فضل الإسلام

فضل الإسلام

(فضل الإسلام) هو رسالة مختصرة من تأليف الإمام محمد بن عبد الوهاب، تهدف إلى توضيح أهمية الالتزام بالإسلام والتمسك بتعاليمه. يستعرض الشيخ في هذه الرسالة مفهوم الإسلام، وأركانه، وأهمية اتباع السنة النبوية، محذراً من الابتعاد عن الصراط المستقيم واتباع البدع والشبهات. يستشهد الإمام بالأدلة من الوحيين القرآن والسنة لتعزيز حججه، مشيراً إلى أن الإسلام هو الدين الحق الذي ارتضاه الله لعباده، وأن أي دين آخر لن يُقبل في الآخرة. الرسالة تخاطب المسلمين لتذكيرهم بضرورة العودة إلى الدين الصحيح والابتعاد عن التفرق والاختلاف الذي يؤدي إلى ضعف الأمة وضياعها.

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इस्लाम की श्रेठता

इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब

अध्याय:इस्लाम को धर्म स्वरूप कबूल करने की अनिवार्यता

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म ढूँढे, उसका धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [1] (सूरा आल-ए-इमरान: आयत संख्या : 85) अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "और यही धर्म मेरा सीधा मार्ग है। अतः इसी रास्ते पर चलो और दूसरे रास्तों पर न चलो। अन्यथा वह तुम्हें अल्लाह के रास्ते से भटका देंगे।" [1] (सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 153) [1] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 85 [2] सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 153

मुजाहिद कहते हैं कि इस आयत में रास्तों से अभिप्राय, बिदअ़तें (मनगढ़ंत धर्म-कर्म) एवं संदेह हैं।

आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ पैदा की, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अमान्य एवं अस्वीकृत है।" [3] एक दूसरी रिवायत में है : "जिसने कोई ऐसा काम किया, जिसपर हमारा आदेश नहीं है, तो वह काम अमान्य और अस्वीकृत है।" [4] [3] बुखारी : अस-सुल्ह (2550), मुस्लिम : अल-अक्ज़िया (1718), अबू दाऊद : अस्-सुन्नह (4606), इब्ने माजा : अल-मुक़द्दिमा (14), मुसनद अहमद (6/256)। [4] बुखारी : अस्-सुल्ह (2550), मुस्लिम : अल-अक्ज़िया (1718), अबू दाऊद : अस-सुन्नह (4606), इब्ने माजा : अल- मुक़द्दिमा (14) मुसनद अहमद (6/256)।

जबकि सहीह बुखारी में अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "मेरी उम्मत के सारे लोग जन्नत में जाएंगे, सिवाय उस आदमी के, जिसने इनकार किया।" पूछा गया कि जन्नत में जाने से किसने इनकार किया? तो आपने फ़रमाया : "जिसने मेरे आदेश का पालन किया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और जिसने मेरी अवज्ञा की, उसने जन्नत में जाने से इनकार किया।" [5] बुखारी : अल-ईतिसाम बिल-किताबि वस्-सुन्ना (6851), मुस्लिम : अल-इमारा (1835), मुसनद अहमद ( 2/361)।

और सहीह में अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से वर्णित है कि अल्लाह के (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "अल्लाह की नज़र में तीन प्रकार के लोग सबसे ज़्यादा घृणित एवं नापसंदीदा हैं : हरम के अंदर गुनाह का काम करने वाला, इस्लाम के अंदर जाहिलियत काल के तौर-तरीक़े को प्रचलित करने वाला और किसी मुसलमान का नाहक़ खून बहाने के लिए उसके ख़ून की तलब में रहने वाला।" [6] (इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।) अल्लाह के रसूलों के लाए हुए धर्म-विधान से इतर, जाहिलियत काल का हर तौर-तरीक़ा इसमें शामिल है, चाहे वह सामान्य हो या उसका संबंध कुछ ही लोगों से हो,फिर उसका संबंध चाहे यहूदियों की धारणा से हो या ईसाइयों की,या मूर्तिपूजकों की, या इनके अतिरिक्त किसी अन्य की धारणा से हो। [6] बुखारी : अद-दिय्यात ( 6488 )।

और सहीह में हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, उन्होंने फरमाया : ऐ क़ुरआन के पाठकों की जमाअत! सीधे मार्ग पर डटे रहो। बेशक तुम लोग, अन्य लोगों के मुकाबले में बहुत आगे निकल चुके हो। अब अगर तुम (क़ुरआन एवं सुन्नत का रास्ता छोड़कर) दाएं या बाएं वाले किसी रास्ते पर चल निकले, तो गुमराही में बहुत दूर निकल जाओगे।

और मुहम्मद बिन वज़्ज़ाह, मस्जिद-ए-नबवी में प्रवेश करते हुए अल्लाह के गुणगान में व्यस्त लोगों के निकट खड़े होकर उनको नसीहत करते हुए कहते थे कि हमसे सुफ़यान बिन उयैना ने मुजालिद से और मुजालिद ने शअबी से और शअबी ने मसरूक़ से वर्णन करते हुए कहा है कि अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) ने फ़रमाया : बाद में आने वाला हर साल, गुज़रे हुए साल से अधिक बुरा होगा। मैं एक साल के दूसरे साल से अधिक हरियाली वाले होने और एक शासक के दूसरे शासक से बेहतर होने की बात नहीं कर रहा। मैं कहना यह चाहता हूँ कि तुम्हारे उलेमा और अच्छे लोग गुज़र जाएंगे और उनके बाद ऐसे लोग आएंगे जो धार्मिक विधानों को अपनी रायों के तराज़ू पर तौलेंगे और इस प्रकार वे इस्लाम की आधारशिला को ढहा देंगे और नष्ट कर देंगे।

अध्याय: इस्लाम की व्याख्या

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "फिर यदि वे आपसे झगड़ें, तो आप कह दें कि मैंने और मेरे मानने वालों ने अल्लाह तआला के सामने अपना सिर झुका दिया है।" [7] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 20) [7] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 20

और सहीह में अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो और सामर्थ्य हो तो अल्लाह के घर काबा का हज करो।" [8] [8] मुस्लिम : अल-ईमान (8), तिरमिज़ी : अल-ईमान ( 2610), नसई : अल-ईमान व शराइउहु (4990), अबू दाऊद : अस-सुन्नह ( 4695), इब्ने माजा : अल-मुकद्दिमा ( 63) अहमद (1/52)।

और सहीह में अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मरफ़ूअन वर्णित है : "मुसलमान वह है, जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे मुसलमान सुरक्षित रहें।" [9] [9] तिरमिज़ी : अल-ईमान ( 2627), नसई : अल-ईमान व शराउहु ( 4995), अहमद (2/379)।

और बह्ज़ बिन हकीम से वर्णित है, वह अपने बाप के वास्ते से अपने दादा से वर्णन करते हैं कि उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से इस्लाम के विषय में प्रश्न किया, तो आपने फ़रमाया : "इस्लाम यह है कि तुम अपना हृदय अल्लाह को सौंप दो, अपना मुख अल्लाह की ओर कर लो, फर्ज़ नमाज़ पढ़ो और फ़र्ज़ ज़कात दो।"[10] इसे अह़मद ने रिवायत किया है। [10] नसई : अज़-ज़काह (2436), अहमद ( 5/3)।

अबू क़िलाबा अम्र बिन अबसा से और वह सीरिया के रहने वाले एक आदमी से वर्णन करते हैं कि उसके बाप ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया कि इस्लाम क्या है, तो आपने फ़रमाया : "इस्लाम यह है कि तुम अपना दिल अल्लाह के हवाले कर दो और मुसलमान तुम्हारी ज़बान और तुम्हारे हाथ से सुरक्षित रहें।" फिर उन्होंने प्रश्न किया कि सर्वश्रेष्ठ इस्लाम क्या है? तो आपने फ़रमाया : "ईमान।" उसने कहा कि ईमान क्या है? तो आपने फ़रमाया : "ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी उतारी हुई पुस्तकों पर, उसके रसूलों पर और मरने के बाद दोबारा उठाए जाने पर विश्वास रखो।" [11] [11] अहमद (4/114)

अध्याय: अल्लाह तआला का फ़रमान : "और जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म तलाश करे, तो उसका धर्म कदाचित स्वीकार नहीं किया जाएगा।"

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "क़यामत के दिन, बन्दों के कर्म उपस्थित होंगे। चुनांचे नमाज़ भी उपस्थित होगी और कहेगी कि ऐ मेरे रब! मैं नमाज़ हूँ। अल्लाह तआला कहेगाः तू ख़ैर पर है। फिर ज़कात उपस्थित होगी और कहेगी कि ऐ मेरे रब! मैं ज़कात हूँ। अल्लाह तआला कहेगाः तू भी ख़ैर पर है। फिर रोज़ा उपस्थित होगा और कहेगा कि ऐ मेरे रब! मैं रोज़ा हूँ। अल्लाह तआला कहेगाः तू भी ख़ैर पर है। इसके बाद बन्दे के शेष कर्म इसी प्रकार उपस्थित होंगे और अल्लाह तआला कहेगाः तुम सब ख़ैर पर हो। फिर इस्लाम उपस्थित होगा और कहेगा कि ऐ मेरे रब! तू सलाम है और मैं इस्लाम हूँ। अल्लाह तआला कहेगाः तू भी ख़ैर पर है। आज मैं तेरे कारण से पकड़ करूँगा और तेरे कारण प्रदान करूँगा। अल्लाह तआला ने अपनी किताब क़ुरआन मजीद में फ़रमाया है : "जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म तलाश करे, तो उसका धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [12] (सूरा आल-ए-इमरान: आयत संख्या : 85) इसे अह़मद ने रिवायत किया है। [12] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 85

और सहीह में आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जिसने कोई ऐसा काम किया, जिसके बारे में हमारा आदेश नहीं है तो वह काम अस्वीकृत है।" [13] इसे अह़मद ने रिवायत किया है। [13] बुखारी : अस्-सुल्ह (2550), मुस्लिम : अल-अक्ज़िया (1718), अबू दाऊद : अस्-सुन्नह (4606), इब्ने माजा : अल-मुक़द्दिमा (14), मुसनद अहमद (6/256)।

अध्याय:केवल आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनुसरण करने और आपके अतिरिक्त अन्य किसी का भी अनुकरण ना करने की बाध्यता

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "और हमने आपपर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का पूरा-पूरा विवरण है।" [14] (सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 89) [14] सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 89

सुनन नसई आदि में है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अनहु) के हाथ में तौरात का एक पन्ना देखा, तो फ़रमाया : "यदि मूसा (अलैहिस्सलाम) भी जीवित होते, तो उनके लिए भी मेरा अनुसरण किए बिना कोई चारा नहीं होता।" [15] यह सुनकर उमर (रज़ियल्लाहु अनहु) ने कहा : "मैं अल्लाह से प्रसन्न हूँ उसे अपना रब मानकर, इस्लाम से प्रसन्न हूँ उसे अपना धर्म स्वीकार करके और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रसन्न हूँ, उन्हें नबी मानकर।" [15] मुसनद अहमद (3/387), अद्-दारमी : अल-मुक़द्दमा (435)।

अध्याय:इस्लाम के दावे से निकल जाने का बयान

अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "उसी अल्लाह ने तुम्हारा नाम मुसलमान रखा है, इस कुरआन के उतरने से पहले भी और इसमें भी।" [16] (सूरा अल-हज, आयत संख्या : 78) [16] सूरा अल-हज, आयत संख्या : 78

हारिस अशअरी (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया : "मैं तुम्हें उन पाँच बातों का आदेश देता हूँ, जिनका अल्लाह तआला ने मुझे आदेश दिया है : शासक की बात सुनने और उसका अनुकरण करने का, जिहाद का, हिजरत (देश-परित्याग) का और मुसलमानों की जमात से जुड़े रहने का, क्योंकि जो व्यक्ति जमात से बित्ता बराबर भी दूर हुआ, उसने अपनी गर्दन से इस्लाम का पट्टा उतार फेंका, मगर यह कि वह जमात की ओर पलट आए। इसी प्रकार, जिसने जाहिलियत काल की पुकार लगाई, तो वह जहन्नम का ईंधन है।" यह सुनकर एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! चाहे वह नमाज़ पढ़े और रोज़े रखे, तो भी? फरमाया : "हाँ, चाहे वह नमाज़ पढ़े और रोज़े रखे, तो भी। अतः ऐ अल्लाह के बन्दो! तुम उस अल्लाह को पुकारो, जिसने तुम्हारा नाम मुसलमान और मोमिन रखा है।" [17] इस हदीस को इमाम अहमद और इमाम तिरमिज़ी ने रिवायत किया है और तिरमिज़ी ने इसे हसन कहा है। [17] तिरमिज़ी : अल-अमसाल (2863), अहमद (4/130)।

और सहीह में है : "जो जमात से बित्ता बराबर भी दूर या अलग हुआ और इसी अवस्था में मर गया, तो उसकी मौत, जाहिलियत काल की मौत होगी।" [18] इसी हदीस में है : "क्या जाहिलियत काल की पुकार लगाई जाएगी, जबकि मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूँ!" शैखूल इस्लाम अबुल अब्बास इब्ने तैमिय्या फरमाते हैं : इस्लाम और कुरआन के दावे के सिवा हर दावा, चाहे वह वंश का हो, देश का हो, क़ौम का हो, धर्म का हो या पंथ का, सब जाहिलियत काल की पुकार और दावे में शामिल है, बल्कि जब एक मुहाजिर और एक अंसारी के बीच झगड़ा हो गया और मुहाजिर ने मुहाजिरों को पुकारा और अंसारी ने अंसारियों को आवाज़ दी, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "क्या जाहिलियत काल की पुकार लगाई जा रही है, जबकि मैं तुम्हारे बीच मौजूद हूँ?" और इस बात से आप बहुत ज़्यादा क्रोधित हुए। शैखुल इस्लाम इमाम इब्ने तैमिय्या की बात समाप्त हुई। [18] बुखारी : अल-फितन (6664) मुस्लिम : अल-इमारा (1849), अहमद (1/297), दारमी : अस-सियर (2519)।

अध्याय:इस्लाम में पुर्णरूपेण प्रवेश होने और उसके अतिरिक्त अन्य धर्मों का परित्याग करने की अनिवार्यता

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "ऐ ईमान वालो! इस्लाम मेें पूरे- पूरे प्रवेश कर जाओ।" [19] (सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 208) अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "क्या आपने उन्हें नहीं देखा, जिनका दावा तो यह है कि जो कुछ आपपर और जो कुछ आपसे पहले उतारा गया, उसपर उनका ईमान है?" [20] (सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 60) अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "जिस दिन कुछ चेहरे चमक रहे होंगे और कुछ काले पड़े होंगे।" [21] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 106) इबने अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अहले सुन्नत व जमाअत के चेहरे उज्जवल होंगे और अहले बिदअत (मनगढ़ंत धर्म-कर्म वालों) तथा साम्प्रदायिक लोगों के चेहरे काले होंगे। [19] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 208 [20] सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 60 [21] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 106

अब्दुल्लाह बिन अमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "मेरी उम्मत पर, बिल्कुल वैसा ही समय अवश्य आएगा, जैसा कि बनी इस्राईल पर आया था, बिल्कुल वैसा ही जैसे एक जूता दूसरे के समान होता है।। यहाँ तक कि यदि उनमें से किसी ने अपनी माँ के साथ खुले-आम बलत्कार किया होगा, तो मेरी उम्मत में भी इस प्रकार का व्यक्ति होगा, जो ऐसा करेगा। और बनी इस्राईल बहत्तर समुदायों में बट गए थे।" [22] हदीस का शेष भाग इस प्रकार है : "और यह उम्मत तिहत्तर (73) फ़िरक़ों में बट जाएगी। उनमें से एक के अतिरिक्त बाक़ी सब, जहन्नम में जाएंगे।" सहाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! वह निजात पाने वाला समुदाय कौन-सा होगा, तो आपने फ़रमाया : "वही जो उस मार्ग पर चलेगा, जिसपर मैं हूँ और मेरे सहाबा हैं।" [23] यह हदीस कितनी बड़ी नसीहत है, जिसने दिलों को जीवित कर दिया! इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी ने रिवायत किया है तथा यही हदीस मुआविया (रज़ियल्लाहु अनहु) के वास्ते से अहमद व अबू दाऊद ने रिवायत की है, जिसमें आया है : "मेरी उम्मत में कुछ ऐसे लोग प्रकट होंगे, जिनके अनदर इच्छाओं का पालन इस तरह से प्रवेश कर जाएगा, जिस प्रकार पागल कुत्ते के काटने से पैदा होने वाली बीमारी काटे हुए व्यक्ति में प्रवेश कर जाती है, यहाँ तक कि वह उसके शरीर की हर नस और हर जोड़ में प्रवेश कर जाती है।" और इससे पहले अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का वह कथन गुज़र चुका है, जिसमें आया है कि इस्लाम में जाहिलियत काल का तरीका ढूँढने वाला अल्लाह के निकट तीन सबसे घृणित लोगों में से एक है। [22] तिरमिज़ी अल-ईमान (2641) [23] तिरमिज़ी अल-ईमान (2641)

अध्याह:इस बात का बयान कि बिदअत (मनगढ़ंत धर्म-कर्म) कबीरा गुनाह (महापाप) से भी अधिक खतरनाक है

क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "अल्लाह अपने साथ किसी को साझी ठहराए जाने को क्षमा नहीं करेगा और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा।" [24] (सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 48) अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "तो फिर ठीक है, क़यामत के दिन यह लोग अपने पूरे बोझ के साथ ही उन लोगों के बोझ को भी अपने ऊपर लाद लें, जिन्हें अनजाने में पथ-भ्रष्ठ करते रहे। देखो तो कैसा बुरा बोझ है जिसे ये उठा रहे हैं!" [25] (सूरा अन-नह्ल, आयत संख्या : 25) [24] सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 48 [25] सूरा अन्- नह्ल, आयत संख्या : 25

और सहीह में है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़वारिज के विषय में फ़रमाया : "उन्हें जहाँ भी पाओ, कत्ल कर दो।" [26] [26] बुखारी : अल-मनाक़िब (3415), मुस्लिम : अज़-ज़काह (1066), नसई : तहरीमुद्-दम (4102), अबू दाऊद : अस-सुन्नह (4767) अहमद (1/131)।

उसी में है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अत्याचारी शासकों को कत्ल करने से रोका, जब तक वह नमाज़ पढ़ते हों।

और जरीर ने अब्दुल्ला (रजयिल्लाहु अनहु) के हवाले से रिवायत किया है कि एक आदमी ने दान दिया फिर दान देने के लिए लोगों का तांता बंध गया। इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जिसने इस्लाम में कोई अच्छा तरीका रिवाज दिया, तो उसे अपने इस सुकृत्य का पुण्य तो मिलेगा ही, मगर उन लोगों का पुण्य भी, बिना किसी कमी के, उसके खाते में लिखा जाएगा, जो इसके बाद उसपर अमल करेंगे। दूसरी ओर, जिसने इस्लाम में कोई बुरा तरीका आविष्कार किया, तो वह अपने उस कुकृत्य के गुनाह का भुक्तभोगी होगा ही, उन लोगों का भी गुनाह, बिना किसी कमी के, उसके खाते में लिखा जाएगा, जो उसपर अमल करेंगे।" [27] इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। [27] मुस्लिम : अज़-ज़काह (1017), तिरमिज़ी : अल-इल्म (2675), नसई : अज़-ज़काह (2554), इब्ने माजा : अल-मुक़द्दमा (203), अहमद (4/359) अद-दारमी : अल-मुक़द्दमा (514)।

तथा सहीह मुस्लिम में अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से इसी के समान एक अन्य हदीस वर्णित है, जिसके शब्द हैं : "जिसने किसी हिदायत की ओर बुलाया" और फिर फ़रमाया : "जिसने किसी गुमराही की और बुलाया।" [28] [28] मुस्लिम : अल-इल्म (2674), तिरमिज़ी : अल-इल्म (2674), अबू दाऊद : अस-सुन्नह (4609 ), अहमद (2/397), अद्-दारमी : अल-मुक़द्दमा (513)।

अध्याय:इस बात का बयान कि अल्लाह तआला बिद्अती (मनगढ़ंत धर्म-कर्म करने वाले) की तौबा स्वीकार नहीं करता।

यह बात अनस (रजियल्लाहु अनहु) से वर्णित हसन बसरी की मुर्सल हदीस से प्रमाणित है।

इब्ने वज़्ज़ाह ने अय्यूब के हवाले से बयान किया है कि उन्होंने कहा : हमारे बीच एक आदमी था, जो कोई गलत अवधारणा रखता था। फिर उसने वह विचार त्याग दिया, तो मैं मुहम्मद बिन सीरीन के पास आया और उनसे कहा : क्या आपको पता है कि अमुक ने अपना विचार त्याग दिया है? तो उन्होंने कहा : अभी देखो तो सही, वह किस दिशा में जाता है, क्योंकि ऐसे लोगों के संबंध में जो हदीस आई है, उसका यह अंतिम भाग उसके प्रारंभिक भाग से अधिक सख्त है : "वे इस्लाम से निकल जाएँगे और फिर उसकी ओर पुनः वापस नहीं लौटेंगे।" [29] इमाम अहमद बिन हंबल से इसका अर्थ पूछा गया, तो उन्होंने फ़रमाया : ऐसे आदमी को तौबा करने का सुयोग नहीं मिलता। [29] बुखारी : अत-तौहीद (6995), मुस्लिम : अज़-ज़काह (1064), नसई : अज़-ज़काह (2578 ), अबू दाऊद : अस-सुन्नह (4764 ), मुसनद अहमद (3/68)।

अध्याय : अल्लाह तआला का फ़रमान : "ऐ अहले किताब! (यहूदी एवं ईसाई) तुम इब्राहीम के विषय में क्यों झगड़ते हो?"

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "ऐ अहले किताब! (यहूदी एवं ईसाई) तुम इब्राहीम के विषय में क्यों झगड़ते हो?" [30] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 65) अल्लाह तआला के इस कथन तक : "और वह मुश्रिक (अनेकेश्वरवादी) नहीं थे।" [31] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 67) और दूसरे स्थान पर फ़रमाया : "और इब्राहीम के धर्म से वही मुँह मोड़ेगा, जो मूर्ख होगा। हमने तो उन्हें दुनिया में भी चुन लिया था और आख़िरत में भी वह सदाचारियों में से हैं।" [32] (सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 130) सहीह में ख़वारिज से संबंधित हदीस मौजूद है, जो गुज़र चुकी है तथा सहीह में है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "अमुक व्यक्ति के परिजन मेरे दोस्त नहीं। मेरे दोस्त, परहेज़गार एवं धर्मपरायण लोग हैं।" [33] और सही में अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) से यह भी वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बताया गया कि किसी सहाबी ने कहा है कि मैं मांस नहीं खाऊँगा, दूसरे ने कहा कि मैं औरतों के समीप तक नहीं जाऊँगा, जबकि तीसरे ने कहा है कि मैं लगातार रोज़ा रखूँगा, बिना रोज़े के एक दिन भी नहीं रहूँगा। इनकी बातें सुनकर, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "किन्तु मेरा हाल यह है कि मैं रात को नमाज़ पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ। रोज़ा रखता हूँ और बिना रोज़े के भी रहता हूँ तथा मैं महिलाओं से शादी करता हूं और मांस भी खाता हूँ। याद रखो कि जिसने मेरी सुन्नत से मुँह मोड़ा, वह मुझसे नहीं है।" [34] ज़रा सोचिए, जब कुछ सहाबियों ने इबादत के उद्देश्य से दुनिया की माया एवं जंजाल से कट जाने की इच्छा प्रकट की, तो उनके बारे में यह कठोर बात कही गई और उनके काम को सुन्नत से मुँह मोड़ना बताया गया। ऐसे में, अन्य बिद्अतों (मनगढ़ंत धर्म-कर्म) और सहाबा के अतिरिक्त अन्य लोगों के बारे में आपका क्या विचार है? [30] सूरा आल-ए- इमरान, आयत संखया : 65 [31] सूरा आल-ए- इमरान, आयत संख्या : 67 [32] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :130 [33] बुखारी : अल-अदब (5644), मुस्लिम : अल-ईमान (215), अहमद (4/203)। [34] बुखारी : अन्-निकाह (4776), मुस्लिम : अन्-निकाह (1401), नसई : अन-निकाह (3217), अहमद (3/285)।

अध्याय : अल्लाह तआला का फ़रमान : "आप बेलाग होकर अपना मुँह अल्लाह के धर्म की ओर कर लें।"

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "आप बेलाग होकर अपना मुँह धर्म की ओर कर लें। यही अल्लाह तआला की वह प्राकृति है जिसपर उसने लोगों को पैदा किया है। अल्लाह की सृष्टि को बदलना नहीं है। यही सीधा धर्म-मार्ग है, किन्तु अधिकांश लोग नहीं जानते।" [35] (सूरा अर-रूम, आयत संख्या : 30) [35] सूरा अर-रूम, आयत संख्या : 30

अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "और इब्राहीम ने इसी धर्म की अपने बेटों को वसीयत की और याकूब ने भी अपनी संतति से इसी धर्म पर अडिग रहने का वचन लिया। कहा कि ऐ मेरे बेटो! अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए इस धर्म को चुन लिया है। इसलिए, तुम मुसलमान होकर ही मरना।" [36] (सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :132) और दूसरे स्थान पर फ़रमाया : "फिर हमने आपकी ओर यह वह्य (प्रकाशना) भेजी कि आप बेलाग होकर इब्राहीम के धर्म का अनुसरण कीजिए, जो एकेश्वरवादी थे और बहुदेववादियों में से नहीं थे।" [37] (सूरा अन्-नह्ल, आयत संख्या : 123) [36] सूरा बक़रा, आयत संख्या : 132 [37] सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 123

तथा अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "प्रत्येक नबी के नबियों में से कुछ दोस्त होते हैं और उनमें से मेरे दोस्त इब्राहीम हैं, जो मेरे बाप और मेरे रब के प्रगाढ़ दोस्त हैं।" [38] इसके बाद आपने क़ुरआन की इस आयत का पाठ किया : "सब लोगों से अधिक इब्राहीम से निकट वह लोग हैं, जिन्होंने उनका अनुसरण किया और यह नबी और वह लोग हैं जो ईमान लाए, और मोमिनों का दोस्त अल्लाह है।" [39] (सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 68] इसे तिरमिज़ी ने रिवायत किया है। [38] तिरमिज़ी : तफ़सीरुल क़ुरआन (2995 ), अहमद (1/430)। [39] सूरा आल-ए- इमरान, आयत संख्या : 68

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "अल्लाह तआला तुम्हारा शरीर और तुम्हारा धन नहीं देखता, बल्कि तुम्हारा दिल और कर्म देखता है।" [40] [40] मुस्लिम : अल-बिर्र वस्-सिलह वल-आदाब (2564)।

बुखारी एवं मुस्लिम में इब्ने मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "मैं हौज़-ए- कौसर पर तुम सबसे पहले पहुँचा रहूँगा। मेरे पास मेरी उम्मत के कुछ लोग आएंगे। जब मैं उन्हें देने के लिए बढूँगा, तो वह मेरे पास आने से रोक दिए जाएंगे। मैं कहूँगाः ऐ मेरे पालनहार! यह तो मेरी उम्मत को लोग हैं। इसपर मुझसे कहा जाएगा कि आपको पता नहीं कि आपके बाद इन्होंने क्या- क्या बिद्अतें (मनगढ़ंत धर्म-कर्म) आविष्कृत कर ली थीं।" [41] [41] बुख़ारी : अल-फ़ितन (6642), मुस्लिम : अल-फ़ज़ाइल (2297) इब्ने माजा : अल-मनासिक (3057), अहमद (5/393)।

बुख़ारी एवं मुस्लिम में अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "मेरी इच्छा हुई कि हम अपने भाइयों को देख लेते।" सहाबा किराम ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हम आपके भाई नहीं हैं? तो फ़रमाया : "तुम मेरे असहाब अर्थात संगी-साथी हो। मेरे भाई वह लोग हैं, जो अब तक नहीं आए।" सहाबा ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आपकी उम्मत के जो लोग अभी तक पैदा नहीं हुए, आप उन्हें कैसे पहचान लेंगे? तो फ़रमाया : "क्या बिल्कुल काले-कलौटे घोड़ों के बीच अगर किसी के सफ़ेद माथे और सफ़ेद पैरों वाला घोड़े हों, तो क्या वह अपना घोड़ों को नहीं पहचान पाएगा?" उन्होंने उत्तर दिया : हाँ, क्यों नहीं। तो आपने फ़रमाया : "मेरी उम्मत भी क़यामत के दिन इस प्रकार उपस्थित होगी कि वज़ू के प्रभाव से उनके चेहरे और अन्य वज़ू के अंग चमक रहें होगे। मैं हौज़-ए-कौसर पर पहले से उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँगा। सुनो, क़यामत के दिन कुछ लोग मेरे हौज़-ए-कौसर से उसी प्रकार ही धिक्कार दिए जाएंगे, जिस प्रकार पराए ऊँट को धिक्कार दिया जाता है। मैं उन्हें आवाज़ दूँगा कि सुनो, इधर आओ, तो मुझसे कहा जाएगा कि यह वह लोग हैं, जिन्होंने आपके बाद धर्म में परिवर्तन किया था। मैं कहूँगा कि फिर तो दूर हो जाओ, दूर हो जाओ।" [42] [42] बुख़ारी : अल-मुसाक़ात (2238), मुस्लिम : अत-तहारह (249), नसई : अत-तहारह (150), अबू दाऊद : अल-जनाइज़ (3227), इब्ने माजा : अज़-ज़ुह्द (4306), अहमद (2/300), मुवत्ता इमाम मालिक : अत्-तहारह (60)।

और सहीह बुख़ारी में है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "जिस समय मैं हौज़-ए-कौसर पर खड़ा रहूँगा, लोगों का एक समूह आएगा। जब मैं उन्हें पहचान लूँगा, तो मेरे और उनके बीच से एक आदमी निकलेगा और उनसे कहेगा : इधर आओ। मैं पूछुूँगा : कहाँ? वह कहेगा : अल्लाह की क़सम! जहन्नम की ओर। मैं कहूँगा : इनका क्या मामला है? वह कहेगा : यह वह लोग हैं, जो आपके बाद इस्लाम धर्म से फिर गए थे। फिर इसके बाद एक अन्य समूह प्रकट होगा।" इस समूह के बारे में भी आपने वही बात कही, जो पहले समूह के बारे में कही थी। इसके बाद आपने फ़रमाया : "इनमें से निजात प्राप्त करने वालों की संख्या भटके हुए ऊँटों के समान अर्थात बहुत ही कम होगी।" [43] [43] बुख़ारी : अर-रिक़ाक़ (6215)।

और बुख़ारी एवं मुस्लिम में इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) की हदीस है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "उस समय मैं वही कहूँगा, जो अल्लाह के नेक बंदे (ईसा अलैहिस्सलाम) ने कहा था : {जब तक मैं उनके बीच रहा, उनपर गवाह रहा। फिर जब तूने मुझे उठा लिया तो तू ही उनसे अवगत रहा और तू हर चीज़ की पूरी सूचना रखता है।}" [44] (सूरा अल-माइदा, आयत संख्या :117) [44] सूरा अल-माइदा, आयत संख्या :117

तथा बुख़ारी एवं मुस्लिम में इब्ने अब्बास से मरफ़ूअन रिवायत है : "हर बच्चा फ़ितरत (इस्लाम) पर पैदा होता है। फिर उसके माँ-बाप उसे ईसाई, यहूदी या मजूसी बना देते हैं। जिस प्रकार कि चौपाया, निपुण चौपाए को जनता है। क्या तुम उनमें से कोई चौपाया ऐसा पाते हो, जिसके कान कटे-फटे हों? यहाँ तक कि तुम ही स्वयं उसके कान चीर-काट देते हो।" [45] इसके बाद अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) ने यह आयत पढ़ी : "अल्लाह की वह फ़ितरत (प्रकृति), जिसपर उसनेे लोगों को पैदा किया है।" [46] (सूरा अर-रूम, आयत संख्या : 30) बुख़ारी एवं मुस्लिम। [45] बुख़ारी : अल-जनाइज़ (1292), मुस्लिम : अल-क़द्र (2658), तिरमिज़ी : अल-क़द्र (2138), अबू दाऊद : अस्-सुन्नह (4714), मुवत्ता इमाम मालिक : अल-जनाइज़ (569)। [46] सूरा अर-रूम, आयत संख्या : 30

हुज़ैफा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं : लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से भलाई के विषय में प्रश्न करते थे और मैं आपसे बुराइयों के बारे में पूछता था, इस डर से कि मैं उनका शिकार न हो जाऊँ। मैंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! हम परौढ़ युग और बुराइयों में पड़े हुए थे। फिर अल्लाह तआला ने हमें भलाई की नेमत से सम्मानित किया, तो क्या इस भलाई के बाद भी फिर कोई बुराई होगी? आपने फ़रमाया : "हाँ।" मैंने कहा : क्या इस बुराई के बाद फिर ख़ैर का ज़माना आएगा? फ़रमाया : "हाँ। किन्तु उसमें खोट होगी।" मैंने कहा : कैसी खोट होगी? आपने फ़रमाया : "कुछ लोग ऐसे होंगे, जो मेरी सुन्नत और हिदायत को छोड़कर दूसरों का तरीक़ा अपना लेंगे। तुम्हें उनके कुछ काम उचित मालूम होंगे और कुछ काम अनुचित।" मैंने कहा : क्या इस ख़ैरे के बाद फिर बुराई प्रकट होगी? फ़रमाया : "हाँ, भयानक अंधे फ़ितने प्रकट होंगे और नरक की ओर बुलाने वाले लोग पैदा होंगे। जो उनकी सुनेगा, उसे नरक में झोंक देंगे।" मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! आप हमें उनकी विशेषताएँ बता दें। फ़रमाया : "वह हममें से ही होंगे और हमारी ही भाषा में बात करेंगे।" मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यदि यह समय मुझे मिल जाए, तो आप मुझे क्या आदेश देते हैं? फ़रमाया : "मुसलमानों की जमात और उनके इमाम के साथ जुड़े रहना।" मैंने कहा कि अगर उस समय मुसलमानों की कोई जमात और उनका इमाम न हो तो क्या करूँ? फ़रमाया : "फिर इन सभी समुदायों से अलग रहना, भले ही तुमको पेड़ की जड़ों को चबाना पड़े, यहाँ तक कि इसी हालत में तुम्हारी मृत्यु हो जाए।" [47] इसी हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है, किन्तु मुस्लिम की रिवायत में यह इज़ाफ़ा भी है : इसके बाद क्या होगा? फ़रमाया : "फिर दज्जाल प्रकट होगा। उसके साथ एक नहर और एक आग होगी। जो उसकी आग में प्रवेश करेगा, उसका पुण्य साबित हो जाएगा"। मैंने कहा : फिर इसके बाद क्या होगा? फ़रमाया : "इसके बाद क़यामत आएगी।" [48] अबुल आलिया कहते हैं : इस्लाम की शिक्षा प्राप्त करो। जब इस्लाम की शिक्षा प्राप्त कर लो, तो उससे मुँह न मोड़ो। सीधे मार्ग पर चलते रहो, क्योंकि यही इस्लाम है। इसे छोड़कर दाँए- बाँए न मुड़ो और अपने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत पर अमल करते रहो और भ्रष्ट धारणाओं और बिदअतों के निकट भी न जाओ। अबुल आलिया का कथन समाप्त हुआ। [47] बुखारी : अल-मनाक़िब (3411), मुस्लिम : अल-इमारा (1847), अबू दाऊद : अल-फ़ितन वल-मलाहिम (4244), इ्बने माजा : अल-फ़ितन (3979), अहमद (5/387)। [48] बुखारी : अल-मनाक़िब, (3411), मुस्लिम : अल-इमारह (1847), अबू दाऊद : अल-फ़ितन वल-मलाहिम (4244), इ्बने माजा : अल-फितन (3979), अहमद (5/404)।

अबुल आलिया (उनपर अल्लाह की कृपा हो) के इस कथन पर चिंतन-मंथन करो। कितना ऊँचा है उनका कथन! और उनके उस समय का स्मरण करो, जिसमें वह इन भ्रष्ट धारणाओं एवं बिदअतों से सावधान कर रहें हैं कि जो इन गलत आस्थाओं एवं बिदअतों में पड़ जाए, वह मानो, इस्लाम से फिर गया। किस प्रकार उन्होंने इस्लाम की व्याख्या सुन्नत से की है और बड़े-बड़े ताबिई़न और विद्वानों के किताब व सुन्नत के दायरे से निकल जाने का डर, उनको सता रहा है! इससे तुम्हारे लिए अल्लाह तआला के इस फ़रमान का अर्थ स्पष्ट हो जाएगा : "जब उनके रब ने उनसे कहा : आज्ञाकारी हो जाओ।" [49] (सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :131) और अल्लाह तआला के इस फ़रमान का भी अर्थ स्पष्ट हो जाएगा : "इसी बात की वसीयत इब्राहीम ने और याक़ूब ने अपनी-अपनी संतान को यह कहकर की कि ऐ मेरे बेटो! अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को चुन लिया है। इसलिए तुम मुसलमान होकर ही मरना।" [50] (सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :132) तथा अल्लाह तआला के इस फ़रमान का भी अर्थ स्पष्ट हो जाएगा : "और इब्राहीम के धर्म से वही मुहँ मोड़ेगा, जो मूर्ख होगा।" [51] (अल-बक़रा, आयत संख्या :130) इस प्रकार की और भी मूल बातें ज्ञात होंगी, जो मूल आधार की बुनियाद रखती हैं, परन्तु लोग उनसे निश्चेत हैं। अबुल आलिया के कथन पर चिंतन करने से इस अध्याय में उल्लिखित हदीसों और इन जैसी अन्य हदीसों का भी अर्थ स्पष्ट हो जाएगा। परन्तु जो व्यक्ति यह और इन जैसी अन्य आयतों और हदीसों को पढ़कर गुज़र जाए और इस बात से संतुष्ट हो कि वह इन ख़तरों का शिकार नहीं होगा और सोचे कि इसका संबंध ऐसे लोगों से है, जो अल्लाह तआला की पकड़ से निश्चेत थे, तो जान लीजिए कि यह व्यक्ति भी अल्लाह तआला की पकड़ से निडर है और अल्लाह की पकड़ से वही लोग निडर होते हैं, जो घाटा उठाने वाले हैैं। [49] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :131 [50] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :132 [51] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या :130

और अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक लकीर खींची और फ़रमाया : "यही अल्लाह का सीधा मार्ग है।" फिर उस लकीर के दाएं-बाएं कई लकीरें खींचीं और फ़रमाया : "यह ऐसे मार्ग हैं, जिनमें से हर मार्ग पर शैतान बैठा हुआ है और अपनी ओर बुला रहा है।" इसके बाद आपने इस आयत का पाठ किया : {और यही मेरा सीधा मार्ग है, इसलिए तुम इसी पर चलो, और दूसरे मार्गों पर मत चलो कि वह तुम्हें अल्लाह के मार्ग से अलग कर देंगे।} [52] (सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 153) इस हदीस को इमाम अहमद और नसई ने रिवायत किया है। [52] सूरा अल-अनआम, आयत संख्या :153

अध्याय:इस्लाम का अजनबी हो जाना और अजनबियों की श्रेष्ठता

अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तो क्यों न तुमसे पहले के लोगों में ख़ैर वाले हुए, जो धरती पर दंगा फ़ैलाने से रोकते, सिवाय उन थो़ड़े लोगों के, जिन्हें हमने उनमें से नजात दी थी?" [53] (सूरा हूद, आयत संख्या :116) अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से मरफ़ूअन वर्णित है : "इस्लाम की शुरूआत अजनबी हालत में हुई और शीघ्र ही वह पहले के समान अजनबी हो जाएगा। ऐसे में, शुभ सूचना है अजनबियों के लिए।" [54] इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है तथा इसे इमाम अहमद ने अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) के हवाले से रिवायत किया है, जिसमें आया है : कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! ग़ुरबा (अजनबी) कौन लोग हैं? तो आपने फ़रमाया : "अल्लाह के मार्ग में अपने वतन तथा खानदान को छोड़ देने वाले और वह लोग, जो उस समय नेक और सदाचारी होंगे, जब अधिकांश लोग बिगड़ चुके होंगे।" [55] [53] सूरा हूद, आयत संख्या :116 [54] मस्लिम : अल-ईमान (145), इब्ने माजा : अल-फितन (3986), अहमद (2/389)। [55] अहमद (4/74)

इमाम तिरमिज़ी ने कसीर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अनहु) के वास्ते से रिवायत किया है, वह अपने बाप के वास्ते से अपने दादा से रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "शुभसूचना है उन अजनबियों के लिए, जो मेरी उन सुन्नतों को सुधारेंगे, जिन्हें लोग बिगाड़ चुके होंगे।" [56] [56] सुनन तिरमिज़ी, अल-ईमान (2630)।

अबू उमय्या कहते हैं कि मैंने अबू सालबा से पूछा कि इस आयत के बारे में आप क्या कहते हैं : "ऐ ईमान वालो! तुम अपनी चिंता करो। यदि तुम सीधे मार्ग पर डटे रहोगे, तो जो पथभ्रष्ट हैं, वे तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे।" [57] (सूरा अल-माइदा :105) तो अबू सालबा ने कहा कि अल्लाह की क़सम! इस आयत के बारे में मैंने सबसे अधिक जानकार अर्थात अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया था, तो आपने फ़रमाया था : "तुम आपस में एक-दूसरे को भलाई का आदेश देते और बुराई से रोकते रहो, यहाँ तक कि जब देख लो कि अति लालच का अनुपालन किया जा रहा है, कामनाओं की पैरवी की जा रही है, दुनिया को प्रधानता दी जा रही है और हर व्यक्ति अपनी विचारधारा पर मस्त और मग्न है, तो अपनी चिंता करो और आमजन को छोड़ दो, क्योंकि तुम्हारे बाद ऐसे दिन आने वाले हैं, जिनमें धर्म पर धैर्य से जमे रहने वाला आग का अंगारा पकड़ने वाले के समान होगा और उनमें अमल करने वाले को ऐसे पचास आदमियों के बराबर पुण्य मिलेगा, जो तुम्हारे ही जैसा अमल करने वाले हैं।" हमने कहा कि क्या हममें से पचास आदमी या उनमें से पचास आदमी? तो आपने फ़रमाया : "बल्कि तुममें से"। [58] इस हदीस को अबू दाऊद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है। [57] सूरा अल-माइदा, आयत संख्या :105 [58] तिरमिज़ी : तफ़सीरुल क़ुरआन (3058), इब्ने माजा : अल-फ़ितन (4014)।

इब्ने वज़्ज़ाह ने इसी अर्थ की हदीस, इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) के हवाले से रिवायत की है, जिसके शब्द इस प्रकार हैं : "तुम्हारे बाद ऐसे दिन आएंगे, जिनमें धैर्य करने वाले और आज तुम जिस धर्म-मार्ग पर हो, उसपर जमे रहने वाले को तुम्हारे पचास आदमियों के बराबर पुण्य मिलेगा।" [59] इसके बाद इब्ने वज़्जाह ने कहा कि हमसे मुहम्मद बिन सईद ने बयान किया, उन्होंने कहा कि हमसे असद ने बयान किया, उन्होंने कहा कि हमसे सुफयान बिन उययना ने बसरी से और उन्होंने हसन के भाई सईद से रिवायत की, वह मरफ़ूअन रिवायत करते हैं : "आज तुम अपने रब के स्पष्ट मार्ग पर हो, भलाई का आदेश देते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह के मार्ग में जिहाद करते हो। अभी तक तुम्हारे अंदर दो नशे प्रकट नहीं हुए हैंः एक अज्ञानता का नशा और दूसरा जीवन से प्यार का नशा। परन्तु शीघ्र ही तुम्हारी यह हालत बदल जाएगी।उस समय क़ुरआन एवं सुन्नत पर जमे रहने वाले को पचास आदमियों के बराबर पुण्य मिलेगा।" पूछा गया कि क्या उनके पचास आदमाी के बराबर? आपने फ़रमाया : "नहीं, बल्कि तुम्हारे पचास आदमियों के बराबर।" इब्ने वज्जाह ने एक दूसरी सनद से मुआफ़िरी से रिवायत किया है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः शुभसंदेश है उन अजनबियों के लिए, जो उस वक्त अल्लाह की किताब को मज़बूती के साथ थामे रहेंगे, जब उसको छोड़ दिया जाएगा और जब सुन्नत की रोशनी बुझा दी जाएगी, तो वे उस पर अमल करेंगे ।"[60] [59] तिरमिज़ी : तफ़सीरुल क़ुरआन (3058), इब्ने माजा : अल-फ़ितन (4014)। [60] मुसनद अहमद (2/222)।

बिद्अतों पर चेतावनी

इरबाज़ बिन सारिया (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वह बयान करते हैं : अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें एक बड़ा ही प्रभावशाली उपदेश दिया, जिससे हमारे दिल काँप उठे और आँखें आँसू बहाने लगीं। हमने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह तो विदाई उपदेश जान पड़ता है। आप हमें वसीयत कीजिए। तो आपने फ़रमाया : "मैं तुम्हें अल्लाह से डरने तथा शासकों की बात मानने और सुनने की वसीयत करता हूँ, भले ही कोई दास तुम्हारा शासक बन जाए। तुममें सो जो व्यक्ति जीवित रहेगा, वह बहुत मतभेद देखेगा। ऐसी अवस्था में तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद संमार्गी शासकों (ख़ुलफ़ा-ए- राशिदीन) का तरीका अपनाए रखना और उसे द्दढ़ता से थामे रहना और धर्म-मार्ग में नई आविष्कृत बिद्अतों से बचे रहना, क्योंकि हर बिद्अत पथभ्रष्टता है।" [61] इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी ने रिवायत किया और हसन कहा है। [61] तिरमिज़ी : अल-इल्म (2676), अबू दाऊद : अस्-सुन्नह (4607), इब्ने माजा : अल-मुक़द्दिमा (44), अहमद (4/126), दारमी : अल-मुक़द्दिमा (95)।

और हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है, वे कहते हैं कि हर वह इबादत जिसे मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा किराम ने न किया हो, उसे तुम भी न करना, क्योंकि अगलों ने बाद में आने वालों के लिए किसी बात की गुंजाइश नहीं छोड़ी है। अतः ऐ क़ारियों की जमात! अल्लाह तआला से डरो और अपने असलाफ़ (पूर्वजों) के तरीके पर चलते रहो। इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। और इमाम दारमी कहते हैं कि हमें हकम बिन मुबारक ने सूचना दी, हकम बिन मुबारक कहते हैं कि हमसे अम्र बिन यह्या ने बयान किया और अम्र बिन यह़्या कहते हैं कि मैंने अपने बाप से सुना, वह अपने बाप से रिवायत करते हैं कि उन्होंने फ़रमाया : हम फ़ज्र की नमाज़ से पहले अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) के दरवाज़े पर बैठ जाते थे और जब वह घर से निकलते, तो उनके साथ मस्जिद की तरफ चल पड़ते थे। एक दिन की बात है कि अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अनहु) आए और कहने लगे कि क्या अबू अब्दुर्रहमान (अब्दुल्लाह बिन मसऊद) निकले नहीं? हमने उत्तर दिया : नहीं। यह सुनकर वह भी हमारे साथ बैठ गए, यहाँ तक कि इब्ने मसऊद बाहर निकले, तो हम सब उनकी ओर बढ़े। इतने में अबू मूसा अशअरी ने उनसे कहा : ऐ अबू अब्दुर्रहमान! मैं अभी-अभी मस्जिद में एक नई बात देखकर आ रहा हूँ। हालाँकि जो बात मैंने देखी है, वह अल-हम्दु लिल्लाह ख़ैर ही है। इब्ने मसऊद ने कहा कि वह कौन-सी बात है? अबू मूसा अशअरी ने कहा कि अगर जिंदगी रही, तो शीघ्र ही आप भी देख लेंगे। उन्होंने कहा : वह बात यह है कि कुछ लोग नमाज़ की प्रतीक्षा में मस्जिद के भीतर गोष्ठियाँ बनाए बैठे हैं। उन सब के हाथों में कंकड़ियाँ हैं और हर गोष्ठी में एक-एक आदमी नियुक्त है, जो उनसे कहता है कि सौ बार अल्लाहु अकबर कहो, तो सब लोग अल्लाहु अकबर कहते हैं। फिर कहता है कि सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाह कहो, तो सब लोग सौ बार ला इलाहा इल्लल्लाह कहते हैं। फिर कहता है कि सौ बार सुबहान अल्लाह कहो, तो सब लोग सुबहान अल्लाह कहते हैं। इब्ने मसऊद ने कहा कि आपने उनसे क्या कहा? अबू मूसा ने जवाब दिया कि इस संबंध में आपका विचार जानने की प्रतीक्षा में मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। इब्ने मसऊद ने फ़रमाया कि आपने उनसे यह क्यों नहीं कहा कि तुम अपने गुनाह शुमार करो और फिर इस बात का दायित्व ले लेते कि उनकी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी। यह कहकर इब्ने मसऊद, मस्जिद की ओर रवाना हुए और हम भी उनके साथ चल पड़े। मस्जिद पहुँचकर इब्ने मसऊद उन संगोष्ठियों में से एक के पास खड़े हुए और फ़रमाया : तुम लोग क्या कर रहे हो? उन्होंने जवाब दिया कि ऐ अबू अब्दुर्रहमान! यह कंकड़ियाँ हैं, जिनपर हम तकबीर, तहलील और तसबीह गिन रहे हैं। इब्ने मसऊद ने फ़रमाया : इसकी बजाय तुम अपने गुनाह गिनो और मैं इस बात का जिम्मा लेता हूँ कि तुम्हारी कोई भी नेकी नष्ट नहीं होगी। तुम्हारी खराबी हो ऐ अल्लाह के रसूल मुहम्मद की उम्मत! अभी तो तुम्हारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा बड़ी संख्या में उपस्थित हैं, अभी आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के छो़ेड़े हुए कपड़े भी नहीं फटे हैं, आपके बर्तन नहीं टूटे हैं और तुम इनी जल्दी तबाही के शिकार हो गए?! कसम है उस हस्ती की, जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम या तो एक ऐसी शरीयत पर चल रहे हो, जो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शरीयत से श्रेष्ठ है या फिर तुम गुमराही का दरवाज़ा खोल रहे हो। उन्होंने कहा कि ऐ अबू अब्दुर्रहमान! अल्लाह की क़सम, इस काम से ख़ैर के सिवाय हमारा कोई और उद्देश्य नहीं था। तो इब्ने मसऊद ने फ़रमाया : ऐसे कितने ख़ैर के आकांक्षी हैं, जो ख़ैर तक कभी नहीं पहुँच पाते। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें बताया है कि एक कौम ऐसी होगी, जो क़ुरआन पढ़ेगी, किन्तु क़ुरआन उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा। अल्लाह की क़सम! क्या पता कि उनमें से अधिकांश शायद तुम्हीं में से हों। अम्र बिन सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि इन संगोष्ठियों के अधिकांश लोगों को हमने देखा कि नहरवान की लड़ाई में वे ख़वारिज के गिरोह में शामिल होकर हमसे जंग कर रहे थे।