هل القرآن كلام الله؟
هل القرآن كلام الله؟ نعم، القرآن الكريم هو كلام الله، ويتضح ذلك من خلال إعجازه اللغوي والتحدي للبشر بأن يأتوا بمثله، وعدم وجود تناقض فيه رغم نزوله قبل أكثر من 1400 سنة، وأمية النبي محمد ﷺ الذي لم يكن يقرأ أو يكتب، وإخباره بأحداث مستقبلية وحقائق علمية اكتشفت حديثًا. كل هذه الدلائل تؤكد أنه وحي من الله وليس من صنع البشر.
क्या क़ुरआन अल्लाह की वाणी है?
भाषा: अरबी
बेशक क़ुरआन अल्लाह की वाणी और उसकी प्रकाशना (वह्य) है जिसे उसने अपने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा और यह कहते हुए उसकी सुरक्षा की ज़मानत ली: (निस्संदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारा है और निस्संदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं)। सूरा अल- हिज्र, आयत संख्या- 9
अगर कोई कहे कि मुझे कैसे पता चलेगा कि यह (क़ुरआन) अल्लाह की वाणी है, किसी मानव की वाणी नहीं?
इसके जवाब में पाँच ऐसी दलीलें हैं जिनको कोई न्यायप्रिय और समझदार इंसान जान ले तो वह कभी भी इस बात का इंकार नहीं कर सकता कि क़ुरआन वाक़ई अल्लाह की वाणी है:
पहली दलील: इंसान का उस जैसी वाणी के लाने में असमर्थ होना:
अगर क़ुरआन किसी मानव की रचना होता तो क्या सारे मानव उस जैसी वाणी गढ़ कर लाने में अक्षम होते?
अल्लाह तआला ने तमाम इंसानों को चुनौती दी कि क़ुरआन जैसी वाणी बना कर लाएं तो सारे इंसान अक्षम प्रमाणित हुए, जैसा कि अल्लाह ने फ़रमायाः (तो फिर वे इस क़ुरआन के समान कोई बात ले आएँ, यदि वे सच्चे हैं)। सूरा तूर, आयत संख्याः 34
फिर अल्लाह तआला ने उन्हें चुनौती दी कि क़ुरआन की सूरतों जैसी दस सूरतें बनाकर लाएं तो भी वे असमर्थ रहे, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः (क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया है? आप कह दें कि इस जैसी गढ़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह के सिवा, जिसे बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम सच्चे हो)। सूरा हूद- 13
फिर अल्लाह तआला ने उन्हें चुनौती दी कि क़ुरआन की सूरतों जैसी एक सूरत बनाकर लाएं तो भी वे असमर्थ रहे, जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया हैः (क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया हैॽ आप कह दें कि इसी के समान एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा जिन्हें तुम बुला सकते हो बुला लो, यदि (अपने दावे में) तुम सच्चे हो)। [सूरा यूनुस: 38] अर्थात, तुम जिन्नों, प्रतिभाशाली इंसानों तथा जिससे भी मदद ले सकते हो, लेकर क़ुरआन की एक ही सूरा जैसी कोई सूरा बनाकर पेश कर दो। यह चुनौती आज भी क़ायम है, कोई इंसान या जिन्न कुछ भी न ला सका। याद रहे कि यह चुनौती सारे इंसानों तथा जिन्नों को शामिल है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है : (आप कह दें : यदि समस्त मनुष्य तथा जिन्न इस बात पर एकत्रित हो जाएँ कि इस क़ुरआन के समान (कोई पुस्तक) ले आएँ, तो इस जैसी पुस्तक नहीं ला सकेंगे, चाहे वे एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हो जाएँ। अल- इसरा: 88
आश्चर्यचकित करने वाली बात यह है कि अल्लाह तआला पूर्ण दृढ़ता के साथ कह रहा है कि दुनिया का कोई भी इंसान या जिन्न भविष्य में भी इस चुनौती को दुनिया के खत्म हो जाने तक, नहीं तोड़ सकता। अल्लाह तआला फरमाता हैः (और यदि तुम उस (पुस्तक) के बारे में किसी संदेह में हो, जो हमने अपने बंदे पर उतारा है, तो उसके समान एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा अपने समर्थकों को भी बुला लो, यदि तुम सच्चे हो। [अल- बक़रा: 23]
इस चुनौती पर चौदह शताब्दियों का समय बीत चुका है, मगर इंसान आज भी उस जैसी वाणी बनाकर लाने में असमर्थ है।
क़ुरआन की सबसे छोटी सूरा, सूरा अल- कौसर है जो केवल एक पंक्ति में समाहित हो जाती है। अल्लाह तआला फ़रमाता हैः ((ऐ नबी!) हमने आपको कौसर प्रदान किया है)। (तो आप अपने रब ही के लिए नमाज़ पढ़ें तथा क़ुर्बानी करें)। (निःसंदेह आपका शत्रु ही बे नाम व निशान है)। अल- कौसर, आयत संख्याः 1-3
तो क्या करोड़ों इंसान जिनमें विद्वान, साहित्यकार, कवि तथा दार्शनिक सभी हैं, सैकड़ों वर्ष गुज़र जाने के बावजूद क़ुरआन के जैसी एक पंक्ति बना कर लाने में असमर्थ रह गए हैं?
क्या यह सब इस बात को नहीं दर्शाता है कि पवित्र क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, किसी इंसान की वाणी नहीं है?
दूसरी दलीलः गलती और अंतर्विरोध से सुरक्षित होनाः
इस में कोई शक नहीं कि मानव- रचित कोई पुस्तक चाहे कितनी ही उच्च कोटि की क्यों न हो, उसमें गलती, भूल तथा कमी रह जाने की संभावना हर हाल में बनी रहती है। बहुत बार लेखक अपनी लिखी किताब में ही अंतर्विरोध का शिकार हो जाते हैं और एक जगह जिस बात की पुष्टि करते हैं, दूसरे स्थान पर उसका स्वयं ही खंडन कर देते हैं।
यही कारण है कि हम देखते हैं कि हर लेखक अपनी किताब के प्राक्कथन में ही, किताब में रह जाने वाली गलती और भूल की क्षमा याचना कर लेता है।
रही बात क़ुरआन की तो हम देखते हैं कि वह अपनी शुरूआत में ही यह घोषणा खुले शब्दों में कर देता है कि उसमें जो कुछ भी है, बिल्कुल सही और सटीक है और उसमें गलती रह जाने की तनिक भी संभावना नहीं है। अल्लाह तआला ने सूरा अल- बक़रा के आरंभ में फ़रमाया हैः (यह (क़ुरआन) वह पुस्तक है, जिसमें कोई संदेह नहीं, परहेज़गारों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है)। अल- बक़रा: 2
और अल्लाह तआला ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी किताब हर प्रकार के अंतर्विरोध और मतभेद से खाली है। वह कहता हैः तो क्या वे क़ुरआन पर चिंतन- मनन नहीं करते? यदि वह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो वे उसमें बहुत सारा अंतर्विरोध और असंगति पाते। [सूरा अन-निसा: 82] यानी अगर क़ुरआन मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) या किसी और की तरफ से गढ़ा हुआ होता, जैसा कि बहुदेववादी लोग कहते हैं, तो वे उसमें ढेरों विसंगतियाँ और अंतर्विरोध पा सकते थे।
तीसरी दलीलः मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनपढ़ होना और उनकी सच्चाई
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ही वह शख्स हैं जिन्होंने क़ुरआन को अल्लाह तआला की तरफ से दुनिया वालों तक पहुंचाया और वे बहुत ही सच्चे और अमानतदार इनसान थे।
उनके अनुयाइयों से पहले उनके दुश्मनों ने ही उन्हें सच्चा और अमानतदार कहकर पुकारा। ईशदौत्य (नुबुव्वत) की प्राप्ति से पहले ही उन्हें यह उपाधि मिल चुकी थी।
जब उन्होंने खुले आम इस्लामी आह्वान के प्रचार-प्रसार की शुरूआत की तो सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े, लोगों को पुकार कर जमा किया और कहाः "तुम्हारा क्या विचार है, अगर मैं तुम्हें सूचना दूँ कि इस घाटी के पीछे एक सेना तुम पर धावा बोलने के लिए तैयार खड़ी है तो क्या तुम मेरी बात पर विश्वास करोगे? सबने एक स्वर में कहाः क्यों नहीं, अवश्य विश्वास करेंगे क्योंकि हमें आपके बारे में केवल सच्चाई का ही अनुभव है"।
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी कौम पर अपने इसी सद्गुण के द्वारा दलील क़ायम की। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः (आप कह दें कि यदि अल्लाह चाहता, तो न तो मैं तुम्हें इसे (क़ुरआन) पढ़ कर सुनाता और न वह तुम्हें इसकी ख़बर देता। आख़िर, इससे पहले मैं तुम्हारे बीच जीवन का एक भाग व्यतीत कर चुका हूँ। तो क्या तुम समझ-बूझ नहीं रखतेॽ) सूरा यूनुस, आयत संख्याः 16
मैंने तुम्हारे बीच अपने जीवन के चालीस साल गुज़ारे हैं। मैंने अपने जीवन के इस कालखंड में हमेशा सच बोला है, कभी एक भी झूठ नहीं बोला। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं लोगों पर तो झूठ न बोलूं, मगर अल्लाह पर झूठ बांधूँ?
इसी प्रकार, आपने उनके बीच चालीस साल गुज़ारे न आपको पढ़ना आता न लिखना, तो भला यह कैसे संभव था कि आप इतनी महान किताब लिख डालते जिसने सारे अरब को अपनी वाक्पटुता और आलंकारिकता से विवश कर दिया? क्या यह मुमकिन था कि आप अपनी तरफ़ से ऐसा कर देते या फिर यह इस बात की ठोस दलील है कि यह किताब उस महान अल्लाह की तरफ़ से उतारी गई है जो हिकमत वाला और प्रशंसा योग्य है?
चौथी दलीलः भूतकाल और भविष्यकाल की सूचनाएँ देना
क़ुरआन में ऐसे बहुत सारे क़िस्से हैं जो हज़ारों साल पहले घटित हुए थे। पवित्र क़ुरआन ने उनकी व्याख्यात्मक सूचना दी, जैसे नूह, आद, समूद, लूत, फ़िरऔन और बनू इस्राईल की कौमें।
नई खोजें जैसे खुदाई, शिलालेख तथा लेख हर उस तथ्य की पुष्टि करते हैं जिसका उल्लेख क़ुरआन ने किया है।
अब ज़रा बताया जाए कि उन अनपढ़ नबी मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह को वह सारी जानकारियाँ कहाँ से प्राप्त हो गईं जो न पढ़ना जानते थे और ना ही लिखना जानते थे? क्या यह इस बात की दलील नहीं कि कुरआन अल्लाह की ओर से है, किसी इनसान की तरफ से नहीं। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः (ये ग़ैब (परोक्ष) की कुछ बातें हैं, जिन्हें (ऐ नबी!) हम आपकी ओर वह्य कर रहे हैं। इससे पूर्व न तो आप इन्हें जानते थे और न आपकी जाति के लोग। अतः आप सब्र करें। निःसंदेह अच्छा परिणाम तक़वा (परहेज़गारी) वालों के लिए है)। सूरा हूद,आयत संख्याः 49
और पवित्र क़ुरआन ने उन चीजों के बारे में भी सूचना दी जो भविष्य में सामने आने वाली थीं और फिर वैसा ही हुआ जैसा कि क़ुरआन ने बताया था। अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (अलिफ़, लाम, मीम। रूमी पराजित हो गए। निकटतम क्षेत्र में। और वे अपनी पराजय के बाद जल्द ही विजयी हो जाएँगे! कुछ (तीन से लेकर नौ) वर्षों में। सारा मामला अल्लाह के अधिकार में है, पहले भी और बाद में भी। और उस दिन ईमान वाले प्रसन्न होंगे। अल्लाह की सहायता से। वह जिसकी चाहता है, सहायता करता है। वह सब पर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान है)। सूरा अल-रूम, आयत संख्याः 1-5
पवित्र क़ुरआन ने न केवल रूमियों की विजय प्राप्ति की अग्रिम सूचना दी, बल्कि उसका समय भी यह कहकर निर्धारित कर दियाः कुछ (तीन से लेकर नौ) वर्षों में और वास्तव में रूमियों को पराजय के सात वर्षों के बाद पारसियों पर विजय प्राप्त हो गई।
तो क्या अल्लाह तआला के सिवा किसी और को भी मालूम है कि कल क्या होने वाला है? अल्लाह तआला ने फ़रमायाः (आप कह दें कि आकाश और धरती में कोई अल्लाह के सिवा ग़ैब (परोक्ष) की बात नहीं जानता, और वे नहीं जानते कि कब फिर जीवित किए जाएँगे)। सूरा अन-नम्ल, आयत संख्या : 65
पाँचवी दलीलः क़ुरआन का वैज्ञानिक तथा संगवैधानिक चमत्कारः
पवित्र क़ुरआन ने चिकित्सा, अंतरिक्ष तथा समुद्र विज्ञान के बारे में बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ दी हैं जिनमें से बहुतों की खोज बीसवीं शताब्दी या उससे थोड़े पहले या थोड़े बाद ही हो सकी है। तो ज़रा बताया जाए कि किसने मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भ्रूण विज्ञान के बारे में बताया और सिखाया कि इंसान कई प्रक्रियाओं से गुज़र कर पैदा होता है अर्थात सबसे पहले वह वीर्य की शक्ल में होता है, फिर रक्त के थक्के का रूप लेता है और फिर गोश्त का लोथड़ा बनता है?
अल्लाह तआला ने कहा; (और हमने मनुष्य को मिट्टी के सार से उत्पन्न किया है। फिर हमने उसे वीर्य बनाकर एक सुरक्षित स्थान में रख दिया। फिर बदल दिया वीर्य को जमे हुए रक्त में, फिर हमने उसे मांस का लोथड़ा बना दिया, फिर हमने लोथड़े में हड्डियाँ बनाईं, फिर हमने पहना दिया हड्डियों को मांस, फिर उसे एक अन्य रूप में उत्पन्न कर दिया। तो शुभ है अल्लाह, जो सबसे अच्छी उत्पत्ति करने वाला है। फिर निःसंदेह तुम इसके बाद अवश्य मरने वाले हो)। सूरा अल-मोमिनून, आयत संख्याः 12-14
अनपढ़ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), जिन्होंने अपना पूरा जीवन अरब की मरुभूमि में बिताया और कभी भी समुद्री यात्रा नहीं की, वह कौन है जिसने उनको सिखाया कि समुद्रों में लहरों की परतें होती हैं? उन्हें किसने बताया कि समुद्रों की गहराइयों में इतना घनघोर अंधकार होता है कि इंसान अपने हाथ की उंगली तक नहीं देख पाता?
अल्लाह तआला का कथन हैः (अथवा (उनके कर्म) उन अँधेरों के समान हैं, जो अत्यंत गहरे सागर में हों, जिसे एक लहर ढाँप रही हो, जिसके ऊपर एक और लहर हो, जिसके ऊपर एक बादल हो, कई अंधेरे हों, जिनमें से कुछ, कुछ के ऊपर हों। जब (इन अंधेरों में फँसा हुआ व्यक्ति) अपना हाथ निकाले, तो क़रीब है कि उसे देख न पाए। और वह व्यक्ति जिसके लिए अल्लाह प्रकाश न बनाए, तो उसके लिए कोई भी प्रकाश नहीं)। सूरा अन-नूर, आयत संख्याः 40
वह कौन है जिसने अनपढ़ मुहम्मद को भौतिक लेनदेन के मामलों में ऐसा ठोस विस्तृत विधान, खानदान और मीरास का कानून और अंतर्राष्ट्रीय संधियों का ज्ञान सिखाया जिसका एक प्रतिशत भी लाने में दुनिया के अत्यंत प्रतिभाशाली कानूनविद असक्षम हैं?
बेशक यह क़ुरआन मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रचना नहीं, अपितु प्रभुत्वशाली प्रशंसित अल्लाह की ओर से है।
बेशक पवित्र क़ुरआन जिस उच्चतम ज्ञान-विज्ञान, रहस्य, अलंकारिक सौंदर्य और भाषाई सटीकता को शामिल है, उसकी मिसाल लाना मानवीय क्षमता से बाहर है। इस संदर्भ में यदि हम इस बात को भी शामिल कर लें कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक अनपढ़ और निरक्षर व्यक्ति थे, पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, किसी पाठशाला से उन्होंने शिक्षा हासिल नहीं की थी, न किसी संस्कृति से उनका संपर्क हुआ था और ना ही उन्होंने अरब उपमहाद्वीप से बाहर कभी कदम रखा था तो यह संभावना बिलकुल समाप्त हो जाती है कि वे ऐसी महान पुस्तक लिखने योग्य हो सकते हैं।
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क्या क़ुरआन अल्लाह की वाणी है?