इस्लाम के बारे में 5 मिनट में जानें भाषाः अरबी शायद आप सोच रहे होंगे कि हर जगह फैल रहे इस धर्म रहस्य क्या है? इसकी हकीकत क्या है? वह क्या है जिसके कारण लोग पूरे प्रेम और संतुष्टि के साथ उसकी ओर आकर्षित होते जा रहे हैं? जवाब यह है कि यह अल्लाह का ऐसा धर्म है जो इंसान की प्रकृति से पूरी तरह मेल खाता है और उसकी सभी आध्यात्मिक एवं शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करता है। इस्लाम, सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रब अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाने, उसके आदेशों के सामने नतमस्तक हो जाने तथा उसने जिस बात से रोका है, उससे दूर रहने का नाम है। यही वह धर्म है जिसे अल्लाह तआला ने सारे मनुष्यों के लिए, उनके बीच जातियों,…
शायद आप सोच रहे होंगे कि हर जगह फैल रहे इस धर्म रहस्य क्या है?इसकी हकीकत क्या है?वह क्या है जिसके कारण लोग पूरे प्रेम और संतुष्टि के साथ उसकी ओर आकर्षित होते जा रहे हैं?
जवाब यह है कि यह अल्लाह का ऐसा धर्म है जो इंसान की प्रकृति से पूरी तरह मेल खाता है और उसकी सभी आध्यात्मिक एवं शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करता है।
इस्लाम, सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रब अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाने, उसके आदेशों के सामने नतमस्तक हो जाने तथा उसने जिस बात से रोका है, उससे दूर रहने का नाम है।यही वह धर्म है जिसे अल्लाह तआला ने सारे मनुष्यों के लिए, उनके बीच जातियों, रंगों और भाषाओं के अंतर्भेदों को परे रखते हुए, चुन लिया है।यही आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और मुहम्मद (अलैहिमुस्सलाम) का धर्म है।
इस्लाम एक महान धर्म है जिसकी बुनियाद ऐसे स्वच्छ आस्था, उच्च आचरण, खालिस (जो केवल अल्लाह के लिए हो) इबादत तथा उत्तम दर्जे के व्यवहारों पर है जो इंसान के अपने रब, अपने परिवार, अपने समाज के लोगों और दुनिया के तमाम लोगों के साथ संबंध सुव्यवस्थित करते हैं।
इस्लाम पाँच मूलाधारों पर टिका हुआ है। उनको माने बगैर किसी का इस्लाम सही नहीं होता और कबूल ही नहींं किया जाता है। इस्लाम की मिसाल एक भवन की है और यह पाँच मूलाधार उसके पाँच स्तंभ हैं जिनपर यह विशाल भवन खड़ा है।
इस्लाम के पाँच स्तंभ यह हैंः(इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत एवं उपासना के लायक़ नहीं है और यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान महीने के रोज़े रखना तथा अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का हज करना)
पहला स्तंभः दो गवाहियाँः
अर्थात आप अपने दिल से विश्वास करेंगे, ज़ुबान से इकरार करेंगे और इन शब्दों का उच्चारण करेंगेः(अश्हदु अल- ला इलाहा इल्लल्लाहु व अन्ना मुहम्मदर्रसूलुल्लाह, यानी अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा माबूद नहीं है एवं मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं)
अर्थात मैं अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं करता, क्योंकि वही एक ऐसा पूज्य है जो वास्तव में इबादत किए जाने का हकदार है, उसके अतिरिक्त इंसान जितने भी माबूदों की पूजा करते हैं, सब असत्य हैं और पूजे जाने के लायक़ नहीं हैं।
क्या आपने कभी अपने बारे में सोचा है?अपने आंतरिक और बाहरी अंगों के बारे में?अपने दिमाग, अपने दिल, अपने मसल सिस्टम और उन तमाम प्रणालियों के बारे में जो आपके शरीर के अंदर हैं?क्या इस पूरे ब्रह्मांड में कोई है जो यह दावा कर सके कि उसी ने इन सब चीजों को पैदा किया है? अल्लाह के सिवा ऐसा कोई मौजूद नहीं है।
बस अल्लाह तआला ही इस बात का हकदार है कि हम उसकी इबादत करें, अपने दिल की गहराइयों से उससे प्रेम करें, उसके आदेशों का अनुपालन करें, तरह-तरह की इबादतों से उसका सामिप्य हासिल करें और हर उस चीज से दूर रहें जिससे वह घृणा करता है और जिसे वह पसंद नहीं करता है।
आप गवाही देंगे कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। अल्लाह तआला ने उन्हें समस्त लोगों के दरमियान से नबी के तौर पर चुना है। अल्लाह ने आप पर इस धर्म और क़ुरआन की वह्य की है और आपको पूरी दुनिया में उसके प्रचार-प्रसार का आदेश दिया है।
वे अल्लाह के नजदीक सबसे निपुण और प्रियतम मनुष्य हैं। आपके आस-पास के तमाम लोगों ने, यहाँ तक कि आपके दुश्मनों ने भी आपको आपकी सच्चाई और अमानतदारी से जाना, बल्कि आपको अमीन अर्थात अमानतदार और विश्सनीय की उपाधि दे दी।
इसलिए आपकी कही हर बात को सच मानना वाजिब है, क्योंकि आप अल्लाह तआला की तरफ से उसी के धर्म का संचार करते हैं। आपके हर आदेश का पालन करना और हर मनाही से दूर रहना भी वाजिब है, क्योंकि आपका अनुसरण वास्तव में अल्लाह ही का अनुसरण है।
2- दूसरा स्तंभ: नमाज़ स्थापित करना
नमाज़, बंदा और उसके सृष्टिकर्ता के बीच एक स्थायी संबंध है। नमाज़ कुछ खास शब्दों और कर्मों पर आधारित है जिनके द्वारा बंदा अपने रब से करीब होता है। इंसान दिन-रात मे पाँच बार नमाज़ पढ़ता है।
इंसान अपने रब का बंदा है और स्थायी तौर पर इस बात का मोहताज है कि उसके सामने नतमस्तक हो, उसे पुकारे, उससे बात करे, उसके सामने अपने दुखों को प्रकट करे और उससे हर वह वस्तु माँगे जिसको पाने की उसे उम्मीद हो।
नमाज़ पढ़ने से पहले बंदे के लिए जरूरी है कि अच्छी तरह से पाक-साफ हो जाए और नमाज़ की तैयारी के तौर पर वज़ू के अंगों को धोए।
फिर क़िब्ले की तरफ मुँह करके खड़ा हो, तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहे, फिर क़ुरआन की कुछ आयतों का पाठ करे, फिर रुकू और सजदा करे, नमाज़ के सारे कर्मों को पूरा करे और उसकी दुआओं का पाठ करे।
ऐसा दिन-रात में पाँच बार करेः फज्र, ज़ुह्र, अस्र, मग्रिब और इशा में।
नमाज़ के अनेक फायदों में से एक यह है कि वह बंदे को उसके रब से करीब करती है और उसे स्थायी तौर पर अल्लाह की याद दिलाती है।अतः बंदा अल्लाह की इबादत ऐसे करता है कि मानो वह उसे देख रहा है और अगर ऐसा न हो तो बेशक उसका रब तो उसे देख ही रहा है।
नमाज़, मोमिन की आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाती है और दुनिया की ज़िंदगी की कठिनाइयों का सामना करने में मदद देती है। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब भी किसी मुसीबत में पड़ते या उन्हें किसी कठिन परिस्थिति का सामना होता तो नमाज़ पढ़ने में जल्दी करते।
तीसरा स्तंभ: ज़कात देना
ज़कात, एक सामूहिक दायित्व प्रणाली है। जिस में धनवान लोग अपनी पूरी दौलत का ढाई प्रतिशत अंश निर्धनों और दरिद्रों की मदद के लिए निकालते हैं।
मालदार के माल में निर्धनों का भी हक है, इसलिए मालदार को अपने पूरे माल पर हक जताकर बैठ जाने और कमाने में असमर्थ लोगों को वंचित करने का हक नहीं है।
ज़कात, मालदार की आत्मा को कंजूसी, अहंकार और धन अर्जित करने के हद से ज्यादा लोभ से पाक करती और उसके अंदर दान करने की आदत डालती है जो उसके लिए सौभाग्य और हृदय-मुक्ति का साधन बनती है।
यही कारण है कि जब वह अपना दानी हाथ किसी दरिद्र की ओर बढ़ाता है और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट की चमक देखता है तो दूसरे को खुश करने के कारण, आत्म-शांति और गहरी प्रसन्नता का अनुभव करता है।
उसी प्रकार, ज़कात दरिद्र की आत्मा को जलन और कपट से पाक करति है, क्योंकि एक फकीर जब देखता है कि एक मालदार उसको दान दे रहा और उसकी सहायता कर रहा है, तो वह उस मालदार आदमी से जलने और उसके माल पर नाहक हाथ डालने के बारे में सोचना भी छोड़ देता है।
बल्कि वह उस मालदार आदमी के माल में ज्यादा से ज्यादा वृद्धि की तमन्ना करने लगता है, क्योंकि वह व्यक्तिगत रूप से इस मालदार से लाभान्वित होता है।
ज़कात, फकीरों को मालदारों के सामने ज़लील होने से बचाती और उनकी इज्जतदार ज़िंदगी की ज़मानत देती है, क्योंकि एक फकीर जब ज़कात का माल लेता है तो महसूस करता है कि वह अपना वह हक ले रहा है जिसे अल्लाह तआला ने उसके लिए निर्धारित किया है। इस तरह, उसे अपना हक लेने में किसी प्रकार के अपमान का अहसास नहीं होता है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः(और जिनके धन में एक निश्चित भाग है)(माँगने वाले तथा वंचित के लिए)सूरा अल-मआरिजः 24-25
4- चौथा स्तंभ: रमज़ान का रोज़ा
इंसान के साल के एक महीने रमज़ान में फज्र से लेकर मग्रिब तक खाने-पीने और संभोग करने से रुक जाने का नाम रोज़ा है।
रोज़ा इंसान को, चाहे वह दूसरे इंसानों की आँखों से दूर ही क्यों न हो, अपने रब को याद रखना, उसके आदेशों का पालन करना और उसकी मना की हुई चीजों से दूर रहना सिखाता है।इसी वजह से आप वास्तविक मुसलमान को अपने कर्मों में निष्ठावान (केवल अल्लाह को राज़ी करने वाला) पाएंगे, चाहे उसकी हरकतों की निगरानी करने वाले कैमरे ना भी लगे हों।
रोज़ा, इंसान को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता और अपनी मनोकामनाओं और इच्छाओं को कंट्रोल करने की क्षमता देता है।तथा एक मुसलमान के अंदर हलाल खाने पीने की वस्तुओं के अधिक उपभोग से दूर रहने की आदत भी पैदा करता है, जिससे उसकी बंदगी सिर्फ अल्लाह के लिए खास हो जाती है, वह दुनिया और उसके भोग-विलास का गुलाम नहीं बनता।
रोज़ा, इंसान को संयम और दृढ़ संकल्प लेने का प्रशिक्षण भी देता है।अतः जो व्यक्ति चौदह घंटों तक सख्त गर्मी में पानी की एक बूँद पिये बिना और सख्त भूख की हालत में खाने का एक भी लुक़मा खाए बिना रह सकता है, उसके दृढ़ संकल्प वाला और अति धैर्यवान इंसान होने में कोई संदेह नहीं।
रोज़ा, लोगों को सामूहिक सहायता का प्रशिक्षण भी देता है।इस तरह कि जब एक धनवान व्यक्ति भूख की सख्ती का अनुभव करता है तो उसे भूखे फकीर की भूख का अहसास होता है और वह अपना माल और खान-पान देकर उसकी सहायता करता है, क्योंकि उसे भूख की सख्ती का अहसास हो चुका होता है।
रोज़े के अंदर बड़े स्वास्थ्य संबंधी फायदे छिपे हैं। उससे इंसान के पाचन तंत्र को आराम मिलता है और वह शरीर के अंदर तरल पदार्थों के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है।
5- पाँचवाँ स्तंभ: अल्लाह के पवित्र घर का हज करना
हज इस प्रकार से उम्र भर की एक यात्रा है कि इंसान अपने पूरे जीवन में कम से कम एक बार पाँच दिनों की अवधि में हज के सारे क्रियाकलापों की अदायगी के लिए जाता है। इस अवधि में वह दुनिया के तमाम झमेलों से आज़ाद होकर अपने रब को खूब याद करता है, उससे खूब दुआएँ करता है और अपनी दुआओं में दुनिया एवं आख़िरत की हर वह चीज माँगता है जिसकी उसे जरूरत होती है।
हज में मुसलमानों की एकता एवं समता का इस प्रकार प्रदर्शन होता है कि विभिन्न राष्ट्रीयताओं से ताल्लुक रखने वाले, विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले दुनिया भर के मुसलमान विभिन्न देशों से आते हैं और एक जैसा वस्त्र पहन कर एक ही जगह एकत्रित होते हैं।
हज मुसलमानों को एक सिस्टम, एकता, समता, आपसी प्रेम और सद्भावना सिखाता है। उसमें धनवान और निर्धन, स्वामी और दास तथा सक्षम और अक्षम के दरमियान कोई अंतर नहीं रह जाता है। वे सभी हज की भूमि में समान होते हैं।
यह इस्लाम के मूलाधारों में से एक मूलाधारा का वार्षिक व्यवहारिक अनुप्रयोग है कि हज के दौरान गोरे को काले पर और अरबी को गैर-अरबी पर धर्मपरायणता के अतिरक्त किसी और आधार पर कोई वरीयता प्राप्त नहीं होती है।
भाषाः अरबी हर इंसान इस हाल में पैदा होता है कि उसकी आत्मा और दिल में अल्लाह का अंतर्ज्ञान और उसकी तौहीद (एकेश्वरवाद) का बीज अंकुरित होता है। जब वह बड़ा होता है तो कभी उसकी आत्मा में वह बीज अंकुरित ही रहता है और कभी वह अपने माता-पिता के कोरे अनुकरण या दूसरे कारणों से इस्लाम के अलावा दूसरे धर्म में दाखिल हो जाता है। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस वास्तविकता को स्पष्ट करते हुए फ़रमाया हैः (प्रत्येक पैदा होने वाला शिशु फितरत (इस्लाम) पर जन्म लेता है, फिर उसके माता-पिता उसे यहूदी बना देते हैं या ईसाई बना देते हैं या मजूसी बना देते हैं।) महान इस्लाम धर्म उस प्रकृति से पूरी तरह मेल…
भाषाः अरबी इस्लाम का संदेश तमाम आसमानी संदेशों का समापन है। इस प्रकार, इस्लाम ही वह धर्म है जिसे अल्लाह तआला ने तमाम लोगों के लिए चुना है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया, तुम पर अपना उपकार पूरा कर दिया और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर चुन लिया) सूरा अल-माइदा:3 और अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबियों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं। इसलिए, वह संपूर्ण मानव जाति के लिए दूत हैं। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (आप कह दें कि ऐ लोगो! बेशक मैं तुम सभों की ओर भेजा गया रसूल हूँ) सूरा अल-आराफ:158 अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व…
इस्लाम, अल्लाह जो ब्रह्माण्ड का निर्माता और प्रबंधक है उसके प्रति समर्पण, तथा प्रेम एवं श्रद्धा के साथ उसके आगे झुकने का नाम है, इस्लाम का आधार अल्लाह पर ईमान (विश्वास) रखने पर है, और यह आस्था रखना कि वही ख़ालिक़ (रचयिता, सृष्टिकर्ता) है तथा उसके सिवा सभी मख़लूक़ (रचना, सृष्टि) हैं, वह अकेला ही पूजा के योग्य है, उसका कोई साझी नहीं है, उसके अतिरिक्त कोई भी वास्तव में पूजा करने योग्य नहीं है, उसके लिए सबसे सुंदर नाम और उच्चतम गुण हैं, तथा उसके लिए बिना किसी कमी के कमाल -ए- मुत़लक़ (वृहद पूर्णता) है, उसने न तो किसी को जन्म दिया है और न ही उसका जन्म हुआ है और न ही कोई उसके बराबर एवं समान है, और…
इस्लाम एक प्रवृत्तिक, तार्किक एवं कल्याणकारी धर्म है।
10 भाषाएँ
इस्लाम एक प्रवृत्तिक, तार्किक एवं कल्याणकारी धर्म है।
यह पुस्तक दर्शाती है कि इस्लाम स्वाभाविक प्रवृत्ति और विवेक के अनुरूप है और दुनिया एवं आख़िरत (लोक-परलोक) में ख़ुशी प्राप्त करने का मार्ग प्रस्तुत करती है। यह स्पष्ट करती है कि सृष्टि का उद्देश्य अल्लाह पर ईमान और केवल उसी एक की इबादत करना है, और यह पुष्टि करती है कि नेक अमल (सदाचार) और ईमान ही लोगों के बीच श्रेष्ठता का आधार हैं।