مكانة المرأة في الإسلام
इस्लाम में नारी का स्थान भाषाः अरबी इसमें कोई शक नहीं कि इस्लाम धर्म ने औरत को बड़ा सम्मान प्रदान किया, उसकी शान बढ़ाई और उसे सम्मान देने वाले को महान पुण्य का भागी घोषित किया है। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने औरतों के साथ सद्व्यवहार करने की वसीयत की है। आपने फ़रमाया हैः (औरतों के बारे में मेरी वसीयत को स्वीकार करो और उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।) यहाँ पर हम आपके समक्ष नारी को इस्लाम के द्वारा प्रदान किए गए सम्मान एवं प्रतिष्ठा की कुछ तसवीरें संक्षेप में पेश कर रहे हैंः 1- इस्लाम ने नारी को, धार्मिक ज़िम्मेवारियों में पुरुष के जैसी तथा उसके समान ठहराया है। अल्लाह के नबी…
इस्लाम में नारी का स्थान
भाषाः अरबी
इसमें कोई शक नहीं कि इस्लाम धर्म ने औरत को बड़ा सम्मान प्रदान किया, उसकी शान बढ़ाई और उसे सम्मान देने वाले को महान पुण्य का भागी घोषित किया है। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने औरतों के साथ सद्व्यवहार करने की वसीयत की है। आपने फ़रमाया हैः (औरतों के बारे में मेरी वसीयत को स्वीकार करो और उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।)
यहाँ पर हम आपके समक्ष नारी को इस्लाम के द्वारा प्रदान किए गए सम्मान एवं प्रतिष्ठा की कुछ तसवीरें संक्षेप में पेश कर रहे हैंः
1- इस्लाम ने नारी को, धार्मिक ज़िम्मेवारियों में पुरुष के जैसी तथा उसके समान ठहराया है। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः (बेशक औरतें, मर्दों की समकक्ष हैं)
2- आख़िरत (प्रलय) में मिलने वाले श्रेय (नेकी) में नारी, पुरुष के समान है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (तथा जो अच्छे कार्य करेगा, चाहे नर हो या नारी, जबकि वह मोमिन हो, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश पाएंगे और उनका खजूर की गुठली के गड्ढे (जो छोटे से बिंदु समान होता है) के बराबर भी हक़ नहीं मारा जाएगा) सूरा अन-निसा, आयत संख्याः 124
3- नारी पर उपकार
यह एक तथ्य है कि इस्लाम धर्म ने नारी को बड़ा सम्मान दिया है और उसकी ज़िन्दगी के हर मोड़ पर और हर हाल में उसके साथ भलाई का मामला करने का हुक्म दिया है।
माँ के तौर पर उसे सम्मान दिया है, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान हैः "(औऱ माता-पिता के साथ अच्छा सलूक करो) " सूरा अल-बक़रा, आयत संख्याः 83
एक आदमी ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे अच्छे व्यवहार का सबसे ज़्यादा हकदार कौन है तो आपने फ़रमायाः "तेरी माँ"। उसने पूछा कि फिर कौन? आपने उत्तर दिया : "तेरी माँ"। उसने पूछा कि फिर कौन? तो आपने उत्तर दिया : "तेरी माँ"। उसने पूछा फिर कौन? तो आपने कहा: "तेरा बाप"।"
उसे बीवी के तौर पर भी सम्मान दिया, जैसा कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः (तुममें से सबसे बेहतर व्यक्ति वह है, जो अपने परिवार के लिए बेहतर है और मैं अपने परिवार के लिए तुममें सबसे बेहतर हूँ।) तथा आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: "औरतों के बारे में मेरी वसीयत को स्वीकार करो और उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।"
उसे बेटी के तौर पर भी सम्मान दिया है। यही कारण है कि इस्लाम धर्म ने बेटी को प्रशिक्षण देने, उसपर खर्च करने और उसके साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है और इस बात का आश्वासन भी दिया है कि जो व्यक्ति ऐसा करेगा, वह महान पुण्य का भागी बनेगा। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान हैः (जिसको तीन बेटियाँ हों और वह उनके मामले में धैर्य से काम लेते हुए अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें खिलाए-पिलाए और पहनने को कपड़ा दे तो वह बेटियाँ उसके लिए क़यामत के दिन जहन्नम की आग और उस के बीच आड़ बन जाएंगी)।
उसे बहन के तौर पर भी सम्मान दिया, जैसा कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः (माता, पिता, बहन, भाई, फिर सबसे निकट के संबंधी और उसके बाद सबसे निकट के संबंधी के साथ अच्छा व्यवहार करो)।
तथा मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह भी फरमाया है: (जिसकी तीन बेटियाँ या तीन बहनें हों, या दो बेटियाँ या दो बहनें हों और वह उनसे अच्छा व्यवहार करे तथा उनके अधिकारों के बारे में अल्लाह से डरे, उसके लिए जन्नत का शुभसमाचार है)।
उसे मौसी के तौर पर भी सम्मान दिया, जैसा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः (मौसी, माँ के समान है)। अर्थात; अच्छे व्यवहार, सम्मान और रिश्ता निभाए जाने के मामले में।
यही नहीं बल्कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उस नारी पर भी उपकार करने का आदेश दिया है जिसके पति का निधन हो गया हो। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान हैः (विधवाओं और निर्धनों की सहायता के लिए दौड़धूप करने वाला, अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने वाले की तरह है)।
4- नारी के लिए विशेष आर्थिक अधिकार का नियमन किया हैः
अतः इस्लाम धर्म ने उसे स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया है, अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (पुरुषों के लिए उनकी कमाई में विशेष हिस्सा है और स्त्रियों के लिए भी उनकी कमाई में विशेष हिस्सा निर्धारित है और तुमलोग अल्लाह से उसका उपकार माँगते रहो, निस्संदेह अल्लाह हर चीज़ को अच्छी तरह जानता है)। सूरा अन-निसा, आयत संख्याः 32
इस्लाम ने मीरास में भी उसका हक निर्धारित किया है, जबकि इस्लाम से पहले उसे मीरास में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (पुरुषों के लिए उस (धन) में से हिस्सा है, जो माता-पिता और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो तथा स्त्रियों के लिए भी उसमें से हिस्सा है, जो माता-पिता और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो, वह थोड़ा हो या अधिक। ये हिस्से (अल्लाह की ओर से) निर्धारित हैं)। सूरा अन-निसा, आयत संख्याः 7
और औरत के लिए पूरा महर है जो शरीयत ने उसके लिए तय किया है। वही उसकी अकेली मालकिन है। उसमें उसका कोई साझेदार नहीं है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (तथा स्त्रियों को उनके अनिवार्य महर खुशी से अदा कर दो। फिर यदि वे अपनी इच्छा से उसमें से कुछ तुम्हारे लिए छोड़ दें, तो उसे हलाल व पाक समझकर खाओ)। सूरा अन-निसा, आयत संख्याः 4
5- उसपर अत्याचार न करने और उसका अधिकार न हड़पने की चेतावनी दी हैः
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है: (ऐ अल्लाह, मैं लोगों को दो कमज़ोरों के हक़ को नष्ट करने से सखती से डराता हूँ; अनाथ तथा स्त्री) अर्थात, जो उन दोनों का हक मारता है, उसे पापी ठहराता हूँ।
6- उसके सतीत्व की सुरक्षा की ज़मानत;
इस्लाम धर्म ने स्त्री को जो सम्मान दिया है, उसमें से एक यह भी है कि उसने उसके सतीत्व तथा प्रतिष्ठा को सुरक्षा प्रदान की है। इसलिए उसके साथ सही तरीके से शादी रचाए बगैर, रहन-सहन करना हलाल और जायज़ नहीं है। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान हैः (औरतों के बारे में अल्लाह से डरो और याद रखो कि उन्हें तुमने अल्लाह के साथ वचन के द्वारा हासिल किया और उनके गुप्तांगों को अल्लाह के शब्दों के ज़रिए हलाल किया है) यहाँ अल्लाह के शब्दों से तात्पर्य; धार्मिक विधान के अनुसार शादी के बंधन में बंधते समय प्रयोग किए जाने वाले शब्द।
नारी के सतीत्व पर झूठा आरोप लगाना हराम, बल्कि महापाप है। अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (निःसंदेह जो लोग सच्चरित्रा, भोली-भाली ईमान वाली स्त्रियों पर आरोप लगाते हैं, वे दुनिया एवं आख़िरत में धिक्कार दिए गए और उनके लिए बड़ी यातना है)। सूरा अन-नूरः 23
बल्कि जो उसके सतीत्व पर बिना किसी दलील के झूठा आरोप जड़ता है, उसपर तीन प्रकार की सख्त सज़ाएँ वाजिब हो जाती हैं।
1- उसे अस्सी कोड़े लगाए जाएंगे।
2- उसकी गवाही अमान्य हो जाएगी।
3- उसे फ़ासिक़ (पापी) का नाम दे दिया जाएगा।
अल्लाह तआला का कथन हैः (तथा जो लोग सच्चरित्रा स्त्रियों पर व्यभिचार का आरोप लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, तो उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी कोई गवाही कभी स्वीकार न करो और वही अवज्ञाकारी लोग हैं)। सूरा अन-नूर: 4
7- उसका आर्थिक भार उठाना:
नारी चाहे कम उम्र हो या बड़ी उम्र की, कोई न कोई मर्द उसके खर्चों के निर्वाहण का जिम्मेदार होता है। यह समाज में उसके प्रतिष्ठित जीवन यापन करने की जमानत है। इससे वह किसी के सामने मदद के लिए हाथ फैलाने पर विवश होने से सुरक्षित रहती है, जिससे वह अपमानित होने से बच जाती है और कोई उसके सतीत्व का सौदा नहीं कर पाता है।
जब वह कम उम्र की होती है तो उसका पिता उसका खर्च उठाता है। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का फ़रमान हैः (जिसने दो लड़कियों का लालन-पालन किया, यहाँ तक कि वह बड़ी हो गईं, तो क़यामत के दिन वह तथा मैं इन दोनों की तरह आएँगे।" फिर आपने अपनी ऊँगलियों को मिला लिया)।
तथा अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया है: (किसी व्यक्ति के पापी (गुनहगार) होने के लिए बस इतना काफी है कि वह किसी ऐसे का राशन रोक ले, जिसका राशन उसके हाथ में है)।
और यदि वह विवाहिता हो तो उसके पति पर उसका खर्च उठाना वाजिब है।
निस्संदेह, इस्लाम धर्म ने नारी का सम्मान बढ़ाया है, उसकी प्रतिष्ठा को सुरक्षित किया है और संतुलित धर्म विधान के द्वारा उसके अधिकारों का नियमन किया है, जिससे सारे स्त्री-पुरुष एक ऐसे शांतिपूर्ण समाज में जीवन यापन करते हैं जिसमें सारे लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों और अधिकारों से अवगत होते हैं और इस प्रकार, सारे लोग दुनिया एवं आख़िरत दोनों जहानों में सफल होते हैं।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (जो भी अच्छा कार्य करे, नर हो अथवा नारी, जबकि वह ईमान वाला हो, तो हम उसे अच्छा जीवन व्यतीत कराएँगे। और निश्चय ही हम उन्हें उनका बदला उन उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे जो वे किया करते थे)। (अन-नह्ल : 97)
कोड को सकैन करें
अन्य भाषाओं में और भी पैम्फलेट डाउनलोड करने हेतु
इस्लाम के बारे में जानें
इस्लाम में नारी का स्थान