أدلة وجود الله - رسالة الرحمة

أدلة وجود الله - رسالة الرحمة

تتناول المطوية أدلة وجود الله تعالى، مؤكدة أن معرفة الخالق الذي أبدع الكون بدقة وإتقان هي الأساس لعبادته وحده. تشير إلى أن الله غني عن مخلوقاته وهم في حاجة دائمة إليه، وترفض فكرة تعدد الآلهة. تبرز الفطرة البشرية التي تميل نحو عبادة الخالق وتؤكد أن الكون وما فيه من إتقان وإحكام دليل على وجود خالق عليم حكيم. وتوضح أن تفاصيل خلق الإنسان وتطوره منذ أن كان جنينًا تثبت علم الله وحكمته. في الختام، تؤكد المطوية أن هذه الأدلة تدل على أن الإسلام هو الطريق الصحيح لعبادة الله.

Language: lang_hi
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अल्लाह के अस्तित्व के प्रमाण

भाषाः अरबी

इससे पहले कि हम उस पूज्य का निर्धारण करें जो वाकई पूजे जाने के लायक है, हमें इस बात का निर्धारण करना चाहिए कि इस विशाल ब्रह्माण्ड को किसने बनाया है और हम सबको इस बेमिसाल अंदाज़ में और इस असीम रूप से सटीक निपुणता के साथ किसने पैदा किया है?

क्योंकि जब हम यह जान लेंगे कि इस ब्राह्मांड को उसकी समस्त कणिकाओं के साथ किसने पैदा किया है, तो हम सब इस बात पर भी सहमत हो जाएँगे कि वही अकेले पूजे जाने का हकदार है, उसका कोई साझी नहीं है। जो लोग जगत-सृष्टा के अस्तित्व को स्वीकारते हैं मगर उसके साथ-साथ दूसरों को भी पूजते हैं, वे वास्तव में अपने इस दृष्टिकोण में एक बुनियादी गलती करते हैं, क्योंकि वह सृष्टा जिसने अकेले सारी सृष्टि की रचना की, विवेक कहता है कि अकेले उसे और बस उसे ही पूजा जाना चाहिए। इसी तरह यह भी लाजिम है कि इन सभी सृष्टियों को बनाने में सक्षम रचयिता बड़ा हिकमत वाला ज्ञानी होगा, हिकमत और ज्ञान में उस जैसा कोई और होगा ही नहीं। इसलिए विवेक यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि उसका कोई समतुल्य भी होगा जो उसके साथ-साथ पूजे जाने का हकदार हो।

क्योंकि जब यह माहिर एवं निपुण स्रष्टा इस असीम कायनात को बिना किसी अग्रिम मिसाल के इस महारत के साथ पैदा कर सकता है, तो वह बेशक किसी भी चीज को पैदा करने में असमर्थ नहीं होगा, बल्कि हर चीज को जब चाहे और जिस तरह चाहे, पैदा कर लेगा। जैसे कि अगर सब लोग किसी को उसका भागीदार बनाकर उसकी उपासना करने लगें तो यह महान स्रष्टा अपनी किसी आवश्यकता के बिना ही तमाम लोगों को क्षमा कर दे। और जैसे कि किसी को बिना माता-पिता के पैदा कर दे, जिस तरह तमाम इंसानों के बाप आदम (अलैहिस्सलाम) को बिना माता-पिता के पैदा किया था।

उसी प्रकार, इस अविष्कारक सृष्टा के लिए जरूरी है कि वह अपनी तमाम सृष्टियों से बेनियाज़ (निस्पृह) हो, उसे उनकी कोई जरूरत ही न हो। उसके राज्य में उनकी इबादतों से न कोई वृद्धि हो और ना ही उनके गुनाहों से उसके राज्य में किसी तरह की कोई कमी आए, क्योंकि वह सबसे बेनियाज़ है और सारी सृष्टियाँ उसकी रहमत एवं करूणा की हर वक्त जरूरतमंद हैं।

और यदि कोई सोचता है कि कुछ और भी पूज्य हैं जिनकी इस आविष्कारक सृष्टा के साथ या उसके अलावा पूजा की जानी चाहिए, तो वास्तव में वह बहुत बड़ी भूल कर रहा है, यदि वह जरा-सा सोच-विचार कर ले तो वह गड़बड़ उसके सामने खुलते देर नहीं लगेगी, जो उसने अल्लाह की एक सृष्टि को उस पूज्य की जगह पर रखकर की है जिसने अकेले हर चीज को पैदा किया है।

आकाश के ग्रह सितारे, विभिन्न वर्गों के मानव, चाहे वे नबी हों या सदाचारी हों या किसी अन्य प्रकार के लोग हों, या फिर अल्लाह की दूसरी सृष्टियाँ हों जैसे फ़रिश्ते, जिन्नात, पत्थर, पेड़ और दूसरी ज़िंदा चीजें, सबके सब सृष्टि के अंतर्गत ही आते हैं। और विवेक कहता है कि यह सारी सृष्टियाँ अस्तित्व में नहीं थीं और एक ऐसे सृष्टा की जरूरतमंद थीं जो उन्हें अस्तित्व में ले आए। फिर यह कैसे मुमकिन है कि हम एक मज़बूत, महान और हर चीज में सक्षम सृष्टा और एक कमज़ोर सृष्टि जो इस बात की मोहताज थी कि कोई उसे इस दुनिया में अस्तित्व में लाए, को एक समान मानें ? क्या सृष्टा इस बात का मोहताज है कि वह अपने साथ किसी और को भी पूज्य ठहराए, जिसकी लोग उसके साथ-साथ इबादत करें? इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे विचारों को स्वीकार करना, परिपक्व विवेक के लिए असंभव है।

इस हिकमत वाले रचयिता के वजूद की अनगिनत दलीलें हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैंः

लोगों की आत्मा में छिपी बंदगी की प्रवृत्ति, जिसपर मनोविज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान की गवाही भी मौजूद है कि मनुष्य की मनोवृत्ति ही उसे एक ऐसे रचयिता की ओर खींचकर ले जाती है जिसकी वह इबादत कर सके। मान लें कि कुछ लोग दूर-दराज़ के किसी द्वीप में पैदा हुए और किसी भी ऐसे बाहरी प्रभाव की चपेट में नहीं आए जो उनकी प्रकृति को बिगाड़ सकता था, तो निश्चय ही उनकी मनोवृत्ति बिना किसी लाग-लपेट या दूसरों के प्रभाव के, जगत-सृष्टा की इबादत की तरफ ही जाएगी। हर मनुष्य की आत्मा में एक ऐसी व्यक्तिगत दरिद्रता (ज़रूरतमंदी) है जिसको एक ऐसी निस्पृह सम्पूर्ण अनदेखी शक्ति की जरूरत है जिससे इंसान फायदा पाने और हानि को टालने की आशा रख सके और विशेषकर मुसीबतों के समय उसके सामने नतमस्तक होकर उन्हें दूर करने की प्रार्थना कर सके। यही कारण है कि विभन्न मुल्कों में प्राचीन काल से ही सारी कौमों की इबादत की खास जगहें अवश्य रही हैं। यहाँ तक कि उन्होंने फायदा उठाने और हानि को टालने के लिए सूरज, सितारों, आग और पत्थरों तक की पूजा की। और इस की वजह यही है कि इंसान अपनी प्रवृत्ति से ही ऐसे माबूद की जरूरत महसूस करता है जो उसकी ज़रूरतों तथा उस की आत्मा की आशाओं को पूरा कर दे। हालांकि जिस वातावरण में इंसान परवरिश पाता है, वही उसे कभी-कभी सही मंजिल से भटका देता है। जिसके कारण वह सत्य पूज्य की जगह असत्य पूज्य, जिसका असत्य होना शरीयत से पहले विवेक से ही सिद्ध हो जाता है, की ओर आकृष्ट हो जाता है।

2- सृष्टि। सोचने की बात यह है कि जब समस्त ज्ञानियों की इस बात पर सहमति है कि हर सृष्टि का एक सृष्टा और हर रचना का एक रचनाकार है, तो फिर इस नियम से यह अनूठा ब्रह्मांड, इन सूक्ष्म विवरणों के साथ, कैसे अपवाद हो सकता है और यह कैसे संभव हो सकता है कि वह बस एक संयोग,क्षणभंगुर धमाका, प्राकृतिक चयन (natural selection) या केवल एक विकास के कारण अस्तित्व में आ गया हो। अगर इस हकीकत का इंकार करने वाले से पूछा जाए कि क्या यह संभव है कि जिस किताब को वह इस वक्त पढ़ रहा है, अचानक उसके सामने प्रकट हो गई है? या इस बात की संभावना है कि किताब के सारे शब्द इस सूरत में केवल संयोगवश एकत्रित हो गए हैं? या इस किताब के सारे अक्षरों ने, प्राकृतिक चयन या विशेष विकास के प्रभाव से यह सूरत अख़्तियार कर ली है जिससे उनके मायने स्पष्ट रूप से समझ में आने लगे हैं? इन प्रश्नों का उत्तर एक विवेकपूर्ण व्यक्ति की तरफ से अवश्य ही यह होगा कि नहीं, यह तो कदापि मुमकिन नहीं है। इस किताब को अस्तित्व में लाने वाला और इसका लेखक कोई न कोई अवश्य ही है।

यह जवाब जब इस विशालकाय ब्रह्मांड की एक इतनी छोटी सी वस्तु के बारे में दिया जाए, तो फिर आसमानों, जमीन, पहाड़ों, नहरों, पेड़ों, समुद्रों और विभिन्न आकारों तथा शक्लों वाले जीवों के बारे में क्या कहा जाएगा? उसी प्रकार, क्या यह संभव है कि यह नाना प्रकार के फफूंद, वाइरस, रोगाणु, कण और जिन चीज़ों से वह बना, कोशिकाएँ और उनके अनुभाग, अनुवंशिक चिन्ह, डीएनए (DNA), रात और दिन का आगे-पीछे आना-जाना, सूरज और चाँद का उगना और डूबना, आकाशीय पिंड और ग्रह जो हर रात हमारी आँखों को चौंकाते हैं तथा ब्राह्मांड की अन्य सृष्टियाँ, यह सब आकस्मिक तौर पर बिना किसी रचनाकार के पैदा हो गईं हैं? निस्संदेह, एक संपूर्ण मानवीय विवेक इन सारी अटकलों को पूर्णतया नकार देगा।

3- महान सृष्टा के अस्तित्व की ढेर सारी दलीलों में से एक, निपुणता और सटीकता भी है। इसलिए, जो चीज सटीक है तो उसको सटीक बनाने वाला भी कोई अवश्य है। असंभव है कि किसी एक काम, जैसे मानव की उत्पत्ति, में प्रयोग होने वाली इस असीम निपुणता के पीछे बस संयोग कार्यरत हो तो फिर ब्रह्मांड की वह करोड़ों चीजें, जिनको हम देखते हैं कि बड़ी निपुणता और ध्यानपूर्वक बनाया गया है, कैसे संभव है कि बस संयोगवश बन गई हों। यदि सारे मनुष्य अपने समस्त संसाधनों के साथ एकत्रित होकर एक मक्खी भी उत्पन्न करना चाहें तो नहीं कर सकते हैं, तो केवल एक संयोग उसे कैसे उत्पन्न कर सकता है? उस महान सृष्टा की तरफ से दी गई इस चुनौती को पढ़िएः

(ऐ लोगो! एक उदाहरण दिया गया है। इसे ध्यान से सुनो। निःसंदेह वे लोग जिन्हें तुम अल्लाह के अतिरिक्त पुकारते हो, एक मक्खी भी कदापि पैदा नहीं कर सकेंगे, यद्यपि वे इसके लिए इकट्ठे हो जाएँ। और यदि मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले, वे उसे उससे छुड़ा नहीं पाएँगे। कमज़ोर है माँगने वाला और वह भी जिससे माँगा जाता है।) सूरा अल-हज्जः 73

मान लीजिए, बेहद कलात्मक ढंग से लकड़ी का बना एक घर है, तो क्या किसी इंसान के दिल में यह बात खटक सकती है कि उस लकड़ी को प्रकृति ने चुना और विकसित किया, यहाँ तक कि वह इस सूरत में ढल गई? मैं नहीं समझता कि कोई न्यायप्रिय आदमी इसका जवाब हाँ में दे सकता है। फिर हम इंसान की रचना के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं कि जिसके शरीर में अल्लाह तआला ने दिल, फेफड़ा, नसें, रगें पैदा कीं हैं तथा उसके शरीर में तंत्रिका तंत्र, मानसिक प्रणाली एवं मांसपेशी तंत्र भी बनाया है और हल यह है कि चिकित्सा विज्ञान इनमें से बहुत की तह तक अब भी नहीं पहुँच सका है? उसी प्रकार भूख-प्यास, तृप्ति, आराम तथा निद्रा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते वक्त, इंसान के शारीरिक अंगों के आपसी सामंजस्य के बारे में ऐसा कैसे कहा जा सकता है कि इन सब में भी वही संयोग कार्यरत है? क्या इंसान की सोच, उसकी प्रतिभा, उसकी नई खोज और उसकी खुशी, शोक और भय आदि जैसी विभिन्न भावनाएँ भी उसी संयोग की पैदावार हैं? माँ के गर्भ में इंसान का आश्चर्यजनक एकाधिक चरणों से गुजर कर पैदा होना, जिनका उल्लेख महान सृष्टा ने अपनी महान किताब (क़ुरआन) में चौदह सौ साल पहले किया है, क्या यह भी केवल संयोग मात्र है? वह कहता हैः (और निःसंदेह हमने मनुष्य को मिट्टी के एक सार से पैदा किया है।) (फिर हमने उसे वीर्य बनाकर एक सुरक्षित स्थान में रखा।) (फिर हमने उस वीर्य को एक जमा हुआ रक्त बनाया, फिर हमने उस जमे हुए रक्त को एक बोटी बनाया, फिर हमने उस बोटी को हड्डियाँ बनाया, फिर हमने उन हड्डियों को कुछ मांस पहनाया, फिर हमने उसे एक अन्य रूप में पैदा कर दिया। तो बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो बनाने वालों में सबसे अच्छा है।) सूरा अल-मोमिनूनः12-14

क्या आधुनिक विज्ञान को पता है कि चौदह सौ साल पहले, माँ के पेट में मानव-भ्रूण के विकास के विभिन्न चरणों की यह व्याख्यात्मक जानकारी किस ने दी? निस्संदेह, जिसने इंसान को यह व्याख्यात्मक जानकारी उस समय प्रदान की, वही हिकमत वाला तत्वज्ञानी सृष्टा अल्लाह है जिसने अपने संदेष्टा को सत्य के साथ भेजा ताकि वह लोगों को सत्य मार्ग दिखाएँ और उनकी उन तमाम चीजों से पुष्टि भी की जो उनकी नुबूवत को सिद्ध करें।

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