क्या क़ुरआन अल्लाह की वाणी है? भाषा: अरबी बेशक क़ुरआन अल्लाह की वाणी और उसकी प्रकाशना (वह्य) है जिसे उसने अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा और यह कहते हुए उसकी सुरक्षा की ज़मानत ली: (निस्संदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा है और निस्संदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं)। सूरा अल- हिज्र, आयत संख्या- 9 अगर कोई कहे कि मुझे कैसे पता चलेगा कि यह (क़ुरआन) अल्लाह की वाणी है, किसी मानव की वाणी नहीं? इसके जवाब में पाँच ऐसी दलीलें हैं जिनको कोई न्यायप्रिय और समझदार इंसान जान ले तो वह कभी भी इस बात का इंकार नहीं कर सकता कि क़ुरआन वाक़ई अल्लाह की वाणी है: पहली दलील: इंसान का…
अगर कोई कहे कि मुझे कैसे पता चलेगा कि यह (क़ुरआन) अल्लाह की वाणी है, किसी मानव की वाणी नहीं?
इसके जवाब में पाँच ऐसी दलीलें हैं जिनको कोई न्यायप्रिय और समझदार इंसान जान ले तो वह कभी भी इस बात का इंकार नहीं कर सकता कि क़ुरआन वाक़ई अल्लाह की वाणी है:
पहली दलील: इंसान का उस जैसी वाणी के लाने में असमर्थ होना:
अगर क़ुरआन किसी मानव की रचना होता तो क्या सारे मानव उस जैसी वाणी गढ़ कर लाने में अक्षम होते?
तो क्या करोड़ों इंसान जिनमें विद्वान, साहित्यकार, कवि तथा दार्शनिक सभी हैं, सैकड़ों वर्ष गुज़र जाने के बावजूद क़ुरआन के जैसी एक पंक्ति बना कर लाने में असमर्थ रह गए हैं?
क्या यह सब इस बात को नहीं दर्शाता है कि पवित्र क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, किसी इंसान की वाणी नहीं है?
दूसरी दलीलः गलती और अंतर्विरोध से सुरक्षित होनाः
इस में कोई शक नहीं कि मानव- रचित कोई पुस्तक चाहे कितनी ही उच्च कोटि की क्यों न हो, उसमें गलती, भूल तथा कमी रह जाने की संभावना हर हाल में बनी रहती है। बहुत बार लेखक अपनी लिखी किताब में ही अंतर्विरोध का शिकार हो जाते हैं और एक जगह जिस बात की पुष्टि करते हैं, दूसरे स्थान पर उसका स्वयं ही खंडन कर देते हैं।
यही कारण है कि हम देखते हैं कि हर लेखक अपनी किताब के प्राक्कथन में ही, किताब में रह जाने वाली गलती और भूल की क्षमा याचना कर लेता है।
तीसरी दलीलः मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनपढ़ होना और उनकी सच्चाई
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ही वह शख्स हैं जिन्होंने क़ुरआन को अल्लाह तआला की तरफ से दुनिया वालों तक पहुंचाया और वे बहुत ही सच्चे और अमानतदार इनसान थे।
उनके अनुयाइयों से पहले उनके दुश्मनों ने ही उन्हें सच्चा और अमानतदार कहकर पुकारा। ईशदौत्य (नुबुव्वत) की प्राप्ति से पहले ही उन्हें यह उपाधि मिल चुकी थी।
जब उन्होंने खुले आम इस्लामी आह्वान के प्रचार-प्रसार की शुरूआत की तो सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े, लोगों को पुकार कर जमा किया और कहाः"तुम्हारा क्या विचार है, अगर मैं तुम्हें सूचना दूँ कि इस घाटी के पीछे एक सेना तुम पर धावा बोलने के लिए तैयार खड़ी है तो क्या तुम मेरी बात पर विश्वास करोगे? सबने एक स्वर में कहाः क्यों नहीं, अवश्य विश्वास करेंगे क्योंकि हमें आपके बारे में केवल सच्चाई का ही अनुभव है"।
मैंने तुम्हारे बीच अपने जीवन के चालीस साल गुज़ारे हैं। मैंने अपने जीवन के इस कालखंड में हमेशा सच बोला है, कभी एक भी झूठ नहीं बोला। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं लोगों पर तो झूठ न बोलूं, मगर अल्लाह पर झूठ बांधूँ?
इसी प्रकार, आपने उनके बीच चालीस साल गुज़ारे न आपको पढ़ना आता न लिखना, तो भला यह कैसे संभव था कि आप इतनी महान किताब लिख डालते जिसने सारे अरब को अपनी वाक्पटुता और आलंकारिकता से विवश कर दिया? क्या यह मुमकिन था कि आप अपनी तरफ़ से ऐसा कर देते या फिर यह इस बात की ठोस दलील है कि यह किताब उस महान अल्लाह की तरफ़ से उतारी गई है जो हिकमत वाला और प्रशंसा योग्य है?
चौथी दलीलः भूतकाल और भविष्यकाल की सूचनाएँ देना
क़ुरआन में ऐसे बहुत सारे क़िस्से हैं जो हज़ारों साल पहले घटित हुए थे। पवित्र क़ुरआन ने उनकी व्याख्यात्मक सूचना दी, जैसे नूह, आद, समूद, लूत, फ़िरऔन और बनू इस्राईल की कौमें।
नई खोजें जैसे खुदाई, शिलालेख तथा लेख हर उस तथ्य की पुष्टि करते हैं जिसका उल्लेख क़ुरआन ने किया है।
पवित्र क़ुरआन ने न केवल रूमियों की विजय प्राप्ति की अग्रिम सूचना दी, बल्कि उसका समय भी यह कहकर निर्धारित कर दियाःकुछ (तीन से लेकर नौ) वर्षों मेंऔर वास्तव में रूमियों को पराजय के सात वर्षों के बाद पारसियों पर विजय प्राप्त हो गई।
पाँचवी दलीलः क़ुरआन का वैज्ञानिक तथा संगवैधानिक चमत्कारः
पवित्र क़ुरआन ने चिकित्सा, अंतरिक्ष तथा समुद्र विज्ञान के बारे में बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ दी हैं जिनमें से बहुतों की खोज बीसवीं शताब्दी या उससे थोड़े पहले या थोड़े बाद ही हो सकी है। तो ज़रा बताया जाए कि किसने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भ्रूण विज्ञान के बारे में बताया और सिखाया कि इंसान कई प्रक्रियाओं से गुज़र कर पैदा होता है अर्थात सबसे पहले वह वीर्य की शक्ल में होता है, फिर रक्त के थक्के का रूप लेता है और फिर गोश्त का लोथड़ा बनता है?
अनपढ़ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), जिन्होंने अपना पूरा जीवन अरब की मरुभूमि में बिताया और कभी भी समुद्री यात्रा नहीं की, वह कौन है जिसने उनको सिखाया कि समुद्रों में लहरों की परतें होती हैं? उन्हें किसने बताया कि समुद्रों की गहराइयों में इतना घनघोर अंधकार होता है कि इंसान अपने हाथ की उंगली तक नहीं देख पाता?
वह कौन है जिसने अनपढ़ मुहम्मद को भौतिक लेनदेन के मामलों में ऐसा ठोस विस्तृत विधान, खानदान और मीरास का कानून और अंतर्राष्ट्रीय संधियों का ज्ञान सिखाया जिसका एक प्रतिशत भी लाने में दुनिया के अत्यंत प्रतिभाशाली कानूनविद असक्षम हैं?
बेशक यह क़ुरआन मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रचना नहीं, अपितु प्रभुत्वशाली प्रशंसित अल्लाह की ओर से है।
बेशक पवित्र क़ुरआन जिस उच्चतम ज्ञान-विज्ञान, रहस्य, अलंकारिक सौंदर्य और भाषाई सटीकता को शामिल है, उसकी मिसाल लाना मानवीय क्षमता से बाहर है। इस संदर्भ में यदि हम इस बात को भी शामिल कर लें कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक अनपढ़ और निरक्षर व्यक्ति थे, पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, किसी पाठशाला से उन्होंने शिक्षा हासिल नहीं की थी, न किसी संस्कृति से उनका संपर्क हुआ था और ना ही उन्होंने अरब उपमहाद्वीप से बाहर कभी कदम रखा था तो यह संभावना बिलकुल समाप्त हो जाती है कि वे ऐसी महान पुस्तक लिखने योग्य हो सकते हैं।
पुस्तक 'पवित्र क़ुरआन का परिचय' बताती है कि पवित्र क़ुरआन अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाली अल्लाह की वाणी, एक बेमिसाल चमत्कारिक ग्रंथ, जीवन तथा जीवन चर्या को सुव्यवस्थित करने वाला तथा भलाई का मार्ग दिखाने वाला एवं बुराई से दूर करने वाला विधान है। यह पुस्तक बताती है कि अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन को हर प्रकार की विकृति से सुरक्षित रखा है, इसके अर्थों को समझने के लिए अरबी भाषा को सीखने का बड़ा महत्व है और यह दुनिया तथा आख़िरत की ख़ुशियों की प्राप्ति के विषय में एक मार्गदर्शक का भूमिका निभाता है।
मानवता को मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ईशदौत्य (पैगम्बरी) की आवश्यकता भाषाः अरबी हे मनुष्य! क्या तुमने अपने-आपसे कभी पूछा है कि तुम्हें किसने पैदा किया है? और तुमको किसलिए पैदा किया गया है? दुनिया की इस जिंदगी में पृथ्वी के ऊपर तुम्हारे अस्तित्व के क्या मायने और उद्देश्य हैं? निस्संदेह, जिसने तुम्हें पैदा किया है, वह अल्लाह है, मूर्तियाँ नहीं हैं, न गाय है, न मसीह हैं, न प्रकृति है और ना ही तुमने खुद को पैदा किया है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (क्या वे बिना किसी चीज के पैदा किए गए हैं या वे स्वयं ही अपने स्रष्टा हैं?) सूरा अत्-तूर: 35 जब बिना किसी आविष्कारक के उनका वजूद में आना असंभव…
भाषाः अरबी इस्लाम का संदेश तमाम आसमानी संदेशों का समापन है। इस प्रकार, इस्लाम ही वह धर्म है जिसे अल्लाह तआला ने तमाम लोगों के लिए चुना है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को सम्पूर्ण कर दिया, तुम पर अपना उपकार पूरा कर दिया और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के तौर पर चुन लिया) सूरा अल-माइदा:3 और अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबियों के सिलसिले की अंतिम कड़ी हैं। इसलिए, वह संपूर्ण मानव जाति के लिए दूत हैं। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (आप कह दें कि ऐ लोगो! बेशक मैं तुम सभों की ओर भेजा गया रसूल हूँ) सूरा अल-आराफ:158 अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व…
दुनिया की हर चीज़ पैदा करने वाले के अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करती है किसने आकाशों, धरती और उनके बीच मौजूद अनगिनत बड़ी-बड़ी सृष्टियों को पैदा किया है? आकाश एवं धरती की यह सटीक एवं सुदृढ़ व्यवस्था किसने स्थापित की? किसने इन्सान को पैदा किया, उसे सुनने एवं देखने की शक्ति दी, बुद्धि-विवेक दिया और ज्ञान एवं तथ्यों को समझने में सक्षम बनाया? आपके तथा अन्य जीवित प्राणियों के शरीर की प्रणालियों की इस सूक्ष्म कारीगरी की व्याख्या आप कैसे करेंगे? इनको इतने शानदार अंदाज़ में किसने पैदा किया? यह महान ब्रह्माण्ड अपने सूक्ष्म नियतों के साथ इतने लंबे समय से कैसे व्यवस्थित एवं स्थिर रूप में चल रहा है?