شروط الصلاة وأركانها وواجباتها
كتاب نافع مختصر في بيان شروط الصلاة، وأركانها، وواجباتها، مبينًا تسعة شروط للصلاة. ويشرح أركانها الأربعة عشر، بالإضافة إلى واجباتها ومبطلاتها. يعتبر الكتاب مرجعًا مهمًا للمسلمين لفهم كيفية أداء الصلاة بشكل صحيح وفقًا لأحكام الشريعة الإسلامية، مستندًا إلى أدلة الوحي من القرآن الكريم والسنة النبوية المطهرة.
नमाज़ की शर्तें, स्तंभ तथा आवश्यक कार्य
लेखक : प्रकांड इस्लामी विद्वान तथा सुधारक इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल बह्हाब (उनपर अल्लाह की कृपा हो)
1115-1206 हिजरी
शोधकर्ता, संशोधक एवं इस किताब की हदीसों के संदर्भयुक्त-कर्ता:
अल्लाह की दया के मुहताज डॉक्टर सईद बिन वह्फ़ अल- क़हतानी
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं बेहद कृपालु है।
शोधकर्ता की प्रस्तावना
हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है। हम उसी की प्रशंसा करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमायाचना करते हैं। हम अपनी आत्मा और अपने कर्मों की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। वह जिसे हिदायत दे, उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता और वह जिसे गुमराह करे, उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं बन सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। उनपर, उनके परिवारजनों पर और उनके सहाबियों पर, अल्लाह की अनगिनत रहमत एवं शांति अवतरित हो। तत्पश्चात:
इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब की "شروط الصلاة، وأركانها، وواجباتها" नामी यह किताब, अत्यंत लाभकारी है, विशेषतया प्रारंभिक पाठकों और जनसामान्य के लिए, बल्कि अल्लाह तआला ने इसके द्वारा विशेष और सामान्य, सबको उसी प्रकार लाभ पहुँचाया है, जिस प्रकार उनकी अन्य सभी किताबों के द्वारा, दुनिया के कोने-कोने में बसने वालों को पहुँचाया है। यह निश्चय ही, उनपर और अन्य सभी लोगों पर अल्लाह का विशाल उपकार है।
इस पावन पुस्तक की व्याख्या हमारे गुरू इमाम अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- ने अपने घर के पास की मस्जिद में की थी। उनके सामने इस पुस्तक को शैख़ मुहम्मद इलियास अब्दुल क़ादिर ने तक़रीबन 1410 हिजरी में पाठ किया था और इमाम इब्ने बाज़ ने पाँच दिनों में, इशा की अज़ान और इक़ामत की मध्यावधि में पाँच बैठकों में इसकी शानदार, अनुसंधानयुक्त, संक्षिप्त, लाभदायक और अनहद उपयोगी व्याख्या की थी। इन पाँचों पाठों की कुल अवधि, एक कैसेट में, नव्वे मिनट की थी। वह कैसेट मेरे पास लग-भग पच्चीस साल, मुहर्रम 1435 हिजरी तक पड़ी रही। उसके बाद अल्लाह तआला ने मुझे कैसेट की आवाज़ को शब्दों की सूरत में कागज़ पर उतारने का सुयोग प्रदान किया।
इसमें मेरी कार्य-प्रणाली इस प्रकार रही :
1- मैंने शैख़ -रहिमहुल्लाह- की रिकार्डेड ध्वनि के एक-एक शब्द की, बहुत गहराई से अभिलेख और व्याख्या दोनों के साथ तुलना की है, और समस्त प्रशंसा तो बस अल्लाह ही के लिए है।
2- मैंने इस किताब के अभिलेख का तुलनात्मक शोध, चार अलग-अलग संस्करणों की प्रतियों से किया है, जिनका विवरण इस प्रकार है : पाठक की वह प्रति, जिसे देखकर वह शैख़ के सामने पढ़ता था और शैख़ सुनते थे। इसी प्रति को मैंने मूलाधार बनाया है। दो हस्तलिखित प्रतियाँ, जिनमें से पहली प्रति बहुत स्पष्ट और सुंदर लिखाई के साथ, शाह फ़ैसल इस्लामी शोध एवं अध्ययन केंद्र में माइक्रो फ़िल्म क्रमांक 5258 के तहत सुरक्षित है, जिसको इबराहीम बिन मुहम्मद ज़ौयान ने 6/5/1307 हिजरी में लिखा। उसकी असल प्रति क़सीम के जामे उनैज़ा पुस्तकालय में मौजूद है। यह प्रति, शैख़ -रहिमहुल्लाह- की ही निम्नलिखित पुस्तकों की पांडुलिपियों के साथ संकलित है : सलासतुल उसूल (तीन मूल सिद्धांत), अल-क़वाइदुल अरबआ (चार मूल सिद्धांत) और कश्फ़ अश-शुबुहात (संदेहों का निवारण)। दूसरी हस्तलिखित प्रति, शाह फ़ैसल केंद्र ही में माइक्रो फ़िल्म क्रमांक 5265 के तहत मौजूद है और जिसका असल स्थान भी क़सीम का जामे उनैज़ा पुस्तकालय ही है। यह भी शैख़ -रहिमहुल्लाह- ही की निम्नलिखित पुस्तकों की पांडुलिपियों के साथ संकलित है : सलासतुल उसूल, अल-क़वाइदुल अरबआ, किताबुत तौहीद और आदाबुल मश्यि लिस-सलात। इसी तरह, उनके साथ शैख़ुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या -रहिमहुल्लाह- की किताब "अल-अ़क़ीदा अल-वासितिय्या" की पांडुलिपि भी संकलित है। यह प्रति 1338 हिजरी में नकल की गई थी। उसपर नकल करने वाले ने अपना नाम नहीं लिखा है। उसकी लिखावट स्पष्ट और सुंदर है, लेकिन उसमें लेखक के कथन "والدليل قوله تعالى: «ومن يبتغ غير الإسلام ديناً فلن ..." से लेखक के कथन, "عليه وسلم في الوقتين..." तक छिद्रित है। मैंने इस प्रति का, दूसरी प्रतियों से तुलनात्मक अध्ययन किया है। चौथी प्रति, इमाम मुहम्मद बिन सऊद इस्लामी विश्वविद्यालय से प्रकाशित प्रति है, जिसके संशोधन और पांडुलिपि संख्या 86/269 से तुलना का कार्य, शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन ज़ैद रूमी और शैख़ सालेह बिन मुहम्मद अल-हसन ने किया है।
3- प्रतियों या पांडुलिपियों में कहीं-कहीं जो अंतर है, उसे मैंने पादटीका में स्पष्ट कर दिया है।
4- आयतों को मैंने सूरतों के साथ संदर्भित कर दिया है।
5- मैंने तमाम हदीसों और पूर्वजों के कथनों को संदर्भयुक्त कर दिया है।
6- तमाम आयतों, हदीसों और पूर्वजों के कथनों की एक सूची भी बना दी है।
7- मैंने इस भावार्थ का नाम "अश-शरहुल मुमताज़ लिश-शैख़ इमाम इब्ने बाज़" रखा है। जब मैंने इस भावार्थ को पूरा लिख लिया और वह प्रकाशित भी हो गया, तो मैंने चाहा कि "नमाज़ की शर्तें, स्तंभ तथा आवश्यक कार्य" के मूल लेख को एक अलग किताब का रूप दे दूँ और उन तमाम मेहनतों को उसमें समेट दूँ, जो "अश्-शरहुल मुमताज़" की तैयारी में लगी थीं, इस उम्मीद पर कि अल्लाह तआला उससे सबको लाभान्वित करेगा। मैंने ऐसा इसलिए भी किया कि उसको भावार्थ से अलग कर देने से उसको ज़ुबानी याद करना, विशेषतया प्राथमिक वर्गों के छात्र-छात्राओं आदि के लिए, अधिक आसान होगा और जो "अश्-शरहुल मुमताज़" से लाभ उठाना चाहेगा, वह अलग से उसका अध्ययन करेगा।
मैं अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ कि वह मेरे इस कार्य को केवल अपनी ख़ुशी की प्राप्ति के साधनस्वरूप ग्रहण कर ले, और उसे उसके लेखक इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब -रहिमहुल्लाह- और उसके भावार्थ प्रदाता इमाम इब्ने बाज़ -रहिमहुल्लाह- के लिए लाभदायक ज्ञान भंडार बना दे। साथ ही, मुझे इससे मेरे जीवन और मेरी मौत के बाद भी लाभ पहुँचाए और हर उस व्यक्ति को भी इससे लाभ पहुँचाए जो इसे पढ़े। बेशक, अल्लाह तआला ही वह पाक हस्ती है जिससे माँगना सबसे अच्छा है, और उम्मीद की सबसे अच्छी किरण भी वही है, वही हम सबका शरणदाता और कल्याण करने वाला है, इस सर्वशक्तिमान ईश्वर की सहायता के बिना न तो पापों से बचने की शक्ति है, न ही अच्छा करने की शक्ति। अल्लाह तआला, हमारे नबी मुहम्मद पर, उनके परिजनों पर और उनके तमाम सहाबियों पर अपनी बरकत तथा रहमत की बरखा बरसाए!
प्रस्तोता : अबू अब्दुर्रहमान
सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-क़हतानी
यह शब्द दिनांक 25/05/1435 हिजरी, मंगलवार को ज़ुहर की नमाज़ के बाद लिखे गए।
पहली पांडुलिपि का छठा पृष्ठ, जो क्रमांक 5258 के तहत शाह फ़ैसल केंद्र में है। दरअसल यह पांडुलिपि क़सीम के जामे उनैज़ा के पुस्तकालय में सुरक्षित है।
दूसरी पांडुलिपि का पाँचवाँ पृष्ठ, जो शाह फ़ैसल केंद्र में क्रमांक 5265 के तहत मौजूद है।
यह पांडुलिपि भी क़सीम के जामे उनैज़ा के पुस्तकालय में सुरक्षित है।
[इस्लाम धर्म के महान ज्ञाता, विद्वानों के विद्वान, इस्लामिक जागरण के ध्वजावाहक इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब -रहिमहुल्लाह- कहते हैं ]:
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं बेहद कृपावान है।
नमाज़ की शर्तें नौ (9) हैं :
इसलाम, अक़्ल, होश संभालने की आयु, हदस (अपवित्रता) को दूर करना, नजासत (गन्दगी) को साफ़ करना, गुप्तांग को छिपाना, समय का आ जाना, क़िबले के सम्मुख होना तथा नीयत करना।
नमाज़ की पहली शर्त इस्लाम है जिसका विलोम कुफ्र है, और काफिर का कोई भी कर्म ग्रहणयोग्य नहीं है, चाहे वह कोई भी कर्म करे [1], [2]। इसकी दलील अल्लाह तआला का यह फ़रमान है: "मुश्रिकों (बहुदेववाद में विश्वास रखने वालों) का काम नहीं कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें, जबकि वे स्वयं अपने ऊपर कुफ़्र के साक्षी हैं, उनके समग्र कर्म व्यर्थ गए, एवं वे सदैव जहन्नम में रहने वाले हैं।" [3] एक अन्य स्थान में अल्लाह तआला का फ़रमान है : "उनके कर्मों को लेकर, हम धूल के समान उड़ा देंगे।" [4] [1] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों के शब्द इस प्रकार हैं : «والكافر عمله مردود، ولا تقبل الصلاة إلا من مسلم، والدليل قوله تعالى: ﴿وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ﴾، والكافر عمله مردود عليه، ولو عمل أي عمل...» यानी काफिर का हर कर्म अग्रहणीय है और नमाज़ केवल मुसलमान ही की क़बूल होती है। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है: {और जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और धर्म तलाश करेगा, तो उसकी तरफ से उसे क़बूल नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।} और काफिर का कर्म, उसके मुँह पर मार दिया जाता है, चाहे वह जो भी कर्म करे ...। [2] यहाँ से दूसरी हस्तलिखित प्रति की लिखावट में छिद्र शुरू होता है, जो नौवीं शर्त के बीच में जाकर ख़त्म होता है। [3] सूरा अत-तौबा, आयत संख्या :17 [4] सूरा अल-फ़ुरक़ान, आयत संख्या : 32
दूसरी शर्त [5] अक़्ल है जिसका विलोम, दीवानगी है। पागल और दीवाने आदमी से उसके स्वस्थ होने तक क़लम उठा लिया जाता है। इसकी दलील यह हदीस है [6] : "तीन प्रकार के लोगों से क़लम उठा ली गई है : सो जाने वाले से, यहाँ तक कि जाग जाए। पागल से, यहाँ तक कि स्वस्थ हो जाए। बालक-बालिका से, यहाँ तक कि जवान हो जाए।" [7] [5] शैख़ इब्ने बाज़ के सामने पढ़ने वाले की प्रति और जामिया की दूसरी प्रति में केवल «الثاني» शब्द है, «الشرط» शब्द नहीं है। [6] पढ़ने वाले की प्रति और जामिया की प्रति में «الحديث» का शब्द है, जबकि पहली पांडुलिपि में है «حتى يفيق لحديث...» के शब्द आए हैं। [7] इसे अबू दाऊद ने किताबुल हुदूद, अध्याय : पागल जब चोरी करे या कोई ऐसा अपराध करे जिसपर दंड लागू करना आवश्यक हो, में हदीस क्रमांक : 4405 के तहत रिवायत किया है। उसके शब्द इस प्रकार हैं : अली -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तीन प्रकार के लोगों से क़लम उठा ली गई है : सो जाने वाले से, यहाँ तक कि जाग जाए, बालक से, यहाँ तक कि वयस्क हो जाए और पागल से, यहाँ तक कि उसे समझ या अक़्ल आ जाए।" उनके अतिरिक्त कई अन्य मुहद्दिसों ने भी इस हदीस को अली -रज़ियल्लाहु अनहु- से, मिलते-जुलते शब्दों में, सो जाने वाले, पागल और बालक के क्रम में थोड़े-से अंतर के साथ रिवायत किया है। देखिए : तिरमिज़ी, किताब अल-हुदूद अन रसूलिल्लाहि सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अध्याय : किसपर दंड लागू करना अनिवार्य नहीं होता, हदीस क्रमांक : 1423, मुसनद अहमद 2/461, हदीस क्रमांक : 1362 और मुस्तदरक हाकिम 2/59। इसे हाकिम ने सहीह क़रार दिया है और इमाम ज़हबी ने उनसे सहमति व्यक्त की है। इसी तरह, मुसनद अहमद (2/461) के शोधकर्ताओं ने उसे सहीह लि-गैरिही करार दिया है और अल्लामा अलबानी ने भी इरवाउल ग़लील 2/5 में सहीह करार दिया है। यह हदीस आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से भी इन शब्दों के साथ वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तीन प्रकार के लोगों से क़लम उठा ली गई है : सो जाने वाले से, यहाँ तक कि जाग जाए, पागलपन से ग्रस्त व्यक्ति से, यहाँ तक कि स्वस्थ हो जाए और बच्चे से, यहाँ तक कि बड़ा हो जाए।" देखिए : सुनन अबू दाऊद, किताबुल हुदूद, अध्याय : पागल जब चोरी करे या कोई ऐसा अपराध करे जिसपर दंड लागू करना आवश्यक हो, हदीस क्रमांक : 4400 और अहमद 42/51, हदीस क्रमांक : 25114। इन दोनों के अतिरिक्त, अन्य लोगों ने भी इसे मिलते-जुलते शब्दों के साथ रिवायत किया है। मुसनद अहमद (42/51) के शोधर्ताओं ने इसकी सनद को जय्यिद (अच्छा) करार दिया है और अलबानी ने इरवाउल ग़लील (2/4) में इसे सहीह करार दिया है।
तीसरी शर्त, होश संभालने की आयु है। इसका विलोम बाल्यावस्था है, जिसकी सीमा सात साल है। उसके बाद नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया जाएगा [8], क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुम लोग अपनी संतानों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दो, जब वे सात साल के हो जाएँ और उसके लिए उन्हें मारो, जब वे दस साल के हो जाएँ तथा उनका बिस्तर अलग-अलग कर दो।" [9] [8] पहली पांडुलिपि में «يؤمر بالصلاة» है और «ثم» नहीं है। [9] इसे अबू दाऊद ने किताबुस-सलात, अध्याय : बच्चे को नमाज़ का आदेश कब दिया जाएगा, में, हदीस क्रमांक : 495 के तहत, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : "तुम लोग अपनी संतानों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दो, जब वे सात साल के हो जाएँ और उसके लिए उन्हें मारो, जब वे दस साल के हो जाएँ तथा उनका बिस्तर अलग कर दो।" मुसनद अहमद (11/369) में यही हदीस क्रमांक : 6756 के तहत आई है और उसके शब्द इस प्रकार हैं : "तुम लोग अपनी संतानों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दो, जब वे सात साल के हो जाएँ और उसके लिए उन्हें मारो, जब वे दस साल के हो जाएँ तथा उनका बिस्तर अलग कर दो और जब तुममें से कोई अपने गुलाम या कामगार की शादी करे, तो उसके किसी भी गुप्तांग को न देखे और याद रखे कि उसकी नाभि से लेकर, उसके घुटनों तक के सारे अंग गुप्तांग के तहत आते हैं।" इसे अहमद ने एक अन्य स्थान में भी रिवायत किया है। वह हदीस क्रमांक : 6689 के तहत, अम्र बिन शुऐब से रिवायत करते हैं, जो अपने पिता से रिवायत करते हैं और वह अपने दादा से रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तुम लोग अपने बच्चों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दो, जब वे सात साल के हो जाएँ और उसके लिए उन्हें मारो, जब वे दस साल के हो जाएँ तथा उनका बिस्तर अलग कर दो"। मुसनद (11/369) के शोधकर्ताओं ने इसकी सनद को हसन कहा है और अलबानी ने इसे इरवाउल ग़लील (1/266) में सहीह क़रार दिया है।
चौथी शर्त [10], हदस यानी अपवित्रता को दूर करना है। ज्ञात हो कि इससे अभिप्राय वज़ू करना है, जो एक सर्वविदित वस्तु है। यह भी मालूम रहे कि वज़ू हदस के कारण ही अनिवार्य होता है। [10] पहली पांडुलिपि में «الرابع» का शब्द है। उसमें «الشرط» शर्त का शब्द नहीं है। जबकि यह शब्द, शैख़ के सामने पढ़ने वाले की प्रति और जामिया से प्रकाशित प्रति में मौजूद है।
वज़ू की दस शर्तें हैं : इस्लाम, अक़्ल, होश संभालने की आयु, नीयत, तहारत [11] (वज़ू) सम्पूर्ण होने तक नीयत बरक़रार रखना, वज़ू वाजिब (आवश्यक) करने वाली वस्तुओं का न पाया जाना, वज़ू से पहले (यदि शौच में गया हो तो) जल से इस्सतिंजा करना अथवा पत्थर आदि के प्रोयग से सफाई करना, जल का पवित्र एवं वैध होना, शरीर में कोई ऐसी वस्तु न रहने देना जो जल को चमड़े तक पहुँचने से रोके, एवं ऐसे व्यक्ति के लिए नमाज़ का समय आ जाना[12], जो किसी बीमारी के कारण अपना वज़ू बचाके न रख पाता हो। [11] पहली पांडुलिपि में «طهارته» यानी यह शब्द बिन अलिफ़-लाम के आया है, जबकि शैख़ के सामने पढ़ने वाले की प्रति में और जामिया (विश्वविद्यालय) से प्रकाशित प्रति में उस शब्द पर अलिफ़-लाम लगा हुआ है। [12] पहली पांडुलिपि में «ودخول الوقت» के शब्द हैं।
रही बात वज़ू के फ़र्ज़ यानी अनिवार्य कार्यों की, तो वे छह हैं : चेहरे को धोना, जिसके अंदर मुँह में पानी लेकर कुल्ली करना और नाक में पानी डालकर उसे साफ करना भी शामिल है। मालूम रहे कि चेहरे की सीमा लंबाई में सर के बालों के उगने की जगहों से लेकर ठुड्डी तक और चौड़ाई में एक कान के किनारे से दूसरे कान के किनारे तक है। जबकि वज़ू के शेष अनिवार्य कार्य हैं : दोनों हाथों को कोहनियों तक धोना, पूरे सर और दोनों कानों का मसह करना, दोनों पाँवों को टख़नों तक धोना तथा इन सब कार्यों को क्रमानुसार और लगातार [13] करना। दलील अल्लाह तआला का यह कथन है : ﴾ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने मुँह तथा कोहनियों सहित अपने हाथों को धो लिया करो और अपने सिर का मसह कर लो, तथा अपने पैर टख़नों सहित धो लो।﴿ [14] अल-आयत [15] [13] पहली पांडुलिपि में, लगातार शब्द के बाद है : «وواجبه التسمية مع الذكر» यानी याद रहने की स्थिति में बिस्मिल्लाह पढ़ना भी वाजिब है। [14] सूरा अल-माइदा, आयत संख्या : 6 [15] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में "अल-आयत" शब्द नहीं है।
वज़ू के उक्त अनिवार्य कार्यों को क्रमानुसार करने की दलील यह हदीस है : "तुम लोग भी उसी क्रम से शुरू करो, जिस क्रम से अल्लाह तआला ने शुरू किया है।" [16] [16] इसे नसई ने किताब मनासिक अल-हज्ज, अध्याय : तवाफ़ की दो रकातों के बाद की दुआएँ, में, हदीस क्रमांक : 2962 के तहत, जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत किया है और अलबानी ने "तमामुल मिन्नह" (पृष्ठ : 88) में सहीह क़रार दिया है। जबकि इमाम मुस्लिम ने इसे अपनी सहीह के अंदर, किताब अल-हज्ज, अध्याय : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का हज, में, हदीस क्रमांक : 1218 के तहत रिवायत किया है, जिसके शब्द इस प्रकार हैं : "मैं उसी से शुरू करता हूँ, जिससे अल्लाह ने शुरू किया है।"
जबकि इन फ़र्ज़ कार्यों को लगातार करने की अनिवार्यता की दलील, चमक वाले व्यक्ति की हदीस है, जिसमें आया है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक आदमी के पैर [17] में पानी न पहुँचने के कारण एक दिरहम के समान स्थान को चमकते हुए देखा, तो उसे दोबारा वज़ू करने का आदेश [18] दिया। [19] [17] पहली पांडुलिपि में «في رجله» के शब्द आए हैं। [18] पहली पांडुलिपि में «أمره بالإعادة» के शब्द हैं। [19] अबू दाऊद, किताब अत-तहारह, अध्याय : वज़ू में निरंतरता बनाए न रखने का बयान, में, हदीस क्रमांक : 175 के तहत और अहमद (24/251) ने हदीस क्रमांक : 15595 के तहत, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के किसी सहाबी से, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : "अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक आदमी को नमाज़ पढ़ते हुए देखा, जिसके पैर में एक दिरहम के बराबर स्थान पानी न पहुँचने के कारण सूखा रह गया था और दूर ही से चमक रहा था। अत:, आपने उसे दोबारा वज़ू करके फिर से नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया।" मुसनद अहमद (24/252) के शोधकर्ताओं और अल्लामा अलबानी ने भी सहीह सुनन अबू दाऊद (1/310) हदीस क्रमांक : 168 के तहत इसे सहीह लि-गैरिही करार दिया है। इब्ने दक़ीक़ अल-ईद ने "अल-इलमाम" (पृष्ठ : 15) में नक़ल किया है कि इमाम अहमद ने इसकी सनद को जय्यिद कहा है। साथ ही इब्ने माजा ने भी इसे अपनी सुनन, किताब अस-सलाह, अध्याय : जिसने वज़ू किया और कोई स्थान सूखा छोड़ दिया, में, हदीस क्रमांक 666 के तहत, उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- से, इसी की भाँति रिवायत किया है।
और वज़ू के लिए बिस्मिल्लाह कहना भी वाजिब है, बशर्तेके याद रहा हो। [20] [20] पहली हस्तलिखित प्रति में यह वाक्य «والموالاة» के बाद आया है।
वज़ू को भंग करने वाली चीज़ें आठ हैं : दोनों रास्तों (गुप्तांगों) से निकलने वाली चीज़ें ,बदन से स्पष्ट रूप से निकलने वाली गंदी चीज़ [21], बुद्धि का विनाश होना, औरत को काम-वासना [22] के साथ छूना, आगे या पीछे के गुप्तांग को हाथ से छूना [23] , ऊँट का माँस खाना, मुर्दे को स्नान देना [24] और इस्लाम धर्म छोड़ देना, अल्लाह तआला इससे हमें सुरक्षित रखे। [21] «النجس» का शब्द पहली हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [22] औरत को काम-वासना के साथ छूने से अगर मज़ी (पतली धातु) आदि न निकले, तो उसके संबंध में हमारे शैख़ इब्ने बाज़ "अश-शरहुल मुमताज़" (पृष्ठ : 68) में कहते हैं : "सही बात यही है कि उससे वज़ू भंग नहीं होगा, क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी बीवियों का चुम्बन लिया करते और वज़ू नहीं करते थे।" [देखिए, मुसनद अहमद, 42/499, हदीस क्रमांक : 25766, अबू दाऊद, हदीस क्रमांक : 179, तिरमिज़ी, हदीस क्रमांक : 86 आदि। इसकी सनद को मुसनद अहमद (42/499) के शोधकर्ताओं ने सहीह कहा है और अलबानी ने सहीह अबू दाऊद (1/322) में इसे सहीह करार दिया है।] रही बात सूरा निसा की आयत क्रमांक : 43 की, जिसमें औरत को छूने की बात आई है, तो उससे तात्पर्य, सहवास और संभोग करना है। [23] पहली पांडुलिपि में «كان» का शब्द नहीं है। [24] सही बात यह है कि मुर्दे को स्नान देने से वज़ू भंग नहीं होता। हाँ, यदि स्नान देने वाले का हाथ मुर्दे के गुप्तांग पर पड़ जाए तो वज़ू टूट जाएगा। हमारे शैख़ इब्ने बाज़ ने अश-शरहुल मुमताज़, (पृष्ठ : 70) में इसे ही वरीयता दी है।
पाँचवीं शर्त [25] : तीन चीज़ों से गंदगी को दूर करना है : शरीर, कपड़े और उस जगह से जहाँ नमाज़ पढ़नी है। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾और अपने कपड़ों को पाक-साफ कर ले﴿ [26] [25] पहली हस्तलिखित प्रति में केवल «पाँचवीं» का शब्द है, «शर्त» का शब्द उसमें नहीं है। [26] सूरा अल-मुद्दस्सिर, आयत संख्या : 4
छठी शर्त : पर्दा करना : विद्वानों का इस बात पर मतैक्य है कि जो भी व्यक्ति क्षमता रखने के बावजूद निर्वस्त्र होकर नमाज़ पढ़ेगा, उसकी नमाज़ नहीं होगी। पुरुष और लौंडी का पर्दा, नाभि से लेकर घुटनों तक है, जबकि आज़ाद औरत का पर्दा, चेहरे को छोड़कर उसका पूरा शरीर है। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह कथन है : ﴾ऐ आदम की संतानो! प्रत्येक मस्जिद के पास अपनी शोभा धारण कर लो।﴿ [27] अर्थात : हर नमाज़ के समय। [27] सूरा अल-आराफ़, आयत संख्या : 31
सातवीं शर्त : नमाज़ का समय होना : सुन्नत से इसकी दलील, जिब्रील -अलैहिस्सलाम- वाली हदीस है, जिसमें आया है कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को पहले और आखिरी वक्त में नमाज़ पढ़ाई [28] और कहा : "ऐ मुहम्मद! नमाज़ इन्हीं दो वक्तों के बीच में पढ़नी है।" [29] [28] पहली हस्तलिखित प्रति में केवल "وآخره" का शब्द है, "فى" का शब्द उसमें नहीं है। [29] अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: "जिब्रील -अलैहिस्सलाम- ने मुझे काबे के पास (एक वक्त की नमाज़) दो बार पढ़ाई। इस क्रम में ज़ुहर की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब सूरज ढल चुका था और छाया तसमे के बराबर थी, अस्र की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब हर चीज़ की छाया उसके बराबर हो गई, मग्रिब की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब रोज़ेदारों ने रोज़ा तोड़ा, इशा की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब क्षितिज की लाली लुप्त हो गई, और फ़ज्र की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब रोज़ा रखने वाले पर खाना-पीना हराम हो जाता है। फिर दूसरे दिन, ज़ुहर की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब हर चीज़ की छाया उसके बराबर हो गई, अस्र की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब हर चीज़ की छाया दोगुनी हो गई, मग्रिब की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब रोज़ेदार ने रोज़ा खोला, इशा की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई, जब रात का एक तिहाई भाग गुज़र गया, और फ़ज्र की नमाज़ उस वक्त पढ़ाई जब उजाला फैल गया। फिर वे मेरी तरफ मुड़े और कहा : ऐ मुहम्मद! आपसे पहले के नबियों के लिए, नमाजों का यही वक्त था। अब नमाज़ का वक्त इन दोनों समयों के बीच में निर्धारित कर दिया गया है।" इस हदीस को अबू दाऊद ने किताबुस-सलाह, अध्याय : नमाज़ की अनिवार्य विधियाँ (हदीस क्रमांक : 393), तिरमिज़ी ने किताबुस-सलाह, अध्याय : नमाज़ के निर्धारत समय का बयान (हदीस क्रमांक : 149), शाफ़िई ने अपनी मुसनद (1/26), अहमद ने अपनी मुसनद (5/202) (हदीस क्रमांक : 3081) और इब्ने ख़ुज़ैमा न (1/168) (हदीस क्रमांक : 325) तथा हाकिम ने अपनी मुसतदरक (1/193) में रिवायत किया है। यहाँ पर शब्द, सुनन अबू दाऊद से लिए गए हैं। हाकिम ने इसे सहीह और मुसनद अहमद (5/202) के शोधकर्ताओं ने इसकी सनद को हसन करार दिया है। इब्ने अब्दुल बर्र ने अत-तमहीद (8/28) में इसे सहीह करार देते हुए, इसे ज़ईफ़ (दुर्बल) कहने वालों का खंडन किया है। अलबानी ने सहीह अबू दाऊद में हदीस क्रमांक : 377 के तहत सहीह करार दिया है। जबकि मुस्लिम की हदीस में, जो किताब अग-मस्जिद व मवाज़़े अस-सलाह , अध्याय : पाँच वक्त की नमाज़ें, में हदीस क्रमांक : 612 के तहत आई है, आया है कि इशा की नमाज़ का वक्त, आधी रात तक है। अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : "जब तुम फज्र की नमाज़ पढ़ लो, तो उसका वक्त सूरज का निकलना शुरू होने तक रहता है। फिर, जब तुम ज़ुहर की नमाज़ पढ़ लो, तो उसका वक्त अस्र का वक्त हो जाने तक रहता है। फिर जब अस्र की नमाज़ पढ़ लो, तो उसका वक्त सूरज के पीला हो जाने तक रहता है। फिर जब मग्रिब की नमाज़ पढ़ लो, तो उसका वक्त, क्षितिज की लाली के लुप्त हो जाने तक रहता है। फिर जब इशा की नमाज़ पढ़ लो, तो उसका वक्य आधी रात तक रहता है।" इससे सिद्ध हो गया कि इशा की नमाज़ का वक्त, आधी रात तक रहता है और यही बात वरीयता प्राप्त और विश्वासयोग्य है।
अल्लाह तआला का यह फ़रमान [30] भी, इसकी दलील है : ﴾बेशक नमाज़, ईमान वालों पर निर्धारित समय पर अनिवार्य की गई है।﴿ [31] अर्थात : निर्धारित समय-सीमा पर अनिवार्य की गई है और हर नमाज़ के अलग-अलग निर्धारित समय की दलील [32], अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾आप नमाज़ की स्थापना करें, सूर्यास्त से रात के अंधेरे तक तथा प्रातः (फ़ज्र के समय) क़ुरआन पढ़िए। वास्तव में, प्रातः क़ुरआन पढ़ना, उपस्थिति का समय है﴿ [32] [30] यहाँ पर दूसरी हस्तलिखित प्रति का छिद्रित भाग समाप्त होता है। [31] सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 103 [32] पहली हस्तलिखित प्रति में «الوقت» का शब्द है। [33] सूरा अल-इसरा, आयत संख्या : 87
आठवीं शर्त : क़िबले की तरफ मुँह करना : इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾हम आकाश की ओर तुम्हारा बार-बार मुँह फेरना देख रहे हैं [34], इसलिए हम तुम्हें उस क़िब्ले की ओर हमेशा के लिए फेर देना चाहते हैं जो तुम्हें पसंद है। तो अब तुम मस्जिद-ए-हराम की तरफ अपना मुँह कर लो और तुम सब लोग जहाँ कहीं भी रहो, उसी की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ा करो﴿ [35] [34] पहली हस्तलिखित प्रति में केवल «فولِّ وجهك شطر المسجد الحرام» तक है और आयत का शेष भाग नहीं लिखा गया है। जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में केवल इतना है : ﴾قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا﴿ [35] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 144
नौवीं शर्त : नीयत : याद रहे कि नीयत का स्थान दिल है और उसके लिए घड़े हुए शब्दों का उच्चारण, बिदअत है। इसकी दलील, यह हदीस [36] है : "सभी कर्मों का आधार नीयतों पर है, और हर व्यक्ति के लिए वही कुछ है जिसकी वह नीयत करता है।" [37] [36] पहली हस्तलिखित प्रति में है : "حديث عمر، قال: قال رسول اللَّه -صلى الله عليه وسلم- :" यानी इसका प्रमाण उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- की यह हदीस है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया। जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में है : "والدليل: «إنما الأعمال بالنيات" यानी इसका प्रमाण है : "सारे कर्मों का आधार नीयतों पर है।" [37] बुख़ारी, हदीस क्रमांक : 1, मुस्लिम, हदीस क्रमांक : 1907, इसके संदर्भ का विवरण पहले गुज़र चुका है।
नमाज़ के स्तंभ चौदह हैं : क्षमता होने पर खड़ा होना, तकबीर-ए-तहरीमा (नमाज की प्रथम तकबीर) कहना, सूरा फ़ातिहा पढ़ना, रुकू करना, रुकू के पश्चात सीधे खड़ा होना, सात अंगों पर सजदा करना [38], सजदे से उठना, दोनों सजदों के बीच बैठना [39], उपरोक्त समस्त कर्मों को इतमीनान से करना, अरकान (स्तंभों) को क्रमवार अदा करना[40], आख़िरी तशह्हुद तथा उसके लिए बैठना, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजना एवं दोनों सलाम। [38] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में "والسجود على سبعة الأعضاء" के शब्द आए हैं। [39] दूसरी हस्तलिखित प्रति में "والجلوس بين السجدتين" के शब्द आए हैं। [40] दूसरी हस्तलिख्त प्रति में "والموالاة" का शब्द ज्यादा है।
पहला स्तंभ : सक्षम होने पर खड़ा होना है और इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾नमाज़ों का, विशेष रूप से माध्यमिक नमाज़ (अस्र) का ध्यान रखो [41] तथा अल्लाह के लिए सविनय खड़े रहो﴿ [42] [41] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में "وقوموا للَّه قانتين" तक है और आयत का शेष भाग मौजूद नहीं है। [42] सूरा अल-बक़रा, आयत संख्या : 238
दूसरा स्तंभ [43] : नमाज़ आरंभ करने के लिए कही जाने वाली तकबीर है और इसकी दलील यह हदीस है [44] : "इसकी शुरूआत, तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहना है [45] और अंत, सलाम फेरना है।" [46] इसके बाद, दुआ-ए- इस्तिफ़ताह पढ़नी है, जो कि सुन्नत है [47]। इसके शब्द हैं : «سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُكَ، وَلاَ إِلَهَ غَيْرك» अर्थात : ऐ अल्लाह! तू पवित्र है, हम तेरी प्रशंशा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है और तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। [48] "سبحانك اللهم" : यानी ऐ अल्लाह! मैं तेरी ऐसी पवित्रता बयान करता हूँ, जो तेरी शान के अनुसार हो। [49] "وبحمدك" : यानी तेरी प्रशंसा करता हूँ। "وتبارك اسمك" : यानी तुझे याद करने से बरकत हासिल होती है। [50] "وتعالى جدك" : यानी तेरी शान और महिमा बहुत ऊँची है। [51] "ولا إله غيرك" : ऐ अल्लाह! धरती और आकाश में, तेरे सिवा कोई भी सत्य पूज्य नहीं है। [52] [43] "الثاني" का शब्द दूसरी हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [44] जामिया से प्रकाशित प्रति में "الحديث" है, जबकि शैख़ इब्ने बाज़ के सामने सिर्फ "حديث" पढ़ा गया और पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में "والدليل من الحديث قوله -صلى الله عليه و سلم-" के शब्द हैं। [45] "وتحليلها التسليم" के शब्द, पहली हस्तलिखित प्रति में नहीं हैं, जबकि दूसरी प्रति में "يحرمها التكبير، ويحللها التسليم" अर्थात, तकबीर से उसकी शुरूआत और सलाम फेरने पर उसका अंत होता है, के शब्द आए हैं। [46] इसे अबू दाऊद ने सुनन अबू दाऊद, किताबुस सलाह, अध्याय : इमाम ने अंतिम रकात के सजदे से सर उठाया और उसका वज़ू टूट गया, तो उसे क्या करना है? (हदीस क्रमांक : 618) में, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : अली -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : नमाज़ की चाभी, वज़ू है, उसकी शुरूआत तकबीर से होती है और अंत सलाम फेरने पर होता है। तिरमिज़ी ने इसे अबवाबुत तहारह अन रसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अध्याय : इस बात का बयान कि नमाज़ की चाबी तहारह है (हदीस क्रमांक : 3) में रिवायत करने के बाद कहा है कि यह हदीस, इस अध्याय की सबसे सहीह हदीस है। इब्ने माजा ने भी इसे किताबुत तहारह व सुननुहा, अध्याय : नमाज़ की चाबी तहारत है (हदीस क्रमांक : 275), इमाम शाफ़िई ने अपनी मुसनद 1/34, इब्ने अबू शैबा ने मुसन्नफ़ 1/208 (हदीस क्रमांक : 2378), इमाम अहमद ने मुसनद 2/292 (हदीस क्रमांक : 1006), दारक़ुतनी (1/360) और ज़िया अल-मक़दिसी ने अल-मुख़तारह (2/341) में अली -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत किया है। ज़िया अल-मक़दिसी कहते हैं कि इसकी सनद हसन है, मुसनद (2/292) के शोधकर्ता कहते हैं कि यह हदीस सहीह लि-ग़ैरिही है और अलबानी सहीह अबू दाऊद (1/102) (हदीस क्रमांक : 55) में कहते हैं : "इसकी सनद हसन सहीह है तथा इसे हाकिम, इब्ने सकन और इसी तरह हाफ़िज़ इब्ने हजर ने सहीह करार दिया है। जबकि नववी ने इसे हसन कहा है और ज़िया अल-मक़दिसी ने अपनी पुस्तक "अल-अहादीहसुल मख़तारह" में शामिल किया है।" [47] दूसरी हस्तलिखित प्रति में "قوله" का शब्द है। [48] इसे अबू दाऊद ने अपनी सुनन, किताबुस सलाह, अध्याय : नमाज़ के आरंभ में सुबहानका अल्लाहुम्मा व बिहमदिका वाली दुआ पढ़ना (क्रमांक : 775), तिरमिज़ी ने अपनी सुनन, किताबुस ललाह, अध्याय : नमाज़ आरंभ करते समय की दुआ (हदीस क्रमांक : 243) और इब्ने माजा ने अपनी सुनन, किताबुस सलाह, नमाज़ आरंभ करने का बयान (हदीस क्रमांक : 806) में, आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से रिवायत किया है और अलबानी ने सहीह अबू दाऊद (3/361) (हदीस क्रमांक : 748) में सहीह करार दिया है। इमाम मुस्लिम ने इसे अपनी सहीह की किताबुस सलाह, अध्याय : ज़ोर से बिस्मिल्लाह न कहने वालों का प्रमाण (हदीस क्रमांक : 399) में, उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- पर मौक़ूफ़ (सहाबी का कथन) के तौर पर, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : अब्दा कहते हैं कि उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- इन शब्दों को ऊँची आवाज़ में पढ़ा करते थे: «سُبْحَانَكَ اللهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، تَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُّكَ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ» [49] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में "بجلالك يا اللَّه" के शब्द आए हैं। [50] दूसरी हस्तलिखित प्रति में "وتبارك اسمك، وتعالى جدك: أي ارتفع قدرك، وعظم شأنك" अर्थात, तेरा सम्मान बुलंद और तेरी शान बहुत ऊँची है, के शब्द आए हैं। [51] पहली हस्तलिखित प्रति में "وتعالى جدُّك: ارتفع قدرك" के शब्द आए हैं। [52] दूसरी हस्तलिखित प्रति में "حق" का शब्द, "ب" के बिना ही आया है।
उसके बाद कहेगा : "أَعُوذُ بِالله مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ" यानी मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" [53] "أَعُوذُ" : का अर्थ: मैं पनाह माँगता हूँ, मैं शर्णागत होता हूँ, और ऐ अल्लाह! शैतान के मुक़ाबले में मैं तेरा सहारा लेता हूँ, के हैं। [54] "الرَّجِيمِ" : यानी धुतकारा हुआ और अल्लाह की रहमत से दूर किया हुआ [55], जो न मुझे मेरे धर्म के मामले मेें हानि पहुँचा सकता है और ना ही मेरी दुनिया के मामले में [56]। [53] दूसरी हस्तलिखित प्रति में "أعوذ باللَّه من الشيطان الرجيم، المطرود، المبعد من رحمة اللَّه" के शब्द आए हैं। [54] पहली हस्तलिखित प्रति में "من هذا الشيطان" अर्थात, इस शैतान से, के शब्द आए हैं। [55] पहली हस्तलिखित प्रति में "المبعد عن رحمتك" अर्थात जो तेरी रहमत से धुतकारा हुआ है, के शब्द हैं। [56] लेखक के कथन «معنى أعوذ: ألوذ» से «في دنياي» तक, दूसरी हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
और सूरा फ़तिहा को नमाज़ की हर रकात में पढ़ना नमाज़ का एक स्तंभ है, जैसा कि इस हदीस में है [57] : "जो सूरा फ़ातिहा नहीं पढ़ेगा, उसकी नमाज़ ही नहीं होगी।" [58] सूरा फ़ातिहा उम्मुल क़ुरआन, अर्थात क़ुरआन की माँ है। [57] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में और जामिया से प्रकाशित प्रति में भी, «كما في الحديث» के शब्द आए हैं। [58] इसे इमाम बुखारी ने सहीह बुख़ारी, किताबुल अज़ान, अध्याय : इमाम और मुक़तदी (इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने वाला) दोनों के लिए सूरा फ़ातिहा पढ़ने की अनिवार्यता (हदीस क्रमांक : 756) और इमाम मुस्लिम ने सहीह मुस्लिम, किताबुस सलाह, अध्याय : हर रकात में सूरा फ़ातिहा पढ़ने की अनिवार्यता तथा जो सूरा फ़ातिहा अच्छी तरह न पढ़ सके और सीखना भी संभव न हो, वह उसके सिवा जो पढ़ सकता हो, पढ़े, (हदीस क्रमांक : 394) में रिवायत किया है।
फिर ﴾बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रहीम﴿ [59] पढ़े, जो कि बरकत और मदद हासिल करने का साधन है। [59] शैख़ के सामने पढ़ने वाले की प्रति और पहली हस्तलिखित प्रति में सिर्फ «بسم اللَّه الرحمن الرحيم» है। जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «قوله: بسم اللَّه الرحمن الرحيم» है।
﴾الحَمْدُ لله﴿ अल-हम्दु का अर्थ है : प्रशंसा और स्तुति। उसपर जो अलिफ़ और लाम हैं, वह हर प्रकार की और सारी प्रशंसाओं को समेटने के लिए हैं। वैसे तो मद्ह के मायने भी प्रशंसा के हैं, मगर ध्यान में रखने की बात यह है कि सुंदरता आदि ऐसे गुण, जिनपर आदमी का अपना कोई अमल-दख़ल न हो, उनके आधार पर होने वाली प्रशंसा [60] को मद्ह कहते हैं, हम्द नहीं। [60] «به» का शब्द दूसरी हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
﴾رَبِّ العَالمَينَ﴿ रब [61] का अर्थ है : सत्य पूज्य, रचयिता, आजीविका प्रदान करने वाला [62], स्वामी, संचालक और सभी सृष्टियों का नेमतों के द्वारा प्रतिपालन करने वाला। [63] [61] «هو» का शब्द पहली हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [62] «الخالق، الرازق» पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में नहीं है। [63] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में है : «مربي جميع العالمين بالنعم»
﴾العَالمَينَ﴿ अल्लाह के अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह आलम (दुनिया) है और अल्लाह तआला ही सबका पालनहार है।
﴾الرَّحْمـَنِ﴿ शब्द में रहमत (करूणा) का जो अर्थ पाया जाता है, वह सम्पूर्ण सृष्टियों के लिए [64] व्याप्त है। [64] जामिया से प्रकाशित प्रति, दूसरी हस्तलिखित प्रति और शैख़ इब्ने बाज़ के सामने पढ़ी जाने वाली प्रति में भी «جميع المخلوقات» है, लेकिन पहली हस्तलिखित प्रति में «لجميع المخلوقات» है।
﴾الرَّحِيمِ﴿ शब्द में करूणा का जो अर्थ पाया जाता है, वह केवल मोमिनों के साथ खास है। इसकी दलील, अल्लाह तआला की यह मधुर वाणी: ﴾وَكَانَ بِالْمُؤْمِنِينَ رَحِيمًا﴿ है, अर्थात अल्लाह तआला मोमिनों पर अति करूणामयी है। [65] [65] सूरा अल-अह़ज़ाब, आयत संख्या : 43
﴾مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ﴿ में يَوْمِ الدِّينِ का अर्थ प्रतिफल और हिसाब-किताब का दिन है, जिस दिन [66] हर शख्स को उसके कर्मों का प्रतिफल दिया जाएगा। चुनांचे अगर अच्छा कर्म किया होगा तो अच्छा और अगर बुरा कर्म किया होगा तो बुरा प्रतिफल दिया जाएगा। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह कथन है : ﴾और तुम क्या जानो कि बदले का दिन क्या है? फिर तुम क्या जानो कि बदले का दिन क्या है? [67] जिस दिन किसी का किसी के लिए कोई अधिकार नहीं होगा, और उस दिन सारे अधिकार अल्लाह के हाथ में होंगे।﴿ [68] अल्लाह के रसूल की यह हदीस भी इसकी दलील है : "बुद्धिमान वह है, जो खुद अपनी समीक्षा करे और मौत के बाद वाले जीवन की तैयारी करे [69] तथा बुद्धिहीन वह है, जो खुद को आकांक्षाओं के पीछे लगाए रखे और अल्लाह से बड़ी-बड़ी उम्मीदें भी बाँधे।" [70] [68] सूरा अल-इनफ़ितार, आयत संख्या : 17-19 [67] दूसरी हस्तलिखित प्रति में पूरी आयत नकल नहीं की गई है, बस الآية लिख दिया गया है। [66] «يوم» का शब्द पहली हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [69] दूसरी हस्तलिखित प्रति में पूरी हदीस नकल नहीं की गई है, बस «إلى آخره» लिख दिया गया है। [70] तिरमिज़ी, किताब सिफ़तुल क़यामह वर-रक़ाइक़,अध्याय क्रमांक : 25, हदीस क्रमांक : 2459; इब्ने माजा : किताबुज़ ज़ुह्द, अध्याय : मौत की याद और उसकी तैयारी, हदीस क्रमांक : 4260; मुसनद अहमद 28/350, हदीस क्रमांक : 17123 और मुसतदरक हाकिम 1/57। इन सारे मुुहद्दिसों ने इसे शद्दाद बिन औस -रज़ियल्लाहु अनहु- से रिवायत किया है और हाकिम ने सहीह तथा तिरमिज़ी ने इसे हसन क़रार दिया है एवं इमाम इब्ने तैमिय्या ने इसे प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत किया है और "मजमूउल फ़तावा" (8/285) में यह कहते हुए इमाम तिरमिज़ी के उसे हसन करार देने से अपनी सहमति व्यक्त की है : "इसे इब्ने माजा और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है और तिरमिज़ी ने कहा है कि यह हदीस हसन है।"
﴾إِيَّاكَ نَعْبُدُ﴿ अर्थात : हम तेरे सिवा किसी की इबादत नहीं करते। यह एक प्रतिज्ञा है बंदे और उसके रब के बीच कि वह उसके सिवा किसी की इबादत कदापि नहीं करेगा। [71] [71] पहली हस्तलिखित प्रति में «أن لا يعبد أحداً سواه» के शब्द हैं, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «أن لا يستعين أحداً غيره» अर्थात वह अल्लाह के सिवा किसी से भी मदद तलब नहीं करेगा, के शब्द हैं।
﴾وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ﴿ यह भी बंदा और उसके रब के बीच एक प्रतिज्ञा है [72] कि बंदा, अल्लाह के सिवा किसी से भी मदद का प्रार्थी नहीं होगा। [72] पहली हस्तलिखित प्रति में «عهد بين العبد وربه» है, और दूसरी हस्तलिखित प्रति में «عهد بين العبد وبين اللَّه أن لا يستعين أحداً غيره» के शब्द आए हैं।
﴾اهْدِنَا الصِّرَاطَ المُسْتَقِيمَ﴿ में ﴾اهْدِنَا﴿ का अर्थ है : हमें रास्ता दिखा, हमारा मार्गदर्शन कर और हमें उसपर अटल रख [73]। ﴾الصِّرَاط﴿ से मुराद इस्लाम धर्म है। जबकि कुछ लोगों के अनुसार इससे अभिप्राय रसूल हैं [74] और कुछ लोगों के अनुसार क़ुरआन मुराद है। वैसे सारे ही अर्थ सही हैं। ﴾المُسْتَقِيَم﴿ के मायने उस रास्ते के हैं, जिसमें ज़रा भी टेढ़ापन ना हो। [73] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «اهدنا: دلنا، وأرشدنا، وثبتنا» के शब्द नहीं हैं। [74] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «والصراط، قيل الرسول، وقيل الإسلام، وقيل القرآن» के शब्द आए हैं।
﴾صِرَاطَ الذِّينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ﴿ में सिरात से मुराद उन लोगों का रास्ता है जिनपर अल्लाह तआला का उपकार हुआ है। इसकी दलील [75] अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾तथा जो अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करेंगे, वही (स्वर्ग में) उनके साथ होंगे, जिनपर अल्लाह ने पुरस्कार किया है, अर्थात नबियों, सत्यवादियों, शहीदों और सदाचारियों के साथ और वे निस्संदेह सबसे अच्छे साथी हैं।﴿ [76] [75] लेखक के कथन «والدليل» से लेकर «غير المغضوب عليهم، و» तक, दूसरी हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [76] सूरा अन-निसा, आयत संख्या : 69
﴾غَيْرِ المَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ﴿ में 'मग़ज़ूब' से मुराद यहूदी हैं जिन्होंने ज्ञान रखने के बावजूद उसपर अमल नहीं किया [77]। आप अल्लाह से प्रार्थना करें कि वह आपको उनके रास्ते पर चलने से बचाए। [77] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «ولا عملوا به» के शब्द आए हैं।
﴾وَلاَ الضَّالِّينَ﴿ 'ज़ाल्लीन' से मुराद, ईसाई हैं जो अल्लाह की इबादत तो करते हैं मगर अज्ञानता एवं पथभ्रष्ठता के साथ [78]। आप अल्लाह तआला से दुआ करें कि वह आपको उनके रास्ते पर चलने से बचाए। 'ज़ाल्लीन' की दलील अल्लाह तआला का यह कथन है : {आप उनसे कहिए कि क्या हम तुम्हें कर्मों के लिहाज से सबसे ज्यादा घाटा उठाने वालों के बारे में बता दें? यह वह हैं, जिनके सांसारिक जीवन [79] के सभी प्रयास व्यर्थ हो गए, परन्तु वे समझते रहे कि वे अच्छे कर्म कर रहे हैं। [80] [81] अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की यह हदीस [82] भी इसकी दलील है : «तुम लोग अपने से पहले के समुदायों के रास्तों पर बिल्कुल वैसे ही चलोगे, जैसे तीर का एक पर दूसरे पर के बराबर होता है। यहाँ तक कि अगर वे सांडे के बिल में घुसे थे, तो तुम भी उसमें घुसोगे। सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आपका आशय यहूदी तथा ईसाई हैं? तो आपने फरमाया : उनके अलावा और कौन होंगे?» इस हदीस को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। [83] [78] दूसरी हस्तलिखित प्रति में शब्द «اللَّه» छूटा हुआ है। [79] दूसरी हस्तलिखित प्रति में उन्होंने संक्षिप्त करते हुए इस प्रकार कहा है : «الَّذِينَ ضَلَّ سَعْيُهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا» الآية. إلى قوله: «فَلَا نُقِيمُ لَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَزْنًا». [80] सूरा अल-कहफ़, आयत संख्या : 103 -104 [81] जामिया से प्रकाशित प्रति और पहली हस्तलिखित प्रति में यह आयत ज्यादा है : ﴾أُولَئِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِ رَبِّهِمْ وَلِقَائِهِ فَحَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَلَا نُقِيمُ لَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَزْنًا﴿ (अल-कहफ़- 105)। जबकि हमने जो दर्ज किया है, वह शैख़ के सामने पढ़ी गई प्रति से लिया गया है। [82] पहली हस्तलिखित प्रति में है : «وفي الحديث عن النبي-صلى الله عليه وسلم- أنه قال», जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में है : «وفي الحديث عنه -صلى الله عليه وسلم-» [83] बुख़ारी, किताबुल ऐतिसाम, अध्याय : नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का कथन : तुम लोग अपने से पहले के समुदायों के पदचिह्नों पर चलोगे, हदीस क्रमांक : 7320 और मुस्लिम, किताबुल इल्म, हदीस क्रमांक : 2669। मुस्लिम के शब्द इस प्रकार हैं : अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तुम लोग अपने से पहले के समुदायों के रास्तों पर कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाकर चलोगे, यहाँ तक कि यदि वे सांडे के बिल में घुसे थे, तो तुम भी उसमें घुसोगे। हमने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या आपका आशय यहूदी तथा ईसाई हैं? तो आपने फरमायाः फिर और कौन?" तथा मुसनद अहमद 18/322, हदीस क्रमांक : 11800। मुसनद (18/322) के शोधकर्ताओं और अलबानी ने भी "सिलसिलतुल अहादीस अस- सहीहा" (6/999) में उसकी सनद को सहीह करार दिया है।
तथा दूसरी हदीस [84] में है : «यहूदी 71 सम्प्रदायों में विभाजित हो गए और ईसाई 72 मतावलंबियों में, लेकिन यह उम्मत 73 सम्प्रदायों में विभाजित हो जाएगी। एक को छोड़ कर सभी सम्प्रदाय जहन्नम में जाएँगे। इसपर सहाबा ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! वह [85] एक सम्प्रदाय कौन है? आपने फ़रमायाः जो उस तरीके पर कायम रहेगा, जिसपर मैं [86] और मेरे सहाबा हैं [87]। [84] पहली हस्तलिखित प्रति में «الحديث الثاني» बिना و (वाव) के है। [85] पहली हस्तलिखित प्रति में «قلنا: يا رسول اللَّه من هي» है, जिसमें शब्दों को आगे-पीछे किया गया है। [86] पहली हस्तलिखित प्रति में «من كان مثل ما أنا عليه اليوم وأصحابي» है, जबकि दूसरी में «من كان على مثل ما أنا عليه وأصحابي اليوم» है। [87] इसे इब्ने माजा ने अपनी सुनन, किताबुल फ़ितन, अध्याय : समुदायों के टोलियों में बटने का बयान (हदीस क्रमांक : 3992) में, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : औफ़ बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: "यहूदी, 71 दलों में विभाजित हो गए। उनमें से केवल एक दल जन्नत में जाएगा और बाकी 70 जहन्नम में। ईसाई, 72 दलों में विभक्त हो गए। उनमें से 71 दल जहन्नम में जाएंगे और सिर्फ एक दल जन्नत में। लेकिन क़सम है उसकी जिसके हाथ में मुहम्मद की जान है! मेरी उम्मत 73 दल में विभाजित हो जाएगी, जिनमें से केवल एक दल जन्नत में जाएगा और बाकी 72 समुदाय जहन्नम में।" पूछा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! वह लोग कौन होंगे? फ़रमाया: "वह जमात के रूप में होंगे।" तिरमिज़ी ने इसकी समरूपक एक हदीस, अपनी सुनन में हदीस क्रमांक : 2641 के तहत, इन शब्दों में रिवायत की है : अब्दुल्लाह बिन अम्र -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मेरी उम्मत पर एक समय ऐसा भी आएगा, जब वे बनू इस्राईल के कदम से कदम मिलाकर चलेंगे, यहाँ तक कि अगर उनमें से किसी ने अपनी माँ के साथ खुल्लम-खुल्ला दुष्कर्म किया होगा, तो मेरी उम्मत का भी कोई न कोई व्यक्ति ऐसा करेगा। बनू इस्राईल 72 दलों में बट गए थे, लेकिन मेरी उम्मत 73 दलों में बट जाएगी। उनमें से एक को छोड़कर सारे दल जहन्नम में जाएंगे।" लोगों ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! वह कौन सा दल होगा? फ़रमाया: "जिसपर मैं और मेरे सहाबा हैं, उसी पर चलने वाला दल।" इसकी दूसरी समरूपक रिवायत, अबू दाऊद में अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- से, 4596 क्रमांक के तहत, इन शब्दों में वर्णित है : "यहूदी 71 और ईसाई 72 दलों में बट गए, लेकिन मेरी उम्मत 73 दलों में बट जाएगी।" यही रिवायत, तिरमिज़ी में 2640 और इब्ने माजा में 3991 क्रमांक के तहत वर्णित है, और अलबानी ने "मिशकातुल मसाबीह" (दूसरा शोध) में क्रमांक 171, "अस्-सिलसिलतुस सहीहा" में क्रमांक : 1348 और सहीह इब्ने माजा में क्रमांक 3982 के तहत, इसे हसन क़रार दिया है।
उसके बाद के स्तंभ हैं : रुकू, उससे उठना, सात अंगों पर सजदा करना, उसको सही ढंग से करना और दो सजदों के बीच बैठना। इनकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾ऐ वह लोगो, जो ईमान लाए हो! रुकू और सजदा करो।﴿ [88] [89] और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की यह हदीस [90] भी : "मुझे सात हड्डियों पर सजदा करने का आदेश दिया गया है।" [91] [92] तथा इतमीनान [93] के साथ नमाज़ के सभी कार्यों [94] को अदा करना और सभी स्तंभों को क्रमवार अदा करना। इसकी दलील, अबू हुरैरा से वर्णित वह हदीस है, जिसमें एक ऐसे व्यक्ति की बात है, जो अच्छी तरह नमाज़ नहीं पढ़ रहा था। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं : हम अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास बैठे हुए थे कि उसी दौरान एक आदमी [95] मस्जिद में दाख़िल हुआ और नमाज़ पढ़ी। [फिर उठा] [96] और आकर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को सलाम किया तो आपने फ़रमाया [97] : "जाओ और दोबारा नमाज़ पढ़ो, क्योंकि तुमने नमाज़ पढ़ी ही नहीं।" उसने ऐसा तीन बार किया और फिर [98] कहने लगा कि क़सम है उस हस्ती की, जिसने आपको हक के साथ नबी बनाकर भेजा है, इससे अधिक अच्छी तरह से मुझे नमाज़ पढ़ना नहीं आता [99], इसलिए आप ही मुझे सिखा दें। इसपर, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया [100] : "जब तुम नमाज़ के लिए खड़े हो तो तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहो और क़ुरआन में से जो कुछ तुम्हें याद हो पढ़ो। फिर रुकू करो, यहाँ तक कि स्थिर हो जाओ, फिर रुकू से उठकर इतनी देर खड़े रहो कि सामान्य [101] अवस्था में आ जाओ, फिर सजदा करो और इतनी देर सजदे में रहो कि स्थिर हो जाओ, फिर सजदे से उठकर इतनी देर बैठो किस्थिर हो जाओ, फिर ऐसा ही अपनी पूरी नमाज़ में करो।" [102] अंतिम तशह्हुद भी, नमाज़ का एक फ़र्ज़ स्तंभ है [103], जैसा कि अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित हदीस में आया है, वह कहते हैं कि तशह्हुद पढ़ना फ़र्ज़ होने से पहले हम लोग यह दुआ पढ़ते थे : السَّلاَمُ عَلَى الله مِنْ عِبَادِهِ، السَّلاَمُ عَلَى" جِبْرِيلَ، وَمِيكَائِيلَ" (अल्लाह तआला पर उसके बंदों की तरफ से शांति अवतरित हो, जिब्रील और मीकाईल पर शांति का अवतरण हो।) इसपर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया [104] : "तुम लोग ऐसा मत कहो कि अल्लाह तआला पर उसके बंदों की तरफ से शांति अवतरित हो [105], क्योंकि अल्लाह तआला स्वयं अस-सलाम, अर्थात शांति देने वाला [106] है, बल्कि उसकी जगह पर यह दुआ पढ़ा करो : "التَّحِيَّاتُ لله[107] وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِبَاتُ، السَّلاَمُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ الله وَبَرَكَاتُهُ، السَّلاَمُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ الله الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَن لاَ إِلَهَ إِلاَّ الله، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ ورَسُولُهُ" अर्थात : हर प्रकार का आदर-सत्कार, समस्त दुआएं और सब पवित्र बातें अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपपर शांति हो और आपपर अल्लाह की तरफ से रहमतें और बरकतें अवतरित हों। हमपर और अल्लाह के नेक बंदों पर भी, शांति की धारा बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद, अल्लाह के बंदे और रसूल हैं। [108] "التَّحِيَّات" : यानी अल्लाह [109] हर प्रकार के सम्मान का स्वामी और अधिकारी है। जैसे उसके सामने झुकना, रुकू करना [110], उसे सजदा करना, यह मानना कि बस वही अनश्वर है, हमेशगी बस उसी को हासिल है और वह सभी [111] आदर और सम्मान जो तमाम जहानों के पालनहार के लिए हो सकते हैं, वह सब अल्लाह के लिए हैं। जो भी उनमें से कोई भी सम्मान और आदर, अल्लाह के सिवा किसी और को देगा, वह मुश्रिक (बहुदेववादी) और काफ़िर समझा जाएगा [112]। "وَالصَّلَوَاتُ" : यानी सारी सारी दुआएँ। कुछ लोगों के अनुसार इससे मुराद पाँच नमाज़ें हैं। "[113]وَالطَّيِّبَاتُ لله" : अल्लाह पाक है और उसी कथन और कर्म को ग्रहण करता है, जो पाक हो। "[114] السَّلاَمُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيّ وَرَحْمَةُ الله وَبَرَكَاتُهُ" : इन शब्दों के द्वारा, आप अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के लिए शांति, रहमत [115] और बरकत [116] की दुआ करते हैं, और जिसके लिए दुआ की जाए, उसे अल्लाह के साथ पुकारा नहीं जाता। "السلام [117] علينا وعلى عباد الله الصالحين" : इन शब्दों के द्वारा आप अपने लिए और आकाश एवं धरती के [118] हर नेक बंदे के लिए सुरक्षा एवं शांति की प्रार्थना और कामना करते हैं। सलाम एक दुआ है और नेक बंदों के लिए दुआ की जाती है, अल्लाह के साथ-साथ उनको भी पुकारा नहीं जाता। "[120] أشهد أن لا اله الا الله وحده [119] لا شريك له" : इन शब्दों के ज़रिए आप पुख़्ता और यक़ीनी गवाही देते हैं कि धरती [121] और आकाश में पूजे जाने का हकदार अल्लाह के सिवा कोई भी नहीं है। इस बात की गवाही देने ही से कि मुहम्मद, अल्लाह के रसूल हैं, स्पष्ट हो जाता है कि वे [122] एक बंदे हैं और बंदे को पूजा नहीं जाता और रसूल को झुठलाया नहीं जाता, बल्कि उनकी आज्ञा का पालन और उनका अनुसरण किया जाता है, अल्लाह तआला ने उन्हें बंदा होने के सम्मान से सम्मानित किया है। इसकी दलील, अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : ﴾अत्यन्त शुभ है वह अल्लाह जिसने अपने उपासक [123] पर फुरक़ान (क़ुरआन) अवतरित किया, ताकि वह सारे संसार के लिए सतर्क करने वाला बन जाए।﴿ [124] "اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، [وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ][125]، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ [وعلى آل إبراهيم][126] إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ[127]" (ऐ अल्लाह! मुहम्मद और उनके परिवारजनों की प्रशंसा कर, जैसा कि तूने इबराहीम और उनके परिवारजनों की प्रशंसा की है। निस्संदेह, तू प्रशंसा को पसंद करने वाला, सर्वसम्मानित है।) "الصَّلاَةُ" : यह शब्द जब अल्लाह तआला की तरफ से बोला जाए, तो इसका अर्थ होता है : उच्चतम कोटि के फ़रिश्तों के सामने, अपने बंदे की प्रशंसा करना [128], जैसा कि इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में अबुल आलिया के हवाले से नकल किया है कि उन्होंने कहा : अल्लाह की तरफ से सलात का अर्थ है उच्चतम कोटि के फ़रिश्तों के सामने अपने बंदे की प्रशंसा करना [129] [130]। वैसे, इस शब्द का अर्थ रहमत भी बताया गया है, लेकिन पहला अर्थ ही सही है। यह शब्द जब फ़रिश्तों की तरफ से बोला जाए, तो उसका अर्थ, क्षमायाचना और जब मानव की तरफ से बोला जाए, तो उसका अर्थ दुआ होगा। "وَبَارِكْ" : यह और इसके बाद के भाग कथनी और करनी की सुन्नतें हैं। [131] [101] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «تطمئن قائماً» के शब्द आए हैं। [93] पहली हस्तलिखित प्रति में «والترتيب كل ركن قبل الآخر، والطمأنينة في جميع الأركان» है, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «والترتيب بين الأركان كل ركن قبل الآخر، والطمأنينة في جميع الأركان» है। [94] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «والطمأنينة في جميع الأركان» के शब्द हैं। [95] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «إذ دخل علينا رجل فصلى» के शब्द हैं। [96] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों तथा जामिया से प्रकाशित प्रति में «فقام» का शब्द ज़्यादा है। यह शब्द शैख़ के सामने पढ़ी जाने वाली प्रति में नहीं है। [97] पहली हस्तलिखित प्रति में «صلِّ فإنك لم تصلِّ» है, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «ارجع فصلِّ فإنك لم تصل» है। [98] पहली हस्तलिखित प्रति में «فقال: والذي بعثك بالحق» के शब्द आए हैं। [99] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «... لا أحسن غيرَهُ» के शब्द आए हैं। [100] पहली हस्तलिखित प्रति में «قال: إذا قمت إلى الصلاة» और दूसरी हस्तलिखित प्रति में «فقال النبي -صلى الله عليه وسلم-: إذا قمت إلى الصلاة» के शब्द आए हैं। [88] सूरा अल-हज, आयत संख्या : 77 [89] दूसरी हस्तलिखित प्रति में इन शब्दों का इज़ाफ़ा है : "واعبدوا ربكم وافعلوا الخير لعلكم تفلحون" अर्थात तुम लोग अपने पालनहार की इबादत करो और नेकी के काम करो, ताकि सफल हो सको। [90] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «وفي الحديث عنه -صلى الله عليه وسلم-» के शब्द आए हैं। [91] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «على سبعة الأعظم» के शब्द हैं। [92] बुख़ारी, किताबुल अज़ान, अध्याय : सात हड्डियों पर सजदा करने का बयान, हदीस क्रमांक : 810 और मुस्लिम, किताबुस सलाह, अध्याय : सजदा करने के अंग एवं नमाज़ की हालत में कपड़ा और बाल समेटने तथा बालों की चोटी बनाने की मनाही का बयान, हदीस क्रमांक : 490। मुस्लिम के शब्द इस प्रकार हैं : अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है, वे कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें सात हड्डियों पर सजदा करने और नमाज़ की हालत में कपड़ा और बाल ना समेटने का आदेश दिया है। [102] बुखारी, हदीस क्रमांक : 6251, अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित और मुस्लिम, हदीस क्रमांक : 397। इसका पूर्ण संदर्भ पहले गुज़र चुका है। [103] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «مفروض» का शब्द नहीं है। [104] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «فقال -صلى الله عليه وسلم- » के शब्द आए हैं। [105] जामिया से प्रकाशित प्रति में «عن عباده» के शब्द हैं। शायद यह छपाई की गलती है। [106] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «لا تقولوا: السلام على اللَّه من عباده ولكن قولوا: التحيات للَّه» के शब्द हैं। [107] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «والصلوات، والطيبات» से लेकर «وأن محمداً عبده ورسوله» तक के शब्द ग़ायब हैं। [108] इसे बुख़ारी ने किताबुल अज़ान, अध्याय : तशह्हुद के बाद ऐच्छिक रूप से पढ़ी जाने वाली वह दुआएं जो वाजिब नहीं हैं, में, हदीस क्रमांक : 835 के तहत, इन शब्दों के साथ रिवायत किया है : अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि हम लोग जब अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ नमाज़ में होते थे, तो यह दुआ पढ़ते थे : السَّلاَمُ عَلَى اللَّهِ مِنْ عِبَادِهِ، السَّلاَمُ عَلَى" فُلاَنٍ وَفُلاَنٍ" (अर्थात: अल्लाह तआला पर उसके बंदों की तरफ से शांति अवतरित हो, अमुक और अमुक पर शांति बरसे।) इसपर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया कि तुम लोग ऐसा मत कहो कि अल्लाह तआला पर उसके बंदों की तरफ से शांति अवतरित हो, क्योंकि अल्लाह तआला स्वयं सलाम अर्थात शांति देने वाला है। बल्कि उसकी जगह पर यह दुआ पढ़ा करो : التَّحِيَّاتُ لله وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِبَاتُ، السَّلاَمُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ" وَرَحْمَةُ الله وَبَرَكَاتُهُ، السَّلاَمُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ الله الصَّالِحِينَ", (अर्थात: हर प्रकार का आदर-सत्कार, दुआएं और पवित्र बातें अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आपपर अल्लाह की तरफ से शांति, रहमतें और बरकतें अवतरित हों। हमपर और अल्लाह के नेक बंदों पर भी, शांति की बारिश हो।) जब तुम ऐसा कहोगे तो यह दुआ हर उस बंदे तक पहुँचेगी, जो आसमान में या आसमान और ज़मीन के बीच है। उसके बाद, أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ" وَرَسُولُهُ" पढ़ा करो, फिर जो दुआ पसंद आए, उसे पढ़कर दुआ माँगो।" इमाम मुस्लिम ने इसे किताबुस सलाह, अध्याय : नमाज़ में तशह्हुद का बयान, हदीस क्रमांक :402 के तहत, अब्दुल्लाह बिन मसऊद ही से इन शब्दों के साथ नकल किया है : वे कहते हैं कि हम लोग, अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पीछे नमाज़ पढ़ते हुए कहा करते थे : السَّلَامُ عَلَى اللَّهِ، السَّلَامُ" عَلَى فُلَانٍ" (अल्लाह तआला पर शांति नाज़िल हो, अमुक पर शांति नाज़िल हो।) एक दिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमसे कहा कि अल्लाह तआलास्वयं सलाम अर्थात शांति देने वाला है है। इसलिए, जब तुममें से कोई, नमाज़ में बैठे, तो यह दुआ पढ़े : التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ، وَالصَّلَوَاتُ، وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا" النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ" जब तुम ऐसा कहोगे तो यह दुआ हर उस बंदे तक पहुँचेगी, जो आसमान और ज़मीन में है। उसके बाद, أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ" وَرَسُولُهُ" पढ़ा करो, फिर जो दुआ माँगनी है, माँगो।" [109] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «للَّه» का शब्द नहीं है। [110] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «والخضوع، والركوع، والسجود» के शब्द आए हैं। [111] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «كل جميع ما يعظم به رب العالمين» के शब्द आए हैं। [112] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «كافر» का शब्द नहीं है। [113] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «للَّه» का शब्द नहीं है। [114] पहली हस्तलिखित प्रति में «من الأعمال والأقوال إلا أطيبها» जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «من الأعمال والأقوال والأفعال إلا طيبها» है। [115] «الرحمة» का शब्द पहली हस्तलिखित प्रति में नहीं है। [116] पहली हस्तलिखित प्रति में «ورفع الدرجات» और दूसरी हस्तलिखित प्रति में «ورفع الدرجة» है, जो البركة पर इज़ाफ़ा है। [117] जामिया संस्करण में و (वाव) के इज़ाफ़े साथ «والسلام علينا» है। [118] पहली और दूसरी प्रतियों में «من أهل السماء والأرض» के शब्द आए हैं। [119] «وحده لا شريك له» के शब्द ना पहली हस्तलिखित प्रति में है और ना ही दूसरी में। [120] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रति में तथा जामिया मुद्रित संस्करण में «وأشهد أن محمداً عبده رسوله» के शब्द ज़्यादा हैं। [121] पहली हस्तलिखित प्रति में «أن لا يعبد في السماء، ولا في الأرض» के शब्द हैं, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «أن لا يعبد في السماء والأرض» है। [122] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «وشهادة أن محمداً عبده، ورسوله عبد لا يعبد» के शब्द आए हैं। [123] दूसरी हस्तलिखित प्रति में पूरी आयत नहीं लिखी गई है, बल्कि केवल «تبارك الذي نزل الفرقان على عبده» तक लिखने के बाद "الآية" लिख दिया गया है। [124] सूरा अल-फ़ुरक़ान, आयत संख्या :10 [125] शैख़ इब्ने बाज़ के सामने पढ़ी जाने वाली प्रति में «وعلى آل محمد» के शब्द नहीं हैं। यह शब्द, जामिया मुद्रित संस्करण और पहली एवं दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में हैं। [126] पहली हस्तलिखित प्रति में «كما صليت على آل إبراهيم», दूसरी में «كما صليت على إبراهيم، وعلى آل إبراهيم» और जामिया मुद्रित संस्करण एवं शैख़ के सामने पढ़ी जाने वाली प्रति में «كما صليت على إبراهيم» है। [127] बुख़ारी, किताबु अहादीसिल अंबिया, अध्याय : 10, हदीस क्रमांक : 3370 और मुस्लिम, किताबुस सलाह, अध्याय : तशह्हुद के बाद नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद पढ़ने का बयान, हदीस क्रमांक : 406। सहीह मुस्लिम के शब्द इस प्रकार हैं : काब बिन उजरा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह ने हमें आप तथा आपके परिवार पर सलाम भेजने का तरीक़ा तो सिखा दिया है, अब यह बताएँ कि हम आप तथा आपके परिवार पर दरूद कैसे भेजें? इसपर आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : तुम लोग यह दरूद पढ़ा करो : اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ،" وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ، وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ" (अर्थात: ऐ अल्लाह! तू मुहम्मद एवं मुहम्मद के परिवारजनों की प्रशंसा कर, जैसा कि तूने इबराहीम और उनके परिवारजनों की प्रशंसा की थी। बेशक तू प्रशंसा पसंद करने वाला और अति सम्मानित है। ऐ अल्लाह! तू मुहम्मद और मुहम्मद के परिवारजनों पर बरकत अवतरित कर, जैसा कि तूने इबराहीम और इबराहीम के परिवारजनों पर बरकत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा पसंद करने वाला और अति सम्मानित है।) [128] पहली हस्तलिखित प्रति में «ثناءٌ على عبده في الملأ الأعلى» के शब्द हैं, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति और जामिया मुद्रित संस्करण में «ثناؤه على عبده» के शब्द हैं। [129] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «عن أبي العالية: ثناء اللَّه على عبده في الملأ الأعلى» के शब्द हैं। [130] बुखारी, किताबुत-तफ़सीर, अध्याय : अल्लाह तआला का कथन : إِنَّ اللَّهَ وَمَلاَئِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا, क्रमांक : 4797 से पहले। शब्द यह हैं : अबुल आलिया कहते हैं कि "صَلاَةُ اللَّهِ: ثَنَاؤُهُ عَلَيْهِ عِنْدَ المَلاَئِكَةِ، وَصَلاَةُ المَلاَئِكَةِ الدُّعَاءُ" अल्लाह की ओर से सलात का मतलब ,अल्लाह का फ़रिश्तों के सामने, उनकी (अर्थात नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की) प्रशंसा करना है और फ़रिश्तों की सलात का मतलब, दुआ है। [131] पहली हस्तलिखित प्रति में «وما بعدها من الدعاء» के शब्द हैं।
नमाज़ की वाजिब (अनिवार्य कार्य) आठ हैं : तकबीर-ए-तहरीमा (पहली बार अल्लाहु अकबर कहकर नमाज़ शुरू करना) के सिवा सारी तकबीरें,रुकू में سبحان ربي العظيم कहना, इमाम तथा अकेले नमाज़ पढ़ने वाला का سمع الله لمن حمده कहना, तथा सभी का ربنا ولك الحمد कहना, रुकू में سبحان ربي العظيم कहना, सजदे में سبحان ربي الأعلى कहना, दोनें सजदों के बीच رب اغفر لي कहना, प्रथम तशह्हुद पढ़ना और उसके लिए बैठना।
याद रहे कि अरकान (स्तंभों) [132] में से कोई अगर, भूले से या जानते-बूझते छूट जाए तो नमाज़ व्यर्थ हो जाएगी, और अगर अनिवार्य कार्यों में से किसी को जान बूझकर छोड़ दिया जाए तो नमाज़, व्यर्थ हो जाएगी और अगर भूले से छूट जाए तो सजदा सह्व अर्थात भूल जाने का सजदा करना होगा। [133] और अल्लाह ही बेहतर जानने वाला हैl [अल्लाह की असीम कृपा एवं शान्ति हो हमारे संदेष्टा मुह़म्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-, आपके परिजनों और साथियों पर।] [134] [132] दूसरी हस्तलिखित प्रति में «والأركان» का शब्द आया है। [133] पहली और दूसरी हस्तलिखित प्रतियों में «والواجبات ما سقط منها سهواً، جبره سجود السهو، وعمداً بطلت الصلاة» है, जबकि दूसरी हस्तलिखित प्रति में «بتركه» का शब्द ज्यादा है। [134] दो कोष्ठकों के बीच में जो है, वह दूसरी हस्तलिखित प्रति में अधिक है।