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النِّسَاء /

आयत 129

4 : 129
النِّسَاء आयतें 176
सूरह · النِّسَاء
हिन्दी · Omari
4 : 129

وَلَن تَسۡتَطِيعُوٓاْ أَن تَعۡدِلُواْ بَيۡنَ ٱلنِّسَآءِ وَلَوۡ حَرَصۡتُمۡۖ فَلَا تَمِيلُواْ كُلَّ ٱلۡمَيۡلِ فَتَذَرُوهَا كَٱلۡمُعَلَّقَةِۚ وَإِن تُصۡلِحُواْ وَتَتَّقُواْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورٗا رَّحِيمٗا

और तुम पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय कदापि नहीं कर सकते, चाहे तुम इसके कितने ही इच्छुक हो। अतः (अवांछित पत्नी से) पूरी तरह विमुख न हो जाओ कि उसे अधर में लटकी हुई छोड़ दो। और यदि तुम आपस में सामंजस्य बना लो और (अल्लाह से) डरते रहो, तो निःसंदेह अल्लाह क्षमा करने वाला, अत्यंत दयावान है।

Explanation & meanings · 3
  1. क्योंकि यह स्वभाविक है कि मन का आकर्षण किसी एक की ओर होगा।
  2. अर्थात जिसमें उसके पति की रूचि न हो, और न व्यवहारिक रूप से बिना पति के हो।
  3. अर्थात सब के साथ व्यवहार तथा सहवास संबंध में बराबरी करो।