المختصر المفيد للمؤذن والإمام والخطيب وأحكام المساجد

المختصر المفيد للمؤذن والإمام والخطيب وأحكام المساجد

كتاب "المختصر المفيد للمؤذن والإمام والخطيب وأحكام المساجد" يتناول مسؤوليات المؤذن والإمام والخطيب وأحكام الأذان والإقامة وصلاة الجمعة وأحكام المساجد. يوضح الكتاب تعريف الأذان والإقامة وحكمهما وفضلهما، كما يبين الصفات المطلوبة في المؤذن والشروط اللازمة لصحة الأذان والإقامة. بالإضافة إلى ذلك يستعرض الكتاب أحكام الإمامة، ومشروعيتها وفضلها، وشروط وصفات الإمام، مع التركيز على أهمية العلم والخلق في من يتولى هذه الوظيفة الشرعية.

Language: lang_hi
Prepared by: अध्ययन समिति, अंतर्गत बहुभाषी इस्लामी सामग्री सेवा संगठन
Version: 2.1
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मुअज़्ज़िन, इमाम, ख़तीब तथा मस्जिदों से संबंधित आदेशों एवं निर्देशों पर आधारित एक संक्षिप्त उपयोगी पुस्तक

अध्ययन समिति, अंतर्गत बहुभाषी इस्लामी सामग्री सेवा संगठन

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह की है। हम उसी की प्रशंसा करते हैं, उसी से सहायता माँगते हैं और उसी से क्षमायाचना करते हैं। हम अपनी आत्मा की बुराइयों और अपने बुरे कर्मों से अल्लाह की शरण में आते हैं। जिसे अल्लाह मार्गदर्शन दे, उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता और जिसे वह गुमराह कर दे, उसे कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे तथा रसूल हैं। अल्लाह की रहमत हो उनपर, उनके परिजनों पर, उनके साथियों पर और अच्छे कामों में उनका अनुसरण करने वालों पर। इन तमाम लोगों को पूर्ण शांति मिले।

अब मूल विषय पर आते हैं। चूँकि लोगों को निरंतर रूप से अपनी स्थिति में सुधार की आवश्यकता रहती है, इसलिए शरीयत ने इसका प्रबंध कर दिया है, जिसके एक भाग के रूप में नमाज़ की अज़ान, इक़ामत, इमामत, जुमे के ख़ुतबे और मस्जिद से संबंधित शरई आदेशों एवं निर्देशों को देखा जा सकता है। यही कारण है कि मस्जिद के मुअज़्ज़िन, इमाम और जुमा के ख़तीब की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी हो जाती है तथा इसी उद्देश्य से हमने 'मुअज़्ज़िन, इमाम, ख़तीब तथा मस्जिदों से संबंधित आदेशों एवं निर्देशों पर आधारित एक संक्षिप्त उपयोगी पुस्तक' नामक एक किताब तैयार की है और इसका कई भाषाओं में अनुवाद कराया है।

पहला विषय : अज़ान तथा इक़ामत से संबंधित आदेश एवं निर्देश

अज़ान इस्लाम और मुसलमानों का एक प्रतीक है, जो हर दिन और रात में पाँच बार दी जाती है। उलेमा ने अपनी किताबों में इसके आदेश, सुन्नतों, इससे संबंधित नियमों और मुसतहब कार्यों तथा इसे नष्ट कर देने वाली चीज़ों को बयान करने पर पूरी तवज्जो दी है, जो इसके महत्व एवं प्रतिष्ठा को दर्शाता है। [1] [1] देखें : फ़त्ह अल-मुनइम शर्ह सहीह मुस्लिम : (2/460).

पहला बिंदु : अज़ान तथा इक़ामत की परिभाषा

अज़ान  की शरई परिभाषा : विशेष निर्धारित शरई शब्दों द्वारा नमाज़ का समय प्रवेश करने का ऐलान करना। [2] [2] देखें : इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी, पृष्ठ : 1/292, मुख़्तार अल-सिहाह, पृष्ठ : 16 - मूल तत्व 'أ ذ ن', तथा अल-क़हतानी की किताब अल-अज़ान व अल-इक़ामह, पृष्ठ : 5।

इक़ामत की शरई परिभाषा : शरीयत की ओर से निर्धारित विशेष शब्दों द्वारा नमाज़ के लिए खड़े होने की सूचना देना। [3] [3] देखें : कश्शाफ़ अल-क़िना (1/230).

दूसरा बिंदु : अज़ान तथा इक़ामत की महत्ता

अज़ान तथा इक़ामत किताब, सुन्नत और इज्मा द्वारा साबित हैं :

जहाँ तक पवित्र क़ुर्आन की बात है, तो उच्च अल्लाह ने कहा है : "और जब तुम नमाज़ के लिए पुकारते हो, तो वे उसे उपहास और खेल बना लेते हैं। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग हैं जो समझते नहीं हैं।" [सूरा माइदा : 58]

जहाँ तक सुन्नत की बात है, तो अज़ान एवं इक़ामत के शरीयत का हिस्सा होने के सबूत में बहुत सारी हदीसें मौजूद हैं। कुछ हदीसें इस प्रकार हैं :

इब्न-ए-उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है कि वह फ़रमाते हैं : जब मुसलमान मदीना मुनव्वरा आए तो नमाज़ के समय का अन्दाज़ा लगाकर उसके लिए जमा हो जाया करते थे। उसके लिए अज़ान नहीं दी जाती थी। एक दिन उन्होंने इसके बारे में मशवरा किया तो किसी ने कहा, ईसाइयों की तरह नाक़ूस (घंटा) बना लिया जाए और कुछ लोगों ने कहा कि यहूदियों के शंख (बिगुल) की तरह नरसिंघा बना लो। ऐसे में उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया : तुम एक आदमी को नियुक्त क्यों नहीं कर देते, जो नमाज़ के लिए पुकार दिया करे? चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "ऐ बिलाल! उठो और नमाज़ की पुकारो।" [4] (4) सहीह बुख़ारी (604), सहीह मुस्लिम (377)।

जहाँ तक इज्मा का सवाल है, तो पूरी उम्मत पाँचों नमाज़ों के लिए अज़ान दिए और इक़ामत कहे जाने पर एकमत है।

इमाम इब्न-ए-क़ुदामा अल-मक़दिसी कहते हैं : "उम्मत का इस बात पर इज्मा है कि पाँच समयों की नमाज़ों के लिए अज़ान देना एक शरई कार्य है।" [5] [5] अल-मुग़नी (1/293)।

अज़ान और इक़ामत पुरुषों के लिए ठहरे हुए और सफ़र दोनों ही अवस्थाओं में फ़र्ज़-ए-किफ़ाया हैं। अज़ान तथा इक़ामत केवल पाँच समयों की फ़र्ज़ नमाज़ों के लिए हैं। अन्य नमाज़ों के लिए नहीं। क्योंकि मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे फ़रमाया है : "जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।" [6] (6) सहीह बुख़ारी (628), सहीह मुस्लिम (674)।

साथ ही यह कि अज़ान और इक़ामत इस्लाम के दो प्रत्यक्ष प्रतीक हैं। अतः इन्हें बंद कर देना जायज़ नहीं है।

जहाँ तक महिलाओं की बात है, तो उनके लिए अज़ान और इक़ामत शरीयत सम्मत नहीं हैं, चाहे महिला अकेले नमाज़ पढ़े या दूसरी महिलाओं की इमामत करे। [7] [7] इब-ए-तैमिया की शर्ह अल-उम्दह - किताब अल-सलात (पृष्ठ : 101).

तीसरा बिंदु : अज़ान तथा इक़ामत की फ़ज़ीलत

अज़ान और मुअज़्ज़िनों की फ़ज़ीलत के बारे में क़ुर्आन एवं हदीस के बहुत-से उद्धरण मौजूद हैं। कुछ आप भी देखते चलें :

मुअज़्ज़िन अल्लाह की ओर बुलाने वालों में शामिल और सबसे अच्छी बात करने वालों में से एक है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और उस व्यक्ति से अच्छी बात किसकी हो सकती है, जिसने अल्लाह की ओर बुलाया तथा सत्कर्म किया और कहा कि निःसंदेह मैं मुसलमानों (आज्ञाकारियों) में से हूँ।" [सूरा फ़ुस्सिलत : 33]

मुअज़्ज़िन क़यामत के दिन सबसे ऊँची गर्दन वाले लोग होंगे। मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : ''क़यामत के दिन अज़ान देने वालों की गर्दनें सबसे ऊँची होंगी।'' [8] (8) सहीह मुस्लिम (387)।

अज़ान तथा इक़ामत शैतान को भगाने का काम करती हैं। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब नमाज़ के लिए अज़ान दी जाती है, तो शैतान हवा निकालता हुआ पीठ फेरकर भागने लगता है, ताकि अज़ान की आवाज़ न सुन सके। जब अज़ान पूरी हो जाती है, तो वापस आ जाता है। फिर, जब नमाज़ के लिए तकबीर कही जाती है, तो दोबारा पीठ फेरकर भाग जाता है। जब तकबीर ख़त्म हो जाती है, तो फिर आ जाता है, ताकि नमाज़ी के दिल में ख़्यालात डाले। वह उससे कहता है : अमुक बात याद कर और अमुक बात याद कर, जो उसे पहले याद नहीं थी। यहाँ तक कि आदमी को यह याद नहीं रह जाता कि उसने कितनी रकात नमाज़ पढ़ी है।" [9] (9) सहीह बुख़ारी (1222), सहीह मुस्लिम (389)।

मुअज़्ज़िन के लिए हर वह चीज़ गवाही देती है जो उसकी अज़ान सुनती है। चुनाँचे अब्दुल्लाह बिन अब्दुर रहमान अंसारी से रिवायत है कि अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनसे कहा : ''मैं तुमको देखता हूँ कि तुम बकरी को एवं देहात को पसंद करते हो। अतः जब तुम अपनी बकरियों के बीच या अपने देहात में रहो और नमाज़ के लिए अज़ान दो, तो ऊँची आवाज़ में अज़ान दो, इसलिए कि "अज़ान देने वाले की आवाज़ जो भी जिन्न, इन्सान या और कोई सुनेगा, वह क़यामत के दिन उसके लिए गवाही देगा।" अबू सईद कहते हैं कि मैंने यह हदीस अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से सुनी है। [10]. (10) सहीह बुख़ारी (609)।

अगर लोगों को अज़ान की फ़ज़ीलत का सही ज्ञान हो जाए तो वे इसके लिए क़ुरआ अन्दाज़ी करें। यानी आपस में क़ुरआ डालें कि कौन अज़ान देगा। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''अगर लोगों को मालूम हो जाए कि अज़ान और पहली सफ़ में क्या सवाब है, फिर उसे पाने के लिए क़ुरआ डालने के सिवा कोई चारा न पाएँ, तो वे अवश्य क़ुरआ अंदाज़ी करेंगे।'' [11] [11] सहीह बुख़ारी : 615, सहीह मुस्लिम : 437.

मुअज़्ज़िन को उसकी आवाज़ की पहुँच के अनुसार क्षमा कर दिया जाता है, उसे सुनने वाले सभी जीवित प्राणी एवं निर्जीव वस्तुएँ उसकी पुष्टि करती हैं और उसे उसके साथ नमाज़ पढ़ने वाले सभी लोगों के समान सवाब मिलता है। क्योंकि अच्छे काम की ओर मार्गदर्शन करने वाला उस काम को करने वाले के समान है। बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने कहा है : "निःसंदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते पहली सफ़ वालों पर रहमत भेजते हैं, मुअज़्ज़िन को उसकी आवाज़ की पहुँच तक माफ़ कर दिया जाता है, उसकी आवाज़ सुनने वाली हर तर और ख़ुश्क चीज़ उसकी पुष्टि करती है और उसे अपने साथ नमाज़ पढ़ने वालों के बराबर सवाब मिलता है।" [12] [12] इसे अहमद (18506) और नसई (646) ने रिवायत किया है। मुंज़िरी ने अल-तरगीब व अल-तरहीब (1/176) में कहा है : इसकी इसनाद हसन जय्यिद है। तथा इब्न अल-मुलक़्क़िन ने अल-बद्र अल-मुनीर (3/385) में कहा है : यह इसनाद जय्यिद है।

अज़ान इस्लाम का एक महान प्रतीक है, जो मुस्लिम क्षेत्र तथा ग़ैर-मुस्लिम क्षेत्र के बीच का अंतर दिखाती है। इमाम बुख़ारी ने अपनी सहीह में एक अध्याय का शीर्षक दिया है : 'अज़ान के कारण रक्त सुरक्षित हो जाने का बयान।' फिर उन्होंने अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) की यह हदीस प्रस्तुत की है : "अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब हमारे साथ किसी क़ौम से जिहाद करते, तो सुबह होने और देख लेने तक उनपर चढ़ाई नहीं करते। फिर, यदि अज़ान सुन लेते तो रुक जाते और यदि अज़ान न सुनते तो हमला कर देते।"[13] (13) सहीह बुख़ारी (610), सहीह मुस्लिम (382)।

इमाम ख़त्ताबी कहते हैं : "इस हदीस से मालूम होता है कि अज़ान इस्लाम धर्म का एक प्रतीक और एक अनिवार्य कार्य है, जिसे छोड़ना जायज़ नहीं है। अगर किसी शहर के लोग एक मत होकर अज़ान छोड़ दें और अज़ान न दें, तो शासक को उनसे इसपर युद्ध करने का अधिकार है।"[14] [14] आलाम अल-हदीस शर्ह सहीह बुख़ारी : (1/460)।

चौथा बिंदु : अज़ान तथा इक़ामत के सही होने की शर्तें

1- मुसलमान होना : काफ़िर न अज़ान दे सकता है और न इक़ामत कह सकता है। क्योंकि यह दोनों कार्य इबादत हैं और काफ़िर की इबादत सही नहीं होती।

2- अक़्लमंद होना : पागल, नशे में धुत व्यक्ति और भले-बुरे की पहचना न रखने वाले बच्चे के द्वारा दी गई अज़ान एवं कही गई इक़ामत दुरुस्त नहीं होंगी।

3- नीयत करना : नीयत के बिना यह दोनों सही नहीं होतीं ; क्योंकि यह इबादत हैं और इबादत नीयत के बिना सही नहीं होती; जैसा कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : "सभी कार्यों का दारोमदार नीयतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नीयत के अनुरूप ही परिणाम मिलेगा।" [15] [15] इस हदीस को बुख़ारी (1) और मुस्लिम (1907) ने उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।

4- मुअज़्ज़िन का पुरुष होना : स्त्री का अज़ान देना और इक़ामत कहना सही नहीं है।

5- अज़ान नमाज़ के समय में दी जाए : नमाज़ के समय से पहले अज़ान देना सही नहीं है। क्योंकि मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब नमाज़ उपस्थित हो जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।" [16] आपने यहाँ अज़ान के आदेश को नमाज़ के उपस्थित होने के साथ जोड़कर बयान किया है और नमाज़ उपस्थित समय प्रवेश करने के बाद ही होती है। इक़ामत नमाज़ के लिए खड़े होने का इरादा करते समय होनी चाहिए। [16] सहीह बुख़ारी (628), सहीह मुस्लिम (674)।

6- अज़ान -और इसी तरह इक़ामत- क्रमबद्ध होनी चाहिए : क्रमबद्धता से मतलब यह है कि मुअज़्ज़िन अज़ान और इक़ामत के शब्दों को उन हदीसों के अनुसार ही कहे, जिनमें दोनों का तरीक़ा बयान किया गया है। किसी शब्द या किसी वाक्य को आगे-पीछे न करे। क्योंकि अज़ान एक इबादत है, जो एक ख़ास क्रम से साबित है। इसलिए उसे उसी तरह करना चाहिए। अल्लाह के रसूल रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : ''जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ जारी की, जो उसका भाग नहीं है, तो वह अस्वीकृत है।'' [17] [17] इसे बुख़ारी (2697) और मुस्लिम (1718) ने आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से रिवायत किया है।

7- अज़ान और इसी तरह इक़ामत लगातार होना चाहिए : लगातार होने का मतलब यह है कि अज़ान के शब्दों के बीच किसी कथन एवं कार्य द्वारा जुदाई न डाली जाए तथा उनके दरमियान लंबा अंतराल न रखा जाए।

8- अज़ान तथा इक़ामत अरबी भाषा में और उन्हीं शब्दों में होनी चाहिए, जो सुन्नत में आए हैं। इन शब्दों में किसी ऐसी विकृति की गुंजाइश नहीं है, जो अर्थ को बदल दे।

9- ऊँची आवाज़ में अज़ान देना; क्योंकि अगर मुअज़्ज़िन अपनी आवाज़ इतनी धीमी रखे कि उसे केवल स्वयं ही सुन सके, तो अज़ान का मक़सद पूरा नहीं होगा। अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने फ़रमाया है : "तो तुममें से कोई तुम्हारे लिए अज़ान दे।" [18] इस हदीस में इस बात की ओर इशारा है कि दूसरों को सुनाने के लिए आवाज़ ऊँची होनी चाहिए; ताकि सूचना देने का अपेक्षित उद्देश्य, यानी सुनाना पूरा हो सके। अतः, यदि कोई अपने लिए या अपने साथ उपस्थित किसी व्यक्ति के लिए अज़ान दे, तो आवाज़ बुलंद करना अनिवार्य नहीं होगा। वह अपनी आवाज़ इतनी बुलंद करेगा कि स्वयं सुन सके या उसके साथ उपस्थित व्यक्ति सुन सके। परंतु, यदि वह इससे अधिक आवाज़ बुलंद करे, तो यह उत्तम है; जैसा कि अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हीदस में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "अतः जब तुम अपनी बकरियों के बीच या अपने देहात में रहो और अज़ान दो, तो ऊँची आवाज़ में अज़ान दो, इसलिए कि अज़ान देने वाले की आवाज़ जो भी जिन्न, इन्सान या और कोई सुनेगा, वह क़यामत के दिन उसके लिए गवाही देगा।" [19] [18] इस हदीस के हवाले पीछ दिए जा चुके हैं। [19] इस हदीस के हवाले पीछे दिए जा चुके हैं।

पाँचवाँ बिंदु : मुअज़्ज़िन में अपेक्षित गुण

1- वह एक विश्वसनीय एवं दीनदार व्यक्ति के रूप में जाना जाता हो; क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है : "इमाम ज़िम्मेदार है और मुअज़्ज़िन अमानतदार है। ऐ अल्लाह! इमामों का मार्गदर्शन कर और मुअज़्ज़िनों को क्षमा कर दे।" [20] मुअज़्ज़िन नमाज़ और रोज़े के समय का अमीन होता है और अमानत एक नेक इन्सान ही अदा कर सकता है, इसलिए किसी अवज्ञाकारी, खुलेआम गुनाह करने वाले या अनैतिक व्यक्ति को मुअज़्ज़िन बनाया नहीं जाना चाहिए। [20] सुनन अबू दाऊद हदीस संख्या : 517 तथा सुनन तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 207।

2- वयस्क हो; क्योंकि वयस्क की अज़ान अधिक पूर्ण होगी। वैसे, भले-बुरे की पहचान रखने वाले बच्चे की अज़ान भी सही है, यदि समय पर दी जाए। अगर वह अज़ान दे दे, तो उसकी दी हुई अज़ान काफ़ी होगी। क्योंकि उसकी अज़ान से समय के प्रवेश की सूचना मिल जाती है।

3- उसके पास समयों का ज्ञान हो; ताकि उनका ध्यान रख सके और समय शुरू होते ही अज़ान दे सके; क्योंकि यदि उसके पास समयों का ज्ञान नहीं होगा, तो गलती या त्रुटि की संभावना बनी रहेगी।

4- उसकी आवाज़ बुलंद हो। इसका प्रमाण अब्दुल्लाह बिन ज़ैद से वर्णित अज़ान के स्वप्न पर आधारित वह हदीस है, जिसमें अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे फ़रमाया है : ''निस्संदेह यह एक सच्चा स्वप्न है। तुम बिलाल के साथ खड़े हो जाओ कि उसकी आवाज़ तुमसे अधिक ऊँची और बुलंद है, फिर उसे वो शब्द बताते जाओ, जो तुमसे कहे गए हैं और वह उनको पुकारते जाएँ।'' [21] इस हदीस में आए हुए शब्द «وَأَمْدُّ صَوْتًا مِنْكَ» का अर्थ है : उसकी आवाज़ तुमसे ज़्यादा ऊँची और बुलंद है। यह इस बात का प्रमाण है कि ऊँची और बुलंद आवाज़ वाले व्यक्ति को मुअज़्ज़िन बनाना मुसतहब है; क्योंकि ऊँची आवाज़ अज़ान की सूचना पहुँचाने में ज़्यादा प्रभावी होती है। [22] [21] सुनन तिर्मिज़ी, हदीस संख्या : 189। तिर्मिज़ी कहते हैं : यह हदीस हसन सहीह है। [22] देखें : तुहफ़ह अल-अहवज़ी (1/481).

5- उसकी आवाज़ अच्छी हो। अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु ही की रिवायत में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "इसलिए कि उसकी आवाज़ तुम्हारी आवाज़ से अधिक सुंदर और बुलंद है।" यानी उसकी आवाज़ तुम्हारी आवाज़ से अधिक सुंदर और बुलंद है।

6- छोटी और बड़ी नापाकी से पाक हो। क्योंकि अज़ान और इक़ामत अल्लाह का ज़िक्र हैं और ज़िक्र करने वाले के लिए पाक होना मुसतहब है।

7- अज़ान खड़े होकर दे। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ऐ बिलाल! खड़े हो जाओ, फिर नमाज़ के लिए पुकारो।" [23] इब्न अल-मुंज़िर कहते हैं : "इस बात पर सर्वसम्मति है कि मुअज़्ज़िन का खड़े होकर अज़ान देना सुन्नत है।"[24]. [23] इस हदीस को बुख़ारी (604) और मुस्लिम (377) ने इब्न-ए-उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है। [24] इब्न अल-मुंज़िर की अल-इजमा : (पृः 38).

8- क़िबला की ओर मुँह करके अज़ान दे। क्योंकि अबदुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु की अज़ान के स्वप्न वाली हदीस की एक रिवायत में आया है कि उन्होंने कहा है : "उन्होंने क़िबला की ओर मुँह किया और कहा : ''अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर...''[25], इब्न-ए-मुंज़िर कहते हैं : "इसपर सर्वसम्मति है कि अज़ान के लिए क़िबले की ओर मुँह करना सुन्नत है।"[26] [25] सुनन अबू दाऊद : 507. [26] इब्न अल-मुंज़िर की अल-इजमा : (पृः 38)

9- अपनी दोनों तर्जनियों को अपने दोनों कानों में डाल ले। क्योंकि बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु ने ऐसा किया था, जब उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने अज़ान दी थी। अबू जुहैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में वह कहते हैं : "मैंने बिलाल को अज़ान देते हुए देखा, वह घूम रहे थे, अपना मुँह इधर-उधर फेर रहे थे और उनकी दोनों उंगलियाँ उनके कानों में थीं तथा उस समय अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक लाल ख़ेमे में थे...[27]. [27] इसे तिरमिज़ी (197) ने रिवायत किया है और हसन सहीह कहा है। यह हदीस मूल रूप से सहीह बुखारी (634) में इन शब्दों के साथ मौजूद है : औन बिन अबू जुहैफ़ा अपने पिता से रिवायत करते हैं कि उन्होंने बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) को अज़ान देते हुए देखा, तो मैं अज़ान के दौरान उनके मुँह को इधर-उधर फिरते हुए देखने लगा।

इमाम तिर्मिज़ी ने इस हदीस को रिवायत करने के बाद कहा है : "अह्ल-ए-इल्म के यहाँ इसी पर अमल है। वे मुसतहब समझते हैं कि मुअज़्ज़िन अज़ान में अपनी दोनों तर्जनियों को अपने दोनों कानों में डाले।"

इब्न शुबरुमा से पूछा गया कि मुअज़्ज़िन को क्यों आदेश दिया गया कि वह अपनी दोनों तर्जनियों को अपने दोनों कानों में डाल ले? तो उन्होंने कहा : “आवाज़ की सख़्ती के लिए...”[28]। [28] अल-औसत (4/11)।

नववी - उनपर अल्लाह की कृपा हो - कहते हैं : "सुन्नत यह है कि मुअज़्ज़िन अपनी दोनों तर्जनियों को अपने दोनों कानों के सुराख़ों में डाल ले। यह एक सर्वसम्मत बात है। इसे महामिली ने 'अल-मजमूअ' में अधिकांश विद्वानों से उद्धृत किया है। हमारे विद्वानों का कहना है : इसका एक लाभ यह भी है कि हो सकता है कोई व्यक्ति बहरेपन, दूरी या किसी अन्य कारण से मुअज़्ज़िन की आवाज़ न सुन सके और उसकी उंगलियों से यह अनुमान लगा ले कि वह अज़ान दे रहा है।" [29] [29] शर्ह अल-मुहज्जब (3/113)।

10- जब 'हय्या अलस्सलाह' कहे, तो दोनों बार दाईं ओर मुड़े, और जब 'हय्या अललफ़लाह' कहे, तो दोनों बार बाईं ओर मुड़े, लेकिन अपने पैरों को स्थिर रखे; जैसा कि अबू जुहैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु की अज़ान के बारे में अल्लाह के नबी ﷺ के सामने कहा गया है : “तो मैं उनके मुँह को इधर-उधर देखने लगा, वह दाएँ तथा बाएँ ''हय्या अलस्सलात'', ''हय्या अलल-फ़लाह'' कह रहे थे।”[30]; दूसरी बात यह है कि यह उन लोगों तक अज़ान की आवाज़ पहुँचाने में अधिक प्रभावी है, जो मस्जिद से दूर हैं। [30] सहीह बुख़ारी : 634 तथा सहीह मुस्लिम : 503। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

11- अज़ान के शब्द रुक-रुक कर कहे। उन्हें अतिशयोक्ति की हद तक न खींचे। क्योंकि अज़ान मस्जिद से अनुपस्थित लोगों के लिए सूचित करने के लिए दी जाती है। अतः अज़ान के शब्दों को रुक-रुककर कहना अधिक प्रभावी है। जबकि इक़ामत के शब्दों को जल्दी-जल्दी कहा जाएगा। क्योंकि इक़ामत मस्जिद में उपस्थित लोगों को सूचित करने के लिए कही जाती है।[31] [31] देखिए : इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी (1/295)।

12- अज़ान उसी प्रकार सरल और सहज आवाज़ में, बिना बनावट और बिना लहक के देनी चाहिए, जिसकी शिक्षा शरीयत ने दी है। अंदाज़ गाने वाला नहीं होना चाहिए। इतना खींचना भी नहीं चाहिए कि उद्देश्य पूरा न हो। अज़ान सामान्य आवाज़ में उसकी शर्तों एवं शरई आदाब का ख़्याल रखते हुए देनी चाहिए।

छठा बिंदु : अज़ान तथा इक़ामत का तरीक़ा

अज़ान तथा इक़ामत के शब्दों में कुछ भिन्नताएँ भी हैं, जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित हदीसों में मौजूद हैं। अज़ान एवं इक़ामत के स्वरूप को बताने वाली एक हदीस अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, जिसमें अज़ान के शब्द इस प्रकार आए हैं :

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। (अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।)

अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह, अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह। (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।)

अश्हदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह। (मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।)

हय्या अलस्सलात, हय्या अलस्सलात। (नमाज़ की ओर आओ। नमाज़ की ओर आओ।)

हय्या अललफ़लाह, हय्या अललफ़लाह। (सफलता की ओर आओ। सफलता की ओर आओ।)

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। (अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह सबसे बड़ा है।)

ला इलाहा इल्लल्लाह। (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।)

जबकि इक़ामत के शब्द इस प्रकार आए हैं :

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। (अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।)

अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह। (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।)

अश्हदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह। (मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।)

हय्या अललफ़लाह, हय्या अललफ़लाह। (नमाज़ की ओर आओ, सफलता की ओर आओ।)

क़द क़ामतिस्सलात, क़द क़ामतिस्सलात। (नमाज़ खड़ी हो चुकी है, नमाज़ खड़ी हो चुकी है।)

अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। (अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है।)

ला इलाहा इल्लल्लाह। (अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं है।) [32] [32] इसे अबू दाऊद (499) ने तथा तिरमिज़ी ने संक्षेप में (189) रिवायत किया है। तिर्मिज़ी ने कहा है : अब्दुल्लाह बिन ज़ैद की हदीस हसन सहीह है।

यह अज़ान और इक़ामत का वह तरीक़ा है, जिसका पालन बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रहकर आपकी मृत्यु तक हमेशा करते रहे। आप चाहे घर में रहे हों या यात्रा में।

फ़ज्र की अज़ान में 'हय्या अलल फ़लाह' के बाद दो बार : "अस्सलातु ख़ैरुम्मिनन्नौम" कहे। क्योंकि अबू महज़ूरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे फ़रमाया था : ''यदि सुबह की नमाज़ हो, तो तुम कहो : "अस्सलातु ख़ैरुम्मिनन्नौम, अस्सलातु ख़ैरुम्मिनन्नौम" (नमाज़ नींद से बेहतर है, नमाज़ नींद से बेहतर है।)'' [33] [33] इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है (500) तथा नववी ने खुलासह अल-अहकाम (1/286) में इसे हसन कहा है।

अज़ान का और एक तरीक़ा भी है। वह है, कुछ शब्दों को दोहराने का तरीक़ा। इसमें दोनों गवाहियों के शब्दों को पहले ज़रा धीमी आवाज़ में कहा जाता है और उसके बाद फिर बुलंद आवाज़ में। इक़ामत के समय भी इक़ामत के शब्दों को दो-दो बार कहा जाता है। यह तरीक़ा अबू महज़ूरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में बयान हुआ है। वह कहते हैं कि स्वयं अल्लाह के रसूल ﷺ ने उन्हें अज़ान सिखाई और फ़रमाया : "कहो : अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह, अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह। अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह। - दो-दो बार - फ़रमाया : फिर अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए दोहराओ : अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह, अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह। अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह। हैय्या अलस्स्लात, हैय्या अलस्स्लात। हैय्या अलल-फलाह, हैय्या अलल-फलाह। अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। ला इलाहा इल्लल्लाह।"

"और इक़ामत यूँ है : अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह, अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह। अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह, अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह। हैय्या अलस्स्लाह, हैय्या अलस्स्लाह। हैय्या अलल-फ़लाह, हैय्या अलल-फ़लाह। क़द क़ामतिस्सलाह, क़द क़ामतिस्सलाह, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। ला इलाहा इल्लल्लाह।" [34] [34] इस हदीस को अबू दाऊद ने रिवायत किया है। हदीस संख्या : 502 तथा 503।

यह भिन्नता दरअसल विविधता को दर्शाती है। मुअज़्ज़िन इन साबित तरीक़ों में से किसी पर भी अमल कर सकता है। शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया ने अज़ान के कुछ साबित तरीक़ों का उल्लेख करने के बाद कहा है : "ऐसी स्थिति में, सही मत अहले हदीस और उनसे सहमत लोगों का है। वह मत यह है कि इस संबंध में नबी ﷺ से प्रमाणित हर तरीक़े को जायज़ समझा जाए। वे इनमें से किसी भी तरीक़े को नापसंद नहीं करते। क्योंकि अज़ान और इक़ामत के तरीक़ों की विविधता, क़िराअतों और तशह्हुदों आदि के तरीक़ों की विविधता के समान है। किसी के लिए जायज़ नहीं है कि वह किसी ऐसे तरीक़े को नापसंद करे, जिसे अल्लाह के रसूल ﷺ ने अपनी उम्मत के लिए जारी किया हो।" [35] [35] मजमू अल-फ़तावा : (22/66)।

सातवाँ बिंदु : अज़ान सुनने वाला क्या कहे और अज़ान के बाद क्या दुआ पढ़े?

अज़ान सुन रहे व्यक्ति के लिए मुसतहब यह है कि वह उसी प्रकार के शब्द कहे, जिस प्रकार के शब्द मुअज़्ज़िन कहता है। क्योंकि अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुम अज़ान सुनो, तो तुम उसके समान कहो, जो मुअज़्ज़िन कहे।" [36]. "हय्या अलस्सलाह" तथा "हय्या अललफ़लाह" को छोड़कर। इन दोनों वाक्यों के बाद यह कहना मुसतहब है : "ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह।" क्योंकि उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब मुअज़्ज़िन "اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ" (अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर) कहता है और (उसके उत्तर में) तुममें से कोई "اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ" (अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ" (अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह) कहता है और वह "أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ" (अश्हदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाह) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "أَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ" (अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह) कहता है और वह "أَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ" (अश्हदु अन्ना मुहम्मदर-रसूलुल्लाह) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "حَيَّ عَلَى الصَّلَاةِ" (हैय्या अलस्स्लाह) कहता है और वह "لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ" (ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "حَيَّ عَلَى الفَلَاحِ" (हैय्या अलल-फ़लाह) कहता है और वह "لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ" (ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ" (अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर) कहता है और वह "اللَّهُ أَكْبَرُ اللَّهُ أَكْبَرُ" (अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर) कहता है, फिर मुअज़्ज़िन "لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ" (ला इलाहा इल्लल्लाह) कहता है और वह सच्चे दिल से "لَا إِلٰهَ إِلَّا اللَّهُ" (ला इलाहा इल्लल्लाह) कहता है, तो वह जन्नत में दाख़िल होगा।" [37] [36] सहीह बुख़ारी (611), सहीह मुस्लिम (383)। [37] सहीह मुस्लिम (385)।

और वह दोनों गवाहियों के बाद यह दुआ कहे : "अशहदु अल-ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीक-लहु व अन्न मुहम्मदन अबदुहू वरसूलुह, रज़ीतु बिल्लाहि रब्बन व बि-मुहम्मदिर रसूलन व बिल-इस्लामि दीनन।" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है और उसका कोई साझी नहीं है। साथ ही इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं। मैं अल्लाह को प्रभु, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रसूल और इस्लाम को धर्म मानकर संतुष्ट हूँ।)

साद बिन अबू वक़्क़ास़ -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सुनकर कहता है : "أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ "وَرَسُولُهُ، رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبًّا، وَبِمُحَمَّدٍ رَسُولًا، وَبِالْإِسْلَامِ دِينًا (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं। मैं अल्लाह को अपना रब मानकर, मुहम्मद को रसूल मानकर और इस्लाम को अपने धर्म के तौर पर स्वीकार कर खुश और संतुष्ट हूँ।) उसके गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं।"[38] [38] सहीह मुस्लिम : 386.

जब सुबह की नमाज़ में अज़ान देने वाला "नमाज़ नींद से बेहतर है" कहे, तो सुनने वाला भी वही कहे; क्योंकि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "जब तुम अज़ान सुनो, तो तुम उसके समान कहो, जो मुअज़्ज़िन कहे।" [39] [39] सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम।

फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद भेजे और उसके बाद वह दुआ पढ़े, जिसका उल्लेख इस हदीस में हुआ है : ''जिसने अज़ान सुनते समय यह दुआ पढ़ी : "اللهم رب هذه الدعوة التامة، والصلاة القائمة، آت محمدا الوسيلة "والفضيلة، وابعثه مقاما محمودا الذي وعدته (ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तूने उन्हें वचन दिया है।) उसे क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश मिल जाएगी।'' [40] और सम्पूर्ण आह्वान का अर्थ है : अज़ान का आह्वान, जो एक संपूर्ण आह्वान है। क्योंकि उसमें अल्लाह का सम्मान, उसके एक होने का ऐलान, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने की गवाही और भलाई की ओर बुलाना जैसी चीज़ें सम्मिलित हैं। क़ायम नमाज़ का अर्थ है : वह नमाज़ जो खड़ी होने और पढ़ी जाने वाली है। अल-वसीलह का अर्थ है : जन्नत का एक स्थान। अल-फ़ज़ीलह का अर्थ है : वह उच्च विशेषता, जो केवल आपको प्राप्त है, किसी और को नहीं। मक़ाम-ए-महमूद का अर्थ है : हर वह स्थान, जिसमें पहुँचे हुए व्यक्ति की प्रशंसा सारे लोग करते हैं। इसमें सारे इन्सानों के लिए सिफ़ारिश करना भी शामिल है कि जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हश्र के मैदान में मौजूद लोगों के लिए उनके बीच निर्णय कर दिए जाने तक सिफ़ारिश करते रहेंगे। [40] सहीह बुख़ारी : 614। वर्णकर्ता जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु।

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब तुम मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सुनो, तो उसी तरह के शब्द कहो, जो वह कहता है। फिर मुझपर दरूद भेजो। क्योंकि जो मुझपर एक बार दरूद भेजेगा, अल्लाह उसकी प्रशंसा दस बार अपने फ़रिश्तों के सम्मुख करेगा। फिर मेरे लिए अल्लाह से वसीला माँगो। क्योंकि यह जन्नत का एक ऐसा स्थान है, जो केवल अल्लाह के एक बंदे के लिए उचित है और मुझे आशा है कि वह बंदा मैं ही हूँ। अतः, जो मेरे लिए वसीला माँगेगा, उसके लिए मेरी सिफ़ारिश अनिवार्य हो जाएगी।" [41] (41) सहीह मुस्लिम (384)।

अज़ान में जो बिदअतें रायज हो गई हैं, उनमें से एक है, अज़ान के बाद मुअज़्ज़िन द्वारा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर बुलंद आवाज़ में दरूद और सलाम भेजना। इसी तरह अज़ान के बाद पढ़ी जाने वाली दुआ (اللهم رب هذه الدعوة التامة . . .) को सामूहिक रूप से पढ़ना। इस दुआ को पढ़ते समय दोनों हाथों को उठाना। तथा अज़ान का जवाब देते समय किसी वाक्य के अंत में (حقًّا) या (أبدًا) शब्द की वृद्धि करते हुए (حقًّا لا إله إلا الله) या (أبدًا لا إله إلا الله) कहना। क्योंकि इन तमाम बातों की कोई दलील नहीं है।

आठवाँ बिंदु : अज़ान के बाद मस्जिद से निकलना

अज़ान के बाद नमाज़ पढ़े बग़ैर मस्जिद से निकलना हराम है। हाँ, किसी के पास कोई शरई कारण हो या वह दोबारा मस्जिद वापस आने का इरादा रखता हो, तो कोई हर्ज नहीं है। अबू शासा से वर्णित एक हदीस में है, वह कहते हैं : हम लोग अबू हुरैरा के संग मस्जिद में बैठे हुए थे कि मोअज़्ज़िन ने अज़ान दी और एक व्यक्ति खड़ा होकर मस्जिद से जाने लगा, तो अबू हुरैरा उसे देखते रहे। वह मस्जिद से निकल गया, तो अबू हुरैरा ने फ़रमाया : इसने अबुल क़ासिम -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की अवज्ञा की।" [42] सहीह मुस्लिम (655)।

इमाम तिर्मिज़ी ने इस हदीस को अपनी सुनन में रिवायत करने के बाद कहा है : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा और उनके बाद के विद्वानों का यही अमल रहा है कि अज़ान के बाद कोई भी व्यक्ति मस्जिद से न निकले। हाँ कोई उचित कारण हो, जैसे वज़ू न हो या कोई अति आवश्यक कार्य पड़ गया हो, तो कोई बात नहीं है।" [43] [43] सुनन तिरमिज़ी 1/397, हदीस संख्या : 204।

नवाँ बिंदु : अज़ान और इक़ामत के बीच कितना समय होना चाहिए?

सुन्नत से इस बात का प्रमाण मिलता है कि अज़ान और इक़ामत के बीच पर्याप्त समय होता था। अब्दुल्लाह बिन मुग़फ्फ़ल रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "हर दो अज़ानों के बीच नमाज़ है। हर दो अज़ानों के बीच नमाज़ है।" फिर तीसरी बार फ़रमाया : "उसके लिए, जो पढ़ना चाहे।" [44]. यहाँ दो अज़ानों से मुराद अज़ान और इक़ामत हैं। अतः, मुअज़्ज़िन अपनी अज़ान एवं इक़ामत के बीच कुछ समय रखे, ताकि उपस्थित लोग नमाज़ से पहले दो रकात अदा कर सकें और अह्ल-ए-मस्जिद (जिन पर मसजिद में आना आवश्यक हो) आकर नमाज़ पा सकें। [44] सहीह बुख़ारी (627), सहीह मुस्लिम (838)।

इमाम अहमद कहते हैं : मुअज़्ज़िन को चाहिए कि जब अज़ान दे, तो इक़ामत कहने में जल्दी न करे, बल्कि अज़ान और इक़ामत के बीच इतना अंतराल रखे कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले लोग आ जाएँ और जिसे शौच करना हो वह शौच कर ले।" [45] [45] इब्ने तैमिया की शर्ह उम्दतुल फ़िक़्ह, किताबुस-सलात : (135)।

दसवाँ बिंदु : मुअज़्ज़िन की ज़िम्मेदारी और उसके आदाब

मुअज़्ज़िन को अज़ान अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए देनी चाहिए। उस्मान बिन अबुल आस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे जो अंतिम वसीयतें कीं, उनमें से एक यह थी कि मैं ऐसा मुअज़्ज़िन रखूँ जो अपनी अज़ान पर कोई पारिश्रमिक न ले।"[46] [46] इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है (209), तथा कहा है : यह हदीस हसन है।

इमाम तिर्मिज़ी -अल्लाह उनपर दया करे- ने इस हदीस को रिवायत करने के बाद कहा है : "अह्ल-ए-इल्म के यहाँ इसी पर अमल है। उन्होंने मुअज़्ज़िन के अज़ान पर पारिश्रमिक लेने को नापसंद किया है और मुअज़्ज़िन के लिए यह बेहतर समझा है कि वह अज़ान सवाब की नीयत से दे।"

रहा मुअज़्ज़िन को मुसलमानों के बैतुल-माल से देने का मामला, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि बैतुल-माल मुसलमानों के हितों के लिए ही क़ायम किया गया है और अज़ान तथा इक़ामत मुसलमानों के हितों में से हैं [47]। [47] देखिए : क़हतानी की किताब अल-अज़ान व अल-इक़ामह : पृ. 19।

मुअज़्ज़िन के लिए यह जानना आवश्यक है कि वह पाँच वक़्त की नमाज़ों के लिए समय पर अज़ान देने का ज़िम्मेदार है; क्योंकि अल्लाह के नबी ﷺ ने कहा है : "इमाम उत्तरदायी है और मुक़तदी अमीन है।" [48] अर्थात : मुअज़्ज़िन नमाज़ के समयों का अमीन है। अतः अज़ान के समय से पर्याप्त समय पहले पवित्र होकर मस्जिद आ जाए और बिना किसी उचित कारण के अनुपस्थित न रहे। अनुपस्थित होने की स्थिति में किसी को अज़ान देने की ज़िम्मेवारी सौंप कर जाए। [48] इसे अबू दाऊद (517) और तिर्मिज़ी (207) ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है।

मुअज़्ज़िन को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

1- मस्जिद की सफ़ाई और देखभाल का ख़याल रखे और इस काम में मस्जिद के कर्मचारियों और नमाज़ियों के साथ सहयोग करे; क्योंकि अल्लाह ने अपने घरों को आबाद करने वालों की प्रशंसा की है, जैसा कि उसने फ़रमाया है : "अल्लाह की मस्जिदें तो वही आबाद करता है, जो अल्लाह पर और अंतिम दिन (क़यामत) पर ईमान लाया, नमाज़ क़ायम की, ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरा। तो ये लोग आशा है कि मार्ग दर्शन पाने वालों में से होंगे।" [सूरा तौबा : 18] मस्जिद आबाद करना चाहे मस्जिद के निर्माण, उसकी सुरक्षा तथा साफ़-सफ़ाई द्वारा हो या उसमें नमाज़ तथा अल्लाह का ज़िक्र स्थापित करके। इसके अंदर दोनों अर्थ शामिल हैं।[49] [49] देखें : फ़त्ह अल-बारी, लेखक: हाफ़िज़ इब्न-ए-हजर 1/541।

2- उसे सही अक़ीदा तथा अज़ान, तहारत और नमाज़ के मसायल को सीखना चाहिए, अल्लाह की किताब का कुछ भाग याद करना चाहिए और इतनी योग्यता रखनी चाहिए कि इमाम की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर नमाज़ पढ़ा सके।

3- अच्छे काम का आदेश दे और बुरे काम से रोके, अल्लाह की तरफ़ हिकमत और अच्छे उपदेश के साथ बुलाए, लोगों के साथ कुशल व्यवहार करे, किसी ने कोई कष्ट दे दिया तो सब्र करे और मस्जिद के इमाम के साथ सहयोग करे।

4- मस्जिद को केवल ज्ञान, इबादत और नमाज़ियों के फ़ायदे की चीज़ों तक सीमित रखे और उन तमाम चीज़ों से दूर रहे, जो दीन और दुनिया में नुक़सान पहुँचाती हैं।

5- मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे लोगों और उसके ज़िम्मेदारों के साथ प्रेम एवं सहयोग पर आधारित संबंध रखे। यदि कोई अनुपस्थित हो तो उसके बारे में पूछे, कोई बीमार हो जाए तो देखने जाए, किसी की मृत्यु हो जाए तो कफ़न-दफ़न में शरीक हो और सुःख-दुःख में उनके साथ रहे।

दूसरा विषय : इमामत से संबंधित मसायल

पहला बिंदु : इमामत की परिभाषा

नमाज़ की इमामत : नमाज़ पढ़ने वालों में से एक व्यक्ति का आगे बढ़ना, ताकि शेष लोग उसका अनुसरण करते हुए नमाज़ पढ़ सकें। नमाज़ का इमाम वह व्यक्ति है, जिसका अनुसरण करते हुे लोग नमाज़ पढ़ते हैं।[50] [50] देखें: हाशिया अर-रौज़ अल-मुरबि'अ: (2/296), अल-इमामह फ़ी अल-सलाह लिल-क़हतानी : (पृष्ठ : 6)।

दूसरा बिंदु : इमामत की महत्ता तथा फ़ज़ीलत

नमाज़ की इमामत उन सर्वश्रेष्ठ कार्यों में से है, जिन्हें ज्ञान, क़ुर्आन पढ़ने की क्षमता और विश्वसनीयता जैसे श्रेष्ठ गुणों वाले सबसे अच्छे लोग अंजाम देते हैं, जैसा कि आगे आएगा। इसके बिना जमात की नमाज़ की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जो कि इस्लाम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।[51] [51] देखें : अल-मौसूअह अल-फ़िक़्हिय्यह अल-कुवैतिय्यह (6/201)।

इमामत की कुछ फ़ज़ीलतें इस प्रकार हैं :

1- इमामत की फ़ज़ीलत सर्वविदित है। इसे स्वयं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने संभाला और इसी तरह आपके सुपथगामी उत्तराधिकारियों ने भी। आज तक हर दौर में ज्ञान तथा कर्म में सर्वश्रेष्ठ मुसलमान ही इस पद को संभालते रहे हैं।[52] [52] देखें : क़हतानी की अल-इमामह फ़ी अल-सलात, (पृष्ठ : 9)

2- नमाज़ की इमामत एक शरई ज़िम्मेदारी है, जिसे श्रेष्ठ लोग उठाते हैं। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "लोगों की इमामत वह शख़्स करेगा जो उनमें सबसे अच्छा क़ुर्आन पढ़ने वाला हो..." [53] और यह ज्ञात है कि सबसे अच्छा क़ारी सर्वोत्तम व्यक्ति होता है। अतः इमामत का उसके साथ जोड़ा जाना, इस पद की श्रेष्ठता को दर्शाता है। [54] [53] सहीह मुस्लिम : 673। वर्णनकर्ता अबू मसऊद अल-अनसारी रज़ियल्लाहु अन्हु। [54] देखें : अल-शर्ह अल-मुम्तिअ (2/41)।

3- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इमामों के लिए मार्गदर्शन की दुआ की है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "इमाम उत्तरदायी है और मुअज़्ज़िन अमानतदार है। ऐ अल्लाह! इमामों को सीधी राह दिखा और मुअज़्ज़िनों को क्षमा कर दे।" [55] [55] सुनन अबू दाऊद (517) तथा सुनन तिर्मिज़ी (207)।

इस हदीस के शब्दों : "इमाम उत्तरदायी है" का अर्थ यह है कि इमाम मुक़तदियों की नमाज़ के सही होने का उत्तरदायी है। क्योंकि मुक़तदियों की नमाज़ उसकी नमाज़ से जुड़ी हुई है। जबकि आपके शब्दों : "ऐ अल्लाह! इमामों को सही मार्ग दिखा।" का अर्थ यह है कि उनका सटीकता की ओर मार्गदर्शन कर; ताकि वे बेहतर से बेहतर अंदाज़ में नमाज़ अदा कर सकें। [56] [56] देखें : ऐनी की शर्ह सुनन अबू दाऊद 2/468 तथा मुनावी की फ़ैज़ अल-क़दीर 3/182।

तीसरा बिंदु : इमामत का अधिक हक़दार

इमाम बनने का सबसे हक़दार और इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति कौन है, इसका उल्लेख अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कर दिया है। फ़रमाया है : "लोगों की इमामत वह शख़्स करेगा जो उनमें सबसे अच्छा क़ुर्आन पढ़ने वाला हो। यदि इसमें सब बराबर हों तो वह व्यक्ति इमामत करेगा जो सबसे अधिक सुन्नत का ज्ञान रखता हो। यदि इसमें भी सब बराबर हों तो वह इमामत करेगा जिसने सबसे पहले हिजरत की हो और यदि इसमें भी सब बराबर हों तो इमाम वह बनेगा जिसने सबसे पहले इस्लाम स्वीकार किया हो -और एक रिवायत में है : जो आयु में सबसे बड़ा हो- और कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकार-क्षेत्र में हरगिज़ उसका इमाम न बने।" [57]. इमामत के सबसे ज़्यादा हक़दार लोग इस प्रकार हैं : सहीह मुस्लिम (673)।

1- ऐसा व्यक्ति जिसे क़ुर्आन अधिक याद हो, जो क़ुर्आन ज़्यादा अच्छा पढ़ता हो तथा नमाज़ के मसायल से अवगत हो। अगर दो लोग एक साथ मौजूद हों, जिनमें से एक क़ुर्आन ज़्यादा अच्छा पढ़ता हो और दूसरा क़ुर्आन तो कम अच्छा पढ़ता हो, लेकिन नमाज़ के मसायल से ज़्यादा अवगत हो, तो दूसरे व्यक्ति को तरजीह दी जाएगी। क्योंकि नमाज़ में नमाज़ के मसायल से अवगत होने की ज़रूरत क़ुर्आन बेहतर पढ़ने से कहीं ज़्यादा पड़ती है।

2- उसके बाद ऐसा व्यक्ति जो सुन्नत का अधिक ज्ञान रखता हो। यदि दो लोग क़ुर्आन पढ़ने के मामले में तो बराबर हों, लेकिन एक शरीयत एवं सुन्नत का ज्ञान अधिक रखता हो, तो शरीयत का अधिक ज्ञान रखने वाले को तरजीह दी जाएगी। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "यदि पढ़ने में सब बराबर हों, तो वह व्यक्ति इमामत करेगा जो सबसे अधिक सुन्नत का ज्ञान रखता हो।"

3- फिर वह व्यक्ति जिसने शिर्क की भूमि से इस्लाम की भूमि की ओर हिजरत पहले की हो। जब कई लोग क़ुर्आन पाठ में प्रवीणता एवं सुन्नत के ज्ञान में बराबर हों, तो हिजरत को सामने रखा जाएगा। क्योंकि नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "यदि इसमें भी सब बराबर हों तो वह इमामत करेगा जिसने सबसे पहले हिजरत की हो।"

4- यदि हिजरत के मामले में सब बराबर हों, तो इमाम बनने का अधिक हक़दार वह होगा, जिसने पहले इस्लाम ग्रहण किया हो। क्योंकि पिछली हदीस में आया है : "यदि हिजरत में भी सब बराबर हों, तो सबसे पहले इस्लाम लाने वाला (इमामत करेगा)।" इस हदीस में आए हुए शब्द "سِلمًا" का अर्थ है, इस्लाम लाने में।

5- फिर अगर पिछले सभी मामलों में सब लोग बराबर हों, तो उम्र में बड़े व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाएगी। क्योंकि पिछली हदीस की एक रिवायत में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्द हैं : ''ते उनमें उम्र में सबसे बड़ा।'' इस तरह मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाते हैं : "तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।" [58] [58] सहीह बुख़ारी : (628), सहीह मुस्लिम : (674)।

इस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आयु में बड़े व्यक्ति को प्राथमिकता इसलिए दी कि सभी लोग ज्ञान में लगभग समान थे।

यदि वे उपर्युक्त सभी चीज़ों में समान हों और उनमें विवाद हो जाए तथा हर कोई इमाम बनने का इच्छुक हो, तो उनके बीच क़ुरआ-अंदाज़ी की जाएगी। जो क़ुरआ-अंदाज़ी में विजयी होगा, उसे आगे किया जाएगा; क्योंकि सभी लोग अधिकार में समान हैं और सब को इमाम बना देना संभव नहीं है। इसलिए उनके बीच अन्य अधिकारों की तरह क़ुरआ-अंदाज़ी की जाएगी।

घर का मालिक अतिथि से इमामत का अधिक हक़दार है। इसी तरह इस्लामी राज्य का शासक अन्य लोगों की तुलना में इमाम बनने का अधिक हक़दार है। क्योंकि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : ''कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की उसके घर वालों के बीच इमामत न करे और न उसके आधिपत्य-क्षेत्र में।''

इसी तरह मस्जिद का नियुक्त इमाम भी अन्य लोगों की तुलना में इमाम बनकर नमाज़ पढ़ाने का अधिक हक़दार है। चाहे दूसरे लोग उससे अधिक अच्छा क़ुर्आन पढ़ने वाले और सुन्नत के अधिक जानकार ही क्यों न हों। इसका प्रमाण पीछे गुज़री हुई हदीस की व्यापकता है। लेकिन इस्लामी राज्य का शासक नियुक्त इमाम से अधिक हक़ रखता है।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का एक गुलाम था, जो मस्जिद में नमाज़ पढ़ता था। एक बार अब्दुल्लाह वहाँ पहुँच गए और उनके ग़ुलाम ने उनको आगे बढ़ाना चाहा, तो फ़रमाया : "तुम अपनी मस्जिद में इमामत के सबसे ज़्यादा हक़दार हो।" [59] [59] इसे शाफ़िई ने "अल-उम्म" 1/185, अब्दुर्रज़्ज़ाक़ ने "अल-मुसन्नफ़" 2/399 में तथा बैहक़ी ने (3/126) (हदीस संख्या : 5531) ने रिवायत किया है। नववी ने "अल-ख़ुलासह" 2/701 में कहा है : इसकी सनद हसन या सहीह है। जबकि अलबानी ने "इरवा अल-ग़लील" 2/302 में इसकी सनद को हसन कहा है।

क्योंकि उसपर किसी और को तरजीह देना उसके अधिकार का अतिक्रमण और उसके दिल को तोड़ना है।

भले-बुरे की पहचान रखने वाला बच्चा इमाम बन सकता है या नहीं, इस बारे में अलग-अलग मत हैं। कुछ इस्लामी विद्वानों ने जायज़ कहा है और इनका प्रमाण अम्र बिन सलिमा रज़ियल्लाहु अन्हु की यह हदीस है कि "उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में अपनी क़ौम की इमामत की, जबकि वह छह या सात साल के थे।"[60] (60) सहीह बुख़ारी : (4302)।

नफ़ल नमाज़ पढ़ रहा व्यक्ति फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्तियों का इमाम बन सकता है। इसकी दलील मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु की यह हदीस है कि "वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ इशा की नमाज़ पढ़ते, फिर लौटकर अपनी क़ौम को वही नमाज़ पढ़ाते थे।" [61] (61) सहीह बुख़ारी (701), सहीह मुस्लिम (465)।

चौथा बिंदु : किसकी इमामत हराम है :

निम्नलिखित परिस्थितियों में इमामत हराम है :

1- किसी महिला का पुरुष का इमाम बनना। इसका प्रमाण इस हदीस की व्यापकता है : "वह क़ौम कदापि सफल नहीं होगी, जो अपनी बागडोर किसी औरत के हाथ में दे दे।" [62], किसी को इमाम बनाना भी एक तरह से अपनी बागडोर उसके हाथ में देना है। दूसरी बात यह है कि औरत को मूल रूप से शिक्षा यह दी गई है कि वह पुरुषों की सफ़ों के बाद पीछे खड़ी होगी। यह बात हदीस से साबित है। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''पुरुषों के लिए सबसे उत्तम सफ़ सबसे पहली सफ़ है और सबसे बुरी सफ़ सबसे अंतिम सफ़ है। जबकि महिलाओं के लिए सबसे उत्तम सफ़ अंतिम सफ़ है तथा सबसे बुरी सफ़ सबसे पहली सफ़ है।'' [63], ऐसा निर्देश उसकी सुरक्षा एवं पर्दे को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। अतः यदि उसे इमामत के लिए आगे किया जाए, तो यह इस शरई उसूल के विरुद्ध होगा। इस मसले में इस्लामी विद्वानों का इजमा (मतैक्य) है। इमाम इब्न-ए-हज़्म रहिमहुल्लाह कहते हैं : "इसमें सर्वसम्मति है कि कोई औरत पुरुषों की इमामत नहीं कर सकती, जब मुक़तदी जानते हों कि नमाज़ औरत पढ़ा रही है। अतः, यदि वे ऐसा कर लें, तो उनकी नमाज़ नहीं होगी, इस बात पर सर्वसम्मति है।" [64] [62] इस हदीस को बुख़ारी (4425) ने अबू बकरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। सहीह मुस्लिम (440)। [64] मरातिब अल-इज्मा : (स. 27)।

2- नापाकी की हालत में इमामत करना, जबकि उसे इसका ज्ञान हो। अगर मुक़तदी इस बात से अवगत न हों और नमाज़ पूरी हो जाए तो उनकी नमाज़ सही होगी। क्योंकि उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि "उन्होंने जनाबत की अवस्था में लोगों को नमाज़ पढ़ा दी और बाद में ख़ुद तो नमाज़ दोहरा ली, लेकिन लोगों को दोहराने का आदेश नहीं दिया।" [65] [65] सुनन दारक़ुतनी (1371)।

अब्दुर रहमान बिन महदी -अल्लाह उनपर दया करे- कहते हैं : "यह सर्वसम्मत है कि जनाबत की हालत में नमाज़ पढ़ाने वाला इमाम अपनी नमाज़ दोहराएगा, जबकि उसके पीछे नमाज़ पढ़ रहे मुक़तदी नमाज़ नहीं दोहराएँगे।"[66]. [66] सुनन दारक़ुतनी : 2/188।

3- जो व्यक्ति सूरा फ़ातिहा याद नहीं रखता, उसे सही से पढ़ नहीं सकता या उसमें ऐसे अक्षरों को एक-दूसरे से मिला देता हो, जिन्हें मिलाना नहीं चाहिए, मसलन इस आयत में हा और रा को मिला दे : "हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह की है, जो सारे संसारों का पालनहार है।" [सूरा फ़ातिहा : 2] क्योंकि उसने एक अक्षर को दूसरे ऐसे अक्षर से मिला दिया जो न तो उसके समान है और न ही उसके निकट, या फिर वह सूरा फ़ातिहा पढ़ते समय एक अक्षर को दूसरे अक्षर से बदल दे, जैसे रा को या से बदल दे या इस तरह से गा-गाकर पढ़े कि अर्थ ही बदल जाए, तो ऐसा व्यक्ति केवल अपने जैसे लोगों ही का इमाम बन सकता है। क्योंकि वह नमाज़ के एक स्तंभ को अदा करने की क्षमता नहीं रखता या फिर उसमें ख़लल डाल दे रहा है।

4- ऐसे बिद्अती की इमामत जो अपनी बिद्अत के कारण काफ़िर हो जाता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तो क्या वह व्यक्ति जो ईमान वाला हो, उसके समान है, जो अवज्ञाकारी हो? वे समान नहीं हो सकते।" [सूरा सजदा : 18]، यहाँ फासिक़ से अभिप्राय काफ़िर है, जैसा कि आयतों के संदर्भ से स्पष्ट होता है।

5- जिस मस्जिद का कोई निर्धारित इमाम हो, उसमें किसी और की इमामत हराम है। अतः, निर्धारित इमाम से पहले किसी और की इमामत सही नहीं होगी। हाँ, वह अनुमति दे दे या देर से आए और समय संकीर्ण हो, तो बात अलग है।[67] [67] देखें : सलमान की पुस्तक, अल-असइलह वल-अजविबह अल-फ़िक़्हिय्यह : (1/163)।

पाँचवाँ बिंदु : किसकी इमामत मकरूह है

निम्नलिखित लोगों की इमामत मकरूह है :

1- क़ुर्आन पढ़ने में बहुत ज़्यादा ग़लतियाँ करने वाला : अगर ग़लतियाँ ऐसी न हों कि अर्थ ही बदल जाए, मसलन (الحمدَ لله) यानी दाल के फ़त्हे के साथ पढ़े, तो नमाज़ सही हो जाएगी, लेकिन उसका इमाम बनकर नमाज़ पढ़ाना मकरूह है। ग़लतियाँ चाहे सूरा फ़ातिहा में हों या किसी और सूरा में। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "लोगों की इमामत वह शख़्स करेगा जो उनमें अल्लाह की किताब को सबसे अच्छा पढ़ने वाला हो।" [68] [68] इसके हवाले पीछे गुज़र चुके हैं।

ग़लतियाँ अगर सूरा फ़ातिहा के बाद शेष क़िरात में हों और ऐसी हों कि अर्थ बदल जाए, भूलवश हों, अज्ञानता के कारण हों या ज़बान में दोष होने के कारण, तो उसकी इमामत कराहत के साथ सही होगी। क्योंकि सूरा फ़ातिहा के बाद कुछ न पढ़े तब भी नमाज़ हो जाएगी, इसलिए ग़लती होने पर भी हो जाएगी। लेकिन अगर ग़लती जान-बूझर करे, तो नमाज़ नष्ट हो जाएगी, क्योंकि वह अपनी नमाज़ के साथ खिलवाड़ करने वाला ठहरेगा।

2- जो व्यक्ति कुछ अक्षरों को दोहराए, जैसे कि 'फ़ा' या 'ता' या अन्य किसी अक्षर को दोहराए, तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ना मकरूह है। क्योंकि वह क़ुर्आन के अक्षरों में वृद्धि कर रहा है।

3- फ़ासिक़ तथा वह बिदअती जो अपनी बिदअत के कारण काफ़िर नहीं होता[69]। [69] देखें : कश्शाफ़ अल-क़िना : (1/475 तथा आगे)।

4- जो व्यक्ति ऐसे लोगों की इमामत करे, जो उसे नापसंद करते हों और इसका कोई उचित कारण भी हो। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "तीन लोग ऐसे हैं जिनकी नमाज़ उनके कानों से ऊपर नहीं जाती : भागा हुआ गुलाम जब तक कि वह वापस न आ जाए; वह औरत जो इस हाल में रात गुज़ारे कि उसका शौहर उससे नाराज़ हो और किसी क़ौम का वह इमाम, जिसे उसकी क़ौम नापसंद करती हो।" [70] [70] इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है (हदीस संख्या : 360), और कहा है : यह हदीस इस सनद से हसन ग़रीब है।

इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं : "कुछ विद्वानों ने इस बात को मकरूह समझा है कि कोई व्यक्ति ऐसे लोगों की इमामत करे, जो उसे नापसंद करते हों। लेकिन अगर इमाम ज़ालिम न हो, तो गुनाह उसी पर होगा, जो उसे नापसंद करे। इमाम अहमद एवं इस्हाक़ ने इस विषय में कहा है कि अगर एक, दो या तीन लोग उसे नापसंद करें, तो उनके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हर्ज नहीं है, जब तक कि अधिकतर लोग उसे नापसंद न करें।"[71] [71] सुनन तिरमिज़ी : (2/192)।

यदि लोग इमाम को इसलिए नापसंद करते हों कि वह नमाज़ में सुन्नत का अनुसरण करता है, चुनाँचे वह उन्हें नमाज़ पढ़ाते समय मसनून सूरतें पढ़ता है और इत्मीनान व सुकून के साथ नमाज़ पढ़ाता है, तो उसकी इमामत नापसंदीदा नहीं होगी; क्योंकि लोगों का उसे नापसंद करना अकारण है। अतः उनकी नापसंदगी का कोई महत्व नहीं है। यदि वे उसे अकारण नापसंद करते हों, तो उसे चाहिए कि उन्हें नसीहत करे, समझाए और उनके दिलों को जोड़े तथा सुन्नत के अनुसार ही नमाज़ पढ़ाए। जब अल्लाह उसकी नीयत में उनके बीच मेल-जोल पैदा करने की सच्चाई को जान लेगा, तो उसके लिए इस काम को आसान कर देगा।[72]। [72] देखिए: अल-शर्ह अल-मुम्ते अला ज़ाद अल-मुस्तक़्ने : 4/253।

छठा बिंदु : मुक़तदियों के साथ इमाम के खड़े होने का स्थान

सुन्नत यह है कि इमाम मुक़तदियों से आगे खड़ा हो। मुक़तदी दो या अधिक हों, तो इमाम के पीछे खड़े होंगे। क्योंकि अल्लाह के रसूल ﷺ जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो आगे बढ़ जाते और आपके साथी आपके पीछे खड़े होते। इसी तरह एक हदीस में है कि "जाबिर और जब्बार (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) में से एक आपके (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) दाएँ और दूसरा आपके बाएँ खड़ा हो गया, जबकि आप नमाज़ पढ़ रहे थे, तो आपने दोनों के हाथ पकड़कर उन्हें अपने पीछे खड़ा कर दिया।" [73] [73] सहीह मुस्लिम : 3010। जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु की एक लंबी हदीस का अंश।

मुक़तदी एक ही हो तो इमाम के दाएँ उसके ठीक सामने खड़ा होगा। क्योंकि अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा का कथन है : "अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) नमाज़ के लिए खड़े हुए, तो मैं आपके बाएँ खड़ा हो गया। ऐसे में, आपने मेरा कान पकड़ा और मुझे घुमाकर अपने दाएँ कर दिया।" [74] [74] सहीह बुख़ारी (6316), सहीह मुस्लिम (763)।

महिलाएँ पुरुषों की पंक्तियों के पीछे खड़ी होंगी; क्योंकि अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है : "मैंने और यतीम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे सफ़ बनाई और बूढ़ी औरत हमारे पीछे थी।" [75] (75) सहीह बुख़ारी (380), सहीह मुस्लिम (658)।

इमाम को क़तार के बीचों-बीच खड़ा होना चाहिए। इब्न-ए-बाज़ रहिमहुल्लाह कहते हैं : "सुन्नत यह है कि इमाम मस्जिद में बीच में हो। यही वह व्यावहारिक सुन्नत है जिस पर मुसलमानों का अमल रहा है।"[76] [76] इस बात को शैख़ सईद क़हतानी (रहिमहुल्लाह) ने अपनी किताब "अल-इमामह फ़ी अल-सलाह" (पृष्ठ : 55) में नक़ल किया है।

वह एक और स्थान में कहते हैं : "सफ़ की शुरुआत इमाम के पीछे बीच से होती है। हर सफ़ का दायाँ हिस्सा उसके बाएँ हिस्से से उत्तम है तथा अनिवार्य यह है कि कोई सफ़ तब तक शुरू न की जाए, जब तक उससे पहले वाली सफ़ पूरी न हो जाए।"

सातवाँ बिंदु : इमाम से आगे बढ़ना

मुक़तदी को चाहिए कि वह नमाज़ के कार्यों को अपने इमाम के बाद शुरू करे और उसका अनुसरण करते हुए सारे कार्य करे। अनुयायी और मुक़तदी का यह स्वभाव होता है कि वह अपने इमाम से आगे न बढ़े, न उसके बराबर चले, बल्कि उसकी स्थिति पर नज़र रखे और उसके कार्यों के बाद उसी प्रकार कार्य करे। इसका तात्पर्य यह है कि वह किसी भी स्थिति में उससे भिन्नता न दिखाए; क्योंकि यह बात अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से प्रमाणित है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है : "इमाम इसलिए बनाया गया है कि उसका अनुसरण किया जाए। अतः उससे भिन्नता न दिखाओ। जब वह रुकू करे तो तुम लोग भी रुकू करो, जब वह "سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ" (समि अल्लाहु लिमन हमिदहु) कहे तो तुम लोग "رَبَّنَا لَكَ الحَمْدُ" (रब्बना लकल-हम्द) कहो, जब वह सजदा करे तो तुम लोग भी सजदा करो और जब वह बैठकर नमाज़ पढ़े तो तुम सब लोग भी बैठ कर नमाज़ पढ़ो। नमाज़ में सफ़ सीधी कर लिया करो, क्योंकि सफ़ सीधी करना नमाज़ को सुंदर बनाने वाली चीज़ों में से है।" [77] [77] सहीह बुख़ारी (722), सहीह मुस्लिम (417)।

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि एक दिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें नमाज़ पढ़ाई। जब नमाज़ पूरी हो गई तो अपना मुंह हमारी तरफ़ कर लिया और फ़रमाया : "ऐ लोगो! बेशक मैं तुम्हारा इमाम हूँ, इसलिए रुकू, सजदे, क़ियाम और सलाम फेरने में मुझसे आगे मत बढ़ो; क्योंकि मैं तुम्हें अपने सामने और अपने पीछे से देख लेता हूँ।" [78]. अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "क्या तुममें से कोई व्यक्ति, जो इमाम से पहले अपना सर उठाता है, इस बात से नहीं डरता कि अल्लाह उसके सर को गधे का सर बना दे अथवा उसकी आकृति को गधे की आकृति में बदल दे?" [79] [78] सहीह मुस्लिम (426)। [79] सहीह बुख़ारी (691), सहीह मुस्लिम (427)।

जिसने अपने इमाम से पहले तकबीर-ए-तहरीमा कह दी, उसकी नमाज़ नहीं होगी; क्योंकि शर्त यह है कि मुक़तदी तकबीर अपने इमाम के बाद कहे। इसलिए, देखा जाए तो उसकी तकबीर छूट गई।

आठवाँ बिंदु : इमामत और जमात से संबंधित विभिन्न मसायल

इमामत और जमात से संबंधित कुछ मसायल पीछे गुज़र चुके हैं और कुछ इस प्रकार हैं :

1- इमाम के क़रीब समझदार और बुद्धिमान लोगों का होना मुसतहब है। इसलिए, समझदार और फ़ज़ीलत वाले वयस्क लोगों को इमाम के पीछे और उसके निकट खड़ा होना चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है : "नमाज़ में मेरे पीछे मुझसे सबसे करीब वयस्क और बुद्धिमान लोग खड़े हों, फिर वे जो (इन गुणों में) उनसे करीब हों, फिर वे जो उनसे करीब हों।" [80] [80] सहीह मुस्लिम : 432। वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु।

2- पहली सफ़ में खड़े होने का प्रयास करना : मुक़तदियों के लिए पहली सफ़ में खड़ा होना और इसका प्रयास करना मुसतहब है। उन्हें पहली सफ़ से पीछे रहने से बचना चाहिए। अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा में पीछे रहने की प्रवृत्ति देखी, तो उनसे कहा :

"आगे बढ़ो तथा मेरा अनुसरण करो एवं तुम्हारा अनुसरण तुम्हारे बाद वाले करें। लोग जब निरंतर पीछे होते रहते हैं, तो अल्लाह भी उन्हें पीछे कर देता है।" [81], अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''यदि लोग जानते कि अज़ान एवं पहली पंक्ति में क्या नेकी है, तो यदि इसके लिए उनको क़ुरआ निकालना पड़ता तो वह ऐसा भी करते।'' [82], और इस हदीस में आए हुए शब्द "لَاسْتَهَمُوا عَلَيْهِ" का अर्थ है : आपस में इस बात के लिए क़ुरआ अंदाज़ी करते कि इमाम के पीछे कौन खड़ा होगा। [81] सहीह मुस्लिम (438)। [82] सहीह बुख़ारी : 615, सहीह मुस्लिम : 437.

महिलाओं के लिए पीछे की सफ़ों में खड़ा होना मुसतहब है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : ''पुरुषों के लिए सबसे उत्तम सफ़ सबसे पहली सफ़ है और सबसे बुरी सफ़ सबसे अंतिम सफ़ है। जबकि महिलाओं के लिए सबसे उत्तम सफ़ अंतिम सफ़ है तथा सबसे बुरी सफ़ सबसे पहली सफ़ है।'' [83]. यह बात उस स्थिति के लिए कही गई है, जब महिलाएँ पुरुषों के पीछे बिना किसी पर्दे के नमाज़ पढ़ रही हों। अगर वे पुरुषों से अलग किसी पर्दे वाली जगह में नमाज़ पढ़ें, तो वे भी पहले पहली सफ़ और उसके बाद उसके बाद वाली सफ़ को पूरा करेंगी।[84] [83] सहीह मुस्लिम (440)। [84] देखें : मजमू फतावा इब्न-ए-बाज़ (12/196)।

3- इमाम को सूरा फ़ातिहा जल्दी-जल्दी नहीं, बल्कि ठहर-ठहर कर पढ़ना चाहिए, ताकि मुक़तदी उसके पीछे-पीछे पढ़ सकें। [85] [85] देखें: "अल-मिन्ज़ार फ़ी बयान कसीर मिन अल-अख़्ता अल-शाइअह", लेखक: सालेह आल- अल-शैख, पृष्ठ : (53)।

4- सफ़ के पीछे अकेले व्यक्ति की नमाज़ दुरुस्त नहीं होगी। क्योंकि वाबिसा बिन माबद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि एक व्यक्ति ने सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ी, तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे नमाज़ दोहराने का आदेश दिया। [86] [86] इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है : (230), तथा उन्होंने कहा है : वाबिसा की हदीस हसन है।

नवाँ बिंदु : वो सुन्नतें जिनका पालन इमाम को करना चाहिए

इमाम को चाहिए कि नमाज़ पढ़ाते समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नतों का पालन करे। इमामत से संबंधित कुछ सुन्रतें इस प्रकार हैं :

1- नमाज़ हल्की पढ़ाए और लोगों की परिस्थितियों का ध्यान रखे। लेकिन इतनी तेज़ भी न पढ़ाए कि मुक़तदी नमाज़ के स्तंभों एवं अनिवार्य कार्यों को अदा न कर सकें। इमाम को अपनी क़िरात में भी इतना ठहराव रखना चाहिए कि उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले अपनी नमाज़ पूरी कर सकें। अबू मसऊद अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि एक व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की क़सम ! ऐ अल्लाह के रसूल! मैं सुबह की नमाज़ में सिर्फ़ अमुक व्यक्ति की वजह से पीछे रह जाता हूँ। क्योंकि वह नमाज़ बहुत लम्बी पढ़ाता है। चुनाँचे मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कभी उस दिन से अधिक क्रोधित होकर उपदेश देते हुए नहीं देखा। इस दौरान आपने कहा : "तुममें से कुछ लोग नफ़रत दिलाने वाले हैं। तुममें से जो व्यक्ति लोगों को नमाज़ पढ़ाए, उसे चाहिए कि हल्की नमाज़ पढ़ाए, क्योंकि मुक़तदियों में कमज़ोर, बूढ़े और ज़रूरतमन्द लोग भी होते हैं।" [87] [87] सहीह बुख़ारी (90)।

2- नमाज़ शुरू करने से पहले सफ़ों को बराबर करने और खाली स्थानों को भरने का आदेश दे; क्योंकि अल्लाह के नबी ﷺ ने ख़ुद भी ऐसा किया है और नमाज़ियों को इसका आदेश भी दिया है। नौमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है : अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमारी सफ़ें इस हद तक सीधी करवाया करते थे कि गोया आप उनसे तीर सीधा कर रहे हों। यहाँ तक कि आप को इतमीनान हो गया कि हमने आपसे यह मसला समझ लिया है। फिर एक दिन आप बाहर निकले और खड़े हो गए। फिर तकबीर कहने ही वाले थे कि एक आदमी को देखा कि उसका सीना सफ़ से बाहर निकला हुआ है। अतः आपने फ़रमाया : "अल्लाह के बंदो! तुम अपनी सफ़ें ज़रूर सीधी कर लिया करो, अन्यथा अल्लाह तुम्हारे दिलों में विभेद डाल देगा।" [88] [88] सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : (717) तथा सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या: (436)। शब्द सहीह मुस्लिम के हैं।

इमाम नववी रहिमहुल्लाह कहते हैं : 'अल-क़िदाह़' (क़ाफ़ के ज़ेर के साथ) से मुराद तीर की वह लकड़ी है, जिसे तराश और छीलकर तैयार किया जाता है। इस हदीस का अर्थ है : आप सफ़ें सीधी करने में अतिशयोक्ति से काम लेते और सफ़ें इस तरह सीधी कर लेते कि गोया उनसे तीर सीधा करना चाहते हों।[89] [89] इमाम नववी की सहीह मुस्लिम की शर्ह : (4/157).

3- मुक़तदियों को आदेश दे कि पहले पहली सफ़ को पूरा कर लें और उसके बाद उसके बाद की सफ़ को। अगर कोई कमी रहे, तो अंतिम सफ़ में रहे। क्योंकि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : "तुम उस प्रकार से सफ़ें क्यों नहीं बनाते, जिस प्रकार से फ़रिश्ते अपने रब के पास सफ़ बनाते हैं?" हमने पूछा : "ऐ अल्लाह के रसूल! फरिश्ते अपने रब के पास कैसी सफ़ बनाते हैं? तो आपने कहा : "पहले पहली सफ़ों को पूरा करते हैं और पंक्तियों में एक-दूसरे से मिलकर खड़े होते हैं।" [90] [90] सहीह मुस्लिम : 430। वर्णनकर्ता जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु।

4- नमाज़ में अल्लाह के नबी ﷺ की क़िरात का अनुसरण करे। अल्लाह के नबी ﷺ अकसर फ़ज्र की नमाज़ में तिवाल-ए-मुफ़स्सल, मग़्रिब में क़िसार-ए-मुफ़स्सल तथा ज़ुहर, अस्र एवं मग़्रिब में औसात-ए-मुफ़स्सल की सूरतें पढ़ा करते थे। सुलैमान बिन यसार ने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि वह कहते हैं : "मैंने अमुक व्यक्ति से ज़्यादा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ से मिलती-जुलती नमाज़ किसी के पीछे नहीं पढ़ी। सुलैमान ने कहा : वह ज़ुहर की पहली दो रकातें लंबी और आख़िरी दो हल्की पढ़ते थे, अस्र की नमाज़ हल्की पढ़ते थे, मग़्रिब में क़िसार-ए-मुफ़स्सल, इशा में औसात-ए-मुफ़स्सल और फज्र में तिवाल-ए-मुफ़स्सल पढ़ते थे।" [91] [91] सुनन नसई (982)। हाफ़िज़ ने बुलूग़ अल-मराम, हदीस संख्या (286) में इसकी सनद को सहीह कहा है।

तिवाल-ए-मुफ़स्सल : सूरा अल-हुजुरात से सूरा अल-बुरूज तक, औसात-ए-मुफ़स्सल : सूरा अल-बुरूज से सूरा अल-बय्यिनह तक और क़िसार-ए-मुफ़स्सल : सूरा अल-बय्यिनह से क़ुर्आन के अंत तक। [92] [92] देखिए : "मिरक़ात अल-मफ़ातीह" (2/700)।

दसवाँ बिंदु : इमाम की विशेषताएँ

मस्जिद का इमाम, मस्जिद का स्तंभ और उसकी शक्ति होता है। उसी के द्वारा मस्जिद इस्लाम के प्रचार-प्रसार, समाज को जागरूक करने और लोगों को उनके धर्म से अवगत कराने के अपने कर्तव्य को पूरा करती है। यदि इमाम विद्वान, बुद्धिमान, दूरदर्शी और लोगों की आदतों और परिस्थितियों से परिचित हो, तो मस्जिद की जमात और उस मुहल्ले के निवासियों पर उसका अच्छा और उचित प्रभाव पड़ता होता है। वह उन्हें शिक्षा देता है, उनका मार्गदर्शन करता है और उनको हर भलाई और अच्छी की ओर ले जाता है।

इमामत की शर्तों को पूरा करने वाले इमाम कुछ ऐसे ही हुआ करते थे। इस्लाम के आरंभिक काल में ख़ुद अल्लाह के नबी ﷺ इमाम थे, फिर आपके मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण इमाम हुए, फिर शासक, उलेमा और बड़े-बड़े विद्वानों ने यह ज़िम्मेवारी अदा की, जो यह दर्शाता है कि इस पद को संभालने वाला व्यक्ति धर्म, आचरण, ज्ञान और व्यवहार में उच्च स्थान पर होना चाहिए।

इससे लोगों के जीवन में इस काम का महत्व स्पष्ट होता है। क्योंकि इमामों की शक्ति उनके समाजों पर दिखाई देती है और उनकी कमज़ोरी का प्रभाव भी उनके समाजों पर दिखाई देता है। क्योंकि मस्जिद ही समाज को कथनी और करनी के बीच एकरूपता रखना सिखाती है। यदि इमाम ज्ञान या बुद्धि-विवेक में कमज़ोर हो या उसका आचरण और व्यवहार खराब हो, तो वह लाभ की बजाय हानि पहुँचाता है। यदि इमाम का कार्य नमाज़ियों को भलाई, परोपकार और सुधार की ओर ले जाना हो, तो अज्ञानी इमाम के लिए इस महान कार्य को पूरा करना कठिन है।

कभी-कभी इमाम इस पद के लिए आवश्यक ज्ञान और व्यक्तिगत क्षमता की शर्तों को पूरा तो करता है, लेकिन अन्य कार्यों में व्यस्त होने के कारण अपनी ज़िम्मेवारी ठीक से अदा नहीं कर पाता और इमामत का काम प्रभावित होता है। मसलन नमाज़ के लिए देर से आता है, उसे नमाज़ में पढ़ी जाने वाली आयतों एवं सूरतों को देखने का उचित समय नहीं मिल पाता, जिसके कारण कुछ निर्धारित आयतें एवं सूरतें ही पढ़ा करता है और उनसे आगे नहीं बढ़ा पाता।

कभी-कभी इच्छाएँ, अज्ञानता, विवाद या निंदनीय अतिवाद आदि उसपर हावी हो जाते हैं, जिससे वह वस्तुनिष्ठता, शैक्षिक मार्गदर्शन और बुद्धिमत्ता व अच्छी नसीहत के साथ आह्वान का काम नहीं कर पाता।

मस्जिद का इस्लाम में अत्यधिक प्रभाव है। यह हिदायत का मीनार है, जहाँ बंदा अपने रब से जुड़ता है, अपने ईमान को मज़बूत करता है और अपने भाइयों से मिलता है, ताकि सब मिलकर भलाई का प्रचार करें और बुराई से रोकें। मस्जिद इस कार्य में तभी सक्षम हो सकती है जब अल्लाह इसके लिए ऐसा इमाम उपलब्ध कर दे, जिसमें इस महान पद को संभालने के लिए आवश्यक ज्ञान और नैतिक गुण हों और जो इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभा सके।

इमाम की कुछ महत्वपूर्ण योग्यताएँ :

1- विशुद्ध रूप से अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए काम करे, ताकि अल्लाह और लोगों के यहाँ समर्थन, सहयोग, स्नेह एवं स्वीकार्यता प्राप्त कर सके।

2- रिया और दिखावे से दूर रहे। क्योंकि हर कार्य उसके उद्देश्य के आधार पर तोला जाता है तथा सभी कार्यों का दारोमदार नीयतों पर है। हर व्यक्ति को वही मिलता है जिसकी उसने नीयत की होती है। जो व्यक्ति अपने अंदर न होने वाली चीज़ से सजता है, अल्लाह उसे अपमानित करता है।

3- अल्लाह की किताब या उसके कुछ अंश को याद रखे, याद किए हुए भाग को दोहराता रहे और प्रत्येक दिन क़ुर्आन का एक निश्चित भाग पढ़े।

4- कुछ हदीसें याद रखे। यह हदीसें रियाज़ अल-सालिहीन, अरबईन नववी, बुलूग़ अल-मराम अथवा किसी अन्य मुसतनद किताब की हो सकती हैं।

5- सही अक़ीदा, सदाचारी पूर्वजों का अक़ीदा सीखे।

6- दीन से संबंधित विधि-विधानों को सीखे। खास तौर से इबादतों से संबंधित विधि-विधानों को। इनमें भी तहारत, नमाज़, ज़कात और रोज़े से संबंधित विधि-विधानों अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह मामलात से संबंधित विधि-विधानों को सीखे, ताकि धन अर्जित करने और खर्च करने से संबंधित सिद्धांतों को जान सके और लोगों को धोखा, फ़रेब और ग़लत तरीक़े से धन कमाने एवं इसी तरह फ़ज़ूलखर्ची और कंजूसी आदि से सावधान कर सके, ताकि लोगों की वित्तीय गतिविधियाँ सुन्नत के अनुरूप हों।

7- अरबी भाषा में दक्षता प्राप्त करे, ताकि क़ुर्आन, जो अरबी भाषा में उतारा गया था, के अर्थों को जान सके।

8- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जीवनी, आचार-विचार और सदाचारी पूर्वजों की जीवनी पढ़े। क्योंकि ये अच्छे आदर्श, उत्तम अनुसरण, लाभकारी ज्ञान की संपत्ति और उच्च इस्लामी संस्कृति है का भंडार हैं।

9- अपने इलाक़े के विद्वानों और अन्य मज़बूत ज्ञान रखने वाले विद्वानों को जाने, जो सही अक़ीदा, ज्ञान और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं और अपने धर्म के सभी आवश्यक मसलों और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए उनसे संपर्क करे।

10- इस्लामी फिर्क़ों और उनके अक़ायद, विभिन्न वैचारिक धाराओं और उनके उद्देश्यों तथा अलग-अलग विध्वंसक मतों और उनके लक्ष्यों से अवगत हो, ताकि अल्लाह की किताब, उसके रसूल ﷺ की सुन्नत और मुस्लिम विद्वानों द्वारा लिखित प्रमाणित ग्रंथों के प्रकाश में उनकी आलोचना कर सके, उनके झूठ का पर्दाफाश कर सके और उनके फ़रेब से सावधान कर सके।

11- विभिन्न मीडिया साधनों, उनके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ इस बात से भी अवगत हो कि अल्लाह की ओर बुलाने में उनसे कैसे लाभ उठाया जा सकता है तथा उनमें निहित खतरों से स्वयं और समाज को कैसे बचाया जा सकता है।

जब मस्जिद के इमाम के अंदर ये ख़ूबियाँ पाई जाएँगी, तो अल्लाह की अनुमति से उसके अंदर स्थिरता एवं संतुलन आएगा।

ख़तीब के आचरण में यह महत्वपूर्ण बातें भी पाई जाने चाहिए :

1- मस्जिद के इमाम को चाहिए कि वह मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले और आसपास के लोगों के लिए एक आह्वानकर्ता एवं शिक्षक की भूमिका निभाए। उसे रसूलुल्लाह ﷺ को अपना आदर्श बनाना चाहिए, क्योंकि वही सच्चे आदर्श, उत्तम उदाहरण और उम्मत तथा रहुनमाओं के लिए सर्वोच्च मिसाल हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।" [सूरा अहज़ाब : 21]

वह अपने आप को और मस्जिद आने वाले लोगों को सांसारिक और राजनीतिक बातों से दूर रखे। मस्जिद को केवल ज्ञान और इबादत तक सीमित रखे।

2- स्वयं साफ़-सुथरा तथा व्यवस्थित रहे, मस्जिद की सफ़ाई, उसमें मौजूद वस्तुओं की व्यवस्था और रखरखाव का ध्यान रखे, इसमें फ़ज़ूलखर्ची तथा मस्जिद को सजाने से बचे।

3- अच्छे आचरण का मालिक हो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का पालन करते हुए दाढ़ी बढ़ाना और मूंछें काटना, कपड़ों को लटकाने से बचना और गंभीरता एवं शांति का पालन करना आदि का ख़्याल रखे। सदाचारी पूर्वजों का अनुसरण करे।

4- मृदुल, सहनशील और दयालु हो; क्योंकि मृदुलता जिस व्यक्ति में होती है, उसे सुंदर बना देती है और जिससे निकाल ली जाती है, उसे कुरूप कर देती है, जैसा कि आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "नर्मी जिसमें भी होती है, उसे सुंदर बना देती है और जिससे निकाल ली जाती है, उसे कुरूप कर देती है।" [93] सहीह मुस्लिम (2594)।

यदि मस्जिद आने वाले किसी व्यक्ति से कोई ग़लती हो जाए, तो इमाम उसे डाँटे नहीं, बल्कि नर्मी से समझाए और अच्छे तरीके से शिक्षा दे। मुआविया बिन हकम सुलमी रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैं एक बार अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ नमाज़ पढ़ रहा था कि अचानक लोगों में से एक आदमी को छींक आई, तो मैंने "यरहमुकल्लाह" (अल्लाह तुझपर रहम करे) कह दिया। इसपर लोग मुझे घूरने लगे, तो मैंने कहा : मेरी माँ मुझे खो दे! आख़िर क्या बात है कि तुम लोग मुझे घूर रहे हो?! यह सुन वे अपनी जाँघों पर हाथ मारने लगे। जब मैंने देखा कि वे मुझे चुप करा रहे हैं, तो मैं चुप हो गया। जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पूरी नमाज़ पढ़ चुके, तो आपपर मेरे माँ-बाप क़ुरबान हों, मैंने आपसे पहले और आपके बाद आपसे उत्तम शिक्षक नहीं देखा। अल्लाह की क़सम! न तो आपने मुझे डाँटा, न मुझे मारा और न मुझे बुरा-भला कहा। आपने फरमाया : “यह नमाज़ है, इसमें किसी मानवीय बातचीत की अनुमति नहीं है। इसमें तो केवल तसबीह, तकबीर और क़ुर्आन की तिलावत होती है।” [94] [94] सहीह मुस्लिम (537)।

5- नर्म और कोमल हृदय का हो; ताकि लोग उसके चारों ओर इकट्ठा हों और उसकी दया, सहायता और ज्ञान से लाभान्वित हों। इमाम को लोगों के संकट की घड़ियों और आवश्यकताओं में उनके साथ खड़ा होना चाहिए। मस्जिद के संदेश से संबंधित मामलों में उनसे परामर्श करना चाहिए।

इन तमाम बातों में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सबसे उच्च स्थान पर विराजमान थे, जैसा कि अल्लाह तआला ने उनके बारे में फ़रमाया है : "अल्लाह की दया के कारण (ऐ नबी!) आप उनके लिए सरल स्वभाव के हैं। और यदि आप अक्खड़ और कठोर हृदय के होते, तो वे आपके पास से छट जाते। अतः आप उन्हें माफ़ कर दें और उनके लिए क्षमा याचना करें। तथा उनसे भी मामले में परामर्श करें। फिर जब आप दृढ़ संकल्प कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें। निःसंदेह अल्लाह भरोसा करने वालों को पसंद करता है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 159]

6- उसे धैर्य एवं विश्वास से सुसज्जित होना चाहिए और उसकी बातों में सच्चाई होनी चाहिए, ताकि अपनी मस्जिद और अपनी जमात में इमामत के सम्मान का हकदार बन सके; क्योंकि धैर्य और विश्वास बंदे को धर्म में इमामत के दर्जे तक पहुँचाते हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने उनमें से कई अग्रणी (इमाम) बनाए, जो हमारे आदेश से मार्गदर्शन करते थे, जब उन्होंने धैर्य से काम लिया, तथा वे हमारी आयतों पर विश्वास करते थे।" [सूरा सजदा : 24]

7- उसकी बातों में सच्चाई हो। बातें चाहे जुमे के ख़ुतबे के दौरान कही गई हों, शिक्षा एवं उपदेश के दौरान कही गई हों या फिर लोगों के साथ बातचीत के दौरान। इससे उसका शुमार सच्चे, सुपथगामी एवं सफल लोगों में हो सकेगा। एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “सच्चाई को मज़बूती से थाम लो, क्योंकि सच्चाई नेकी (सुकर्म) की राह दिखाती है और नेकी जन्नत की ओर ले जाती है, और एक व्यक्ति सर्वदा सत्य बोलता जाता है तथा सच्चाई की तलाश में लगा रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के निकट सत्यवादी लिख लिया जाता है। और तुम झूठ बोलने से बचो, क्योंकि झूठ बुराई की ओर ले जाता है, और बुराई जहन्नम की ओर ले जाती है, और एक व्यक्ति सदा झूठ बोलता रहता है तथा झूठ ही की खोज में लगा रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के निकट झूठा लिख लिया जाता है।” [95] [95] सहीह बुख़ारी : 6094 तथा सहीह मुस्लिम : 2607। वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु।

झूठ एक बुराई और आपदा है और सबसे बड़ा झूठ अल्लाह पर झूठ बोलना और बिना ज्ञान के उसके बारे में कुछ कहना है। अल्लाह तआला कहता है : "(ऐ नबी!) आप कह दें कि मेरे पालनहार ने तो केवल खुले एवं छिपे अश्लील कर्मों को तथा पाप एवं नाहक़ अत्याचार को हराम किया है, तथा इस बात को कि तुम उसे अल्लाह का साझी बनाओ, जिस (के साझी होने) का कोई प्रमाण उसने नहीं उतारा है तथा यह कि तुम अल्लाह पर ऐसी बात कहो, जो तुम नहीं जानते।" [सूरा आराफ़ : 33]

इस आयत में सभी बड़े गुनाहों को एकत्र कर दिया गया है। क्रम कम बड़े गुनहों से अधिक बड़े गुनाहों का रखा गया है। सबसे बड़ा गुनाह है, अल्लाह के नामों, गुणों और उसकी शरीयत के बारे में बिना ज्ञान के बात करना।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर झूठ बोलना सबसे बड़े झूठों और सबसे बुरा गुनाहों में से एक है। यह उन बड़े गुनाहों में से एक है, जिनके लिए जहन्नम की धमकी दी गई है। मुग़ीरा बिन शोबा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फ़रमाते हुए सुना है : "मुझपर झूट बाँधना और लोगों पर झूट बाँधने की तरह नहीं है। जिसने जान-बूझकर मुझपर झूठ बाँधा, वह अपना ठिकाना जहन्नम बना ले।" [96] [96] सहीह बुख़ारी (1291), सहीह मुस्लिम (4)।

झूठ बोलने से बचे। झूठ चाहे अच्छे इरादे से भलाई की प्रेरणा देने या बुराई से डराने के लिए ही क्यों न बोली जाए, जैसा कि कुछ जनसाधारण को संबोधित करने वाले लोग करते हैं। यह एक बुरी चीज़ है जिसमें कोई भलाई या अच्छाई नहीं है। ऐसा कहने वाला सवाब नहीं, बल्कि गुनाह का हक़दार होता है।

8- शब्दों को नक़ल करने में ईमानदार हो, सूचनाओं के सही या ग़लत होने की छानबीन कर ले, अफ़वाहों को सही मानने में जल्दी न करे और केवल विश्वसनीय बातों पर ही भरोसा करे। अल्लाह तआला ने हमें इस बारे में आदेश देते हुए कहा है : "ऐ ईमान वालो! यदि कोई दुराचारी (अवज्ञाकारी) तुम्हारे पास कोई सूचना लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर लिया करो। ऐसा न हो कि तुम किसी समुदाय को अज्ञानता के कारण हानि पहुँचा दो, फिर अपने किए पर पछताओ।" [सूरा हुजुरात : 6]

9- लोगों की ग़लतियों को छुपाने का पूरा प्रयास करे; क्योंकि जो व्यक्ति किसी मुसलमान की ग़लतियों को छुपाता है, अल्लाह इस दुनिया और आख़िरत में उसकी कमियों को छुपाएगा। जो मुसलमानों की त्रुटियों का पीछा करता है, अल्लाह उसकी त्रुटियों का पीछा करेगा, यहाँ तक कि उसे उसके घर के अंदर भी बेनक़ाब कर देगा। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है : "जो किसी मुसलमान का दोष छुपाएगा, अल्लाह क़यामत के दिन उसके दोषों को छुपाएगा।" [97]. और अबू बरज़ा असलमी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो जो ज़ुबान से ईमान लाए हो, लेकिन ईमान अब तक तुम्हारे दिल में दाखिल नहीं हुआ है! मुसलमानों की ग़ीबत न करो और न उनके अवगुणों की टोह लो। क्योंकि, जो उनके अवगुणों की टोह लेगा, अल्लाह उसके अवगुणों की टोह लेगा, और जिसके अवगुणों की टोह अल्लाह लेगा, उसे उसके घर में ही रुसवा कर देगा।" [98] (97) सहीह बुख़ारी (2442), सहीह मुस्लिम (2580)। [98] अबू दाऊद हदीस संख्या : 4880। इस विषय में देखिए : शैख़ सऊद बिन मुहम्मद अल-बशर की किताब इमामुल मस्जिद : मुक़व्विमातुहु अल-इल्मिय्यह वल-ख़ुलुक़िय्यह।

तीसरा विषय : जुमा की नमाज़ और उसका ख़ुतबा

पहला बिंदु : जुमा की नमाज़

पहला मसला : जुमे की नमाज़ का अर्थ और उसका समय :

1- जुमे की नमाज़ का अर्थ :

जुमा : सप्ताह के दिनों में से एक दिन है, जिसमें एक विशेष नमाज़ पढ़ी जाती है, जो कि जुमा की नमाज़ है। [99] [99] देखें : मोजम लुग़ह अल-फ़ुक़हा, लेखक मुहम्मद रव्वास क़लअजी तथा अन्य, पृष्ठ : 166।

अल्लाह का इस उम्मत को जुमे के दिन का मार्गदर्शन करना एक बड़ी फ़ज़ीलत है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "हम बाद में आए हैं, लेकिन क़यामत के दिन सबसे आगे होंगे। सिर्फ़ इतनी बात है कि उन्हें हमसे पहले किताब दी गई और हमें उनके बाद दी गई। और यही वह दिन है, जो उनपर फ़र्ज़ किया गया था, तो उन्होंने इसमें इख़्तिलाफ़ किया। फिर अल्लाह तआला ने हमारा इसकी ओर मार्गदर्शन दिया। तो वे लोग इसमें (जुमे के बारे में) हमारे पीछे हैं। यहूदी कल (शनिवार को) और ईसाई परसों (रविवार को इबादत करते हैं)।" [100] (100) सहीह बुख़ारी (876), सहीह मुस्लिम (855)।

जुमे का दिन सबसे उत्कृष्ट दिन है, जिसमें सूरज निकलता है; अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सबसे उत्तम दिन जिसमें सूरज निकला, जुमा का दिन है। इसी दिन आदम- अलैहिस्सलाम- पैदा हुए, इसी दिन जन्नत में दाख़िल हुए और इसी दिन वहाँ से निकाले गए।" [101] सहीह मुस्लिम (854)।

एक जुमा दूसरे जुमा तक के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फ़रमाया करते थे : "पाँच नमाज़ें, एक जुमा दूसरे जुमे तक तथा एक रमज़ान दूसरे रमज़ान तक, इनके बीच में होने वाले गुनाहों का कफ़्फ़ारा- प्रायश्चित- बन जाते हैं, यदि बड़े गुनाहों से बचा जाए।" [102] सहीह मुस्लिम (233)।

जुमा की नमाज़ : एक संपूर्ण नमाज़ है, जो रकातों की संख्या, ऊँची आवाज़ में क़िरात, ख़ुतबा और मान्य शर्तों में ज़ुहर की नमाज़ से भिन्न है, अलबत्ता दोनों का समय एक है।

2- जुमे की नमाज़ का समय :

जुमा का समय वही है, जो ज़ुहर का है। यह सूरज ढलने के बाद से लेकर उस समय तक रहता है, जब तक किसी चीज़ की छाया ढलान के समय की छाया के बाद उस चीज़ की लंबाई के बराबर न हो जाए। क्योंकि अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जुमा की नमाज़ उस समय पढ़ते थे, जब सूरज ढल जाता था [103]। अर्थात, जब सूरज पश्चिम की ओर झुक जाता और आकाश के मध्य से हट जाता था। यही ज़ुहर की नमाज़ का भी समय है। [103] सहीह बुख़ारी : (904)।

दूसरा मसला : जुमे की नमाज़ का हुक्म और यह किन लोगों पर वाजिब है?

1- जुमे की नमाज़ का हुक्म :

जुमा की नमाज़ मर्दों पर फर्ज़ है। अल्लाह ने फ़रमाया है : "ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र की ओर दौड़ पड़ो तथा क्रय-विक्रय छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।" [सूरा जुमा : 9] अब्दुल्लाह बिन उमर और अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने मिंबर की सीढ़ियों पर यह कहते हुए सुना है : "लोग जुमा की नमाज़ छोड़ने से रुक जाएँ, वरना अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देगा। फिर वे अचेत रहने वालों में हो जाएँगे।" [104] [104] सहीह मुस्लिम (865)।

मुसलमानों का इस बात पर इज्मा है कि जुमे की नमाज़ वाजिब है। इब्न-ए-मुंज़िर ने कहा है : "इस बात पर सर्वसम्मति है कि जुमे की नमाज़ उन आज़ाद, वयस्क एवं ठहरे हुए लोगों पर फ़र्ज़ है, जिनके पास कोई मजबूरी न हो।" [105] [105] अल-इजमा : (पृ. 40)

2- जुमे की नमाज़ किनपर अनिवार्य है?

जुमे की नमाज़ हर उस मुसलमान पुरुष पर अनिवार्य है जो आज़ाद हो, वयस्क हो, समझ रखने वाला हो, उसे अदा करने की क्षमता रखता हो तथा ठहरा हुआ हो। यह गुलाम, औरत, बच्चे, पागल, बीमार तथा मुसाफिर पर फ़र्ज़ नहीं है। इसका प्रमाण तारिक़ बिन शिहाब रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित यह हदीस है, जिसमें अल्लाह के नबी ﷺ से फ़रमाया है : "जुमा जमात के साथ हर मुसलमान पर वाजिब है, सिवाय चार लोगों के : ग़ुलाम, औरत, बच्चा या रोगी।" [106] [106] सुनन अबू दाऊद : 1067.

जहाँ तक मुसाफिर की बात है, तो उस पर जुमा की नमाज़ वाजिब नहीं है। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सफरों में जुमा की नमाज़ नहीं पढ़ी। हज के दौरान यौम-ए-अरफा जुमा के दिन पड़ा, फिर भी आपने ज़ुहर की नमाज़ पढ़ी और उसके साथ अस्र की नमाज़ को मिला लिया।

इब्न-ए-मुंज़िर ने इसपर इज्मा नक़ल किया है। वह कहते हैं : "इस बात पर सर्वसम्मति है कि बच्चे और महिलाओं पर जुमा नहीं है...इस बात पर भी सर्वसम्मति है कि जुमा उन आज़ाद, वयस्क, ठहरे हुए लोगों पर वाजिब है, जिनके साथ कोई मजबूरी न हो।"[107] [107] अल-इजमा : (पृ. 40)।

यदि कोई गुलाम, महिला, बच्चा, बीमार या यात्री उसमें शामिल हो जाए, तो उसकी नमाज़ सही है और उसे ज़ुहर की नमाज़ पढ़नी नहीं होगी।

जुमा की नमाज़ उन खानाबदोशों पर वाजिब नहीं है जो चरागाह और पानी की तलाश में घूमते रहते हैं, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समय में इस प्रकार के लोग मदीना के आसपास रहते थे और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें जुमे का आदेश नहीं दिया। इमाम अहमद ने कहा है : "बंजारों पर जुमा नहीं है; क्योंकि वे एक स्थान से दूसरा स्थान जाते रहते हैं। यहाँ अनिवार्यता समाप्त होने का कारण उनका स्थानांतरित होते रहना है। इसलिए हर वह व्यक्ति, जो कहीं का स्थायी निवासी हो और अपनी मर्ज़ी से स्थानांतरण न करता हो, वह बस्ती वालों में शुमार होगा।" [108] [108] मजमू अल-फ़तावा (24/166)।

जुमा का आयोजन तीन व्यक्ति हो जाने पर किया जाएगा। एक ख़ुतबा देने वाला और दो सुनने वाले। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "...अल्लाह के ज़िक्र की ओर दौड़ पड़ो..." [सूरा जुमा : 9] यहाँ बहुवचन शब्द लाया गया है और बहुवचन में कम से कम तीन लोग हुआ करते हैं।

तीसरा मसला : जुमा की नमाज़ का तरीक़ा :

जुमा की नमाज़ दो रकात है, जिसमें बुलंद आवाज़ से क़ुर्आन पढ़ा जाता है; क्योंकि पैग़म्बर ﷺ ऐसा किया करते थे और इसपर सभी विद्वान एकमत हैं। इब्न-ए-हज़्म कहते हैं : "इसपर सर्वसम्मति है कि जुमा -जब वह अपनी शर्तों के साथ अदा की जाए- दो रकात है, जिनमें बुलंद आवाज़ से क़िरात की जाएगी।" [109] [109] मरातिब अल-इजमा : (स. 33).

इसकी पहली रकात में सूरा फ़ातिहा के साथ सूरा आला और दूसरी रकात में सूरा फ़ातिहा के साथ सूरा ग़ाशिया पढ़ना सुन्नत है; जैसा कि नौमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) दोनों ईदों और जुमे में "सब्बिहिस्मा रब्बिकल अला” और “हल अता-क हदीसुल ग़ाशियह” पढ़ा करते थे।[110] [110] सहीह मुस्लिम (878)।

या फिर पहली रकात में सूरा फ़ातिहा और सूरा जुमा पढ़े तथा दूसरी रकात में सूरा फ़ातिहा और सूरा मुनाफ़िक़ून। इब्न अबू राफ़े से रिवायत है कि मर्वान ने अबू हुरैरा को मदीना का हाकिम बनाया और खुद मक्का चले गए। अबू हुरैरा ने हमें जुमा की नमाज़ पढ़ाई और सूरा जुमा के बाद दूसरी रकात में "इज़ा जा'अक अल-मुनाफ़िक़ून" पढ़ी। मैं अबू हुरैरा से नमाज़ के बाद मिला और कहा : आपने वो दो सूरतें पढ़ीं जो अली बिन अबी तालिब कूफ़ा में पढ़ते थे, तो अबू हुरैरा ने कहा : "मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को जुमे के दिन यह दोनों सूरतें पढ़ते सुना है।" [111] [111] सहीह मुस्लिम (877)।

चौथा मसला : जुमे की नमाज़ कब मिलती है :

जुमा की नमाज़ इमाम के साथ एक रकात मिल जाने से मिल जाती है; अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "जिसे जुमा या किसी और नमाज़ की एक रकात मिल गई, उसकी नमाज़ पूरी हो गई।" [112] [112] सुनन नसई (557)।

अगर एक रकात से कम मिले, तो ज़ुहर की नमाज़ पढ़ेगा। [113] [113] देखिए : इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी, पृष्ठ : 2/231।

जिसकी जुमा की नमाज़ की एक रकात छूट गई और उसने इमाम को दूसरी रकात में रुकू के दौरान या उससे पहले पा लिया, वह केवल एक रकात की क़ज़ा करेगा। इसका प्रमाण यह हदीस है : "जिसे किसी नमाज़ की एक रकात मिल गई, उसे नमाज़ मिल गई।" [114] [114] अबू दाऊद, हदीस संख्या : 893।

पाँचवाँ विषय : जुमे के दिन हराम या मकरूह कार्य

1- इमाम के ख़ुतबा देने के दौरान बात करना हराम है; क्योंकि अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है : "यदि तुमने जुमे के दिन, इमाम के ख़ुतबा देते समय अपने साथी से कहा कि खामोश हो जा, तो तुमने व्यर्थ कार्य किया।" [115] यानी तूने व्यर्थ बात की और तेरे जुमे की फ़ज़ीलत नष्ट हो गई। [115] सहीह बुख़ारी (934), सहीह मुस्लिम (851)।

अल्लामा नववी कहते हैं : "इस हदीस में ख़ुतबा के दौरान हर तरह की बात करने से मना किया गया है और इसके द्वारा अन्य चीज़ों से भी सचेत कर दिया गया है। क्योंकि जब 'ख़ामोश हो जाओ' कहने को—जो कि असल में एक अच्छे काम का अनुग्रह है—व्यर्थ कार्य कहा गया है, तो मामूली बातें तो और भी ज़्यादा व्यर्थ होंगी।"[116] [116] शर्ह मुस्लिम : (6/ 138)।

ख़ुतबा के दौरान बात करने की मनाही में छींकने वाले को यरहमुकल्लाह कहना और सलाम का जवाब देना भी शामिल है। इसलिए जब इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, तो यह जायज़ नहीं है। लेकिन ख़तीब के ख़ुतबा शुरू करने से पहले या दो ख़ुतबों के बीच में ख़ामोशी के दौरान बात करने में कोई हर्ज नहीं है।

जहाँ तक ख़तीब के साथ मुक़तदी के बात करने की बात है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। अनस बिन मालिक का वर्णन है : "एक व्यक्ति जुमा के दिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के घर, जो उनकी मृत्यु के बाद उनके कर्ज़ की अदायगी के लिए बिक गया था, की दिशा वाले द्वार से मस्जिद के अंदर आया। उस समय रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खड़े ख़ुतबा दे रहे थे। वह रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर मुँह करके खड़ा हो गया, फिर बोला : ऐ अल्लाह के रसूल! माल-मवेशी हलाक हो गए और रास्ते अवरुद्ध हो गए। अल्लाह से दुआ करें कि हमें वर्षा प्रदान करे। अतः रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने दोनों हाथ उठाए..."[117] (117) सहीह बुख़ारी (967), सहीह मुस्लिम (897)।

2- ख़ुतबा के दौरान कंकड़ छूना, तस्बीह का उपयोग करना, मोबाइल फ़ोन में व्यस्त रहना और इस तरह के अन्य काम करना हराम है; क्योंकि अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है : "जिसने (ख़ुतबे के दौरान) कंकड़ को भी छुआ, उसने व्यर्थ कार्य किया।" [118]. ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यर्थ काम व्यक्ति को चिंतन एवं विनय से वंचित कर देता है। (118) सहीह मुस्लिम (857)।

3- ख़ुतबा के दौरान लोगों की गर्दनें फलाँगना हराम है। हदीस में आता है कि अब्दुल्लाह बिन बुस्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा है : एक आदमी जुमे के दिन लोगों की गर्दनें फलाँगता हुआ आया, जबकि नबी ﷺ ख़ुतबा दे रहे थे, तो नबी ﷺ ने उससे फ़रमाया : "बैठ जाओ, क्योंकि तुमने तकलीफ़ दी है।" [119] [119] सुनन अबू दाऊद : 1118.

इसका कारण यह है कि गर्दनें फलाँगने से नमाज़ियों को तकलीफ़ होती है और ख़ुतबा सुनने में उनका ध्यान बँटता है। हाँ, इमाम के लिए अपनी जगह तक पहुँचने का कोई और रास्ता न हो, तो वह ऐसा कर सकता है। इसी तरह, जो व्यक्ति किसी ज़रूरी हाजत, जैसे वुज़ू करने या अपने आगे की खाली जगह को भरने आदि के लिए मजबूर हो, वह भी ऐसा कर सकता है।

4- किसी व्यक्ति को उसके स्थान से उठाना और उसकी जगह पर बैठना हराम है; क्योंकि जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित एक हदीस में है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "तुममें से कोई जुमे के दिन अपने भाई को उसकी जगह से उठाकर ख़ुद वहाँ न बैठे, बल्कि तुम उसके लिए जगह बनाओ।" [120] [120] सहीह मुस्लिम (2178)।

5- दो व्यक्तियों के बीच में बैठकर या उन्हें फलाँग कर उनको एक-दूसरे से अलग करना मकरूह है। सलमान फ़ारसी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : ''जिसने जुमा के दिन स्नान किया... फिर नमाज़ के लिए चला एवं दो व्यक्तियों के बीच घुसकर न बैठा, फिर जितनी सुन्नत पढ़ सका पढ़ा, फिर जब इमाम (ख़ुतबा देने के लिए) निकला तो ख़ामोश रहा, उसके दोनों जुमा के बीच के गुनाह क्षमा कर दिए जाएंगे।'' [121], इससे यह पता चलता है कि जो व्यक्ति दो लोगों को एक-दूसरे से अलग करता है, उसे यह क्षमा प्राप्त नहीं होगी। [121] सहीह बुख़ारी (910)।

छठा मसला : जुमे के दिन की सुन्नतें :

1- जुमा के दिन फ़ज्र की नमाज़ में सूरा सजदा और सूरा इन्सान पढ़ना सुन्नत है। क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमेशा ऐसा किया करते थे। अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित एक हदीस में वह कहते हैं : "नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जुमा के दिन फ़ज्र की नमाज़ में "अलिफ़-लाम-मीम तनज़ील अस-सज्दह" एवं "हल अता अलल-इन्सानि हीनुम-मिनद-दह्र" पढ़ते थे।"[122]. [122] सहीह बुख़ारी (891), सहीह मुस्लिम (880)।

2- जुमे के दिन स्नान करना। यह सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित एक रिवायत में है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई जुमे की नमाज़ के लिए आए, तो स्नान कर ले।" [123] इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए और इसे छोड़ना नहीं चाहिए, ख़ास तौर से दुर्गंध वाले लोगों को। [123] सहीह बुख़ारी (877), सहीह मुस्लिम (844)।

जुमे के लिए स्नान का समय फ़ज्र प्रकट होने से शुरू होता है। जनाबत का स्नान जुमे के स्नान के लिए काफ़ी है, क्योंकि जुमे के स्नान का मक़सद सफ़ाई और शरीर से बदबू दूर करना है, जो जनाबत के स्नान से पूरा हो जाता है। लेकिन जनाबत का स्नान करते समय जुमे के स्नान की नीयत कर लेनी चाहिए, ताकि इसका सवाब मिल जाए।

3- उसके लिए इत्र लगाना, (शरीर की) साफ़-सफ़ाई करना और शरीर से उन चीज़ों को हटाना सुन्नत है, जिन्हें हटाना चाहिए। जैसे नाखून काटना, नाभि के नीचे के बाल साफ़ करना, बगल के बाल उखेड़ना और मूँछ कतरना आदि। क्योंकि, सलमान फ़ारसी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है : "जिसने जुमा के दिन स्नान किया, जहाँ तक हो सका अच्छी तरह पाकी (पवित्रता) प्राप्त की, तेल या ख़ुश्बू लगाई, फिर नमाज़ के लिए चल पड़ा, एवं दो व्यक्तियों के बीच घुसकर न बैठा, फिर जो सुन्नत एवं नफ़ल पढ़ पाया पढ़ा, फिर जब इमाम ख़ुतबा देने के लिए खड़ा हुआ तो उसकी बातों को ध्यान से सुना, उसके दो जुमा के बीच के गुनाहों को क्षमा कर दिया जाएगा।" [124] [124] सहीह बुख़ारी (910)।

इसी तरह जुमा के दिन मिस्वाक करने का भी बड़ा महत्व है। अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के रसूल ﷺ पर गवाही देता हूँ कि आपने फ़रमाया है : "जुमे के दिन हर वयस्क (बालिग़) व्यक्ति पर स्नान करना अनिवार्य है तथा (उचित है कि) वह मिस्वाक (दातून) करे और उपलब्ध हो तो ख़ुशबू भी लगाए।" [125] [125] सहीह बुख़ारी (880)।

4- उपलब्ध कपड़ों में से सबसे अच्छे कपड़े पहनना सुन्नत है, जिसका प्रमाण उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु की यह हदीस है : "उन्होंने मस्जिद के दरवाज़े के पास एक रेशमी जोड़ा बिकते देखा, तो कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर आप इसे खरीद लें और जुमे के दिन एवं किसी प्रतिनिधिमंडल के आने के वक़्त पहन लिया करें..." [126] [126] सहीह बुख़ारी (886), सहीह मुस्लिम (2068)।

5- जुमे के दिन मस्जिद जल्दी जाना सुन्नत है; क्योंकि नबी ﷺ ने इसके लिए प्रेरित किया है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : "जिसने जुमे के दिन जनाबत का स्नान (फर्ज़ गुस्ल) किया -अर्थात ऐसा स्नान, जिसका तरीक़ा जनाबत के स्नान के तरीक़े जैसा हो- फिर पहली घड़ी में मस्जिद पहुँचा, उसने गोया एक ऊँट की क़ुर्बानी दी -जो नर या मादा कुछ भी हो सकता है-; जो दूसरी घड़ी में पहुँचा, उसने गोया एक गाय की क़ुर्बानी दी; जो तीसरी घड़ी में पहुँचा, उसने गोया एक सींग वाले मेंढे की क़ुर्बानी दी; जो चौथी घड़ी में पहुँछा, उसने गोया एक मुर्गी दान की और जो पाँचवीं घड़ी में पहुँचा, उसने गोया एक अंडा दान किया। फिर जब इमाम निकल आता है, तो फ़रिश्ते उपस्थित होकर ख़ुतबा सुनने लगते हैं।" [127] [127] सहीह बुख़ारी (881), सहीह मुस्लिम (850)।

6- जो व्यक्ति जुमा के दिन मस्जिद में दाख़िल हो और इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, उसके लिए यह सुन्नत है कि वह बैठने से पहले हल्के अंदाज़ दो रकात नमाज़ पढ़ ले। क्योंकि अल्लाह के रसूल ﷺ ने ख़ुतबे के समय मस्जिद में दाख़िल होने वाले को ऐसा करने का आदेश दिया है। जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमा के दिन ख़ुतबा दे रहे थे कि सुलैक ग़तफ़ानी जुमा के दिन आए और बैठ गए, तो आपने उनसे फ़रमाया : "ऐ सुलैक! उठो, दो रकात पढ़ लो और उन्हें संक्षिप्त अदा करो।" फिर फ़रमाया : "जब तुममें से कोई जुमा के दिन आए और इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, तो दो रकात पढ़ ले और उन्हें संक्षेप में पढ़े।" [128] [128] इस हदीस को बुख़ारी (930) और मुस्लिम (875) ने रिवायत किया है।

7- जुमे के दिन सूरा कह्फ़ पढ़ना सुन्नत है। अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "जिसने जुमे के दिन सूरा कह्फ़ पढ़ी, उसके लिए दोनों जुमों की बीच की अवधि प्रकाशमान रहेगी।" [129] [129] इसे हाकिम ने अल-मुस्तदरक (3392) में रिवायत किया है। इस हदीस में दोष यह है कि यह अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु का कथन है।

8- जुमे के दिन और रात में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अधिक से अधिक दरूद भेजना सुन्नत है; औस बिन औस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''तुम्हारे सबसे अच्छे दिनों में से एक जुमे का दिन है, इसलिए इस दिन मुझपर अधिक से अधिक दरूद भेजा करो, क्योंकि तुम्हारे भेजे हुए दरूद मुझपर पेश किए जाते हैं।'' [130] [130] सुनन अबू दाऊद : 1531.

9- इस दिन अधिक से अधिक दुआएँ करना और दुआ क़बूल होने के क्षण को तलाश करना सुन्नत है। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जुमे के दिन का ज़िक्र किया और फ़रमाया : "इसमें एक घड़ी ऐसी है कि अगर ठीक उस घड़ी में मुसलमान बन्दा दुआ करे और अल्लाह तआला से कोई चीज़ माँगे तो अल्लाह तआला उसको वह चीज़ ज़रूर देता है।" [131] [131] सहीह बुख़ारी (935), सहीह मुस्लिम (852)।

वैसे तो जुमे का पूरा दिन ही ऐसा है कि उसमें दुआ क़बूल होने की आशा रहती है, लेकिन सबसे अधिक आशा जुमे के दिन इमाम के ख़ुतबे के लिए बैठने से लेकर नमाज़ ख़त्म होने तक और मग़्रिब की नमाज़ की प्रतीक्षा में बैठे हुए व्यक्ति के लिए जुमे के दिन के अंतिम क्षण में रहती है। बैठा हुआ चाहे मस्जिद में हो या घर में। क्योंकि अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जुमे के उस क्षण के बारे में फ़रमाया है : "यह इमाम के (मिंबर पर) बैठने से लेकर नमाज़ के समाप्त होने तक का समय है।" [132] [132] सहीह मुस्लिम (853)।

सातवाँ मसला : जुमे की नफ़ल नमाज़ :

जुमे की नमाज़ से पहले कोई नियमित रूप से पढ़ी जाने वाली सुन्नत नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति जुमा के लिए आए, उसके लिए जितनी चाहे नफ़ल नमाज़ पढ़ना सुन्नत है। दो रकात, चार रकात, छह रकात या इससे अधिक। इसमें भी हर दो-दो रकात के बाद सलाम फेर लेना चाहिए। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसके लिए प्रेरित किया है, जैसा कि सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में आया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : «जिसने जुमा के दिन स्नान किया... फिर नमाज़ के लिए चला, एवं दो व्यक्तियों के बीच घुसकर न बैठा, फिर जो सुन्नत एवं नफ़्ल पढ़ पाया पढ़ा, फिर जब इमाम ख़ुतबा देने के लिए खड़ा हुआ तो उसकी बातों को ध्यान से सुना, तो उसके दोनों जुमा के बीच के गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं।'' [133] सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम का इसपर अमल रहा है और आम नफ़ल नमाज़ आम फ़ज़ीलत भी आई हुई है। [133] इसे इमाम बुख़ारी (910) ने रिवायत किया है।

नियमित सुन्नत जुमे की नमाज़ के बाद है। जुमे की नमाज़ के बाद घर में दो रकात या मस्जिद में चार रकात पढ़ी जाएगी। "नबी ﷺ जुमे के बाद अपने घर में दो रकात पढ़ा करते थे।" [134] अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई जुमे की नमाज़ पढ़ ले, तो उसके बाद चार रकात पढ़ ले।" [135] [134] सहीह बुख़ारी : 937, सहीह मुस्लिम : 729। वर्णनकर्ता इब्न-ए-उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा। [135] सहीह मुस्लिम (881)।

जुमा की सुन्नतें यदि मस्जिद में पढ़ी जाएँ तो चार रकात और घर में पढ़ी जाएँ तो दो रकात पढ़ी जाएँ।

दूसरा बिंदु : जुमा का ख़ुतबा

पहला मसला : जुमा का ख़ुतबा :

यह एक भाषण है, जो जुमे की नमाज़ से पहले लोगों के एक समूह के सामने दिया जाता है, जिसमें अल्लाह की प्रशंसा, नबी ﷺ पर दरूद व सलाम और उपदेश तथा नसीहत शामिल होती हैं।[136] [136] देखें : मोजम लुग़ह अल-फ़ुक़हा (पृष्ठ 197) तथा अल-हजैलान की ख़ुतबह अलृजुमुअह व अहकामुहा अल-फ़िक़्हिय्यह (पृष्ठ 22)।

दूसरा मसला : ख़ुतबे का हुक्म :

जुमे की नमाज़ के लिए ख़ुतबा शर्त है। इसके बिना जुमे की नमाज़ सही नहीं होती, क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र की ओर दौड़ पड़ो..." [सूरा जुमा : 9] अल्लाह के ज़िक्र की व्याख्या ख़ुतबा [137] से की गई है; अतः यदि ख़ुतबा वाजिब न होता, तो उसकी ओर जाना भी वाजिब न होता। साथ ही, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस पर हमेशा अमल करने और इसे कभी न छोड़ने के कारण भी यह वाजिब है। [137] देखें : तफ़सीर तबरी (22/642)।

इमाम इब्न-ए-क़ुदामा हंबली -अल्लाह उनपर दया करे- कहते हैं : "इसका सारांश यह है कि ख़ुतबा जुमा की एक शर्त है। इसके बिना जुमा सहीह नहीं होता।" [138] [138] अल-मुग़नी (2/224)।

तीसरा मसला : ख़ुतबा की शर्तें :

1- ख़ुतबा दो होने चाहिएँ। क्योंकि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : "अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो ख़ुतबा दिया करते और उन दोनों के बीच बैठते थे।" [139] [139]  सहीह बुख़ारी : (928)।

2- ख़ुतबा जुमे की नमाज़ का समय प्रवेश करने के बाद दिया जाए। अगर पूरा ख़ुतबा या उसका कुछ भाग समय प्रवेश करने से पहले दिया जाए, जो काफ़ी नहीं होगा।

3- दोनों ख़ुतबे जुमे की नमाज़ से पहले दिए जाएँ। क्योंकि साइब बिन यज़ीद से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : «रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अबू बकर और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के ज़माने में जुमे के दिन अज़ान उस वक़्त होती थी जब इमाम (ख़ुतबा देने के लिए) मिम्बर पर बैठ जाता था।» [140] इससे स्पष्ट है कि दोनों ख़ुतबे नमाज़ से पहले दिए जाते थे। [140] सहीह बुख़ारी : (916)।

साथ ही अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''तुम नमाज़ उसी प्रकार पढ़ो, जिस प्रकार मुझे पढ़ते हुए देखते हो।'' [141] जबकि हम देखते हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो खुतबों के बाद ही नमाज़ पढ़ी है। मरदावी ने कहा है : "दोनों -यानी दोनों ख़ुतबों- का नमाज़ से पहले होना निर्विवाद रूप से शर्त है।" [142] [141] इस हदीस को इमाम बुख़ारी (631) ने मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है। [142] अल-इन्साफ़ (2/389).

4- ख़ुतबे के विभन्न भागों के बीच निरंतरता होनी चाहिए। इमाम इब्न-ए-क़ुदामा कहते हैं : "ख़ुतबे के सही होने के लिए निरंतरता शर्त है। यदि उसके भागों के बीच लंबी बातचीत, लंबी ख़ामोशी या ऐसी किसी अन्य चीज़ से अंतराल आ जाए जो निरंतरता को तोड़ दे, तो खुतबे को नए सिरे से शुरू करना होगा। अंतराल के लंबा या छोटा होने का निर्णय आम रिवाज के अनुसार लिया जाएगा। इसी तरह, ख़ुतबे और नमाज़ के बीच भी निरंतरता शर्त है। यदि तहारत की ज़रूरत पड़ जाए, तो तहारत हासिल करके अपने ख़ुतबे को वहीं से जारी रख सकता है, बशर्ते कि अंतराल लंबा न हो।"[143] [143] अल-मुग़नी (2/230)

5- ख़ुतबा बुलंद आवाज़ से देना; क्योंकि ख़ुतबा जुमा के लिए वाजिब और उसके सही होने की शर्त है और बुलंद आवाज़ से देना उसके अदा करने और उसके उद्देश्य की प्राप्ति, जो कि उपदेश एवं याद दिलाना है, को पूरा करने का माध्यम है। हम सब जानते हैं कि जिस चीज़ के बिना कोई कार्य पूरा न हो, वह चीज़ भी वाजिब हुआ करती है।

6- जुमे की नमाज़ के लिए आवश्यक संख्या का मौजूद होना। क्योंकि ख़ुतबा एक ऐसा ज़िक्र है, जिसकी ओर दौड़ना वाजिब है, जिससे उक्त संख्या का ध्यान से सुनना लाज़िम आता है।

चौथा मसला : खुतबे के स्तंभ :

1- अल्लाह की स्तुति और प्रशंसा से शुरू करना; क्योंकि जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जुमे के दिन अपने ख़ुतबे में अल्लाह की प्रशंसा करते और उसकी स्तुति बयान करते, फिर उसके बाद कहते..." [144]. [144] सहीह मुस्लिम : 867.

2- ख़ुतबे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजा जाए, क्योंकि खुतबों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के निकट एक प्रसिद्ध एवं ज्ञात बात थी।[145] [145] देखें : जला अल-अफ़हाम, लेखक : इब्न अल-क़ैयिम, पृष्ठ : 371।

2- इसमें नसीहत और अल्लाह तआला का तक़वा अपनाने की वसीयत शामिल हो। जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दो खुतबे होते थे, जिनके बीच आप बैठते, क़ुर्आन पढ़ते और लोगों को उपदेश देते थे।" [146] क्योंकि यही ख़ुतबे का उद्देश्य एवं लक्ष्य है। [146] सहीह मुस्लिम : 862।

4- पवित्र क़ुर्आन का कुछ भाग पढ़ना। जाबिर बिन समुरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दो खुतबे होते थे। आप उन दोनों के बीच बैठते थे, क़ुर्आन पढ़ते थे और लोगों को नसीहत करते थे।"

पाँचवाँ मसला : ख़ुतबा की सुन्नतें :

1- मिंबर या ऊँचे स्थान पर ख़ुतबा देना; "चुनांचे आपके लिए एक मिंबर बनाया गया, जिसपर आपने जुमे के दिन ख़ुतबा दिया।" [147], बहुत-से सहाबा -रज़ियल्लाहु अन्हुम- से तवातुर के साथ यह बात वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मिंबर पर ख़ुतबा दिया करते थे[148], तथा इमाम नववी रहिमहुल्लाह ने इसके मुस्तहब होने पर इजमा का उल्लेख करते हुए कहा है: विद्वानों की इस बात पर सर्वसहमति है कि ख़ुतबा मिम्बर पर दिया जाना मुस्तहब है"[149]، साथ ही यह कि इससे सूचना देने का काम अधिक प्रभावशाली अंदाज़ में होता है। जब लोग संबोधित करने वाले को देख रहे हों, तो उनपर बात अधिक असर करती है। [147] सहीह बुख़ारी : 2095, वर्णकर्ता जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु। [148] देखिए : इरवा अल-ग़लील फ़ी तख़रीज अहादीस मनार अल-सबील : 3/75 तथा आगे। [149] अल-मजमू शर्हु अल-मुहज़्ज़ (4/527)।

2- खड़े होकर ख़ुतबा देना। इसका प्रमाण उच्च एवं महान अल्लाह का यह कथन है : "और जब उन्होंने कोई व्यापार अथवा खेल-तमाशा देखा, तो उठकर उसकी ओर चले गए और उन्होंने आपको खड़ा छोड़ दिया..." [सूरा जुमुआ : 11] तथा अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है : "अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े होकर ख़ुतबा दिया करते थे, फिर बैठ जाते, फिर खड़े होते, जैसा कि तुम अब करते हो।" [150] (150) सहीह बुख़ारी (920), सहीह मुस्लिम (861)।

3- ख़ुतबा मुक़तदियों की ओर मुँह करके देना सुन्नत है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब जुमे के दिन अपने मिंबर के पास आते, तो अपने पास बैठे लोगों को सलाम करते और जब मिंबर पर चढ़ जाते, तो लोगों की ओर मुँह फिर सलाम करते।"[151] [151] इसे बैहक़ी ने "अल-सुनन अल-कुबरा" (5742) में रिवायत किया है।

हाफिज़ इब्न -ए- रजब कहते हैं : "इमाम का मस्जिद वालों की ओर मुँह करना और क़िबले की ओर पीठ करना सर्वसम्मत है और इसकी दलीलें भी मौजूद हैं। क्योंकि इमाम लोगों को संबोधित करता है, ताकि लोग उसकी बात समझें। लेकिन, यह सब सुन्नत है। अतः, अगर इमाम इसके विरुद्ध करता है, तो वह सुन्नत का उल्लंघन करता है, लेकिन उसका जुमा सही हो जाएगा।"[152] [152] फ़त्ह अल-बारी, लेखक : इब्न-ए-रजब (8/250)।

4- ख़तीब के मिंबर पर चढ़ते समय मुक़तदियों को सलाम करना सुन्नत है। क्योंकि जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब मिंबर पर चढ़ते, तो सलाम करते।" [153] [153] सुनन इब्न-ए-माजा : 1109.

5- मुअज़्ज़िन के अज़ान पूरी करने तक मिंबर पर बैठना सुन्नत है। क्योंकि इब्न-ए-उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो खुतबे दिया करते थे। आप जब मिंबर पर चढ़ते तो मुअज़्ज़िन के फ़ारिग़ होने तक बैठ जाते, फिर खड़े होकर ख़ुतबा देते, फिर बैठ जाते और कोई बात नहीं करते, फिर खड़े होकर ख़ुतबा देते थे।[154] इसका प्रमाण साइब बिन यज़ीद रज़ियल्लाहु अन्हु की यह हदीस है, जिसमें वह कहते हैं : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, अबू बक्र सिद्दीक़ और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के ज़माने में जुमे के दिन अज़ान उस समय होती थी, जब इमाम मिंबर पर बैठ जाता था।" [155] [154] सुनन अबू दाऊद : 1092। [155] सहीह बुख़ारी : 916।

6- अपनी ताक़त के अनुसार ऊँची आवाज़ में ख़ुतबा देना; जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्होंने फरमाया : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब ख़ुतबा देते, तो आपकी आँखें सुर्ख़ हो जातीं, आपकी आवाज़ बुलंद हो जाती और आपका क्रोध बढ़ जाता, यहाँ तक कि गोया आप किसी लश्कर से सावधान करने वाले हों और फरमा रहे हों : "तुमपर सुबह हमला हो सकता है, तुमपर शाम को हमला हो सकता है।" [156], "सब्ब-ह-कुम" का अर्थ है, तुमपर सेना सुबह हमला करने वाली है और "मस्साकुम" का अर्थ है, तुमपर सेना शाम के समय हमला करने वाली है। जब किसी को डराना हो, तो इन दोनों शब्दों का प्रयोग किया जाता है। (156) सहीह मुस्लिम (867)।

7- दोनों ख़ुतबों के बीच कुछ देर बैठना। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित एक हदीस में है : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो खुतबे दिया करते थे और उन दोनों के बीच बैठते थे।" [157] [157] सहीह बुख़ारी : 928।

8- ख़ुतबा छोटा देना सुन्नत है। दूसरा ख़ुतबा पहले ख़ुतबे से छोटा होगा। जबकि नमाज़ लंबी होगी। क्योंकि अम्मार रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया है : "आदमी की लंबी नमाज़ और उसका संक्षिप्त ख़ुतबा, उसकी समझदारी की पहचान है। अतः, नमाज़ लंबी पढ़ो और ख़ुतबा संक्षिप्त दिया करो।" [158] [158] सहीह मुस्लिम : 869.

9- मुसलमानों के लिए दीन और दुनिया की भलाई और मुस्लिम शासकों के लिए सुधार और सफलता की दुआ करना। नववी रहमतुल्लाह अलैहि कहते हैं : मुस्लिम शासकों तथा सुलतानों के लिए सदाचार के मार्ग पर चलने, सत्य के मार्ग पर सहयोग प्राप्त करने और न्याय स्थापित करने आदि की दुआ तथा मुस्लिम सेनाओं के लिए दुआ करना सर्वसम्मति से मुस्तहब है।"[159]. [159] अल-मजमू शर्ह अल-मुहज्जब (4/521)।

जुमा के ख़ुतबे के दौरान इमाम का दुआ के समय हाथ उठाना शरीयत सम्मत नहीं है। इसकी अनुमति बस इस्तिस्क़ा में है। इमाम का तर्जनी उंगली से इशारा करना मुस्तहब है। उमारा बिन रुऐबा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि उन्होंने बिश्र बिन मरवान को मिंबर पर हाथ उठाए हुए देखा, तो कहा : "अल्लाह इन दोनों हाथों का बुरा करे! मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इससे अधिक कुछ करते नहीं देखा कि आप अपनी शहादत की उंगली से इस तरह इशारा करते।" [160] [160] सहीह मुस्लिम (874)।

10- नमाज़ वही व्यक्ति पढ़ाए जो ख़ुतबा दे; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन दोनों को स्वयं अंजाम देते थे और आपके बाद आपके खुलफ़ा भी। और अगर किसी उज़्र के कारण एक व्यक्ति ख़ुतबा दे और दूसरा नमाज़ पढ़ाए, तो यह जायज़ है। [161] इब्न-ए-क़ुदामा की अल-मुग़नी : (2/228)

छठा मसला : जुमा के ख़ुतबे का अनुवाद :

ख़तीब उन इलाक़ों में, जहाँ के लोग या अधिकतर लोग अरबी भाषा नहीं जानते, वहाँ की भाषा में ख़ुतबा दे सकता है, ताकि ख़ुतबा का उद्देश्य पूरा हो, वहाँ के लोग ख़ुतबा समझ सकें और उसमें मौजूद ज्ञान, नसीहत और याददिहानी से लाभ उठा सकें। क्योंकि नबी ﷺ से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि जुमे के ख़ुतबे का अरबी भाषा में होना अनिवार्य है। बल्कि आप ﷺ अरबी में ख़ुतबा देते थे, क्योंकि यह आपकी और आपकी क़ौम की भाषा थी।

अलबत्ता बेहतर यह है कि ख़तीब पहले अरबी भाषा में ख़ुतबा दे, फिर उसका अपने इलाक़े की भाषा में अनुवाद करे। इससे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के खुतबों का अनुसरण हो जाएगा और इस मसले में मौजूद मतभेद से निकलने का रास्ता बन जाएगा।

अनुवाद में श्रोताओं के हितों का ध्यान रखते हुए या तो ख़ुतबे के हर हिस्से के बाद उसका अनुवाद किया जाए या फिर अरबी भाषा में ख़ुतबा समाप्त होने के बाद और नमाज़ से पहले उसका अनुवाद किया जाए।

इसी तरह ख़ुतबे का तात्कालिक अनुवाद करना और उस अनुवाद को प्रसारण स्टेशन के माध्यम से प्रसारित करना और जो नमाज़ी अरबी नहीं जानते, उनके द्वारा उस अनुवाद को सुनने के लिए रिसीवर का उपयोग करना भी जायज़ है। यह उस व्यर्थ कार्य में दाख़िल नहीं है, जिससे मना किया गया है। क्योंकि इससे बड़े स्तर पर लाभ और ख़ुतबे का उद्देश्य पूरा होता है।

सातवाँ मसला : ख़तीब के गुण :

मस्जिद का ख़तीब मस्जिद का स्तंभ और उसकी शक्ति है। उसी के माध्यम से मस्जिद इस्लाम के प्रचार-प्रसार, समाज को जागरूक करने और लोगों के अंदर इस्लामी सूझ-बूझ पैदा करने का काम करती है। अतः, यदि ख़तीब इस्लाम का ज्ञाता, बुद्धिमान, दूरदर्शी तथा लोगों की आदतों और परिस्थितियों से परिचित हो, तो मस्जिद की जमात और उस मुहल्ले के निवासियों पर उसका प्रभाव अच्छा और लाभदायक होता है। वह उन्हें शिक्षा देता है, उनका मार्गदर्शन करता है और उन्हें हर भलाई और पुण्य की ओर ले जाता है।

इमामत की शर्तों को पूरा करने वाले इमाम कुछ ऐसे ही हुआ करते थे। इस्लाम के आरंभिक काल में ख़ुद अल्लाह के नबी ﷺ इमाम थे, फिर आपके मार्ग पर चलने वाले ख़लीफ़ागण इमाम हुए, फिर शासक, उलेमा और बड़े-बड़े विद्वानों ने यह ज़िम्मेवारी अदा की, जो यह दर्शाता है कि इस पद को संभालने वाला व्यक्ति धर्म, आचरण, ज्ञान और व्यवहार में उच्च स्थान पर होना चाहिए।

इससे लोगों के जीवन में इस काम का महत्व स्पष्ट होता है। क्योंकि इमामों की शक्ति उनके समाजों पर दिखाई देती है और उनकी कमज़ोरी का प्रभाव भी उनके समाजों पर दिखाई देता है। क्योंकि मस्जिद ही समाज को कथनी और करनी के बीच एकरूपता रखना सिखाती है। यदि इमाम ज्ञान या बुद्धि-विवेक में कमज़ोर हो या उसका आचरण और व्यवहार खराब हो, तो वह लाभ की बजाय हानि करता है। यदि इमाम का कार्य नमाज़ियों को भलाई, परोपकार और सुधार की ओर ले जाना है, तो अज्ञानी इमाम के लिए इस महान कार्य को पूरा करना कठिन है।

कभी-कभी इमाम इस पद के लिए आवश्यक ज्ञान और व्यक्तिगत क्षमता की शर्तों को पूरा तो करता है, लेकिन अन्य कार्यों में व्यस्त होने के कारण अपनी ज़िम्मेवारी ठीक से अदा नहीं कर पाता और इमामत का काम प्रभावित होता है।

इसी तरह, उसे हालात के मुनासिब ख़ुतबा तैयार करने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। अतः वह लोगों के सामने -जैसा कि इब्न-ए-क़ैयिम अल-जौज़िया रहिमहुल्लाह कहते हैं- "एक ऐसा ख़ुतबा लेकर आता है, जो न दिलों के अंदर ईमान, एकेश्वरवाद तथा अल्लाह की पहचान की जौत जगाता है, न जीवन में घटने वाली घटनाओं से शिक्षा लेने की प्रेरणा देता है और न हृदय में अल्लाह से प्रेम तथा उससे मिलने की इच्छा का अलख जगाता है।"[162] [162] ज़ाद अल-मआद : (1/409).

कभी-कभी इच्छाएँ, अज्ञानता, विवाद या निंदनीय अतिवाद आदि उसपर हावी हो जाते हैं, जिससे वह वस्तुनिष्ठता, शैक्षिक मार्गदर्शन और बुद्धिमत्ता व अच्छी नसीहत के साथ आह्वान का काम नहीं कर पाता।

मस्जिद का इस्लाम में अत्यधिक प्रभाव है। यह हिदायत का मीनार है, जहाँ बंदा अपने रब से जुड़ता है, अपना ईमान मज़बूत करता है और अपने भाइयों से मिलता है, ताकि सब मिलकर भलाई का प्रचार करें और बुराई से रोकें। मस्जिद इस कार्य में तभी सक्षम हो सकती है जब अल्लाह इसके लिए ऐसा इमाम उपलब्ध कर दे, जिसके अंदर इस महान पद को संभालने के लिए आवश्यक ज्ञान और नैतिक गुण हों और जो इस महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभा सके।

ख़तीब की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ :

1- विशुद्ध रूप से अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए काम करे, ताकि अल्लाह और लोगों के यहाँ समर्थन, सहयोग, स्नेह एवं स्वीकार्यता प्राप्त कर सके।

2- रियाकारी और दिखावे से दूर रहे। क्योंकि हर कार्य उसके उद्देश्य के आधार पर तोला जाता है तथा सभी कार्यों का दारोमदार नीयतों पर है। हर व्यक्ति को वही मिलता है जिसकी उसने नीयत की होती है। जो व्यक्ति अपने अंदर न होने वाली चीज़ से सजता है, अल्लाह उसे अपमानित करता है।

3- अल्लाह की किताब या उसके कुछ अंश को याद रखे, याद किए हुए भाग को दोहराता रहे और प्रत्येक दिन क़ुर्आन का एक निश्चित भाग पढ़े।

4- कुछ हदीसें याद रखे। यह हदीसें रियाज़ अल-सालिहीन, अरबईन नववी, बुलूग़ अल-मराम अथवा किसी अन्य मुसतनद किताब की हो सकती हैं।

5- सही अक़ीदा, सदाचारी पूर्वजों का अक़ीदा सीखे।

6- दीन से संबंधित विधि-विधानों को सीखे। खास तौर से इबादतों से संबंधित विधि-विधानों को। इनमें भी तहारत, नमाज़, ज़कात और रोज़े से संबंधित विधि-विधान अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह मामलात से संबंधित विधि-विधानों को सीखे, ताकि धन अर्जित करने और खर्च करने से संबंधित सिद्धांतों को जान सके और लोगों को धोखा, फ़रेब और ग़लत तरीक़े से धन कमाने एवं इसी तरह फ़ज़ूलख़र्ची और कंजूसी आदि से सावधान कर सके तथा फलस्वरू लोगों की वित्तीय गतिविधियाँ सुन्नत के अनुरूप हों।

7- अरबी भाषा में दक्षता प्राप्त करे, ताकि क़ुर्आन, जो अरबी भाषा में उतारा गया था, के अर्थों को जान सके।

8- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जीवनी, आचार-विचार और सदाचारी पूर्वजों की जीवनी पढ़े। क्योंकि ये अच्छे आदर्श, उत्तम अनुसरण, लाभकारी ज्ञान की संपत्ति और उच्च इस्लामी संस्कृति है के भंडार हैं।

9- अपने इलाक़े के विद्वानों और अन्य मज़बूत ज्ञान रखने वाले विद्वानों को जाने, जो सही अक़ीदा, ज्ञान और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं और अपने धर्म के सभी आवश्यक मसलों और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए उनसे संपर्क करे।

10- इस्लामी फिर्क़ों और उनके अक़ायद, विभिन्न वैचारिक धाराओं और उनके उद्देश्यों तथा अलग-अलग विध्वंसक मतों और उनके लक्ष्यों से अवगत हो, ताकि अल्लाह की किताब, उसके रसूल ﷺ की सुन्नत और मुस्लिम विद्वानों द्वारा लिखित प्रमाणित ग्रंथों के प्रकाश में उनकी आलोचना कर सके, उनके झूठ का पर्दाफाश कर सके और उनके फ़रेब से सावधान कर सके।

11- उसे मुसलमानों की वर्तमान स्थिति, उनकी कमज़ोरी और दुश्मनों के उनपर हावी होने की चिंता हो। वह जानता हो कि यह सब अल्लाह के सीधे मार्ग से दूर होने और अल्लाह पर ईमान के कमज़ोर होने तथा उसकी शरीयत के अनुपालन में कमी के कारण है। इसलिए वह लोगों को दीन और दुनिया की लाभदायक बातें सिखाने का प्रयास करे।

12- विभिन्न मीडिया साधनों, उनके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ इस बात से भी अवगत हो कि अल्लाह की ओर बुलाने में उनसे कैसे लाभ उठाया जा सकता है तथा उनमें निहित खतरों से स्वयं और समाज को कैसे बचाया जा सकता है।

जब मस्जिद के इमाम के अंदर ये ख़ूबियाँ पाई जाएँगी, तो अल्लाह की अनुमति से उसके अंदर स्थिरता एवं संतुलन आएगा।

ख़तीब के आचरण में यह महत्वपूर्ण बातें भी पाई जाने चाहिए :

1- मस्जिद के इमाम को चाहिए कि वह मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले और आसपास के लोगों के लिए एक आह्वानकर्ता एवं शिक्षक की भूमिका निभाए। उसे रसूलुल्लाह ﷺ को अपना आदर्श बनाना चाहिए, क्योंकि वही सच्चे आदर्श, उत्तम उदाहरण और उम्मत तथा रहुनमाओं के लिए सर्वोच्च मिसाल हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है। उसके लिए, जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो, तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।" [सूरा अहज़ाब : 21]

वह अपने आप को और मस्जिद आने वाले लोगों को सांसारिक और राजनीतिक बातों से दूर रखे। मस्जिद को केवल ज्ञान और इबादत तक सीमित रखे।

2- स्वयं साफ़-सुथरा तथा व्यवस्थित रहे, मस्जिद की सफ़ाई, उसमें मौजूद वस्तुओं की व्यवस्था और रखरखाव का ध्यान रखे, लेकिन इसमें फ़ज़ूलखर्ची करने तथा मस्जिद को बहुत ज़्यादा सजाने से बचे।

3- अच्छे आचरण का मालिक हो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का पालन करते हुए दाढ़ी बढ़ाने और मूंछें काटने, कपड़ों को लटकाने से बचने और गंभीरता एवं शांति का पालन करने आदि का ख़्याल रखे। सदाचारी पूर्वजों अनुसरण करे।

4- मृदुल, सहनशील और दयालु हो; क्योंकि मृदुलता जिसके अंदर होती है, उसे सुंदर बना देती है और जिससे निकाल ली जाती है, उसे कुरूप कर देती है, जैसा कि आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया है : "नर्मी जिसमें भी होती है, उसे सुंदर बना देती है और जिससे निकाल ली जाती है, उसे कुरूप कर देती है।" [163] [163] सहीह मुस्लिम (2594)।

यदि मस्जिद आने वाले किसी व्यक्ति से कोई ग़लती हो जाए, तो इमाम उसे डाँटे नहीं, बल्कि नर्मी से समझाए और अच्छे तरीके से शिक्षा दे। मुआविया बिन हकम सुलमी रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैं एक बार अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ नमाज़ पढ़ रहा था कि अचानक लोगों में से एक आदमी को छींक आई, तो मैंने "यरहमुकल्लाह" (अल्लाह तुझपर रहम करे) कह दिया। इसपर लोग मुझे घूरने लगे, तो मैंने कहा : मेरी माँ मुझे खो दे! आख़िर क्या बात है कि तुम लोग मुझे घूर रहे हो?! यह सुन वे अपनी जाँघों पर हाथ मारने लगे। जब मैंने देखा कि वे मुझे चुप करा रहे हैं, तो मैं चुप हो गया। जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ से फ़ारिग़ हुए, तो आपपर मेरे माँ-बाप क़ुरबान हों, मैंने आपसे पहले और आपके बाद आपसे उत्तम शिक्षक नहीं देखा, अल्लाह की क़सम! न तो आपने मुझे डाँटा, न मुझे मारा और न मुझे बुरा-भला कहा। आपने फरमाया : “यह नमाज़ है, इसमें किसी मानवीय बातचीत की अनुमति नहीं है। इसमें तो केवल तसबीह, तकबीर और क़ुर्आन की तिलावत होती है।” [164] [164] सहीह मुस्लिम (537)।

5- नर्म और कोमल हृदय का हो; ताकि लोग उससे जुड़ें और उसकी दया, सहायता और ज्ञान से लाभान्वित हों। इमाम को लोगों के संकट की घड़ियों और आवश्यकताओं में उनके साथ खड़ा होना चाहिए। मस्जिद के संदेश से संबंधित मामलों में उनसे परामर्श करना चाहिए।

इन तमाम बातों में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सबसे उच्च स्थान पर विराजमान थे, जैसा कि अल्लाह तआला ने उनके बारे में फ़रमाया है : "अल्लाह की दया के कारण (ऐ नबी!) आप उनके लिए सरल स्वभाव के हैं। और यदि आप अक्खड़ और कठोर हृदय के होते, तो वे आपके पास से छट जाते। अतः आप उन्हें माफ़ कर दें और उनके लिए क्षमा याचना करें। तथा उनसे मामलों में परामर्श करें। फिर जब आप दृढ़ संकल्प कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें। निःसंदेह अल्लाह भरोसा करने वालों को पसंद करता है।" [सूरा आल-ए-इमरान : 159]

6- उसे धैर्य एवं विश्वास से सुसज्जित होना चाहिए और उसकी बातों में सच्चाई होनी चाहिए, ताकि अपनी मस्जिद और अपनी जमात में इमामत के सम्मान का हक़दार बन सके; क्योंकि धैर्य और विश्वास बंदे को धर्म में इमामत के दर्जे तक पहुँचाते हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने उनमें से कई अग्रणी (इमाम) बनाए, जो हमारे आदेश से मार्गदर्शन करते थे, जब उन्होंने धैर्य से काम लिया, तथा वे हमारी आयतों पर विश्वास करते थे।" [सूरा सजदा : 24]

7- उसकी बातों में सच्चाई हो। बातें चाहे जुमे के ख़ुतबे के दौरान कही गई हों, शिक्षा एवं उपदेश के दौरान कही गई हों या फिर लोगों के साथ बातचीत के दौरान। इससे उसका शुमार सच्चे, सुपथगामी एवं सफल लोगों में हो सकेगा। एक हदीस में है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “सच्चाई को मज़बूती से थाम लो, क्योंकि सच्चाई नेकी (सुकर्म) की राह दिखाती है और नेकी जन्नत की ओर ले जाती है। एक व्यक्ति सर्वदा सत्य बोलता रहता है तथा सत्य की खोज करता रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के समीप सत्यवादी लिख लिया जाता है। और झूठ बोलने से बचो, क्योंकि झूठ बुराई की ओर ले जाता है, और बुराई जहन्नम की ओर ले जाती है। एक व्यक्ति सदा झूठ बोलता रहता है तथा झूठ ही की खोज में लगा रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के समीप झूठा लिख लिया जाता है।” [165] [165] सहीह बुख़ारी : 6094, सहीह मुस्लिम : 2607। वर्णनकर्ता अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु।

झूठ एक बुराई और आपदा है और सबसे बड़ा झूठ अल्लाह पर झूठ बोलना और बिना ज्ञान के उसके बारे में कुछ कहना है। अल्लाह तआला कहता है : "(ऐ नबी!) आप कह दें कि मेरे पालनहार ने तो केवल खुले एवं छिपे अश्लील कर्मों को तथा पाप एवं नाहक़ अत्याचार को हराम किया है, तथा इस बात को कि तुम उसे अल्लाह का साझी बनाओ, जिस (के साझी होने) का कोई प्रमाण उसने नहीं उतारा है तथा यह कि तुम अल्लाह पर ऐसी बात कहो, जो तुम नहीं जानते।" [सूरा आराफ़ : 33]

इस आयत में सभी बड़े गुनाहों को एकत्र कर दिया गया है। क्रम कम बड़े गुनहों से अधिक बड़े गुनाहों का रखा गया है। सबसे बड़ा गुनाह है, अल्लाह के नामों, गुणों और उसकी शरीयत के बारे में बिना ज्ञान के बात करना।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर झूठ बोलना सबसे बड़े झूठों और सबसे बुरा गुनाहों में से एक है। यह उन बड़े गुनाहों में से एक है, जिनके लिए जहन्नम की धमकी दी गई है। मुगीरा बिन शोबा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फ़रमाते हुए सुना है : "मुझपर झूठ बोलना किसी और पर झूठ बोलने जैसा नहीं है। जिसने जान-बूझकर मुझपर झूठ बोला, वह अपना ठिकाना जहन्नम बना ले।" [166] [166] सहीह बुख़ारी (1291), सहीह मुस्लिम (4)।

झूठ बोलने से बचे। झूठ चाहे अच्छे इरादे से भलाई की प्रेरणा देने या बुराई से डराने के लिए ही क्यों न बोली जाए, जैसा कि कुछ जनसाधारण को संबोधित करने वाले लोग करते हैं। यह एक बुरी चीज़ है, जिसमें कोई भलाई या अच्छाई नहीं है। ऐसा कहने वाला सवाब नहीं, बल्कि गुनाह का हक़दार होता है।

8- शब्दों को नकल करने में ईमानदार हो, सूचनाओं के सही या गलत होने की छानबीन कर ले, अफवाहों को अपनाने में जल्दी न करे और केवल विश्वसनीय बातों पर ही विश्वास करे। अल्लाह तआला ने हमें इस बारे में आदेश देते हुए कहा है : "ऐ ईमान वालो! यदि कोई दुराचारी (अवज्ञाकारी) तुम्हारे पास कोई सूचना लेकर आए, तो उसकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर लिया करो। ऐसा न हो कि तुम किसी समुदाय को अज्ञानता के कारण हानि पहुँचा दो, फिर अपने किए पर पछताओ।" [सूरा हुजुरात : 6]

9- लोगों की गलतियों को छुपाने का पूरा प्रयास करे; क्योंकि जो व्यक्ति किसी मुसलमान की ग़लतियों को छुपाता है, अल्लाह इ दुनिया और आख़िरत में उसकी कमियों को छुपाएगा। जो मुसलमानों की त्रुटियों का पीछा करता है, अल्लाह उसकी त्रुटियों का पीछा करेगा, यहाँ तक कि उसे उसके घर के अंदर भी बेनकाब कर देगा। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है : "जो आदमी मुसलमान का दोष छुपाएगा, क़यामत के दिन अल्लाह उसके दोषों को छुपाएगा।" [167]. तथा अबू बरज़ा असलमी रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो, जो अपनी ज़ुबान से ईमान लाए हो और ईमान अब तक तुम्हारे दिलों में दाखिल नहीं हुआ है, मुसलमानों की ग़ीबत न करो और न उनके अवगुणों की टोह लो; क्योंकि जो उनके अवगुणों की टोह लेगा, अल्लाह उसके अवगुणों की टोह लेगा, और जिसके अवगुणों की टोह अल्लाह लेने लगा, उसे उसके घर में ही रुस्वा कर देगा।" [168] [167] सहीह बुख़ारी : 2442, सहीह मुस्लिम : 2580। [168] सुनन अबू दाऊद : 4880.

आठवाँ मसला : ख़ुतबे और ख़तीब के आदाब :

1- जुमा का ख़ुतबा किसी व्यक्ति, पार्टी, संस्था या अन्य किसी के प्रचार का साधन नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसे केवल अल्लाह और उसके दीन के लिए, उसके आह्वान को आम करने और उसके पताका को बुलंद करने के लिए होना चाहिए, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो।" [सूरा जिन्न : 18]

2- ख़ुतबा इतना लंबा नहीं होना चाहिए कि सुनने वालों पर बोझ बन जाए और वे उसे सुनने से विमुख हो जाएँ, और न ही इतना छोटा होना चाहिए कि खुतबे के विषय में ख़लल पड़े और वह अधूरा रह जाए।

3- ख़तीब को चाहिए कि ख़ुतबा देते समय सुनने वालों के स्तर का ध्यान रखे। आम लोगों के सामने उनकी समझ के अनुसार सरल भाषा का प्रयोग करे तथा कठिन शब्दों से बचे। मध्यम स्तर के लोगों के साथ संतुलित रहे और ख़ास लोगों के साथ परिष्कृत भाषा का प्रयोग करे। इस तरह सभी वर्गों के साथ हिकमत से काम ले तथा हर चीज़ को उसके सही स्थान पर रखे। लेकिन, हर परिस्थिति में अपने शब्दों में किसी भी अलंकार से बचे।

4- उन विवादास्पद मुद्दों से बचे जो वैमनस्य और द्वेष को भड़काते हैं; क्योंकि ख़तीब का मुख्य कार्य लोगों को शिक्षा देना और उनके दिलों को सत्य पर एकत्रित करना तथा उनके बीच के मतभेदों के कारणों को दूर करना है।

5- अलंकारिक भाषा के प्रयोग या बाल की खाल निकालने की कोशिश न करे, बल्कि उद्देश्य यह हो कि लाभकारी बातों को स्पष्ट और संक्षिप्त शब्दों में पहुँचाया जाए।

6- घृणित अनुकरण और मशहूर ख़तीबों की नक़ल उतारने से दूर रहे। क्योंकि इससे दिलों में कबीदगी और असंतोष पैदा होता है।[169] [169] देखिए : अब्दुल्लाह बिन ज़ैफ़ुल्लाह अर-रुहैली की किताब उस्लूब ख़ुतबह अल-जुमुअह, पृष्ठ: 12, 20, 22, तथा अमीर बिन मुहम्मद अल-मदरी की किताब ख़म्सून वसिय्यह व वसिय्यह लि-तकूना ख़तीबन नाजिहा, पृष्ठ: 33, 73, 87।

नवाँ मसला : ख़ुतबा के उद्देश्य तथा लक्ष्य :

जुमे के ख़ुतबे का उद्देश्य निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करना होना चाहिए :

1- एकेश्वरवाद से संबंधित मूल बातों और एकेश्वरवाद का महत्व तथा फ़ज़ीत बयान करना एवं अनेकेश्वरवाद के सभी प्रकारों, रूपों एवं उसकी ओर ले जाने वाली चीज़ों से सावधान करना।

2- उपदेश देना, अल्लाह तथा आख़िरत के हिसाब-किताब एवं उस दिन मिलने वाले प्रतिफल की याद दिलाना, अल्लाह के ऐसे संदेशों का ज़िक्र करना जिनसे दिलों को जीवन मिलता है, भलाई की ओर बुलाना, नेकी का आदेश तथा बुराई से रोकना।

3- मुसलमानों को उनके धर्म की सच्चाइयों की समझ प्रदान करना, अल्लाह की किताब और उसके रसूल ﷺ की सुन्नत की शिक्षा देना, तथा उनके आचरण और शिष्टाचार को अतिशयोक्ति और लापरवाही से सुरक्षित रखने पर ध्यान देना।

4- इस्लाम के बारे में प्रचलित ग़लत धारणाओं को बदलना और विरोधियों द्वारा उठाए गए संदेहों और मिथ्याओं, जो मन को भ्रमित करने का काम करते हैं, का खंडन एक प्रभावी और बुद्धिमान शैली में करना, जो विरोधाभास एवं गाली-गलौज से ख़ाली हो।

5- विनाशकारी और गुमराह करने वाले विचारों का मुक़ाबला सही इस्लाम को सामने रखकर करना, जो कि उम्मत का असल मार्ग है, जिसे अल्लाह ने उनके लिए पसंद किया है और जिसे उन्होंने अपने लिए धर्म के रूप में स्वीकार किया है। प्रयास यह हो कि इस्लाम की विशेषताओं, जैसे व्यापकता, संतुलन, गहराई और सकारात्मकता आदि को सामने लाया जाए।

6- ख़ुतबे को जीवन और लोगों के वर्तमान हालात से जोड़ना। इसके लिए इस्लामी शरीयत की रोशानी में समाज की बीमारियों के इलाज और उसकी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। साथ ही अक़ीदा और उसके सुधार, इस्लाम और ईमान के स्तंभ, महिला और मुस्लिम परिवार के मसायल और लोगों से जुड़े हुए अन्य आवश्यक विषयों पर ध्यान दिया जाए।

7. साल भर में बार-बार आने वाले विभिन्न अवसरों, जैसे रमज़ान और हज आदि, का ध्यान रखना, जो श्रोताओं को आकर्षित करते हैं और उन्हें उस विषय के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो उनका मार्गदर्शन करता है।

8- मुसलमानों के दिलों में इस्लामी भाईचारे के अर्थ को बिठाना और मुसलमानों को विभाजित करने वाली नस्लीय, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय तथा अन्य प्रवृत्तियों तथा पक्षपातों का विरोध करना।

दसवाँ मसला : ख़ुतबे की तैयारी करने का तरीक़ा :

ख़तीब को चाहिए कि पूरी मेहनत से ख़ुतबे की तैयारी करे और निम्नलिखित बातों का ध्यान रखे :

ख़ुतबा आमतौर पर तीन हिस्सों से मिलकर बनता है : प्रस्तावना, विषय-वस्तु और समापन। ये तत्व लिखते या प्रस्तुत करते समय स्पष्ट नहीं किए जाते और आपस में जुड़े हुए और गुथे हुए होते हैं, जिनके बीच का संबंध ख़तीब की क्षमता, उसके ज्ञान की गहराई और उसके अनुभव के अनुसार होता है, जिससे ख़ुतबे के सभी हिस्से व्यवस्थित होते हैं और उसकी संरचना को मज़बूती मिलती है।

यही व्यवस्था और मज़बूती ख़तीब द्वारा कही जा रही बातों को स्पष्ट और उद्देश्यों को प्रकट तथा श्रोताओं को वक्ता की बीतों को ध्यान से सुनने पर मजबूर करती है।

प्रस्तावना : ख़तीब को प्रस्तावना तथा आरंभिक बातों पर ख़ास ध्यान देना चाहिए। शुरुआती वाक्य ऐसे रखे कि श्रोताओं को ख़ुतबा का उद्देश्य समझ में आ जाए, जिससे ध्यान आकर्षित हो और श्रोता सुनने के लिए तैयार हो जाएँ। इसके लिए क़ुर्आन की सावधान या प्रेरित करने वाली आयतें पढ़ी जा सकती हैं या हिकमत से भरी हुई कोई हदीस रखी जा सकती है। आरंभिक शब्द ख़तीब द्वारा श्रोताओं के सामने रखे जाने वाले पहले शब्द हुआ करते हैं। इसलिए अगर आरंभ बेहतर हो गया, तो शेष ख़ुतबा पूरे मन से और उत्साह के साथ सुना जाएगा।

आरंभिक वाक्यों ही से यह समझ में आ जाना चाहिए कि आज बात किस विषय पर होनी है। वैसे, सब लोग जानते हैं कि जुमे का ख़ुतबा अल्लाह की प्रशंसा, दोनों गवाहियों और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद व सलाम से शुरू होता है। लेकिन, इन शब्दों का चयन भी ऐसा हो कि ख़ुतबे का विषय तथा उद्देश्य झलकने लगे।

विषय-वस्तु : यही खुतबे का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य हुआ करता है। कभी ख़ुतबे के आरंभ में विषय को स्पष्ट कर देना बेहतर होता है, जब बात किसी ज्वलंत मुद्दे पर करनी हो और लोग उसके बारे स्पष्ट एवं संतोषजनक बात सुनने की अपेक्षा रखते हों।। मसलन कह दिया जाए कि मैं आज .... विषय पर बात करना चाहता हूँ।

लेकिन कभी-कभी स्पष्ट करना बेहतर नहीं होता। ख़ात तौर से जब विषय-वस्तु विवादास्पद हो या लोगों में विभाजन का कारण बन सकता हो। ऐसी स्थिति में ख़ुतबा देने वाले को चाहिए कि वह उस विषय में क्रमिक रूप से प्रवेश करे और अप्रत्यक्ष रूप से उसे प्रस्तुत करे, ताकि श्रोताओं को तार्किक क्रम में ले जाकर अपने उद्देश्य तक संतुलन और संयम के साथ पहुँचे, उत्तेजना और विभाजन से बचते हुए। इस प्रकार ख़ुतबा देने वाला अपनी बात को उन लोगों के दिलों में बिठा सकता है, जो उससे विमुख हैं या जिनके लिए यह विषय नया है।

ख़ुतबे का विषय आमतौर पर दो मुख्य स्तंभों पर आधारित होता है : स्पष्टता और प्रमाणिकता।

जहाँ तक स्पष्टता का सवाल है, तो यह उस विषय की परिभाषा, उसकी विशेषताओं, गुणों और लाभों का उल्लेख करने के माध्यम से की जाती है।

जहाँ तक दलील पेश करने की बात है, तो आम तौर पर अपनी बात की पुष्टि के लिए दलीलों, प्रमाणों एवं साक्ष्यों की आवश्यकता होती है, जो आम तौर पर किताब व सुन्नत तथा सलफ़ के कथनों से लिए जाते हैं। प्रसंग के तौर पर कुछ घटनाएँ भी बयान की जाती हैं। विषय-वस्तु की ज़रूरत को देखते हुए प्रसिद्ध इमामों और ज्ञानवान् लोगों, जो अपनी दीनदारी, विद्वता, सदाचार, सांसारिक मोह-माया से विरक्ति, दिलेरी एवं परहेज़गारी के कारण जाने जाते हों, के कथनों को नक़ल करना भी लाभकारी रहता है।

ख़ुतबे का अंत : जब ख़तीब अपना विषय समाप्त कर ले, तो उचित होगा कि अपने ख़ुतबे को कुछ अलग शब्दों में एक उपयुक्त संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ समाप्त करे, जो उसके विचारों को समेटने और उसके विषय को संक्षेप में प्रस्तुत करने का काम करे। क्योंकि यहाँ लंबी बात होने लगे, तो उकताहट पैदा होगी और उलझाव सामने आएगा।

यहाँ आकर नए विचार एवं नए प्रमाण प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसा होने पर यह अंत नहीं, बल्कि उसका एक भाग और उसका विस्तार माना जाएगा।

निष्कर्ष अपनी अभिव्यक्ति और प्रभाव में सशक्त होना चाहिए, क्योंकि यह वह अंतिम बात है जो श्रोता के कानों में पड़ती है और उसके ज़ेहन में रह जाती है। यदि उसकी संरचना कमज़ोर और उपस्थापन दुर्बल हो, तो ख़ुतबा का लाभ समाप्त हो जाता है।

अंत के तौर पर कुछ क़ुर्आनी आयतें प्रस्तुत की जा सकती हैं, जो पहले बयान न हुई हों और प्रेरणा, चेतावनी, प्रमाण या पुष्टि के रूप में पूरे विषय को समेटने का काम करती हों। कोई हदीस भी हो सकती है, जिसके अंदर उक्त बातें पाई जाएँ। ऐसा भी हो सकता है कि ख़ुतबे के तत्वों को एक अलग प्रभावशाली, व्यापक एवं स्पष्ट शैली में दोहरा दिया जाए।

ख़तीब को दो बातों का ख़ास ख़याल रखना चाहिए, जो इस प्रकार हैं : विषय की एकरूपता तथा नवीनता और परिवर्तन।

विषय की एकरूपता : ख़ुतबे में बात एक ही विषय पर हो, उसके सभी पहलुओं को समेटा जाए और उसपर पूरी गहराई से बात की जाए। क्योंकि एक ही ख़ुतबे में विभिन्न विषयों और अलग-अलग मुद्दों पर बात करने से ज़ेहनों में बिखराव आता है, एक बात दूसरी बात को भुला देती है तथा थका देने वाली लंबाई आ जाती है।

नवीनता और परिवर्तन : इसका अर्थ यह है कि सभी ख़ुतबे एक ही विषय पर न हों, बल्कि विषयों में विविधता आती रहे; ताकि तौहीद, इबादत, मामलात और अख़लाक़ आदि शरीयत के सभी पहलू सामने आते जाएँ।

ख़तीब अपनी बात एक ही शैली और एक ही ढर्रे पर रखता न चला जाए। अंदाज़ कभी प्रशनवाचक हो, कभी सामान्य हो, कभी मिसाल बयान की जाए और कभी हिकमतें तथा जीवन के रहस्य बयान किए जाएँ। साथ ही समाज की वास्तविक हालत तथा लोगों की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाए, उनका मार्गदर्शन किया जाए और उनको जागरुक करने का प्रयास किया जाए।[170] [170] देखिए : डॉक्टर सालेह बिन अब्दुल्लाह बिन हुमैद की किताब मनहज फ़ी ऐदाद ख़ुतबह अल-जुमुअह, (पृष्ठ : 22 और उसके बाद)।

चौथा विषय : मस्जिदों के आदाब

पहला बिंदु : मस्जिद की परिभाषा

मस्जिद का शरई अर्थ : वह स्थान, जहाँ पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ें, जुमा और अन्य नमाज़ें अदा की जाती हैं तथा अज़ान दी जाती है। इसे मस्जिद इसलिए कहा जाता है कि यह अल्लाह तआला के लिए सजदा करने का स्थान है।

मस्जिद और नमाज़गाह के बीच अंतर

मस्जिद वह स्थान है, जो स्थायी रूप से फ़र्ज़ नमाज़ों के लिए वक़्फ़ हो। जबकि 'नमाज़गाह' वह स्थान है, जो अस्थायी रूप से नमाज़ के लिए बनाया गया हो, जैसे कि स्कूलों, संस्थानों, कंपनियों और सरायों की नमाज़गाहें। इसे पाँचों नमाज़ों के लिए वक़्फ़ नहीं किया गया जाता है। नमाज़गाह में प्रवेश के समय मस्जिद की तरह तहीयतुल मस्जिद पढ़ना सुन्नत नहीं है। तहीयतुल मस्जिद केवल मस्जिद में प्रवेश के समय पढ़ी जाती है।

दूसरा बिंदु : मस्जिद का निर्माण तथा उसकी फ़ज़ीलत

मस्जिदें धरती के सर्वोत्तम और सबसे सम्मानित स्थान हैं, जहाँ सबसे उत्तम इबादत की जाती है। यानी नमाज़ पढ़ी जाती है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "(यह चिराग़) उन महान घरों में (जलाया जाता है), जिनके बारे में अल्लाह ने आदेश दिया है कि वे ऊँचे किए जाएँ और उनमें उसका नाम लिया जाए। उनमें सुबह और शाम उसकी महिमा का गान करते हैं। ऐसे लोग, जिन्हें व्यापार तथा क्रय-विक्रय अल्लाह के स्मरण, नमाज़ क़ायम करने और ज़कात देने से ग़ाफ़िल नहीं करता। वे उस दिन से डरते हैं, जिसमें दिल तथा आँखें उलट-पलट हो जाएँगी।" [सूरा नूर : 36-37]

अल्लाह तआला ने मस्जिदों को अपने साथ जोड़कर उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान की है। उसने कहा है : "और उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जो अल्लाह की मस्जिदों में उसके नाम का स्मरण करने से रोके..." [सूरा बक़रा : 114] एक और जगह में पवित्र अल्लाह ने कहा है : "और यह कि मस्जिदें केवल अल्लाह के लिए हैं। अतः अल्लाह के साथ किसी को भी मत पुकारो।" [सूरा जिन्न : 18]

इसलिए शरीयत ने मस्जिदों के निर्माण और उन्हें आबाद करने की प्रेरणा दी है। मसलन उसने एक स्थान पर कहा है : "अल्लाह की मस्जिदें तो वही आबाद करता है, जो अल्लाह पर और अंतिम दिन (क़यामत) पर ईमान लाया, तथा नमाज़ क़ायम की, ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरा। तो ये लोग आशा है कि मार्गदर्शन पाने वालों में से होंगे।" [सूरा तौबा : 18]

उसमान बिन अफ़्फ़ान -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : ''जो अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए कोई मस्जिद बनाता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत में वैसा ही घर बना देगा।'' [171] [171] सहीह बुख़ारी (450), सहीह मुस्लिम (533)।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित एक हदीस में है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो अल्लाह के लिए क़ता पक्षी के घोंसले जितनी या उससे भी छोटी मस्जिद बनाता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत में एक घर बनाएगा।" [172] [172] सुनन इब्न-ए-माजा, हदीस संख्या : 738। बूसीरी ने "अल-ज़वाइद" 1/94 में कहा है : यह सनद सहीह है।

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के शब्दों : "भले ही वह क़ता पक्षी के घोंसले के बराबर हो।" का अर्थ है : वह स्थान जिसे मादा पक्षी अपने अंडों के लिए तैयार करती है। यहाँ इसका उदाहरण देकर छोटी से छोटी मस्जिद बनाने की बात कही गई है। यानी मस्जिद चाहे जितनी भी छोटी हो, उसे बनाने को मामूली न जाना जाए।

इसमें वह सारे लोग शामिल हैं, जिन्होंने मस्जिद के निर्माण में, मिट्टी या ईंट द्वारा ही सही, योगदान दिया, निर्माण में अपने हाथ से काम किया, काम करने वालों की मज़दूरी दी या इस तरह का कोई भी काम किया, जिसके करने वाले के बारे में कहा जा सके कि उसने अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए और इसके नतीजे में मिलने वाले प्रतिफल की आशा में अपने शरीर या धन द्वारा मस्जिद के निर्माण में साथ दिया। इसके नतीजे में मिलने वाला प्रतिफल यह है कि अल्लाह उसके लिए जन्नत में वैसा ही या उससे भी विशाल घर बनाता है। विशाल इसलिए कि जन्नत के घर की तुलना दुनिया के घर से नहीं की जा सकती। दोनों के बीच कोई तुलना ही नहीं है। यह बात उन लोगों को प्रेरित करती है , जिन्हें अल्लाह ने धन से नवाज़ा है, भलाई के कामों में बढ़-चढ़कर भाग लेने और इस जीवन में मिले अवसर का लाभ उठाने का जज़्बा दिया है कि अपनी आख़िरत के लिए कुछ ऐसा कर्म आगे भेजें, जिसका प्रतिफल अपने रब के पास कई गुना बढ़ा हुआ पाएँगे।[173] [173] देखें : "फ़ुसूल व मसाइल ततअल्लक़ बिल-मसाजिद", लेखक शैख इब्न-ए-जिब्रीन, पृष्ठ : 14।

तीसरा बिंदु : मस्जिदों को आबाद करना तथा इसकी फ़ज़ीलत

मस्जिदों को आबाद करने का मतलब व्यापक रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार से आबाद करना है। इसमें मस्जिदों का निर्माण और मरम्मत, उनकी रोशनी और फर्श का प्रबंध करना, उनकी सेवा और सफाई करना, उनमें अल्लाह की इबादत करना, उनके लिए इमाम और मुअज़्ज़िन नियुक्त करना, उनके अंदर ज़िक्र की महफ़िलों, जैसे क़ुर्आन, फ़िक़्ह, तफ़सीर और हदीस आदि लाभकारी शास्त्रों की शिक्षा की सभाओं का आयोजन करना, मस्जिदों में काम करने वाले लोगों के लिए आजीविका का प्रबंध करना और उनके लिए वक़्फ़ का प्रबंध करना, मसलन उनके अंदर इमाम, मुअज़्ज़िन, शिक्षक और विद्यार्थी के लिए आवास वक़्फ़ करना और वज़ूख़ाना आदि का निर्माण आदि शामिल हैं।

उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "अल्लाह की मस्जिदें तो वही आबाद करता है, जो अल्लाह पर और अंतिम दिन (क़यामत) पर ईमान लाया, तथा जिसने नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरा। तो ये लोग आशा है कि मार्ग दर्शन पाने वालों में से होंगे।" [सूरा तौबा : 18]

इस आयत ने उस व्यक्ति के ईमान को सिद्ध किया है, जो मस्जिदों में नमाज़ पढ़कर, उनकी सफ़ाई करके और उनके टूटे-फूटे हिस्सों की मरम्मत करके मस्जिदों को आबाद करता है।[174] [174] देखें : "अल-मशरूअ व अल-ममनूअ फ़ी अल-मस्जिद", लेखक मुहम्मद अल-अरफ़ज (पृष्ठ : 9)।

चौथा बिंदु : मस्जिदों को गंदगियों से पाक रखना और उनका संरक्षण करना।

चूँकि मस्जिदें इबादत और अल्लाह के क़रीब होने के स्थान हैं, इसलिए उन्हें साफ़-सुथरा रखने और गंदगी, नापाकी और फालतू चीज़ों से बचाने का आदेश दिया गया है, ताकि वे स्वच्छता, सुंदरता और खूबसूरती की मिसाल बनी रहें।

शैख़ इब्न-ए-सादी रहिमहुल्लाह ने अल्लाह तआला के इस फ़रमान की व्याख्या करते हुए कहा है : "(यह चिराग़) उन महान घरों में (जलाया जाता है), जिनके बारे में अल्लाह ने आदेश दिया है कि वे ऊँचे किए जाएँ और उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए। उनमें सुबह और शाम उसकी महिमा का गान करते हैं।" [सूरा नूर : 36] वह कहते हैं : "...कि वे ऊँचे किए जाएँ और उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए..." ये मस्जिदों से जुड़े समग्र दिशा-निर्देश हैं। उन्हें बुलंद करने में, उनका निर्माण, उनकी साफ़-सफ़ाई, उन्हें नापाक चीज़ों तथा गंदगियों से पाक-साफ़ रखना, उन्हें ऐसे पागलों और बच्चों से बचाना जो नापाकियों से परहेज़ नहीं करते, इसी तरह काफ़िरों से बचाना तथा बेकार की बातों और अल्लाह के ज़िक्र के अलावा अन्य सारे शोरगुल से सुरक्षित रखना शामिल हैं।"[175] [175] तफ़्सीर सादी, पृष्ठ : 569 ।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि एक काली औरत मस्जिद में झाड़ू दिया करती थी। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे नहीं देखा तो उसके बारे में पूछा। लोगों ने बताया कि वह मर गई है। आपने फ़रमाया : “भला तुमने मुझे सूचना क्यों नहीं दी?” (वर्णनकर्ता) कहता है : एक तरह से लोगों ने उसे महत्व नहीं दिया था। लेकिन, आपने फ़रमाया : “मुझे उसकी क़ब्र बता दो।” लोगों ने आपको उसकी क़ब्र दिखा दी, तो आपने उसपर जनाज़े की नमाज़ पढ़ी और उसके बाद फ़रमाया : “बेशक, ये क़ब्रें अपने रहने वालों के लिए अंधेरे से भरी होती हैं और सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह मेरी नमाज़ की वजह से उनके लिए इन्हें रोशन कर देता है।” [176] (176) सहीह बुख़ारी (460), सहीह मुस्लिम (956)।

अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित एक हदीस में है कि उन्होंने कहा है : हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ मस्जिद में थे कि एक देहाती आया और मस्जिद में पेशाब करने लगा। तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सहाबा ने कहा : रुक जाओ, रुक जाओ! इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "इसे रोको मत - यानी इसका पेशाब न रोको - इसे छोड़ दो।" तो उन्होंने उसे पेशाब कर लेने तक छोड़ दिया। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे बुलाया और उससे फ़रमाया : "निश्चय ही, ये मस्जिदें पेशाब और गंदगी जैसी किसी भी चीज़ के लिए नहीं बनी हैं, बल्कि ये तो अल्लाह के ज़िक्र, नमाज़ और क़ुर्आन पढ़ने के लिए हैं।" फिर आपने एक व्यक्ति को आदेश दिया, जिसने एक बालटी पानी लाकर उस पर बहा दिया। [177] [177] सहीह बुख़ारी : 219 (संक्षेप में), तथा सहीह मुस्लिम : 285।

इसमें कोई इख़्तिलाफ़ नहीं है कि पेशाब और इस जैसी नापाक वस्तुओं से, जिनसे पाक होना आवश्यक है,  मस्जिदों को दूर रखा जाएगा। इसलिए मस्जिदों, उनके फर्श और उनके आंगन और छत आदि को सभी नापाक वस्तुओं से बचाकर रखा जाएगा और यदि गिर जाएँ तो साफ़-सुथरा कर दिया जाएगा।

और इसी तरह मसजिद को बलग़म, नाक की गंदगी, लार, खून और पीप जैसी गंदगियों से पाक करने का वर्णन आया है। चुनांचे अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़िबला की तरफ कुछ थूक देखा, तो यह बात आप पर बहुत भारी गुज़री, यहां तक कि उसका असर आपके चेहरे पर देखा गया, आप ख़ुद खड़े हुए और अपने हाथ से उसे साफ़ करने के बाद फ़रमायाः "जब तुममें से कोई व्यक्ति नमाज़ में खड़ा होता है, तो अपने रब से मुनाजात (दुआ) कर रहा होता है या उसका रब उसके और क़िबले के बीच होता है। अतः तुममें से कोई भी अपने क़िबले की ओर न थूके। हाँ बाएँ तरफ़ या अपने क़दम (पाँव) के नीचे (थूक सकता है)। फिर आपने अपनी चादर के एक किनारे पर थूका और उसे मसल दिया फिर फ़रमाया कि या इस तरह कर ले।" [178] [178]  सहीह बुख़ारी (405), सहीह मुस्लिम (551)।

बहुत सारी हदीसें इस बात की दलील हैं कि मस्जिद में थूकने और बलगम फेंकने से मना किया गया है। कुछ हदीसों में क़िबला या दाईं तरफ़ थूकने से मना किया गया है, बाईं तरफ़ या बाएँ पैर के नीचे थूकने की अनुमति दी गई है और फिर उसे पैर से रगड़ने का आदेश दिया गया है। इसमें कोई शक नहीं कि थूक और बलगम आदि चीज़ें स्वभावतः गंदगी मानी जाती हैं, इसलिए जब नबी ﷺ ने मस्जिद के क़िबले में थूक देखा, तो आपका चेहरा गुस्से से लाल हो गया और आपने तुरंत उसे साफ़ कर दिया और उस जगह ख़लूक़ या ज़ाफ़रान मल दिया।

हम सब जानते हैं कि अगर मस्जिद मिट्टी से बनी हो, तो उसे खुरच देना आसान होता है। इसी तरह अगर फ़र्श मिट्टी की हो, तो उसमें गिरने वाली चीज़ को दफ़न कर देना या गंदी मिट्टी को निकाल देना संभव है।

लेकिन, चूंकि इन दिनों मस्जिदें आमतौर पर साफ-सुथरी कालीनों से ढकी होती हैं और फर्श भी साफ-सुथरा होता है, जो गंदगी और मैल से प्रभावित हो सकता है, और उनपर थूक, खून और मवाद आदि का असर दिखाई दे सकता है, इसलिए ज़मीन पर थूकना पूरी तरह मना होगा, चाहे वह कालीन पर हो, दीवारों पर हो या फर्श पर। अगर किसी को थूकने की ज़रूरत हो, तो उसे बाहर जाकर थूकना चाहिए, रूमाल में थूककर उसे बाहर निकाल देना चाहिए या अपने कपड़े के किनारे में थूककर उसे मसल देना चाहिए जैसा कि हदीस में बताया गया है, ताकि मस्जिद साफ-सुथरी और पाक बनी रहे।

आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है, वह कहती हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने घरों (मोहल्लों) में मस्जिद बनाने के साथ-साथ इस बात का भी आदेश दिया कि उनको साफ़-सुथरा एवं ख़ुशबूदार रखा जाए।" सुफ़यान कहते हैं : "घरों में मस्जिद बनाने का अर्थ है, क़बीलों में मस्जिद बनाना।"[179] [179] इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है (हदीस संख्या : 594), तथा देखें : "फ़ुसूल व मसाइल ततअल्लक़ु बि अल-मसाजिद" (पृष्ठ : 27)।

पाँचवाँ बिंदु : क़ब्र पर मस्जिद बनाने या मस्जिद में क़ब्र दाख़िल करने का हुक्म

किसी भी व्यक्ति की क़ब्र पर मस्जिद बनाना जायज़ नहीं है, चाहे वह कोई भी हो; क्योंकि इससे मना किया गया है, जैसा कि शैख़ुल इस्लाम इब्न-ए-तैमिया ने कहा है : "इमामों (इस्लामी विद्वानों) की इस बात पर सहमति है कि किसी क़ब्र पर मस्जिद नहीं बनाई जाएगी, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''तुमसे पहले जो लोग थे, वे क़ब्रों को मस्जिदें बना लिया करते थे। ख़बरदार! क़ब्रों को मस्जिदें न बनाना, क्योंकि मैं तुम्हें इससे मना करता हूँ।''

मस्जिद में मरे हुए को दफ़न करना जायज़ नहीं है। अगर मस्जिद पहले से हो तो उसे बदल दिया जाए। यानी या तो क़ब्र को समतल कर दिया जाए या फिर क़ब्र नई तो खोद डाला जाए।।

अगर मस्जिद क़ब्र बनने के बाद बनाई गई हो, तो या तो मस्जिद का स्थान बदला जाएगा या क़ब्र का रूप। चुनाँचे, जो मस्जिद क़ब्र पर बनी हो, उसमें न फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ी जाएगी, न नफ़ल। क्योंकि इससे मना किया गया है।"[180] [180] मजमू अल-फ़तावा (22/194)।

शैखुल-इस्लाम रहिमहुल्लाह द्वारा वर्णित प्रमाणों के अतिरिक्त एक प्रमाण यह भी है कि आइशा और अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु का समय निकट आया, तो आप अपनी चादर अपने चेहरे पर डाल लेते। फिर जब उससे परेशानी होने लगती, तो उसे अपने चेहरे से हटा देते। इसी दौरान आपने फ़रमाया : "यहूदियों तथा ईसाइयों पर अल्लाह की लानत हो। उन लोगों ने नबियों की क़ब्रों को मसजिद बना लिया।" आप उनकी तरह क़ब्र को मसजिद बनाने से सावधान कर रहे थे। [181] [181] सहीह बुख़ारी : 435, सहीह मुस्लिम : 531।

रसूल ﷺ ने मृत्यु की कठिनाइयों के समय भी स्पष्ट किया कि अल्लाह ने यहूदियों और ईसाइयों पर लानत भेजी है, क्योंकि उन्होंने अपने नबियों की क़ब्रों को मस्जिद बना लिया। आपने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्राचीन काफिरों की आदतों में से था। आपने ऐसा अपनी उम्मत को उनके जैसा काम करने से रोकने और शिर्क तथा ग़ैरुल्लाह की इबादत का द्वार बंद करने के लिए किया। ताकि आपकी उम्मत को उनके समान बनने से सावधान किया जा सके और अल्लाह के साथ शिर्क और अन्य की पूजा के दरवाजे को बंद किया जा सके।

उम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि उम्म-ए-हबीबा और उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने हबशा में एक गिरजाघर देखा था, जिसमें तसवीरें थीं। जब उन्होंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से उसका ज़िक्र किया तो आपने फ़रमाया : "उन लोगों में जब कोई सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी क़ब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें इस तरह की तसवीरें बना देते। वे क़यामत के दिन अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग होंगे।" [182] (182) सहीह बुख़ारी: (427), सहीह मुस्लिम: (528)।

आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस बीमारी के दौरान, जिससे आप ठीक न हो सके, फ़रमाया : "यहूदियों तथा ईसाइयों पर अल्लाह की लानत हो। उन लोगों ने नबियों की क़ब्रों को मसजिद बना लिया।" यदि ऐसा न होता, तो आपकी क़ब्र बाहर ही रखी जाती।मगर (इस लिए नहीं रखा गया क्योंकि) आपको इस बात का डर था कि कहीं उसे मस्जिद न बना लिया जाए [183]। [183] सहीह बुख़ारी : 1390, सहीह मुस्लिम : 529।

छठा बिंदु : मस्जिदों को सजाना कैसा है?

मस्जिदों को सजाना और उनपर गर्व करना उचित नहीं है, क्योंकि बुखारी ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत किया है, वह कहते हैं : "तुम लोग उसे अवश्य उसी तरह सजाओगे, जिस तरह यहूदियों तथा ईसाइयों ने सजाया।"

अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : "वे उनपर गर्व करेंगे, मगर उन्हें आबाद बहुत कम करेगे।"

उमर रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित एक हदीस में है कि उन्होंने मस्जिदों के निर्माण का आदेश दिया और कहा : “लोगों को बारिश से बचाओ, और ख़बरदार, उसे (मसजिद की छत को) लाल या पीला करके लोगों को फ़ितने में न डालना।” [184] [184] इन आसार का उल्लेख बुख़ारी ने अपनी 'सहीह' में सनद के बिना जज़्म के सेग़े के साथ किया है। (1/96-97)

इन दिनों मस्जिदों के निर्माण में दिखावा बढ़ गया है और लोग उनकी सजावट और उनपर खर्च करने में काफ़ी फ़जूलख़र्ची से काम ले रहे हैं। वैसे तो उलेमा ने इस बात की अनुमति दी है कि जब घर और मकान पोख़्ता बन रहे हैं, तो मस्जिदों को भी पोख़्ता बनाया जा सकता है, ताकि मस्जिदें घरों और मकानों से कमतर न दिखें। लेकिन इसके बावजूद फ़ज़ूलख़र्ची, बहुत ज़्यादा रंग व रौग़न, तरह-तरह की टाइल्स, फर्श और आनावश्यक कालीनों की अनुमति नहीं दी जा सकती। ख़ास तौर पर इसलिए कि आज भी बहुत-सी मस्जिदों को मामूली निर्माण की ज़रूरत है, इसलिए धनराशि का उपयोग इन मस्जिदों के निर्माण में किया जाना चाहिए।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है, "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में मस्जिद कच्ची इंटों से बनी हुई थी, उसकी छत खजूर की डालियों की थी और उसके खम्भे खजूर की लकड़ी के थे। अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उसमें कोई इज़ाफा नहीं किया। उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उसमें इज़ाफा किया और उसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने की तरह ही कच्ची ईंटों और खजूर की डालियों से बनाया तथा उसके खम्भे दोबारा लकड़ी के ही बनवाए। फिर उसमान (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उसे बदल दिया और उसमें बहुत ज़्यादा इज़ाफा किया। उन्होंने उसकी दीवारें तराशे हुए पत्थरों और चूने से बनवाईं, उसके खम्भे भी तराशे हुए पत्थरों के बनवाए और उसकी छत सागवन की लकड़ी से बनवाई।" [185] 974 [185] सहीह बुख़ारी (446)।

आदरणीय शैख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- कहते हैं : "उसमान रज़ियल्लाहु अनहु का अमल इस बात का प्रमाण है कि तराशे हुए पत्थरों, उम्दा लकड़ियों और दीवार पर रंग-रोगन करके मस्जिद को सुंदर बनाने में कोई हर्ज नहीं है। यद्यपि सलफ़ (यानी उनसे पहले के सहाबा) का जीवन अधिक उत्तम एवं श्रेष्ठ है, लेकिन जब लोग अपने घरों को सुंदर बनाने लगें, पुरानी इमारतों से दूर भागने लगें और मस्जिद को उसकी पुरानी हालत पर छोड़ देना मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए उपस्थित तथा अन्य कार्यों के लिए एकत्र होने से गुरेज़ का कारण बन जाए, तो मस्जिदों की ओर आकर्षित करने के लिए वैसा ही करने में कोई हर्ज नहीं है, जैसा उसमान रज़ियल्लाहु अनहु ने किया था। लेकिन अभिमान और दिखावे के लिए ऐसा करना जायज़ नहीं है। मस्जिद में कुछ लिखना मकरूह (नापसंदीदा) है। बेहतर यही है कि मसजिद के निर्माण में सादगी रहे।"[186] [186] इसे अल-क़हतानी की "अल-मसाजिद" (पृष्ठ : 71) से नक़ल किया गया है।

सातवाँ बिंदु : काफ़िर के मस्जिद में प्रवेश करने का हुक्म

मुसलमानों के लिए किसी भी काफ़िर को मस्जिद-ए-हराम और उसके आस-पास के पूरे हरम क्षेत्र में प्रवेश करने देना हराम है। इसका आधार अल्लाह तआला का यह फ़रमान है : "ऐ ईमान लाने वालो! निःसंदेह बहुदेववादी अशुद्ध हैं। अतः वे इस वर्ष के बाद मस्जिद-ए-हराम के पास न आएँ..." [सूरा तौबा : 28] रहीं अन्य मस्जिदें, तो अगर वे उनमें किसी शरई उद्देश्य से प्रवेश करें, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। जैसे इस्लाम के बारे में पूछना, मस्जिद से संबंधित कोई काम करना, मुसलमानों के हितों के लिए कोई काम करना, कोई उपदेश सुनना या किसी अन्य जायज़ काम के लिए प्रवेश करना, जैसे मस्जिद के अंदर मौजूद पानी पीना। इन हालात में यह जायज़ है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सुमामा बिन उसाल को मस्जिद के एक स्तंभ से बाँधकर रखा था। अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस में है कि वह कहते हैं : "नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नज्द की ओर कुछ घुड़सवार भेजे, जो बनू हनीफ़ा के एक आदमी को पकड़ लाए, जिसको सुमामा बिन उसाल कहा जाता था। उसको मस्जिद के एक खम्बे से बांध दिया गया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसके पास तशरीफ लाए और पूछा : "ऐ सुमामा! तेरा क्या ख़्याल है?" उसने कहा : "मेरा अच्छा ख़्याल है। ऐ मुहम्मद! अगर आप मुझे मार देंगे तो ऐसे आदमी को मारेंगे जो ख़ूनी है, और अगर आप एहसान करते हुए मुझे छोड़ देंगे तो आपका शुक्रगुज़ार रहूँगा, और अगर आप माल चाहते हैं तो जितना चाहिए माँगें। तो आपने उसे अगले दिन तक के लिए उसी अवस्था में छोड़ दिया..." हदीस[187]. [187] बुख़ारी व मुस्लिम।

नजरान का प्रतिनिधि मंडल मस्जिद में दाख़िल हुआ, जो ईसाई था[188]। इसी तरह, ज़िमाम बिन सालबा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, जब आप मस्जिद में थे। अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : "एक बार हम मस्जिद में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ बैठे हुए थे कि इतने में एक ऊँट सवार आया और अपने ऊँट को मस्जिद में बिठाकर बाँध दिया, फिर पूछने लगा कि तुममें से मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कौन हैं? उस समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों के बीच टेक लगाकर बैठे थे। हमने कहा : यह सफ़ेद रंग वाले जो टेक लगाकर बैठे हुए हैं। तब उस व्यक्ति ने आपसे कहा : ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटे! इसपर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : मैंने तुम्हें सुना, पूछो मैं उत्तर देता हूँ। फिर उस आदमी ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा : मैं आपसे कुछ पूछने वाला हूँ और पूछने में सख़्ती करूँगा, आप मुझपर नाराज़ ना हों। आपने फ़रमाया : जो चाहे पूछ!... उसके बाद वह आदमी कहने लगा : मैं उस (शरीयत) पर ईमान लाता हूँ, जो आप लाए हैं। मैं अपनी क़ौम का प्रतिनिधि बनकर आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ और मैं ज़िमाम बिन सालबा हूँ, बनू साद बिन बक्र क़बीले से हूँ।" [189] [188] बुख़ारी व मुस्लिम। [189] इस हदीस को इमाम बुख़ारी ने रिवायत किया है। और देखें : मजमू' फ़तावा व मक़ालात इब्न बाज़, आठवाँ खंड, काफ़िरों के मस्जिदों में प्रवेश का हुक्म, तथा फ़तावा अल-लजनह अल-दाइमह 6/276.

ये मुअज़्ज़िन, इमाम, ख़तीब और मस्जिद के अहकाम से संबंधित कुछ ज़रूरी बाते हैं, जो हम बयान कर पाए। मुअज़्ज़िन, इमाम और ख़तीबगण से हमारा अनुरोध है कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से डरते रहें तथा पूरी मेहनत से ज्ञान अर्जित करें एवं उसे फैलाएँ।

यह कुछ बातें थीं, जो प्रस्सतुत की गईं। सुयोग प्रदान करना अल्लाह का काम है। अल्लाह की कृपा एवं शांति की धारा बरसे हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा आपके परिवारजनों और सब साथियों पर। हमारी अंतिम प्रार्थना यह है कि समस्त संसारों के पालनहार अल्लाह की प्रशंसा हो।

मुअज़्ज़िन, इमाम और ख़तीब के लिए कुछ लाभदायक स्रोत

अल-अज़ान व अल-इक़ामह, लेखक : डॉ. सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-क़हतानी, प्रकाशक : मक्तबा सफ़ीर, रियाद।

अहकाम अल-इमामह व अल-ऐतिमाम फ़ी अल-सलात, लेखक : डॉ. अब्दुल मुहसिन अल-मुनीफ़।

अल-इमामह फ़ी अल-सलात फ़ी ज़व अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : सईद बिन अली बिन वह्फ़ क़हतानी।

उसलूब ख़ुतबह अल-जुमुअह, लेखक : अब्दुल्लाह बिन ज़ैफ़ुल्लाह अर-रहीली, प्रकाशक : इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

अल-इमामह फ़ी अल-सलात - मफ़हूम व फ़ज़ाइल व अनवाअ व आदाब व अहकाम फ़ी ज़व अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक: डॉ. सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-कहतानी, प्रकाशक : मक्तबा सफ़ीर, रियाद।

ख़ुतब अल-जुमुअह व मस्ऊलिय्यात अल-ख़ुतबा, प्रस्तुति : आह्वान तथा मार्गदर्शन सभा, इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

ख़ुतबह अल-जुमुअह फ़ी अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : अब्दुर्रहमान बिन मुहम्मद अल-हम्द, प्रकाशक : इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

ख़ुतबह अल-जुमुअह व अहकामुहा अल-फ़िक़्हिय्यह, लेखक : अब्दुल अज़ीज़ बिन मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह अल-हजीलान, प्रकाशक: इस्लामी मामलात तथा आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, इस्लामिक अनुसंधान एवं अध्ययन केंद्र।

ख़ुतबह अल-जुमुअह व दौरुहा फ़ी तरबियह अल-उम्मह, लेखक : अब्दुल ग़नी अहमद जब्र मजहर, प्रकाशक : इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

ख़मसून वसीयह व वसीयह लि-तकूना ख़तीबन नाजिहा, लेखक : अमीर बिन मोहम्मद अल-मदरी। यह किताब इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब की वेबसाइट पर प्रकाशित है।

सलात अल-जुमुअह - मफ़हूम व शुरूत व फ़ज़ाइल व ख़साइस व आदाब व अहकाम फ़ी ज़व अल-किताब व अल-सुन्नह, लेखक : डॉ. सईद बिन अली बिन वह्फ़ अल-कहतानी, प्रकाशक: मक्तबा सफ़ीर, रियाद.

मिंबर जुमुअह अमानह व मस्ऊलियह, लेखक : अब्दुल्लाह बिन मोहम्मद बिन हुमैयिद, प्रकाशक : इस्लामी मामलात, आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

मंहज फ़ी एदाद ख़ुत्बह अल-जुमुअह, लेखक : डॉ. सालेह बिन अब्दुल्लाह बिन हमीद, प्रकाशक : इस्लामी मामलात तथा आह्वान एवं मार्गदर्शन मंत्रालय, सऊदी अरब।

रसाइल लिल-अइम्मह व अल-मुअज़्ज़िनीन, लेखक : शैख़ अब्दुल्लाह बिन सालेह अल-फ़ौज़ान, प्रकाशक : दार इब्न अल-जौज़ी।

रिसालह इला अइम्मह अल-मसाजिद व अल-मुअज़्ज़िनीन व अल-मामूनीन, लेखक : शैख़ अब्दुल्लाह बिन जारुल्लाह अल-जारुल्लाह।

कुवैती फ़िक़्ह विश्वकोश, और ख़ुतबा, इमामत, अज़ान एवं मस्जिदों के बाब।