श्रेष्ठ आचरण
यह पुस्तिका अल्लाह और लोगों के साथ व्यवहार में अच्छे आचरण के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालती है और यह स्पष्ट करती है कि अल्लाह द्वारा दी गई सूचनाओं और उसके आदेशों को स्वीकृति एवं प्रसन्नता के साथ ग्रहण करना तथा उसके निर्णयों पर धैर्य रखना अनिवार्य है। साथ ही यह दूसरों के साथ व्यवहार करते समय किसी को कष्ट देने से बचने, उदारतापूर्ण व्यवहार करने और चेहरे पर मुस्कान सजाए रखने के माध्यम से उत्तम आचरण के सभी मानकों पर खरा उतरने का महत्व बताती है एवं पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पावन जीवनी से उदाहरण प्रस्तुत करती है।
This PDF is generated automatically from the book's text; its layout may differ from the printed edition.
श्रेष्ठ आचरण
लेखक : आदरणीय शैख़ अल्लामा
मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन
अल्लाह तआला उन्हें, उनके माता-पिता तथा समस्त मुसलमानों को क्षमा करे।
अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ, जो बड़ा दयालु अत्यंत दयावान है।
अल्लाह तआला ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मार्गदर्शन एवं सत्य धर्म के साथ भेजा; ताकि उस सत्य धर्म को अन्य सभी धर्मों पर प्रभावशाली बना दे। अल्लाह तआला ने उन्हें क़यामत से पहले सुसमाचार देने वाला, सावधान करने वाला, अपनी अनुमति से अल्लाह की ओर बुलाने वाला एवं उज्ज्वल दीप बनाकर भेजा। अतः उन्होंने अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया, अमानत अदा कर दी, उम्मत को सही मार्ग दिखा दिया एवं अंतिम साँस तक अल्लाह के मार्ग में प्रयत्नशील रहे। तदनुसार अल्लाह ने अपने बंदों में से जिसे चाहा अपना अनुग्रह प्रदान किया और उसने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आह्वान को स्वीकार कर लिया एवं उनके मार्गदर्शन से लाभान्वित हुआ तथा अल्लाह ने अपनी तत्वदर्शिता से अपने बंदों में से जिसे चाहा वंचित कर दिया। अतः उसने आज्ञापालन के बजाय अहंकार दिखाया, उनके संदेश को झुठलाया तथा उनके आदेश का विरोध किया। अतः वह घाटे और घोर पथभ्रष्टता का शिकार हो गया। नि:सन्देह समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है। हम उस की स्तुति करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं, उसी से क्षमायाचना करते हैं और उसी की ओर लौटते हैं। हम अपनी आत्मा और अपने कर्मों की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, उसे कोई पथभ्रष्ट नहीं कर सकता और जिसे पथभ्रष्ट कर दे, उसे कोई मार्गदर्शन देने वाला नहीं। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई समकक्ष नहीं है, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के दास एवं उसके संदेशवाहक (रसूल) हैं।
तत्पश्चात्: मुझे इस समागम में [1] अच्छे आचरण के बारे में बात करते हुए प्रसन्नता हो रही है। [1] यह समागम उनैज़ा वैज्ञानिक संस्थान के ग्रीष्मकालीन केंद्र में आयोजित किया गया था।
(अरबी भाषा के शब्द) अल-ख़ुलुक़ (का अर्थ) - जैसा कि विद्वान कहते हैं - इन्सान का आंतरिक रूप है; क्योंकि इन्सान के दो रूप होते हैं :
बाह्य रूप : यह उसकी संरचना का वह आकार है जिस पर अल्लाह ने शरीर को बनाया है और हम सभी जानते हैं कि इस बाह्य रूप में से कुछ सुंदर तथा मनोहर होता है, एवं कुछ कुरूप तथा भद्दा होता है और कुछ इनके बीच का होता है।
इसी तरह, आंतरिक रूप भी अच्छे रूप और बुरे रूप में विभाजित होता है और इसी को आचरण कहा जाता है। अतः आचरण वह आंतरिक रूप है, जो उसकी मूल प्रकृति में समाहित है।
क्या आचरण जन्मजात होता है अथवा अर्जित?
उत्तर यह है कि : निस्संदेह कुछ आचरण जन्मजात होते हैं और कुछ अर्जित होते हैं। जिस तरह आचरण स्वाभाविक होता है, उसी तरह वह अर्जित भी हो सकता है, जिसका अर्थ यह है कि इन्सान जिस प्रकार प्राकृतिक रूप से अच्छे और सुंदर आचरण वाला हो सकता है, उसी प्रकार वह प्रयास और अभ्यास के द्वारा भी आचरण अर्जित कर सकता है; और इसीलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अशज्ज अब्दुल क़ैस से कहा था : "तुम में दो गुण ऐसे हैं, जिन्हें अल्लाह पसंद करता है : बुद्धिमत्ता और धैर्य।" उन्होंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या मैंने इन्हें प्रयासपूर्वक अपनाया है या अल्लाह ने मुझे इन पर उत्पन्न किया है? आपने उत्तर दिया : "बल्कि अल्लाह ने तुम्हें इन पर उत्पन्न किया है।" उन्होंने कहा : समस्त प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जिसने मुझे दो ऐसी बातों पर उत्पन्न किया, जिन्हें अल्लाह और उसके रसूल पसंद करते हैं [2]। [2] इसे अबू दावूद ने ''किताब अल-अदब'', ''बाब फ़ी क़ुब्लतिर-रिज्ल'' (हदीस संख्या : 5225) में ज़ारिअ् रज़ियल्लाहु अन्हु से, जो अब्दुल क़ैस के प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे, तथा तिर्मिज़ी ने ''अबवाब अल-बिर्र व अल-सिलह'', ''बाब मा जाअ फ़ी अल-अनात व अल-अ'ज'लति'' (हदीस संख्या : 2011) में इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है।
यह इस बात का प्रमाण है कि अच्छे और उच्च आचरण जन्मजात भी होते हैं और अभ्यास से भी अपनाए जाते हैं। किंतु निःसंदेह, जन्मजात आचरण, अभ्यास से अपनाए गए आचरण से उत्तम होता है; क्योंकि जब आचरण स्वाभाविक होता है, तो वह इन्सान का चरित्र और उसकी प्रकृति बन जाता है। उसे व्यवहार में लाने के लिए न तो किसी कृत्रिमता की ज़रूरत होती है और न ही किसी बनावट की आवश्यकता होती है। लेकिन यह अल्लाह की कृपा है, वह जिसे चाहता है, प्रदान करता है। और जो व्यक्ति इससे वंचित रह जाए - अर्थात्, जो जन्मजात रूप से अच्छे आचरण से वंचित रह जाए - तो वह उसे निरंतर प्रयास के माध्यम से प्राप्त कर सकता है। और यह प्रशिक्षण तथा अभ्यास के द्वारा संभव है, जैसा कि हम -इन शा अल्लाह तआला- आगे चलकर इसका उल्लेख करेंगे।
यहाँ एक प्रश्न उठता है। प्रश्न यह है कि दोनों में से कौन श्रेष्ठ है; एक वह व्यक्ति जो स्वभाव से ही अच्छे आचरण वाला है और दूसरा वह व्यक्ति जो उसे अपनाने के लिए स्वयं से संघर्ष करता है, तो दोनों में से किसका स्थान अधिक ऊँचा और पुण्य अधिक है?
हम इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं : इसमें कोई संदेह नहीं कि जिसे अच्छे आचरण पर स्वाभाविक रूप से ढाला गया है, वह उस आचरण को अपनाने या अपने अन्दर उस आचरण की उपस्थिति की दृष्टि से अधिक संपूर्ण है; क्योंकि उसे किसी प्रकार के कष्ट या संघर्ष की आवश्यकता नहीं होती, और कुछ स्थितियों तथा स्थानों पर यह आचरण उससे छूटता भी नहीं है। चूँकि अच्छा आचरण उसकी प्रकृति और स्वभाव में होता है, इसलिए आप उससे किसी भी समय अथवा किसी भी स्थान पर और किसी भी परिस्थिति में मिलें, उसे अच्छे आचरण वाला ही पाएँगे। अतः इस दृष्टिकोण से वह निस्संदेह अधिक संपूर्ण है।
और जहाँ तक उस आचरण का प्रश्न है जो अभ्यास, प्रयास, साधना या प्रशिक्षण के माध्यम से आता है, तो मनुष्य को इसके लिए अपने मन से संघर्ष करने के कारण पुण्य तो मिलता है, लेकिन चरित्र की पूर्णता के दृष्टिकोण से यह पहले प्रकार (प्राकृतिक स्वभाव) की तुलना में काफ़ी अधूरा होता है।
तो जब मनुष्य को दोनों प्रकार के आचरण एक साथ प्रदान किए जाते हैं, स्वाभाविक और अर्जित दोनों, तो यह अत्यंत परिपूर्ण होता है। इस तरह कुल चार प्रकार हुए :
1- अच्छे आचरण से वंचित व्यक्ति।
2- वह व्यक्ति जिसकी फ़ितरत (स्वभाव) में अच्छा आचरण मौजूद हो, लेकिन वह जन्मजात आचरण तक ही सीमित रहे।
3- वह व्यक्ति जिसकी फ़ितरत (स्वभाव) में अच्छा आचरण मौजूद हो तथा फिर अर्जन के द्वारा उसमें और वृद्धि की हो।
4- वह व्यक्ति जिसकी फ़ितरत (स्वभाव) में अच्छा आचरण मौजूद न हो, लेकिन वह अपने प्रयास से उसे प्राप्त करे।
संक्षेप में निष्कर्ष यह है किः जहाँ तक अच्छे आचरण का संबंध है, तो जिसे यह जन्मजात स्वभाव के रूप में मिला है, वह अधिक परिपूर्ण है। वहीं दूसरी ओर, उत्तम चरित्र प्राप्त करने में आने वाले कष्ट और कठिनाई के दृष्टिकोण से, जिस व्यक्ति ने इसे प्रयास और अभ्यास से अर्जित किया है, उसे संघर्ष का पुण्य मिलता है।
यहाँ एक और प्रश्न है किः क्या कुछ ऐसे नैतिक चरित्र (आचरण) भी हैं, जो कुरआन और सुन्नत में मौजूद नहीं हैं? यदि हैं, तो उन्हें जानने का क्या उपाय है?
उत्तर: अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "निःसंदेह मुझे अच्छे आचरण को पूर्ण रूप देने के लिए भेजा गया है।" [3]; वह इसलिए कि अल्लाह की ओर से बंदों को दी गई पिछली सभी शरीअतें उत्तम आचरण की प्रेरणा देती हैं तथा इसीलिए विद्वानों ने उल्लेख किया है कि उत्तम आचरण वे हैं जिनके वांछनीय होने पर सभी शरीअतें एकमत हों। लेकिन इस संपूर्ण शरीअत में, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उत्तम एवं उत्कृष्ट चरित्र का पूर्ण रूप लेकर पधारे। [3] इसे अहमद ने (2/381), और बैहक़ी ने 'अस-सुनन अल-कुबरा' (10/233) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। शब्द बैहक़ी के हैं।
आइए इसे क़िसास (बदले या दंड के नियम) के उदाहरण से समझें। यदि कोई व्यक्ति किसी पर शारीरिक आघात कर दे, तो क्या उससे बदला (क़िसास) लिया जाएगा या नहीं? विद्वानों ने लिखा है कि यहूदियों की शरीअत में क़िसास अनिवार्य है और हर हाल में लिया जाना है। उसमें पीड़ित के पास कोई विकल्प नहीं है। जबकि ईसाइयों की शरीअत में इसके विपरीत है, वहाँ माफ़ करना अनिवार्य है। लेकिन हमारी शरीअत (इस्लाम) दोनों दृष्टिकोण से परिपूर्ण है; इसमें क़िसास का भी प्रावधान है और क्षमा का भी। क्योंकि अपराधी को उसके अपराध की सज़ा देना दृढ़ता और बुराई को रोकने का उपाय है, जबकि उसे क्षमा करने में भलाई, एहसान और माफ़ किए गए व्यक्ति पर उपकार है। अतः हमारी शरीअत —और समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है— पूरक बनकर आई है, जिसने हक़दार व्यक्ति को क्षमा करने या बदला लेने के विकल्प दिए; ताकि जहाँ क्षमा करना उचित हो वहाँ क्षमा किया जा सके और जहाँ दंड देना उचित हो वहाँ दंडित किया जा सके।
*
अच्छे आचरण के क्षेत्र
बहुत-से लोग समझते हैं कि अच्छे आचरण का संबंध सृष्टिकर्ता के साथ व्यवहार से नहीं, बल्कि केवल सृष्टि के साथ व्यवहार से है। परंतु यह समझ अपूर्ण है, क्योंकि अच्छा आचरण जिस प्रकार सृष्टि के साथ व्यवहार में होता है, उसी प्रकार सृष्टिकर्ता के साथ व्यवहार में भी होता है।
इस प्रकार, अच्छे आचरण का संबंध महिमावान एवं सर्वोच्च सृष्टिकर्ता (अल्लाह) के साथ व्यवहार और सृष्टि के साथ व्यवहार दोनों से है। इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
पहला : महिमावान एवं सर्वोच्च सृष्टिकर्ता के साथ व्यवहार में अच्छा आचरण :
सृष्टिकर्ता के साथ अच्छे आचरण में तीन बातें सम्मिलित हैं :
1- अल्लाह द्वारा दी गई सूचनाओं की पुष्टि करना।
2- उसके आदेशों को स्वीकार करके उन्हें क्रियान्वित करना तथा उन्हें अपने जीवन में उतारना।
3- उसके द्वारा निर्धारित भाग्यों को धैर्य के साथ स्वीकार करना और उनसे संतुष्ट रहना।
ये तीन चीज़ें हैं, जिन पर अल्लाह तआला के साथ अच्छा आचरण निर्भर है।
1- उसकी दी हुई सूचनाओं को सत्य मान कर इस तरह स्वीकार करना कि इन्सान के मन में प्रतापी एवं महिमावान अल्लाह की सूचना के संबंध में कोई संदेह या दुविधा न रहे; क्योंकि अल्लाह तआला की दी हुई सूचना ज्ञान पर आधारित है, तथा पवित्र अल्लाह कहने वालों में सबसे सच्चा है, जैसा कि उसने अपने बारे में स्वयं कहा है : "...अल्लाह से अधिक सच्ची बात वाला और कौन होगा?" [सूरा अल-निसा : 87]।
अल्लाह की सूचनाओं की पुष्टि का अनिवार्य परिणाम यह है कि इन्सान उन पर पूर्ण विश्वास रखे, उनका बचाव करे और उनके लिए संघर्ष करे। विश्वास इतना दृढ़ हो कि महान अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सूचनाओं के संबंध में उसके दिल में संदेह या शंका हेतु कोई स्थान न रहे।
जब कोई बंदा इस गुण को धारण कर लेता है, तो उसके लिए अल्लाह और उसके रसूल की दी हुई सूचनाओं पर विरोधियों द्वारा जताए जाने वाले हर संदेह से छुटकारा पाना संभव हो जाता है, विरोधियों का संबंध चाहे अल्लाह के दीन में नित-नई चीज़ें जोड़ने वाले मुसलमानों से हो या मुसलमानों के दिलों में संदेह पैदा करने वाले नास्तिकों से।
आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं : सहीह बुख़ारी में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "यदि तुम में से किसी के पीने की चीज़ में मक्खी गिर जाए तो उसे डुबो दे, फिर उसे निकाल दे; क्योंकि उसके एक पंख में रोग और दूसरे में आरोग्य होता है।" [4] [4] इस हदीस को बुख़ारी ने “किताब बद'उल-खल्क़'' अध्याय : "इज़ा व'क़'अ अज़-ज़ुबाबु फ़ी शराबि अहदिकुम फ़ल-यग़्मिस्हु, फ़-इन्ना फ़ी इह्दा जनाह़ैहि दाअन व फ़ी अल-उखरा शिफ़ाअन" में, हदीस संख्या : (3320) के अंतर्गत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
अतः यह एक सूचना है, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दी है और इसका संबंध ग़ैब (परोक्ष) की बातों से है। (वह रसूल) जो अपनी इच्छा से कुछ नहीं कहते। केवल वही कहते हैं जो अल्लाह द्वारा उनपर वह्य (ईश-वाणी) की गई होती है, क्योंकि आप एक मनुष्य हैं और मनुष्य ग़ैब नहीं जानता, बल्कि अल्लाह ने उनसे फ़रमाया: "(ऐ नबी!) आप कह दें : मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने (कोष) हैं, और न मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ, और न मैं तुम से यह कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) की जाती है...।" [सूरा: अल-अन्आम : 50]।
अतः हमारे लिए अनिवार्य है कि हम इस सूचना के प्रति अच्छा आचरण व्यक्त करें। इस सूचना के प्रति अच्छे आचरण का अर्थ यह है कि हम इसे स्वीकार करें और यह दृढ़ विश्वास रखें कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस हदीस़ में जो कुछ भी कहा है, वह सत्य एवं यथार्थ है, भले ही कोई आपत्ति करने वाला इस पर आपत्ति करे। हम पूर्ण विश्वास के साथ यह जान लें कि जो बात भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सही रूप में प्रमाणित बातों के विरुद्ध है, वह असत्य है; क्योंकि अल्लाह तआला ने कहा है : "फिर सत्य के पश्चात कुपथ (असत्य) के सिवा क्या रह गयाॽ फिर तुम किधर फिराये जा रहे हो?" [सूरा यूनुस : 32]।
एक अन्य उदाहरण देखें, जिसका संबंध क़यामत के दिन से संबंधित सूचनाओं से है: :
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है : ''निश्चय ही क़यामत के दिन सूरज सृष्टि से इतना निकट आ जाएगा कि वह एक मील की दूरी पर होगा।'' [5], (इस मील से अभिप्राय) चाहे सुरमे की सलाई हो या धरती की दूरी, सूरज एवं सृष्टि के सिरों के बीच की यह दूरी बहुत कम होगी। इसके बावजूद लोग उसकी गर्मी से नहीं जलेंगे, हालाँकि यदि सूरज अभी दुनिया में एक पोर के बराबर भी निकट आ जाए, तो दुनिया जल जाएगी। [5] सहीह मुस्लिम : किताबुल-जन्नह, बाब फ़ी स़िफ़ति यौमिल क़ियामति (क़यामत के दिन का वर्णन), हदीस संख्या : (2864), वर्णनकर्ता मिक़दाद बिन असवद रज़ियल्लाहु अन्हु।
ऐसे में कोई कहने वाला कह सकता है किः जब क़यामत के दिन सूरज सृष्टियों के सिरों से इतना निकट आ जाएगा, तो फिर लोग एक पल के लिए भी कैसे जीवित रहेंगे?!
तो इस हदीस के प्रति श्रेष्ठ आचरण क्या है?
इस हदीस के प्रति श्रेष्ठ आचरण यह है कि हम इसे स्वीकार करें, इसे सत्य मानें और हमारे मन में इससे सबंधित न कोई आपत्ति हो, न कोई तंगी हो और न ही कोई दुविधा हो, तथा हम यह जान लें कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस विषय में जो भी सूचना दी है, वह सत्य है।
परलोक की स्थितियों की तुलना संसार की स्थितियों से करना संभव नहीं है, क्योंकि इनके बीच एक विशाल अंतर मौजूद है। हम जानते हैं कि क़यामत के दिन लोग पचास हज़ार साल तक खड़े रहेंगे, ऐसे में दुनिया के मापदंड के अनुसार, क्या किसी व्यक्ति के लिए पचास हज़ार साल तक खड़े रहना संभव है?
उत्तर है : नहीं। इसलिए कि अंतर बहुत बड़ा है। अतः यदि ऐसा है, तो मोमिन इस प्रकार की सूचना को खुले दिल और संतुष्टि के साथ स्वीकार करता है, उसकी समझ इसके लिए विस्तृत हो जाती है और उसका दिल इसके लिए खुल जाता है।
2- अल्लाह के आदेशों को स्वीकार कर के ग्रहण करना, उन पर अमल करना और उन्हें लागू करना : अतः इन्सान अल्लाह के किसी भी आदेश को न ठुकराए। यदि वह अल्लाह के किसी आदेश को ठुकराता है, तो यह सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह के साथ बुरा व्यवहार है। चाहे वह उस आदेश का इन्कार करते हुए उसे ठुकराए, उस के अनुसार कर्म करने से अहंकार दिखाते हुए ठुकराए, अथवा अमल करने में लापरवाही दिखाते हुए ठुकराए, ये सब अल्लाह के साथ श्रेष्ठ आचरण के विपरीत हैं।
आइए, हम इसका एक उदाहरण देखें : रमज़ान के महीने में हम जो कठिन पुण्य कर्म करते हैं, उनमें बिना किसी संदेह के रोज़ा इन्सान के लिए एक कठिन कार्य है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने प्रिय खान-पान और शारीरिक संबंधों को छोड़ देता है, जो मनुष्य के लिए एक कठिन बात है। लेकिन सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह के साथ श्रेष्ठ आचरण रखने वाला मोमिन इस दायित्व को सहर्ष स्वीकार करता है, या अधिक सही शब्दों में कहें तो वह इस सम्मान को स्वीकार करता है। यह सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह की ओर से एक अनुग्रह है, जिसे वह हृदय की प्रसन्नता और मन की शांति के साथ स्वीकार करता है तथा उसका मन इसके लिए पूरी तरह तैयार रहता है।इसलिए आप उसे देखेंगे कि वह लंबे और भीषण गर्मी के दिनों में भी रोज़ा रखता है और इस से पूरी तरह संतुष्ट और प्रसन्नचित्त रहता है, क्योंकि वह अपने रब के साथ श्रेष्ठ आचरण (उत्तम व्यवहार) रखता है। किंतु (इसके विपरीत) अल्लाह के साथ बुरा व्यवहार रखने वाला व्यक्ति इस प्रकार की इबादत का सामना झल्लाहट एवं अप्रसन्नता के साथ करता है। और यदि उसे किसी ऐसे परिणाम का डर न हो जो उसके हित में न हो, तो वह रोज़े की पाबंदी ही न करे।
एक अन्य उदाहरणः नमाज़ का है। निस्संदेह यह कुछ लोगों पर भारी है। विशेष रूप से मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) पर भारी है, जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है : "मुनाफ़िक़ों पर सबसे भारी नमाज़ः इशा और फ़ज्र की नमाज़ है।" [6] [6] इसे बुखारी ने किताबुल अज़ान, अध्याय : बाब फ़ज़्लिल-इशा फ़िल-जमाअति (जमात में इशा की नमाज़ का महत्व), में, हदीस संख्या (657) के तहत, एवं मुस्लिम ने किताबुल मसाजिद, अध्याय : बाब फ़ज़्लि सलातिल-जमाअति (जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का महत्व), में, हदीस संख्या (651) के तहत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णन किया है।
लेकिन मोमिन के लिए नमाज़ भारी नहीं है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "तथा धैर्य और नमाज़ का सहारा लो, और निःसंदेह वह (नमाज़) निश्चय ही बहुत भारी है, परंतु अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण करने वालों पर (नहीं)। जो विश्वास रखते हैं कि निःसंदेह वे अपने पालनहार से मिलने वाले हैं और यह कि निःसंदेह वे उसी की ओर लौटने वाले हैं।" [सूरा अल बक़रा : 45-46]। अतः यह इन लोगों के लिए भारी नहीं, बल्कि बहुत ही आसान है। यही कारण है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : ''मेरी आँखों की ठंडक नमाज़ में रखी गई है।'' [7] [7] इसे इमाम अहमद (3/128) और नसई ने किताब 'इशरतुन्निसा', अध्याय 'हुब्बुन्निसा', में, हदीस संख्या : (3940) के तहत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
अतः नमाज़ के संदर्भ में अल्लाह के साथ श्रेष्ठ आचरण यह है कि आप इसे प्रसन्नचित्त, शांत और संतुष्ट मन से अदा करें तथा आपके नयन तृप्त हों। जब आप इसमें लीन हों तो आनंद का अनुभव करें तथा जब इसका समय निकट आए तो इसकी प्रतीक्षा करें। जब आप फज्र की नमाज़ पढ़ लें, तो ज़ुह्र की नमाज़ का उत्सुकता से इंतज़ार करें; ज़ुह्र के बाद अस्र की नमाज़ की चाह रखें; अस्र के बाद मग़्रिब की नमाज़ का शौक हो; मग़्रिब के बाद इशा की नमाज़ के लिए लालायित रहें; और इशा के बाद पुनः फज्र की नमाज़ के लिए उत्सुक रहें। इस प्रकार आपका दिल सदैव इन इबादतों से जुड़ा रहे, तो निःसंदेह यह अल्लाह तआला के साथ श्रेष्ठ आचरण का ही हिस्सा है।
तीसरा उदाहरण पारस्परिक व्यवहार (लेन-देन) से संबंधित : सूदी लेन-देन का हराम होना। अल्लाह ने क़ुरआन में हम पर सूदी लेन-देन को स्पष्ट रूप से हराम (वर्जित) क़रार दिया है, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "...अल्लाह ने व्यापार को हलाल किया है तथा ब्याज को हराम।..." तथा सूद ही के बारे में कहा है : "...फिर जिसके पास उसके पालनहार की ओर से कोई उपदेश आए, सो वह रुक जाए, तो जो पहले हो चुका, वह उसी का है और उसका मामला अल्लाह के हवाले है। और जो दोबारा ऐसा करे, तो वही आग वाले हैं, वे उसमें हमेशा रहने वाले हैं।" [सूरा अल बक़रा : 275]। अतः सदुपदेश आ जाने और हुक्म (विधान) जान लेने के बाद भी जो व्यक्ति सूदखोरी करे, उसे सदा जहन्नम में रहने की धमकी दी गई है -हम इस से अल्लाह की शरण चाहते हैं-।
अतः ईमान वाला व्यक्ति इस आदेश को प्रसन्नता, संतुष्टि और पूर्ण समर्पण के साथ स्वीकार करता है, जबकि ईमान न रखने वाला व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं करता और उसका मन इससे संतुष्ट नहीं होता तथा कभी-कभी वह विभिन्न प्रकार की चालें चलकर इससे बचने का प्रयास करता है; क्योंकि हम जानते हैं कि ब्याज में एक निश्चित कमाई है और इसमें किसी प्रकार का जोखिम नहीं है, किंतु वास्तव में यह एक व्यक्ति के लिए कमाई और दूसरे के लिए अत्याचार है। इसीलिए अल्लाह तआला ने फरमाया : "...और यदि तुम तौबा कर लो, तो तुम्हारे लिए तुम्हारे मूल धन हैं, न तुम अत्याचार करोगे और न तुम पर अत्याचार किया जाएगा।" [सूरा अल बक़रा : 279]।
अल्लाह के द्वारा निर्धारित भाग्यों को रज़ामंदी (संतोष) एवं धैर्य के साथ स्वीकार करना : अल्लाह के साथ श्रेष्ठ आचरण का यह तीसरा पहलू है। हम सभी जानते हैं कि सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह के द्वारा निर्धारित विधान जिसका वह अपनी सृष्टि के संबंध में प्रबंध करता है, वह सभी इंसानों के अनुकूल नहीं होते। तो क्या अल्लाह हमारे लिए जो कुछ भी भाग्य निर्धारित करता है, वह सदा हमारे अनुकूल होता है? अर्थात क्या हमारा मन सदैव उसकी ओर झुकाव रखता है और मानसिक रूप से उसके साथ ढल जाता है? वास्तविकता यह है कि ऐसा नहीं होता।
उदाहरण के लिए, रोग मनुष्य के अनुकूल नहीं होता, इसलिए कि मनुष्य स्वस्थ रहना पसंद करता है।
इसी प्रकार गरीबी मनुष्य के अनुकूल नहीं होती, क्योंकि मनुष्य धनी होना पसंद करता है। इसी प्रकार अज्ञानता मनुष्य के अनुकूल नहीं होती, क्योंकि मनुष्य ज्ञानी होना पसंद करता है। परंतु सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह की नियतियाँ (भाग्य) उसकी तत्वदर्शिता के अनुसार विभिन्न प्रकार की होती हैं, जिनमें से कुछ मनुष्य के अनुकूल होती हैं और वह अपनी प्रकृति के अनुसार उनसे सुख पाता है और उनमें से कुछ ऐसी नहीं होतीं। तो फिर सर्वशक्तिमान एवं महिमावान अल्लाह की नियतियों के प्रति उसके साथ श्रेष्ठ आचरण क्या है?
अल्लाह की तक़दीर (भाग्य) के प्रति उसके साथ श्रेष्ठ आचरण यह है कि अल्लाह ने आपके भाग्य में जो कुछ लिख दिया है, आप उस से प्रसन्न रहें, उसके प्रति मन को संतुष्ट रखें, और आप यह जानें कि पवित्र एवं सर्वोच्च (अल्लाह) ने जो भी फ़ैसला किया (विधान रचा) है, वह किसी न किसी तत्वदर्शिता एवं प्रशंसनीय उद्देश्य के लिए ही किया है, जिसके लिए वह स्तुति एवं कृतज्ञता का अधिकारी है।
इस तरह, अल्लाह की तक़दीर (फ़ैसलों) के प्रति उसके साथ श्रेष्ठ आचरण यह है कि इंसान संतुष्ट रहे, आत्मसमर्पण करे और इत्मीनान रखे। इसीलिए अल्लाह ने सब्र करने वालों (धैर्यवानों) की प्रशंसा करते हुए फ़रमाया है : "...और (ऐ नबी!) सब्र करने वालों को शुभ समाचार सुना दें। वे लोग कि जब उन पर कोई आपदा आ पड़े, तो कहते हैं : निःसंदेह हम अल्लाह के हैं और निःसंदेह हम उसी की ओर लौटने वाले हैं।" [सूरा अल बक़रा : 155-156]।
2- लोगों से व्यवहार में श्रेष्ठ आचरण अपनाना :
रही बात सृष्टि के साथ श्रेष्ठ आचरण की, तो कुछ विद्वानों ने, जिनमें हसन बसरी (रहिमहुल्लाह) भी सम्मिलित हैं, इसे इस प्रकार परिभाषित किया है : कफ़्फ़ुल-अज़ा (कष्ट देने से बचना), बज़्लुन-नदा (उदारतापूर्ण व्यवहार करना) और त़लाक़तुल-वज्ह (हँसकर मिलना)। [8] [8] इह्याउ उलूम अल-दीन (3/52-53)।
प्रथम: कफ़्फ़ुल-अज़ा (कष्ट देने से बचने) का अर्थ यह है कि: इन्सान दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बचे, चाहे यह कष्ट धन से संबंधित हो, जान से संबंधित हो या मान-सम्मान से संबंधित हो। अतः जो व्यक्ति सृष्टि को कष्ट पहुँचाने से नहीं रुकता, वह श्रेष्ठ आचरण वाला नहीं, बल्कि बुरे आचरण वाला है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी को कष्ट देने के हराम (वर्जित) होने की घोषणा, उस सबसे बड़ी सभा में की थी, जिसमें आप अपनी उम्मत (समुदाय) के साथ एकत्र हुए थे। आपने कहा था : "निःसंदेह तुम्हारा रक्त, तुम्हारे धन और तुम्हारा मान-सम्मान तुम पर उसी प्रकार हराम हैं, जैसा कि तुम्हारा आज का यह दिन, तुम्हारे इस महीने में और तुम्हारे इस नगर में हराम है।" [9] [9] इसे बुख़ारी ने किताब अल-हज्ज, बाब अल-ख़ुतबति अय्याम मिना, हदीस संख्या : (1741) के अंतर्गत तथा मुस्लिम ने किताब अल-क़सामह, बाब तग़्लीज़ि तहरीमि अद-दिमा, हदीस संख्या : (1679) के अंतर्गत अबू बकरह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णन किया है।
यदि कोई व्यक्ति लोगों का धन छीनकर उन पर अत्याचार करता है, या धोखाधड़ी करके उन पर अत्याचार करता है, अथवा विश्वासघात करके उन पर अत्याचार करता है, या मारपीट और अपराध करके उन पर अत्याचार करता है, अथवा गाली-गलौज और ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई) करके उन पर अत्याचार करता है, तो ऐसा व्यक्ति लोगों के साथ श्रेष्ठ आचरण वाला नहीं हो सकता; क्योंकि उसने उन्हें कष्ट देने से अपने आप को नहीं रोका। इसका पाप तब और बड़ा हो जाता है, जब यह ऐसे व्यक्ति के साथ किया जाए जिसका आप पर अधिक बड़ा अधिकार हो।
अतः उदाहरणस्वरूप माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार (बुरा आचरण) करना अन्य लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने से अधिक गंभीर (पाप) है, सगे-संबंधियों के साथ दुर्व्यवहार करना सगे-संबंधियों के अतिरिक्त अन्य लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने से अधिक गंभीर (पाप) है और पड़ोसियों के साथ दुर्व्यवहार करना, उन लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने से अधिक गंभीर (पाप) है जो तुम्हारे पड़ोसी नहीं हैं। इसीलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वह व्यक्ति मोमिन नहीं है।" लोगों ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! कौन ? आपने उत्तर दिया : "जिसका पड़ोसी उसके कष्ट से सुरक्षित नहीं रहता।" [10] [10] इसे इमाम बुख़ारी ने किताब अल-अदब, बाब इस्मि मन्-ला याअ्मनु जारहू बवाइक़हू (उस व्यक्ति का गुनाह जिसका पड़ोसी उसके कष्ट से सुरक्षित न हो), में, हदीस संख्या : (6016) के तहत अबू शुरैह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
द्वितीय: बज़्लुन-नदा (उदारतापूर्ण व्यवहार करना) का अर्थ : 'नदा' का अर्थ उदारता और दानशीलता है। अर्थात आपको उदारता और दानशीलता का परिचय देना चाहिए। तथा उदारता केवल धन ख़र्च करना नहीं है, जैसा कि कुछ लोग समझते हैं, बल्कि उदारता शारीरिक सेवा देना, पद-प्रतिष्ठा द्वारा लाभ पहुँचाना और धन ख़र्च करना है।
तो जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को देखें, जो लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करता हो, उनकी सहायता करता हो, उनके काम लेकर उन लोगों के पास जाता हो जिनके पास वे स्वयं नहीं जा सकते, लोगों के बीच अपने ज्ञान का प्रसार करता हो और लोगों पर अपना धन खर्च करता हो, तो हम उसे श्रेष्ठ आचरण वाला कहेंगे; क्योंकि उसने उदारता का प्रमाण दिया है। इसी को ध्यान में रखते हुए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “जहाँ कहीं भी रहो, अल्लाह से डरते रहो, बुरे कर्म के बाद अच्छे कर्म कर लिया करो, अच्छे कर्म बुरे कर्म को मिटा देंगे तथा लोगों के साथ उत्तम आचरण वाला व्यवहार करो।” [11] [11] इसे तिर्मिज़ी ने अब्वाबुल-बिर्रि वस्सिलह, बाब मा जाअ फ़ी मुआशरतिन्नास (लोगों के साथ मेल-जोल का बयान), हदीस संख्या: (1987) के अंतर्गत, अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के रूप में वर्णित किया है।
लोगों के साथ श्रेष्ठ आचरण का प्रदर्शन करने में यह भी शामिल है कि: जब आप पर अत्याचार या आपके साथ दुर्व्यवहार किया जाए, तो आप क्षमा कर दें और अनदेखा करें। अल्लाह ने क्षमा करने वालों की प्रशंसा की है। उसने जन्नत में प्रवेश पाने वालों के बारे में कहा है : "जो कठिनाई और आसानी की प्रत्येक स्थिति में (अल्लाह के मार्ग में) खर्च करते हैं, तथा क्रोध पी जाते हैं और लोगों को क्षमा कर देते हैं। और अल्लाह सदाचारियों से प्रेम करता है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 134]।
एक अन्य स्थान में फ़रमाया है : "...और यह (बात) कि तुम क्षमा कर दो तक़वा (परहेज़गारी) के अधिक निकट है..." [सूरा अल बक़रा : 237]।
एक और जगह कहा है : "...और उन्हें चाहिए कि क्षमा कर दें तथा जाने दें..." [सूरा अल नूर : 22]।
एक और जगह कहा है : "...फिर जो क्षमा कर दे तथा सुधार कर ले, तो उसका प्रतिफल अल्लाह के ऊपर है...।" [सूरा अल शूरा : 40]।
जो भी व्यक्ति लोगों के साथ मेल-जोल रखेगा, उसे लोगों की ओर से किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का सामना अवश्य करना पड़ेगा। अतः इस दुर्व्यवहार के प्रति उसकी नीति यह होनी चाहिए कि वह अनदेखा करे और क्षमा कर दे। उसे यह अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि उसके अनदेखा करने, क्षमा करने और भलाई के साथ जवाब देने के कारण, उसके और उसके भाई के बीच की शत्रुता घनिष्ठता और मित्रता में बदल जाएगी। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "भलाई और बुराई बराबर नहीं हो सकते। आप बुराई को ऐसे तरीक़े से दूर करें जो सर्वोत्तम हो। तो सहसा वह व्यक्ति जिसके और आपके बीच बैर है, ऐसा हो जाएगा मानो वह परम मित्र है।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 34]।
हे अरबी भाषा के ज्ञाताओं! ध्यान दीजिए कि कैसे इस आयत में परिणाम, आकस्मिकता सूचक शब्द (إِذَا, इज़ा) के साथ आया है, जो अपने परिणाम के तत्काल घटित होने का बोध कराता है। "...तो सहसा वह व्यक्ति जिसके और आपके बीच बैर है, ऐसा हो जाएगा मानो वह घनिष्ठ मित्र है।" किन्तु हर किसी को इसका सुयोग प्राप्त नहीं होता, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "और ये गुण उन्हीं लोगों को प्राप्त होता है, जो धैर्य से काम लेते हैं तथा यह उसी को प्राप्त होता है, जो बड़ा भाग्यशाली हो।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 35]।
लेकिन, क्या हम इससे यह समझें कि अपराधी को क्षमा करना पूर्ण रूप से प्रशंसनीय है और इसका आदेश दिया गया है? इस आयत से ऐसा समझा जा सकता है, परंतु यह ज्ञात होना चाहिए कि क्षमा करना केवल तभी प्रशंसनीय होता है, जब क्षमा करना अधिक उचित हो। इसके विपरीत यदि बदला लेना अधिक उचित हो, तो बदला लेना ही अधिक उत्तम है। इसीलिए अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "...फिर जो क्षमा कर दे तथा सुधार कर ले, तो उसका प्रतिफल अल्लाह के ऊपर है...।" [सूरा अल शूरा : 40]। यहाँ अल्लाह ने क्षमा को सुधार के साथ जोड़कर बयान किया है।
जबकि क्षमा कभी-कभी सुधार का कारण नहीं भी हो सकती है। संभव है कि जिस व्यक्ति ने आप पर अत्याचार किया है और आपके साथ दुःसाहस किया है, वह बुराई और उपद्रव के लिए जाना जाता हो। ऐसे में यदि आप उसे क्षमा कर देंगे, तो वह अपनी बुराई और उपद्रव में और अधिक निडर होकर आगे बढ़ेगा। इसलिए ऐसी स्थिति में उत्तम यही है कि उसके अपराध की सजा दी जाए; क्योंकि इसी में सुधार का पहलू है। शैखुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया रहिमहुल्लाह ने कहा है : "सुधार वाजिब (अनिवार्य) है और क्षमा मुस्तहब (निवार्य)। अतः यदि क्षमा करने के कारण सुधार का पहलू छूट जाए, तो इसका अर्थ यह है कि हमने वाजिब पर मुस्तहब को वरीयता दी है, जबकि शरीअत इसकी अनुमति नहीं देती।" उन्होंने सही कहा है, उन पर अल्लाह की कृपा हो!
इस अवसर पर मैं एक ऐसे कार्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, जिसे बहुत-से लोग परोपकार के इरादे से करते हैं। वह कार्य यह है कि किसी व्यक्ति से कोई दुर्घटना हो जाती है, जिसके कारण किसी दूसरे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। फिर मृतक के उत्तराधिकारी आकर उस दुर्घटना को अंजाम देने वाले दोषी से 'दियत' माफ़ कर देते हैं। तो क्या उनका दियत माफ़ कर देना सराहनीय है और इसे श्रेष्ठ आचरण का हिस्सा माना जाएगा या फिर इसमें विस्तार है?
उत्तर यह है कि इसमें विस्तार है। वास्तव में उस दोषी की स्थिति पर चिंतन एवं विचार करना आवश्यक है, जिससे यह दुर्घटना घटी है। क्या वह उन लोगों में से है जो अपनी जल्दबाज़ी (अधीरता) और लापरवाही के लिए विख्यात हैं? क्या वह इस प्रकार का व्यक्ति है, जिसे कोई परवाह नहीं -हम इस से अल्लाह की शरण चाहते हैं- कि वह किसी व्यक्ति को टक्कर मार दे, क्योंकि वह उसकी दियत अदा करने में सक्षम है? या फिर वह ऐसा व्यक्ति है जिससे पूर्ण सावधानी और पूर्ण संतुलन के बावजूद यह दुर्घटना हो गई, क्योंकि अल्लाह ने हर चीज़ की तक़दीर (नियति) लिख रखी है?
यदि वह दूसरी श्रेणी का है, तो उसके संबंध में क्षमा कर देना अधिक उचित है। परन्तु क्षमा करने से पहले, दूसरी श्रेणी में भी, यह देखना अनिवार्य है कि क्या मृतक पर कोई कर्ज़ है? यदि मृतक पर कोई कर्ज़ है और दियत के अतिरिक्त उसे अदा करने का कोई अन्य साधन नहीं है, तो हम क्षमा नहीं कर सकते; क्योंकि कर्ज़ को विरासत (उत्तराधिकार) पर वरीयता प्राप्त है। यदि हम माफ़ कर भी दें, तो हमारी यह माफ़ी मान्य नहीं होगी। यह एक ऐसा मसला (विषय) है जिससे संभवतः बहुत-से लोग अनभिज्ञ हैं। हम यह बात इसलिए कह रहे हैं; क्योंकि उत्तराधिकारियों को इस दियत का हक़ उस मृतक से प्राप्त होता है जो दुर्घटना में हताहत हुआ है, और उनका यह हक़ कर्ज़ अदा करने के बाद ही सिद्ध होता है; इसीलिए जब अल्लाह ने विरासत का उल्लेख किया, तो फ़रमाया : "...उस (मृतक) की वसीयत का निष्पादन करने, या उसका क़र्ज़ चुकाने के बाद..." [सूरा अल निसा : 11]।
निष्कर्ष यह है कि श्रेष्ठ आचरण में : लोगों को क्षमा करना भी सम्मिलित है, और यह बज़्लुन-नदा (उदारता दिखाने) के अंतर्गत आता है; क्योंकि उदारता दिखाना या तो कुछ देना है या कुछ छोड़ना, और क्षमा करना कुछ छोड़ने के अंतर्गत आता है।
तृतीय : त़लाक़तुल-वज्ह (हँसकर मिलना) : वह इस प्रकार कि मनुष्य का मुख खिला हुआ हो। इसके विपरीत है चेहरे पर चिड़चिड़ापन रखना। इसीलिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "किसी भी नेकी के काम को कदापि तुच्छ न समझो, चाहे इतना ही क्यों न हो कि तुम अपने भाई से मुस्कुराते हुए मिलो।" [12] [12] इसे मुस्लिम ने किताब अल-बिर्र वस-सिला, बाब इस्तिहबाब तलाक़त अल-वज्ह इन्द अल-लिक़ा, हदीस संख्या (2626) में अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
हंसमुख चहरा आपसे मिलने और आपकी ओर आने वाले व्यक्ति को प्रसन्न कर देता है। इससे प्रेम और स्नेह पैदा होता है तथा यह आपके और आपसे मिलने वाले व्यक्ति के हृदय में प्रफुल्लता उत्पन्न करता है। परख कर देख लें, आप यही पाएँगे।
किंतु यदि आप त्योरी चढ़ाए हुए रहते हैं, तो लोग आपसे दूर रहेंगे और आपके पास बैठने तथा आपसे बातचीत करने में उनका चित्त प्रफुल्लित नहीं होगा एवं हो सकता है कि आप रक्तचाप नामी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाएँ; क्योंकि चित्त का प्रफुल्लित रहना एवं प्रसन्नमुख होना इस बीमारी को रोकने वाली सबसे सफल औषधियों में से एक हैं। इसीलिए चिकित्सक इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति को यह परामर्श देते हैं कि वह उत्तेजित तथा क्रोधित करने वाली प्रत्येक वस्तु से दूर रहे क्योंकि इससे बीमारी बढ़ जाती है। अतः प्रसन्नमुख रहना इस रोग को समाप्त कर देता है क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य का हृदय प्रफुल्लित रहता है और वह लोगों का प्रिय बन जाता है।
यही वो तीन मौलिक चीज़ें हैं, जो लोगों के साथ व्यवहार में श्रेष्ठ आचरण की आधारशिला हैं।
सृष्टि के साथ अच्छे आचरण में : दोस्तों, संबंधियों और परिवार वालों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी शामिल है। न उनसे तंग आए और न उनको तंग करे, बल्कि अल्लाह की शरीअत की सीमाओं के भीतर रहकर जहाँ तक संभव हो, उन्हें प्रसन्नता प्रदान करे। अल्लाह की सीमाओं के दायरे में रहने की शर्त अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि कुछ लोग अल्लाह की अवज्ञा करने से ही प्रसन्न होते हैं -हम ऐसा करने से अल्लाह की शरण चाहते हैं-, अतः हम ऐसी बात में उनका साथ नहीं देंगे। लेकिन, शरीअत की सीमाओं में रहते हुए अपने परिवार के लोगों, मित्रों और रिश्तेदारों को प्रसन्नता प्रदान करना अच्छे आचरण का हिस्सा है। इसी कारणवश नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तुम में सबसे उत्तम व्यक्ति वह है, जो अपने परिवार के लिए उत्तम है और मैं अपने परिवार के लिए तुममें सबसे उत्तम हूँ।" [13] [13] इसे तिरमिज़ी ने किताब 'अल-मनाक़िब', बाब 'फ़ी फ़ज़्लि अज़्वाजिन-नबिय्यि सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम', में, हदीस संख्या : (3895) के तहत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से, और इब्न-ए-माजा ने किताब 'अन्निकाह', बाब 'हुस्नि मुआशरतिन्निसा' में, हदीस संख्या : (1977) के तहत इब्न-ए-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है।
अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ता है कि बहुत से लोग बाहर के लोगों के साथ तो अच्छा व्यवहार करते हैं, लेकिन अपने परिवार के साथ उनका व्यवहार अच्छा नहीं होता। यह एक भारी भूल और तथ्यों को उलटने जैसी बात है। भला यह कैसे हो सकता है कि आप दूर के लोगों के साथ तो उत्तम आचरण का प्रदर्शन करें और अपनों के साथ दुर्व्यवहार करें?! कोई व्यक्ति कह सकता है कि : 'चूँकि अपनों के बीच किसी प्रकार का औपचारिक संकोच नहीं होता, इसलिए मैं उनके साथ ऐसा व्यवहार कर लेता हूँ।' तो हम कहेंगे : यह कदापि उचित नहीं है! रिश्तेदार और घरवाले ही इस बात के सर्वाधिक अधिकारी हैं कि आप उनके साथ सबसे अच्छा आचरण और बर्ताव रखें। इसीलिए एक आदमी ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे अच्छे व्यवहार का सर्वाधिक अधिकारी कौन है? आपने फ़रमाया: "तेरी माँ।" उसने कहा: फिर कौन? फ़रमाया: "तेरी माँ।" उसने कहा: फिर कौन? फ़रमाया: "तेरी माँ।" उसने कहा: फिर कौन? फ़रमाया: "तेरा बाप।" [14] [14] इसे बुख़ारी ने किताबुल अदब, बाब मन अह़क़्क़ुन-नासि बिह़ुस्निस्सुह़्बति (अध्याय : 'लोगों में अच्छे व्यवहार का सबसे अधिक हक़दार कौन है') में, हदीस संख्या (5971) के तहत तथा मुस्लिम ने किताबुल बिर्र वस-सिलह वल-आदाब, बाब बिर्रिल-वालिदैनि व अन्नहुमाअह़क़्क़ु बिहि (अध्याय : 'माता-पिता के साथ भलाई करना और वे इसके सबसे अधिक योग्य हैं' में, हदीस संख्या (2548) के तहत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
जबकि कुछ लोगों का मामला इसके विपरीत है। आप पाएँगे कि वह अपनी माँ के साथ दुर्व्यवहार करते हैं और अपनी पत्नी के साथ उत्तम व्यवहार करते हैं। इस प्रकार वह अपनी पत्नी के साथ अच्छे व्यवहार को अपनी माँ के साथ सद्व्यवहार करने पर प्राथमिकता देता है।
निष्कर्ष यह है कि : घरवालों, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करना, यह सब अच्छे आचरण का हिस्सा है।
हमें इन ग्रीष्मकालीन केंद्रों में युवाओं की उपस्थिति का लाभ उठाते हुए उन्हें उत्तम आचरण का अभ्यास कराना चाहिए; ताकि ये केंद्र शिक्षा एवं प्रशिक्षण के केंद्र बन सकें; क्योंकि प्रशिक्षण के बिना ज्ञान कभी-कभी अपने लाभ की अपेक्षा अधिक हानिकारक हो सकता है, जबकि प्रशिक्षण के साथ ज्ञान अपने वांछित परिणाम तक पहुँचाने वाला होता है। इसी कारणवश अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "किसी मनुष्य का यह अधिकार नहीं कि अल्लाह उसे पुस्तक, निर्णय शक्ति तथा पैग़ंबरी (दूतत्व) प्रदान करे, फिर वह लोगों से कहे कि अल्लाह को छोड़ कर मेरे बंदे बन जाओ, बल्कि (वह तो यही कहेगा कि) तुम रब वाले बनो, इसलिए कि तुम पुस्तक की शिक्षा दिया करते थे और इसलिए कि तुम पढ़ा करते थे।" [सूरा आल-ए-इमरान : 79]।
ज्ञान का यही लाभ है कि इन्सान रब्बानी बने, अर्थात वह अल्लाह की शरीअत के अनुसार अल्लाह के बंदों को प्रशिक्षण देने वाला बने। अतः ये वे केंद्र हैं जिनके प्रबंधकों से हम यह आशा करते हैं कि वे इन्हें सदाचारों में प्रतिस्पर्धा का मैदान बनाएँ। तथा उन्हीं सदाचारों में से एक है उत्तम आचरण।
हम पहले उल्लेख कर चुके हैं कि उत्तम आचरण स्वाभाविक रूप से भी होता है तथा अभ्यास के द्वारा भी अपनाया जाता है, तथा स्वाभाविक रूप से प्राप्त उत्तम आचरण अभ्यास के द्वारा अपनाए गए उत्तम आचरण की अपेक्षा अधिक पूर्ण होता है। हमने इसके लिए प्रमाण भी प्रस्तुत किया है, जो अशज्ज अब्दुल क़ैस से कहा गया अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है : "बल्कि अल्लाह ने तुम्हें इसी आचरण के साथ पैदा किया है।" [15] [15] इसे अबू दावूद ने ''किताब अल-अदब'', ''बाब फ़ी क़ुब्लतिर-रिज्ल'' में, हदीस संख्या : (5225) के अंतर्गत ज़ारिअ रज़ियल्लाहु अन्हु से, जो अब्दुल क़ैस के प्रतिनिधि मंडल में शामिल थे, तथा तिर्मिज़ी ने ''अबवाब अल-बिर्र वल-सिलह'', ''बाब मा जाअ फ़ी अल-अनात व अल-अ'ज'लति'' में, हदीस संख्या : (2011) के अंतर्गत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है।
तथा इसलिए कि जन्मजात अच्छा आचरण इन्सान के व्यक्तित्व से कभी अलग नहीं होता, जबकि प्रयास से अपनाया गया अच्छा आचरण कई परिस्थियों में इन्सान का साथ छोड़ देता है; क्योंकि इसके लिए निरंतर अभ्यास और कड़े प्रयास की आवश्यकता होती है तथा इन्सान को उकसाने वाली किसी चीज़ के सामने आने पर उसका ध्यान रखने की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे वसीयत कीजिए, तो आपने फ़रमाया : "क्रोध मत किया करो।" उसने कई बार अपनी बात दोहराई और आपने हर बार यही कहा कि "क्रोध मत किया करो।"[16] तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमने फ़रमाया है : "बलवान वह नहीं है, जो किसी को पछाड़ दे, बलवान तो वह है, जो क्रोध के समय अपने आप को नियंत्रण में रखे।"[17] [16] इसे बुख़ारी ने 'किताबुल अदब', 'बाब अल-ह़ज़र मिनल-ग़ज़ब (अध्याय : क्रोध से सावधान रहना)' में, संख्या (6116) के अंतर्गत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। [17] इसे बुख़ारी ने 'किताबुल अदब', 'बाब अल-ह़ज़र मिनल-ग़ज़ब (अध्याय : क्रोध से सावधान रहना)' में, हदीस संख्या (6114) के अंतर्गत, तथा मुस्लिम ने 'किताबुल बिर्र वस-सिलह वल-आदाब', 'बाब फ़ज़्ल मन् यमलिकु नफ़्सहु इंदल-ग़ज़ब (अध्याय : क्रोध के समय स्वयं को वश में रखने वाले की फ़ज़ीलत)' में, हदीस संख्या (2609) के अंतर्गत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के रूप में वर्णित किया है।
अरबी भाषा के शब्द : “الصُّرَعَةُ” (अस्सुरअ़तु) का अर्थ है: वह जो लोगों को पछाड़ देता हो। “الْهُمْزَةُ” (अल-हुमज़ह) और “اللُّمَزَةُ” (अल-लुमज़ह) की तरह। “الْهُمْزَةُ” वह है जो लोगों की बुराई करता हो और “اللُّمَزَةُ” वह है जो लोगों में अवगुण निकालकर उनकी निंदा करता हो। हदीस का अर्थ यह है कि बलवान वह नहीं है, जो लोगों को पछाड़ दे और उन्हें पराजित कर दे। "बलवान तो वह है, जो क्रोध के समय अपने आप को नियंत्रण में रखे।" [18] अतः जो स्वयं को पछाड़ दे और क्रोध के समय अपने आप को नियंत्रण में रखे, वास्तव में वही बलवान है। क्रोध के समय मनुष्य का अपने आप को नियंत्रण में रखना उत्तम आचरण का भाग माना जाता है। [18] इसे बुख़ारी ने 'किताबुल अदब', 'बाब अल-ह़ज़र मिनल-ग़ज़ब' में, हदीस संख्या (6114) के अंतर्गत, तथा मुस्लिम ने 'किताबुल बिर्र वस-सिलह वल-आदाब', 'बाब फ़ज़्ल मन् यमलिकु नफ़्सहु इंदल-ग़ज़ब' में, हदीस संख्या (2609) के अंतर्गत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के रूप में वर्णित किया है।
अतः यदि आपको क्रोध आए, तो क्रोध के वशीभूत होकर कोई कार्य न करें, बल्कि धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगें। और यदि आप खड़े हैं, तो बैठ जाएँ, और यदि आप बैठे हैं, तो लेट जाएँ। और यदि आपका ग़ुस्सा बढ़ जाए, तो वुज़ू कर लें, इससे आपका ग़ुस्सा दूर हो जाएगा।
निष्कर्ष यह है कि : जन्मजात अच्छा आचरण, प्रयास के द्वारा अपनाए गए अच्छे आचरण से उत्तम है; क्योंकि यह इन्सान का प्राकृतिक स्वभाव होता है और हर स्थिति में उसकी शोभा बढ़ाता रहता है, जबकि प्रयास के द्वारा अपनाया गया आचरण कुछ स्थितियों में इन्सान का साथ छोड़ सकता है।
और इसी प्रकार हम कहते हैं कि : अच्छा आचरण अर्जित भी किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि इन्सान अपने आपको अभ्यस्त बनाए। इन्सान कुछ उपायों के द्वारा अच्छे आचरण वाला बन सकता है। जैसे :
प्रथम : वह अल्लाह की किताब और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत में देखे; वह उन उद्धरणों पर विचार करे जो उस महान आचरण की प्रशंसा करते हैं। क्योंकि मोमिन जब ऐसे उद्धरणों को देखता है, जो किसी आचरण या कर्म की प्रशंसा करते हैं, तो वह उस पर अमल करने लगता है।
द्वितीय : वह ऐसे लोगों की संगति अपनाए जो अच्छे चरित्र के लिए जाने जाते हों। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने इस फ़रमान में इसी की ओर इशारा किया है : "अच्छे और बुरे साथी का उदाहरण ऐसे है, जैसे कस्तूरी वाला और आग की भट्टी धौंकने वाला। कस्तूरी वाला या तो तुझे भेंट में सुगंध देगा, या तू उससे खरीद लेगा या तू उसकी सुगंध पाएगा। जबकि आग की भट्टी धौंकने वाला या तो तेरे कपड़े जला देगा या तू उसकी दुर्गंध पाएगा।" [19] [19] इसे बुख़ारी ने, किताब अल-ज़बाइह वल-सैद, बाब अल-मिस्क, हदीस संख्या (5534) तथा मुस्लिम ने, किताब अल-बिर्र वल-सिलह, बाब इस्तिहबाब मुजालसत अल-सालिहीन, हदीस संख्या (2628) के अंतर्गत अबू मूसा अल-अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के रूप में रिवायत किया है।
अतः सभी युवाओं को चाहिए कि वे उन लोगों की संगति अपनाएँ जो अच्छे नैतिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध हों, तथा बुरे चरित्र और तुच्छ कर्मों से दूर रहें; ताकि इस संगति को एक ऐसी पाठशाला के रूप में ग्रहण कर सकें जिससे उन्हें उत्तम चरित्र अपनाने में सहायता मिले।
तृतीय : मनुष्य को इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसके बुरे आचरण का क्या परिणाम होता है; क्योंकि बुरे आचरण वाला घृणित होता है, बुरे आचरण वाला परित्यक्त होता है, और बुरे आचरण वाले का उल्लेख बुरे विशेषणों के साथ किया जाता है। अतः जब मनुष्य यह जान लेता है कि बुरा आचरण उसे इस स्थिति तक पहुँचाता है, तो वह उससे दूर हो जाता है।
*
उत्तम आदर्श (नबी) सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
हमारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सबसे उत्तम चरित्र वाले हैं; क्योंकि अल्लाह तआला ने उनके बारे में फ़रमाया है : "तथा निःसंदेह निश्चय आप एक महान चरित्र के मालिक हैं।" [सूरा अल क़लम : 4], रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग में होने वाली घटनाएँ और प्रसंग आपके उत्तम चरित्र को दर्शाते हैं, बल्कि बच्चों के साथ भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उत्तम चरित्र का प्रदर्शन करते थे। आप उनके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते और खेलते थे। आप एक बच्चे से कहा करते थे : ''हे अबू उमैर! नुग़ैर का क्या हुआ?''[20], अबू उमैर एक छोटे बच्चे की कुन्यत (उपनाम) थी, और उसके पास एक 'नुग़ैर' अर्थात गौरैया जैसी एक छोटी-सी चिड़िया थी। नुग़ैर मर गया, तो बच्चा दुखी और उदास हो गया। इसलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उससे स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हुए फ़रमाते : "हे अबू उमैर! ! नुग़ैर ने क्या किया?" [20] इसे बुख़ारी ने 'किताबुल अदब', 'बाब अल-इम्बिसात इला अन-नासि (अध्याय : लोगों के साथ प्रसन्नतापूर्वक मिलना)' में, हदीस संख्या (6129) के अंतर्गत, तथा मुस्लिम ने 'किताबुल आदाब', 'बाब इस्तिहबाब तह़नीक अल-मौलूद इन्द अल-विलादति (अध्याय : जन्म के समय नवजात शिशु की तहनीक का मुस्तहब होना)' में, हदीस संख्या (2150) के अंतर्गत, अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
तथा एक देहाती आया और मस्जिद में पेशाब करने लगा, तो लोगों ने उसे डाँटा और कड़ाई से झिड़का, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें रोका। फिर जब वह पेशाब कर चुका, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक बालटी पानी लाने का आदेश दिया और उसे पेशाब पर बहा दिया गया। फिर आपने उस देहाती को बुलाया और उससे फ़रमाया : "निश्चय ही, इन मस्जिदों में गंदगी या अपवित्रता जैसी कोई भी चीज़ उचित नहीं है, बल्कि ये तो नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत (पाठ) के लिए हैं।” [21] अथवा इसी तरह की बात आपने कही थी। [21] इसे बुखारी ने 'किताबुल वुज़ू', 'बाब सब्ब अल-माअ अला अल-बौल (अध्याय : पेशाब पर पानी डालना)' में, हदीस संख्या (221) के अंतर्गत, एवं मुस्लिम ने 'किताब अत-तहारह', 'बाब वुजूब ग़स्ल अल-बौल (अध्याय : पेशाब धोने की अनिवार्यता)' में, हदीस संख्या (285) के अंतर्गत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस के रूप में रिवायत किया है।
इस घटना में सदव्यवहार का पहलू स्पष्ट है। आपने उस बद्दू को न तो डाँटा और न पीटने का आदेश दिया। अपितु आपने उसे छोड़ दिया, यहाँ तक कि जब उसने अपना पेशाब (करने का कार्य) पूरा कर लिया, तो उसे बताया कि मस्जिदें उस काम के लिए उपयुक्त नहीं हैं जो उसने किया है, बल्कि ये नमाज़, ज़िक्र और क़ुरआन पढ़ने के लिए हैं।
इसी तरह एक बार रमज़ान में एक व्यक्ति आपके पास आया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल! मैं तबाह हो गया!! तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे फरमाया : "तुम्हें किस चीज़ ने तबाह कर दिया?" उसने कहा : मैं ने रमज़ान में रोज़े की स्थिति में अपनी पत्नी के साथ सहवास कर लिया है। उसकी बात सुनकर आपने उसे न तो डांटा और न ही झिड़का, बल्कि उससे कहा : "क्या तुम्हारे पास किसी दास को स्वतंत्र करने का सामर्थ्य है?" उसने कहा : नहीं। आपने कहा : "क्या तुम लगातार दो महीने तक रोज़े रख सकते हो?" उसने कहा : नहीं। आपने कहा : "क्या तुम्हारे पास साठ निर्धनों को खाना खिलाने का सामर्थ्य है? उसने कहा : नहीं। फिर वह बैठ गया, तभी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास खजूरों से भरा एक टोकरा लाया गया, तो आपने वह टोकरा उसे दे दिया और उससे कहा : "इसे दान कर दो", यह सुन उसने कहा : क्या हमसे भी अधिक किसी गरीब को?! इन दो पथरीले मैदानों के बीच हमसे अधिक ज़रूरतमंद (अभावग्रस्त) कोई नहीं है। यह सुनकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हँस पड़े यहाँ तक कि आपके दाँत दिखाई देने लगे, फिर आपने कहा : "जाओ और इसे अपने परिवार को खिला दो।" [22] [22] इस हदीस को बुख़ारी ने किताब अल-सौम, 'बाब इज़ा जा'म'अ फ़ी रमज़ान व लम यकुन् लहु शैउन फ़तुसुद्दिक़ा अलैहि फ़ल्युकफ़्फ़िर' में, हदीस संख्या (1936) के अंतर्गत, और मुस्लिम ने किताब अल-सियाम, बाब तग़्लीज़ि तहरीमि अल-जिमाइ फ़ी नहारि रमज़ान अलस्साइम' में, हदीस संख्या (1111) के अंतर्गत, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत किया है।
इस घटना में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदर्श आचरण बिलकुल स्पष्ट है, क्योंकि आपने इस व्यक्ति को न झिड़का, न बुरा-भला कहा और न डाँटा-फटकारा। यह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहनशीलता और बुद्धिमत्ता के कारण था। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने देखा कि यह व्यक्ति लज्जित हो कर, तौबा करने वाला और डरा हुआ आया है, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यही महसूस किया कि वह डाँट-फटकार का पात्र नहीं है, बल्कि उसे सत्य बात स्पष्ट रूप से बता दी जाए और उसके साथ कोमलता का व्यवहार किया जाए।
प्रश्न : बहुत-से लोगों का यह कहना है कि पश्चिमी देशों के लोग अपने लेन-देन और क्रय-विक्रय में अधिक अच्छे आचरण वाले हैं, जबकि हम मुसलमानों के बीच धोखाधड़ी, झूठ और झूठी क़सम खाकर सामान बेचने जैसी चीज़ें देखने को मिलती हैं, तो इसका क्या कारण है? और क्या उनके आचरण के निर्माण में उनकी औद्योगिक सभ्यता का बड़ा प्रभाव है?
उत्तर : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यदि लोगों को उनके दावों के आधार पर दे दिया जाए तो कुछ लोग, लोगों की जान और माल का दावा करने लगें। लेकिन, दावा करने वाले के लिए प्रमाण देना आवश्यक है।" [23] लोगों के बीच प्रसिद्ध यह बात कि पश्चिमी देशों के लोग व्यवहार में अच्छे होते हैं, सही नहीं है। उनके यहाँ बुरे व्यवहार के ऐसे अनेक रूप हैं, जिन्हें वही व्यक्ति जान सकता है जो वहाँ गया हो और जिसने उन्हें न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से देखा हो। वह व्यक्ति नहीं, जिसने उन्हें आदर और महानता की दृष्टि से देखा हो। किसी कवि ने कहा है : संतोष की दृष्टि किसी भी दोष को देखने में असमर्थ होती है *** जिस प्रकार असंतोष की दृष्टि बुराइयों को ही उजागर करती है। [24] [24] देखिए : जाहिज़ की पुस्तक अल-हैवान (3/226), ऊयून अल-अख़बार (3/16) तथा अल-इक्द अल-फ़रीद (2/194)। [23] इसे बुख़ारी ने किताब तफ़सीर अल-क़ुरआन, अध्याय : {إِنَّ ٱلَّذِينَ يَشۡتَرُونَ بِعَهۡدِ ٱللَّهِ وَأَيۡمَٰنِهِمۡ ثَمَنٗا قَلِيلًا أُوْلَٰٓئِكَ لَا خَلَٰقَ لَهُمۡ} (अर्थात्ः निःसंदेह जो लोग अल्लाह के वचन तथा अपनी क़समों के बदले तनिक मूल्य प्राप्त करते हैं, उनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं है) [आल-ए-इमरान : 77] में, हदीस संख्या (4552) के अंतर्गत, तथा मुस्लिम ने किताबुल-अक़ज़ियति, अध्याय : 'बाब अल-यमीनु अला अल-मुद्दआ अलैहि (प्रतिवादी पर क़सम)' में, हदीस संख्या (1711) के अंतर्गत, इब्न-ए-अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत किया है।
और मुझे पश्चिम जाने वाले बहुत से युवाओं ने अत्यंत निकृष्ट आचरण वाले कृत्यों के बारे में बताया है। लेकिन क्रय-विक्रय में वे जो ईमानदारी से काम लते हैं, तो यह इसलिए नहीं है कि वे उच्च नैतिक आचरण वाले लोग हैं, बल्कि इसलिए कि वे भौतिकता के दास हैं। और मनुष्य इन मामलों के लेन-देन में जितना अधिक ईमानदार होता है, लोग उसकी ओर उतने ही अधिक आकर्षित होते हैं, तथा उसकी सामग्री को खरीदने और उसका प्रचार करने में उतनी ही अधिक तत्परता दिखाते हैं।
अतः वे ऐसा इसलिए नहीं करते कि वे सर्वोत्तम आचरण वाले हैं, बल्कि इसलिए करते हैं कि वे भौतिकवादी हैं। वे अपने धन को बढ़ाने का सबसे बड़ा विज्ञापन यही मानते हैं कि लोगों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए; ताकि उनका व्यवसाय चमक सके। अन्यथा, वे बिल्कुल वैसे ही हैं जैसा कि उच्च एवं महान अल्लाह ने उनका वर्णन करते हुए फ़रमाया है : "निःसंदेह किताब वालों और मुश्रिकों में से जो लोग काफ़िर हो गए, वे सदा जहन्नम की आग में रहने वाले हैं, वही लोग सबसे बुरे प्राणी हैं।" [सूरा अल बय्यिना : 6], मुझे नहीं लगता कि काफिरों (सत्य का इंकार करने वालों) का वर्णन सर्वशक्तिमान व महिमावान अल्लाह के वर्णन से अधिक सच्चा कोई कर सकता है कि वे तो सृष्टि में सबसे बुरे लोग हैं। और जिन लोगों का वर्णन अल्लाह ने 'सृष्टि में सबसे बुरे' के रूप में किया हो, उनसे अपने आप में किसी भलाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मेरा मानना है कि ऐसा कभी नहीं हो सकता। लेकिन लेन-देन के मामले में उनके अंदर जो सच, स्पष्टता और ईमानदारी देखने को मिलती है, वह उनके यहाँ किसी और उद्देश्य के लिए होती है, वह है : ख्याति और लाभ प्राप्त करना। अन्यथा, जिसने कई मौकों पर उनका अत्याचार, अन्याय और लोगों पर उनका धौंस जमाना देखा है, वह अल्लाह तआला के इस फ़रमान की सच्चाई को भली-भांति जान लेता है : "...वही लोग सबसे बुरे प्राणी हैं।"
जहाँ तक बहुत-से मुसलमानों द्वारा लेन-देन के मामले में की जाने वाली धोखाधड़ी, झूठ एवं विश्वासघात का सवाल है, तो इन मुसलमानों के इस्लाम और ईमान में उसी अनुपात में कमी आई है, जिस अनुपात में ये लोग इन मामलों में इस्लामिक नियमों का उल्लंघन करते हैं।
अतः कुछ मुसलमानों के अपने मामलात में इस्लानी नियमों के उल्लंघन और शरीअत के दायरे से बाहर निकल जाने का यह अर्थ नहीं है कि शरीअत में कोई कमी है। क्योंकि शरीअत पूर्ण है और ये वे लोग हैं जिन्होंने सबसे पहले स्वयं अपने साथ बुरा किया है, तत्पश्चात इस्लामी शरीअतों के साथ, फिर अपने मुसलमान भाइयों के साथ, और फिर उन गैर-मुस्लिमों के साथ जिनके साथ वे व्यवहार करते हैं। वास्तव में इन लोगों ने केवल स्वयं अपने साथ बुरा किया है। एक समझदार व्यक्ति किसी आचरण करने वाले की बुराई को उस शरीअत (धर्म-विधान) का दोष नहीं ठहराता, जिसका वह अनुयायी है।
अतः सभी मुसलमानों से मेरा अनुरोध है कि वे झूठ, विश्वासघात, धोखा-धड़ी, छल-कपट और इस प्रकार की अन्य सभी अवगुणों के विरुद्ध एक सशक्त अभियान चलाएँ, जिन्हें इस्लाम स्वीकार नहीं करता।
मसला (प्रश्न) : एक व्यक्ति है, जिसका दीन अपूर्ण है लेकिन आचरण अच्छा है, जबकि दूसरा व्यक्ति है, जो शरीअत का पालन करने में संपूर्णता के निकट है लेकिन उसका आचरण बुरा है, दोनों में से कौन बेहतर है? और इसका आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस फ़रमान से क्या संबंध है : "अच्छे आचरण ने लोक एवं परलोक की भलाई प्राप्त कर ली।” [25], तथा जो आपने उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा के एक प्रश्न के उत्तर में कहा था? [25] इसे अब्द बिन हुमैद ने अपनी मुसनद (1210) में, खराइती ने 'मकारिमुल अख़लाक़' (50) में, और तबरानी ने 'अल-कबीर' (23/223) में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तम आचरण दीन की पूर्णता का अंग है, जैसा कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक सहीह हदीस में है : "सबसे संपूर्ण ईमान वाला मोमिन वह है, जो उनमें सबसे अच्छे आचरण का मालिक हो।" [26] [26] इसे अबू दावूद ने किताब अस-सुन्नत, 'बाब अद-दलील अला ज़ियादति अल-ईमान व नुक़्स़ानिहि (अध्याय : ईमान के बढ़ने और घटने का प्रमाण)', हदीस संख्या : (4682), तथा तिरमिज़ी ने किताब अर-रज़ाअ, 'बाब मा जाअ फ़ी ह़क़्क़िल-मर्अति अला ज़ौजिहा (अध्याय : 'पति पर पत्नी के अधिकार के संबंध में)', हदीस संख्या : (1162) के अंतर्गत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णन किया है।
इस आधार पर, जिसका आचरण अपूर्ण है, उसका धर्म भी अपूर्ण है; क्योंकि धर्म की पूर्णता आचरण की पूर्णता से (संबंधित) है। और जैसा कि हमने उल्लेख किया है कि अच्छा आचरण सृष्टिकर्ता और सृष्टि के साथ व्यवहार में परिलक्षित होता है, तो इससे यह स्पष्ट होता है कि आचरण की पूर्णता धर्म की पूर्णता से होती है। इसी आधार पर, पूर्ण आचरण वाले व्यक्ति का दूसरों को इस्लाम और धर्म की ओर लाने में प्रभाव, बुरे आचरण वाले धार्मिक व्यक्ति के प्रभाव की तुलना में, अधिक होता है। अतः यदि उपासना (इबादत) में दृढ़ किसी व्यक्ति को अच्छा आचरण अपनाने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए, तो वह अवस्था अधिक पूर्ण है। जहाँ तक ऐसे व्यक्ति की तुलना का प्रश्न है जो अपनी व्यक्तिगत उपासना में तो दृढ़ है, लेकिन उसका आचरण बुरा है; तो यह एक ऐसा मामला है जिसे निर्धारित करना संभव नहीं है।
दुआ है कि अल्लाह हमें प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से अपनी किताब और अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का अनुसरण करने वालों में सम्मिलित करे, इसी पर हमें मृत्यु प्रदान करे, लोक-परलोक में हमारा संरक्षक बने, मार्गदर्शन के पश्चात हमारे दिलों को पथभ्रष्ट न करे और हमें अपनी कृपा प्रदान करे। निःसंदेह वह परम दाता है।
*
Related books
All books
इस्लाम के बारे में 5 मिनट में जानें5 भाषाएँइस्लाम के बारे में 5 मिनट में जानें
भाषाः अरबी शायद आप सोच रहे होंगे कि हर जगह फैल रहे इस धर्म रहस्य क्या है? इसकी हकीकत क्या है? वह क्या है जिसके कारण लोग पूरे प्रेम और संतुष्टि के साथ उसकी ओर आकर्षित होते जा रहे हैं? जवाब यह है कि यह अल्लाह का ऐसा धर्म है जो इंसान की प्रकृति से पूरी तरह मेल खाता है और उसकी सभी आध्यात्मिक एवं शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करता है। इस्लाम, सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रब अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाने, उसके आदेशों के सामने नतमस्तक हो जाने तथा उसने जिस बात से रोका है, उससे दूर रहने का नाम है। यही वह धर्म है जिसे अल्लाह तआला ने सारे मनुष्यों के लिए, उनके बीच जातियों, रंगों और भाषाओं के अंतर्भेदों को परे…
इस्लाम ही क्यों?5 भाषाएँइस्लाम ही क्यों?
भाषाः अरबी सबसे बड़ी विशेषता जिससे मनुष्य शेष सारे जीवों में उत्कृष्ट ठहरता है, वह विवेक है और विवेक एवं बुद्धि का अस्ल काम सोच-विचार करना है। एक गैर-मुस्लिम पूछ सकता हैः मैं इस्लाम धर्म क्यों ग्रहण करूँ? मुझे कौन सी चीज़ अपने धर्म को छोड़ने और इस्लाम धर्म में दाखिल होने के लिए प्रेरित कर सकती है? कौन सी चीज मुझे यह संकल्प लेने पर उत्साहित कर सकती है?
इस्लाम के सिद्धांत और उसके मूल आधार7 भाषाएँइस्लाम के सिद्धांत और उसके मूल आधार
लेखक डॉ. मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन सालेह अस-सुहैम अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है। प्राक्कथन सभी प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं। हम उसकी प्रशंसा और गुणगान करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमा याचना करते हैं। हम अपनी आत्मा की बुराइयों और अपने दुष्कर्मों से अल्लाह की शरण में आते हैं। जिसे अल्लाह मार्गदर्शन प्रदान कर दे, उसे कोई पथभ्रष्ट नहीं कर सकता और जिसे वह पथभ्रष्ट कर दे, उसे कोई मार्ग दर्शाने वाला नहीं। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं। तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और…
उम्मत के सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण पाठ40 भाषाएँउम्मत के सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण पाठ
शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- की पुस्तक "उम्मत के सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण पाठ" एक संक्षिप्त किंतु अत्यंत लाभदायक पुस्तिका है, जिसे इमाम ने आम मुसलमानों के लिए वैज्ञानिक (धार्मिक) पूँजी बनने के उद्देश्य से तैयार किया। इसमें उसूल-ए-दीन (इस्लाम के मूल सिद्धांतों) और उसके स्तंभों—तौहीद, ईमान और इस्लाम— से लेकर पवित्रता (तहारत) और नमाज़ के अहकाम (नियम), इस्लामी आचरण एवं शिष्टाचार, तथा शिर्क और गुनाह के खतरों का बयान, सब कुछ सरल और स्पष्ट शैली में, किताब व सुन्नत से प्रमाणित तौर पर, किया गया है, ताकि हर मुसलमान के लिए सही अक़ीदा और इबादत को सरल और सुलभ बना दिया जाए।