" [सूरा यासीन : 81-77]

इसमें पिछली जातियों के बारे में ऐसी सूचनाएँ मौजूद हैं, जो किसी अन्य पुस्तक में नहीं मिलतीं। ज़ाहिर सी बात है कि उन सूचनाओं में किसी प्रकार की किसी त्रुटि की संभावना नहीं है। इसमें अल्लाह के द्वारा इस संसार की रचना के बारे में ऐसी बारीक बातें बताई गई हैं, जिनसे लोग आधुनिक काल में आकर ही अवगत हो सके। उदाहरण स्वरूप माँ के पेट में भ्रूण की रचना के विभिन्न चरणों को ही देख लें। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और निःसंदेह हमने मनुष्य को तुच्छ मिट्टी के एक सार से पैदा किया। फिर हमने उसे वीर्य बनाकर एक सुरक्षित स्थान में रखा। फिर हमने उस वीर्य को एक जमा हुआ रक्त बनाया, फिर हमने उस जमे हुए रक्त को एक बोटी बनाया, फिर हमने उस बोटी को हड्डियाँ बनाया, फिर हमने उन हड्डियों को कुछ माँस पहनाया, फिर हमने उसे एक अन्य रूप में पैदा कर दिया। तो बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो अनुमान लगाने वालों में सबसे अच्छा अनुमान लगाने वाला है।" [सूरा अल-मोमिनून : 12-14] इसी प्रकार उच्च एवं महान अल्लाह ने अंतरिक्ष में जाने वाले की स्थिति बयान करते हुए कहा है : "तो वह व्यक्ति जिसे अल्लाह चाहता है कि उसे मार्गदर्शन प्रदान करे, उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है और जिसे चाहता है कि उसे गुमराह करे, उसका सीना तंग, अत्यंत घुटा हुआ कर देता है, मानो वह बड़ी कठिनाई से आकाश में चढ़ रहा है। इसी प्रकार अल्लाह उन लोगों पर यातना भेज देता है, जो ईमान नहीं लाते।" [सूरा अल-अनआम : 125]

लग-भग छह सौ (600) पृष्ट में फैले होने के बावजूद इस ग्रंथ में कोई त्रुटि, विरोधाभास या परस्पर टकराव नहीं मिल सकता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तो क्या वे क़ुरआन के अर्थों पर सोच-विचार नहीं करते हैं? यदि वह अल्लाह के सिवा दूसरे की ओर से होता तो उसमें बहुत सी विसंगतियाँ पाते।" [सूरा अल-निसा : 82]

इसमें कोई शंका या संदेह भी नहीं है। संदेह होता भी कैसे, जब आरंभ में ही उच्च एवं महान अल्लाह ने कह दिया है : "यह (क़ुरआन) वह पुस्तक है, जिसमें कोई संदेह नहीं, परहेज़गारों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है।" [सूरा अल-बक़रा : 2] अल्लाह ने अपने शब्दों (ذَلِكَ الْكِتَابُ) में दूर की ओर इशारे के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द (ذَلِكَ) का प्रयोग किया है। मतलब यह है कि यह महान पुस्तक इस बात से कहीं ऊँची है कि उसके बारे में यह सोचने की गुंजाइश हो कि इसमें संदेह है या नहीं है। अल्लाह ने पूरे यक़ीन के साथ बताया है कि यह एक सुदृढ़ ग्रंथ है, जिसमें कोई शंका या संदेह नहीं है।

इस ग्रंथ के बारे में अल्लाह ने बताया है कि इन्सान एवं जिन्नात इस जैसा ग्रंथ प्रस्तुत नहीं कर सकते। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ!" [सूरा अल-इसरा : 88], अल्लाह ने इस ग्रंथ के अवतरण से क़यामत तक पैदा होने वाले तमाम इन्सानों को चुनौती दे रखी है कि इस जैसा कोई ग्रंथ, इसमें शामिल सूरतों जैसी दस सूरतें या एक ही सूरत प्रस्तुत करके दिखाएँ, लेकिन वो ऐसा कर नहीं सके। उनका ऐसा न कर पाना भी इस बात का प्रमाण है कि यह अल्लाह का उतारा हुआ ग्रंथ है। इसकी सुरक्षा की ज़िम्मेवारी अल्लाह ने ले रखी है। इसलिए यह आज तक सुरक्षित है और क़यामत के दिन तक सुरक्षित रहेगा। यह ग्रंथ उसी भाषा में मौजूद है, जिसमें उतरा था। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन काल ही में आपके साथियों ने इसे लिख लिया था। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन काल में ही दसियों सहाबा ने इसे कंठस्थ कर लिया था। यह ग्रंथ जहाँ एक तरफ़ एक-दूसरे से ज़बानी तौर पर पढ़ने-पढ़ाने वालों की ज्ञात श्रंख्लाओं द्वारा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, बल्कि जिबरील अलैहिस्सलाम द्वारा वर्णित है, वहीं दूसरी तरफ़ सुदृढ़ लेखन द्वारा भी सहाबा के दौर से आज तक सुरक्षित है और क़यामत तक सुरक्षित रहेगा। आज आपको हर मुस्लिम देश में पवित्र क़ुरआन के हज़ारों हाफ़िज़ (ज़बानी याद रखने वाले) मिल जाएँगे। मदरसों के छोटे-छोटे बच्चे इसे याद करने और इसमें महारत हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और इस उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।

इस आकाशीय ग्रंथ से जुड़ी हुई एक अद्भुत बात यह है कि अल्लाह ने इसे याद करना आसान कर दिया है। आपको हज़ारों ग़ैर-अरबी भाषी मुलमान मिल जाएँगे, जिनको पूरा क़ुरआन कंठस्थ है और अरब मुसलमानों की तरह ही उसे पढ़ सकते हैं। जबकि उनको अरबी भाषा के पाँच वाक्य भी याद नहीं हैं।

पवित्र क़ुरआन की जो बातें पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं, उनमें से एक यह है कि उसमें अल्लाह के नबी इबराहीम, उनके परिवार एवं अपने पिता तथा जाति के साथ उनके संवाद के बारे में बड़ी विस्तार से बात की गई है; अल्लाह के नबी याक़ूब के परिवार तथा उनके बेटों एवं पोतों का भी विवरण मिलता है; मूसा अलैहिस्सलाम के जन्म, उनके भ्रमण, फ़िरऔन के साथ उनकी बहस, फ़िरऔन की मौत, मूसा तथा उनकी जाति की मुक्ति एवं उनके लंबे इतिहास का भी विवरण मिलता है। पवित्र क़ुरआन पढ़ते समय आप आल-ए-इमरान परिवार से संबंधित जानकारियों से भी गुज़रेंगे। वह परिवार, जिसने यह्या अलैहिस्सलाम, जिन्हें ईसाई जॉन बेप्टिस्ट कहते हैं, को जन्म दिया और ईसा मसीह की माता मरयम अलैहस्सलाम को जन्म दिया। ये सारे विवरण पवित्र क़ुरआन में एकेश्वरवाद, नबूवतों तथा रसूलों एवं नबियों के प्रति अल्लाह के समर्थन को बयान करने, जैसे बड़े उद्देश्य के तहत प्रस्तुत किए गए हैं। जबकि दूसरी ओर आपको क़ुरआन के अंदर अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़बीला क़ुरैश के इतिहास का कोई विवरण नहीं मिलेगा। आपके परिवार तथा बाल-बच्चों का कोई विवरण नहीं मिलेगा। बल्कि नूह, इबराहीम, मूसा, दाऊद, सुलैमान एवं ईसा अलैहिमुस्सलाम आदि नबियों के नामों का ज़िक्र क़ुरआन में अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नाम से अधिक बार मिलेगा। यह दरअसल इस बात का एक बड़ा प्रमाण है कि यह किताब वह्य है, जो अल्लाह की ओर से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित हुई है।

इस ग्रंथ के अल्लाह का उतारा हुआ ग्रंथ होने का एक प्रमाण यह है कि इसमें आपको अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अल्लाह की ओर से दिए गए निर्देश भी मिल जाएँगे। उदाहरण के तौर पर इन दो आयतों को देखें : ''और यदि हम आपको सुदृढ़ न रखते तो आप उनकी ओर कुछ न कुछ झुक जाते। तब हम आपको जीवन की दोहरी तथा मरण की दोहरी यातना चखाते। फिर आप अपने लिए हमारे ऊपर कोई सहायक न पाते।" [सूरा अल-इसरा : 74-75], अबू जाफ़र तबरी रहिमहुल्लाह कहते हैं : (ऐ मुहम्मद, अगर आप इन बुतों की पूजा करने वालों ने आपसे जो आग्रह किया था, उसमें उनकी ओर थोड़ा-सा भी झुक जाते, तो हम आपको जीवन की दोहरी और मरण की दोहरी यातना चिखाते।) [41]

एक अन्य स्थान में फ़रमाया है : ''और यदि इसने (नबी ने) हमपर कोई बात बनाई होती। तो अवश्य हम पकड़ लेते उसका सीधा हाथ। फिर अवश्य काट देते उसके गले की रग। फिर तुममें से कोई (मुझे) उससे रोकने वाला न होता।" [सूरा अल-हक़्क़ा : 44-47] शैख़ सादी इस आयत की व्याख्या करते हुए कहते हैं : (इस संसार के रब की ओर से उतरने वाली पुस्तक किसी इन्सान की वाणी नहीं हो सकती। यह वाणी अपने बोलने वाले की महानता, उसके प्रतापी गुणों, उसकी अपने बंदों के तरबियत करने के संपूर्ण तरीक़े और उसके बंदों के ऊपर होने को इंगित करती है। दूसरी बात यह है कि यह मुश्रिकों का गुमान है, जो अल्लाह और उसकी हिकमत के अनुरूप नहीं है। क्योंकि अगर इस नबी ने अपनी ओर से तैयार करके हमसे जोड़ने की कोशिश की होती (कोई बात) यानी कोई झूठी बात, (तो अवश्य हम पकड़ लेते उसका सीधा हाथ। फिर अवश्य काट देते उसके गले की रग।) (الْوَتِينَ) यह इन्सान के हृदय से जुड़ी हुई एक रग है, जिसके कटने पर ईन्सान मर जाता है। आयतों का अर्थ : अगर ऐसा हो भी जाता, हालाँकि ऐसा कभी नहीं हो सकता, कि रसूल अपनी ओर से कोई बात अल्लाह की बात कहकर कह देता, तो अल्लाह उसे फ़ौरन दंड दे देता। उसकी पकड़ उसी तरह करता, जिस तरह एक शक्तिशाली हस्ती करती है। क्योंकि वह हिमकत वाला है। हर चीज़ की क्षमता रखता है। अतः उसकी हिकमत का तक़ाज़ा यह है कि उसका हवाला देकर झूठ बोलने वाले को मोहलत न दे।) [42] सर्वशक्तिमान अल्लाह ने अपने रसूल से कहा है : "और अपनी आँखों को उन चीज़ों की ओर कदापि न उठाएँ जो हमने उनके विभिन्न प्रकार के लोगों को सांसारिक जीवन के लिए आभूषण के रूप में उपयोग करने के लिए दी हैं, ताकि हम उसमें उनकी परीक्षा लें, और आपके रब की दी हुई रोज़ी सबसे अच्छी और सबसे अधिक स्थायी है।" [सूरा ताहा : 131] जामे अल-बयान (17/509)

ज़रा ग़ौर करें कि अगर यह पवित्र क़ुरआन अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का लिखा हुआ होता, तो क्या वह अपने विरुद्ध इस प्रकार की बातें दर्ज करते कि बाद में उनके अनुयायी उसे पढ़ते रहें? [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 884]

यहाँ एक और प्रश्न है। पिछली आकाशीय किताबें क्यों विकृत हो गईं और सुरक्षित नहीं रह सकीं, जबकि पवित्र क़ुरआन आज भी उसी भाषा में सुरक्षित है, जिसमें उतरा था? न उसमें कोई कमीबेशी हुई और न परिवर्तन?

हम अल्लाह से मदद तलब करते हुए कहते हैं : पिछली आकाशीय किताबें, जैसे इबराहीम और मूसा अलैहिमस्सलाम के सहीफ़े, तौरात, ज़बूर और इंजील, अल्लाह ने उनको कुछ खास जातियों की ओर उतारा था और उनकी एक समय सीमा निर्धारित कर दी थी। अतः जब उस जाति का ह्रास हो गया, उसमें बटवारे हो गए और वह निर्धारित समय समाप्त हो गया, जिसके दौरान अल्लाह ने उस किताब को उस जाति के लिए संदर्भ के रूप में निर्धारित कर रखा था, तो अल्लाह ने उसके ह्रास की अनुमति दे दी। क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था और वह मानवता के लिए इतिहास के एक निश्चित चरण में ही उपयोगी था तथा उस चरण की समाप्ति के बाद अल्लाह बाद के चरण के लिए कोई उपयुक्त पुस्तक लाता था। अल्लाह को अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर मालूम था कि वह एक व्यापक पुस्तक उतारेगा, जिसमें हर प्रकार का मार्गदर्शन, सद्गुण, सत्य और प्रमाण समाहित होगा तथा उसे पिछली किताबों के बारे में निर्णय करने वाली और उनको निरस्त करने वाली किताब घोषित करेगा। वही किताब महान क़ुरआन है। यही कारण है कि इस संसार के रब ने पिछली किताबों के ह्रास की अनुमति दे दी, जब उनके अवतरण का उद्देश्य पूरा हो गया, ताकि एक महान पुस्तक के अवतरण की भूमिका तैयार हो सके। इसी लिए सर्वशक्तिमान रब ने पिछली किताबों की सुरक्षा का काम खुद अपने ज़िम्मे नहीं लिया। उनकी सुरक्षा का काम उनके धर्म गुरुओं के हवाले किया, जिन्होंने उसे भुला दिया, उसे बदल डाला और नष्ट कर दिया। अगर उनकी सुरक्षा का काम अल्लाह ने अपने ज़िम्मे लिया होता, तो क़यामत तक बाक़ी रहतीं। क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि अल्लाह किसी चीज़ की सुरक्षा का काम अपने ज़िम्मे ले ले और वह नष्ट हो जाए।

जो व्यक्ति नए नियम और पुराने नियम का अध्ययन करेगा, जिनके तौरात एवं इंजील होने का दावा किया जाता है, वह आश्वस्त हो जाएगा कि यह किताबें अपने वर्तमान स्वरूप में आकाशीय पुस्तक नहीं हो सकती हैं। क्योंकि उनके अंदर इतना विरोधाभास और अल्लाह एवं मासूम नबियों पर मिथ्यारोपन है कि स्वच्छ विवेक को उनसे नफ़रत हो जाती है। इसी तरह उनके अंदर नबियों पर ऐसे-ऐसे अनैतिक कार्यों का आरोप लगाया गया है कि समाज के प्रतिष्ठित लोग तो दूर, आम लोग भी उनसे दूर रहा करते हैं। साथ ही यह कि इन किताबों को मानने वाले इस बात का दावा भी नहीं करते कि उनके पास इन किताबों की मूल प्रतियाँ मौजूद हैं। वे इस बात पर एकमत हैं कि इन किताबों की मूल प्रतियाँ दसियों सदी पहले नष्ट हो गई हैं, उनके पास मौजूद इन किताबों को उनके उतरने के सदियों बाद लिखा गया और ऐसी भाषाओं में लिखा गया, जिनमें वे उतरी नहीं थीं। इन सारी बातों को सामने रखते हुए उनको आकाशीय ग्रंथ कैसे कहा जा सकता है?

जहाँ तक इनके अतिरिक्त अन्य समुदायों के ग्रंथों की बात है, तो उनके आकाशीय ग्रंथ होने का दावा कोई नहीं करता। वह सारे ग्रंथ संबंधित धर्म के संस्थापक की ओर मंसूब हैं। कभी-कभी वह इस बात से भी परिचित होते हैं कि जिस व्यक्ति को संबंधित धर्म का संस्थापक माना जाता है, उसने खुद नहीं, बल्कि उसके गुज़र जाने के बाद उसके अनुयायियों ने उसे लिखा है। इस तरह जब खुद उनके अनुयायी उनको आकाशीय ग्रंथ नहीं मानते, तो उनको आकाशीय ग्रंथों की सूची में डाला नहीं जा सकता। सच्ची बात यह है कि वह इन्सानों द्वारा लिखे हुए ग्रंथ हैं। और जब वह इन्सान द्वारा लिखी गई किताबें हैं, तो हमें उनके साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जो हम इन्सान द्वारा लिखी गई अन्य किताबों के साथ करते हैं। अतः उनके अंदर कही हुई दुरुस्त (सठीक) बातों को लिया जाएगा और जो बातें इससे हटकर हैं, उनको छोड़ दिया जाएगा।

प्रिय पाठक आप से अनुरोध है कि आप अपनी भाषा में पवित्र क़ुरआन का अनुवाद पढ़ें। यह इन्सान के पास मौजूद सबसे महान पुस्तक है। इन्सान के पास आने वाला अल्लाह का अंतिम संदेश है। इसके अंदर बड़े-बड़े तार्किक प्रमाण मौजूद हैं। हम यहाँ बस एक प्रमाण का उल्लेख कर रहे हैं, ताकि आपके अंदर पवित्र क़ुरआन की एक प्रति प्राप्त करके उसे पढ़ने का शौक़ पैदा हो।

हमने अभी जो प्रमाण प्रस्तुत करने की बात की, उसका ज़िक्र अल्लाह के इस कथन में है : ''ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ। जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उससे कई प्रकार के फल तुम्हारी जीविका के लिए पैदा किए। अतः अल्लाह के लिए किसी प्रकार के साझी न बनाओ, जबकि तुम जानते हो।) [सूरा अल-बक़रा : 21-22] (ऐ लोगो!) के संबोधन पर ग़ौर करें। यह संबोधन बताता है कि "लोगों" के अंदर सारे इन्सान दाख़िल हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि उनमें से कोई पूज्य नहीं हो सकता। और जब सब लोग इन्सान हैं, तो वे सर्वशक्तिमान रब के सामने झुकने वाले हैं। अल्लाह के कथन (अपने रब की इबादत करो) में आदेश चूँकि इन्सानों को दिया गया है, इसलिए साबित यह हुआ कि सारे इन्सान एक महान, शक्तिमान एवं बलशाली अल्लाह द्वारा आदेशित एवं उसके अधीन हैं। अल्लाह के कथन (जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया) का अर्थ यह है कि जब वे सृष्टि हैं और उनसे पहले के लोग भी सृष्टि हैं, तो उनका सृष्टि होना उनका अल्लाह के बंदे होने का प्रमाण है। चाहे मानें या न मानें। अल्लाह का कथन (जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक बिछौना तथा आकाश को एक छत बनाया और आकाश से कुछ पानी उतारा) अल्लाह के रब होने के साथ-साथ इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उसी ने इस संसार की रचना की है और उसकी यह सुंदर व्यवस्था बनाई है। फिर, इसका तक़ाज़ा यह है कि लोग उसकी इबादत करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ।

छठा अनुभाग : नबूवत तथा नबीगण (उनपर अल्लाह दरूद और शांति की वर्षा बरसाए)

पहली परिचर्चा : नबूवत की हक़ीक़त

यहाँ बेहतर होगा कि हम नबूवत, रसूल और रसूल को प्राप्त होने वाली वह्य के बारे में बात करें। हम कहते हैं :

1- नबूवत एक बहुत बड़ा पद है, जिसके महत्व का अंदाज़ा केवल अल्लाह को है, जिसने इस पद को बनाया और इसका प्रबंध किया है और अपने कुछ बंदों को इससे सम्मानित किया है। इसी प्रकार इस पद का मूल्य केवल वही नबी एवं रसूल समझ सकते हैं, जिनको अल्लाह ने नबूवत से सम्मानित किया है। क्योंकि यह महत्वपूर्ण पद अल्लाह अपने जिस बंदे को चाहता है, प्रदान करता है।

नबूवत दरअसल अल्लाह की ओर से, उसकी वह्य की प्राप्ति के लिए, नबियों एवं रसूलों को चुने जाने की प्रक्रिया का नाम है। नबूवत दरअसल एक आकाशीय संदेश है, जिसमें वह सारी बातें समाहित होती हैं, जो अल्लाह उस जाति से चाहता है, जिसपर वह संदेश उतारा गया हो। उसमें इन्सान के दीन एवं दुनिया के हित से जुड़ी हुई सारी आवश्यक बातें मौजूद होती हैं। उसके अंदर अल्लाह के बारे में, सभी लोकों की उत्पत्ति के आरंभ के बारे में और आकाशों तथा उनके अंदर मौजूद चीज़ों के बारे में ग़ैबी सूचनाएँ मौजूद होती हैं। उसमें पिछले जातियों से जुड़ी हुई आवश्यक बातें मौजूद होती हैं। उसमें दोबारा उठाए जाने, एकत्र किए जाने एवं प्रतिफल प्रदान किए जाने जैसी आने वाले समय से जुड़ी हुई बातें मौजूद होती हैं। उसमें आकाशीय आदेश एवं निषेध होते हैं और विधि-विधान होते हैं जो कि अल्लाह की ओर से अपनी सृष्टि के लिए हिकमत, ज्ञान, मार्गदर्शन, बखान, प्रकाश एवं नसीहत होती है।

आकाशीय संदेशों द्वारा प्रदान की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण वस्तु एकेश्वरवाद, एक अल्लाह पर ईमान और इसके परिणाम स्वरूप केवल एक अल्लाह की इबादत, आख़िरत के दिन यानी बदले के दिन पर ईमान, अल्लाह के सिवा की इबादत से दूरी और बहुदेववाद एवं अविश्वास से सावधान करना है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते थे कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत करो।" [सूरा अल-अंबिया : 25]

नबूवतों ने उपयोगी ज्ञान प्रस्तुत किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अतः जान लें कि निःसंदेह तथ्य यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा अपने पापों के लिए क्षमा माँगें और ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों के लिए भी, और अल्लाह तुम्हारे चलने-फिरने और तुम्हारे ठहरने को जानता है।" [सूरा मुहम्मद : 19] नबूवतों ने सत्कर्म का भी आह्वान किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ दाऊद के परिजनो! कृतज्ञता के तौर पर सत्कर्म करो। और मेरे बंदों में थोड़े ही लोग कृतज्ञ हैं।" [सूरा अल-सबा : 13]

नबूवत अल्लाह की ओर से प्राप्त होने वाली एक नेमत है। यह मेहनत, वरासत या अन्य तरीक़ों से प्राप्त नहीं हो सकती। यह अल्लाह का अनुग्रह है। इसे वह अपने धर्म का पालन करने वाले बंदों में से जिसे चाहे प्रदान करे। नबूवत दरअसल अल्लाह की ओर से किसी सदाचारी बंदे के ऊपर इस बात की ज़िम्मेवारी डालने का नाम है कि वह अल्लाह का संदेश पहुँचाए और इस मार्ग में सामने आने वाली हर परीक्षा, लोगों की ओर से झुठलाए जाने तथा उनकी दुश्मनियों का सामना धैर्य के साथ करे। क्योंकि देखने में यह आया कि जब भी अल्लाह की ओर से कोई नबी या रसूल भेजा गया, तो उसके समुदाय ने उसके साथ द्वेषपूर्ण व्यवहार किया, उसके आह्वान को ठुकारया, उससे तथा उसके आह्वान से लोगों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन इन सब बातों के बावजूद कुछ लोग मुसलमान हुए और कुछ लोगों ने अविश्वास व्यक्त किया और काफिर रहे। नबियों तथा रसूलों के आने का यह सिलसिला मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आने के बाद अब बंद हो चुका है। आप इस सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं।

2- रसूल ऐसा इन्सान है, जिसे अल्लाह ने बंदों तक अपना संदेश पहुँचाने के लिए चुन लिया हो। दरअसल संदेश पहुँचाने का यह कार्य एक बहुत बड़ा कार्य है, जिसे अल्लाह अपने किसी चयनित बंदे के कंधे पर डालता है और उसे आदर्श आचरण, विवेक, ज्ञान, समझ और हिकमत के साथ-साथ ऐसी निपुणताएँ प्रदान करता है कि वह वह्य प्राप्त करने और उसे लोगों तक पहुँचाने का काम कर सके। अगर अल्लाह की प्रदान की हुई यह निपुणताएँ न हों, तो रसूलों द्वारा अल्लाह का संदेश पहुँचाने का काम बेहतर तौर पर संपन्न न हो सके। उच्च एवं महान अल्लाह ने अपने नबी मूसा अलैहिस्सलाम से कहा था : ''और ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी आँखों के सामने किया जाए।'' [सूरा ताहा : 39], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और मैंने तुझे विशेष रूप से अपने लिए बनाया है।" [सूरा ताहा : 41], इसी तरह अंतिम नबी एवं रसूल के बारे में कहा है : "तथा निश्चय ही आप उच्च शिष्टता एवं आचरण वाले हैं।" [सूरा अल-क़लम : 4], ऐसा इसलिए, ताकि रसूल अल्लाह का संदेश पहुँचाने का काम कर सकें, उनको अल्लाह पर ईमान की ओर बुला सकें, बहुदेववाद एवं अविश्वास से सावधान कर सकें और लोगों के पास बहानेबाज़ी का कोई अवसर न रहने दें।

अल्लाह रसूलों का चयन अपनी हिकमत तथा इरादे के अनुसार एवं अधिकार से करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि वह अपनी रिसालत (संदेश) कहाँ रखे।'' [सूरा अल-अनआम : 124] अल्लाह अपने रसूलों के समर्थन में उनको कुछ स्पष्ट निशानियाँ प्रदान करता है, जो उनके सच्चे रसूल होन का प्रमाण हुआ करती हैं। इन निशानियों का उल्लेख हम इस अनुभाग की एक खास परिचर्चा में करेंगे।

सबसे महान रसूल नूह, इबराहीम, मूसा, ईसा और मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम हैं। इनमें भी सबसे श्रेष्ठ नबी अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

3- वह्य नाम है अल्लाह की ओर से उसके रसूलों को गुप्त रूप से त्वरित सूचना प्रदान करने का। सूचना पहुँचाने का यह काम वह्य लाने के कार्य पर नियुक्त जिबरील नामी एक फ़रिश्ता करता है। वह्य फ़रिश्ते द्वारा रसूल को पहुँचाई जाने वाली अल्लाह की वाणी को कहते हैं। वह्य रसूल को नीचे प्रस्तुत की गई आयत में बयान की गई तरीक़ों में से किसी एक तरीक़े से प्राप्त होती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “और किसी मनुष्य के लिए संभव नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, परंतु वह़्य के द्वारा, अथवा पर्दे के पीछे से, अथवा यह कि कोई दूत (फ़रिश्ता) भेजे, फिर वह उसकी अनुमति से वह़्य करे, जो कुछ वह चाहे। निःसंदेह वह सबसे ऊँचा, पूर्ण हिकमत वाला है।'' [सूरा अल-शूरा : 51], (इस आयत से मालूम हुआ कि नबियों को वह्य कई तरीक़ों से प्राप्त होती है। जैसे : अल्लाह रसूल से पर्दे के पीछे से बात करे, उसके पास एक फ़रिश्ता भेजकर अपनी वाणी पहुँचाए, उसपर नींद की अवस्था में वह्य डाल दे, उसके दिल में इस तरह बात डाल दे कि वह निश्चित हो जाए कि बात यही है।) [43]

दूसरी परिचर्चा : नबियों की विशेषताएँ, कर्तव्य एवं कार्य

[अल-एलाम बिमा फ़ी दीन अल-नसारा मिन अल-फ़साद व अल-औहाम : 238] कुछ परिवर्तन के साथ।

अल्लाह लोगों के बीच से रसूलों एवं नबियों का चयन अपनी हिकमत, ज्ञान एवं इच्छा के अनुसार उनकी जाति में सबसे बेहतर, सबसे उत्कृष्ठ पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले, सबसे अधिक विवेकी, सबसे पाक-साफ़ दिल तथा पाक शरीर वाले, सबसे सच्ची और स्पष्ट ज़बान वाले, सबसे उदार दिल वाले, सबसे पाकबाज़, सबसे न्यायप्रिय और सबसे विनम्र एवं सहनशील लोगों में से करता है।

रसूल बनने से पहले से भी रसूल सबसे संपूर्ण बुद्धि-विवेक, फ़ज़ीलत, शरीरिक बनावट एवं आचरण वाले लोगों में से हुआ करता है। नबी बनने से पहले भी उससे अनैतिकता, जान-बूझकर झूठ बोलना, किसी पर अत्याचार करना और ग़लत तरीक़े से किसी का धन हड़प लेना आदि कोई ऐसा काम नहीं होता, जिससे शिष्टता का उल्लंघन होता हो।

जबकि नबी बन जाने के बाद अल्लाह उसे गुनाहों से बचाता है, उसपर वह्य उतारता है, फ़रिश्तों, स्पष्ट निशानियों एवं अकाट्य प्रमाणों द्वारा उसका समर्थन करता है। हम इस प्रकार की कुछ निशानियों का ज़िक्र अल्लाह की अनुमति से इस अनुभाग में करेंगे।

सारे रसूल इन्सान होते हैं, दूसरे इन्सानों की तरह ही खाते-पीते और बाज़ारों में चलते-फिरते हैं। उनके बीवी-बच्चे भी हुआ करते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हम ने आप से पहले जितने भी रसूल भेजे सब के सब खाना भी खाते थे और बाजारों में भी चलते फिरते थे।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 20], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और हमने आपसे पहले बहुत-से रसूलों को भेजा है और उनकी पत्नियाँ तथा बाल-बच्चे बनाए। किसी रसूल के बस में नहीं है कि अल्लाह की अनुमति बिना कोई निशानी ले आए और हर वचन के लिए एक निर्धारित समय है।" [सूरा अल-राद : 38]

अंतर यह है कि उनके पास अल्लाह की ओर से वह्य आती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने आपसे पहले बस्तियों के रहने वालों में से केवल पुरुषों को नबी बनाकर भेजे, जिनकी ओर हम वह्य किया करते थे।" [सूरा यूसुफ़ : 109], एक अन्य स्थान में फ़रमाया है : "उनके रसूलों ने उनसे कहा : हम तो तुम्हारे जैसे इनसान ही हैं, परन्तु अल्लाह अपने बंदों में से जिसपर चाहे, उपकार करता है। और हमारे लिए कभी संभव नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना तुम्हारे पास कोई प्रमाण ले आएँ और ईमान वालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए।" [सूरा इबराहीम : 11]

अल्लाह हर रसूल को उसकी जाति के भाषा में भेजता है, ताकि लोग उसकी बात समझ सकें। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने कोई रसूल नहीं भेजा परंतु उसकी जाति की भाषा में, ताकि वह उनके लिए खोलकर बयान करे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है, पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता है, मार्गदर्शन प्रदान करता है। और वही सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।" [सूरा इबराहीम : 4]

अल्लाह रसूलों को इस प्रकार की निपुणता इसलिए प्रदान करता है कि वे अपने अनुयायियों के लिए आदर्श बन सकें। जब रसूल उनको किसी बात का आदेश दें, तो वही उसपर सबसे पहले अमल करने वाले बनें और जब वह उनको किसी बात से रोकें, तो वही उससे सबसे पहले रुकने वाले बनें। क़ुरआन के वर्णन अनुसार अल्लाह के नबी शोऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति से कहा था : "शुऐब ने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! तुम बताओ, यदि मैं अपने रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अच्छी जीविका प्रदान की हो, (तो कैसे तुम्हारा साथ दूँ?) मैं नहीं चाहता कि तुम्हारा विरोध करते हुए वह कार्य करूँ, जिससे तुम्हें रोक रहा हूँ। मैं जहाँ तक हो सके, सुधार ही चाहता हूँ और यह जो कुछ करना चाहता हूँ, मुझे इसका सामर्थ्य अल्लाह ही से मिलेगा। मैंने उसी पर भरोसा किया है और उसी की ओर लौटता हूँ।" [सूरा हूद : 88], अल्लाह ने नबियों के अनुयायियों को आदेश दिया था कि अपने नबियों के आदेश मानकर जीवन व्यतीत करें। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।" [सूरा अल-अहज़ाब : 21], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह तुम्हारे लिए उनके अंदर एक अच्छा आदर्श है, उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह तथा अंतिम दिवस की आशा रखता है। और जो कोई मुँह फेरे, तो निश्चय अल्लाह बेनियाज़, हर प्रकार की प्रशंसा के योग्य है।" [सूरा अल-मुमतहना : 6]

जहाँ तक नबियों एवं रसूलों के कर्तव्यों की बात है, तो उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है लोगों को अल्लाह पर ईमान लाने, एकमात्र उसी की इबादत करने, आख़िरत के दिन, जो कि हिसाब एवं प्रतिफल का दिन है, पर ईमान लाने का आह्वान करना। अल्लाह ने जितने भी रसूल भेजे, सब को यही आदेश दिया कि अपनी जाति को एकेश्वरवाद एवं आख़िरत के दिन पर ईमान का आह्वान करें, उनको अविश्वास, अनेकेश्वरवाद तथा आडंबर के अंधकारों से निकालकर ईमान, इस्लाम, न्याय, दृढ़ता और पवित्र जीवन की ओर ले जाएँ। उन्हें इबादत का तौर-तरीक़ा और विवरण सिखाएँ, उनको बताएँ कि उनके लिए पवित्र चीज़ें हलाल हैं, अनेकेश्वरवाद हराम है, किसी की नाहक़ हत्या हराम है, व्यभिचार एवं खुली तथा छुपी बेहयाइयाँ (अशलीलताएं) हराम हैं, सूद एवं ग़लत तरीक़े से किसी का धन हड़प लेना हराम है, अक़्ल को नष्ट कर देने वाली सारी नापाक एवं गंदी चीज़ें हराम हैं।

रसूलों के कर्तव्यों में उनपर उतरने वाली अल्लाह की किताब की तिलावत करना, अपने अनुयायियों को हिकमत सिखाना, उनके आचार-विचार एवं कथनों की शुद्धि करना, सच्चे मार्ग से हट जाने पर उनको सही मार्ग दिखाना, ग़फ़लत में पड़ जाने पर अल्लाह के विधानों की याद दिलाना, धर्म के मिटे हुए पक्षों को जीवित करना और लोगों को ग़लत कार्यों से दूर रखना आदि शामिल है।

उनके सबसे बड़े कार्यों एवं कर्तव्यों में से एक यह है कि वे अपने अनुसरणकारियों के लिए बेहतर आदर्श बनें। उन तमाम बातों पर खुद अमल करें, जिनकी ओर बुलाते हैं और उन तमाम बातों से दूर रहें, जिनसे दूर रहने का आदेश देते हैं।

नबियों का एक प्रमुख कार्य यह है कि हर पूर्ववर्ती नबी परवर्ती नबी की शुभ सूचना देता है और उसके समकालीन लोगों को उसपर ईमान लाने का आदेश देता है। जबकि हर परवर्ती नबी पूर्ववर्ती नबी पर ईमान रखता है और अपनी जाति को पूर्ववर्ती नबियों पर ईमान रखने का आदेश देता है। क्योंकि अल्लाह की ओर से भेजे हुए किसी एक नबी का इनकार भी दरअसल तमाम नबियों का इनकार है।

सारे नबी सच्चे धर्म की रक्षा तथा जान, रक्त, धन, अक़्ल और नस्ल की रक्षा के लिए आए थे। क्योंकि सच्चे धर्म की रक्षा ही में दोनों जहानों में इन्सान की मुक्ति तथा जान, रक्त एवं वतन की रक्षा निहित है। अक़्ल की सुरक्षा में इन्सान की गुमराही एवं आडंबर से सुरक्षा निहित है, धन की सुरक्षा में लोगों के जीवन की सुरक्षा तथा उनके आर्थिक जीवन की स्थिरता निहित है, नस्ल की रक्षा में मानव जाति की निरंतरता एवं व्यभिचार आदि से उसकी सलामती निहित है।

दूसरी परिचर्चा : नबूवत के प्रमाण तथा नबियों की निशानियाँ

नबूवत के प्रमाणों से मुराद ऐसे प्रमाण है, जिनसे नबियों एवं रसूलों की सत्यता को प्रमाणित किया जाता है। यह बहुत सारे और भिन्न-भिन्न प्रकार हैं। इनमें से कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं :

पहला : नबियों एवं रसूलों द्वारा प्रस्तुत वह्य में शामिल अल्लाह तथा आख़िरत के दिन पर ईमान, परोक्ष की सूचनाएँ, मज़बूत विधि-विधान, महत्वपूर्ण कार्य एवं परिस्थितियाँ, सृष्टि पर दया, मानव समाज को मुक्ति के मार्ग का आह्वान, अविश्वास एवं अनेकेश्वरवाद से दूर रहने का आह्वान, बुरे आचरण एवं विनाश की ओर ले जाने वाली चीज़ों से सावधान करना आदि।

उनके लाए हुए विधि-विधान एवं उनके द्वारा प्रस्तुत सूचनाएँ बड़ी ही ठोस, पूर्ण, तथ्यों को खोलने वाली और मानव जाति का मार्गदर्शन करने वाली हैं, जिनके बारे में यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि इन्हें कोई इन्सान प्रस्तुत नहीं कर सकता, चाहे वह जितना भी पढ़ा-लिखा एवं विवेकी क्यों न हो। क्योंकि विधि-विधानों एवं सूचनाओं में इस हद तक सटीकता अल्लाह की वह्य ही में पाई जा सकती है।

दूसरा : स्पष्ट निशानियाँ। कुछ लोग इन स्पष्ट निशानियों को मोजिज़ा (चमत्कार) भी कहते हैं। "المعجزة" (चमत्कार) ऐसी चीज़ को कहते हैं, जिसकी चुनौती के सामने प्रतिद्वंदी विवश हो जाए। यह आम सांसारिक सिस्टम से हट कर असाधारण चीज़ हुआ करती है, जिसे अल्लाह अपने किसी नबी के हाथ से ज़ाहिर करता है, ताकि उसकी तथा उसके संदेश की सच्चाई प्रमाणित हो जाए। रसूलों के हाथ से बहुत सारे चमत्कार सामने आए हैं। जैसे सालेह अलैहिस्सलाम को दी गई ऊँटनी, मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई लाठी का साँप बन जाना, ईसा अलैहिस्सलाम के द्वारा कोढ़ तथा अंधे को स्वस्थ कर दिया जाना और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को दिए गए चमत्कार। अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बहुत सारी निशानियां दी गई थीं। इनमें से सबसे बड़ा मोजिज़ा (चमत्कार) पवित्र क़ुरआन है। पवित्र क़ुरआन एक शास्वत चमत्कार है। इसके द्वारा अल्लाह ने जिन्नात एवं इन्सान को चुनौती प्रस्तुत की है। यह चमत्कार क़यामत के दिन तक बाक़ी रहेगा, जैसा कि हम पीछे उल्लेख कर आए हैं। आपके कुछ चमत्कार इसरा एवं मेराज (रातों-रात मक्का से बैत अल-मक़दिस तक और वहाँ से आकाशों की सैर कर आना), चाँद के दो टुकड़े होना, आपकी हथेली में कंकड़ियों का अल्लाह की पाकी बयान करना, खजूर के तने का आपके प्रेम में रोना और आपका अतीत तथा भविष्यकाल की सूचनाएँ प्रदान करना आदि हैं। लेकिन नबूवत के प्रमाण चमत्कारों तक ही सीमित नहीं होते। ये प्रमाण बहुत सारे और भिन्न-भिन्न प्रकार के हुआ करते हैं।

यहाँ यह याद रखना चाहिए कि नबियों की निशानियाँ एवं चमत्कार उनकी अपनी चाहत से एवं क्षमता के कारण सामने नहीं आते। उन्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह नबियों के हाथों से उनके सच्चे नबी होने की निशानी के तौर पर ज़ाहिर करता है। मसलन चाँद के दो टुकड़े होना, लाठी का साँप बन जाना, क़ुरआन जैसी महान पुस्तक प्रस्तुत करना एवं अल्लाह के द्वारा दी गई ग़ैब की सूचनाएँ प्रदान करना। यही कारण है कि जब क़ुरैश क़बीले के अविश्वासी लोगों ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से एक निशानी परस्तुत करने को कहा, तो सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फ़रमाया : "तथा उन्होंने कहा : उसपर उसके रब की ओर से निशानियाँ क्यों नहीं उतारी गईं? आप कह दें : निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास हैं और मैं तो केवल स्पष्ट रूप से सावधान करने वाला हूँ।" [सूरा अल-अनकबूत : 50]

तीसरा : नबीगण अल्लाह की इबादत, उसके कहे हुए के मुताबिक़ जीवन व्यतीत करना, आख़िरत के दिन की पुष्टि एवं तमाम रसूलों तथा किताबों की पुष्टि आदि जिन बातों का आदेश देते हैं, उनमें उन सब की पद्धति एक है।ऐसा नहीं हो सकता कि जिन बातों पर सभी नबियों की सहमति है, उनमें से किसी बात में कोई नबी अलग खड़ा हो जाए। परवर्ती नबी पूर्ववर्ती नबी की पुष्टि करता है और पूर्वर्ती नबी परवर्ती नबी की शुभ सूचना देता है। चुनांचे हम देखते हैं कि ईसा अलैहिस्सलाम और उनसे पहले के अन्य नबी अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शुभ सूचना देते हैं और अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तमाम नबियों की पुष्टि करते हैं।

इसी प्रकार उनके बीच विरोधाभास या टकराव नहीं होता। उनके द्वारा दी गई सूचनाएँ असत्य एवं ग़लत नहीं होतीं। उनकी दी हुई सारी सूचनाएँ सत्य एवं दुरुस्त हुआ करती हैं।

चौथा : वे अपने ऊपर उतरने वाली वह्य के माध्यम से अपनी-अपनी उम्मतों को बताते रहे हैं कि आने वाले दिनों में उनको विजय प्राप्त होगी और उनका दुश्मन परास्त होगा। बाद में उनकी यह भविष्यवाणी शत प्रतिशत सत्य साबित भी हुई। नूह, हूद, सालेह, शोऐब, इबराहीम, लूत, मूसा तथा अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ऐसा ही हुआ, जिसका विवरण पवित्र क़ुरआन में मौजूद है। इन रसूलों ने अपनी जातियों को बताया था कि अल्लाह द्वेषपूर्ण व्यवहार करने वाले अहंकारी काफ़िरों से इंतिक़ाम (बदला) लेगा। यह जातियाँ उनकी बातों का मज़ाक़ बनाती और उनपर यातना आने की बात को दूर की कौड़ी समझती थीं। लेकिन रसूलों के कथनानुसार उनपर यातना आ गई। जब यातना आ गई तो वे न संभल सके और न खुद को बचा सके।

पाँचवाँ : नबियों को अल्लाह का समर्थन प्राप्त रहा। अल्लाह ने उनको समर्थन स्वरूप निशानियाँ, प्रमाण एवं तर्क प्रदान किए, जो अभिमानी एवं अहंकारी अविश्वासियों के सामने उनको सच्चा साबित करते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फरमाया : हम तेरे भाई के साथ तेरा हाथ अवश्य मज़बूत करेंगे और तुम दोनों को प्रभुता प्रदान करेंगे। अतः वे तुम दोनों तक नहीं पहुँच सकेंगे। हमारी निशानियों के कारण तुम दोनों और जिन्होंने तुम्हारा अनुसरण किया, प्रभावी रहने वाले हो।" [सूरत अल-क़सस : 35], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : ''निःसंदेह हम अपने रसूलों और ईमान वालों की सांसारिक जीवन में सहायता करेंगे और उस दिन भी, जब साक्षि खड़े होंगे''। [सूरा ग़ाफ़िर : 51]

अल्लाह का यह नियम रहा है कि वह सच्चे का समर्थन करता है और झूठे को रुस्वा करता है। वह किसी झूठे की मदद नहीं करता। बल्कि उसका अवश्य ही विनाश करता है। क्योंकि जिसने इस बात का झूठा दावा किया कि उसे अल्लाह ने भेजा है, तो उसे अल्लाह कुछ समय तक के लिए मोहलत देता है और फिर उसका विनाश कर देता है तथा उसके विनाश को दुनिया एवं आख़िरत में खुद उसके लिए अपमान का सामान एवं दूसरों के लिए एक सीख बना देता है।

छठा : नबी के नबी होने से पहले तथा बाद का जीवन उसके नबी होने की गवाही देता है। क्योंकि उसकी सच्चाई, व्यवहार और अमानतदारी उसे आम लोगों के हवाले से भी झूठ बोलने से रोकती है। चुनांचे जब वह अपने परिवार एवं खानदान के लोगों के हवाले से भी झूठ बोलने से गुरेज़ करता हो, तो सर्वशक्तिमान अल्लाह के हवाले से झूठ कैसे बोल सकता है? उसके परिवार ने उसे कभी झूठ बोलते और ख़यानत करते हुए नहीं पाया। उसे हमेशा उच्च नैतिकता का पालन करते हुए पाय। यही कारण है कि क़ुरआन के वर्णन अनुसार शोऐब की जाति ने उससे कहा : "क्या तेरी नमाज़ तुझे यही हुक्म देती है कि हम अपने बुजुर्गों के देवताओं को छोड़ दें और हम अपने माल में जो कुछ करना चाहें उस का करना भी छोड़ दें, बेशक तू तो बड़ा समझदार और नेक चलन वाला है।" [सूरा हूद : 87] यही कारण है कि जब अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर पहली वह्य उतरी और आप घबराए हुए अपनी पत्नी ख़दीजा रज़ियल्लाहु अनहा के पास आए तथा जो कुछ देखा था बताया, तो उन्होंने कहा : (आप सुसमाचार प्राप्त करें। अल्लाह की क़सम! अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा। अल्लाह की क़सम! आप रिश्ते-नातों का ख़्याल रखते हैं, सच बोलते हैं, दूसरों का बोझ उठाते हैं, निर्धनों पर खर्च करते हैं, अतिथि का सत्कार करते हैं और विपत्ति में पड़े हुए लोगों की मदद करते हैं।) [44] यहाँ ख़दीजा रज़ियल्लाहु अनहा ने आपके पिछले जीवन की सच्चाई, सदाचार और दानशीलता को इस बात का प्रमाण बनाया कि आप वह्य उतरने की जो बात कह रहे हैं, वह सच्ची हैं। उनको पता था कि जब आप लोगों के हवाले से कभी झूठ नहीं बोलते, तो अल्लाह के हवाले से भी झूठ नहीं बोल सकते।

सातवाँ : रसूलों एवं नबियों की लाई हुई शिक्षाएँ ऐसी होती हैं कि मानव विवेक उनकी पुष्टि करता है, मानव प्रकृति उसे ग्रहण करती है तथा लोग उसमें अपनी सांसारिक एवं धार्मिक उद्देश्य को पा लेते हैं। बल्कि लोग इस तरह की शिक्षाओं के इंतेज़ार में रहा करते हैं। क्योंकि रसूल और नबी उच्च नैतिकता एवं आदर्श व्यहार की शिक्षा देते थे। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "बेशक मुझे सदाचार को पूर्ण रूप देने के लिए भेजा गया है।" [45] ऐसा नहीं हो सकता कि कोई नबी किसी बात का आदेश दे और लोग कहें कि काश इस बात का आदेश न दिया गया होता, या किसी बात से रोके और लोग कहें कि काश इस चीज़ से रोका न गया होता। क्योंकि सारे रसूल न्याय का आदेश देते और बेहयाई, बुराई तथा सरकशी से रोकते हैं। [46] [सही बुख़ारी : 4935, सहीह मुस्लिम : 252]

आठवाँ : किसी नबी को उसकी क़ौम ने नबूवत का भार उठाने से पहले ईमान तथा ग़ैब के बारे में बात करते हुए, लोगों को एकेश्वरवाद का आदेश देते हुए, अनेकेश्वरवाद एवं अविश्वास से रोकते हुए तथा वह्य पढ़कर सुनाते हुए नहीं देखा। यह सिलिला तब शुरू हुआ, जब अल्लाह की ओर से उसे रसूल बना दिया गया और वह्य उतरना आरंभ हो गया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और इसी प्रकार हमने आपकी ओर अपने आदेश से एक रूह़ (क़ुरआन) की वह़्य की। आप नहीं जानते थे कि पुस्तक क्या है और न यह कि ईमान क्या है। परंतु हमने उसे एक ऐसा प्रकाश बना दिया है, जिसके द्वारा हम अपने बंदों में से जिसे चाहते हैं, मार्ग दिखाते हैं। और निःसंदेह आप सीधी राह की ओर मार्गदर्शन करते हैं।" [सूरा अल-शूरा : 52] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "इससे पहले तो आप कोई किताब पढ़ते न थे और न किसी किताब को अपने हाथ से लिखते थे कि यह बातिल की पूजा करने वाले लोग शक में पड़ते।'' [सूरा अल-अनकबूत : 48], एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "और जब उन्हें हमारी स्पष्ट आयतें सुनाई जाती हैं, तो जो लोग हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, वे कहते हैं : "इसके अलावा कोई और क़ुरआन ले आओ, या इसे बदल दो। कह दो : मेरे लिए यह संभव नहीं है कि मैं इसे अपनी ओर से बदल दूँ। मैं तो केवल उसी का पालन करता हूँ, जो मेरी ओर वह्य की जाती है। निःसंदेह, यदि मैं अपने रब की अवज्ञा करूँ, तो मुझे एक बड़े दिन की यातना का डर है * आप कह दें : यदि अल्लाह चाहता, तो मैं तुम्हें इसे पढ़कर न सुनाता और न वह तुम्हें इसकी ख़बर देता। फिर निःसंदेह मैं इससे पहले तुम्हारे बीच जीवन की एक अवधि व्यतीत कर चुका हूँ। तो क्या तुम नहीं समझतेॽ" [सूरा यूनुस : 15-16] [मुसनद अहमद : 8952] इन प्रमाणों के लिए सालेह फ़ौज़ान की किताब "अल-इरशाद इला सहीह अल-ऐतिक़ाद" पृष्ठ 181-183 देखें।

चौथी परिचर्चा : अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपका संदेश

अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक बहुत ही प्रतिष्ठित एवं श्रेष्ठ वंश से थे। आपने ही कहा है : ''अल्लाह तआला ने इसमाईल -उन पर अल्लाह की शांति हो- की औलाद में से किनाना को चुना है, और किनाना से क़ुरैश को, और क़ुरैश में से बनू हाशिम को और बनू हाशिम में से मुझे चुना है।'' फिर आपको वह सबसे बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ, जिसके बराबर कोई सम्मान नहीं है। अल्लाह ने आपका चयन अंतिम नबी एवं रसूल के रूप में कर लिया और इसके लिए आपको पवित्रता प्रदान की, संपूर्णता दी और ऐसी-ऐसी ख़ूबियाँ प्रदान कीं कि उस प्रकार की ख़ूबियाँ किसी और को प्राप्त नहीं हुईं। अल्लाह ने आपको बौद्धिक रूप से पवित्रता प्रदान की थी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तुम्हारा साथी न तो गुमराह हुआ है और न टेढ़ी राह पर है।" [सूरा अल-नज्म : 2], उसने आपके दिल को पवित्रता प्रदान की है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "दिल ने झूठ नहीं बोला, जो कुछ उसने देखा।" [सूरा अल-नज्म : 11], एवं ज़बान की पवित्रता प्रदान की थी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और वह अपनी इच्छा से नहीं बोलता है।" [सूरा अल-नज्म : 3], एवं निगाह की पवित्रता प्रदान की थी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "न निगाह इधर-उधर हुई और न सीमा से आगे बढ़ी।" [सूरा अल-नज्म : 17], व्यवहार एवं आचरण की पवित्रता प्रदान की थी। आप दानशीलता, अमानतदारी, न्याय, सच्चाई, पाकदामनी, त्याग एवं बहादुरी की पराकाष्ठा पर थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा निश्चय ही आप उच्च शिष्टता एवं आचरण वाले हैं।" [सूरा अल-क़लम : 4]

अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रसूल बनाकर नबियों एवं रसूलों के सिलसिले का अंत कर दिया और आपको पूरे मानव समाज का रसूल होने का सम्मान प्रदान किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा हमने (ऐ नबी ) तुम्हें सारे लोगों के लिए शुभ सूचना देने वाला तथा यातना (अज़ाब) से डराने वाला बना कर भेजा है, किन्तु बहुत-से लोग इस बात का ज्ञान नहीं रखते।'' [सूरा अल-सबा : 28] आपको तमाम लोगों के हक़ में गवाही देने वाला बनाया। विश्वास रखने वाले के विश्वास एवं अविश्वास व्यक्त करने वाले के अविश्वास की गवाही देंगे। आपको सुसमाचार सुनाने वाला, सावधान करने वाला एवं अल्लाह की ओर बुलाने वाला बनाया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ नबी! हमने आपको गवाही देने वाला, शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है। तथा अल्लाह की अनुमति से उसकी ओर बुलाने वाला और एक प्रकाशमान दीप (बनाकर भेजा है)। तथा आप ईमान वालों को शुभ सूचना दे दें कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बड़ा अनुग्रह है।" [सूरा अल-अहज़ाब : 45-45] [सहीह मुस्लिम : 2276]

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सर्वश्रेष्ठ नबी तथा रसूल हैं। आप आदम की संतान के सरदार, अल्लाह के प्रिय एवं अंतिम रसूल तथा नबी हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "मुह़म्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। किन्तु, वे अल्लाह के रसूल और सब नबियों में अन्तिम हैं और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का अति ज्ञानी है।" [सूरा अल-अहज़ाब : 40], अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "बेशक मेरी मिसाल और मुझसे पहले के नबियों की मिसाल उस मनुष्य की तरह है, जिसने एक अच्छा और बहुत सुंदर घर बनाया, मगर एक कोने में एक ईंट की जगह खाली छोड़ दी। तो लोग उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगे और उसपर आश्चर्य करने लगे और कहने लगे : यह ईंट क्यों लगाई नहीं गई है? आपने फ़रमाया : तो मैं ही वह ईंट हूँ और मैं नबियों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हूँ।" आज ईसाइयों के पास जो इंजील है, उसमें ईसा मसीह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन का शुभ समाचार सुनाते हुए कहा है : (जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने अस्वीकार कर दिया था, वह कोने का सिरा बन गया है। क्या तुमने किताबों में कभी नहीं पढ़ा है : यीशु ने उनसे कहा : यह अल्लाह की ओर से है और यह हमारी नज़र में अद्भुत है।) [49] आज मौजूद तौरात में है कि अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : (मैं उनके लिए उनके भाइयों के बीच में से तेरे समान एक नबी खड़ा करूँगा, और अपने वचन उसके मुँह में डालूँगा। वह उन्हें वह सब कुछ बताएगा जो मैं उसे आदेश दूँगा।) [50]

सर्वशक्तिमान अल्लाह ने आपके संदेश को ऐसा व्यापक एवं पर्याप्त बनाया है कि आपके बाद मानव जाति को किसी अन्य नबी एवं रसूल) की आवश्यकता नहीं है। पूर्ववर्ती रसूलों की सारी ख़ूबियाँ, जिनकी ज़रूरत मानव जाति को क़यामत तक पड़ सकती है, आपके अंदर मौजूद हैं। "क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हमने आपपर यह पुस्तक (क़ुरआन) उतारी, जो उनके सामने पढ़ी जाती है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी दया और उपदेश है, जो ईमान रखते हैं।" [सूरा अल-अनकबूत : 51], एक और स्थान में उसने कहा है : "निःसंदेह यह क़ुरआन वह मार्ग दिखाता है, जो सबसे सीधा है और उन ईमान वालों को, जो अच्छे कर्म करते हैं, शुभ सूचना देता है कि उनके लिए बड़ा बदला है।" [सूरा अल-इसरा : 9], अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का संदेश पर्याप्त एवं संतुष्टिप्रद है। आपका संदेश सारे संसार के लिए दया एवं कृपा है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (ऐ नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा है।" [सूरा अल-अंबिया : 107] [सहीह बुख़ारी : 3535, सहीह मुस्लिम : 2286] [इंजील मत्ती 42 : 21] [व्यवस्था विवरण 18 : 18]

अंतिम रसूल के द्वारा दीन को संपूर्ण कर दिया गया और रसूल भेजने के सिलसिले का समापन कर दिया गया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "मैंने आज तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को परिपूर्ण कर दिया हैl तथा तुमपर अपना पुरस्कार पूरा कर दिया है और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म स्वरूप स्वीकार कर लिया हैl" [सूरा अल-माइदा : 3]

पढ़ना लिखना न जानने और किसी ऐसे व्यक्ति से संपर्क न होने के बावजूद, जिससे ज्ञान प्राप्त करना संभव हो, आपका इतना सच्चा, अमानतदार, पाकदामन और श्रेष्ठ होना, इस प्रकार का व्यापक एवं महान संदेश प्रस्तुत करना, इस प्रकार का महान एवं निर्णीयक अंदाज़ में बात करने वाला क़ुरआन प्रस्तुत करना, अल्लाह के द्वारा आपके हाथों से बहुत-सी बड़ी-बड़ी निशानियाँ सामने रखा जाना, आपके दीन एवं अनुयायियों को कई शताब्दियों तक विजय एवं प्रभुत्व प्रदान किया जाना आपके सच्चे नबी होने का तथा आपके संदेश के सच्चा संदेश होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा उन्होंने कहा : उसपर उसके रब की ओर से निशानियाँ क्यों नहीं उतारी गईं? आप कह दें : निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास हैं और मैं तो केवल स्पष्ट रूप से सावधान करने वाला हूँ। क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हमने आपपर यह पुस्तक (क़ुरआन) उतारी, जो उनके सामने पढ़ी जाती है। निःसंदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी दया और उपदेश है, जो ईमान रखते हैं।" [सूरा अल-अनकबूत : 50-51] [51]

चूँकि अंतिम संदेश अंतिम ईश्वरीय संदेश है, इसलिए इसका पालन करना और इसे निर्णायक मानना ज़रूरी है तथा पिछले संदेशों की जो बातें इसके विरुद्ध जाती हैं, वह या तो विकृत हैं या फिर निरस्त हो चुकी हैं। इसका नतीजा यह निकला कि अल्लाह की इबादत के इरादे से अंतिम रसूल की शिक्षाओं से परे किसी भी व्यक्ति या किताब का अनुसरण करना, ग़लत अनुसरण है। इससे इन्सान के लिए क़यामत के दिन अल्लाह के सामने कुछ भला होने वाला नहीं है। उसकी सारी मेहनत बेकार जाएगी। शर्ह अल-अक़ीदह अल-तहावियह, लेखक : अल-बर्राक (पृष्ठ : 90)

पाँचवीं परिचर्चा : नबियों के बारे में लोगों का रवैया

रसूलों के बारे में सभी मानव जातियों का रवैया लग-भग एक समान रहा है। जब भी किसी उम्मत (जाति) के पास उसका रसूल आया, तो उसके प्रभावशाली लोगों ने उसे झुठला दिया, उसे झूठा और पागल कहा तथा कहा कि यह राजपाट पर क़ब्ज़ा करना चाहता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "इसी प्रकार, उन लोगों के पास जो इनसे पहले थे, जब भी कोई रसूल आया, तो उन्होंने कहा : यह जादूगर है, या पागल। क्या उन्होंने एक-दूसरे को इस (बात) की वसीयत की है? बल्कि वे (स्वयं ही) उद्दंड लोग हैं।" [सूरा अल-ज़ारियात : 52-53], जब मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह की ओर से फ़िरऔन के पास भेजे गए, तो क़ुरआन के वर्णन अनुसार फ़िरऔन और उसके दरबारियों ने कहा : "उन्होंने कहा : क्या तुम इसलिए हमारे पास आये हो, ताकि हमें उस प्रथा से फेर दो, जिसपर हमने अपने पूर्वजों को पाया है और देश (मिस्र)में तुम दोनों की महिमा स्थापित हो जाये? हम, तुम दोनों का विश्वास करने वाले नहीं हैं।" [सूरा यूनुस : 78], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा मूसा (की कहानी) में (भी एक निशानी है), जब हमने उसे फ़िरऔन की ओर एक स्पष्ट प्रमाण देकर भेजा। तो उसने अपनी शक्ति के कारण मुँह फेर लिया और उसने कहा : यह जादूगर है, या पागल।" [सूरा अल-ज़ारियात : 38-39]

अब एक प्रश्न खड़ा होता है कि रसूलों के विरुद्ध यह द्वेषपूर्ण व्यहार क्यों देखने को मिलता है, जबकि वे सत्य की ओर बुलाते हैं, अच्छे काम का आदेश देते हैं और बुरे काम से रोकते हैं? इसका उत्तर यह है कि आम तौर पर इन सम्मानित लोगों का दावा रहता है कि वही सत्य पर हैं एवं सच्चे रास्त पर चल रहे हैं और उनके सारे विरोधी गुमराह हैं। उनका दावा रहता है कि उन्हें आम लोगों पर नस्ल श्रेष्ठता प्राप्त है, जिसके कारण वही नेतृत्व का अधिकार रखते हैं। इसी पृष्ठभूमि के कारण लोगों को ग़ुलाम बना लेते हैं, ज्ञान पर एकाधिकार का दावा करते हैं और कहते हैं कि उनको वह बातें मालूम हैं, जो आम लोगों को मालूम नहीं हैं। इस प्रकार का नेतृत्व लोगों को नबियों के अनुसरण से रोकने के लिए उनपर जादूगर होने का आरोप लगाता है और कहता है कि उन्होंने जादू का सहारा लेकर कुछ लोगों को अपना अनुयायी बना लिया है। दूसरी बात यह है कि इन्सान जिन बातों पर अपने पूर्वजों को पाता है, उनसे प्रेम रखता है और उनको छोड़ना गवारा नहीं करता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा इसी प्रकार, हमने आपसे पूर्व जिस बस्ती में भी कोई सावधान करने वाला भेजा, तो वहाँ के संपन्न लोगों ने यही कहा कि निःसंदेह हमने अपने बाप-दादा को एक रीति पर पाया और निःसंदेह हम उन्हीं के पद्चिह्नों का अनुसरण करने वाले हैं।" [सूरा अल-ज़ुख़रुफ़ : 23]

तीसरी बात यह है कि अल्लाह के नबीगण इन सम्मानित लोगों की ग़लत नीतियों से लोगों को अवगत करते हैं, उनके झूठ तथा शोषण का पर्दाफ़ाश करते हैं, उन्हें ग़लत तरीक़े से लोगों का माल खाने से सावधान करते हैं, उनके श्रेष्ठता के दावे को धराशायी करते हैं, उनकी कुलीनता का ख़ात्मा करते हैं और लोगों से कहते हैं कि तुम सब लोग बराबर हो और एक ही माता-पिता की संतान हो, इसलिए तुममें से किसी को किसी पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। अगर श्रेष्ठता प्राप्त है तो अल्लाह पर विश्वास, धर्म के पालन एवं अच्छे कर्मों के आधार पर। रसूलगण चाहते हैं कि अनुपालन केवल अल्लाह के दीन का किया जाए। यानी विनीति, समर्पण और इबादत केवल सारे संसार के रब की हो और विधान के रूप में उसी रब की शरीयत को माना जाए। जबकि तथाकथित सम्मानित लोग चाहते हैं कि लोग उनके आदेशों एवं निर्देशों का पालन करें। वही लोगों का शरण स्थल बने रहें। उनके बनाए हुए विधि-विधानों का पालन करें। उनको पवित्र एवं सम्मानित मानें। अल्लाह को छोड़कर उन्हीं को रब बना लें। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “उन्होंने अपने विद्वानों और अपने दरवेशों को अल्लाह के सिवा रब बना लिया।” [सूरा अल-तौबा : 31], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : “या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है?” [सूरा अल-शूरा : 21]

इन्हीं कारणों से अविश्वासी समुदाय के सरगना नबियों के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं और लोगों को उनपर ईमान लाने तथा उनकी बात मानने से रोकते हैं। यही कारण है कि जब एक फ़ारसी कमांडर ने रिबई बिन आमिर रज़ियल्लाहु अनहु से फ़ारस आने और लोगों की ओर अल्लाह के दीन का आह्वान करने का कारण पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया : (अल्लाह ने हमें इसलिए भेजा है कि वह जिसे चाहे उसे हम अन्य लोगों की इबादत से निकालकर अल्लाह की इबादत, दुनिया की संकीर्णता से निकालकर उसकी विशालता और धर्मों के उत्पीड़न से निकालकर इस्लाम के न्याय ओर ले आएँ।) [52]

इसके साथ ही अल्लाह अपने रसूलों का निशानियों एवं अपने चुने हुए मोमिन बंदों द्वारा समर्थन करता है, चुनांचे उनपर ऐसे लोग ईमान ले आते हैं, जिनकी क़िस्मत में अल्लाह न ख़ुशियाँ लिख रखी हैं और फलस्वरूप उनको दुनिया एवं आख़िरत में वर्चस्व प्राप्त होता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया है : ''निःसंदेह हम अपने रसूलों और ईमान वालों की सांसारिक जीवन में सहायता करेंगे और उस दिन भी, जब साक्षि खड़े होंगे।'' [सूरा ग़ाफ़िर : 51] फिर क़यामत के दिन स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सत्य पर था और किसके दुनिया में किए हुए सारे कार्य बेकार चले गए, जबकि वह समझता था कि बहुत अच्छा कर रहा है। अल-बिदायह व अल-निहायह (9/622)

छठी परिचर्चा : दुनिया एवं आख़िरत में रसूलों को सच मानने तथा उनको झुठलाने वालों का प्रतिफल

सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने इन्सान की रचना की, उसके लिए जीवन के रास्ते आसान कर दिए, उसे ज़रूरत की सारी चीज़ें दीं, उसके स्वभाव में अच्छाई रख दी, उसको विवेक, आँख और कान दिया, ताकि अल्लाह की किताबों में लिखी हुई और इस ब्रह्माण्ड में उसकी आँखों के सामने फैली हुई तथा खुद उसके अदंर पाई जाने वाली निशानियों को देखे और उनपर ग़ौर करे। उसकी ओर किताबें उतारीं और उसके पास रसूल भेजे कि उसे अपने पैदा करने वाले और रोज़ी देने वाले अल्लाह की ओर बुलाएँ और अपनी लाई हुई शिक्षाओं की पुष्टि में विभिन्न प्रकार के प्रमाण प्रस्तुत करें। ऐसे में जिसने उनकी बात मानी वह दोनों जहानों में सफल हो गया, उसके लिए सत्य के मार्ग पर चलना आसान हो गया, उसे खुशियों भरा एवं संतोषप्रद जीवन प्राप्त हो गया। आप देखेंगे कि वह अल्लाह के प्रति समर्पित है, उसकी दी हुई चीज़ों पर खुश है और अंतर्दृष्टि के साथ अल्लाह की इबादत करता है। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे व्यक्ति का सांसारिक जीवन तो आनंददायी होगा ही, आख़िरत में भी अल्लाह ने उसे बड़ा प्रतिफल तथा कभी ख़त्म न होने वाली नेमतें प्रदान करने का वादा कर रखा है। उसके लिए अल्लाह ने ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी। उसे नबियों, सत्यवादियों, शहीदों एवं सदाचारियों के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त होगा। वह शास्वत नेमतों से भरी हुई इस जन्नत में सदा रहेगा। ने मौत आएगी, न फ़ना होगा और न नेमतों में कटौती होगी।

इसके विपरीत जिसने अल्लाह की अवज्ञा की, अभिमान एवं अहंकार दिखाया, अपनी अक़्ल एवं दिल का द्वार बंद कर लिया, सत्य एवं उसके प्रमाणों को देखने एवं सुनने से मना कर दिया, वह इस जीवन में हैरान, उलझन का शिकार, भ्रम में पड़ा हुआ एवं चिंतित रहेगा। हो सकता है कि देखने में उसका जीवन बड़ा सुखमय एवं आनंददायी लगे, लेकिन जैसे ही उसके जीवन के चार दिन समाप्त हो जाएँगे और उसके पास मौत के फ़रिश्ते आ जाएँगे, तो उसके सामने आख़िरत का जीवन होगा। एक कभी न ख़त्म होने वाला एवं नित्य जीवन। उस जीवन में काफ़िर जहन्नम में हमेशा पड़ा रहेगा। उसे कुकर्मियों, अहंकारियों एवं अत्याचारियों के साथ उठाया तथा रखा जाएगा।

अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में बता दिया है कि रसूलों को झुठलाने वालों के साथ उसका रवैया कैसा रहा है। उसने नूह अलैहिस्सलाम की जाति को एक बड़े तूफ़ान एवं सैलाब द्वारा डुबो दिया, हूद अलैहिस्सलाम की जाति को एक प्रचंड आँधी द्वारा नष्ट कर दिया, सालेह अलैहिस्सलाम की जाति को एक भयंकर आवाज़ द्वारा हलाक कर दिया। लूत अलैहिस्सलाम की जाति की बस्ती को पलट कर ऊपर तले कर दिया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर जब हमारा आदेश आ गया, तो हमने उस बस्ती को उलट दिया और उनपर पकी हुई कंकरियों की बारिश कर दी। जो तेरे रब के यहाँ चिन्ह लगायी हुयी थी और वह (बस्ती) अत्याचारियों से कोई दूर नहीं है।" [सूरा हूद : 82-83], कारण यह है कि इन्होंने अपने रसूल को झुठलाया था। मानव प्रकृति के विपरीत काम किया था। औरतों के बजाय मर्दों से हवस पूरी करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा अल्लाह ने रसूलों को झुठलाने वाली कई अन्य सरकश अविश्वासी जातियों को कई दंड दिए।

सातवाँ अनुभाग : इबादत

पहली परिचर्चा : इबादत करना एक मानवीय आवश्यकता है

इबादत हर उस व्यक्त तथा गुप्त कार्य एवं कथन को कहते हैं, जो अल्लाह को प्रिय एवं पसंद हो, और जिसे इन्सान अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए, उसकी प्रसन्नता पाने के लिए, उसकी नाराज़गी के भय से और उसकी नेमतें हासिल करने के लिए करता हो। इबादत में माबूद (पूज्य; वह महान हस्ती, जिसकी इबादत की जा रही हो) के सामने विनीति की पराकाष्ठा के साथ-साथ संपूर्ण प्रेम भी निहित होता है।

आम तौर पर इन्सान इबादत करता ही है। अगर उसके पास सही ज्ञान एवं अंतर्दृष्टि मौजूद हो और वह रसूलों के मार्ग पर चलने वाला हो, तो उसकी इबादत, निकटता, भय, आशा, प्रेम एवं विनीति इस संसार के रब से जुड़ी होती है। इसके विपरीत अगर सत्य के मार्ग से अलग हो गया हो, तो किसी मृत व्यक्ति, पत्थर, मूर्ति या ग्रह से जुड़ जाता है और निकटता, आशा, भय एवं प्रेम आदि को ऐसी चीज़ों से संबद्ध कर लेता है, जो न उसके कुछ काम आ सकते हैं, न भले-बुरे के मालिक हैं और न फ़रियाद सुन सकते हैं और न किसी परेशानी में पड़े हुए इन्सान की मदद कर सकते हैं। अपनी इबादत से बुराई से बचने, लाभ प्राप्त करने एवं मन की शांति पाने की उसकी आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। ऐसा भी होता है कि वह एक पूज्य को छोड़कर दूसरे पूज्य की इबादत करने लगता है या एक धर्म को छोड़कर दूसरे का पालन करने लगता है। इस आशा में कि उसकी इबादत ठिकाने लग जाए और उसे इस संसार के रचयिता की निकटता प्राप्त हो जाए। लेकिन उसकी सारी मेहनतें बर्बाद जाती हैं। उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

इस तरह, इबादत एक मानवीय आवश्यकता है। यही कारण है कि आपको हर जाति में, प्राचीन हो कि आधुनिक, विभिन्न प्राकर की मौसमी एवं सामाजिक अवसरों, जैसे शादी-विवाह, जन्म, खेती एवं उपचार आदि से जुड़ी हुई इबादतें मिल जाएँगी।

चूँकि इबादत की ज़रूरत इन्सान को पड़ती ही है, इसलिए इन्सान अपने लिए पूज्य एवं इबादतें बना लेता है। जबकि अल्लाह ने उसे इस्लाम धर्म द्वारा ऐसी बड़ी-बड़ी इबादतें दे रखी हैं, जिनसे उसकी हर ज़रूरत पूरी हो सकती है। उन इबादतों के द्वारा इन्सान अपने रब एवं रचयिता की इबादत कर सकता है, हर नुक़सान से बच सकता है, परेशानी का उपचार कर सकता है और दिल का सुकून हासिल कर सकता है। अल्लाह ने इन इबादतों में भी बड़ी भिन्नताएँ रखी हैं और उन्हें हर इन्सान के लिए सुलभ बनाया है। कुछ इबादतों का संबंध हृदय से है। जैसे ईमान, इख़लास, भय, प्रेम और पुष्टि। कुछ इबादतों का संबंध शरीर के अंगों से है। जैसे नमाज़, हज्ज और परोपकार आदि। कुछ इबादतों का संबंध ज़बान से है। जैसे क़ुरआन पढ़ना, अज़कार पढ़ना और राह भटके हुए व्यक्ति को राह बताना आदि। कुछ इबादतों का संबंध धन से है। जैसे ज़कात, सदक़ा और खर्च करना आदि। कुछ इबादतें मौसमी हैं। जैसे रमज़ान के रोज़े और हज आदि। कुछ इबादतें शरई त्योहारों की हैसियत रखती हैं। जैसे ईद अल-फ़ितर एवं ईद अल-अज़हा। इनका उद्देश्य इबादत करने वाले मुसलमान के दिल में खुशी दाख़िल करना है।

इस्लामी इबादतें करने वाला व्यक्ति किसी सृष्टि की निकटता प्राप्त करने का उद्देश्य नहीं रखता। किसी को साझी तक नहीं बनाता। किसी को अल्लाह का साझी बनाया, तो उसकी इबादत नष्ट हो जाती है और वह इस संसार के रब का साझी बनाने वाला बन जाता है। इस्लाम में इबादत केवल अल्लाह की होनी चाहिए।

सही इबादतों में पाई जाने वाली यह विविधता आत्मा की इबादत की प्यास बुझाती है, आत्मा को प्रसन्न करती है और हृदय को प्रफुल्लित करती है। इसका कारण यह है कि आत्मा में एक खाली स्थान होता है, जिसे संसार के रब की इबादत द्वारा ही भरा जा सकता है और उसके अंदर रब की एक ज़रूरतमंदी होती है, जिसे अल्लाह के सामने अपनी ज़रूरत का इज़हार और हर सृष्टि से बेनियाज़ी ही पूरी कर सकती है। हृदय में एक बिखराव एवं उथल-पुथल होती है, जिसे अल्लाह पर विश्वास एवं उसके प्रति समर्पण ही शांत कर सकता है। हृदय अदृश्य रूप से मृत होता है, उसे अल्लाह पर ईमान एवं उसका ज्ञान ही जीवित कर सकता है। बंदा अपने दिल को वह्य के प्रकाश से जीवित करता है और उसके अंदर एक नई ऊर्जा महसूस करता है। हृदय के अंदर अविश्वास, अनेकेश्वरवाद एवं अज्ञानता का अंधकार होता है, जिसे अल्लाह पर विश्वास ही बाहर निकाल सकता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तो क्या, जो निर्जीव रहा हो, फिर हमने उसे जीवन प्रदान किया हो तथा उसके लिए प्रकाश बना दिया हो, जिसके उजाले में वह लोगों के बीच चल रहा हो, उस जैसा हो सकता है, जो अंधेरों में हो, उससे निकल न रहा हो? इसी प्रकार, काफ़िरों के लिए उनके कुकर्म सुंदर बना दिये गए हैं।" [सूरा अल-अनआम : 122] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : ''और हमने मूसा को अपनी निशानियों (चमत्कारों) के साथ भेजा, ताकि अपनी जाति को अन्धेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लायें और उन्हें अल्लाह के दिनों (पुरस्कार और यातना) का स्मरण करायें। वास्तव में, इसमें कई निशानियाँ हैं, प्रत्येक अति सहनशील, कृतज्ञ के लिए।'' [सूरा इबराहीम : 5]

इन्सान देखता है कि उसे खाने, पीने, पहनने और रहने के लिए मकान की ज़रूरत है। अल्लाह ने उसे सिखा भी दिया है कि कैसे रोज़ी कमाए, कैसे भूख मिटाए और कैसे बदन ढाँपे? लेकिन वह इस बात से आँखें मूँद लेता है कि उसके हृदय को सर्वशक्तिमान रब की ज़रूरत है। इन्सान अपने चेतना एवं अक़्ल से यह पता भी नहीं कर सकता कि उसका रब उससे क्या चाहता है, उसे अल्लाह की इबादत कैसे करनी है और उसकी प्रसन्नता कैसे प्राप्त की जा सकती है? क्योंकि यह बातें प्रयोग एवं अनुभव से प्राप्त नहीं की जा सकतीं। अक़्ल, ज्ञान और चेतना की शक्ति से भी प्राप्त नहीं की जा सकतीं। इन्हें प्राप्त करने का एकमात्र तरीक़ा है नबियों के मार्ग का अनुसरण और वह्य के प्रकाश द्वारा निर्देशित होना।

दूसरी परिचर्चा : संसार के रब की इबादत की वास्तविकता

अल्लाह, जो कि पूरे संसार का रब है, की इबादत का मतलब है, अल्लाह की निकटता, ऐसे गुप्त तथा व्यक्त कथनों एवं कर्मों द्वारा प्राप्त करना, जो उसे प्रिय हों। इबादत के समय इन्सान सर्वशक्तिमान रब से संपूर्ण मोहब्बत के साथ-साथ उसके आगे विनम्रता एवं विनयशीलता की पराकाष्ठा पर होता है। इबादत हृदय, कर्म, कथन एवं धन से संबधित उन्हीं कार्यों द्वारा की जा सकती है, जो अल्लाह ने अपने रसूलों के माध्यम से बंदों को सिखाए हैं। यहाँ याद रहे कि पवित्र एवं महान अल्लाह अपने बंदों और उनकी इबादतो से बेनियाज़ है। इन्सान की इबादतों से उसकी शान में कोई वृद्धि नहीं होती। इन्सान की अवज्ञाकारियों से उसकी कोई हानि नहीं होती। बंदों के दान से उनके ख़ज़ाने में कोई वृद्धि नहीं होती। उसी ने इन्सान को पैदा किया है और उसे अपनी इबादत का आदेश दिया है, ताकि दुनिया एवं आख़िरत में उसे सरफ़राज़ करे। बंदों की इबादतें अल्लाह की ओर से उन्हें मिली हुई नेमतों की बराबरी नहीं कर सकतीं। नेमतों का हक़ अदा करना तो दूर, वह इतनी ज़्यादा हैं कि बंदे उनको गिन तक नहीं सकते। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और तुम्हें हर उस चीज़ में से दिया, जो तुमने उससे माँगी। और यदि तुम अल्लाह की नेमत की गणना करो, तो उसकी गणना नहीं कर पाओगे। निःसंदेह मनुष्य निश्चय बड़ा अत्याचारी, बहुत नाशुक्रा है।" [सूरा इबराहीम : 34], अल्लाह की ओर से निर्धारित इबादतें कठिन तथा बोझल नहीं, बल्कि बहुत ही आसान हैं। पाँच वक़्त की नमाज़ों को ही ले लें। एक वक़्त की नमाज़ में दस मिनट भी नहीं लगते। ज़कात मात्र ढाई प्रतिशत अदा करना होता है। वो भी उस समय, जब धन निसाब तक पहुँच जाए और उसपर पूरा एक वर्ष गुज़र जाए। उसे धनवानों द्वारा निर्धनों को दया एवं सहानुभूति के रूप में और धन के शुक्र के तौर पर दिया जाता है। रोज़ा साल में एक महीना रखना होता है। मुसलमान दिन में रोज़ा रखता है और रात में खाता-पीता है। हज पूरे जीवन काल में एक बार करना होता है। वह भी उसे, जिसके पास सामर्थ्य हो। फ़र्ज़ की अदायगी के बाद सबसे बड़ी इबादत अर्थ के स्मरण के साथ ज़बान से अल्लाह का ज़िक्र करना है।

इसी तरह किसी दूसरे, मुस्मिल हो या ग़ैर-मुस्लिम, निकट हो या दूर, बल्कि जानवर तक के लिए मुसलमान द्वारा किया गया हर अच्छा अमल इबादत और इस संसार के रब की निकटता का साधन है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "एक व्यक्ति एक रास्ते से चला जा रहा था कि उसने रास्ते में किसी काँटेदार टहनी को देखा। चुनांचे उसने उसे हटा दिया, तो अल्लाह ने उसके उस काम का लिहाज़ करते हुए उसके गुनाह माफ़ कर दिए।" [53] अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (एक कुत्ता एक कुएँ के चारों ओर चक्कर लगा रहा था और क़रीब था कि वह प्यास से हलाक हो जाए कि उसे बनी इसराईल की एक वेश्या ने देख लिया। उसने अपना मोज़ा उतारा और उसे पानी पिलाया, तो इस पुण्य के कारण उसे क्षमा कर दिया गया।) [54] देखिए कि अल्लाह ने इस वेश्या को, जो एक बहुत बड़ा पाप किया करती थी, प्यास से हलाक होते एक कुत्ते को पानी पिलाने के कारण कैसे क्षमा कर दिया।

इस्लाम में इबादतें इन्सान को सांसारिक जीवन में स्वच्छ जीवन प्रदान करती हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।" [सूरा अल-नह्ल : 97] [सहीह बुख़ारी : 2472, सहीह मुस्लिम : 1914] [सहीह बुख़ारी : 3467, सहीह मुस्लिम : 2245]

मुसलमान क़ब्र में भी अपनी इबादत से लाभान्वित होता है। उसे क़ब्र में एक आनंदमय जीवन प्राप्त होता है। जबकि काफिर (अविश्वासी) को क़ब्र के अंदर यातनाओं का सामना करना पड़ता है। मुसलमान को उसके कुछ कर्मों का सवाब उस समय तक मिलता रहता है, जब तक वो कर्म फल देते रहें। मसलन किसी ने ऐसा ज्ञान सिखाया, जिससे उसकी मृत्यु के बाद भी लोग लाभान्वित होते रहें, कुआँ खोद दिया कि इन्सान, जानवर और परिंदे उसका पानी पी सकें, रोगियों के इलाज के लिए अस्पताल बना दिया या ऐसा सदाचारी पुत्र छोड़ गया, जो उसके लिए दुआ एवं क्षमा याचना करता रहे। इसी तरह मुर्दों की ओर से जीवित लोगों द्वारा किए गए सदक़े का सवाब भी उन तक पहुँचता है और उन्हें इससे क़ब्रों के अंदर फ़ायदा होता है।

इबादत के बदले में इन्सान को आख़िरत में हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतें और सर्वशक्तिमान रब की प्रसन्नता प्राप्त होती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह ने ईमान वाले पुरुषों तथा ईमान वाली स्त्रियों से ऐसे बाग़ों का वादा किया है जिनके नीचे से नहरें बहती हैं, जिनमें वे सदैव रहने वाले होंगे, और स्थायी बाग़ों में अच्छे आवासों का (वादा किया है)। और अल्लाह की ओर से थोड़ी-सी प्रसन्नता सबसे बड़ी है, यही तो बहुत बड़ी सफलता है।" [सूरा अल-तौबा : 72]

तीसरी परिचर्चा : सही तौर पर इबादत करने के नियम

इस्लाम में इबादतों का बड़ा महत्व है। अल्लाह के यहाँ उनका स्थान बड़ा ऊँचा है। अल्लाह किसी इन्सान की इबादत उस समय तक स्वीकार नहीं करता, जब तक वह इस संसार के रब के आगे आत्म समर्पण न कर दे, उसके भेजे हुए रसूलों, उतारी हुई किताबों, फ़रिश्तों और क़यामत के दिन उसके सामने खड़े होने तथा अपने कर्मों का प्रतिफल पाने पर ईमान न लाए। जिसने इस्लाम ग्रहण किए बिना कोई इबादत की, अल्लाह उसकी इबादत को स्वीकार नहीं करता। यह और बात है कि उसका बदला उसे दुनिया में खुशहाली एवं आर्थिक संपन्नता के रूप में प्रदान कर देता है। यह दरअसल अल्लाह का न्याय है। अल्लाह किसी के अमल को नष्ट नहीं करता, वह काफिर (अविश्वासी) ही क्यों न हो, क्योंकि अविश्वासी अल्लाह और आख़िरत के दिन पर विश्वास नहीं रखता, उसके सामने खड़े होने की आशा भी नहीं रखता, परन्तु अल्लाह उसे क़यामत के दिन उसके अविश्वास, अभिमान और शत्रुता का बदला देगा।

इस्लाम में इबादत से जुड़ी हुई एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अल्लाह उसी इबादत को ग्रहण करता है, जो विशुद्ध रूप से उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए की जाए। उसे किसी सृष्टि की निकटता प्राप्त करने के लिए न किया जाए। वह सृष्टि चाहे जो भी हो। नबी, रसूल या निकटवर्ती फ़रिश्ता ही क्यों न हो। जिसने कोई नेकी का काम किया और उसमें किसी को अल्लाह का साझी बना लिया, उसका अमल उसी के मुँह पर मार दिया जाएगा। उसे कोई सवाब नहीं मिलेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''नि: संदेह आप की ओर और आप से पहले जो गुजर चुके हैं (संदेशवाहक) उनकी ओर भी वह्य की गई थी कि यदि तुम ने अल्लाह के साथ शिर्क किया तो तुम्हारा कर्म अकारत चला जायेगा, और तुम घाटे उठाने वालों में से हो जाओगे।'' [सूरा अल-ज़ुमर : 65], अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : मैं तमाम साझेदारों की तुलना में साझेदारी से अधिक बेनियाज़ हूँ। जिसने कोई कार्य किया और उसमें किसी को मेरा साझी ठहराया, मैं उसके साथ ही उसके साझी बनाने के इस कार्य से भी किनारा कर लेता हूँ।"

इसी तरह अल्लाह उन्हीं इबादतों को ग्रहण करता है, जो उसने अपने बंदों को अपने रसूलों के माध्यम से सिखाई हैं। अतः जो इबादत अल्लाह ने नहीं सिखाई है और जिसे बाद में जारी कर दिया गया, उसे स्वीकार नहीं किया जाता और उसका सवाब भी नहीं दिया जाता। [सहीह मुस्लिम : 2589]

बाद में जारी की गई इबादतें एवं ईदें अल्लाह के यहाँ ग्रहणयोग्य नहीं हैं। बल्कि अल्लाह की ओर से न सिखाई गई इन इबादतों को जारी करने पर अल्लाह के यहाँ इन्सान की पकड़ होगी। क्योंकि यह काम करके इन्सान एक तरह से खुद को विधि निर्माता एवं अल्लाह का साझी बना लेता है, जो लोगों के लिए इबादतें जारी करता है और समझता है कि उनको अल्लाह ग्रहण कर लेगा।

सारांश यह कि सही एवं अल्लाह के यहाँ ग्रहणयोग्य इबादत, जिससे इन्सान दोनों जहानों में लाभान्वित होगा, वही इबादत है, जिसे अल्लाह पर ईमान रखने वाला व्यक्ति अल्लाह के बताए हुए तरीक़े के अनुसार विशुद्ध रूप से उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करे।

चौथी परिचर्चा : इबादतों तथा उनके सवाब के मामले में सभी लोग बराबर हैं

एक पाठक पवित्र क़ुरआन में सबसे पहले जो चीज़ पाता है, वह अल्लाह का यह कथन है : ''ऐ लोगो! अपने उस रब की इबादत करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच जाओ।'' [सूरा अल-बक़रा : 21], सर्वशक्तिमान रब जब लोगों को अपनी इबादत का आदेश देता है, अपनी अवज्ञा से रोकता है या शैतान के फ़रेब से सावधान करता है, तो उन्हें इन शब्दों द्वारा संबोधित करता है : {ऐ लोगो} इस संबोधन के दायरे में सारे लोग समान रूप से आ जाते हैं। अरब का रहने वाला भी, यूरोप का रहने वाला भी, अफ़्रीक़ा का रहने वाला भी, चीन का रहने वाला भी, जापान का रहने वाला भी और दुनिया के किसी अन्य देश का रहने वाला भी। इस तरह {ऐ लोगो} का संबोधन सभी लोगों के सर पर यह ज़िम्मेदारी डालती है कि वह अल्लाह का आदेश सुनें, उसकी आवाज़ पर तवज्जो दें और उस हस्ती के आगे नतमस्तक हो जाएँ, जिसके हाथ में रोज़ी एवं लाभ-हानि है। इस शब्द द्वारा संबोधन के बाद किसी के पास यह कहने का मौक़ा ही नहीं रह जाता कि इसके दायरे में वह नहीं आता। हाँ, अगर कोई खुद को "लोगों " में से न माने, तो बात अलग है। लेकिन कोई यह तो नहीं कहता कि वह "लोगों" में से नहीं है। फिर, अल्लाह के द्वारा तमाम लोगों को संबोधित किया जाना, अल्लाह के इस अनुग्रह, संपूर्ण न्याय एवं महान हिकमत को दर्शाता है कि उसने तमाम लोगों का प्रतिफल समान रखा है। यहाँ न किसी अरब को ग़ैर-अरब पर श्रेष्ठता प्राप्त है और न किसी काले को गोरे पर। श्रेष्ठता का आधार केवल धर्मपरायणता एवं सत्कर्म है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बिलाल रज़ियल्लाहु अनहु से फ़ज्र की नमाज़ के समय कहा था : (ऐ बिलाल! तुम मुझे बताओ कि इस्लाम ग्रहण करने के बाद तुमने सबसे आशा दिलाने वाला अमल कौन-सा किया है? क्योंकि मैंने जन्नत में अपने आगे-आगे तुम्हारे जूतों की आहट सुनी है। उन्होंने उत्तर दिया : मैंने सबसे ज़्यादा आशा दिलाने वाला जो काम किया है, वह यह है कि मैंने रात या दिन के समय जब भी वज़ू किया है, तो उस वज़ू से जितनी नमाज़ मेरे नसीब में लिखी होती है, ज़रूर पढ़ी है।) [56]

इसी प्रकार समय एवं स्थान की दृष्टि से भी लोगों के कर्मों के सवाब में कमी-बेशी नहीं होती। इस संसार के रब के लिए आज से हज़ार साल पहले नमाज़ पढ़ने वाले को भी उतना ही सवाब मिलेगा, जितना आज पढ़ने वाले को मिलेगा तथा दुनिया के पूर्वी छोर में नमाज़ पढ़ने वाले को भी उतना ही सवाब मिलेगा, जितना पश्चिमी छोर में पढ़ने वाले को मिलेगा। बस कुछेक समयों, जैसे रमाज़ का महीना एवं स्थानों, जैसे मक्का एवं मदीना आदि को छोड़ कर। इन समयों एवं स्थानों में इबादत का अधिक सवाब मिलता है, यह बात साबित है। [सहीह बुख़ारी : 1149]

इस्लाम वर्ण व्यवस्था को सिरे से ख़ारिज करता है और अमल तथा सवाब के मामले में सर्वशक्तिमान रब के सामने सभी लोगों को बराबर क़रार देता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने खानदान के लोगों, चचा अब्बास, फूफी सफ़िय्या और बेटी फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अनहुम से कहा था : "ऐ कुरैश के लोगो! -या इसी प्रकार का कोई और संबोधन- अपने आप को खरीद (बचा) लो। मैं तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा नहीं सकता। ऐ अब्द-ए-मनाफ़ के वंशजो, मैं तुम लोगों को अल्लाह की यातना से बचा नहीं सकता। ऐ अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब, मैं आपको अल्लाह की यातना से बचा नहीं सकता। ऐ सफ़िय्या -अल्लाह के रसूल की फूफी- मैं आपको अल्लाह की यातना से बचा नहीं सकता। ऐ फ़ातिमा मुहम्मद की बेटी, मेरे धन में से जो चाहो मांग लो। मैं तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा नहीं सकता।" [57] अपने निकटवर्ती रिश्तेदारों से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह संबोधन उनको संदेश पहुंचाता है, हर व्यक्ति पर उसकी खुद की ज़िम्मेवारी डालता है और यह स्पष्ट कर देता है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी को अल्लाह की पकड़ से बचा नहीं सकते, चाहे वह अंतिम नबी का निकटवर्ती रिश्तेदार ही क्यों न हो।

इस्लाम इबादत के मामले में नस्ल, रंग, देश, कुल, पद या सामाजिक अथवा धार्मिक प्रतिष्ठा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। चुनांचे हम देखते हैं कि रसूलगण भी अन्य लोगों की तरह अल्लाह की इबादत, उसके सवाब की आशा में और उसके दंड के भय में किया करते थे। अल्लाह ने उनको जो ऊँचा पद प्रदान किया था, उसके आधार पर वह अमल में पीछे नहीं रहते थे। उच्च एवं महान अल्लाह ने नबियों के बारे में कहा है : "निःसंदेह वे नेकी के कामों में बहुत जल्दी करते थे और हमें आशा तथा भय के साथ पुकारते थे, और वे हमसे दीनतापूर्वक विनती करने वाले थे।" [सूरा अल-अंबिया : 90] [सहीह बुख़ारी : 4771, सहीह मुस्लिम : 351]

पाँचवीं परिचर्चा : इन्सान का अपने ऊपर अत्याचार

अल्लाह ने इन्सान को पैदा किया, उसके लिए जीवन के साधन जुटाए, आकाशों एवं धरती की सारी चीज़ों को उसके काम पर लगाया और उसे अपने बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ अपनी इबादत का आदेश दिया। लेकिन इन्सान का हाल यह है कि वह अपने रब की इबादत करने के बजाय अपने ऊपर कई प्रकार का अत्याचार करता है। उसके अपने ऊपर अत्याचार के कुछ रूप इस प्रकार हैं :

1- अल्लाह का साझी ठहराना; यह सबसे बड़ा अत्याचार है। पवित्र क़ुरआन के अनुसार लुक़मान हकीम ने अपने बेटे से कहा था : ''तथा (याद करो) जब लुक़मान ने कहा अपने पुत्र से, जब वह समझा रहा था उसेः हे मेरे पुत्र! साझी मत बना अल्लाह का, वास्तव में, शिर्क (मिश्रणवाद) बड़ा घोर अत्याचार है।'' [सूरा लुक़मान : 13], इस आयत के अनुसार सबसे बड़ा अत्याचार अल्लाह का साझी बनाना है। साझी बनाने का मतलब यह है कि इन्सान किसी को अल्लाह का, जिसने उसे पैदा किया है और बेशुमार नेमतें दे रखी हैं, साझी बना डाले। एक हदीस में अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा : "सबसे बड़ा गुनाह क्या है? फ़रमाया : "यह है कि तुम अल्लाह का साझी बनाओ, हालाँकि उसी ने तुम को पैदा किया है।" मैंने कहा : निस्संदेह यह एक बहुत बड़ा गुनाह है। मैंने कहा : फिर कौन-सा? फ़रमाया : "फिर यह कि तुम अपनी संतान को इस भय से मार डालो कि वह तुम्हारे साथ खाएगी।" मैंने कहा : फिर कौन-सा? तो फ़रमाया : "फिर यह कि तुम अपने पड़ोसी की पत्नी से दुष्कर्म करो।" [58]

2- आत्मा की शुद्धि और उसे संपूर्ण बनाने के लिए दुनिया से विरक्ति और हलाल चीज़ों से किनाराकशी द्वारा स्वयं पर अत्याचार करना; यह जायज़ नहीं है। इस्लाम में खुद को हलाल चीज़ों, जैसे हलाल चीज़ें खाना, शादी करना और अच्छे कपड़े पहनना आदि से रोकना हराम है। यह दरअसल पिछली जातियों का तौर-तरीक़ा है। वह अपने ऊपर अत्याचार के इसी मार्ग पर चला करते थे। अल्लाह ने न इसका आदेश दिया है, न अपनी किताब में इसे हलाल किया है और न किसी नबी को इस मार्ग पर चलने के लिए कहा है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर हमने उनके पद्चिह्नों पर निरंतर अपने रसूल भेजे। और उनके पीछे मरयम के पुत्र ईसा को भेजा, और उसे इंजील प्रदान किया, और हमने उन लोगों के दिलों में जिन्होंने उसका अनुसरण किया नर्मी और मेहरबानी रख दी। रहा संन्यास, तो उन्होंने खुद इसका आविष्कार किया, हमने उसे उनके ऊपर अनिवार्य नहीं किया था, परंतु अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए (उन्होंने ऐसा किया)। फिर उन्होंने उसका पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। फिर हमने उनमें से जो लोग ईमान लाए उन्हें उनका बदला प्रदान कर दिया और उनमें से बहुत-से लोग अवज्ञाकारी हैं।" [सूरा अल-हदीद : 27], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "(ऐ नबी!) कह दें : किसने अल्लाह की उस शोभा को, जिसे उसने अपने बंदों के लिए पैदा किया है तथा खाने-पीने की पवित्र चीज़ों को हराम किया है? आप कह दें : ये चीज़ें सांसारिक जीवन में (भी) ईमान वालों के लिए हैं, जबकि क़ियामत के दिन केवल उन्हीं के लिए विशिष्ट होंगी। इसी तरह, हम निशानियों को उन लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करते हैं, जो जानते हैं।" [सूरा अल-आराफ़ : 32], बल्कि इस्लाम में हराम चीज़ें सीमित हैं। इस्लाम में मूलतः सारी (व्यवहारिक) चीज़ें हलाल हैं। इन्सान के लिए इस बात की इजाज़त क़तई नहीं है कि वह अपने ऊपर ऐसी चीज़ें हराम कर ले, जो अल्लाह ने हराम नहीं की हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! उन स्वच्छ पवित्र चीज़ों को, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए हलाल (वैध) की हैं, हराम (अवैध) न ठहराओ और सीमा से आगे न बढ़ो। निःसंदेह अल्लाह हद से आगे बढ़ने वालों से प्रेम नहीं करता।" [सूरा अल-माइदा : 87] [सहीह बुख़ारी : 4477, सहीह मुस्लिम : 141]

इस्लाम में शुद्धिकरण एवं संपूर्णता की प्राप्ति के उद्देश्य से अपने आप को इस प्रकार सज़ा देना कि उसे मारा जाए, एकांत में या फिर गारों में रखा जाए, जायज़ नहीं है। खुद अल्लाह ने बंदों के लिए जो इबादतें निर्धारित की हैं, उनमें अपने आप को यातना देने जैसी कोई बात पाई नहीं जाती। इबादतों में जहाँ भी कोई कठिनाई दिखाई देती है, वहाँ शरीयत द्वारा आसानी उपलब्ध करा दी गई है। मिसाल के तौर पर हम देखते हैं कि यात्री एवं रोगी के लिए, जब तक यात्री यात्रा से लौट न आए और रोगी स्वस्थ न हो जाए, कुछ मसायल में छूट दी गई है।

कुछ इबादतों, जैसे रोज़े का उद्देश्य भी अपने आप को यातना देना नहीं है। उद्देश्य उसका शुद्धिकरण है। वैसे, रोज़े के दौरान भी रात के समय अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ों से लाभान्वित होना हलाल है।

3- बेहयाई के कार्यों और गुनाहों में संलिप्त होकर और जीवन को नष्ट करके बंदों पर अत्यार करना;

अपने आप पर अत्याचार का एक रूप व्यभिचार एवं समलैंगिकता आदि बेहयाई के कामों और गुनाहों में संलिप्त होना, बंदों पर उनके धन लूटकर एवं उनकी जान एवं संपत्ति पर हमला करके अत्याचार करना, जुआ एवं क्रय-विक्रय के हराम रूपों, जैसे सूद, धोखा और फ़रेब आदि भी हैं। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने बुरे यहूदी एवं ईसाई धर्म गुरुओं के कुकर्मों एवं उनके द्वारा अवैध रूप से लोगों का धन खाने का उल्लेख करते हुए कहा है : "ऐ ईमान वालो! निःसंदेह बहुत-से विद्वान तथा सन्नियासी निश्चित रूप से लोगों का धन अवैध तरीके से खाते हैं और अल्लाह की राह से रोकते हैं। तथा जो लोग सोना-चाँदी एकत्र करके रखते हैं और उसे अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते, तो उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो।" [सूरा अल-तौबा : 34]

इन अन्यायपूर्ण आचरणों द्वारा स्वयं पर अत्याचार जीवन को नष्ट कर देता है, धन, समय और रोज़ी की बरकत ख़त्म कर देता है और इन बिगाड़ पैदा करने वालों को उनके अत्याचार तथा सीमा लाँघने के कारण अल्लाह के दंड से दोचार कर देता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जल और थल में लोगों के हाथों की कमाई के कारण बिगाड़ फैल गया है, ताकि वह (अल्लाह) उन्हें उनके कुछ कर्मों का मज़ा चखाए, ताकि वे बाज़ आ जाएँ।" [सूरा अल-रूम : 41] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा हमने आद और समूद को भी विनष्ट कर दिया और उनके आवासों से तुम्हारे लिए (उनका विनाश) स्पष्ट हो चुका है। और शैतान ने उनके लिए उनके कर्मों को शोभनीय बना दिया था। अतः उसने उन्हें सीधे रास्ते से रोक दिया था, हालाँकि वे बहुत समझ-बूझ वाले थे। तथा क़ारून और फ़िरऔन और हामान को (विनष्ट किया) और निःसंदेह उनके पास मूसा खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने धरती में अभिमान किया और वे बच निकलने वाले न थे। तो हमने हर एक को उसके पाप के कारण पकड़ लिया। फिर उनमें से कुछ पर हमने पथराव करने वाली हवा भेजी, और उनमें से कुछ को चीख़ ने पकड़ लिया, और उनमें से कुछ को हमने धरती में धँसा दिया और उनमें से कुछ को हमने डुबो दिया। तथा अल्लाह ऐसा नहीं था कि उनपर अत्याचार करे, परंतु वे स्वयं अपने आपपर अत्याचार करते थे।" [सूरा अल-अनकबूत : 38-40]

बंदों पर किए गए इन अत्याचारों के परिणाम से अत्याचारी दुनिया एवं आख़िरत में बच नहीं सकता। वैसे तो परिणाम का सामना दुनिया ही में करना पड़ जाता है, लेकिन दुनिया में बच भी जाए, तो आख़िरत के दिन बच नहीं सकता। उस दिन हर पीड़ित को अपने ऊपर किए गए अत्याचार का बदला लेने का अवसर दिया जाएगा। बंदों के अधिकार बेकार नहीं जाएँगे। ये अधिकार उस दिन दिलाए जाएँगे, जिस दिन इन्सान का धन और उसका पद उसके कुछ काम नहीं आएगा। काम आएगा तो बस ईमान और बंदों के अधिकारों के बोझ से खाली होना। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और किताब सामने रख दी जाएगी, तो आप अपराधियों को देखेंगे कि जो कुछ उसमें होगा, उससे डरने वाले होंगे और कहेंगे : हाय हमारा विनाश! यह कैसी किताब है, जो न कोई छोटी बात छोड़ती है न बड़ी, परंतु उसने उसे संरक्षित कर रखा है। तथा उन्होंने जो कर्म किए थे, सब अंकित पाएँगे। और आपका रब किसी पर अत्याचार नहीं करेगा।" [सूरा अल-कह्फ़ : 49]

छठी परिचर्चा : गुनाहों से तौबा तथा ईमान एवं अच्छे कर्म द्वारा आत्मा की शुद्धि

इन्सान पैदाइशी तौर पर कमज़रोर है। उसके अंदर इच्छाएँ और अभिलाषाएँ हैं। लालच, कंजूसी, सरकशी और अज्ञानता है। उसपर शैतान और बुरे साथी हावी हो जाते हैं। फलस्वरूप वह गुनाह कर बैठता है। गुनाह चाहे शिर्क (अल्लाह का साझी ठहराना) या अल्लाह के प्रति अविश्वास के रूप में हो या स्वयं अपने ऊपर अत्याचार, जैसे व्यभिचार के रूप में या फिर किसी और पर अत्याचार के रूप में। जब इन्सान अपनी अज्ञानता के नशे से बाहर निकलता है, अपने अंदर सुधार लाना चाहता है, जो कमियाँ रह गई हैं उनकी भरपाई करना चाहता है, जो गुनाह हुआ था उसे छोड़ देता है, उसपर शर्मिंदा होता है, दोबारा उसे न करने का इरादा कर लेता है और अल्लाह के सामने सच्ची तौबा करता है, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल कर लेता है। चाहे उसका गुनाह जितना भी बड़ा रहा हो। तौबा उस समय तक क़बूल होती है, जब तक मौत सर पर न आ जाए और रूह गले तक न पहुँच जाए। तौबा एक बहुत बड़ी इबादत है। जो अल्लाह की ओर लौटता है, अल्लाह उसकी ओर लौटता है और उसके गुनाह माफ़ कर देता है। चाहे गुनाह समुद्र की झाग के बराबर ही क्यों न रहे हों। "और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को नहीं पुकारते, और न उस प्राण को क़त्ल करते हैं, जिसे अल्लाह ने ह़राम ठहराया है परंतु हक़ के साथ और न व्यभिचार करते हैं। और जो ऐसा करेगा, वह पाप का भागी बनेगा। क़ियामत के दिन उसकी यातना दुगुनी कर दी जाएगी और वह अपमानित होकर उसमें हमेशा रहेगा। परंतु जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और अच्छे काम किए, तो ये लोग हैं जिनके बुरे कामों को अल्लाह नेकियों में बदल देगा और अल्लाह हमेशा बहुत बख़्शने वाला, अत्यंत दयावान् है।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 68-70] अल्लाह तआला ने एक अन्य स्थान में कहा है : "निःसंदेह उन लोगों ने कुफ़्र किया, जिन्होंने कहा : निःसंदेह अल्लाह तीन में से तीसरा है! हालाँकि कोई भी सत्य पूज्य नहीं है, परंतु एक पूज्य। और यदि वे उससे नहीं रुके जो वे कहते हैं, तो निश्चय उनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र किया, उन्हें अवश्य दर्दनाक यातना पहुँचेगी। तो क्या वे अल्लाह के समक्ष तौबा नहीं करते तथा उससे क्षमा याचना नहीं करते, और अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।" [सूरा अल-माइदा : 73-74]

सर्वशक्तिमान रब ने तमाम काफिरों (अविश्वासियों) को तौबा का आह्वान करते हुए कहा है : "(ऐ नबी!) इन काफ़िरों से कह दें : यदि वे बाज़ आ जाएँ, तो जो कुछ हो चुका, उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा, और यदि वे फिर ऐसा ही करें, तो पहले लोगों (के बारे में अल्लाह) का तरीक़ा गुज़र ही चुका है।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 38] इब्न-ए- कषीर अपनी तफ़सीर में कहते हैं : (अल्लाह अपने नबी सल्लल्लहु अलैहि व सल्लम से कहता है : "(ऐ नबी!) इन काफ़िरों से कह दें : यदि वे बाज़ आ जाएँ" यानी यदि वे अपने कुफ्र (अविश्वास), विरोध और द्वेष से बाज़ आ जाएँ, इस्लाम ग्रहण कर लें और अल्लाह के बताए हुए तरीक़े के अनुसार जीवन गुज़ारने लगें, "तो उनके पिछले गुनाह", यानी कुफ्र (अविश्वास) के गुनाह तथा अन्य छोटे-बड़े गुनाह "माफ़ कर दिए जाएँगे।") [59] उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) आप मेरे उन बंदों से कह दें, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किए हैं कि तुम अल्लाह की दया से निराश न हो। निःसंदेह अल्लाह सब पापों को क्षमा कर देता है। निःसंदेह वही तो अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान् है।" [सूरत अल-ज़ुमर : 53] अल्लाह इन्सान पर दया के कारण उसकी तौबा से खुश होता है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (अल्लाह अपने बंदे की तौबा से उससे कहीं अधिक खुश होता है, जितना वह व्यक्ति खुश होता है, जो यात्रा के दौरान किसी स्थान पर आराम करने के लिए उतरे, जहाँ विनाश की संभावना हो। साथ में सवारी भी हो, जिसमें खाने-पीने की चीज़ें लदी हों। वह लेट जाए और उसे नींद आ जाए। जब जागे, तो देखे कि उसकी सवारी कहीं चली गई है। (फिर वह उसे ढूँढने के लिए निकल पड़े।) यहाँ तक कि जब गर्मी, प्यास और इस तरह की अन्य परेशानियों से बेहाल हो जाए, तो सोचे कि चलो, अब अपने उसी स्थान की ओर लौट चलें। वह वहाँ लौटकर कुछ देर के लिए सो जाता है और जब जागता है, तो देखता है कि सवारी उसके पास खड़ी है।) [60]

अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु के इस्लाम ग्रहण करने के क़िस्से में इसका एक साक्ष्य है। वह कहते हैं : (जब अल्लाह ने मेरे दिल में इस्लाम को डाल दिया, तो मैं अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास पहुँचा : मैंने कहा : आप अपना दाहिना हाथ बढ़ाएँ, ताकि मैं आपकी बैअत करूँ। चुनांचे आपने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, तो मैंने अपना हाथ खींच लिया। आपने फ़रमायाः "तुमने ऐसा क्यों किया ऐ अम्र?" मैंने कहाः मैं एक शर्त रखना चाहता हूँ। फ़रमायाः "तुम कौन-सी शर्त रखना चाहते हो?" मैंने कहाः यह कि मुझे क्षमा कर दिया जाए। फ़रमायाः "क्या तुम नहीं जानते कि इसलाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है, हिजरत पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है और हज पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है?" [61] यहाँ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अनहु से फ़रमा रहे हैं कि इस्लाम पहले किए हुए छोटे-बड़े गुनाहों को ख़त्म कर देता है और तौबा पहले किए हुए गुनाहों को ख़त्म कर देती है। तफ़सीर इब्ने कषीर (4/54) [सहीह बुख़ारी : 6308, सहीह मुस्लिम : 2675]

जिस इन्सान से कोई गुनाह हो जाए, उसके लिए बेहतर होगा कि अपने आपको सुधारे और ईमान तथा अच्छे कर्म द्वारा उसे पाक करे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और मैं निश्चय बड़ा क्षमाशील हूँ उसके लिए, जिसने क्षमा याचना की तथा ईमान लाया और सदाचार किया फिर सुपथ पर रहा।" [सूरा ताहा : 82] सत्कर्म आत्मा को विशुद्ध करता है और उसे दृढ़ता के साथ ईमान पर क़ायम रहने की शक्ति प्रदान करता है, ताकि वह दूसरी बार गुनाह में न पड़े। अगर इन्सान गुनाह में पड़ने के बाद तौबा कर लेता है, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल कर लेता है और वह गुनाह से पाक-साफ़ होकर निकल जाता है। इन्सान के दामन में उस समय तक भलाइयाँ रहती हैं, जब तक वह हर बार गुनाह करने के बाद क्षमा याचना करता है, अपने किए पर शर्मिंदा होता है, तौबा करता है और सत्कर्म करता है। [सहीह मुस्लिम : 121]

आठवाँ अनुभाग : तक़दीर

पहली परिचर्चा : तक़दीर पर ईमान

तक़दीर पर ईमान रसूलों के दीन का एक बहुत बड़ा सिद्धांत है। क्योंकि यह अल्लाह के रब होने पर ईमान का एक भाग है। तक़दीर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के ज्ञान का एक अंग है। अल्लाह का ज्ञान उसका एक गुण है। अल्लाह का ज्ञान सारी सृष्टियों की उत्पत्ति से पहले से मौजूद है। सारी सृष्टियों की उत्पत्ति इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह उनको पैदा करने से पहले से उनसे अवगत था। अल्लाह ने अपने ज्ञान के अनुसार उनके बारे में सारे निर्णय लिए और उसके बाद उनकी रचना की तथा उनको अस्तित्व प्रदान किया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''क्या आप ने नहीं जाना कि आकाश तथा धरती की हर वस्तु अल्लाह के ज्ञान में है। यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। अल्लाह के लिए यह अति सरल है।'' [सूरा अल-हज्ज : 70], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : ''और उसी (अल्लाह) के पास ग़ैब (परोक्ष) की कुंजियाँ हैं, उन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता। तथा वह जानता है जो कुछ थल और जल में है और कोई पत्ता नहीं गिरता, परंतु वह उसे जानता है। और धरती के अँधेरों में कोई दाना नहीं और न कोई गीली चीज़ है और न कोई सूखी चीज़, परंतु वह एक स्पष्ट पुस्तक में (अंकित) है।'' [सूरा अल-अनआम : 59], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "निश्चय हमने प्रत्येक वस्तु को उत्पन्न किया है एक तक़दीर (निर्धारित अनुमान) से।" [सूरा अल-क़मर : 49]

तक़दीर दरअसल एक भेद है, जिससे अल्लाह की अनुमति के बिना कोई अवगत नहीं हो सकता। अल्लाह ने अपने भेजे हुए तमाम रसूलों को तक़दीर पर ईमान रखने का आदेश दिया। तक़दीर पर ईमान, ईमान का एक बहुत बड़ा आधार है। नूह, इबराहीम, मूसा और ईसा आदि रसूलों ने अपनी जातियों को इस महान आधार पर ईमान रखने का आदेश दिया है। किसी व्यक्ति का ईमान उस समय तक ठीक नहीं हो सकता, जब तक तक़दीर पर ईमान न लाए, यह विश्वास न रखे कि इस दुनिया में सब कुछ अल्लाह के निर्णय अनुसार होता है, अल्लाह के हर निर्णय में बड़ी हिकमत निहित होती है, कायनात की कोई भी चीज़ अल्लाह के निर्णय से बाहर नहीं है और हर वस्तु को अल्लाह ने अपने ज्ञान और हिकमत के तहत पैदा किया है।

दूसरी परिचर्चा : व्यापक तक़दीर तथा साधारण तक़दीर

तक़दीर पर ईमान के दायरे में जो बातें आती हैं, वो यह हैं : इन्सान इस बात पर ईमान रखे कि अल्लाह जो कुछ हो चुका है, उसका भी ज्ञान रखता है और जो कुछ होने वाला है, उसका भी ज्ञान रखता है। अल्लाह का ज्ञान व्यापक है और उसमें सब कुछ शामिल है। कोई भी चीज़ उसके ज्ञान से बाहर नहीं है। उसका ज्ञान सारे अस्तित्व से पहले का है। उसने हर चीज़ के बारे में सारे निर्णय उसकी रचना से पहले से ले रखे हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा उसने प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति की, फिर उसे एक निर्धारित रूप दिया।" [सूरा अल-फ़ुरक़ान : 2], अल्लाह से कोई गुप्त से गुप्त चीज़ भी छुपी नहीं रह सकती। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा आकाशों में और धरती में वही (एकमात्र) अल्लाह है, वह तुम्हारे छिपे और तुम्हारे खुले को जानता है तथा जानता है जो तुम कमाते हो।" [सूरा अल-अनआम : 3], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : ''निःसंदेह अल्लाह वह है जिससे न धरती में कोई चीज़ छिपी रहती है और न आकाश में। और उनके पास उनके रब की आयतों (निशानियों) में से कोई आयत (निशानी) नहीं आती, परंतु वे उससे मुँह फेरने वाले होते हैं।" [सूरा आल-ए-इमरान : 5-6], अल्लाह ने तमाम चीज़ों की तक़दीरें आकाशों एवं धरती की उत्पत्ति से पचास हज़ार साल पहले ही लिख दी थीं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''धरती में एवं तुम्हारे प्राणों में जो भी आपदा पहुँचती है, वह एक पुस्तक में लिखी है, इससे पूर्व कि हम उसे उत्पन्न करें, और यह अल्लाह के लिए अति सरल है।'' [सूरा अल-हदीद : 22]

इस ब्रह्मांड में जो कुछ होता है, उसकी मर्ज़ी से होता है। वह हर चीज़ का उत्पत्तिकार है। इस संसार की रचना एवं संचालन में कोई उसका साझी नहीं है। सब कुछ वही अपने ज्ञान एवं मर्ज़ी के अनुसार करता है। जिस तरह इन्सान अल्लाह के ज्ञान का इहाता (घेराव) नहीं कर सकता, उसी तरह उसकी तक़दीर और तदबीर का भी इहाता नहीं कर सकता। इन्सान यह जान नहीं सकता कि अल्लाह ने क्या निर्णय कर रखा है और क्या लिख रखा है। वह इसकी हिकमत से भी अवगत नहीं हो सकता। लेकिन अल्लाह के हर फ़ैसले के पीछे हिकमत हुआ करती है। लोग जानें या न जानें। जिस तरह सब को मालूम है कि सूरज निकलने और डूबने तथा सर्दी और गर्मी एवं ख़रीफ़ और रबी आदि भाँत-भाँत के मौसम रखने के पीछे बड़ी हिकमत है, उसी तरह जिन चीज़ों की हिकमत हम देख नहीं पाते, उनके पीछे भी बड़ी हिकमत है, लेकिन हम उन्हें जानते नहीं हैं। सच्चाई यह भी है कि स्वच्छ विवेक किसी चीज़ का इस बिना पर इनकार नहीं करता कि उसकी जानकारी हमारे पास नहीं है।

तक़दीर के दायरे में सारी चीज़ें आ जाती हैं। जो भी चीज़ अस्तित्व में आती है उसे अल्लाह ने लिख रखा है और वह अल्लाह के इरादे से होती है। इन्सान को जो रोज़ी मिलती है, उससे जो नेमत छिनती है, उसपर जो विपत्ति आती है और उसकी जो मुसीबत दूर होती है, सब तक़दीर में लिखा होता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और कोई चीज़ ऐसी नहीं है, जिसके कोष हमारे पास न हों और हम उसे एक निश्चित मात्रा ही में उतारते हैं।" [सूरा अल-हिज्र : 21] अल्लाह की यह तदबीर एक सुनियोजित तदबीर है, जिसमें कोई बिगाड़ नहीं होता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने धरती को फैलाया और उसमें पर्वत डाल (गाड़) दिए और उसमें हर चीज़ निर्धारित मात्रा में उगाई।'' [सूरा अल-हिज्र : 19], एक और स्थान में उसने कहा है : "पवित्र है वह अस्तित्व जिसने सभी जोड़े पैदा किए, उन चीज़ों के भी जिन्हें धरती उगाती है, और स्वयं उन (मनुष्यों) के अपने भी, और उनके भी जिन्हें वे नहीं जानते।" [सूरा यासीन : 36]

तीसरी परिचर्चा : तक़दीर पर ईमान के फल

तक़दीर पर ईमान के इन्सान को कई बड़े-बड़े लाभ होते हैं। जैसे :

1- तक़दीर पर ईमान इन्सान के सामने इस कायनात की सबसे बड़ी, बल्कि सबसे मूल्यवान वास्तविकता को खोलता है। यह वास्तविकता है, उस महान अल्लाह के ज्ञान का एक अंश प्राप्त करना, जिसने इस कायनात को पैदा किया है और उसे अपने इरादे एवं आदेश के अनुसार संचालित किया है। क्योंकि अक़्ल का सर्वश्रेष्ठ स्थान और उसके सीखने तथा ग़ौर व फ़िक्र करने का सबसे उत्तम वस्तु महान अल्लाह और उसके सम्मान का ज्ञान है। जो इस सम्मान से वंचित रह गया, उसने कुछ प्राप्त नहीं किया और कोई उद्देश्य हासिल नहीं किया। यह कैसे उचित हो सकता है कि इन्सान इस जीवन से निकल जाए और इसकी सबसे उत्कृष्ट चीज़ को न जाने।

2- तक़दीर पर ईमान इस कायनात के संचालन, इसके भविष्य और इसे एक अचूक एवं सुदृढ़ व्यवस्था प्रदान करने वाले के बारे में ज़हन में आने वाले बहुत-से प्रश्नों का उत्तर दे देता है।

3- तक़दीर पर ईमान इन्सान के ज्योतिषियों एवं जादूगरों के पास जाने का द्वार, यह जानने की इच्छा से इस कायनात में क्या कुछ होने वाला है और कैसे होने वाला है बंद कर देता है, जब इन्सान जान लेता है कि तक़दीर एक बहुत बड़ा भेद है, जिसे सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता, तो उसे पता चल जाता है कि ज्योतिषि, काहिन और ग़ैब की बात जानने का दावा करने वाले झूठे, फ़रेबी और हीलाबाज़ हैं, जो ग़लत तरीक़े से लोगों का धन खाते हैं।

4- तक़दीर पर ईमान इन्सान को सुकून और इस ब्रह्मांड के रब (उत्पत्तिकार, सवामी, प्रबंधक) अल्लाह के आगे समर्पण प्रदान करता है, उसे संतोष एवं सौभाग्य प्रदान करता है तथा बहादुरी एवं आगे बढ़ने का हौसला देता है। क्योंकि तक़दीर पर ईमान के बाद इन्सान को इस बात का विश्वास रहता है कि जो उसे मिलने वाला है, वह हाथ से निकल नहीं सकता और जो मिलने वाला नहीं है, वह हाथ लग नहीं सकता। अतः जब आगे बढ़ना अच्छा होता है, आगे बढ़ता है और जब पीछे हटना अच्छा होता है, पीछे हटता है। न भय रहता है, न हड़बड़ी। तक़दीर पर ईमान इन्सान को शुद्ध बनाता है। जब इन्सान इस बात पर विश्वास रखता है कि अल्लाह उसके सारे कार्यों से अवगत है, तो न अपने दिल में कोई बुराई रखता है और न कीना-कपट एवं द्वेष जैसी चीज़ें पालता है।

5- तक़दीर पर ईमान इन्सान को सारी परिस्थितियों में संपूर्ण संतुलन प्रदान करता है। यदि उसे कुछ अच्छा मिलता है, तो अभिमान एवं लोगों पर अत्याचार नहीं करता। क्योंकि उसे पता है कि मिलने वाली यह अच्छी चीज़ उसे अपनी शक्ति एवं ताक़त से नहीं, बल्कि अल्लाह की कृपा से एवं हिकमत के तहत मिली है। इसके विपरीत यदि उसपर कोई मुसीबत आती है, तो इस बात पर विश्वास होने के कारण कि तक़दीर में यही लिखा था, वह घबराता और मायूस नहीं होता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और यदि हम मनुष्य को अपनी तरफ़ से किसी दया (नेमत) का स्वाद चखा दें, फिर उसे उससे छीन लें, तो निश्चय ही वह अति निराश, बड़ा नाशुक्रा हो जाता है। और यदि हम उसे विपत्ति पहुँचने के बाद कोई नेमत चखाएँ, तो निश्चय ही वह अवश्य कहेगा : समस्त विपत्तियाँ मुझसे दूर हो गईं। निःसंदेह वह बहुत इतराने वाला, बहुत गर्व करने वाला है। परन्तु जिन लोगों ने धैर्य से काम लिया और अच्छे कर्म करते रहे, ऐस लोगों के लिए क्षमा और बड़ा प्रतिफल है।" [सूरा हूद : 9-11], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "धरती में तथा तुम्हारे प्राणों पर जो भी विपदा आती है, वह एक किताब में अंकित है, इससे पहले कि हम उसे (सृष्टि को) पैदा करें। निश्चय यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। ताकि तुम उसपर शोक न करो, जो तुमसे छूट जाए और उसपर फूल न जाओ, जो वह तुम्हें प्रदान करे। और अल्लाह किसी अहंकार करने वाले, बहुत गर्व करने वाले से प्रेम नहीं करता।" [सूरा अल-हदीद : 22-23]

नवाँ अनुभाग : आख़िरत का दिन

पहली परिचर्चा : सांसारिक जीवन तथा मौत की हक़ीक़त

अल्लाह ने इन्सान पर गुज़रने वाले समय के तीन चरण बनाए हैं। पहला चरण सांसारिक जीवन, दूसरा चरण बर्ज़ख़ (मौत के बाद तथा क़यामत के दिन उठाए जाने से पहले) का जीवन, जिसे क़ब्र का चरण कहा जाता है और तीसरा चरण आख़िरत का जीवन। तीसरा चरण उस समय शुरू होगा, जब क़यामत क़ायम होगी और सारे लोग जीवित होकर सारे संसार के रब के सामने जाकर एकत्र होंगे। इन तमाम चरणों के बारे में हम इस अनुभाग में विस्तृत बात करेंगे।

सांसारिक दुनिया की अल्लाह ने रचना की और उसे ज़िम्मेवारियाँ उठाने तथा परीक्षा के दौर से गुज़रने का स्थान बनाया। इसमें इन्सान पर अल्लाह की इबादत करने, अच्छे कार्यों की ओर तेज़ी से बढ़ने और उनमें प्रतिस्पपर्धा करने, अल्लाह के मार्ग की ओर बुलाने और धरती को आबाद करने का दायित्व डाला। अतः सफल इन्सान वह है, जिसने इस जीवन में अल्लाह की इबादत की, इसे अल्लाह पर विश्वास, उसके अनुसरण, सृष्टि पर उपकार और खुले तथा छुपे में अल्लाह के ध्यान तथा उसके भय के साथ आबाद रखा, जबकि विफल इन्सान वह है, जिसने अहंकार तथा अभिमान वाला रवैया अपनाया और महान अल्लाह पर विश्वास नहीं किया।

इस्लाम में सांसारिक दुनिया का जीवन ऐसी तमाम चीज़ें प्रस्तुत करने का एक विस्तृत और विशाल क्षेत्र है, जिनके माध्यम से एक व्यक्ति अपने सर्वशक्तिमान रब की संतुष्टि प्राप्त कर सकता है, लोगों को खुश कर सकता है, धरती को आबाद कर सकता है और अच्छाई, दान एवं विकास प्रदान कर सकता है। सांसारिक जीवन कोई बेड़ी एवं बोझ नहीं है, जिसे उतार फेंकना आवश्यक हो। यह धरती के निर्माण और दुनिया तथा आख़िरत की खुशियाँ एवं क़यामत के दिन की सफलता एवं स्थायी आनंद प्राप्त करने का स्थान है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।" [सूरा अल-नह्ल : 97]

अल्लाह ने सांसारिक जीवन का उदाहरण उस फ़सल से दिया है, जो उगती है और उसकी वृद्धि संपन्न हो जाती है और फिर नष्ट हो जाती है और चूरा-चूरा हो जाती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और (ऐ नबी!) आप उन्हें सांसारिक जीवन का उदाहरण दें, वह उस पानी के समान है, जिसे हमने आकाश से बरसाया, तो पृथ्वी की वनस्पति (घनी होकर) उसके साथ मिल गई। फिर वह चूरा-चूरा हो गई, जिसे हवाएँ उड़ाए फिरती हैं। और अल्लाह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखने वाला है।" [सूरा अल-कह्फ़ : 45], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "जान लो कि वास्तव में संसार का जीवन केवल एक खेल है और मनोरंजन है और शोभा है, तथा तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताना है और धन एवं संतान में एक-दूसरे से बढ़ जाने की कोशिश करना है। उस वर्षा के समान जिससे उगने वाली खेती ने किसानों को प्रसन्न कर दिया, फिर वह पक जाती है, फिर तुम उसे देखते हो कि वह पीली हो गई, फिर वह चूरा हो जाती है। और आख़िरत में कड़ी यातना है और अल्लाह की ओर से बड़ी क्षमा और प्रसन्नता है, और संसार का जीवन धोखे के सामान के सिवा और कुछ नहीं।" [सूरा अल-हदीद : 20]

अल्लाह ने इस जीवन अथवा काल खंड का एक समय तय कर रखा है, जिसके बाद इसे समाप्त हो जाना है और लोगों को आख़िरत के जीवन की ओर प्रस्थान करना है। इसी प्रकार हर इन्सान की एक निर्धारित आयु तय कर रखी है, जिससे वह आगे नहीं बढ़ सकता। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "प्रत्येक प्राणी को मौत का स्वाद चखना है और तुम्हें क़ियामत के दिन तुम्हारे कर्मों का भरपूर प्रतिफल दिया जाएगा। (उस दिन) जो व्यक्ति जहन्नम से बचा लिया गया और जन्नत में प्रवेश पा गया, वह वास्तव में सफल हो गया। तथा दुनिया की ज़िंदगी धोखे की पूंजी के सिवा कुछ नहीं है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 185]

जहाँ तक मृत्यु की वास्तविकता का प्रश्न है, तो यह अस्तित्व का एक पड़ाव है। इससे अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता कि इसके बाद कोई जीवन ही न हो। अल्लाह ने जिस प्रकार जीवन की रचना की है, उसी प्रकार मौत की भी रचना की है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है? तथा वही प्रभुत्वशाली, अति क्षमावान् है।" [सूरा अल-मुल्क : 2] मृत्यु दरअसल इस जीवन का अंत है, जिसके बाद इन्सान को बर्ज़ख़ के जीवन (इस्थमस जीवन) की ओर प्रस्थान करना है। याद रहे कि बर्ज़ख़ क़ब्र और उसके अंदर मौजूद चीज़ों का चरण है।

मौत चूँकि अल्लाह के आदेश से आती है, इसलिए कोई किसी की मौत का मालिक नहीं है। कोई किसी ऐसे व्यक्ति को मौत नहीं दे सकता, जिसका निर्धारित समय न आया हो। ज़रा सोचिए कि इन्सान, जानवर एवं पेड़-पौधों आदि सारी चीज़ों को सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह को छोड़कर कौन मौत देता है? सारे इन्सान मिलकर भी न किसी को मार सकते हैं और न मौत का समय आ जाने पर उसकी मौत को रोक सकते हैं। अल्लाह ने इन्सानों को चुनौती दे रखी है कि वह बिना किसी सबब के किसी को मारकर दिखाएँ। उन्हें इस बात की भी चुनौती दे रखी है कि उसे जीवित करके दिखाएँ, जिसे अल्लाह ने मौत दे दी हो। चुनौती इस बात की भी दे रखी है कि अपनी या किसी और की मौत को रोककर दिखाएँ। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "(ऐ नबी!) कह दीजिए : फिर तो मौत से अपनी रक्षा कर लो, यदि तुम सच्चे हो।" [सूरा आल-ए-इमरान : 168] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "आप कह दें कि जिस मौत से तुम भाग रहे हो, वह अवश्य तुमसे मिलकर रहेगी। फिर तुम अवश्य फेर दिये जाओगे परोक्ष (छुपे) तथा प्रत्यक्ष (खुले) के ज्ञानी की ओर। फिर वह तुम्हें सूचित कर देगा उससे, जो तुम करते हो।" [सूरा अल-जुमुआ : 8], अल्लाह ने इन्सान को चुनौती दी है, जिसे उसने मौत दे दी हो, उसमें दोबारा जान डालकर दिखाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर क्यों नहीं जब वह (प्राण) गले को पहुँच जाता है। और तुम उस समय देखते रहते हो। तथा हम तुमसे अधिक उसके निकट होते हैं, परंतु तुम नहीं देखते। तो अगर तुम (किसी के) अधीन नहीं हो तो क्यों नहीं तुम उसे वापस ले आते, यदि तुम सच्चे हो?" [सूरा अल-वाक़िआ : 83-87]

मौत बंदों पर अल्लाह के आधिपत्य का एक प्रमाण है। वही जिस बंदे की चाहता है, उसकी आत्मा निकालने के लिए मौत के फ़रिश्तों को भेजता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा वही अपने बंदों पर ग़ालिब (हावी) है और वह तुमपर रक्षकों को भेजता है। यहाँ तक कि जब तुममें से किसी को मौत आती है, तो हमारे फ़रिश्ते उसका प्राण निकाल लेते हैं और वे कोताही नहीं करते।" [सूरा अल-अनआम : 61] अतः मृत्यु एवं जीवन तथा दिन एवं रात का बदलना एक महान उत्पत्तिकार, जो इस ब्रह्मांड को चलाता है, के अस्तित्व के कुछ बड़े-बड़े प्रमाण हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा वही है, जो जीवित करता और मारता है और उसी के अधिकार में रात और दिन का बदलना है। तो क्या तुम नहीं समझते?'' [सूरा अल-मोमिनून : 80]

क़ुरआन के अनुसार मौत के दो प्रकार हैं :

1. नैतिक मौत। नैतिक मौत यह है कि इन्सान अपनी अक़्ल, सुनने और देखने की शक्ति से काम लेना बंद कर दे। इस प्रकार का व्यक्ति मरे हुए व्यक्ति के समान है। क्योंकि वह इस संसार में फैली हुई ऐसी निशानियों को नहीं देखता, जो इस कायनात के पालनहार, संचालक, उत्पत्तिकार एवं आजीविकादाता के अस्तित्व को प्रमाणित करती हैं। वह अल्लाह की किताब को भी नहीं देखता, जो बंदों के मार्गदर्शन के लिए उतारी गई है। अपने महान रब की इबादत नहीं करता, जिसने उसे पैदा किया, रोज़ी दी और अच्छाई के रास्ते पर चलना सिखाया। इस तरह वह अपने रब का अविश्वासी है और फलस्वरूप मरे हुए व्यक्ति के समान है तथा उसकी इस अचेतना को अल्लाह ने मौत कहा है। आप ज़रा सोच कर बताएँ। यह कैसे हो सकता है कि इन्सान इस जीवन में क़दम रखे, फिर पाए कि अल्लाह ने उसे रहने-सहने का एक अनुकूल स्थान दिया है, आकाशों एवं धरती को उसके काम पर लगा रखा है, खाने-पीने की चीज़ें उपलब्ध कर रखी हैं, गर्मी, सर्दी और बारिश से बचने की चीज़ें पैदा कर रखी हैं, इस धरती पर जीवन बिताने के सारे साधन उपलब्ध कर रखे हैं, फिर वह यहाँ जीवन गुज़ारे, खुद को जीवित समझे और सुनने, देखने और समझने की शक्ति रखने का दावा करे और इन सब के बावजूद इतना न जाने कि इस संसार का एक उत्पत्तिकार है, जिसने उसे पैदा किया है और उस रब की इबादत न करे, जिसने उसे अस्तित्व प्रदान किया है? क्या वह नहीं देखता कि उसके शरीर के सारे अंग एक हिकमत वाले की योजना के अनुरूप काम कर रहे हैं? फिर उसपर ईमान नहीं रखता। इस इन्सान के बीच, जो अपने उत्पत्तिकार को नहीं जानता और अपने परिवेश को इस प्रकार नहीं जानता कि उसके हक़ में लाभकारी साबित हो और क़ब्र में दफ़न उस मृत व्यक्ति के बीच क्या अंतर है, जो अपने आस-पास की ख़बर नहीं रखता? क़ुरआन की भाषा में यह व्यक्ति मरा हुआ जीवित व्यक्ति है। इस प्रकार का इन्सान जानवरों से भी अधिक पथभ्रष्ट है। क्योंकि जानवर अपनी ज्ञानेंद्रियों को काम में लाकर लाभकारी चीज़ें ढूँढ लेता है और अपनी चेतना का प्रयोग करके हानिकारक चीज़ों से बचता है।

2- वह मौत जिसे हम सब जानते हैं। यानी आत्मा का शरीर से अलग हो जाना। इस मौत से सारी सभ्यताएँ एवं समाज अवगत हैं। इसका सामना मुस्लिम एवं ग़ैर-मुस्लिम सब को करना होता है। मौत का समय निकट आने पर अल्लाह आत्मा को निकालने के लिए मौत के फ़रिश्ते को भेजता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''आप कह दें कि तुम्हारे प्राण निकाल लेगा मौत का फ़रिश्ता, जो तुम पर नियुक्त किया गया है, फिर तुम अपने रब की ओर फेर दिए जाओगे।'' [सूरा अल-सजदा : 11]

यहाँ एक और सवाल है। सवाल यह है कि क्या क़ुरआन एवं हदीस के अनुसार अल्लाह पर विश्वास रखने वाले की मौत और उसपर विश्वास न रखने वाले की मौत में कोई अंतर है? हमारा उत्तर यह है कि दोनों की मौतों में बड़ा अंतर होता है। लेकिन इस मृत्यु के अंतर को वही महसूस कर सकता है, जिसकी मृत्यु का समय निकट आ गया हो।

अल्लाह पर विश्वास रखने वाले की मौत का चित्रण पवित्र क़ुरआन की नीचे दी गई आयतें करती हैं। जब उसकी मौत का समय निकट आता है, तो उसके पास रहमत के फ़रिश्ते आते हैं और यह सुसमाचार सुनाते हैं कि अल्लाह उससे प्रसन्न है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ संतुष्ट आत्मा! अपने रब की ओर लौट चल, इस हाल में कि तू उससे प्रसन्न है, उसके निकट पसंदीदा है। अतः तू मेरे बंदों में प्रवेश कर जा। और मेरी जन्नत में प्रवेश कर जा।" [सूरा अल-फ़ज्र : 27-30] उसे यह सुसमाचार भी सुनाता है कि उसे आगे के बारे में कोई भय नहीं करना चाहिए और दुनिया में परिवार को छोड़कर आने पर कोई ग़म नहीं करना चाहिए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह जिन लोगों ने कहा : हमारा रब केवल अल्लाह है, फिर उसपर मज़बूती से जमे रहे, उनपर फ़रिश्ते उतरते हैं कि भय न करो और न शोकाकुल हो तथा उस जन्नत से खुश हो जाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 30]

एक हदीस में आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “जो अल्लाह से भेंट करना पसंद करता है, अल्लाह भी उससे भेंट करना पसंद करता है और जो अल्लाह से मिलना पसंद नहीं करता, अल्लाह भी उससे मिलना पसंद नहीं करता।” मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल ! क्या इससे अभिप्राय मौत से भय करना है- यदी ऐसी बात है- तो हम सब मौत को ना पसंद करते हैं? आपने फ़रमाया : “यह मतलब नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि मोमिन को जब अल्लाह की रहमत और उसकी ख़ुशनूदी और जन्नत की ख़ुशख़बरी सुनाई जाती है, तो वह अल्लाह से भेंट करना चाहता है, तो अल्लाह भी उससे भेंट करना चाहता है। और काफ़िर को जब अल्लाह के अज़ाब और उसके प्रकोप की सूचना सुनाई जाती है, तो अल्लाह से भेंट करना ना पसंद करता है, तो अल्लाह भी उस से मिलना ना पसंद करता है।”[62]

जबकि काफिर (अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले) की मौत बड़ी बुरी मौत होती है। यह एक कठिन समय होता है। मौत की कठिनाइयाँ होती हैं, दुनिया से जुदा होने का ग़म होता है, घर परिवार छोड़कर जाने का दुःख होता है, आगे के चरणों का भय होता है और फ़रिश्तों द्वारा आत्मा निकाले जाने का कष्ट होता है। इस भयावह दृश्य का चित्रण इन आयतों द्वारा किया गया है : ''यदि आप अत्याचारियों को मौत की घोर यातना में देखेंगे, जब फ़रिश्ते अपने हाथ फैलाए होते हैं (और कहते हैं) कि अपने प्राण निकालो। आज तुम्हें अल्लाह पर अनुचित आरोप लगाने तथा अभिमानपूर्वक उसकी आयतों का इनकार करने के कारण अपमानकारी प्रतिकार दिया जाएगा।'' [सूरा अल-अनआम : 93], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और काश कि तू देखता जबकि फ़रिश्ते काफिरों की जान निकालते हैं, उन के मुंह और कमर पर मार मारते हैं (और कहते हैं) तुम जलने के अज़ाब का मज़ा चखो। यही तुम्हारे करतूतों का प्रतिफल है और अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार करने वाला नहीं है।'' [सूरा अल-अनफ़ाल : 50-51], अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले के लिए यह अपमान एवं निरादर की घड़ी होगी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उस दिन (अल्लाह) के दण्ड के समान कोई दण्ड नहीं होगा। और न उसके जैसी जकड़ कोई जकड़ेगा।" [सूरा अल-फ़ज्र : 25-26], अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक हदीस में काफिर (अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले) की मौत तथा उसकी आत्मा निकाले जाने का दृश्य बयान करते हुए फ़रमाया है : (काफ़िर र्अथाथ; अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले का जब इस दुनिया से आख़िरत की ओर प्रस्थान करने का समय आता है, तो उसके पास बड़े ही निष्ठुर एवं कठोर फ़रिश्ते आते हैं और उसकी आत्मा को ऐसे निकालते हैं, जैसे गीली रुई से बहुत-से दाँतों वाले सीख को खींचकर निकाला जाता है। फ़रिश्ते उसकी आत्मा को रगों के साथ खींचकर निकाल लेते हैं। फिर उसपर आकाश एवं धरती के बीच रहने वाला हर फ़रिश्ता और आकाश में रहने वाला हर फ़रिश्ता लानत करता है।) [63] [सहीह बुख़ारी : 6507, सहीह मुस्लिम : 2684] शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

आत्मा की मौत से मुराद उसका शरीर से अलग हो जाना है। आत्माएँ फ़ना नहीं होतीं। बर्ज़ख़ के जीवन (इस्तमुस जीवन) की ओर प्रस्थान कर जाती हैं। बर्ज़ख़ के जीवन में भी एक शरीर से दूसरे शरीर की ओर प्रस्थान नहीं करतीं, जैसा कि आत्माओं के आवागवन की धारणा है। हर आत्मा एक खास शरीर के साथ जुड़ी होती है। न किसी दूसरे शरीर में समाती है और न उसकी प्रस्थान करती है। आत्मा जीवन काल में जिस शरीर में होती है, मौत के बाद क़ब्र में उसी शरीर से जुड़ जाती है और क़यामत के दिन एक और बार उससे जुड़ेगी। अल्लाह ने चाहा तो आगे हम विस्तार से इसपर बात करेंगे। [मुसनद अहमद : 18614] प्रकाशन : अल-रिसालह

इस्लाम ने इन्सान के सम्मान का ध्यान रखते हुए आदेश दिया है कि मरने के बाद उसे ग़ुसल दिलाया जाए, खुशबू लगाई जाए, उसे ऐसे कपड़े पहना दिए जाएँ जो उसके पूरे शरीर को छुपा दें, उसपर एक खास नमाज़ पढ़ी जाए जिसमें उसके लिए दया एवं क्षमा की दुआ हो और फिर उसके शरीर को क़ब्र में छुपा दिया जाए। मरे हुए व्यक्ति को क़ब्र में दफ़न करते समय कोई चीज़ रखी नहीं जाएगी, क्योंकि वह उससे लाभ नहीं उठा सकता। इन्सान को क़ब्र के अंदर उसके अच्छे कर्मों के सिवा किसी चीज़ का लाभ नहीं मिल सकता।

दूसरी परिचर्चा : क़ब्र लोक और उससे जुड़ी बातें

क़ब्र की दुनिया सांसारिक जीवन एवं आख़िरत के जीवन दोनों से अलग है। क़ब्र के जीवन को एहसास एवं अवलोकन की दुनिया पर क़यास नहीं किया जा सकता। क़ब्र की दुनिया एक अदृश्य दुनिया है, जिसे कोई व्यक्ति उस समय तक समझ नहीं सकता, जब तक उसे उसकी क़ब्र में डाल न दिया जाए। वैसे महान अल्लाह ने अपनी किताब पवित्र क़ुरआन तथा अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत द्वारा क़ब्र के कुछ तथ्यों तथा उसमें ईमान वालों के लिए रखी गई नेमतों एवं ईमान न रखने एवं दुश्मनी के मार्ग पर चलने वालों के लिए नियत यातनाओं के बारे में बताया है।

मृत व्यक्ति को जब उसकी क़ब्र में रखा जाता है, तो उसकी ओर उसकी आत्मा को लौटा देता है तथा उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं और उससे तीन प्रश्न पूछते हैं :

तेरा रब कौन है?

तेरा धर्म किया है?

तेरा नबी कौन है?

उत्तर में एक मुसलमान कहता है : मेरा रब अल्लाह है, मेरा धर्म इस्लाम है और मेरा नबी मुहम्मद है। इसके बाद क़ब्र में उसे एक आनंदमय जीवन प्राप्त होता है। उसे जन्नत में प्राप्त होने वाला उसका ठिकाना भी दिखा दिया जाता है। उससे कहा जाता है : यह जन्नत के अंदर प्राप्त होने वाला तेरा ठिकाना है। इसे देख लेने के बाद वह कहता है : ऐ मेरे रब! अभी क़यामत ले आ।

जबकि अविश्वासी एवं मुनाफ़िक़ जवाब नहीं दे पाता। फलस्वरूप उसे क़ब्र में यातना दी जाती है और जहन्नम में प्राप्त होने वाला उसका ठिकाना दिखा दिया जाता है। उससे कह दिया जाता है कि यह जहन्नम के अंदर प्राप्त होने वाला तेरा ठिकाना है। इसे देख लेने के बाद वह कहता है : ऐ मेरे रब! अभी क़यामत न लाना।

याद रहे कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का शरीर के साथ संबंध रहता है। क़ब्र के जीवन में आत्मा तथा शरीर दोनों को यातना का सामना करना पड़ता है अथवा नेमतों का आनंद उठाने का लाभ मिलता है। यह बात हमें बड़े हिकमत वाले तथा सब कुछ जानने वाले अल्लाह ने बताई है। लेकिन यह सब होता कैसे है, हमें नहीं मालूम। मोमिन की आत्मा जन्नत में होती है, जबकि काफ़िर की आत्मा जहन्नम में होती है। लेकिन क़ब्र के इस जीवन में उसका संपर्क शरीर से भी रहता है। अलबत्ता, क़ब्र के अंदर शरीर से आत्मा का संबंध दुनिया में दोनों के संबंध से भिन्न होता है। ऐसे में कोई कह सकता है कि ऐसा कैसे होगा? तो हमारा जवाब होगा : जब हम जीवित अवस्था में शरीर से आत्मा के संबंध को समझ नहीं पाते, तो मिट्टी के नीचे क़ब्र में दोनों के संबंध को कैसे समझ सकते हैं? जब हम यह नहीं जानते कि माँ के पेट में पल रहे बच्चे के शरीर में आत्मा कैसे डाली जाती है, बल्कि खुद माँ को पता नहीं होता कि उसके पेट में पल रहे बच्चे के शरीर में आत्मा कब डाली गई, तो इन्सान इस बात की उम्मीद कैसे कर सकता है कि वह इस बात को जान ले कि ग़ैबी दुनिया यानी क़ब्र की दुनिया में शरीर से आत्मा का संबद्ध कैसा होगा?

महान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में बताया है कि फ़िर्औन की जाति के लोग आज क़ब्रों के अंदर किस प्रकार की यातना का सामना कर रहे हैं। फ़रमाया : ''वे प्रस्तुत किए जाते हैं अग्नि पर, प्रातः तथा संध्या, तथा जिस दिन क़यामत स्थापित होगी, (यह आदेश होगा) कि डाल दो फ़िर्औन के अनुयायियों को कड़ी यातना में।'' [सूरा ग़ाफ़िर : 46] दोबारा उठाए जाने के बाद जो कुछ होना है, उसका विवरण अल्लाह ने चाहा, तो हम आगे प्रस्तुत करेंगे।

यहाँ एक प्रश्न है। प्रश्न यह है कि क्या जीवित लोग क़ब्रों में मौजूद मरे हुए लोगों को कुछ फ़ायदा पहुँचा सकते हैं? हम कहते हैं : अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें बताया है कि एक मुसलमान मरने के बाद जीवन काल में किए हुए अपने अच्छे कर्मों एवं ऐसे जीवित व्यक्ति के प्रयासों से लाभान्वित हो सकता है, जो उसे लाभ पहुँचाना चाहे। आपने कहा है : (इन्सान जब मर जाता है, तो उसके कर्मों का सिलसिला बंद हो जाता है। अलबत्ता पुण्य के तीन स्रोत शेष रह जाते हैं। उसका छोड़ा हुआ ऐसा ज्ञान जिससे लाभ उठाया जाए, उसका किया हुआ ऐसा दान जो उसके लिए जारी रहे या सत्कर्मी संतान उसके लिए दुआ करती रहे।) [64] इस तरह एक मुसलमान के ऐसे अच्छे कार्यों के बदले में क़ब्र में उसका अमल बढ़ता रहता है और अल्लाह के यहाँ उसका स्थान ऊँचा होता रहता है, जिनसे उसकी मौत के बाद भी लोग लाभान्वित होते रहते हैं, जैसे लाभकारी ज्ञान और निरन्तर रूप से जारी रहने वाले सदक़े, मसलन मदरसे का निर्माण, कुआँ खोदना और अस्पतला बनाना, चाहे ये काम उसने खुद किए हों या उसकी ओर से किए गए हों, या फिर नेक संतान का उसके हक़ में दुआ करना।

यहाँ एक प्रश्न और भी है। क्या कोई मरा हुआ इन्सान किसी जीवित इन्सान को कुछ लाभ पहुँचा सकता है? स्वयं कोई मरा हुआ व्यक्ति जीवित लोगों को कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता। हाँ, जीवित लोग उसके छोड़े हुए ज्ञान एवं कल्याणकारी कार्यों से लाभान्वित हो सकता हैं। लेकिन मरा हुआ व्यक्ति किसी जीवित व्यक्ति को स्वयं कोई लाभ हरगिज़ नहीं पहुँचा सकता। क्योंकि मरे हुए व्यक्ति का संबंध जीवित लोगों से कट चुका होता है। न वह उनकी बात सुनता है, न कुछ माँगने पर जवाब देता है, न लाभ पहुँचाता है और न हानि करता है। जब सर्वशक्तिमान अल्लाह ने खुद अपने नबी को संबोधति करके यह कहने का आदेश दे दिया है : ''आप कह दें कि मैं स्वयं अपने लाभ तथा हानि का अधिकार नहीं रखता। वही होता है, जो अल्लाह चाहता है। प्रत्येक जाति का एक समय निर्धारित है तथा जब उनका समय आ जायेगा, तो न एक क्षण पीछे रह सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं।'' [सूरा यूनुस : 49], तो दूसरे लोगों का ज़िक्र ही क्या। [सुनन तिरमि़ज़ी : 1376, सुनन दारिमी : 578]

जब हमने इतना जान लिया, तो यह स्पष्ट हो गया कि क़ब्र में दफ़न लोगों का वसीला लेना, उनको पुकारना, उनके लिए मन्नत मानना, उनकी क़ब्रों के पास नज़राने रखना और इस बात की आशा रखना ग़लत है कि ये मरे हुए उनको लाभ पहुँचा सकते हैं। मरा हुआ व्यक्ति जीवित व्यक्ति की केवल दुआ एवं सदक़ों से लाभान्वित हो सकता है और मरा हुआ व्यक्ति जीवित व्यक्ति को कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता।

यहाँ एक और सवाल उठता है। क्या पूर्वजों की आत्माएँ जीवित लोगों पर प्रभाव डाल सकती हैं, उनके सुख-दुख को महसूस कर सकती हैं, उनकी सभाओं में उपस्थित हो सकती हैं या बाधाओं को दूर करने में उनकी मदद कर सकती हैं? उत्तर : मरे हुए लोगों की आत्माएँ, मरे हुए लोग चाहे नबी हों, सत्कर्मी हों, सम्मानित लोग हों या रिश्तेदार, जीवित लोगों से जुड़ नहीं सकते, उनको लाभ नहीं पहुँचा सकते, उनके जीवन को प्रभावित नहीं कर सकते और उनके बारे में कुछ जान नहीं सकते। वो खुद उनको मिलने वाली नेमतों में व्यस्त या आन पड़ने वाली यातनाओं में उलझी होती हैं।

तीसरी परिचर्चा : दोबारा उठाए जाने और एकत्र किए जाने का दिन

अरबी शब्द "البعث" के मायने हैं, मृतकों को क़ब्रों से उठाया जाना और शरीरों में आत्माओं को वापस किया जाना। मुराद है, अल्लाह के आदेश से शरीरों का क़ब्रों से निकलना, आत्माओं से मिलना, हिसाब के दिन के लिए एकत्र होना और उसके बाद प्रतिफल प्राप्त करना। क़ब्रों से उठाए जाने तथा एकत्र किए जाने के इस दिन के बहुत-से नाम हैं। जैसे, आख़िरत का दिन, क़यामत का दिन तथा हिसाब का दिन आदि। उस दिन सारी सृष्टियों को जीवित करके उठाया जाएगा, सबको एकत्र किया जाएगा, उनके कर्मों का हिसाब लिया जाएगा और उसके बाद पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा। कर्म अच्छा तो अच्छा प्रतिफल और कर्म बुरा तो बुरा प्रतिफल।

इस महान दिन के बारे में बात करने से पहले हम यह बता देना चाहते हैं कि इस धरती पर जीवन का अंत कैसे होगा तथा लोगों को क़ब्रों से कैसे निकाला जाएगा? यह सारी बातें बहुत ही संक्षिप्त में रखी जाएँगी , क्योंकि इन बड़ी-बड़ी घटनाओं को इस तरह की एक संक्षिप्त पुस्तक में एकत्र करना संभव नहीं है। हम कहते हैं :

1- क़यामत का दिन बड़ा ही महान दिन है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''हे मनुष्यो! अपने रब से डरो, वास्तव में, क़यामत (प्रलय) का भूकंप बड़ा ही घोर विषय है।'' ''जिस दिन, तुम उसे देखोगे, सुध न होगी प्रत्येक दूध पिलाने वाली को अपने दूध पीते शिशु की और गिरा देगी प्रत्येक गर्भवती अपना गर्भ तथा तुम देखोगे लोगों को मतवाले, जबकि वे मतवाले नहीं होंगे, परन्तु अल्लाह की यातना बहुत कड़ी होगी।'' [सूरा अल-हज्ज : 1-2] चूँकि यह दिन एक बहुत बड़ा दिन है, इसलिए अल्लाह ने उसकी दस निशानियाँ बनाई हैं, जो उससे पहले सामने आएँगी। ये दस निशानियाँ दरअसल उस दिन की भूमिका हैं। हुज़ैफ़ा बिन उसैद ग़िफ़ारी रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें आपस में परिचर्चा करते हुए देखा, तो फ़रमाया : "तुम किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हो?" सहाबा ने उत्तर दिया : हम क़यामत के बारे में बात कर रहे हैं। आपने कहा : "क़यामत उस समय तक नहीं आएगी, जब तक तुम उससे पहले दस निशानियाँ न देख लो। फिर आपने ज़िक्र किया धुआँ का, दज्जाल का, जानवर का, पश्चिम से सूरज निकलने का, ईसा बिन मरयम अलैहिस्सलाम के उतरने का, याजूज एवं माजूज का और ज़मीन के अंदर धँसा दिए जाने की तीन घटनाओं का; इनमें से एक घटना पूरब में होगी, एक घटना पश्चिम में होगी और एक घटना अरब प्रायद्वीप में होगी, अंतिम निशानी एक आग होगी, जो यमन से निकलेगी और इंसानों को उनके जीवित करके उठाए जाने के स्थान की ओर हाँक कर ले जाएगी।" [65]

2- जब ये बड़ी-बड़ी निशानियाँ सामने आ जाएँगी और अल्लाह हमें दिखने वाले इस संसार को फ़ना करने का निर्णय कर लेगा, तो फ़रिश्ते को आदेश देगा और वह सूर में इतना तेज़ फूँक मारेगा कि उसे सुनते ही सारे जीवित प्राणी मर जाएँगे, बचेगा वही, जिसे अल्लाह बचाना चाहेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी, तो जो कोई आकाशों और धरती में होगा, बेहोश हो जाएगा। सिवाय उसके, जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसमें पुनः फूँक मारी जाएगी, तो अचानक सब खड़े होकर देखने लगेंगे।'' [सूरा अल-ज़ुमर : 68] [सहीह मुस्लिम : 2901]

3- अल्लाह इस ज़मीन को बदलकर दूसरी ज़मीन ले आएगा, जो एक टुकड़ा मालूम होगी। इसी ज़मीन पर अल्लाह तमाम लोगों को हिसाब-किताब के लिए जमा करेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जिस दिन यह धरती दूसरी धरती से तथा आकाश बदल दिए जाएँगे, और सब अल्लाह के समक्ष उपस्थित होंगे, जो अकेला प्रभुत्वशाली है।" [सूरा इबराहीम : 48]

4- अल्लाह के आदेश से फ़रिश्ता सूर में दूसरी बार फूँक मारेगा, जिसके साथ ही हर आत्मा अपने शरीर की ओर लौट जाएगी और उससे कहीं अधिक पूर्ण तरीक़े से जुड़ जाएगी, जितना सांसारिक जीवन और क़ब्र के जीवन में जुड़ी हुई थी। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी, तो एका-एक वे कब्रों से (निकलकर) अपने रब की ओर दौड़ रहे होंगे। वे कहेंगे : हाय हमारा विनाश! किसने हमें जगा दिया हमारे विश्राम गृह से? ये वो है, जिसका वचन दिया था अत्यंत कृपाशील ने तथा सच कहा था रसूलों ने। नहीं होगी वह, परन्तु एक कड़ी ध्वनि। फिर सहसा वे सबके सब, हमारे समक्ष उपस्थित कर दिये जायेंगे।'' [सूरा यासीन : 51-53]

5- शरीरों में आत्माओं को लौटा दिए जाने के बाद अल्लाह शुरू से अंत तक सारी सृष्टियों को एक ही स्थान में एकत्र करेगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और सभी आपके रब के समक्ष पंक्तियों में प्रस्तुत किये जायेंगे, तुम हमारे पास आ गये, जैसे हमने तुम्हारी उत्पत्ति प्रथम बार की थी, बल्कि तुमने समझा था कि हम तुम्हारे लिए कोई वचन का समय निर्धारित ही नहीं करेंगे।'' [सूरा अल-कह्फ़ : 48]

6- सारी सृष्टियों को जीवित करके उठाने एवं एकत्र करने के बाद अल्लाह उनके कर्मो का हिसाब लेगा। हर व्यक्ति को उसका कर्म पत्र दिया जाएगा, वह उसमें लिखी सारी बातों को देखेगा और उसमें अपने सारे भले-बुरे कर्मों को पाएगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और हमने हर इनसान के (अच्छे-बुरे) कार्य को उसके गले से लगा दिया है*। और क़ियामत के दिन हम उसके लिए एक किताब (कर्मपत्र) निकालेंगे, जिसे वह अपने सामने खुली हुई पाएगा। अपनी किताब (कर्मपत्र) पढ़ ले। आज तू स्वयं अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।" [सूरा अल-इसरा : 13-14] उस समय हर इन्सान आश्चर्य करेगा कि उसके कर्म पत्र में उसके किए हुए किसी भी कर्म को छोड़ा नहीं गया है। सब कुछ दर्ज है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और किताब सामने रख दी जाएगी, तो आप अपराधियों को देखेंगे कि जो कुछ उसमें होगा, उससे डरने वाले होंगे और कहेंगे : हाय हमारा विनाश! यह कैसी किताब है, जो न कोई छोटी बात छोड़ती है न बड़ी, परंतु उसने उसे संरक्षित कर रखा है। तथा उन्होंने जो कर्म किए थे, सब अंकित पाएँगे। और आपका रब किसी पर अत्याचार नहीं करेगा।" [सूरा अल-कह्फ़ : 49]

उस दिन जब सारे तथ्य सामने आ जाएँगे, मोमिन (अल्लाह पर विश्वास रखने वाला) जान लेगा कि वह सही रास्ते पर चल रहा था और काफिर( अल्लाह पर विश्वास न रखने वाला) जान लेगा कि वह ग़लत रास्ते पर चल रहा था, तो उस समय अल्लाह पर विश्वास न रखने वाले को अपने कर्मों का समीक्षा करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "उस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति अपने पहले के किए हुए कामों को जाँच लेगा और वे अपने सच्चे मालिक अल्लाह की ओर लौटाए जाएँगे और वे जो कुछ झूठा आरोप लगाया करते थे, सब उनसे गुम हो जाएगा।" [सूरा यूनुस : 30], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी की हुई नेकी को हाज़िर किया हुआ पाएगा, तथा जिसने बुराई की होगी, वह कामना करेगा कि उसके तथा उसकी बुराई के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता। तथा अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है और अल्लाह अपने बंदों के प्रति अत्यंत करुणामय है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 30]

7- हिसाब-किताब के बाद न्यायपूर्ण प्रतिफल दिया जाएगा। अल्लाह पर विश्वास रखने वालों को हमेशा जन्नत में रहने का अधिकार मिलेगा और उसपर विश्वास न रखने वालों को हमेशा के लिए जहन्नम में डाल दिया जाएगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जिस दिन वह तुम्हें, एकत्र होने के दिन एकत्रित करेगा, वही दिन है हार जीत का। और जो अल्लाह पर ईमान लाए और सत्कर्म करे, अल्लाह उसकी बुराइयों को उससे दूर कर देगा और उसे ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे से नहरें बहतीं होंगी। वे वहाँ हमेशा रहेंगे। यही बड़ी सफलता है। और जिन लोगों ने कुफ़्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वही जहन्नम वाले हैं, जो उसमें हमेशा रहने वाले हैं। तथा वह बुरा ठिकाना है।" [सूरा अल-तग़ाबुन : 9-10]

8-काफिर (अल्लाह पर विश्वास न रखने वाला) जब अपनी आँखों से यातना को देख लेगा और उसके सामने सारे तथ्य खुल जाएँगे, तो अच्छे काम करने के लिए दोबारा लौटकर दुनिया जाना चाहेगा। लेकिन इसका क्या फ़ायदा? अमल का समय समाप्त हो चुका होगा और प्रतिफल का समय उपस्थित हो चुका होगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा (ऐ नबी!) यदि आप उस समय देखें, जब वे आग पर खड़े किए जाएँगे, तो वे कहेंगे : ऐ काश! हम वापस भेजे जाएँ और अपने रब की आयतों को न झुठलाएँ और हम ईमान वालों में से हो जाएँ।" [सूरा अल-अनआम : 27]

चौथी परिचर्चा : दोबारा उठाए जाने की हिकमत

हम पीछे बयान कर आए हैं कि यह दुनिया प्रतिफल की जगह नहीं है। कभी-कभी इन्सान की आयु समाप्त हो जाती है और वह अपने कर्मों का प्रतिफल प्राप्त किए बिना ही इस दुनिया से चला जाता है। एक व्यक्ति अल्लाह पर ईमान रखकर जीवन व्यतीत करता है, उसकी नेमतों का शुक्र अदा करता है, अपने नफ़्स को हराम ख़्वाहिशों से बचाता है और लोगों का भला करता है। लेकिन वह अपने अमल के अनुरूप जीवन की खुशियाँ प्राप्त नहीं कर पाता। जबकि इसके विपरीत एक व्यक्ति अत्याचार, सरकशी और रक्तपात करता फिरता है। लेकिन इसके बावजूद सामान्य मौत मरकर इस दुनिया से चला जाता है। उसे उसके कर्मों का बदला नहीं मिल पाता। उत्पीड़न के शिकार लोग उससे अपना हक़ नहीं ले पाते। छिनी हुई चीज़ें वापस नहीं करा पाते। इसी तरह एक व्यक्ति दुनिया में अल्लाह की दी हुई नेमतों का आनंद लेता है, लेकिन उसका शुक्र अदा नहीं करता, उसकी इबादत नहीं करता और उसपर विश्वास नहीं रखता। ऐसे में क्या यह न्याय की बात होगी कि भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म करने वाले और अलग-अलग तरह की मान्यताएँ रखने वाले लोग दुनिया से चले जाएँ और उनको उनके कर्मों का प्रतिफल न मिले।

यही कारण है कि अल्लाह ने एक दिन निर्धारित कर रखा है, जब सारे लोग एकत्र होंगे, ईमान रखने वाले लोग सफल होंगे और देख लेंगे कि ईमान ही दोनों जहान में सफलता का सबब है। क्योंकि अपने रब पर ईमान रखने वाले और अच्छे कर्म करने वाले लोगों के लिए पूरा-पूरा प्रतिफल और हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमत है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह ने ईमान वाले पुरुषों तथा ईमान वाली स्त्रियों से ऐसे बाग़ों का वादा किया है जिनके नीचे से नहरें बहती हैं, जिनमें वे सदैव रहने वाले होंगे, और स्थायी बाग़ों में अच्छे आवासों का (वादा किया है)। और अल्लाह की ओर से थोड़ी-सी प्रसन्नता सबसे बड़ी है, यही तो बहुत बड़ी सफलता है।" [सूरा अल-तौबा : 72], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और वे जो उस चीज़ को जोड़ते हैं, जिसके जोड़ने का अल्लाह ने आदेश दिया है और अपने रब का भय रखते हैं तथा बुरे हिसाब से डरते हैं। तथा वे जिन्होंने अपने रब का चेहरा चाहने के लिए धैर्य से काम लिया, और नमाज़ का आयोजन किया तथा हमने उन्हें जो कुछ प्रदान किया है, उसमें से छिपे और खुले ख़र्च किया, तथा भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं, यही लोग हैं जिनके लिए आख़िरत के घर का अच्छा परिणाम है। सदैव रहने के बाग़, जिनमें वे प्रवेश करेंगे और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नियों और उनकी संतानों में से जो नेक हुए (वे भी प्रवेश करेंगे)। तथा फ़रिश्ते प्रत्येक द्वार से उनके पास आएँगे। (वे कहेंगे :) सलाम (शांति) हो तुमपर उसके बदले जो तुमने धैर्य किया। तो क्या ही अच्छा है इस घर (आखिरत) का परिणाम!" [सूरा अल-राद : 21-24]

काफ़िर यह देख ले कि वह दुनिया तथा आख़िरत दोनों का घाठा उठाने वाला ठहरा। अत्याचार करने वाला यह देख ले कि अल्लाह ने उसके हर अत्याचार को गिन रखा है, जिसका बदला उससे लिया जाएगा और उसे उसके सारे विनाशकारी कर्मों एवं अपराधों के बदले में ऐसी हमेशा बाक़ी रहने वाली यातना में डाला जाएगा, जो न कभी हल्की होगी और न परिवर्तित होगी। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और जिस दिन वे लोग, जिन्होंने कुफ़्र किया, आग के सामने पेश किए जाएँगे, (कहा जाएगा :) क्या यह सत्य नहीं है? वे कहेंगे : क्यों नहीं, हमारे रब की क़सम! वह कहेगा : फिर यातना का मज़ा चखो, उसके बदले जो तुम कुफ़्र किया करते थे।" [सूरा अल-अहक़ाफ़ : 34] एक और स्थान में उसका फ़रमान है : ''वास्तव में, जिन लोगों ने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र (अविश्वास) किया, हम उन्हें नरक में झोंक देंगे। जब-जब उनकी खालें पकेंगी, हम उनकी खालें बदल देंगे, ताकि वे यातना चखें, निःसंदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ है।'' [सूरा अल-निसा : 56], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "और जिन लोगों ने कुफ़्र किया, उनके लिए जहन्नम की आग है। न उनपर (मृत्यु का) फैसला किया जाएगा कि वे मर जाएँ, और न उनसे उसकी यातना ही कुछ हल्की की जाएगी। हम प्रत्येक अकृतज्ञ को इसी तरह बदला दिया करते हैं। और वे उसमें चिल्लाएँगे : ऐ हमारे रब! हमें (जहन्नम से) निकाल ले। हम जो कुछ किया करते थे, उसके अलावा नेकी के काम करेंग। क्या हमने तुम्हें इतनी आयु नहीं दी थी कि उसमें जो शिक्षा ग्रहण करना चाहता, वह शिक्षा ग्रहण कर लेता, हालाँकि तुम्हारे पास डराने वाला (नबी) भी तो आया था? अतः, तुम (यातना) चखो। अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं है।" [सूरा फ़ातिर : 36-37]

अब रहा प्रश्न ऐसे काफ़िर का, जिसने अल्लाह की नवाज़िशों की आशा में दुनिया में अच्छे काम किए हों और समझ रखा हो कि उसे क़यामत के दिन इसका लाभ मिलेगा, तो उसके कर्मों को अल्लाह नष्ट नहीं करेगा। उसे दुनिया ही में उसके कर्मों का बदला दे देगा। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : (अल्लाह किसी मोमिन के किसी अच्छे काम को बेकार जाने नहीं देता। उसके बदले दुनिया में नेमतें प्रदान करता है और आख़िरत में उसका प्रतिफल देता है। जबकि काफ़िर द्वारा अल्लाह के लिए किए गए कर्मों के बदले उसे आजीविका प्रदान करता है। यहाँ तक कि जब वह आख़िरत की ओर जाएगा, तो उसके पास कोई अच्छा कर्म नहीं होगा, जिसका प्रतिफल उसे मिल सके।) [66]

क्या यह न्याय हो सकता है कि मोमिन तथा काफ़िर बराबर ठहरें और अपराधी तथा परोपकार करने वाले एक समान साबित हों? उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "क्या हम आज्ञाकारियों को पापियों के समान कर देंगे?" [सूरा अल-क़लम : 35], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "(क्या यह बेहतर) या वह व्यक्ति जो रात की घड़ियों में सजदा करते हुए तथा क़ियाम करते हुए इबादत करने वाला है। आख़िरत का भय रखता है तथा अपने रब की दया की आशा रखता है? आप कह दें कि क्या समान हैं वे लोग जो ज्ञान रखते हों तथा वे जो ज्ञान नहीं रखते? उपदेश तो वही ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" [सूरा अल-ज़ुमर : 9] [सहीह मुस्लिम : 2808]

क़यामत के दिन लोग दो ही प्राकर के होंगे। उनका कोई तीसरा प्रकार नहीं होगा। विश्वासी एवं अविश्वासी। विश्वासी का ठिकाना जन्नत होगा और अविश्वासी का ठिकाना जहन्नम। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा इसी प्रकार, हमने आपकी ओर अरबी क़ुरआन की वह़्य (प्रकाशना) भेजी है, ताकि आप मक्का वासियों को और उसके आस-पास के लोगों को सावधान कर दें, और एकत्र होने के दिन से सचेत कर दें, जिसमें कोई संदेह नहीं। एक समूह जन्नत में तथा एक समूह भड़कती आग में होगा।" [सूरा अल-शूरा : 7]

क़यामत के दिन अल्लाह का न्याय सामने होगा। उस दिन हर मज़लूम को ज़ालिम से बदला लेने का अवसर दिया जाएगा। हर इन्सान को उसके कर्म का प्रतिफल मिलेगा, जिसे देखकर हर प्राणी महान रब के न्याय एवं हिकमत का गुणगान करेगा।

पाँचवीं परिचर्चा : क़यामत के दिन फ़िदया देना और बहस करना

क़यामत के दिन जब सारे तथ्य सामने आ जाएँगे, तो हर व्यक्ति चाहेगा कि बस उसे मुक्ति मिल जाए। चाहे इसकी क़ीमत जो भी चुकानी पड़े। धरती और उसकी सारी चीज़ें देनी पड़ जाएँ, तब भी कोई बात नहीं है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और जिन लोगों ने अत्याचार किया है, अगर धरती की सारी चीज़ें उनकी हो जाएँ, और उनके साथ उतना ही और भी, तो वे क़ियामत के दिन बुरी यातना से बचने के लिए इन सारी चीज़ों को फ़िदया में दे देंगे। तथा अल्लाह की ओर से उनके लिए वह बात खुल जाएगी, जिसका वे गुमान भी न करते थे।" [सूरा अल-ज़ुमर : 47], एक और स्थान में उसका फ़रमान है : "निःसंदेह जिन लोगों ने कुफ़्र किया, यदि उनके पास वह सब कुछ हो जो धरती में है और उतना ही उसके साथ और भी हो, ताकि वे यह सब कुछ क़ियामत के दिन की यातना से छुड़ौती के रूप मे दे दें, तो उनकी ओर से स्वीकार नहीं किया जाएगा और उनके लिए दर्दनाक यातना है।" [सूरा अल-माइदा : 36], उस दिन की यातना से बचने के लिए एक अविश्वासी व्यक्ति अपने पुत्र एवं परिवार तक को फ़िदया के तौर पर देने के लिए तैयार हो जाएगा। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : “पापी उस दिन के अज़ाब के बदले में अपने पुत्रों को देना चाहेगा, तथा अपनी पत्नी और अपने भाई को। तथा अपने घराने और खानदान को, जो उसे शरण देता था। और जो धरती में है, सभी को, फिर वह उसे यातना से बचा ले।" [सूरा अल-मआरिज : 11-14]

जिस प्रकार उस दिन किसी काफ़िर को फ़िदया का कोई लाभ नहीं मिलेगा, उसी प्रकार अपने पक्ष में किए गए तर्क-वितर्क का भी कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसी तरह सत्य के मार्ग से रोकने वाले, गुमराही और कुपथ की ओर बुलाने वाले और यातना में डालने वाले को कोस कर भी उसका जी नहीं भरेगा। अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में उन बहसों का उल्लेख कर दिया है, जो क़यामत के दिन पथप्रदर्शकों एवं उनके बताए हुए मार्ग पर चलने वालों के बीच होने वाली हैं और जिनका कोई लाभ नहीं होने वाला। "जिस दिन प्रत्येक प्राणी को अपने बचाव की चिन्ता होगी और प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जायेगा और उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।" [सूरा अल-नह्ल : 111], इब्न-ए-जरीर कहते हैं : (जिस दिन प्रत्येक प्राणी को अपने बचाव की चिन्ता होगी) और हर प्राणी अपने बचाव में बहस करेगा और अपने द्वारा दुनिया में किए गए अच्छे, बुरे, विश्वास एवं अविश्वास के बचाव में प्रमाण प्रस्तुत करेगा। (और प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जायेगा।) यानी उन कर्मों का, जो उसने दुनिया में किए थे। अच्छे हों कि बुरे। (उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा) : यानी उनके साथ वही व्यवहार किया जाएगा, जिसके वो अपने अच्छे या बुरे कर्मों के कारण हक़दार होंगे। अच्छे काम करने वाले को अच्छा बदला दिया जाएगा और बुरे काम करने वाले को बुरा बदला।) [67]

एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "वे लोग जो घमंड करते (बड़े बनते) थे, उन लोगों से जो कमज़ोर समझे जाते थे, कहेंगे : क्या हमने तुम्हें मार्गदर्शन से रोका था, जब वह तुम्हारे पास आ गया था? बल्कि तुम (स्वयं ही) अपराधी थे। तथा वे लोग जो कमज़ोर समझे जाते थे, उन लोगों से कहेंगे, जो अहंकार करते थे : बल्कि (तुम्हारी) रात और दिन की चालों ही ने (हमें रोका था) जब तुम हमें आदेश देते थे कि हम अल्लाह के साथ कुफ़्र करें तथा उसके लिए साझी ठहराएँ। तथा जब वे यातना को देखेंगे तो (अपने दिल में) पछतावा को छिपाएँगे। और हम उन लोगों की गरदनों में तौक़ डाल देंगे, जिन्होंने कुफ़्र किया। उन्हें केवल उसी का बदला दिया जाएगा, जो वे किया करते थे।" [सूरा सबा : 32-33] इन आयतों में सर्वशक्तिमान रब (उत्पत्तिकार, सवामी, प्रबंधक) ने बताया है कि अहंकार करने वाले अपना अनुसरण करने वाले कमज़रो लोगों से अपना पीछा छुड़ा लेंगे और सारा दोष उन्हीं पर डाल देंगे। फिर कमज़ोर समझे जाने वाले लोग अहंकारियों के बारे में बताएँगे कि वे उनके साथ निरंतर रूप से फ़रेब करते रहे और उनको सत्य के मार्ग से रोककर ही मद लिया। [तफ़सीर अल-तबरी : 17/308]

तथा उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अल्लाह के सिवा कुछ साझी बना लेते हैं, जिनसे वे अल्लाह के प्रेम जैसा प्रेम करते हैं। तथा वे लोग जो ईमान लाए, अल्लाह से प्रेम में सबसे बढ़कर होते हैं। और काश! वे लोग जिन्होंने अत्याचार किया उस समय को देख लें जब वे यातना को देखेंगे, (तो जान लें) कि निःसंदेह शक्ति सब की सब अल्लाह ही के लिए है और यह कि निःसंदेह अल्लाह बहुत सख़्त अज़ाब वाला है। जब वे लोग जिनका अनुसरण किया गया था, उन लोगों से बिल्कुल अलग हो जाएँगे जिन्होंने (उनका) अनुसरण किया और वे यातना को देख लेंगे और उनके आपस के संबंध पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे। तथा जिन लोगों ने अनुसरण किया था, कहेंगे : काश! हमारे लिए एक बार पुनः (संसार में) जाना होता, तो हम इनसे वैसे ही बिल्कुल अलग हो जाते, जैसे ये हमसे बिल्कुल अलग हो गए। ऐसे ही अल्लाह उनके कर्मों को उनके लिए अफ़सोस बनाकर दिखाएगा और वे किसी भी तरह आग से निकलने वाले नहीं हैं।" [सूरा अल-बक़रा : 165-167], इस बहस से साबित होता है कि दुनया में जिन का अनुसरण किया गया था वे क़यामत के दिन अपने अनुसरणकारियों से दामन छुड़ा लेंगे। लेकिन इससे उनको कोई लाभ नहीं होगा और अल्लाह दोनों प्रकार के लोगों को जहन्नम में डाल देगा।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, तो कहेगा : कहाँ हैं मेरे वे साझी, जो तुम दावा करते थे? वे लोग कहेंगे जिनपर बात सिद्ध हो चुकी : ऐ हमारे रब! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने गुमराह किया, हमने उन्हें उसी तरह गुमराह किया जैसे हम गुमराह हुए। हम तेरे सामने (इनसे) अलग होने की घोषणा करते हैं। ये हमारी तो पूजा नहीं करते थे। तथा कहा जाएगा : अपने साझियों को पुकारो। तो वे उन्हें पुकारेंगे, परंतु वे उन्हें उत्तर न देंगे। तथा वे यातना को देखेंगे, (तो कामना करेंगे) काश कि उन्होंने मार्गदर्शन स्वीकार किया होता। और जिस दिन वह (अल्लाह) उन्हें पुकारेगा, फिर कहेगा : तुमने रसूलों को क्या उत्तर दिया? तो उस दिन उनसे सब बातें लुप्त हो जाएँगी, इसलिए वे एक-दूसरे से (भी) नहीं पूछेंगे।" [सूरा अल-क़सस : 62-66] इस बहस से साबित होता है कि दुनया में जिनका अनुसरण किया गया था वे लोग क़यामत के दिन अपने अनुसरणकारियों से दामन छुड़ा लेंगे। वे कहेंगे कि ये लोग हमारी इबादत करते ही नहीं थे। ऐसे में इबादत करने वालों से कहा जाएगा कि उन लोगों को पुकारो, जिनका तुम दुनिया में अनुसरण किया करते थे। चुनांचे उनको पुकारेंगे, मगर उनको कोई जवाब न मिल पाएगा। इस बहस का नतीजा जो भी हो, उन तमाम लोगों का ठिकाना जहन्नम होगा।

जब जहन्नम के हक़दार लोग जहन्नम में दाख़िल हो जाएँगे, तो इबलीस उनको शर्मसार करने और उनसे अपना दामन छुड़ाने के लिए कहेगा कि उसका उनपर कोई आधिपत्य नहीं था। बस उसने उनको बुलाया था और उन लोगों ने पीछे चलना शुरू कर दिया था। वह उनसे कहेगा कि वे उसकी निंदा करने की बजाय खुद अपनी निंदा करें। जिस तरह वह खुद अपने आपको बचा नहीं सकता, उस तरह उनको भी बचा नहीं सकता। इसके बारे में बताते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और जब निर्णय कर दिया जाएगा, तो शैतान कहेगा : निःसंदेह अल्लाह ने तुमसे सच्चा वादा किया था। और मैंने (भी) तुमसे वादा किया था, तो मैंने तुमसे वादा-खिलाफ़ी की। और मेरा तुमपर कोई आधिपत्य नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने तुम्हें (अपनी ओर) बुलाया, तो तुमने मेरी बात मान ली। अब मेरी निंदा न करो, बल्कि स्वयं अपनी निंदा करो। न मैं तुम्हारी फ़रयाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रयाद सुन सकते हो। निःसंदेह मैं उसका इनकार करता हूँ, जो तुमने इससे पहले मुझे साझी बनाया। निश्चय अत्याचारियों के लिए दर्दनाक यातना है।'' [सूरा इबराहीम : 22]

क़यामत के दिन बहुस-सी बहसें होंगी और यह विषय बड़ा विस्तृत है। इनमें से बहुत-सी बातों का ज़िक्र पवित्र क़ुरआन में हुआ है। हमने जितना लिखा है, वह इसके एक भाग से अवगत होने के लिए काफ़ी है।

छठी परिचर्चा : दोबारा उठाए जाने, हिसाब व किताब होने और प्रतिफल दिए जाने के प्रमाण

इस अति महत्वपूर्ण विषय, कायनात में घटित होने वाली सबसे बड़ी, ख़ौफ़नाक और भयावह घटना के बारे में अल्लाह ने इतने तार्किक शरई प्रमाण प्रस्तुत कर दिए हैं कि सत्य की तलाश करने वाले एक न्यायप्रीय एवं विकेवी व्यक्ति के ईमान लाने के लिए काफ़ी हैं। अल्लाह के द्वारा पवित्र क़ुरआन में उल्लिखित इन तार्किक प्रमाणों से इन्सान का हृदय संतुष्ट हो जाता है और उसकी अक़्ल तृप्त हो जाती है। इनसे सामने आने वाले नतीजे को ठुकराना संभव नहीं रहता। ये प्रमाण बड़ी संख्या में मौजूद हैं। कुछ प्रमाणों का ज़िक्र हम यहाँ करने जा रहे हैं। क्योंकि यह एक संक्षिप्त पुस्तक है, जिसमें लंबी बात करने और सारे प्रमाणों का उल्लेख करने की गुंजाइश नहीं है। कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं :

पहला प्रमाण : जिसने इन्सान को मिट्टी से पहली बार पैदा किया और उसमें आत्मा डाली, वह इन्सान के मर जाने और मिट्टी हो जाने के बाद उसे दोबारा पैदा करने से विवश नहीं हो सकता। जिस रब ने उसे पहली बार पैदा किया, वह उसे दूसरी बार पैदा करने की क्षमता रखता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और उसने हमारे लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया, और अपनी रचना को भूल गया। उसने कहा : इन अस्थियों को कौन जीवित करेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी? आप कह दें : उन्हें वही (अल्लाह) जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है।'' [सूरा यासीन : 78-79]

दूसरा प्रमाण : जिस रब ने इन्सान को पानी की एक बूँद से पैदा किया, उसके शरीर के ये अंग बनाए और उसे सुंदर रंग-रूप प्रदान किया, वह उसे मौत के बाद दोबारा पैदा कर सकता है। क्योंकि दूसरी रचना पहली रचना से कहीं आसान है। हालाँकि अल्लाह के लिए सब कुछ आसान है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''और वही अल्लाह है जो पहली बार पैदा करता है, फिर उसे वह दोबारा (पैदा) करेगा और यह उस पर अधिक आसान है।'' [सूरा अल-रूम : 27], एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "उसने मनुष्य को एक बूँद वीर्य से पैदा किया। फिर अकस्मात् वह खुला झगड़ालू बन गया।" [सूरा अल-नह्ल : 4], एक अन्य स्थान में उसका फ़रमान है : "तो क्या तुमने उस वीर्य पर विचार किया, जो तुम टपकाते हो? क्या तुम उसे पैदा करते हो, या हम ही पैदा करने वाले हैं? हम ही ने तुम्हारे बीच मृत्यु का समय निश्चित किया है और हम कदापि विवश नहीं हैं। कि हम तुम्हारे रूप को परिवर्तित कर दें और तुम्हें ऐसी शक्ल-सूरत में पैदा कर दें, जिसे तुम नहीं जानते। तथा निश्चय ही तुम पहली पैदाइश को जान चुके हो, फिर तुम नसीहत ग्रहण क्यों नहीं करते?" [सूरा अल-वाक़िआ : 58-62], हर विवाहित इन्सान, जिसे अल्लाह ने बच्चा दिया हो, इस स्पष्ट प्रमाण को समझ सकता है। कौन माँ के पेट में भ्रूण को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में ले जाता है? वीर्य की एक बूँद से रक्त के थक्के में और रक्त के थक्के से मांस की बोटी में और मांस की बोटी से एक संपूर्ण एवं सुंदर रचना में? क्या पति-पत्नी ऐसा कर सकते हैं? अगर नहीं, तो जिसने वीर्य की एक बूँद से इन्सान को पैदा किया वह निश्चित रूप से उसे दोबारा पैदा कर सकता है।

तीसरा प्रमाण : जिस महान रब ने आकाशों, धरती, सारे ब्रह्मांडों एवं ग्रहों को पैदा किया है, वह इन्सान को दोबारा जीवित करके उठाने और एक स्थान में जमा करने की शक्ति रखता है। क्योंकि उसे पैदा करना इन बड़ी-बड़ी सृष्टियों को पैदा करने से कहीं आसान है। ज़ाहिर सी बात है कि जो बड़े को पैदा कर सकता है, वह छोटे को पैदा कर ही सकता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा क्या उन्होंने नहीं देखा कि निःसंदेह वह अल्लाह, जिसने आकाशों और धरती को बनाया और उन्हें बनाने से नहीं थका, वह मरे हुए लोगों को पुनर्जीवित करने में सक्षम है? क्यों नहीं! निश्चय वह हर चीज में पूर्ण सक्षम है।" [सूरा अल-अहक़ाफ़ : 33]

चौथा प्रमाण : हम देखते हैं कि ज़मीन मरी पड़ी है। उसमें पेड़-पौधे और हरियाली नहीं हैं। फिर आकाश से बारिश होती है और ज़मीन जीवित होकर हरी-भरी दिखने लगती है। अब प्रश्न उठता है कि ज़मीन को जीवित किसने किया और उसे हरा-भरा किसने बनाया? निश्चय ही इस मृत भूमी को जीवित करने वाला इन्सान को मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करके उठाने की शक्ति रखता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''तथा उसकी निशानियों में से है कि आप धरती को सूखी हुई (बंजर) देखते हैं। फिर जब हम उसपर बारिश बरसाते हैं, तो वह हरित हो जाती है और बढ़ने लगती है। निःसंदेह जिस (अल्लाह) ने उसे जीवित किया, वह मुर्दों को अवश्य जीवित करने वाला है। निःसंदेह वह हर चीज़ पर समार्थ्यवान् है।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 39], एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! यदि तुम (मरणोपरांत) उठाए जाने के बारे में किसी संदेह में हो, तो निःसंदेह हमने तुम्हें तुच्छ मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य की एक बूँद से, फिर रक्त के थक्के से, फिर माँस की एक बोटी से, जो चित्रित तथा चित्र विहीन होती है, ताकि हम तुम्हारे लिए (अपनी शक्ति को) स्पष्ट कर दें, और हम जिसे चाहते हैं गर्भाशयों में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर हम तुम्हें एक शिशु के रूप में निकालते हैं, फिर ताकि तुम अपनी जवानी को पहुँचो, और तुममें से कोई वह है जो उठा लिया जाता है, और तुममें से कोई वह है जो अत्यंत दयनीय अवस्था की ओर लौटाया जाता है, ताकि वह जानने के बाद कुछ न जाने। तथा तुम धरती को सूखी (मृत) देखते हो, फिर जब हम उसपर पानी उतारते हैं, तो वह लहलहाती है और उभरती है तथा हर प्रकार की सुदृश्य वनस्पतियाँ उगाती है। यह इसलिए है कि अल्लाह ही सत्य है और (इसलिए कि) वही मुर्दों को जीवित करेगा और (इसलिए कि) वह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। और (इसलिए कि) क़ियामत आने वाली है, उसमें कोई संदेह नहीं और (इसलिए कि) निश्चय अल्लाह उन लोगों को उठाएगा जो क़ब्रों में हैं।" [सूरा अल-हज्ज : 5-7] इन आयतों में दोबारा जीवित करके उठाए जाने के बहुत-से प्रमाण मौजूद हैं। वीर्य का विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रते हुए एक संपूर्ण एवं सुंदर इन्सान बन जाना और भूमि का मृत पड़े रहने के बाद जीवित होकर लहलहा उठना इन्सान के दोबारा उठाए जाने के स्पष्ट प्रमाण हैं।

पाँचवाँ प्रमाण : किसान बीज खरीदता है, उसे मिट्टी में डालता है, सिंचाई करता है और पौधा निकलने तथा फल देने का इंतेज़ार करता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बीज को मिट्टी में डाल दिए जाने और उसपर पानी पड़ जाने के बाद उसे सड़ने से कौन बचाता है, बीज से अनाज, फल तथा इन्सानों एवं जानवरों के लिए खाने की चीज़ें कौन निकालता है? निश्चित रूप से यह सब कुछ अल्लाह करता है, जो मुर्दों को जीवित करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर क्या तुमने उसपर विचार किया जो कुछ तुम बोते हो? क्या तुम उसे उगाते हो, या हम ही उगाने वाले हैं? यदि हम चाहें, तो अवश्य उसे चूर-चूर कर दें, फिर तुम आश्चर्य करते रह जाओ।" [सूरा अल-वाक़िआ : 63-65] क्या किसान ही मिट्टी में दाना डालकर फसल उगाता है या पवित्र एवं महान अल्लाह दाने से पौधा निकालकर उससे फल और अनाज पैदा करता है? हर गाँव और हर खेत में बार-बार दिखने वाला यह दृश्य दोबारा जीवित होकर उठाए जाने का एक स्पष्ट प्रमाण है। खेती-बाड़ी की इस प्रक्रिया से कोई अनभिज्ञ नहीं है। भोजन प्राप्त करने के लिए सभी लोग खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं। ऐसे में इन्सान का क्या किया जाए, जो खेती-बाड़ी की इस प्रक्रिया से अवगत होने के बावजूद उसी जैसी चीज़ दोबारा उठाए जाने का इनकार कर देता है?

छठा प्रमाण : अल्लाह ने इन्सान को चुनौती दी है और उसकी विवशता ज़ाहिर की है। क्योंकि उसका दावा है कि अल्लाह मरे हुए लोगों को दोबारा जीवित करके नहीं उठाएगा और उनसे हिसाब नहीं लेगा। इस लिए अल्लाह ने एक ऐसी चीज़ का ज़िक्र कर दिया, जिसे वह देख रहा है। यानी मौत और आत्मा को निकाला जाना। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर क्यों नहीं जब वह (प्राण) गले को पहुँच जाता है। और तुम उस समय देखते रहते हो। तथा हम तुमसे अधिक उसके निकट होते हैं, परंतु तुम नहीं देखते। तो अगर तुम (किसी के) अधीन नहीं हो, तो क्यों नहीं। तुम उसे वापस ले आते, यदि तुम सच्चे हो?" [सूरा अल-वाक़िआ : 83-87] इन आयतों में सर्वशक्तिमान एवं महान रब उनकी विवशता को रेखांकित करते हुए उनसे कहता है : अगर तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुमको दोबारा जीवित करके उठाया नहीं जाएगा, तो प्राण को शरीर छोड़ने से रोककर दिखाओ और जब गले तक प्राण पहुँच जाए, तो उसे दोबारा लौटा कर अपनी सच्चाई साबित करो।

अगर इन्सान यह दावा करता है कि उसे दोबारा उठाया नहीं जाएगा और उसका हिसाब-किताब नहीं होना है, तो वह मौत को रोककर और प्राण जब गले तक आ जाए, तो उसे लौटाकर दिखाए। अगर वह ऐसा नहीं कर सकता, तो इसका मतलब यह है कि उसे हिसाब-किताब के मरहले से गुज़रना है।

ताहिर बिन आशूर रहिमहुल्लाह कहते हैं : (प्राण के शरीर परित्याग करते समय उसे वापस लौटाने में उनकी असमर्थता, उन्हें इस तथ्य के प्रति सचेत करती है कि यह परित्याग इस कायनात की रचना व्यवस्था का एक अंग है और इसके पीछ हिकमत मौजूद है। क्योंकि अल्लाह ने तुमको बता दिया है कि वह लोगों को उनके कर्मों का प्रतिफल प्रदान करेगा। इसी के मद्देनज़र वह उनको मौत के बाद दोबारा जीवित करेगा, ताकि उन्हें प्रतिफल दिया जा सके। बलपूर्वक प्राण निकालकर तुम्हें यह दिखा भी दिया गया है। अगर तुम्हारा यह दावा दुरुस्त होता कि तुमको मौत के बाद कोई प्रतिफल नहीं दिया जाना है, तो प्राण शरीर ही में बाक़ी रह जाते। क्योंकि प्राण निकालने का कोई फ़ायदा न होता। इसके पीछे बस एक ही हिकमत है। हिकमत यह है कि इन्सान को एक दूसरे जीवन की ओर ले जाया जाए, जहाँ उसे पहले जीवन में किए हुए कर्मों का प्रतिफल दिया जाए।) [68]

शैख़ सादी अपनी तफ़सीर में कहते हैं : "फिर क्यों नहीं जब वह (प्राण) गले को पहुँच जाता है। और तुम उस समय देखते रहते हो। तथा हम तुमसे अधिक उसके निकट होते हैं, परंतु तुम नहीं देखते।" यानी ऐसा क्यों नहीं है कि जब प्राण गले तक पहुँच जाए, तुम मौत के निकट पहुँचे हुए व्यक्ति को उस अवस्था में देख रहे हो और सच्चाई यह है कि उस समय हम अपने ज्ञान एवं फ़रिश्तों द्वारा तुमसे भी कहीं ज़्यादा उससे निकट होते हैं, परन्तु तुम देख नहीं सकते। [अल-तहरीर व अल-तनवीर : 27/342]

"तो अगर तुम (किसी के) अधीन नहीं हो, तो क्यों नहीं।" यानी जब तुम यह दावा करते हो कि तुमको जीवित करके उठाया नहीं जाएगा और तुमको हिसाब-किताब एवं प्रतिफल के मर्हलों से नहीं गुज़रना है,

तो प्राण को शरीर में लौटा क्यों नहीं देते? "यदि तुम सच्चे हो।" जब तुम इस बात का इक़रार करते हो कि तुम प्राण को शरीर तक लौटाने में असमर्थ हो, तो या तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए सत्य को मान लो या फिर द्वेष के मार्ग पर चल पड़ो तो तुम अपनी स्थिति और अपने बुरे अंजाम को जान लोगे।] [69]

दसवाँ अनुभाग : अल्लाह पर ईमान, उसके आगे समर्पण और इस्लाम धर्म ग्रहण करने का फल [तैसीर अल-करीम अल-रहमान : 836]

इन्सान अल्लाह पर ईमान लाने, अपने उत्पत्तिकार के आगे समर्पण, नबियों एवं रसूलों के मार्ग पर चलने और अल्लाह के दीन इस्लाम में प्रवेश करने के जो सुखद परिणाम प्राप्त करता है, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है। यहाँ कुछ बातों का ज़िक्र किया जा रहा है :

1- इस संसार का सबसे बड़ा सत्य अल्लाह पर रब, उत्पत्तिकार एवं पूज्य के रूप में विश्वास है। जबकि इस संसार का सबसे सम्मानीय ज्ञान जीवन, ज्ञान एवं उपकार प्रदान करने वाले अल्लाह के बारे में ज्ञान प्राप्त करना है। अतः जिसने अल्लाह पर विश्वास रखा, रसूलों के मार्ग का अनुसरण किया और अल्लाह के दीन में प्रवेश किया, उसने इस कायनात के सबसे बड़े सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लिया और वह सबसे उत्तम मार्ग पर चल पड़ा, जो अल्लाह की ओर एवं अनंत खुशियों की ओर ले जाता है। इसके विपरीत जिसने इस अवसर को हाथ से जाने दिया, उसने अज्ञानता के साथ और सबसे बड़े ज्ञान एवं सम्मान से अनभिज्ञ होकर जीवन बिताया। वह ज्ञान, ईमान और जीवन जीने के सही तरीक़े से वंचित रहा। उसने खुद को ऐसे निश्चेत, अज्ञान, संदेह में पड़े हुए और भ्रमित लोगों में कर लिया, जिनको पता ही नहीं कि क्यों पैदा किए गए हैं, किसके द्वारा पैदा किए गए हैं, जाना कहाँ हैं, इस जीवन का कोई उद्देश्य है या नहीं और सफल लोग उसे प्राप्त कर सकेंगे या नहीं?

2- अल्लाह पर ईमान रखने में अल्लाह की किताबों पर ईमान लाना शामिल है। इनमें सबसे उत्कृष्ट किताब पवित्र क़ुरआन है, जो आज तक ही नहीं, बल्कि क़यामत के दिन तक बाक़ी रहेगा। पवित्र क़ुरआन आज भी उसी भाषा में सुरक्षित है, जिसमें अल्लाह के यहाँ से उतरा है। जिसने अल्लाह पर ईमान रखा, उसकी किताबों एवं रसूलों पर ईमान रखा और महान क़ुरआन को पढ़ा, उसने बड़ी सफलता प्राप्त कर ली। सच तो यह है कि लोग किसी भी पुरानी किताब को प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और प्राप्त हो जाने पर उसपर फ़ख़्र करते हैं, जब वह अपनी मूल प्रति में मौजूद हो, चाहे उसकी विषय-वस्तु में उसकी रुचि न भी हो। ऐसे में उस किताब से अवगत होने की ललक और उसपर ईमान लाने की चाहत कितनी होनी चाहिए, जो अल्लाह की उतारी हुई हो और अवतरण काल से आज तक सुरक्षित रही हो?

4- अल्लाह पर ईमान में अल्लाह के रसूलों पर ईमान शामिल है। सबसे श्रेष्ठ रसूल, बल्कि तमाम रसूलों के सरदार मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। अल्लाह की क़सम, जीवन की सबसे बड़ी पूंजी और कमाई यह है कि इन्सान इस रसूल को जाने, उसपर ईमान ले आए, उसका अनुसरण करे और उसकी प्रतिष्ठा जाने। जबकि जीवन का सबसे बड़ा घाटा यह है कि इन्सान दुनिया से विदा हो जाए और रसूलों के रास्ते को न जाने, उनके बताए हुए मार्ग पर न चले और उनका अनुसरण न करे।

4- अल्लाह पर ईमान में उसके दिए हुए विधान एवं उसके उतारे हुए दीन पर ईमान शामिल है। दरअसल यह सबसे महान दीन एवं सबसे संपूर्ण विधान है। जिसने इसपर ईमान रखा, वह सफल हो गया। इन्सान का सौभाग्य है कि वह इस धरती पर चले तो अपने रब पर विश्वास रखे और अल्लाह के दीन का पालन करे। वह अपने रब से संतुष्ट हो और उसका रब उससे संतुष्ट हो। इसके विपरीत जो अल्लाह पर ईमान तथा उसके दीन एवं उसकी शरीयत से वंचित रहा, वह निश्चित रूप से अल्लाह के क्रोध और नाराज़ी का भागीदार बनेगा।

5- अल्लाह पर ईमान इन्सान को स्वच्छ जीवन प्रदान करता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत करायेंगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।" [सूरा अल-नह्ल : 97], उसे आसानी एवं कुशादगी प्राप्त होती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर जिसने (दान) दिया और (अवज्ञा से) बचा। और सबसे अच्छी बात को सत्य माना। तो निश्चय हम उसके लिए भलाई को आसान कर देंगे।" [सूरा अल-लैल : 5-7] वह भ्रम, संश्य एवं संदेह आदि से मुक्त रहता है। क्योंकि अपने आस-पास की तमाम चीज़ों, मौत के बाद की परिस्थितियों और क़यामत के दिन मिलने वाली चीज़ों के बारे में पूरे तौर पर आश्वस्त रहता है। और यह ऐसी दौलत है, जो उसी को प्राप्त होती है, जिसके पास अल्लाह पर विश्वास की पूंजी हो।

6- दुनिया का जीवन अंतिम जीवन नहीं है और इसमें आने वाली मौत स्थायी अंत नहीं है। इन्सान को दोबारा जीवित होकर उठना है, एक स्थान पर जमा होना है, हिसाब-किताब के मर्हले से गुज़रना है और प्रतिफल प्राप्त करना है। हम पीछे बयान कर आए हैं कि क़यामत के दिन लोग दो समूहों में बट जाएँगे। एक समूह जन्नत जाएगा और एक समूह जहन्नम। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा इसी प्रकार, हमने आपकी ओर अरबी क़ुरआन की वह़्य (प्रकाशना) भेजी है, ताकि आप मक्का वासियों को और उसके आस-पास के लोगों को सावधान कर दें, और एकत्र होने के दिन से सचेत कर दें, जिसमें कोई संदेह नहीं। एक समूह जन्नत में तथा एक समूह भड़कती आग में होगा।" [सूरा अल-शूरा : 7] जो अल्लाह पर विश्वास रखेगा और अच्छा अमल करेगा, उसे शास्वत नेमतें प्राप्त होंगी और जो अविश्वास के मार्ग पर चलेगा और अभिमान दिखाएगा, उसे जहन्नम जाना और यातना का शिकार होना पड़ेगा। अतः एक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि उस काम को न छोड़े, जिसमें उसका लाभ एवं हित हो और उस चीज़ से खुद को अलग रखे, जिसका ग़लत होना और बुरा अंजाम स्पष्ट हो गया हो।

इस किताब के अंत में हम बताना चाहेंगे कि हर समय, देश और क्षेत्र का इन्सान, बल्कि पूरा मानव समाज अलग-अलग प्रकार के विचार और लक्ष्य रखता आया है, अलग-अलग परिवेश से संबंध रखता रहा है और अलग-अलग प्रकार के काम करता आया है। अतः उसे निर्देशित करने के लिए एक मार्गदर्शक, एकजुट करने के लिए एक व्यवस्था और उसकी रक्षा के लिए एक शासक की आवश्यकता है। यही काम अल्लाह के रसूल गण अल्लाह की वह्य के मार्गदर्शन में करते आए हैं। वे लोगों को नेकी और भलाई का रास्ता बताते, अल्लाह की शरीयत पर एकत्र करते और उनके दरमियान न्याय के साथ निर्णय करते थे। ऐसे में लोगों द्वारा उनके आह्वान को स्वीकार किए जाने और उनके आगमन के दौर से निकटता के अनुसार लोगों के आचार-विचार ठीक रहते। अल्लाह ने रसूलों के आगमन के सिलसिले को अंतिम रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन के साथ समाप्त कर दिया और आपके संदेश को एक शाश्वत संदेश बना दिया। आपका संदेश लोगों के लिए रहमत और प्रकाश है तथा अल्लाह की ओर ले जाने वाले मार्ग का मार्गदर्शन करता है।

अतः आपसे आग्रह है कि रीति-रिवाजों एवं आदतों के बंधनों से दामन झाड़कर सच्चे मन से अल्लाह के लिए खड़े हो जाएँ। दिल में इस बात का विश्वास रखें कि मरने के बाद अपने रब की ओर लौटकर जाना है। खुद अपनी हस्ती और अपने चारों ओर के ब्रह्मांड पर ग़ौर करें। फिर मुसलमान हो जाएँ। दुनिया एवं आख़िरत दोनों जगहों में खुश रहेंगे। मैं आपको आपके और दूसरों के लिए अल्लाह की ओर बुलाता हूँ, जैसा पवित्र क़ुरआन की इस आयत में है : "आप कह दें : मैं बस तुम्हें एक बात की नसीहत करता हूँ कि तुम अल्लाह के लिए दो-दो तथा अकेले-अकेले खड़े हो जाओ। फिर सोचो। तुम्हारे साथी में कोई पागलपन नहीं है। वह तो केवल तुम्हें एक कठोर यातना के आने से पहले डराने वाला है।" [सूरा सबा : 46] आपसे आग्रह है कि तंहाई में खुद अपने तथा उस सच्चे धर्म के बारे में सोचें, जो आपके पास आया है। अगर अच्छा लगे, तो मुलमान हो जाएँ, खुश रहेंगे।

अगर आप इस्लाम में प्रवेश करना चाहें, तो आपको बस इतना करना है कि इस बात की गवाही दे दें कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूजे नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, अल्लाह के अतिरिक्त पूजी जाने वाली तमाम चीज़ों से खुद को अलग कर लें, इस बात पर ईमान रखें कि अल्लाह क़ब्रों में दफ़न लोगों को जीवित करके उठाएगा और हिसाब-किताब के बाद सब को उनके कर्मों का प्रतिफल प्रदान करेगा। इन बातों की गवाही देने के बाद आप मुसलमान हो गए। इसके बाद आप वह इबादतें करें, जिनका आदेश अल्लाह ने दिया है। जैसे नमाज़, ज़कात, रोज़ा और सक्षम होने पर हज। फिर इस्लाम के विधान सीखें, जिनका पालन करना ज़रूरी है।

समापण

सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसकी अनुकंपा से अच्छे कार्य संपन्न होते हैं। हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसके रब होने, नामों, गुणों एवं पूज्य होने में उसका कोई साझी नहीं है। हम गवाही देते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और रसूल हैं। उन्होंने अमानतदारी के साथ अपना काम किया, लोगों को सत्य का मार्ग दिखाया और अल्लाह का संदेश पहुँचाया।

इस संक्षिप्त पुस्तक के अंत तक पहुँचने के बाद हम फिर से इस बात का उल्लेख कर देना चाहते हैं कि इस पुस्तक में अल्लाह के रब होने को प्रमाणित करने वाली दलीलें बयान की गई हैं, उसके नामों, गुणों और एकमात्र पूज्य होने का उल्लेख किया गया है, किसी को अल्लाह का साझी ठहराने का खंडन किया गया है और लोगों द्वारा ठहराए गए साझियों से अल्लाह की पवित्रता दिखाई गई है। इसमें हमने बयान कर दिया है कि असत्य धर्मों के बीच कौन-सी बातें समान हैं। इसमें पवित्र क़ुरआन द्वारा मानव जाति से किए प्रश्न भी नक़ल कर दिए गए हैं। दरअसल ये ज्वलंत प्रश्न हैं। जो इन्सान को इस बात पर मजबूर कर देते हैं कि या तो सत्य को ग्रहण कर ले और उसपर ईमान ले आए या फिर द्वेष एवं अभिमान के आधार पर ठुकरा दे। इसमें हमने अल्लाह की ओर से मानव समाज को दी गई कुछ बड़ी-बड़ी चुनौतियों का ज़िक्र किया है। पवित्र क़ुरआन में दी गई इन चुनौतियों से इन्सान सरसरी तौर पर गुज़र नहीं सकता। उसे महान रब (उत्पत्तिकार, स्वामी और प्रबंधक) पर ईमान लाना ही पड़ेगा।

इस किताब में हमने यह भी बताया है कि उत्पत्ति का आरंभ कैसे हुआ और अल्लाह ने इन्सान, जिन्नात और फ़रिश्तों की रचना कैसे की? हमने आकाशीय ग्रंथों, दूतत्व, आकाशीय संदेशों और रसूलों के बारे में भी बात की है। हमने तक़दीर एवं तक़दीर पर ईमान के नतीजों पर भी प्रकाश डाला है।

अंत में आख़िरत यानी क़यामत के दिन तथा उस दिन घटित होने वाली भयावह घटनाओं, प्राप्त होने वाली नेमतों या सामने आने वाली यातनाओं के बारे में बात की है। साथ ही दोबारा उठाए जाने तथा एकत्र किए जाने के तार्किक शरई प्रमाणों का भी उल्लेख कर दिया है।

हमने इस किताब का समापण उन सुखद परिणामों के उल्लेख के साथ किया है, जो इन्सान को महान अल्लाह पर ईमान के कारण प्राप्त होते हैं। दुआ है कि अल्लाह इस किताब को विशुद्ध रूप से अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का साधन, अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत के अनुरूप, अल्लाह के बंदों के लिए लाभदायक एवं उसके दीन तथा सीधे मार्ग की ओर ले जाने वाली किताब बनाए।

दुआ है कि अल्लाह भटके हुए हर व्यक्ति को सीधा मार्ग दिखा दे, सत्य की ओर लौटा दे, उसे खुद अपनी आत्मा की बुराई एवं शैतान की बुराई से बचाए, सीधे रास्ते पर चलने वालों को सुदृढ़ रखे, सीधा मार्ग प्राप्त होने की इस नेमत पर, जो दरअसल एक बहुत बड़ी नेमत है, अल्लाह का शुक्र अदा करने और उसपर क़ायम रहने के उपाय करने का सुयोग प्रदान करे।

दुआ है कि हमारा अमल अल्लाह की शरीयत के अनुरूप हो, विशुद्ध रूप से उसकी प्रसन्नता की प्राप्ति की दिशा में गतिमान रहे तथा अल्लाह हमें एवं हमारे माता-पिता को क्षमा करे।

सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जो इस संसार का रब है। दरूद व सलाम हो उस नबी पर, जो इस संसार के लिए दया के तौर पर भेजे गए थे।