الوسائل المفيدة للحياة السعيدة
كتاب "الوسائل المفيدة للحياة السعيدة" للشيخ عبد الرحمن بن ناصر السعدي، يتناول مفهوم السعادة الحقيقية التي يسعى لتحقيقها كل إنسان. الكتاب يوضح أن السعادة تتحقق بطاعة الله ورسوله، والعمل الصالح، والإيمان. ويُقسم السعادة إلى دنيوية مؤقتة وأخروية دائمة، ويربط بينهما بالرضا الإلهي للمؤمنين. يعتمد الكتاب على الأدلة الشرعية من القرآن والسنة لتقديم الأسباب المؤدية للسعادة وكيفية تحقيقها، مما يجعله دليلاً للمسلمين لتنظيم حياتهم على بصيرة وإيمان.
सौभाग्यशाली जीवन के उपयोगी साधन
लेखक
शैख़ अब्दुर्रहमान बिन नासिर अस-सादी (रहिमहुल्लाह)
भूमिका
हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो समस्त प्रकार की प्रशंसा का योग्य है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और उसके रसूल हैं। दुरूद एवं सलाम हो उनपर, उनके परिजनों पर तथा उनके समस्त साथियों पर।
अल्लाह की प्रशंसा और उसके रसूल पर दरूद भेजने के बाद हम कहना चाहते हैं कि दुनिया में हर व्यक्ति की कामना होती है कि उसे दिल का चैन व सुकून नसीब हो और वह हर प्रकार के दुःख एवं चिंता से मुक्त रहे, और यही अच्छे जीवन तथा पूर्ण आनंद की आधारशिला है। और इसके कुछ धार्मिक, कुछ भौतिक एवं कुछ व्यवहारिक साधन हैं। ये सारे साधन केवल उसी व्यक्ति के लिए एकत्र हो सकते हैं, जिसके पास ईमान की दौलत हो। दूसरे लोगों को यदि किसी साधन से सुकून प्राप्त होता भी है जिसके लिए उनका बुद्धिजीवी वर्ग रातदिन प्रयत्न करता है, तो दूसरे बहुत से साधनों से वे दूर रह जाते हैं, जो कहीं अधिक उपयोगी, स्थायी और वर्तमान तथा भविष्य में ज्यादा उत्कृष्ट हैं।
परन्तु मैं अपनी इस पुस्तक में इस सर्वोच्च उद्देश्य के, जिसे हर व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है, कुछ साधनों को, जो इस समय मेरे ज़ेहन में हैं, बयान करूंगा।
कुछ लोगों को इनमें से बहुत-से साधन प्राप्त हुए और उन्होंने सुखी और मंगलमय जीवन व्यतीत किया; एवं कुछ लोग इनमें से किसी में भी सफल न हो सके, और उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण और असफल जीवन व्यतीत किया; और कुछ लोग बीच वाली अवस्था में हैं—जितनी अल्लाह ने उन्हें तौफीक प्रदान की उसी के अनुसार। और अल्लाह तआला ही तौफीक प्रदान करने वाला और प्रत्येक भलाई की प्राप्ति तथा प्रत्येक बुराई को दूर करने पर सहायक है ।
अध्याय: ईमान और सत्कर्म
सौभाग्यशाली जीवन का सबसे महान एवं उत्कृष्ट साधन और इसका मूल आधार अल्लाह पर विश्वास और सत्कर्म है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगे। और निश्चय हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे।" [सूरा अन-नह्ल: 97]।
इस आयत में अल्लाह तआला ने यह बताया और इस बात का वचन दिया है कि वह ईमान तथा सत्कर्म करने वालों को इस संसार में सुखमय जीवन के साथ-साथ दुनिया एवं आख़िरत में अच्छा प्रतिफल प्रदान करेगा।
इसका कारण स्पष्ट है : क्योंकि जो लोग आल्लाह तआला पर ऐसा शुद्ध ईमान रखते हैं जो सत्कर्म की ओर प्रेरित करे और हृद, चरित्र और लोक व प्रलोक का सुधार करे उनके पास ऐसे आधार और सिद्धांत होते हैं जिनके कारण वे समस्त प्रकार के हर्ष व आनन्द के कारणों, तथा दुख, चिन्ता और व्याकुलता के कारणों का स्वागत करते हैं।
वे प्रिय एवं आनंददायक चीज़ों को ग्रहण करते हैं, उनपर अल्लाह का आभार व्यक्त करते हैं और उन्हें लाभकारी कार्यों में इस्तेमाल करते हैं। जिसके नतीजे में इन चीजों के आनंद व प्रसन्नता, इनके स्थायित्व और इनमें बरकत की आशा तथा शुक्र करने वालों की नेकी की उम्मीद जैसी कुछ इतनी बड़ी बातें उनके सामने होती हैं कि जिनकी भलाइयां और बरकतें उन आनंददायक चीज़ों से भी बढ़कर होती हैं।
एवं अप्रिय तथा हानिकारक चीज़ों तथा शोक और चिन्ता का सामना उसका प्रतिरोध करके करते हैं, यदि प्रतिरोध सम्भव हो, और जिस को वे हल्का कर सकते हों उसे हल्का कर लेते हैं, और जिस पर उनका बस न चलता हो उस पर सुदृढ़ रूप से धैर्य रखते हैं। जिसके फलस्वरूप उन्हें अप्रिय चीज़ों के लाभदायक प्रतिरोध, उस प्रतिरोध से प्राप्त अनुभव, शक्ति तथा धैर्य और पुण्य की आशा जैसी ऐसी महान चीज़ें हासिल होती हैं जिनके कारण उन अप्रिय चीज़ों का जैसे वजूद ही नहीं रहता और उनका स्थान प्रसन्नताएँ, शुभ कामनाएँ (आशाएँ) तथा अल्लाह की अनुकम्पा और उसके पुण्य की आशा ले लेती है। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहीह हदीस में इसका विवरण करते हुए फ़रमाया : "मोमिन का मामला भी बड़ा अजीब है। उसके हर काम में उसके लिए भलाई है। यदि उसे ख़ुशहाली प्राप्त होती है और वह शुक्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है, और अगर उसे तकलीफ़ पहुँचती है और सब्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है। जबकि यह बात मोमिन के सिवा किसी और के साथ नहीं है"। सहीह मुस्लिम।
इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूचित किया कि मोमिन का फायदा, उसकी भलाई और उसके कर्मों का प्रतिफल उसके जीवन में आने वाली समस्त प्रकार की प्रसन्नताओं और अप्रसन्नताओं में कई गुना बढ़ जाता है। इसी लिए आप दो व्यक्तियों को पाएँगे कि उनके साथ कोई शुभ अथवा अशुभ घटना घटती है तो उसका सामना करने में उनके बीच व्यापक अंतर पाया जाता है, और यह अंतर उन दोनों के ईमान और पुण्य के कार्यों में अंतर के अनुसार होता है। इन दोनों विशेषताओं (ईमान और सत्कर्म) से सुसज्जित व्यक्ति भलाई और बुराई का सामना कृतज्ञता और धैर्य तथा उन दोनों से जुड़ी हुई चीज़ों के साथ करता है, जिससे उसके अन्दर हर्ष और आनन्द उत्पन्न होता है और उसका शोक, चिन्ता, व्याकुलता, सीने की तंगी और दुर्भाग्य समाप्त हो जाता है और उसे इस संसार में शुभ जीवन प्राप्त होता है। और दूसरा व्यक्ति प्रिय वस्तुओं को पाकर घमण्ड, अहंकार और सीमाओं का उल्लंघन करता है, जिसके कारण उसका चरित्र बिगड़ जाता है और वह उन्हें चौपायों के समान लालसा और घबराहट के साथ प्राप्त करता है, इसके उपरान्त उसके हृदय को सुकून नहीं मिलता, बल्कि कई प्रकार से वह परेशान रहता है, अपनी प्रिय वस्तुओं के नष्ट हो जाने के भय से, बहुल विरोधों (टकराव, खिलाफ जैसे अति भोजन स्वास्थ्य के खिलाफ है) से जो अधिकतर उन्हीं (प्रिय वस्तुओं) से जन्म लेते हैं, और इस प्रकार से भी कि हृदय किसी एक सीमा पर नहीं ठहरते हैं, बल्कि नित्य अन्य चीज़ों के लिये प्रलोभित और अभिलाषी रहते हैं, जो कभी प्राप्त हो जाती हैं और कभी प्राप्त होने से रह जाती हैं, और यदि प्राप्त हो भी जायें, तब भी वह उपरोक्त विषयों से परेशान रहता है । तथा अप्रिय चीज़ों का सामना चिंता, बेसब्री, भय और ऊबन के साथ करता है, इसके फलस्वरूप वह जीवन की जिस दुर्भाग्यता और मानसिक तथा स्नायु संबंधी जिन बीमारियों से ग्रस्त होता है उनके बारे में न पूछें और डर के मारे कभी कभी उसकी दशा इतनी बुरी और कष्टदायक हो जाती है कि बताना मुशकिल है, क्योंकि वह किसी प्रतिफल की आशा नहीं रखता और न ही उसके पास धैर्य होता है जो उसका ढारस बंधा सके और उसके शोक को कम कर सके ।
अनुभव इन सारी बातों का साक्षी है। इस प्रकार के किसी एक उदाहरण पर यदि आप चिन्तन करें और उसे लोगों की दशाओं पर फिट करें, तो आप उस मोमिन के बीच जो अपने ईमान के तक़ाज़े के अनुसार कार्य करने वाला है तथा उस व्यक्ति के बीच जो ऐसा नहीं है, व्यापक अन्तर पाएँगे। क्योंकि (इस्लाम) धर्म अल्लाह की प्रदान की हुई जीविका और उसकी ओर से बन्दों को प्राप्त होने वाली कृपा और भिन्न भिन्न प्रकार की अनुकम्पाओं पर संतुष्ट होने की प्रेरणा देता है।
अतः जब कोई मोमिन किसी बीमारी, गरीबी या इस प्रकार की अन्य परिस्थितियों का सामना करता है, जिनका सामना हर इन्सान को करना पड़ता है, तो वह अपने ईमान एवं संतुष्टि की भावना के कारण चिंतामुक्त रहता है। उसके दिल में किसी ऐसी वस्तु का मोह नहीं होता, जो उसे दी न गई हो। वह उन लोगों को देखता है, जो उससे कमज़ोर अवस्था में हैं। उन लोगों को नहीं, जो उससे मज़बूत स्थिति में हैं। ऐसे में कभी-कभी वह तो उन लोगों से भी अधिक खुश रहता है, जिन्हें दुनिया के सारे ऐश व आराम मिले हुए हों, लेकिन संतुष्टि की दौलत न मिली हो।
इसी तरह जो ईमान के तक़ाज़े के अनुरूप अमल नहीं करता, जब उसे निर्धनता का सामना होता है या उसकी कोई सांसारिक इच्छा पूरी नहीं होती, तो वह आपको बेहद दुखी एवं शोक में डूबा हुआ मिलेगा।
एक दूसरा उदाहरण: जब भय के कारण उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को कष्टदायक और चिन्ताजनक चीज़ों का सामना होता है, तो आप शुद्ध ईमान वाले व्यक्ति को इस अवस्था में पाएँगे कि उसका हृदय स्थिर और आश्वस्त है; वह अपने विचार, वचन और कर्म के द्वारा इस पेश आने वाली विपत्ति का उपाय करने और उससे निपटने का सामर्थ्य रखता है; उसने अपने आप को इस कष्टदायक आपदा के लिए तैयार कर रखा है। ये ऐसी अवस्थाएँ हैं जो मनुष्य को सुख और चैन प्रदान करती हैं और उसके हृदय को स्थिर और सुदृढ़ रखती हैं।
दूसरी ओर ईमान रहित व्यक्ति की अवस्था इसके विपरीत होती है। जब भयानक चीज़ें सामने होती हैं तो उसका दिल परेशान हो जाता है, उसकी तंत्रिकाएँ तनावग्रस्त हो जाती हैं, उसके विचार परागंदा हो जाते हैं, उसके भीतर भय और डर समा जाता है, और उसके पास बाहरी भय और आंतरिक व्याकुलता एकत्र हो जाते हैं जिसके तथ्य का वर्णन करना असंभव है। इस प्रकार के लोगों को यदि कुछ प्राकृतिक साधन प्राप्त न हों, जिनमें बड़े अभ्यास की आवश्यकता होती है, तो उनकी शक्तियाँ नष्ट हो जाएँ और उनकी तंत्रिकाएँ तनाव का शिकार हो जाएँ। कारण यह है कि उनके पास वह ईमान नहीं होता है, जो उन्हें सब्र करने पर उभारे, विशेषकर कठिन परिस्थितियों तथा शोकजनक और कष्टदायक हालतों में।
इस प्रकार सदाचारी और दुराचारी, मोमिन और काफ़िर उपार्जित वीरता की प्राप्ति और उस स्वभाव में दोनों साझीदार होते हैं जो भय और डर को न्यून और हलका कर देता है। किन्तु मोमिन को अपने ईमान की शक्ति, अपने धैर्य, अल्लाह पर भरोसा व तवक्कुल, और उसके पुण्य तथा प्रतिफल की आशा के कारण ऐसी विशेषता प्राप्त होती है कि जिससे उसकी वीरता और बढ़ जाती है, उसके भय की तीव्रता कम हो जाती है और उसकी कठिनाईयों दूर हो जीती हैं। जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "यदि तुम्हें पीड़ा होती है, तो निःसंदेह उन्हें भी पीड़ा होती है जिस तरह तुम्हें पीड़ा होती है और तुम अल्लाह से जिस चीज़ की आशा रखते हो, वे उसकी आशा नहीं रखते।" [सूरा अन-निसा : 104] साथ ही मोमिनों को अल्लाह की सहायता, उसकी मदद और सहयोग प्राप्त होता है, जो भय के वातावरण को समाप्त कर देता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "...तथा धैर्य रखो, निःसंदेह अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 46]
- कथन एवं कर्म के द्वारा अल्लाह के बंदों के साथ एहसान। चिंता, दुख एवं बेचैनी को दूर करने वाली चीज़ों में से एक चीज़ अपने कथन एवं कर्म तथा अनेक प्रकार की भलाईयों के द्वारा सृष्टि का उपकार करना भी है। इससे अल्लाह सदाचारी एवं दुराचारी दोनों प्रकार के बंदों की चिंताओं एवं दुखों को उनके उपकार के अनुसार दूर करता है। लेकिन मोमिन को चिंता एवं दुख से मुक्ति अधिक पूर्ण रूप से मिलती है और उसकी एक विशेषता यह होती है कि वह उपकार केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए और उसके सवाब की आशा में करता है।
इसतरह अल्लाह तआला मोमिन के लिए उपकार करने को आसान कर देता है; क्योंकि उसे (अल्लाह की ओर से) भलाई की आशा होती है। और उसके इखलास तथा सवाब की उम्मीद के कारण उसे अप्रिय चीज़ों से भी बचाता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "उनकी अधिकतर कानाफूसियों में कोई भलाई नहीं होती, परन्तु जो दान या नेकी या लोगों के बीच संधि कराने का आदेश दे (तो इसमें भलाई है), और जो कोई ऐसे कर्म अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करेगा, हम जल्द ही उसे बहुत बड़ा बदला प्रदान करेंगे।" [सूरा अन-निसा : 114]
उक्त आयत में अल्लाह तआला ने यह सूचना दी है कि यह समस्त चीज़ें जिसने भी किया है वह ख़ैर और भलाई हैं, और भलाई के द्वारा भलाई ही आती है, और भलाई बुराई को दूर भगाती है, तथा पुण्य की इच्छा और आशा के साथ कार्य करने वाले मोमिन को अल्लाह तआला बहुत बड़ा प्रतिफल देगा, और महान प्रतिफल में चिंता, दुख एवं जीवन को कष्टमय बनाने वाली चीज़ों से मुक्ति भी शामिल है।
अध्याय: किसी लाभकारी कार्य अथवा किसी लाभकारी ज्ञान में व्यस्त रहना
तंत्रिकाओं के तनाव और हृदय के कुछ कष्टदायक और दुखदायी चीज़ों में लीन होने के कारण उत्पन्न होने वाली व्याकुलता को दूर करने के कारणों में से है: किसी कार्य या किसी लाभदायक ज्ञान में व्यस्त होना; क्योंकि ऐसा करने से इन्सान का हृदय उस चीज़ में व्यस्त होने से बच जाता है, जो उसकी व्याकुलता का कारण बनी है। कभी-कभी वह इसके कारण उन बातों को भूल जाता है, जो उसके लिए चिंता एवं दुख का कारण बनी होती हैं। अतः उसकी आत्मा प्रसन्न रहती है और उसकी चुस्ती-फुरती में वृद्धि हो जाती है। यह कारण भी मोमिन एवं काफ़िर दोनों के लिए है। लेकिन मोमिन को यह विशिष्टता प्राप्त है कि उसके पास ईमान, अल्लाह के प्रति निष्ठा, ज्ञान प्राप्त करने या प्रदान करने के कार्य तथा भलाई के कार्य को सवाब का साधन समझने का अक़ीदा और विश्वास होता है। भलाई का वह कार्य यदि इबादत है, तो इबादत है, और यदि सांसारिक कार्य या आदत (जो इबादत के तौर पर नहीं किया जाता) है, तो मोमिन इनसान उसमें सच्ची नीयत को शामिल कर लेता है और उसका उपयोग कर अल्लाह का आज्ञापालन करता है। अतः चिंता, दुख एवं परेशानी को दूर करने में इन चीज़ों का सक्रिय प्रभाव होता है। बहुत-से ऐसे इन्सान हैं, जो परेशानी एवं अप्रिय परिस्थिति से गुज़रने के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो गए और इस परिस्थिति में आकर उनकी अचूक दवा यह ठहरी कि वे उस बात को भूल जाएँ, जिसने उनको परेशान और चिंतित किया था और अपने किसी काम में व्यस्त हो जाएँ।
और उचित यह है कि वह ऐसे काम में व्यस्त हो जिससे हृदय को लगाव हो और दिल में उसके लिए उत्सुकता हो, क्योंकि इसतरह इस लाभदायक उद्देश्य की प्राप्ति की संभावना अधिक होती है। और अल्लाह तआला अधिक ज्ञान रखने वाला है।
सारा साच विचार आज के दिन के कार्यों को लेकर होना चिंता एवं दुख से छुटकारे का एक तरीक़ा यह भी है कि इन्सान पूरी एकाग्रता के साथ आज के काम पर ध्यान दे, भविष्य को लेकर चिंतित न रहे और भूतकाल को लेकर दुखित न रहे। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चिंता एवं दुख से अल्लाह की शरण माँगी है। जो कुछ हो चुका है और उसे लौटाया नहीं जा सकता तथा उससे होने वाली क्षति की पूर्ति नहीं हो सकती, उसे सोच कर दुखी होने से कुछ हाथ नहीं आएगा, जबकि भविष्य के भय के कारण होने वाली चिंता हानिकारक सिद्ध हो सकती है। इसलिए इन्सान को अपने आज पर ध्यान देना चाहिए और उसे बेहतर बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि इससे एक तो इन्सान का कर्म बेहतर से बेहतर होगा और दूसरे उसे चिंता एवं दुख से मुक्ति भी मिलेगी। और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब कोई दुआ करते या अपनी उम्मत को कोई दुआ सिखाते, तो अल्लाह की सहायता माँगने और उसके अनुग्रह की आशा रखने की प्रेरणा देने के साथ-साथ, जिस चीज़ की प्राप्ति के लिए आदमी दुआ करे, उसे प्राप्त करने की पूरी कोशिश करने की भी प्रेरणा देते थे। और जिस चीज़ को टालने के लिए दुआ करता है, उसका परित्याग करने की शिक्षा देते; क्योंकि दुआ कर्म के साथ जुड़ी हुई है। अतः बन्दे को चाहिए कि उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहे जो उसके लिए लोक और परलोक में लाभकारी हों, और अपने पालनहार से अपने उद्देश्य में सफलता की दुआ करे, और उससे इस काम में सहायता माँगे। जैसा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "अपने लाभ की चीज़ के इच्छुक बनो तथा अल्लाह तआला से सहायता माँगो और कदापि विवश होकर न बैठो। यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, तो यह न कहो कि यदि मैंने ऐसा किया होता, तो ऐसा और ऐसा होता। बल्कि यह कहो कि; "قدر الله وما شاء فعل" (अर्थात अल्लाह तआला ने ऐसा ही भाग्य में लिख रखा था और वह जो चाहता है, करता है), क्योंकि ‘यदि’ शब्द शैतान के कार्य का द्वार खोलता है।" सहीह मुस्लिम। उक्त हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो चीज़ों को एकत्र कर दिया है : प्रत्येक अवस्था में लाभदायक चीज़ों का इच्छुक और लालसी होना, तथा अल्लाह तआला से सहायता मांगना और विवशता का शिकार न होना जो कि वास्तव में हानिकारक आलस्य है। दूसरी चीज़ः बीती हुई घटित चीज़ों के सामने आत्मसमर्पण करना और अल्लाह तआला के क़ज़ा व क़दर (भाग्य संबंधित विषयों) को सदैव ध्यान में रखना ।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सारी चीज़ों को दो भागों में बाँट दिया है। एक भाग वह, जिसे अथवा जिसके कुछ अंश को प्राप्त करना या फिर टालना या हल्का करना बंदे के लिए संभव हो। इस तरह के कामों के लिए बंदे को कोशिश करनी चाहिए तथा अपने रब से मदद माँगनी चाहिए। दूसरा भाग वह है जिसके बारे में ऐसा संभव न हो। इस प्रकार के विषयों के प्रति बंदे को संतुष्ट तथा अल्लाह के निर्णय पर राज़ी रहना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस नियम का पालन करने से बंदे को प्रसन्नता प्राप्त होगी और वह चिंताओं एवं दुखों से मुक्त रहेगा।
अध्याय: अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करना
प्रफुल्लता और संतोष के महान कारणों में से: अल्लाह का अधिक से अधिक ज़िक्र करना है, क्योंकि प्रफुल्लता और संतोष, तथा शोक और चिन्ता के निवारण में इसका अनोखा प्रभाव पड़ता है। अल्लाह तआला का फ़रमान है: "सुन लो! अल्लाह की याद ही से दिलों को संतुष्टि मिलती है।" [सूरा अर-राद : 28] अतः अल्लाह के ज़िक्र का इस उद्देश्य की प्राप्ति में व्यापक प्रभाव है। क्योंकि एक तो खुद ज़िक्र के अंदर ही यह विशेषता मौजूद है और इसलिए भी कि बंदा इसके सवाब एवं प्रतिल की आशा भी रखता है।
अल्लाह की दी हुई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष नेमतों के बारे में बात करना, इसी प्रकार अल्लाह की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष नेमतों का वर्णन भी दुख एवं चिंता से इन्सान को मुक्त करता है और उसे शुक्र की प्रेरणा देता है, जो कि सबसे ऊँचा स्थान है। यहां तक कि बंदा अगर निर्धन या बीमार हो या इस तरह की किसी और मुसीबत का सामना कर रहा हो और इस अवस्था में भी अल्लाह की ओर से प्राप्त अनगिनत नेमतों और अपनी परेशानी के बीच तुलना करे, तो नेमतों के मुक़ाबले में परेशानी कहीं नहीं ठहरेगी।
अपितु अल्लाह तआला जब बन्दे की अप्रिय और घृणास्पद चीज़ों तथा विपत्तियों के द्वारा परीक्षा लेता है, और वह (बन्दा) उस में धैर्य, प्रसन्नता और स्वीकृति का कर्तव्य पूरा करता है, तो उस विपत्ति की तीव्रता कम हो जाती है, उसका भार और बोझ हल्का हो जाता है, और बंदे का सब्र के पुण्य और प्रतिफल की आशा करना और धैर्य तथा संतुष्टि के कर्तव्य को पूरा करते हुये अल्लाह तआला की इबादत (उपासना) करना, कटु और कड़वी (अप्रिय) चीज़ों को मधुर बना देता है, और उस (विपत्ति पर धैर्य रखने) के प्रतिफल की मधुरता उसके धैर्य की कटुता और कड़वाहट को मिटा देती है।
हमसे नीचे वालों की ओर दृष्टिपात, 7- इस स्थान पर एक बहुत ही लाभदायक कार्य वह है, जिसका मार्गदर्शन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी इस सहीह हदीस में फ़रमाया है : "उसे देखो, जो तुमसे नीचे है तथा उसे न देखो, जो तुमसे ऊपर है। क्योंकि इससे इस बात की संभावना अधिक रहती है कि तुम अल्लाह की नेमतों की नाक़दरी न कर बैठो।" सहीह मुस्लिम। क्योंकि जब बंदा इस महत्वपूर्ण विषय को अपनी आंखों के सामने रखेगा, तो वह स्वयं को आफियत (आपदा से मुक्ति) और उससे संबंधित चीज़ों में तथा जीविका और उससे जुड़ी हुई चीज़ों में बहुत-से लोगों से उत्तम और श्रेष्ठ पाएगा, चाहे उसकी हालत जैसी भी हो। इस प्रकार उसकी चिंता ख़त्म हो जाएगी एवं उसका दुख समाप्त हो जाएगा और अल्लाह की दी हुई उन नेमतों पर उसका हर्ष और आनंद बढ़ जाएगा, जिन्हें पाने के मामले में वह ऐसे बहुत-से लोगों से आगे है, जो इस विषय में उससे कमतर हैं।
बंदा अल्लाह की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष तथा सांसारिक एवं धार्मिक नेमतों पर जितना चिंतन करता जाएगा, वह देखेगा कि उसके रब ने उसे बहुत-सी अच्छी चीज़ें दे रखी हैं और बहुत-सी बुरी चीज़ों से बचाए रखा है। ज़ाहिर सी बात है कि इससे दुख दूर होगा और हर्ष एवं आनंद प्राप्त होगा।
अध्याय: शोक और खेद को उत्पन्न करने वाले कारणों के निवारण का प्रयास तथा आनन्द उत्पन्न करने वाले कारणों की प्राप्ति
गम देने वाले कारणों के निवारण तथा आनन्द दायक कारणों की प्राप्ति के लिये संघर्ष और प्रयास करना भी खुशी के आने और दुखों के जाने के कारणों में से है; और वह इस प्रकार कि आदमी अपने ऊपर बीती हुई उन अप्रिय और घृणास्पद चीज़ों को भुला दे जिनका लौटाना सम्भव नहीं है, और यह बात भी समझ ले कि ऐसी चीज़ों के विषय में चिंता करना निरर्थक और असंभव के बारे में सोचना है, और ऐसा करना मूर्खता और पागलपन है। अतः बंदा ऐसी चीज़ों में चिंतन न करने के लिए अपने हृदय से संघर्ष करे, तथा भविष्य जीवन में जिस निर्धनता या भय या इनके अतिरिक्त अन्य अप्रिय चीज़ों के घटने की वह कल्पना कर रहा है उसके विषय में व्याकुल और चिंतित न होने के बारे में भी अपने हृदय से संघर्ष करे। अतः उसे जान लेना चाहिए कि भविष्य में सामने आने वाली भलाइयों और बुराइयों, आशाओं और वेदनाओं का ज्ञान किसी को नहीं है। यह बातें सर्वशक्तिमान एवं हिकमत वाले अल्लाह के हाथ में हैं। बंदों के हाथ में कुछ नहीं है। अगर कुछ है, तो बस भलाइयों को प्राप्त करने तथा बुराइयों से बचने का प्रयास करना। साथ ही बंदे को याद रखना चाहिए कि अगर वह अपने किसी काम के भविष्य को लेकर चिंतित रहना छोड़ देगा और अपनी दशा में सुधार के लिए अपने रब पर भरोसा रखेगा और इस संबंध में अपने रब से आश्वस्त महसूस करेगा, तो ऐसी सूरत में उसका ह्रदय निश्चिंत रहेगा, उसकी हालत अच्छी हो जाएगी और उसका सारा दुःख दूर हो जाएगा तथा उसकी सब चिंता समाप्त हो जाएगी।
दुआ का उपयोग, भविष्य के विषयों पर विचार करते समय एक बहुत ही लाभदायक काम यह है कि बंदा यह दुआ करता रहे, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किया करते थे : "ऐ अल्लाह! मेरे लिए मेरे धर्म को सुधार दे, जो मेरे मामले का संरक्षण है (जिसके कारण तमाम बुरी चीज़ों से सुरक्षा प्राप्त होत है) और मेरे लिए मेरी दुनिया को सुधार दे, जिसके अंदर मेरी जीविका है, और मेरे लिए मेरी आख़िरत को सुधार दे, जिसकी ओर मुझे लौटना है। तथा मेरे लिए जीवन को प्रत्येक भलाई में वृद्धि का कारण बना दे और मृत्यु को मेरे लिए प्रत्येक बुराई से मोक्ष का कारण बना दे।" सहीह मुस्लिम। इसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की यह दुआ भी है : “ऐ अल्लाह! मैं तेरी ही कृपा की आशा रखता हूँ। अतः तू मुझे पलक झपकने के बराबर भी खुद के हवाले न कर, और मेरे लिए मेरे सारे मामलात को ठीक कर दे। तेरे अतिरिक्त कोई वास्तविक उपास्य नहीं है।” इसे अबू दाऊद ने सहीह सनद के साथ रिवायत किया है। जब बन्दा उपस्थित हृदय और सच्ची नियत के साथ यह दुआ करेगा जिसके अन्दर उसके धार्मिक और सांसारिक भविष्य की भलाई (सुधार और कल्याण) है, साथ ही साथ इस सुधार को साकार करने वाली चीज़ में संघर्ष करेगा, तो अल्लाह तआला उसके लिये उस चीज़ को साकार और सम्पन्न कर देगा जिसके लिये उसने दुआ की है, और जिसकी आशा की है और जिसके लिये कार्य किया है, तथा उसका शोक और चिन्ता, आनन्द और प्रसन्नता में परिवर्तित हो जायेगा।
अध्याय: सबसे बुरी संभावनाओं का अनुमार रखना
जब कोई व्यक्ति किसी विपत्ति में पड़े, तो शोक और चिंता के निवारण का एक बहुत ही लाभदायक साधन यह है कि वह उस विपत्ति को कम करने के लिए उसकी सब से बुरी संभावना के बारे में सोचे जहां तक वह पहुंच सकती है और उसका सामना करने के लिए अपने हृदय को तैयार कर ले। फिर तत्पश्चात उस विपत्ति को जितना हो सके कम करने का प्रयास करे। इस लाभकारी प्रयास से उसके शोक दूर हो जाएँगे और वह लाभ प्राप्त करने तथा हानि को दूर करने की कोशिश करने वाला सिद्ध होगा।
जब आदमी भय, बीमारी, निर्धनता और विभिन्न प्रिय वस्तुओं से महरूमी जैसे हालात का सामना करे, तो उसे उनका सामना संतोष के साथ करना चाहिए और स्वयं को उनसे भी बुरे हालात के लिए तैयार रखना चाहिए। क्योंकि बुरी से बुरी परिस्थितियों के लिए तैयार रहने से मुसीबत आसान हो जाती है और उसकी तीव्रता घट जाती है। विशेष रूप से उस समय, जब इन्सान जहाँ तक हो सके, इन हालात का मुक़ाबले में व्यस्त रहे। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में उसके पास दो चीजें जमा होंगी; मसीबतों के लिए तैयार रहना एवं लाभकारी प्रयास करना, जिससे इन्सान मुसीबतों को भूल जाता है। और इनसान को ऐसी हालत में अप्रिय घटनाओं का सामना करने की शक्ति नए सिरे से प्राप्त करने के लिए अपने नफ़्स से लड़ाई करना है। साथ ही अल्लाह पर भरोसा भी रखना है। कोई शक नहीं कि इन बातों का स्वयं को खुश रखने के संबंध में बड़ा फ़ायदा होता है और बंदे को दुनिया एवं आख़िरत में प्रतिफल की आशा भी रहती है। अनुभव इसका साक्ष्य प्रस्तुत करता है और अनुभव करने वालों की इस तरह की बहुत-सी घटनाएँ मौजूद हैं।
अध्याय: दिल की शक्ति तथा उसका न घबराना और प्रभावित न होना।
दिल की तंत्रिका संबंधी बीमारियों, बल्कि शारीरिक रोगों का एक महत्वपूर्ण इलाज है दिल का बलशाली होना और उन भ्रमों एवं खयालों से प्रभावित न होना और न घबराना, जो दुश्चिंता के नतीजे में जन्म लेते हैं। कष्टदायक चीज़ें तथा अप्रिय घटनाओं के घटित होने और प्रिय चीज़ें के छिन जाने से क्रोधित तथा परेशान होने के कारण इनसान चिंताओं, दुखों, हृदय संबंधित तथा शारीरिक बीमारियों एवं तंत्रिका ह्रास का शिकार हो जाता है, जिसके कुप्रभावों के ढेर सारे हानि और क्षति से लोग अवगत हैं।
अल्लाह पर भरोसा रखना, जब इन्सान का हृदय अल्लाह पर भरोसा करता है, और उस पर आश्रय लगाता है, भ्रमों के सामने आत्म समर्पण नहीं करता और न ही दुष्ट विचारों को अपने ऊपर हावी होने देता है, और अल्लाह पर विश्वास रखता है तथा उसकी अनुकम्पा की आशा करता है, तो इसके कारण उसका शोक और बहुत सी चिन्ताएं समाप्त हो जाती हैं, उसकी बहुत-सी हार्दिक और शारीरिक बीमारियाँ दूर हो जाती हैं, और उसके हृदय को वह शक्ति, प्रफुल्लता तथा आनंद प्राप्त होता है जिसका वर्णन करना असंभव है। कितने ही अस्पताल भ्रमों और दुष्ट विचारों के शिकार रोगियों से भरे पड़े हैं, कमज़ोरों की बात तो दूर, न जाने कितने शक्तिशाली लोगों के दिलों पर इन बातों ने प्रभाव डाला है, और कितनों को मूर्खता और पागलपन तक पहुँचा दिया है। आफियत में (आपदाओं से मुक्त) वही है जिसे अल्लाह ने आफियत दी और उसे अपनी आत्मा से संघर्ष करने का सामर्थ्य दिया ताकि वह हृदय को शक्ति प्रदान करने वाले तथा व्याकुलता का निवारण करने वाले लाभदायक कारणों को प्राप्त कर सके। अल्लाह तआला का फ़रमान है: "...तथा जो व्यक्ति अल्लाह पर भरोसा करे, वह उसके लिए पर्याप्त है।..." (सूरा अत-तलाक : 3) यानी उसके सभी धार्मिक एवं सांसारिक मामलों को हल करने के लिए वही काफ़ी है।
अल्लाह पर भरोसा रखने वाला सशक्त हृदय का मालिक होता है, जिसपर भ्रमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और न ही घटनाएँ उसे व्याकुल करती हैं। क्योंकि वह जानता है कि यह दिल की कमज़ोरी, कायरता तथा निराधार भय के कारण होता है। साथ ही उसे यह भी पता होता है कि अल्लाह तआला ने अपने ऊपर भरोसा रखने वाले को इस बात की गारंटी दे रखी है कि वह उसके लिए संपूर्ण रूप से पर्याप्त होगा। अतः वह अल्लाह पर भरोसा और उसके वायदे पर विश्वास रखता है, जिसके बाद उसकी सारी चिंताएँ दूर हो जाती हैं, उसकी हर मुश्किल आसान हो जाती है, उसका ग़म खुशी में और उसका खौफ़ अमन में बदल जाता है। अतः हम अल्लाह से आफियत माँगते हैं और उससे प्रार्थना करते हैं कि हमें अपनी कृपा से हृदय की शक्ति एवं दृढ़ता तथा संपूर्ण विश्वास प्रदान करे, जो हर भलाई का स्रोत तथा हर बुराई से बचाव का साधन है।
अध्याय: दूसरों की कमियों को सहन करने के लिए हृदय को मनाना
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस कथन से कि: "कोई मोमिन पुरुष किसी मोमिन स्त्री से नफ़रत न करे। यदि वह उसके किसी व्यवहार को नापसंद करता है, तो उसके किसी दूसरे व्यवहार को पसंद करेगा।" सहीह मुस्लिम।
दो महान लाभ:
पहला लाभ: इस बात की ओर मार्गदर्शन कि पत्नी, निकटवर्ती, साथी, साथ में काम करने वाले और हर उस व्यक्ति के साथ, जिसके और आपके बीच कोई संबंध और नाता हो, किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? कि आपको यह मान लेना चाहिए कि उसके अंदर कोई न कोई ऐब, कमी या ऐसी बात होगी ही, जो आपको पसंद न हो। अतः जब इस तरह की कोई बात पाएं, तो उसकी अच्छाइयों और उससे जुड़े हुए विशेष तथा साधारण उद्देश्यों को याद करते हुए एक तरफ़ उसकी इन कमियों को देखें और दूसरी तरफ़ सोचें कि आपको यह रिश्ता निभाना चाहिए। इस प्रकार, अपने साथी की कमियों को नज़रअंदाज़ करने और अच्छाइयों को सामने रखने से संबंध बना रहेगा और जीवन का अनंद मिल सकेगा।
दूसरा लाभ: शोक एवं चिंता की समाप्ति, साफ़-सुथरे संबंध का बना रहना, अनवार्य तथा वांछित (वाजिब एवं मुसतहब) अधिकारों को अदा करते रहना तथा दोनों ओर शांति एवं सुकून की प्राप्ति। इसके विपरीत जो अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के इस मार्गदर्शन पर अमल नहीं करेगा तथा अपने साथी की अच्छाइयों की अनदेखी करते हुए केवल बुराइयों को सामने रखेगा, वह परेशान रहेगा और ज़रूर उनकी मुहब्बत का पानी गदला हो जाएगा और दोनों के द्वारा बहुत-से अधिकारों का हनन होगा, जिनकी रक्षा दोनों को करना है।
बहुत-से महान साहस वाले लोग विपत्तियों, दुर्घटनाओं और कष्टदायक चीज़ों के घटने के समय अपने आपको धैर्य और सन्तुष्टि के लिए तैयार कर लेते हैं। लेकिन साधारण और छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाते हैं और संबंध खराब हो जाता है। इसका कारण यह है कि उन्होंने बड़ी-बड़ी मुसीबतों पर सब्र करने की तो आदत डाली, लेकिन साधारण घटनाओं पर धैर्य रखने का खुद को आदी नहीं बनाया, जिसके कारण ये छोटी घटनाएँ उनका सुकून बर्बाद कर देती हैं। अतः बुद्धिमान व्यक्ति अपने आपको बड़ी घटानों के साथ-साथ छोटी घटनाओं पर भी सब्र करने का आदी बनाता है और अल्लाह से इसके लिए मदद माँगता है। वह अल्लाह से दुआ करता है कि उसे एक क्षण के लिए उसके नफ़्स के हवाले न करे। इसके बाद बड़ी घटनाओं के साथ-साथ छोटी घटनाओं का सामना करना भी उसके लिए आसान हो जाता है। फिर, आदमी इतमीनान के साथ आनंद भरा जीवन गुज़ारता है।
अध्याय: चिंता एवं शोक में पड़े न रहना
बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि उसका स्वस्थ जीवन, ख़ुशी और इतमीनान का जीवन है और यह बहुत छोटा है। इसलिए ग़म और मनस्ताप में पड़कर उसे छोटा करना उचित नहीं है, क्योंकि यह स्वस्थ जीवन के विपरीत है। अतः वह अपने जीवन के अधिकांश को ग़मों और चिंताओं में बर्बाद नहीं होने देात। इसमें सदाचारी और दुराचारी के बीच कोई अन्तर नहीं है, किन्तु मोमिन को इस गुण का बड़ा भाग और दुनिया एवं आख़िरत में लाभदायक अंश प्राप्त होता है।
अल्लाह तआला की नेमतों और उसे पहुँची हुई आपत्ति के बीच तुलना करना, और जब वह किसी अप्रिय चीज़ से पीड़ित हो या उससे भयभीत हो, तो उसे बाक़ी धार्मिक अथवा सांसारिक नेमतों के बीच और उसे जो अप्रिय चीज़ पहुँची है उसके बीच तुलना भी करना चाहिए; क्योंकि तुलना करते समय यह स्पष्ट हो जायेगा कि वह कितनी ज़्यादा नेमतों में है, और वह जिस अप्रिय चीज़ से पीड़ित है वह इन नेमतों के सामने कितनी छोटी है।
इसी प्रकार उसे चाहिए कि उसे हानि से पीड़ित होने का जो भय है उसके बीच और उस हानि से सुरक्षित रहने की जो बहुत-सी संभावनाएँ हैं, उनके बीच तुलना करे और दुर्बल संभावना को प्रबल संभावनाओं पर हावी न होने दे। ऐसा करने से उसकी चिंता और भय समाप्त हो जाएगा। और सबसे बुरी संभावनाओं का अनुमान लगाकर अपने आपको उनका सामने करने के लिए तैयार रखेगा तथा जो आपदा सामने आ चुकी हो, उसे दूर करने या कम करने और जो सामने नहीं आई है उससे अपना बचाव करने का प्रयास करेगा।
लोगों के आपको कष्ट देने का नुकसान उन्हींको होगा, जब तक आप उसकी चिन्ता में अपने आप को व्यस्त न करें। लाभदाय बातों में से एक यह है कि आप इस बात को जान जाएँ कि यदि लोग आपको कष्ट देते हैं, खास तौर से अपनी ज़बान से आपका दिल दुखाते हैं, तो इससे आपका नहीं, खुद उनका नुक़सान होगा। हाँ, यदि आपने उन बातों पर तवज्जो देना शुरू कर दी और उनको अपने दिल पर ले लिया, तो नुक़सान उनके साथ-साथ आपको भी होगा। लेकिन यदि आपने उनपर ध्यान नहीं दिया, तो उससे आपका कुछ नहीं बिगड़ने वाला।
लाभकारी विचारों से अपने जीवन को सौभाग्यशाली और सुखदायक बनाएँ। आप यह बात भी जान लें कि आपका जीवन आपके विचारों के अधीन है; यदि आपके विचार ऐसे हैं जिनका लाभ धर्म अथवा संसार में आप पर लौटता है, तो आपका जीवन सौभाग्य और वैभवशाली है, अन्यथा मामला इसके विपरीत है।
बर्ताव अल्लाह के लिए हो, न कि सृष्टि के लिए। शोक और चिन्ता को दूर रखने के सर्वाधिक लाभदायक उपायों में से एक यह है कि आप स्वयं को इस बात का आदी बना लें कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य से शुक्र (कृतज्ञता) की याचना न करें। जब आप किसी ऐसे व्यक्ति पर उपकार करें जिसका आप पर कोई अधिकार है अथवा जिसका कोई अधिकार नहीं है, तो आप यह समझ लें कि आपका यह मामला (व्यवहार) अल्लाह के साथ है। इसलिए जिस पर आपने उपकार किया है, उसके शुक्र की परवाह न करें, जैसाकि अल्लाह तआला ने अपने प्रमुख बन्दों के विषय में फ़रमाया है : "(और कहते हैं :) हम तो तुम्हें केवल अल्लाह के चेहरे की ख़ातिर खिलाते हैं। न तुमसे कोई बदला चाहते हैं और न कृतज्ञता।" [सूरा अल-इंसान : 9]
यह बात परिवार जन तथा संतान के साथ व्यवहार के मामले में अधिक अनिवार्य हो जाती है। अतः जब भी आप स्वयं को इन लोगों से हानि पहुंचने की संभावना का आदी बना लेंगे, तो आप स्वयं को भी आराम पहुँचाएंगे और दूसरों को भी। इसी तरह शान्ति के कारणों में से है, अपनी इच्छा के अनुसार अच्छे गुणों को अपनाना, स्वयं को कष्ट देकर नहीं; अन्यथा आप गुणों को प्राप्त किए बिना ही अपनी डगर पर असफल होकर लौट आएँगे; क्योंकि ऐसा करके आप ने टेढ़े मार्ग अपना लिया था। यही बुद्धि और हिक्मत की बात है। और यह भी अकलमन्दी है कि आप अप्रिय और कष्टदायक चीज़ों में से स्वच्छ और सुखमयी चीज़ों को चुन लें; इस प्रकार हर्ष और आनन्द में वृद्धि होगी, और अप्रसन्नताएँ समाप्त हो जाएँगी।
लाभकारी चीज़ों पर ध्यान देना, हानिकारक चीज़ों से बचना, लाभकारी चीज़ों को अपना उद्देश्य बनाएँ, उनकी प्राप्ति के लिए कार्य करें और हानिकारक चीज़ों की ओर ध्यान न दें, ताकि इस तरह शोक और खेद उत्पन्न करने वाली बातों से निश्चित रह सकें। साथ ही महत्वपूर्ण कार्यों के समापन के लिए आराम और आत्म-नियंत्रण के द्वारा सहायता प्राप्त करें।
कार्यों को समय पर निपटा लेना, एक लाभकारी बात कार्यों को समय पर निबटाना और कल के लिए न छोड़ना भी है। क्योंकि कार्यों को समय पर न निबटाने की स्थिति में आने वाले कार्यों के साथ-साथ पिछले कार्यों का बोझ भी इन्सान के कंधों पर आएगा, जिससे दबकर वह परेशान हो जाएगा। लेकिन जब आप हर काम को समय पर निबटा लेंगे, तो आने वाले कामों के लिए अधिक एकाग्र होकर एवं अधिक ऊर्जा के साथ काम करने का अवसर मिलेगा।
परामर्श के साथ प्राथमिकताओं को क्रमबद्ध करना, तथा आप के लिये उचित है कि लाभकारी कार्यों में से सब से अधिक महत्वपूर्ण कार्य का चयन पहले करें फिर उस से कम महत्वपूर्ण का चयन करें, तथा जिस चीज़ की ओर आप के हृदय का झुकाव हो और आप उस में अधिक रूचि रखते हों उस में (और उसके विपरीत में) अन्तर करें, क्योंकि उसका विपरीत ऊबन तथा अप्रसन्नता उत्पन्न करेगा। और इस सिलसिले में शुद्ध विचार तथा परामर्श की सहायता लें, क्योंकि परामर्श करने वाले को कभी पश्चाताप नहीं होता। और जिस काम को आप करने की इच्छा रखते हों उसका बारीकी और सूक्ष्मता के साथ गहन अध्ययन करें, फिर यदि मसलहत, हित और भलाई निश्चित हो जाये और आप उस का संकल्प कर लें तो अल्लाह तआला पर सम्पूर्ण तवक्कुल और भरोसा रखें, निःसन्देह अल्लाह तआला तवक्कुल और भरोसा रखने वालों को प्रिय रखता है ।
सारी प्रशंसा अल्लाह ही की है जो सारे संसारों का रब है।
अल्लाह की प्रशंसा एवं सलाम हो हमारे संदेष्टा मुह़म्मद पर तथा आपके परिजनों और साथियों पर।