الاسلام والعنصرية
تتناول المطوية موضوع الإسلام والعنصرية، موضحة موقف الإسلام من هذه القضية. وتبرز المطوية أن الإسلام يرفض جميع أشكال العنصرية، ويؤسس العلاقات بين الناس على أساس التعارف والتعاون بغض النظر عن اختلافاتهم في اللون أو اللغة أو البلد.
इस्लाम बनाम नस्लवाद
भाषाः अरबी
इक्कीसवीं शताब्दी ईसवी में विज्ञान, टेक्नोलॉजी और संस्कृति में चौंकाने वाली उन्नति तथा हर जगह मानवाधिकार संगठनों के विस्तार के बावजूद, आज भी नस्लवाद दुनिया के अधिकतम विकसित देशों में मौजूद है।
जबकि इस्लाम ने नस्लवाद के सभी रूपों के खिलाफ लड़ाई लड़ी हैः
इस्लाम में लोगों के बीच संबंध का आधार, आपसी परिचय और सहयोग है। रंग, भाषा और देश कितने ही भिन्न क्यों न हों, उनके बीच आपसी संबंध का मूल आधार परिचय और सहयोग ही है।
अल्लाह तआला ने पवित्र क़ुरआन में फ़रमाया हैः (ऐ मनुष्यो! हमने तुम्हें निस्संदेह एक नर तथा एक नारी से पैदा किया तथा तुम्हारी जातियाँ तथा प्रजातियाँ बना दीं, ताकि एक-दूसरे को पहचान सको। वास्तव में, अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक आदर का पात्र वही है, जो तुममें सबसे अधिक अल्लाह से डरता हो। निश्चय ही अल्लाह सब जानने वाला है, सबकी खबर रखने वाला है।) सूरा अल-हुजुरात:13
इस्लाम ने नस्ल, रंग और भाषा की बुनियाद पर लोगों के बीच भेद-भाव करने को हराम ठहराया है। इस्लाम ने सुहैब रूमी, सलमान फ़ारसी, बिलाल हब्शी और उमर अरबी को एकत्रित कर दिया था।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है: (लोगो! तुम्हारा रब एक है और तुम्हारा पिता एक है। सुनो, तक़वा (धर्मपरायणता) के अलावा किसी और आधार पर किसी अरबी को अजमी (जो अरबी न हो) पर, अजमी को अरबी पर, लाल को काले अथवा काले को लाल पर कोई प्रधानता प्राप्त नहीं है।) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक अन्य हदीस में फरमाया है : (तुम सब आदम की संतान हो और आदम मिट्टी से पैदा किए गए थे।) एक और हदीस में फ़रमाया हैः (वह हम में से नहीं है जो पक्षपात का आह्वान करता है, वह हम में से नहीं है जो पक्षपात के आधार पर लड़ाई लड़ता है, और वह हम में से नहीं है जो पक्षपात पर मरता है।)
इस्लाम लोगों के बीच उनके सामाजिक स्तर के आधार पर अंतर नहीं करता है। इसलिए वह अमीर-गरीब, बलवान-दुर्बल, सुंदर-कुरूप और आक़ा-गुलाम के बीच कोई अंतर नहीं करता है। इस्लाम में लोगों के दरमियान वरीयता का मापद़ड अल्लाह का तक़वा, पुण्यकर्म और उसके आदेशों का अनुपालन है।
एक आदमी का गुज़र अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास से हुआ तो एक आदमी जो आपके पास बैठा हुआ था, उससे आपने कहाः (इस आदमी के बारे में तेरी क्या राय है? उसने कहाः यह एक सम्मानित व्यक्ति है। इस लायक है कि यदि निकाह का पैगाम दे तो स्वीकार कर लिया जाए और सिफ़ारिश करे तो उसकी सिफ़ारिश ग्रहण कर ली जाए। यह सुनकर आप ख़ामोश रहे। फिर एक और व्यक्ति गुज़रा तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उससे पूछाः इसके बारे में तेरी क्या राय है? उसने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! यह एक निर्धन मुसलमान है। इस लायक़ है कि यदि निकाह का पैग़ाम दे तो स्वीकार न किया जाए, सिफ़ारिश करे तो न मानी जाए तथा कुछ कहे तो उसकी बात सुनी न जाए। आपने फ़रमायाः यह व्यक्ति उस तरह के धरती भर लोगों से उत्तम है।)
इस्लाम दंड लागू करने के मामले में भी नस्लवाद को नकारता हैः
इसलिए जो भी अपराध करेगा, उसे सजा दी जाएगी, चाहे उसका रंग, मर्तबा, वंशावली कोई-सी भी हो और वह शासक का करीबी ही क्यों न हो।
जो इस्लामी इबादतों पर चिंतन-दृष्टि डालेगा, उसके सामने स्पष्ट हो जाएगा कि उनमें से प्रत्येक नस्लवाद की घोर-विरोधी है।
देखिए कि नमाज़ में एक ही पंक्ति में गोरा काले की बगल में, अरबी गैर-अरबी की बगल में, निर्धन धनवान की बगल में और मालिक कामगार की बगल में खड़ा होता है।
और लोगों का इमाम कभी ऐसा निर्धन व्यक्ति होता है जो छोटे पद पर कार्यरत होता है और उसके पीछे डाक्टर,अफ़सर और ऊँचे पदों पर आसीन लोग नमाज़ पढ़ते हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए होता है कि वह (इमाम) उनमें अल्लाह की किताब का सबसे बड़ा ज्ञाता होता है।
और हज में आप लाखों लोगों को - जिनमें अमीर-गरीब, उच्चतर- कमतर, गोरे-काले, अरबी-गैर अरबी, हाकिम-प्रजा सब होते हैं - देखेंगे कि एक ही पंक्ति में, एक ही समय में, एक ही परिधान में, एक ही उद्देश्य से, एक ही उद्घोष के तहत खड़े होकर सिर्फ एक ही रब को पुकार रहे हैं और एक ही नबी का अनुसरण कर रहे हैं और ऐसे में उनके दरमियान का भाषा, रंग और देश-दुनिया का हर अंतर मिट चुका है।
इस मौसम में ईमानी एकता और इस्लामी भाईचारा का प्रतीक जगमगाता है और नस्लवाद की हर निशानी लुप्त हो जाती है।
और रोज़े के दिनों में आप सारे मुसलमानों को पाएंगे कि स्तर, रंग और नस्ल के अंतर के बावजूद सब एक ही वक्त में रोज़ा रख रहे हैं। जब फज्र की अज़ान हो जाती है तो सारे मुसलमान खान-पान से रुक जाते हैं। और जब मग्रिब की अज़ान होती है तो सब रोज़ा तोड़ देते हैं। किसी को भी इस बात की अनुमति नहीं दी जाती है कि वह फज्र की अज़ान हो जाने के बाद और मग्रिब की अज़ान होने से पहले खाता-पीता रहे, चाहे उसका रंग, शहर या पद जो भी और जैसा भी हो।
वास्तव में, नस्लवाद एक प्रकार का अहंकार है जिससे बचने की इस्लाम ने चेतावनी दी है। अल्लाह के नबी (सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया हैः (वह व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, जिस के दिल में रत्ती बराबर भी अहंकार होगा।) आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक और हदीस में फ़रमाया हैः (अल्लाह तआला ने मेरी ओर वह़्य की है कि तुम लोग विनम्रता धारण करो, यहाँ तक कि कोई किसी पर अत्याचार न करे और न कोई किसी पर गर्व करे।)
तो साबित हुआ कि इस्लाम में वरीयता और प्रधानता का मेयार धर्मपरायणता (तक़वा) और अच्छे कर्म हैं, विरासत में मिली हुई वंशावली आदि नहीं जिससे लोग एक दूसरे पर वरीयता जतलाते फिरें, जैसा कि अल्लाह तआला ने क़ुरआन में फ़रमाया हैः (बेशक अल्लाह की नजर में तुम में से सबसे सम्मानित व्यक्ति वह है जो अल्लाह से सबसे ज्यादा डरने वाला है।) सूरा अल-हुजुरात:13
कोड को स्कैन करें
अन्य भाषाओं में और भी पैम्फलेट डाउनलोड करने हेतु
इस्लाम को समझें
इस्लाम बनाम नस्लवाद