أسئلة وأجوبة عن شهر رمضان للصغار، ولا يستغني عنها الكبار
छोटे बच्चों के लिए रमज़ान महीने से संबंधित कुछ प्रश्नोत्तर जो बड़ों के लिए भी आवश्यक हैं
छोटे बच्चों के लिए रमज़ान महीने से संबंधित कुछ प्रश्नोत्तर जो बड़ों के लिए भी आवश्यक हैं
विभिन्न भाषाओं में इस्लामी सामग्री सेवा संगठन
शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत कृपावान है
प्रस्तावना
सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें रमज़ान महीना दिया और उसे शेष महीनों तथा दिनों पर बहुत-सी फ़ज़ीलतें प्रदान कीं। दरूद व सलाम हो मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह, उनके परिजनों और साथियों पर। अब मूल विषय पर आते हैं।
रमज़ान महीने से संबंधित कुछ प्रश्नोत्तर प्रस्तुत हैं, जो बच्चों के लिए तैयार किए गए हैं और जो बड़ों के लिए भी ज़रूरी हैं। इनके माध्यम से बताया गया है कि रमज़ान महीने में कौन-कौन से काम ज़रूरी हैं, कौन-कौन से मुसतहब हैं, और रमज़ान महीने के प्रति हमारा रवैया क्या होना चाहिए। अभिभावक बच्चे तथा उसकी आयु को ध्यान में रखते हुए इनमें से जो बातें चाहे, चुन सकता है।
सहाबा अपने छोटे बच्चों से रोज़ा रखवाया करते थे, ताकि बचपन ही से रोज़ा रखने की आदत पड़ जाए।
हदीस में है कि रुबैयि बिंत मुअव्विज़ बिन अफ़रा कहती हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दसवीं मुहर्रम की सुबह मदीने के आसपास की अन्सार की बस्तियों में यह संदेश पहुँचाने के लिए आदमी भेजे : "तुममें से जिसने रोज़े की अवस्था में सुबह की है, वह रोज़ा पूरा करे और जिसने बिना रोज़े के सुबह की है, वह बाक़ी दिन पूरा करे।" अतः इसके बाद हम खुद इस दिन रोज़ा रखते और अगर अल्लाह की मंशा होती तो अपने छोटे बच्चों को भी रोज़ा रखवाते थे। हम मस्जिद चले जाते और बच्चों के लिए रंगीन ऊन से खिलौने बना लेते। जब कोई बच्चा खाने के लिए रोता, तो हम उसे यही खिलौने दे देते। ऐसा इफ़तार के समय तक करते रहते। (सहीह बुख़ारी : 1950, सहीह मुस्लिम : 1136, यहाँ लिए गए शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।)
इस हदीस से मालूम होता है कि सहाबा बच्चों के लिए रंगीन ऊन के खिलौने बनाकर रखते थे और जब कोई बच्चा खाने के लिए रोता, तो उसे खिलौने दे दिए करते थे, ताकि इफ़तार के समय तक किसी तरह बहल कर रह जाए। दरअसल ऐसा वह बच्चों को इबादत का अभ्यस्त बनाने के लिए करते थे।
ध्यान रहे कि बच्चे को रोज़ा रखने में अगर ज़्यादा कठिनाई महसूस होने लगे, तो उसपर रोज़ा पूरा करने के लिए ज़ोर नहीं डालना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि इसके नतीजे में उसके अंदर इबादत से नफ़रत पैदा हो जाए, वह झूठ बोलने लगे या बीमार हो जाए। जबकि शरीयत की नज़र में अभी वह इबादत का पाबंद है ही नहीं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिए और रोज़े के मामले में बच्चे पर सख़्ती नहीं करनी चाहिए।
लाभ अधिक हो, इस बात को सामने रखते हुए हमने ऐसे मसायल भी बयान कर दिए हैं, जिन्हें बड़ों को जानना चाहिए। बच्चों को शिक्षा देते समय इस प्रकार के मसायल बयान करने से गुरेज़ किया जाएगा। जहाँ इस तरह के मसायल आए हैं हमने कोष्ठकों के बीच यह लिख दिया है : (बड़ों के लिए)।
दुआ है कि अल्लाह हमारे इस कार्य को लाभकारी बनाए और इसे ग्रहण करे।
प्रश्न तथा उनके उत्तर
रमज़ान का महीना क्या है?
उत्तर : रमज़ान का महीना साल का सबसे उत्तम महीना है। यह चंद्र वर्ष का नवाँ महीना है। इस महीने का रोज़ा इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक स्तंभ है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "इस्लाम पाँच स्तंभों पर आधारित है: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान के रोज़े रखना।" (सहीह बुख़ारी : 8, सहीह मुस्लिम : 16)
क्या रमज़ान महीने का रोज़ा फ़र्ज़ है?
उत्तर : हाँ, रमज़ान महीने का रोज़ा फ़र्ज़ तथा इस्लाम का एक स्तंभ है।
इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है : "ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिये गये हैं, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किये गये थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।" [सूरा अल-बक़रा : 183]
इस आयत में आए हुए शब्द "कुतिब अलैकुम" का अर्थ है : तुमपर फ़र्ज़ किया गया।
एक अन्य स्थान में अल्लाह ने फ़रमाया है : "अतः तुममें से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित हो (अर्थाथ: मुसाफिर न हो), तो वह इसका रोज़ा रखे।" [सूरा अल-बक़रा : 185]
रोज़ा क्या है?
उत्तर : रोज़ा नाम है फ़ज्र निकलने से लेकर सूरज डूबने तक नीयत के साथ खाने, पीने तथा रोज़ा तोड़ने वाली अन्य सारी चीज़ों से दूर रहकर पवित्र एवं महान अल्लाह की इबादत करने का।
इसका प्रमाण अल्लाह का यह फ़रमान है : "तथा खाओ और पियो, यहाँ तक कि तुम्हारे लिए भोर की सफेद धारी रात की काली धारी से स्पष्ट हो जाए, फिर रोज़े को रात (सूर्य डूबने) तक पूरा करो।" [सूरा अल-बक़रा : 187]
यानी रात भर खाते-पीते रहो, यहाँ तक कि फ़ज्र की सफ़ेदी तथा उसके रात की तारीकी से जुदा होने के द्वारा फ़ज्र-ए-सादिक़ का प्रकट होना स्पष्ट हो जाए। फिर फ़ज्र प्रकट होने से सूरज डूबने तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से परहेज़ करके रोज़ा पूरा करो।
रमज़ान महीने की क्या-क्या फ़ज़ीलतें हैं?
उत्तर : रमज़ान महीने की बहुत-सी फ़ज़ीलतें हैं। जैसे -
1- इसी महीने में अल्लाह ने क़ुरआन उतारा है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए मार्गदर्शन और सत्य एवं असत्य के बीच अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं।" [सूरा अल-बक़रा : 185]
2- इस महीने में जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं।
3- इसमें जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं।
4- इसमें शैतान को बेड़ियों से जकड़ दिया जाता है। इसलिए शैतान मुसलमानों को उन फ़ितनों में डाल नहीं पाता, जिनमें अन्य महीनों में डाल लेता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब रमज़ान का महीना आता है, तो जन्नत के द्वार खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बेड़ियों में जकड़ दिया जाता है।" (सहीह बुख़ारी : 3277, सहीह मुस्लिम : 1079)
5- इस महीने में शब-ए-क़द्र है, जो उसमें अल्लाह पर विश्वास एवं सवाब की नीयत के साथ इबादत करने वाले के लिए हज़ार महीनों से बेहतर है। "लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) हज़ार महीनों से उत्तम है।" [सूरा अल-क़द्र : 3]
6- इस महीने में अल्लाह ने रोज़ा फ़र्ज़ किया है, जो उसकी निकटता प्राप्त करने का एक बहुत बड़ा साधन है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : आदम की संतान का (हर) नेक काम उसी के लिए है, सिवाय रोज़े के। रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा। क़सम उसकी जिसके हाथ में मुहम्मद की जान है, रोज़ेदार के मुँह की गंध क़यामत के दिन अल्लाह के निकट कस्तूरी की सुगंध से अधिक सुगंधित होगी।" [सहीह बुख़ारी : 1904 , सहीह मुस्लिम : 1151]
इस हदीस में आए हुए शब्द «लख़ुल्फता फ़मिस-साइमि» से मुराद रोज़ेदार के मुँह का बदला हुआ गंध है।
7- जिसने अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए इस महीने के रोज़े रखे और इसमें तरावीह की नमाज़ पढ़ी तो उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए, रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" [सहीह बुख़ारी : 38, सहीह मुस्लिम : 760]
इसी तरह एक हदीस में है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान में तरावीह की नमाज़ पढ़ी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" (सहीह बुख़ारी : 37 , सहीह मुस्लिम : 759)
इस हदीस में आए हुए शब्द "ईमानन" से मुराद है : अल्लाह पर विश्वास रखते हुए और मानते हुए कि यह अल्लाह का फ़र्ज़ किया हुआ काम है।
जबकि दूसरे शब्द «इह्तिसाबन» से मुराद है, अल्लाह से प्रतिफल की प्राप्ति के लिए, दिखावा आदि चीज़ों के लिए नहीं, जो निष्ठा (इख़्लास) के विपरीत हैं।
8- रमज़ान में किए गए उमरा का सवाब एक हज के बराबर है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "रमज़ान का एक उमरा एक हज अथवा मेरे साथ किए गए एक हज के बराबर है।" (सहीह बुख़ारी : 1863, सहीह मुस्लिम : 1256)
इस हदीस में आए हुए शब्द «तक़्ज़ी हज्जतन» का अर्थ यह है कि उसका सवाब हज के सवाब के बराबर है।
9- इस महीने में रोज़ेदार को इफ़तार कराने वाले को रोज़ा रखने वाले के बराबर सवाब मिलता है।
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार कराएगा, उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब मिलेगा और इससे रोज़ेदार के सवाब में कोई कमी नहीं होगी।" (सुनन तिर्मिज़ी : 807, सुनन इब्न-ए-माजा : 1746)
10- रमज़ान महीने की हर रात में अल्लाह कुछ लोगों को जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "अल्लाह हर इफ़तार के समय कुछ लोगों को जहन्नम से आज़ाद करता है और ऐसा हर रात रोता है।" (सुनन इब्न-ए-माजा : 1643)
11- रमज़ान महीने के रोज़े इस रमज़ान तथा इससे पहले रमज़ान के बीच किए गए गुनाहों की माफ़ी का सबब बन जाते हैं, जब कबीरा गुनाहों से बचा जाए।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाया करते थे : "पाँच नमाज़ें, एक जुमा दूसरे जुमे तक तथा एक रमज़ान दूसरे रमज़ान तक, इनके बीच में होने वाले गुनाहों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) बन जाते हैं, यदि बड़े गुनाहों से बचे।" (सहीह मुस्लिम : 233)
कबीरा गुनाहों की माफ़ी के लिए तौबा ज़रूरी है।
शरई प्रमाणों से एक साधारण बात यह स्पष्ट है कि रमज़ान का महीना इबादत, नेकी, दान, दया, क्षमा और जहन्नम से मुक्ति का महीना है।
रोज़े की क्या-क्या फ़ज़ीलतें हैं?
उत्तर : रोज़े की कुछ फ़ज़ीलतें इस प्रकार हैं :
1- अल्लाह सारे अमलों के बीच रोज़े का विशेष बदला प्रदान करता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "आदम की संतान का हर अमल उसके लिए है, सिवाए रोज़े के; क्योंकि रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूँगा।" (सहीह बुख़ारी : 1904 , सहीह मुस्लिम : 1151)
2- रोज़ा ढाल है, जो आग से बचाने का काम करता है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "रोज़ा ढाल है।" (सहीह बुख़ारी : 1904 , सहीह मुस्लिम : 1151)
3- रोज़ेदार के मुँह की दुर्गंध अल्लाह के निकट कस्तूरी की सुगंध से उत्तम है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "क़सम उसकी जिसके हाथ में मुहम्मद की जान है, रोज़ेदार के मुँह की गंध क़यामत के दिन अल्लाह के निकट कस्तूरी की सुगंध से अधिक सुगंधित होगी।" (सहीह बुख़ारी : 1894, सहीह मुस्लिम : 1151)
4- रोज़ेदार को दो ख़ुशियाँ मिलती हैं।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "रोज़ेदार के लिए दो ख़ुशियाँ हैं : एक, जब वह (सूरज डूबने पर) रोज़ा तोड़ता है और दूसरी ख़ुशी उसको उस वक्त मिलेगी, जब वह अपने रब के दर्शन करेगा।" (सहीह बुख़ारी : 1904 , सहीह मुस्लिम : 1151)
5- जन्नत का एक द्वार है, जिससे केवल रोज़ेदार ही प्रवेश करेंगे।
सह्ल रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जन्नत में एक द्वार है, जिसे रैयान कहा जाता है। क़यामत के दिन उससे रोज़ेदार प्रवेश करेंगे। उनके सिवा कोई उस द्वार से प्रवेश नहीं करेगा। कहा जाएगा : रोज़ेदार कहाँ हैं? तब वे उठ खड़े होंगे। उनके सिवा कोई उससे प्रवेश न करेगा। जब वे दाख़िल हो जाएँगे, तो द्वार बंद कर दिया जाएगा और उससे कोई अंदर न आएगा।" (सहीह बुख़ारी : 1896 , सहीह मुस्लिम : 1152)
6- रोज़ेदार की दुआ अस्वीकार नहीं होती।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तीन लोगों की दुआ अस्वीकार नहीं होती। (जिनमें से एक है) रोज़ादार रोज़ा इफ़तार करने तक।" (सुनन तिर्मिज़ी : 3598)
रोज़े की हिकमत तथा फ़ायदे क्या-क्या हैं?
उत्तर : रोज़े की हिकमत तथा फ़ायदे अनेक है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण इस प्रकार हैं :
1- रोज़े की एक बहुत बड़ी हिकमत यह है कि रोज़ा तक़वा की प्राप्ति का साधन है। याद रहे कि तक़वा अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहने का नाम है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिये गये हैं, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किये गये थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।" [सूरा अल-बक़रा : 183]
2- रोज़ा इन्सान को सब्र का आदी बनाता है, जो सारे कार्यों का आधार है। सब्र के तीन प्रकार हैं : अल्लाह की आज्ञा के पालन में धैर्य दिखाना, अल्लाह की अवज्ञा से बचने में धैर्य दिखाना और अल्लाह के निर्णयों का सामना धैर्य के साथ करना।
3- रमज़ान के रोज़े का एक फ़ायदा यह है कि इससे पूरे समाज में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की इबादत का प्रदर्शन होता है। आप देखें दुनिया भर के तमाम मुसलमान एक साथ मिलकर इस महीने में रोज़ा रखते हैं।
4- इससे अल्लाह के आज्ञापालन एवं इबादत विशेष रूप से रोज़े की आदत पड़ती है।
5- इससे अल्लाह के लिए चीज़ों को छोड़ने की आदत पड़ती है।
6- रोज़ेदार को अल्लाह की प्रदान की हुई नेमतों, जिनमें खाने-पीने की चीज़ें भी शामिल हैं, का एहसास होता है।
7- रोजा रखने से रोजा रखने वाले को कमजोरों, गरीबों और दीन-दुखियों के प्रति संवेदनशीलता का एहसास होता है, और उनके प्रति दया का भाव पैदा होता है। क्योंकि उसे भूख का दर्द महसूस होता है।
8- रोज़ा शैतान के प्रभाव तथा उसके बुरे ख़याल डालने की क्षमता को घटाता है।
9- रोज़ा इन्सान के दिल में यह बात बिठाने में मददगार है कि नेकी का काम केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया जाए और दिल में यह विश्वास रखा जाए कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है। सच्चाई यह है कि इन्सान का यही एहसास उसे खाने और पीने आदि से रोके रखता है।
10- रोज़े से स्वास्थ्य एवं शक्ति प्राप्त होती है, जैसा कि डॉक्टरों के यहाँ सर्वमान्य है।
कौन-कौन सी चीज़ें रोज़े को नष्ट कर देती हैं?
उत्तर : 1- रमज़ान महीने के दिन में जान-बूझकर खाना या पीना। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर रात तक रोज़ा पूरा करो।" [सूरा अल-बक़रा : 187]
अगर कोई भूलकर खा-पी लेता है, तो रोज़ा सही है। बस, याद आ जाने या याद दिला दिए जाने पर खाना-पीना छोड़ देना है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "जो रोज़ा रख कर भूल कर खा ले अथवा पी ले, वह अपना रोज़ा पूरा करे, क्योंकि उसे अल्लाह ने खिलाया एवं पिलाया है।" (सहीह बुख़ारी : 1933, सहीह मुस्लिम : 1155)
2- जान-बूझकर उलटी करना। यानी पेट में मौजूद खाना-पानी को जान-बूझकर मुँह के रास्ते से बाहर निकाल देना। लेकिन अगर बिना इरादे के अपने आप उलटी हो जाए, तो इसका रोज़े पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "जिसे अपने आप उलटी आ जाए, उसपर क़ज़ा नहीं है। लेकिन जो जान-बूझकर उलटी करे, वह रोज़े की क़ज़ा करे।" (सुनन तिर्मिज़ी : 720)
इस हदीस में आए हुए "ज़रअहु अल-क़ैउ" का अर्थ है, जिसे बिना इरादे के अपने आप उलटी आजाए।
3- इस्लाम से फिर जाना और अविश्वासी बन जाना, क्योंकि यह इबादत के विपरीत है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अगर तुमने शिर्क किया, तो तुम्हारे सारे अमल नष्ट हो जाएँगे।" (सूरा अल-ज़ुमर : 65)
4- पछना लगाना। यानी चमड़े से रक्त निकालना।
क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "पछना लगाने वाले और पछना लगवाने वाले दोनों का रोज़ा टूट गया।" (सुनन अबू दाऊद : 2367)
रक्त दान भी पछना लागने के समान है।
लेकिन ज़ख़्म, दाँत उखाड़ने या नकसीर के कारण ख़ून निकलने से रोज़े का नुक़सान नहीं होगा। क्योंकि यह चीज़ें पछना लागने के समान नहीं हैं।
5- (बड़ों के लिए) संभोग या हस्त मैथुन से रोज़ा टूट जाता है।
6- (बड़ों के लिए) माहवारी या निफ़ास (प्रसव के बाद कुछ दिनों तक निकलने वाला रक्त) का रक्त निकलने से भी रोज़ा टूट जाता है। औरत जब माहवारी या निफ़ास का रक्त देखे, तो रोज़ा छोड़ दे और बाद में रख ले। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरत के बारे में कहा है : "क्या ऐसा नहीं है कि जब वह माहवारी की अवस्था में होती है तो न नमाज़ पढ़ती है और न रोज़ा रखती है?" (सहीह बुख़ारी : 304)
7- जो चीज़ें खाने तथा पीने के समान हैं : जैसे पोषण वाले इंजेक्शन एवं सूई।
रोज़े के दौरान कौन-कौन से कार्य मुसतहब हैं?
उत्तर : रोज़ेदार के लिए रोज़ा रखते समय निम्नलिखित कार्य करना मुसतहब एवं सुन्नत है :
1- सहरी करना : क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तुम सेहरी करो, क्योंकि सेहरी में बरकत है।" (सहीह बुख़ारी : 1923, सहीह मुस्लिम : 1095)
सहरी अधिक या कम किसी भी मात्रा में खाने से हो जाती है, बल्कि एक घूँट पानी से भी। सहरी का समय आधी रात से फ़ज्र प्रकट होने तक रहता है।
2- देर से सहरी करना : क्योंकि ज़ैद बिन साबित की हदीस में है : "हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ सहरी खाई और उसके बाद हम नमाज़ के लिए गए। (अनस रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि) मैंने ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहु से पूछा कि सहरी और अज़ान के बीच कितना अंतराल था? उन्होंने उत्तर दिया : पचास आयतें पढ़ने के बराबर।" (सहीह बुख़ारी : 575, सहीह मुस्लिम : 1097)
इस हदीस का अर्थ यह है कि सहरी तथा फ़ज्र की अज़ान के बीच में पचास आयतें पढ़ने के समान समय हुआ करता था। इस हदीस में इस बात की प्रेरणा दी गई है कि सहरी देर करके फ़ज्र से कुछ पहले की जाए।
3- इफ़तार जल्दी करना : सूरज डूबने से आशवस्त हो जाने के बाद इफ़तार जल्दी करना मुसतहब है।
क्योंकि सह्व बिन साद रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "लोग जब तक इफ़्तार जल्दी करेंगे, तब तक भलाई में रहेंगे।" (सहीह बुख़ारी : 1957, सहीह मुस्लिम : 1098)
4- तर खजूरों से इफ़तार करना। तर खजूर न मिल सके, तो सूखी खजूर ले। सूखी खजूर भी न मिल सके, तो कुछ घूँट पानी पी ले।
क्योंकि अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु की हदीस में है : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने से पहले कुछ तर खजूरें खाकर इफ़तार किया करते थे। तर खजूरें न मिलने पर सूखी खजूरें लेते। अगर वह भी न मिलतीं, तो कुछ घूँट पानी पी लेते।" (सुनन अबू दाऊद : 2356)
हदीस में आए हुए शब्द "हसा हसवातिन" का अर्थ है, तीन घूँट पानी पिए।
अगर किसी ऐसी जगह इफ़तार का समय आ जाए, जहाँ खाने-पीने के लिए कुछ न हो, तो दिल में इफ़तार की नीयत कर ली जाए। यही काफ़ी है।
5- इफ़तार के समय और रोज़े के दौरान दुआ करना।
क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तीन प्रकार के लोगों की दुआ व्यर्थ नहीं जाती : न्यायकारी शासक की, रोज़ेदार की यहाँ तक कि रोज़ा इफ़्तार करे, और पीड़ित की।" (सुनन तिर्मिज़ी : 3598)
6- ज़्यादा से ज़्यादा सदक़ा करना, क़ुरआन की तिलावत करना, रोज़ेदारों को इफ़तार कराना और अन्य तमाम नेकी के काम करना।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सब लोगों से ज़्यादा दानी थे। खासकर रमज़ान में जब जिबरील अलैहिस्सलाम से आपकी मुलाक़ात होती तो और अधिक दानी हो जाते। जिबरील अलैहिस्सलाम रमज़ान में हर रात आपसे मुलाक़ात करते और आपके साथ क़ुरआन मजीद का दौर फ़रमाते। ऐसे में, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सदक़ा करने में आंधी से भी ज़्यादा तेज़ रफ़्तार हो जाते थे।" (सहीह बुख़ारी : 6, सहीह मुस्लिम : 2308)
7- रात की नमाज़ पढ़ने का प्रयास करना। ख़ास तौर से रमज़ान के अंतिम दस दिनों में।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : "जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आते, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रातों को जागते, अपने घर के लोगों को जगाते, ख़ूब इबादतें करते और कमर कस लेते।" (सहीह बुख़ारी : 2024, सहीह मुस्लिम : 1174)
हदीस में आए हुए शब्द "इज़ा दख़ल अल-अश्रु" का अर्थ है, जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आ जाएँ।
इस हदीस में आए हुए शब्द "शद्द मि'ज़रहू" का अभिप्राय है कि: आप इन दिनों में इबादत तथा अन्य दिनों से अधिक इबादत करने के लिए तैयार हो जाते थे।
जबकि "अह्या लैलहू" का अर्थ यह है कि: आप पूरी-पूरी रात जागकर नमाज़ पढ़ते तथा अन्य इबादतें किया करते थे।
जबकि "ऐक़ज़ अह'लहू" का अर्थ यह है कि: अपने घर वालों को रात में नमाज़ पढ़ने के लिए जगाते थे।
8- उमरा करना।
क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब रमज़ान आ जाए, तो उमरा करो, क्योंकि रमज़ान में किया गया उमरा हज के बराबर है।" (सहीह बुख़ारी : 1782, सहीह मुस्लिम : 1256)
9- कोई गाली-गलोज पर उतर आए, तो उससे यह कहना चाहिए : मैं रोज़ा रखा हुआ हूँ। लोगों के साथ अच्छे अंदाज़ में बात करना और कोई बुरी बात मुँह से न निकालना।
क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई किसी दिन रोज़े की हालत में सुबह करे, तो अश्लील एवं अज्ञानता वाली बातें न करे। अगर कोई उससे गाली-गलोज करे या लड़ने-भिड़ने लगे, तो कह दे कि मैं रोज़े से हूँ, मैं रोज़े से हूँ।" (सहीह बुख़ारी : 1904, सहीह मुस्लिम : 1151)
इस हदीस में आए हुए शब्दों "फ़ला यर्फ़सु" का अर्थ यह है कि: कोई अश्लील बात न करे।
जबकि "वला यज्हलु" का अर्थ यह है कि: कोई ऐसा कार्य या कोई ऐसी बात न करे, जो हिकमत तथा सही के विपरीत हो।
10- इफ़तार करने के बाद रोज़ेदार के लिए यह दुआ पढ़ना मुसतहब है : "प्यास दूर हो गई, रगें तर हो गईं और अल्लाह ने चाहा तो प्रतिफल भी सिद्ध हो गया।" (सुनन अबू दाऊद : 2357)
रोज़े के दौरान कौन-कौन सी बातें मकरूह (अप्रिय) हैं?
उत्तर : रोज़ेदार के लिए कुछ बातें अप्रिय हैं, जो रोज़े को कभी नष्ट कर देती हैं या उसके सवाब को घटा देती हैं। यह बातें हैं :
1- कुल्ली करने एवं नाक में पानी डालने में अतिशयोक्ति से काम लेना।
ताकि कहीं ऐसा न हो कि पानी पेट के अंदर चला जाए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ख़ूब अच्छी तरह नाक में पानी चढ़ाओ, लेकिन अगर रोज़े से हो, तो ऐसा मत करो।" (सुनन अबू दाऊद : 2366)
2- बलगम या राल को, जिसे इन्सान थूक देता है, निगल लेना। क्योंकि एक तो यह चीज़ पेट में पहुँचकर शक्ति का सबब बनती हैं और दूसरा यह एक गंदी चीज़ है, जिससे हानि हो सकती है।
4- बिना ज़रूरत खाना चखना : अगर ज़रूरत हो, जैसे कोई व्यक्ति बावर्ची हो और नमक आदि का अंदाज़ा लगाने के लिए खाना चखना पड़े, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन यह सावधानी रहे कि कोई चीज़ पेट तक न पहुँचे।
4- दिन में बहुत ज़्यादा सोना, समय नष्ट करना और व्यर्थ कार्य एवं बातें करना। प्रयास यह रहे कि इस महीने की एक-एक घड़ी को नेकी के कामों में लगाया जाए।
5- (बड़ों के लिए), ऐसे व्यक्ति के हक़ में बोसा लेना (चूमना), जिसकी काम वासना जाग जाए और उसका अपने ऊपर क़ाबू न हो : अतः रोज़ेदार का अपनी पत्नी को चूमना अप्रिय है, क्योंकि हो सकता है कि काम वासना जाग जाए और संभोग कर डालने या वीर्य निकल जाने के कारण रोज़ा नष्ट हो जाए। हाँ, अगर अपने ऊपर कंट्रोल हो और रोज़ा नष्ट हो जाने का भय न हो, तो कोई हर्ज नहीं है।
6- (बड़ों के लिए), संभोग के बारे में सोचना या काम वासना जगाने वाली बात करना।
उचित शरई कारण के बिना रमज़ान का रोज़ा छोड़ देने का हुक्म क्या है?
उत्तर : जब कोई मुसलमान किसी उचित शरई कारण के बिना रमज़ान महीने के किसी दिन का रोज़ा छोड़ दे, तो उसपर अल्लाह के सामने तौबा करना और उससे क्षमा माँगना वाजिब है। क्योंकि यह बहुत बड़ा अपराध और गुनाह है। तौबा एवं क्षमा माँगने के साथ-साथ बाद में उस दिन का रोज़ा रख लेना भी ज़रूरी है।
रमज़ान महीने में रोज़ा न रखने की अनुमति किसे होगी और उसे क्या करना होगा?
उत्तर : पहली हालत : ऐसा बीमार जो रोज़ा न रख सकता हो, यात्री , गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली औरत, चाहे दोनों को अपने बारे में भय हो या अपने बच्चे के नुक़सान का भय हो, इसी तरह अन्य ऐसे उचित कारण वाले लोग जिनको रोज़ा न रखने की अनुमति है, इन सब के लिए रोज़ा न रखना जायज़ है। लेकिन रमज़ान के बाद छूटे हुए रोज़ों को रख लेना ज़रूरी है। क्योंकि उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "फिर यदि तुममें से कोई रोगी अथवा यात्रा पर हो, तो ये गिनती, दूसरे दिनों में पूरी करे।" [सूरा अल-बक़रा : 184]
यानी तुममें से जो व्यक्ति ऐसी बीमारी का शिकार हो कि उसके साथ रोज़ा रखना कठिन हो, या सफ़र की हालत में हो, तो वह रोज़ा छोड़ सकता है। लेकिन, बाद में छूटे हुए रोज़ा की क़ज़ा करना ज़रूरी है।
दूसरी हालत : अगर इन्सान ऐसी बीमारी में पड़ जाए, जो ठीक न होती हो और जीवन भर साथ रहती है, इसी तरह कोई इतना बूढ़ा हो गया हो कि रोज़ा रखने की क्षमता न रखता हो, तो क्षमताहीन होने के कारण इस प्रकार के व्यक्ति को रोज़ा नहीं रखना है। उसे खाना खिलाना है। हर-हर दिन के बदले में एक-एक निर्धन को खाना खिलाएगा। उसे आधा सा'अ खाने की वस्तु देगा। एक सा'अ लग-भग 3 किलो होता है।
इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है : "और जो उस रोज़े को सहन न कर सके, वह फ़िदया दे, जो एक निर्धन को खाना खिलाना है।" [सूरा अल-बक़रा : 184] अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं : "यह आयत निरस्त नहीं हुई है। यहाँ मुराद ऐसा बूढ़ा मर्द एवं बूढ़ी औरत है, जो रोज़ा न रख सकते हों, दोनों हर-हर दिन के बदले एक-एक निर्धन को खाना खिलाएँगे।" (सहीह बुख़ारी : 4505)
छूटे हुए रोज़ों को कब रखा जाए? अगर रखने में देर हुई और दूसरा रमज़ान आ गया, तो क्या किया जाए?
जिसने किसी शरई कारण से रमज़ान महीने का रोज़ा छोड़ दिया, उसे अल्लाह के इस आदेश का पालन करते हुए छूटे हुए रोज़े को बाद में रख लेना है : "फिर यदि तुममें से कोई रोगी अथवा यात्रा पर हो, तो ये गिनती, दूसरे दिनों में पूरी करे।" [सूरा अल-बक़रा : 185]
और उस पर यह अनिवार्य है कि छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा उसी साल करे। इतनी देर नहीं करनी है कि दूसरा रमज़ान आ जाए। क्योंकि आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का फ़रमान है : "मुझे रमज़ान के छूटे हुए रोज़े रखने होत, लेकिन मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ व्यस्तता के कारण उन्हें शाबान महीने ही में रख पाती।" (सहीह बुख़ारी : 1950, सहीह मुस्लिम : 1146)
यहाँ उनका छूटे हुए रोज़ों के बारे में यह कहना कि मैं उन्हें शाबान महीने ही में रख पाती, इस बात का प्रमाण है कि रमज़ान के छूटे हुए रोज़ों को दूसरा रमज़ान आने से पहले-पहले रख लेना ज़रूरी है।
लेकिन अगर छूटे हुए रोज़े दूसरा रमज़ान आने तक नहीं रखता है, तो अल्लाह से क्षमा माँगे, तौबा करे, अपने इस काम पर शर्मिंदा हो और रोज़ा भी रखे। क्योंकि देर हो जाने से छूटे हुए रोज़े को रखने की अनिवार्यता ख़त्म नहीं हो जाती। रोज़ा रखना है, दूसरे रमज़ान के बाद ही सही।
फ़र्ज़ रोज़ों के आदाब क्या-क्या हैं?
उत्तर : हम यहाँ कुछ आदाब बयान करने जा रहे हैं। वैसे तो इन आदाब का ख़्याल रखना हर सयय वांछित है, लेकिन रमज़ान महीने में और रोज़ेदार के हक़ में इनका महत्व अधिक बढ़ जाता है :
1- इबादतों एवं फ़र्ज़ कार्यों की पाबंदी करना। इसमें समय पर और जमात के साथ नमाज़ पढ़ना भी शामिल है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "निःसंदेह नमाज़ ईमान वालों पर निर्धारित समय पर फ़र्ज़ की गई है।" [सूरा अल-निसा : 103]
2- अल्लाह एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा हराम की गई तमाम चीज़ों, जैसे झूठ, ग़ीबत, चुग़लख़ोरी, धोखा और म्यूज़िक सुनना आदि गुनाह के कामों से दूर रहना।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो झूठ बोलना और झूठा काम करना न छोड़े, उसके खाना-पीना छोड़े रहने की अल्लाह को कोई ज़रूरत नहीं है।" [सहीह बुख़ारी : 1903]
इस हदीस में आए हुए शब्द "अज़-ज़ूर" से मुराद है: झूठ ,सत्य के मार्ग से हटना और असत्य कार्य करना।
जबकि "फ़लैस लिल्लाहि हाजतुन" का अर्थ है: अल्लाह उसके रोज़े पर ध्यान नहीं देगा और उसे ग्रहण नहीं करेगा। यहाँ उसे रोज़ा छोड़ देने का आदेश नहीं दिया जा रहा है, बल्कि झूठी बात कहने से सावधान किया जा रहा है।
रोज़ेदार के लिए कौन-कौन से कार्य जायज़ हैं?
उत्तर : उलेमा ने कुछ चीज़ों के जायज़ होने की बात स्पष्ट रूप से कही है ? जैसे :
1- स्नान करना और पानी से ठंडक प्राप्त करना।
2- मिस्वाक करना।
3- कुल्ली करना तथा नाक में पानी चढ़ाना। लेकिन इन दोनों में अतिशयोक्ति से बचना चाहिए।
4- ख़ून जाँच करने के लिए थोड़ा-सा ख़ून लेना।
5- नाक या कान में दवा डालना।
6- इलाज के लिए इंजक्शन लेना। इंजक्शशन पोषक नहीं होना चाहिए।
7- ज़रूरत के समय खाना चख कर देखना। लेकिन निगला न जाए और थूक कर फेंक दिया जाए।
8- ख़ुशबू लगाना और ख़ुशबू सूँघना।
9- आँख में सुर्मा लगाना।
रमज़ान महीने में रात की नमाज़ की क्या फ़ज़ीलत है?
उत्तर : रमज़ान महीने में पढ़ी जाने वाली रात की नमाज़ की, जिसे तरावीह की नमाज़ कहा जाता है, बड़ी फ़ज़ीलत है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान की रातों में तरावीह की नमाज़ पढ़ी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" (सहीह बुख़ारी : 37, सहीह मुस्लिम : 759)
इस हदीस में आए हुए "ईमानन" शब्द से मुराद है: अल्लाह पर ईमान रखते हुए और इसे अल्लाह का फ़र्ज़ किया हुआ काम मानते हुए।
जबकि "इह्तिसाबन" शब्द से मुराद है: अल्लाह से प्रतिफल तलब करते हुए। दिखावा आदि विशुद्धता के विपरीत चीज़ों के लिए नहीं।
प्रयास यह होना चाहिए कि इमाम के साथ तरावीह की नमाज़ अंत तक पढ़ी जाए, ताकि पूरी रात नमाज़ पढ़ने का सवाब मिल जाए, क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो इमाम के साथ उसके सलाम फेरने तक खड़ा रहे (अर्थात: तरावीह की नमाज़ में आख़िर तक इमाम के साथ रहे), उसके लिए रात भर तरावीह की नमाज़ पढ़ने का सवाब लिख दिया जाता है।" (सुनन तिर्मिज़ी : 806)
रमज़ान के अंतिम दस दिनों तथा शब-ए-क़द्र में कौन-कौन से कार्य मुसतहब हैं?
उत्तर : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के अंतिम दस दिनों में अन्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक इबादत करते थे। इन्हीं दस दिनों में आप शब-ए-क़द्र तलाश करते थे। यहाँ हम कुछ कार्यों का उल्लेख करने जा रहे हैं, जिन्हें करना मुसतहब है :
1- इनमें ख़ूब इबादत करना।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : "जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आते, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (इबादत के लिए) कमर कस लेते, रातों को जागते, और अपने घर के लोगों को जगाते।" (सहीह बुख़ारी : 2024, सहीह मुस्लिम : 1174)
इस हदीस में आए हुए शब्दों "व शद्द मि'ज़रहू" का अर्थ यह है कि: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इबादत के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते और आम दिनों से कहीं अधिक इबादत करते।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा ही का वर्णन है, वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान महीने के अंतिम दस दिनों में दूसरे दिनों की तुलना में कहीं अधिक इबादत में लीन रहा करते थे।" [सहीह मुस्लिम : 1175]
शब-ए-क़द्र रमज़ान के अंतिम दस दिनों में होती है। इसलिए शब-ए-क़द्र पाने के लिए अंतिम दस रातों को ग़नीमत जानकर खूब इबादत करनी चाहिए। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "शब-ए-क़द्र को रमज़ान की अंतिम दस रातों में तलाश करो।" (सहीह बुख़ारी : 2021)
2- शब-ए-क़द्र में तरावीह की नमाज़ पढ़ना।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए, लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) में तरावीह की नमाज़ पढी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" (सहीह बुख़ारी : 1901, सहीह मुस्लिम : 760)
3- मस्जिद में एतिकाफ़ करना।
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : "अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के अंतिम दस दिनों में एतिकाफ़ करते थे।" (सहीह बुख़ारी : 2033, सहीह मुस्लिम : 1172)
एतिकाफ़ : दुनिया-जहान के कामों से अलग होकर, एकांत में, मस्जिद में रहने तथा दिल व दिमाग़ को दुनिया के झमेलों से अलग करके सिर्फ अल्लाह से लगा लेने को एतिकाफ़ कहते हैं।
सूरा क़द्र को पढ़िए और उसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर : अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपाशील तथा दयावान् है : "निस्संदेह, हमने उस (क़ुरआन) को 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) में उतारा है। और तुम क्या जानो कि वह 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) क्या है? लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) हज़ार मास से उत्तम है। उसमें (हर काम को पूर्ण करने के लिए) फ़रिश्ते तथा रूह (जिब्रील) अपने रब की आज्ञा से उतरते हैं। वह शान्ति की रात्रि है, जो भोर होने तक रहती है।" [सूरा अल-क़द्र : 1-5]
व्याख्या :
"निस्संदेह, हमने उस (क़ुरआन) को 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) में उतारा है।" [सूरा अल-क़द्र : 1] हमने पूरे क़ुरआन को एक बार में दुनिया से निकट आकाश की ओर उतारा, और इसी तरह हमने उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर रमज़ान महीने की शब-ए-क़द्र में उतारना शुरू किया।
"और तुम क्या जानो कि वह 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) क्या है?" [सूरा अल-क़द्र : 2] और (ऐ रसूल) क्या आप जानते हैं कि इस रात में कितनी भलााई और बरकत है?!
"लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) हज़ार महीनों से उत्तम है।" [सूरा अल-क़द्र : 3] यह रात बड़ी भलाई वाली रात है। यह रात अल्लाह पर विश्वास एवं सवाब की आशा में इबादत करने वालों के लिए एक हज़ार महीने से उत्तम है। यह बड़ी बरकत वाली रात है। इसमें किया गया नेकी का काम एक हज़ार महीने की नेकी के काम से उत्तम है।
"उसमें (हर काम को पूरा करने के लिए) फ़रिश्ते तथा रूह़ (जिब्रील) अपने रब की आज्ञा से उतरते हैं।" [सूरा अल-क़द्र : 4] उस रात, फ़रिश्ते और जिबरील अलैहिस्सलाम अपने रब के आदेश से उस साल के लिए लिखे गए अल्लाह के सभी निर्णयों के साथ उतरते हैं, चाहे उनका संबंध रोज़ी से हो, मौत से हो या पैदाइश आदि से हो।
"वह शान्ति की रात्रि है, जो भोर होने तक रहती है।" [सूरा अल-क़द्र : 5] यह बरकत वाली रात शुरू से अंत अर्थात भोर होने तक भलाई वाली है।
ज़कात-ए-फ़त्र किया है और इसका क्या महत्व है?
उत्तर : यह एक प्रकार की ज़कात है, जिसे इस्लाम ने रमज़ान की समाप्ति के अवसर पर फ़र्ज़ किया है।
ज़कात-ए-फ़ित्र हर मुसलमान पर वाजिब है, छोटा हो कि बड़ा और पुरुष हो कि स्त्री। इसे एक मुसलमान अपनी ओर से तथा पत्नी एवं संतान आदि ऐसे लोगों की ओर से निकालेगा, जिनपर वह ख़र्च करता है।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े (सब पर) एक सा'अ खजूर या एक सा'अ जौ फ़र्ज़ क़रार दिया है और आदेश दिया है कि उसे नमाज़ के लिए लोगों के निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।" [सहीह बुख़ारी : 1503, सहीह मुस्लिम : 984]
ज़कात-ए-फ़ित्र के तौर पर चावल आदि वही चीज़ें दी जाएँगी, जो उस इलाक़े के लोग खाते हों। ज़क़ात-ए-फ़ित्र निकालने का सही समय ईद के दिन सुबह नमाज़ से पहले का समय है। एक-दो दिन पहले भी निकाली जा सकती है। मात्रा लगभग 3 किलो है।
ज़कात-ए-फ़ित्र को वाजिब करने की हिकमत क्या है?
उत्तर : इसकी कुछ हिकमतें इस प्रकार हैं :
1- रोज़ेदार को उन व्यर्थ कार्यों एवं अश्लील कथनों से पाक करना, रोज़े के दौरान जिनके होने की संभावना रहती है।
2- ग़रीबों एवं निर्धनों को ईद के दिन किसी के सामने हाथ फैलाने से बचाना और उनको खुश होने का अवसर देना, ताकि ईद का दिन हर वर्ग के मुसलमानों के लिए ख़ुशी का दिन बन जाए। अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़कात-ए-फ़ित्र फ़र्ज़ किया है, ताकि रोज़ेदार को व्यर्थ कार्यों एवं अश्लील बातों से पाक किया जा सके और निर्धनों के लिए खाने की व्यवस्ता हो सके।" (सुनन अबू दाऊद : 1609)
3- ज़कात-ए-फ़ित्र एक तरह से बंदे पर अल्लाह की इस नेमत का शुक्राना है कि उसने रमज़ान महीने में रोज़ा रखने और रात में इबादत करने तथा इस महीने में अन्य नेकी के काम करने का सुयोग प्रदान किया।
4- नियत समय पर इसे हक़दारों को देने के नतीजे में बड़ा प्रतिफल प्राप्त होता है।
ईद के दिन कौन-कौन से काम सुन्नत हैं?
उत्तर : ईद मुसलमानों के लिए अल्लाह के अनुग्रह एवं दया पर खुशी व्यक्त करने का एक अवसर है। इस दिन एक मुसलमान के लिए निम्नलिखित कार्य सुन्नत हैं :
1- ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले स्नान करना।
मुवत्ता आदि की एक सहीह हदीस में है कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा ईद के दिन ईदगाह जाने से पहले स्नान किया करते थे। (मुवत्ता इमाम मालिक : 1/177)
2- ईद अल-फ़ित्र की नमाज़ के लिए निकलने से पहले खा लेना। नमाज़ के लिए निकलने से पहले कुछ खजूरें ज़रूर खा ली जाएँ। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईद अल-फ़ित्र के दिन निकलने से पहले कुछ खजूरें ज़रूर खा लिया करते ... तथा खजूरें विषम संख्या में खाते थे।" (सहीह बुख़ारी : 953)
3- ईद के दिन तकबीर कहना।
ईद अल-फ़ित्र में तकबीर का समय ईद की रात यानी रमज़ान के अंतिम रात (दिन) के मग़्रिब से शुरू हो जाता है और इमाम के ईद की नमाज़ के लिए दाख़िल होने तक रहता है।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और ताकि तुम गिनती पूरी करो और ताकि तुम इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें मार्गदर्शन प्रदान किया और ताकि तुम उसका शुक्र अदा करो।" [सूरा अल-बक़रा : 185]
4- मुबारकबाद देना। ईद के आदाब में से एक अदब लोगों को आपस में एक-दूसरे को मुबारकबाद देना भी है। इसके शब्द कुछ भी हो सकते हैं। जैसे - अल्लाह हमारी और आपकी इबादतों को क़बूल करे, ईद मुबारक या मुबरकबाद के इस प्रकार के अन्य जायज़ शब्द।
जुबैर बिन नुफ़ैर का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा जब ईद के दिन मिलते, तो एक-दूसरे से कहते : हमारी और आपकी इबादतें क़बूल हों। (इसे महामिली ने रिवायत किया है, जैसा कि "फ़त्ह अल-बारी" (2/446) में है। इब्न-ए-हजर कहते हैं : इसकी सनद हसन है।)
5- दोनों ईदों के लिए सुंदरता अपनाना।
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है उन्होंने पूछा : "ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने अतारद को दीबाज का एक जोड़ा बेचते हुए देखा है। आप उसे ख़रीद लें और प्रतिनिधि मंडलों से मिलते समय तथा ईद के दिन पहनें, (तो अच्छा रहेगा।)" (सहीह बुख़ारी : 948, सहीह मुस्लिम : 2068)
तथा नाफ़े का वर्णन है कि : अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा दोनों ईदों के दिन अपने सबसे अच्छे कपड़े पहना करते थे। (बैहक़ी की सुनन अल-कुबरा : 6143)
6- ईद की नमाज़ के लिए एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से लौटना।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : "जब ईद का दिन होता, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रास्ता बदल लिया करते थे।" (सहीह बुख़ारी : 986)
शव्वाल के छः रोज़े रखने की क्या फ़ज़ीलत है?
उत्तर : रमज़ान महीने के फ़र्ज़ रोज़ों के बाद शव्वाल महीने के छः रोज़े सुन्नत तथा मुसतहब हैं। इनकी बड़ी फ़ज़ीलत तथा बड़ा सवाब है। सवाब यह है कि रमज़ान के रोज़ों के बाद इन छः रोज़ों को रख लिया जाए, तो साल भर रोज़ा रखने का सवाब लिखा जाता है। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने रमज़ान के रोज़े रखने के साथ-साथ शव्वाल के छह रोज़े रखे, मानो उसने पूरे साल के रोज़े रखे।" (सहीह मुस्लिम : 1164)
रमज़ान ने हमें क्या सिखाया और रमज़ान के बाद हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर : इस प्रश्न के उत्तर के साथ ही हम अपनी बात ख़त्म करना चाहते हैं। रोज़ा इस्लाम का एक बहुत बड़ा मदरसा है, जहाँ मुसलमानों की तरबियत होती है। यह दीन का एक स्तंभ और एक बुनियाद है। यहाँ कुछ हिकमतों एवं पाठों का ज़िक्र किया जा रहा है, जिन्हें बंदा रमज़ान महीने में रोज़े की पाठशाला से सीखता है, ताकि रमज़ान के बाद भी उनको जारी रखे।
पहला पाठ :
रमज़ान महीने में हमने सब्र करना सीखा, जो एक महत्वपूर्ण इबादत एवं अल्लाह की निकटता प्राप्त करने का एक बहुत बड़ा ज़रिया है। जब बंदा सब्र से काम लेते हुए खाने एवं पीने से रुका रहता है, तो वह सब्र को अपने आचरण का हिस्सा बनाने की आदत डालता है, जो तमाम भलाइयों का स्रोत है और जिसके अंदर अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से रुके रहना और उसके कष्टदायक निर्णयों का सामना धैर्य के साथ करना शामिल है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : ''धैर्यवानों को उनका बदला अनगिनत दिया जाएगा।'' [सूरा अल-ज़ुमर : 10]
दूसरा पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेशों एवं निषेधों का पालन करना सिखाया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तथा किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री को यह अधिकार नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का निर्णय कर दें, तो उनके लिए अपने मामले में कोई अख़्तियार बाक़ी रहे। और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे, वह खुली गुमराही में पड़ गया।" [सूरा अल-अहज़ाब : 36]
तीसरा पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें अल्लाह के लिए अपनी ज़बान, शरीर के अंगों और इच्छाओं पर कंट्रोल रखकर तक़वा की राह पर चलना सिखाया। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिये गये हैं, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किये गये थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।" [सूरा अल-बक़रा : 183]
तथा अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह कहता है : रोज़ा मेरे लिए है और उसका प्रतिफल मैं दूँगा। इन्सान अपना सहवास, खाना और पीना मेरे लिए छोड़ता है। और रोज़ा ढाल है।" (सहीह बुख़ारी : 7492, सहीह मुस्लिम : 1151)
इसी तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो झूठ बोलना और झूठा काम करना न छोड़े, उसके खाना-पीना छोड़े रहने की अल्लाह को कोई ज़रूरत नहीं है।" [सहीह बुख़ारी : 1903]
चौथा पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें इबादत सिखाई और उसकी मिठास से अवगत कराया, ताकि हम बाद में भी तहज्जुद, रोज़े और क़ुरआन की तिलावत जैसे नेकी के काम करते रहें।
रोज़े के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए, रमज़ान के रोज़े रखे, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" [सहीह बुख़ारी : 38, सहीह मुस्लिम : 760]
तरावीह की नमाज़ की फ़ज़ीलत के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए रमज़ान की रातों में तरावीह की नमाज़ पढ़ी, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।" (सहीह बुख़ारी : 37, सहीह मुस्लिम : 759)
जबकि क़ुरआन की तिलावत के बारे में आपका हाल इस हदीस में बयान किया गया है : "खासकर रमज़ान में जब जिबरील अलैहिस्सलाम से आपकी मुलाक़ात होती तो और अधिक दानी हो जाते। जिबरील अलैहिस्सलाम रमज़ान में हर रात आपसे मुलाक़ात करते और आपके साथ क़ुरआन मजीद का दौर फ़रमाते।" (सहीह बुख़ारी : 6, सहीह मुस्लिम : 2308)
अतः बंदे को रोज़ा, रात की नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत जैसी इबादतें रमज़ान जैसी न सही, लेकिन निरंतर रूप से करनी चाहिए।
पाँचवाँ पाठ :
रमज़ान के महीने ने हमें अल्लाह के मुराक़बे और एहसान के मक़ाम को सिखलाया। एहसान यह है कि हम अल्लाह की इबादत इस तरह करें, जैसे हम उसे देख रहे हैं, अगर यह भावना पैदा न हो सके तो कम से कम यह इहसास हो कि वह हमें देख रहा है। क्योंकि रोज़ेदार स्वयं को अल्लाह के मुराक़बे का अभ्यस्थ करता है और अपनी इच्छाओं को उनकी क्षमता रखते हुए भी इस विश्वास के कारण छोड़ देता है कि उसे अल्लाह देख रहा है। ''और वह तुम्हारे साथ है, तुम जहाँ कहीं भी हो। और अल्लाह तुम्हारे कार्यों को देख रहा है।'' [सूरा अल-हदीद : 4]
छठा पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें सिखाया कि हमारा दीन आसान है और अल्लाह किसी व्यक्ति पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। जो रोज़ा न रख सके, वह फ़िलहाल रोज़ा छोड़ दे तथा बाद में रख ले या कफ़्फ़ारा अदा करे, अपनी स्थिति के अनुसार काम करे। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अतः तुममें से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित हो, तो वह इसका रोज़ा रखे। तथा जो बीमार हो अथवा किसी यात्रा पर हो, तो दूसरे दिनों में गिनती पूरी करना है। अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ तंगी नहीं चाहता। और ताकि तुम गिनती पूरी करो और ताकि तुम इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें मार्गदर्शन प्रदान किया और ताकि तुम उसका शुक्र अदा करो।" [सूरा अल-बक़रा : 185]
सातवाँ पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें सदक़ा-ख़ैरात करने, निर्धनों एवं ग़रीबों पर उपकार करने और उनकी पीड़ा को समझने का पाठ पढ़ाया। ख़ुद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान महीने में सबसे अधिक दानी हुआ करते थे। (सहीह बुख़ारी : 6, सहीह मुस्लिम : 2308)
बंदा जब ख़ुद भूख की पीड़ा से गुज़रता है, तो उसके अंदर ग़रीबों एवं दीन-दुखियों का दर्द बाँटने का जज़्बा पैदा होता है। यह तक़्वा (धर्मनिष्ठा) की विशेषताओं में से एक है।
आठवाँ पाठ :
रमज़ान महीने ने हमें सिखाया कि अल्लाह की क्षमा, दया एवं अनुग्रह विशाल है। यह पूरा का पूरा महीना दया, क्षमा एवं जहन्नम से मुक्ति का महीना है। इस महीने में शब-ए-क़द्र है, जो हज़ार महीनों यानी अस्सी साल चार महीनों से बेहतर है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और आपको क्या मालूम कि क़द्र की रात क्या है? लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) हज़ार मास से उत्तम है। उसमें (हर काम को पूर्ण करने के लिए) फ़रिश्ते तथा रूह (जिब्रील) अपने रब की आज्ञा से उतरते हैं। वह शान्ति की रात्रि है, जो भोर होने तक रहती है।" [सूरा अल-क़द्र : 3-5]
अंतिम पाठ :
अब रमज़ान के बाद हमें क्या करना चाहिए? अल्लाह ही रमज़ान का तथा तमाम महीनों एवं दिनों का रब है। इसलिए हालात जो भी हों, बंदे को एक ही मूल बात पर जमे रहना चाहिए। वह मूल बात है सर्वश्किमान एवं महान अल्लाह का तक़्वा और उसके भय से अपने लिए बचाव की राह अपनाना।
अतं
अंत में इस अध्याय के संबंध में अधिक जानकारी के लिए कुछ लाभकारी संदर्भों की ओर इशारा कर देना चाहता हूँ। रोज़े के मसायल जानने के लिए इनको पढ़ा जा सकता है।
"रिसालतान मूजज़तान फ़ी अल-ज़कात व अल-सियाम" लेखक : शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़।
"मजालिस शह्र रमज़ान" लेखक : मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन।
"मजालिस शह्र रमज़ान अल-मुबारक" इसके साथ एक अन्य पुस्तक मिली हुई है, जिसका नाम है "इतहाफ़ अह्ल ईमान बि-दुरूस शह्र रमज़ान" लेखक : शैख़ सालेह बिन फ़ौज़ान।
"उक़ूद अल-जुमान फ़ी दुरूस शह्र रमज़ान" लेखक : शैख़ साद बिन तुर्की ख़सलान।
"दुरूस शह्र रमज़ान" लेखक : शैख़ मुहम्मद बिन शामी शैबा।
ऐ अल्लाह! तू क्षमा करने वाला एवं कृपाशील है। तुझे क्षमा करना पसंद है। अतः हमें क्षमा कर दे। दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, तथा आपके परिजनों एवं तमाम साथियों पर।