عيسى عليه السلام في الإسلام
عيسى عليه السلام في الإسلام هو نبي من أنبياء الله، ولد بمعجزة من أم دون أب، ودعا إلى توحيد الله وعبادته وحده. لم يكن إلهًا ولا ابنًا لله كما تزعم النصارى، بل رسولاً من الله. رفعه الله إلى السماء، وسينزل في آخر الزمان ليحكم بشريعة محمد ﷺ، ويؤمن المسلمون به كرسول من رسل الله الكرام.
ईसा (अलैहिस्सलाम) इस्लाम की नजर से
भाषा अरबी
दुनिया के कोने-कोने में हम उनका नाम सुनते हैं। कुछ लोग उन्हें रब और पूज्य मानते हैं जबकि कुछ लोग उनकी शान में गुस्ताखी करते और उन्हें गालियाँ देते हैं।
तो फिर मरियम के पुत्र ईसा मसीह की हकीकत क्या है? क्या वे अल्लाह के बेटे हैं, जैसा कि ईसाई कहते हैं? या वे स्वयं अल्लाह हैं, जैसा कि कुछ ईसाई कहते हैं? या फिर वे व्यभिचार से जन्मे पुत्र हैं, जैसा कि यहूदी कहते हैं?
सच्चाई यह है कि मरियम के पुत्र ईसा मसीह (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के नबियों में से एक थे। अल्लाह तआला ने उन्हें चुना और इस्राईल की अवलाद की तरफ, उन्हें एकेशवरवाद तथा सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करने और उसके साथ किसी को शरीक न करने का आह्वान देने के लिए भेजा था।
अल्लाह तआला ने उन्हें विशेष रूप से पैदा किया था। वे बिन बाप के माँ के पेट से पैदा हुए थे। उसमें यह हिकमत निहित थी कि अल्लाह तआला हमें अपनी असीम शक्ति दिखाए। अल्लाह ने आदम (अलैहिस्सलाम) को बिन माँ-बाप के पैदा किया, तथा हव्वा को बिन माँ के और ईसा (अलैहिस्सलाम) को बिन बाप के माँ के पेट से, और शेष सारे इंसानों को माँ-बाप दोनों के मेल से पैदा किया है।
उनकी माँ इमरान की बेटी मरियम थीं जो एक ज़ाहिदा (ज़ोहद की विशेषता रखने वाली) आबिदा (उपासक) थीं।उन्होंने खुद को बैतुल मक़्दिस में इबादत के लिए समर्पित कर दिया था। वे मस्जिद की पूर्वी दिशा में बैठ गईं, अपने समुदाय के लोगों से पर्दा कर लिया और सिर्फ अल्लाह की इबादत के लिए लोगों से अलग हो गईं।
फिर अल्लाह तआला ने जिब्रील (अलैहिस्सलाम) को उनके पास भेजा। वे मानव का रूप धारण कर उनके सामने आए तो वे डर गईं और सोचा कि यह आदमी मेरे साथ बुरा काम करने की नीयत से आया है। उन्होंने जिब्रील से कहाः (मैं शरण माँगती हूँ अत्यंत कृपाशील की तुझ से, यदि तुझे अल्लाह का कुछ भी भय हो) सूरा मरियमः 18 अर्थात यदि तुम्हारे अंदर अल्लाह का जरा भी डर है तो बुरे इरादे से मेरे पास मत आओ। यह सुनकर फ़रिश्ते ने उन्हें इत्मीनान दिलाते हुए कहाः (मैं तेरे रब का भेजा हुआ हूँ, ताकि तुझे एक पुनीत बालक प्रदान कर दूँ) सूरा मरियमः 19
अर्थात ऐसा बालक प्रदान करने आया हूँ जो पापों से मुक्त होगा और पुण्य तथा भलाई के साथ परवरिश पाएगा।
इसपर मरियम को आश्चर्य हुआ और कहने लगींः (ये कैसे हो सकता है कि मुझसे बालक पैदा हो, जबकि किसी पुरुष ने मुझे छुआ भी नहीं और न मैं व्यभिचारिणी हूँ?) सूरा मरियमः 20 अर्थात मुझसे बच्चा कैसे पैदा हो सकता है जबकि मेरी शादी भी नहीं हुई और ना ही मैं व्यभिचारिणी हूँ? ((फ़रिश्ते ने) कहाः ऐसा ही होगा, तेरे रब का वचन है कि ऐसा करना मेरे लिए अति सरल है और ताकि हम उसे लोगों के लिए एक निशानी बनाएं तथा अपनी विशेष दया, और यह एक निश्चित बात है) सूरा मरियमः 21 फिर जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने उनके गरीबान में फूँक दिया जिससे वे ईसा (अलैहिस्सलाम) के साथ गर्भवती हो गईं।
आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है: (जिसने गवाही दी कि एक अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, उसका कोई साझी नहीं, बेशक मुहम्मद उसके बन्दे और उसके रसूल हैं, बेशक ईसा अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल एवं उसके वह शब्द हैं जिसे उसने उनकी माँ मरियम की ओर डाला तथा वह अल्लाह के पास की आत्मा हैं, निस्संदेह जन्नत सत्य है और जहन्नम भी सत्य है, तो अल्लाह उसे जन्नत के आठ दरवाज़ों में से जिससे चाहेगा उस से प्रवेश देगा)
ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के शब्द से पैदा हुए, का मतलब यह है कि अल्लाह तआला ने उनके लिए कहा कि हो जा तो वे पैदा हो गए। यही कारण है कि उनको ईश्वरीय शब्द भी कहा जाता है। अल्लाह का फ़रमान हैः (निस्संदेह, ईसा का उदाहरण अल्लाह के निकट आदम के उदाहरण की तरह है कि उसे मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा : "हो जा", तो वह हो जाता है) सूरा आल-ए-इमरान : 59
चूँकि ईसा मसीह (अलैहिस्सलाम) बिन बाप के पैदा किए गए थे, इसलिए ईसाइयों ने यह धारणा बना ली कि वे अल्लाह के बेटे हैं। उनकी इस कुधारणा का खंडन अल्लाह तआला ने अपनी किताब में कायल करने वाली अकली दलीलों से किया है जो इस प्रकार हैंः
निस्संदेह, अल्लाह तआला निस्पृह और बेनियाज़ है, जैसा कि उसका फ़रमान हैः (तथा उन्होंने कहा कि अल्लाह ने कोई संतान बना रखी है, वह पवित्र है। बल्कि उसी का है जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, सब उसी के आज्ञाकारी हैं) सूरा अल-बक़राः 119
मालूम हुआ कि अल्लाह तआला अपने अलावा हर चीज़ से बेनियाज़ है। हर चीज उसकी मोहताज है। आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, सब उसी का है तो फिर सृष्टि में से कोई उसका बेटा कैसे हो सकता है जबकि हर चीज उसकी गुलाम और दास है?
वह तो इंसान है जो बेटे का मोहताज है जो बुढ़ापे में उसके साथ रहे या काम में उसका सहायक हो सके या बुढ़ापे में उसका खर्च चलाए या उसकी मौत के बाद उसका नाम जिंदा रख सके।
जबकि अल्लाह तआला तो ऐसी हर चीज से बेनियाज़ है, वह जीवित रहने वाला, अमर है, उसे कदापि मौत नहीं आने वाली है, तो फिर वह किसी बेटे का मोहताज कैसे हो सकता है?
अल्लाह की कोई पत्नी भी नहीं है जैसा कि उसने स्वयं स्पष्ट कर दिया हैः (वह आकाशों तथा धरती का रचयिता है, उसकी संतान कैसे होगी, जबकि उसकी कोई पत्नी नहीं? तथा उसी ने हर चीज़ पैदा की और वह प्रत्येक वस्तु को भली-भाँति जानने वाला है) सूरा अल-अन्आम:101
फिर उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है जबकि उसकी कोई बीवी ही नहीं है? संतान तो दो संगत चीजों के मिलन से पैदा होती है और अल्लाह तआला की सृष्टि में उसके योग्य और समान कोई वस्तु सिरे से है ही नहीं, क्योंकि वही हर वस्तु का रचयिता है इसीलिए न उसकी कोई बीवी है और न ही संतान। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (तथा यह कि हमारे रब की महिमा बहुत ऊँची है। उसने न (अपनी) कोई संगिनी (पत्नी) बनाई है और न कोई संतान) सूरा अल-जिन्न: 3
ईसा (अलैहिस्सलाम) का बिन बाप के जन्म लेना, उन्हें ईश्वर बनाए जाने के लिए काफ़ी नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (निस्संदेह, ईसा का उदाहरण अल्लाह के निकट आदम के उदाहरण की तरह है कि उसे मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा: "हो जा", तो वह हो गया) सूरा आल-ए-इमरान : 59
यदि ईसा का बिन बाप के पैदा होना, उनके ईश्वर होने को उचित ठहराता हो तो आदम का, जो माँ-बाप दोनों के बिना पैदा किए गए थे, ईश्वर होना अधिक मान्य होना चाहिए। लेकिन जब वे आपके स्वीकार तथा सहमति के अनुसार ईश्वर नहीं हो सकते हैं तो फिर ईसा का ईश्वर ना होना और अधिक मान्य हो जाता है।
उनका यह कथन एक ऐसा निरा दावा है जिसपर कोई दलील उपलब्ध नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (उनका कहना है कि अल्लाह ने अपने लिए पुत्र बनाया है। अल्लाह (हर कमी से) पवित्र है। वह निस्पृह है। जो कुछ आकाशों में तथा जो कुछ धरती में है, सबका मालिक वही है। तुम्हारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है। क्या तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहते हो, जिसका ज्ञान नहीं रखते?) सूरा यूनुसः 98 अल्लाह तआला ने एक अन्य स्थान में फ़रमाया है: (यह तो बस उनका मौखिक कथन है) सूरा अत्- तौबा: 30 अर्थात यह एक ऐसी बात है जिसका वजूद बस ज़ुबानी है, हकीक़त में इसका कोई वजूद नहीं है। यह इशारा है इस बात की तरफ कि यह तो बस एक झूठ है।
अल्लाह तआला ने हमें, बल्कि बच्चों को भी, एक ऐसी स्पष्ट दार्शनिक प्रमाण प्रदान किया है जिससे सिद्ध हो जाता है कि ईसा (अलैहिस्सलाम) ईश्वर कदापि नहीं थे। वह प्रमाण अल्लाह के इस कथन में हैः (मरियम का बेटा मसीह एक रसूल के सिवा कुछ नहीं। निश्चय ही उससे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके और उसकी माँ सिद्दीक़ा (अत्यंत सच्ची) है। दोनों खाना खाया करते थे। देखो, हम उनके लिए किस तरह निशानियाँ स्पष्ट करते हैं। फिर देखो, वे किस तरह भटके जाते हैं) सूरा अल-माइदा: 75 अर्थात दोनों ही खाद्दपदार्थ के मोहताज थे और उसे दोनों ही अपने भीतर से निकालने पर विवश भी थे, जिससे साबित होता है कि दोनों और बंदों की तरह दो बंदे ही थे, ईश्वर नहीं थे।
स्वयं मसीह (अलैहिस्सलाम) ने कभी दावा नहीं किया कि वे ईश्वर हैं और ना ही किसी को अपनी इबादत करने का हुक्म दिया। इसके उलट, जब वे दूध-पीते शिशु थे तो सबसे पहले उन्होंने जिस वाक्य का उच्चारण किया, वह यह थाः (मैं अल्लाह का बंदा हूँ। उसने मुझे पुस्तक (इन्जील) प्रदान की है तथा मुझे नबी बनाया है) सूरा मरियमः 30 अल्लाह तआला फ़रमाता है: (तथा जब अल्लाह (क़ियामत के दिन) कहेगा: ऐ मरियम के पुत्र ईसा! क्या तुमने लोगों से कहा था कि मुझे तथा मेरी माँ को अल्लाह के अलावा दो पूज्य बना लो? वह कहेगा: तू पवित्र है, मेरे लिए यह उचित ही न था कि मैं ऐसी बात कहूँ, जिसका मुझे कोई अधिकार नहीं? यदि मैंने यह बात कही थी, तो निश्चय तूने उसे जान लिया। तू जानता है, जो मेरे मन में है और मैं नहीं जानता जो तेरे मन में है। निश्चय तू ही सब छिपी बातों (परोक्ष) को बहुत अच्छी तरह जानने वाला है) सूरा अल-माइदाः 119
ईसा मसीह (अलैहिस्सलाम) को जिंदा आसमान पर उठा लिया गया। हुआ यह कि जब रूमियों ने उन्हें गिरफ्तार करना चाहा तो अल्लाह तआला ने उन्हीं में से एक व्यक्ति को मसीह का समरूप बना दिया, फिर उन्हें आसमान पर जिंदा उठा लिया गया। इस प्रकार, न उनकी हत्या की जा सकी और न उनको सूली चढ़ाया जा सका, बल्कि उनके हमशक्ल को उनके स्थान पर मार डाला गया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः (निस्संदेह, वे उनको नहीं मार सके) (बल्कि अल्लाह ने उन्हें अपनी ओर उठा लिया तथा अल्लाह सदा से हर चीज़ पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है) सूरा अन-निसा: 157-158 वे दुनिया के अंतकाल में आसमान से उतरेंगे और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शरीयत के अनुसार फैसले करेंगे।
इसलिए, कोई व्यक्ति जब तक अल्लाह के रसूलों में से दो रसूलों- मुहम्मद तथा ईसा मसीह- पर ईमान नहीं लाएगा, तब तक उसका ईमान सही नहीं माना जाएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे की पुष्टि करने वाले हैं। दोनों का धर्म एक ही था और वह था अल्लाह को केवल एक मानते हुए उसकी इबादत करना और किसी को उसका साझी न ठहराना। इसी तरह व्यक्ति के ईमान के सहीह होने के लिए अनिवार्य है कि वह अल्लाह के समस्त रसूलों पर ईमान लाए। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः "(रसूल उस चीज़ पर ईमान लाया, जो उसके लिए अल्लाह की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले अल्लाह तथा उसके फ़रिश्तों और उसकी सब पुस्तकों एवं रसूलों पर ईमान लाए। (वे कहते हैः) हम उसके रसूलों में से किसी के बीच अन्तर नहीं करते। हमने सुना और हम आज्ञाकारी हो गए। हे हमारे रब! हमें क्षमा कर दे और हमें तेरे ही पास आना है) " सूरा बक़राः 285
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