لماذا الإسلام؟

لماذا الإسلام؟

لماذا الإسلام؟ الإسلام يُقنع العقل الباحث عن الحقيقة بوجود إله واحد خالق للكون، ويلبي فطرة الإنسان ويحقق له السلام الداخلي والسعادة في الدنيا والآخرة. الإسلام يدعو إلى الأخلاق الكريمة والمعاملات الطيبة، ويوجه الإنسان لتحقيق غايته الحقيقية بعبادة الله وحده، مما يؤدي به إلى الجنة والنجاة من النار يوم القيامة.

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इस्लाम ही क्यों?

भाषाः अरबी

सबसे बड़ी विशेषता जिससे मनुष्य शेष सारे जीवों में उत्कृष्ट ठहरता है, वह विवेक है और विवेक एवं बुद्धि का अस्ल काम सोच-विचार करना है।

एक गैर-मुस्लिम पूछ सकता हैः मैं इस्लाम धर्म क्यों ग्रहण करूँ?

मुझे कौन सी चीज़ अपने धर्म को छोड़ने और इस्लाम धर्म में दाखिल होने के लिए प्रेरित कर सकती है?

कौन सी चीज मुझे यह संकल्प लेने पर उत्साहित कर सकती है?

इसका जवाब हैः

1- तुम इस्लाम स्वीकार करोगे ताकि तुम सच्चाई को तलाश करने वाले अपने विवेक को संतुष्ट कर सको।

क्योंकि बुद्धिमान मनुष्य यदि किसी बाहरी दबाव से मुक्त निरपेक्ष होकर अपने अविकृत विवेक से सोचे तो वह मालूम कर सकता है कि इस्लाम के अतिरिक्त वह जिस धर्म में आस्था एवं विश्वास रखता है, एक ऐसा असत्य धर्म है जिसे विवेक ग्रहण नहीं करता है।

क्या अक्ल इस बात को कबूल कर सकती है कि पत्थर या ताम्र या स्वर्ण से बनी कोई मूर्ति ऐसा ईश्वर हो सकती है जिसने समस्त आकाशों एवं धरती को पैदा किया है?

क्या वह नहीं जानता है कि वह मूर्ति पहाड़ से तराशा हुआ एक पत्थर है जो पहाड़ के अन्य पत्थरों से जरा भी भिन्न नहीं है?

क्या विवेक यह कबूल करता है कि मनुष्य अपने ही जैसे किसी मनुष्य को पूजे?

रही बात इस्लाम की तो उसकी नजर में ईश्वर वह स्रष्टा अल्लाह है जिसने समस्त आसमानों और धरती को रचा है, जो सारे मनुष्य, जिन्न तथा जीवों को रोज़ी देता है और इसीलिए वही अकेला इस बात का हकदार है कि उसकी इबादत और उपासना की जाए।

बुद्धिमान मनुष्य जब अपने आस-पास की दुनिया पर चिंतन-मनन की नजर डालता है तो पाता है कि हर चीज अल्लाह के अस्तित्व और उसकी इबादत की हकदारी पर साक्षी है। आकाश से लेकर धरती तक, ब्रह्मांड की हर चीज अल्लाह के अस्तित्व और उसके एक होने की गवाही देती है। आकाश और उसमें ग्रहों, तारों और आकाशगंगाओं के रूप में जो कुछ भी है, धरती और उसमें पहाड़ों, नहरों, रात-दिन, घास-फूस, खेत-फसल और इंसानी दुनिया के रूप में जो कुछ भी है, अल्लाह तआला के अस्तित्व और उसके केवल एक होने की गवाही देता है। इसलिए, अल्लाह तआला का कथन हैः (तथा धरती में बहुत-सी निशानियाँ हैं विश्वास करने वालों के लिए) (तथा स्वयं तुम्हारे भीतर (भी), फिर क्या तुम देखते नहीं?) सूरा अज़-ज़ारियात, आयत संख्याः 20-21

2- तुम इस्लाम ग्रहण करोगे ताकि तुम अपनी आत्मा को संतुष्ट कर सकोः

हर इंसान इस्लामी प्रकृति पर पैदा किया गया है। उसे उसके माता-पिता ने दूसरे धर्म की तरफ फेर कर उसकी प्रकृति को बदला है, लेकिन आत्मा अपनी उस वास्तविक प्रकृति की ओर खिंचती रहती है जिसपर उसे पैदा किया गया है और वह केवल इस्लाम धर्म है।

यदि हम दो धर्मों के बीच तुलना करें तो

एक धर्म कहता है कि सिर्फ उस एक अल्लाह की उपासना करो जिसे पूरा कमाल हासिल है (उसमें किसी भी तरह की कोई कमी नहीं है) और वही सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रचयिता, जीविका देने वाला और अमर है जिसे कभी भी मौत नहीं आ सकती।

जबकि दूसरा धर्म कहता है कि ईश्वर विवश होता है, बीमार होता है और मरता भी है।

तो अब बताया जाए कि दोनों में से कौन सा धर्म विवेक और प्रकृति से मेल खाता है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि केवल इस्लाम ही विवेक और प्रकृति से मेल खाता है और यही वह प्रकृति है जिसपर अल्लाह ने तमाम इनसानों को पैदा किया है।

3- तुम इस्लाम कबूल करोगे ताकि तुम्हें आंतरिक शांति और हृदय-मुक्ति का अनुभव हो सके।

यह सच है कि इस्लाम मन की शांति, हृदय-मुक्ति और आंतरिक राहत का सामान है और इसे इस्लाम कबूल करने वाले बहुत सारे लोगों ने स्वीकारा भी है।

उनमें से एक व्यक्ति कहता है कि जब मैंने इस्लाम कबूल किया और गवाही के शब्दों का उच्चारण किया तो लगा कि मेरी आत्मा एक प्रकाश और शांति से भर उठी है और मैं अल्लाह से प्रार्थना करता हूँ कि वह तमाम लोगों के दिलों को इस धर्म में प्रवेश पाने के लिए खोल दे ताकि वे दुनिया में प्रसन्नता और क़ियामत के दिन जहन्नम की आग से निजात हासिल कर सकें।

निस्संदेह, महान इस्लाम धर्म दुनिया एवं आख़िरत दोनों जहानों में सफलता का सूत्राधार है। अल्लाह तआला कहता हैः (जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी, और ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन प्रदान करेंगे और ऐसे लोगों को उनका बदला उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे) सूरा अन-नह्ल : 97

4- तुम इस्लाम स्वीकार करोगे ताकि तुम अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पूरा कर सकोः

तुम्हारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य यह नहीं है कि तुम बस काम करो, धन अर्जित करो, खाओ-पियो और फिर मर जाओ।

तुम्हारे जीवन का मूल उद्देश्य वह है जिसके लिए तुम्हें पैदा किया गया है और तुम्हें इसलिए पैदा किया गया है कि तुम उस अल्लाह की उपासना और इबादत करो और उसे अच्छी तरह जानो-पहचानो जिसने तुम्हें पैदा किया है और तुम्हें रोज़ी दे रहा है। क्योंकि वही है जिसने तुम्हें जिंदगी दी है, वही तुम को मृत्यु भी देगा और फिर प्रलय (क़यामत) के दिन दोबारा जीवित करके उठाएगा, जैसा कि महान अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में फ़रमाया हैः (और मैंने जिन्न और मनुष्य को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबादत करें) (न मैं उनसे जीविका चाहता हूँ, न मेरी यह चाहत है कि वे मुझे खिलाएं) (अल्लाह तो स्वंय ही सबको जीविका प्रदान करने वाला है परम शक्ति और क्षमता वाला है और उसके पास सारी शक्ति और सामर्थ्य है। सूर अज़-ज़ारियातः 56-58

5- तुम इस्लाम स्वीकार करोगे क्योंकि इस्लाम हर प्रकार के सद्गुणों और अच्छे आचणों की ओर बुलाता हैः

इस्लाम का एक बड़ा उद्देश्य, मानवात्मा को बुराइयों से पाक करना और उसे सद्गुणों और अच्छे व्यवहारों से सुसज्जित करना है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (वही है, जिसने निरक्षरों में एक रसूल भेजा उन्हीं में से। जो पढ़कर सुनाते हैं उन्हें अल्लाह की आयतें और पवित्र करते हैं उन्हें तथा शिक्षा देते हैं उन्हें पुस्तक (क़ुरआन) तथा तत्वदर्शिता (सुन्नत) की। यद्यपि वे इससे पूर्व खुली गुमराही में थे) सूरा अल-जुमुआ, आयत संख्या : 2

अर्थात वह उन्हें बहुदेववाद, गुनाहों, जघन्य आचरणों तथा सारी बुराइयों से पाक करता है। अल्लाह के नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया हैः (बेशक मुझे सदाचरणों को पूर्ण रूप देने हेतु प्रेषित किया गया है) जैसे सच्चाई, अमानतदारी, रिश्ता निभाना, पड़ोसी के साथ अच्छा सलूक, न्याय, दानशीलता, लज्जा, क्षमा और किसी को दुख न पहुंचाना आदि।

6- तुम इस्लाम स्वीकार करोगे ताकि तुम आख़िरत (प्रलोक) में सफल हो सकोः

कल्पना करो कि एक आदमी ने एक बड़ा सा भवन बनाया और उसे नई टेक्नोलॉजी के आविष्कृत संसाधनों से सुसज्जित किया और फिर वह भवन बनकर तैयार ही हुआ था कि उसने उसे तोड़ दिया तो क्या उस आदमी को बुद्धिमान कहा जा सकता है?

जब ऐसा काम किसी बुद्धिमान मनुष्य की शान के अनुसार नहीं तो क्या उस अल्लाह की शान के अनुसार हो सकता है जिसने इस ब्रह्मांड को इस बुद्धिमत्ता और विवेकशीलता के साथ बनाए फिर इसे बिना किसी उद्देश्य और लक्ष्य के ध्वस्त कर दे?

महान अल्लाह ने कहा है: (क्या तुमने समझ रखा है कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और तुम हमारी ओर फिर नहीं लौटाए जाओगे?) (तो सर्वोच्च है अल्लाह वास्तविक अधिपति। नहीं है कोई सच्चा पूज्य, परन्तु वही महिमावान अर्श (सिंहासन) का स्वामी) सूरा अल-मोमिनूनः 115-116

बेशक अल्लाह तआला ने तमाम लोगों को अपनी इबादत के लिए पैदा किया है, वही उनको (प्रलय) क़यामत के दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाएगा और उनके कर्मों का हिसाब लेगा। फिर जो ईमान वाला होगा, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और उसमें हमेशा सुख सम्पन्न जीवन गुजारेगा और जिसने अल्लाह के आह्वान और उसके सत्य धर्म को नकारा, वह जहन्नम में प्रवेश करने वालों में से होगा।

इस तरह कहा जा सकता है कि बुद्धिमान इंसान क़यामत के दिन सफल होने के लिए ही इस्लाम स्वीकार करता है ताकि जन्नत में प्रवेश करे और जहन्नम से निजात पा जाए।

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