الإبداع في كمال الشّرع وخطر الابتداع

الإبداع في كمال الشّرع وخطر الابتداع

رسالة قيمة تبين أن كل من ابتدع شريعة في دين الله ولو بقصد حسن فإن بدعته هذه مع كونها ضلالة تعتبر طعنا في دين الله - عز وجل -.

Language: lang_hi
Prepared by:
Version: 1.0
Translations 8
Amharic English Spanish Persian +4
Attachments 7
PDF
Audio
Video
+3

आदरणीय शेख की पुस्तकों की श्रृंखला (8)

शरीयत की पूर्णता और बिदअत के ख़तरे का बयान

लेखक: आदरणीय शेख़ अल्लामा

मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन

अल्लाह तआला उनकी तथा उनके माता-पिता और समस्त मुसलमानों की मग़्फ़िरत फ़रमाये

शेख़ मुहम्मद बिन सालेह अल-उसैमीन चैरिटेबल फाउंडेशन के प्रकाशनों में से

*

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत दयावान है।

सभी प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, हम उसी की प्रशंसा और गुणगान करते हैं, उसी से सहायता मांगते हैं, उसी से क्षमा याचना करते हैं और उसी की तरफ लौटते हैं। तथा हम अपनी आत्मा की बुराईयों और अपने दुष्कर्मों से अल्लाह की शरण में आते हैं। अल्लाह जिसे हिदायत दे उसे कोई गुमराह करने वाला नहीं, और वह जिसे गुमराह करे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं । और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, और उसका कोई साझी नहीं है। मैं गवाही देता हूँ कि मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे और उसके रसूल हैं। अल्लाह तआला ने उन्हें हिदायत एवं सत्य धर्म के साथ भेजा। तो उन्होंने पैग़ाम को पहुंचा दिया, अमानत को अदा कर दिया, उम्मत को सही रास्ता दिखाया एवं मरते दम तक अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया। और उन्होंने अपनी उम्मत को बिल्कुल प्रकाशमय मार्ग पर छोड़ा, जिसकी रात भी दिन की तरह है, इससे जो भी भटकता है वह हलाक हो जाता है। उम्मत को अपने सभी मामलों में जिस मार्गदर्शन की ज़रूरत पड़ सकती हो, उसको बयान कर दिया, यहां तक कि अबू ज़र्र (अल्लाह उन से राज़ी हो) ने कहा: ''उड़ने वाला पक्षी जो आकाश में अपने परों को फड़फड़ाता है, उसके बारे में भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें ज्ञान दिया है''।

बहुदेव वादियों में से एक व्यक्ति ने सलमान फ़ारसी (अल्लाह उनसे राज़ी हो) से कहा: तुम्हारे नबी ने तुम लोगों को ख़राआ (पैख़ाना करने का तरीक़ा) तक सिखाया है। उन्होने कहा: ''हां, उन्होंने हम को मना किया है कि हम पश्चिम मुंह होकर पैख़ाना या पेशाब करें, या तीन पत्थरों से कम में मल-मूत्र साफ़ करें, या दाएं हाथ से मल-मूत्र साफ़ करें, या गोबर या हड्डी से मल-मूत्र साफ़ करें''।

और आप देख रहे हैं इस महान क़ुरआन को, अल्लाह ने इसमें इस्लाम धर्म के उसूल (मूल) एवं उसकी शाखाओं को बयान किया है। इसने तौहीद (एकेश्वरवाद) के सभी प्रकारों को समझाया है, यहाँ तक कि बैठकों में बैठने एवं अनुमति माँगने के नियम भी बताये हैं। अल्लाह तआला ने कहा है: ''हे ईमान वालों! जब तुमसे कहा जाए कि अपनी बैठकों में (दूसरों को) जगह दो, तो उन्हें जगह दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बनाएगा''। [सूरा अल-मुजादिला: 11] अल्लाह तआला ने कहा है: ''हे ईमान वालों! अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में प्रवेश न करो, यहाँ तक कि अनुमति ले लो एवं उनके वासियों को सलाम कर लो, यह तुम्हारे लिए उत्तम है, ताकि तुम याद रखो। और यदि उनमें किसी को न पाओ, तो उनमें प्रवेश नहीं करो यहाँ तक कि तुम्हें अनुमति दे दी जाए। और यदि तुम से कहा जाए कि वापिस हो जाओ, तो वापिस हो जाओ। यह तुम्हारे लिए अधिक पवित्र है, और जो तुम करते हो अल्लाह उसे भली भाँति जानता है''। [सूरा अल-नूर: 27-28]

यहाँ तक कि कपड़ा पहनने के तरीक़े का भी उल्लेख किया है, अल्लाह तआला ने कहा है: ''तथा वो बूढ़ी स्त्रियाँ जो विवाह की आशा न रखती हों, तो उनपर कोई दोष नहीं कि अपनी (पर्दे की) चादरें उतारकर रख दें,यदि अपनी शोभा का प्रदर्शन करने वाली न हों''। [सूरा अल-नूर: 60] "हे नबी! कह दो अपनी पत्नियों, अपनी पुत्रियों और ईमान वालों की स्त्रियों से कि डाल लिया करें अपने ऊपर अपनी चादरें। यह अधिक समीप है कि वे पहचान ली जाएँ। फिर उन्हें दुःख न दिया जाए और अल्लाह अति क्षमावान एवं दयावान है।" [सूरा अल-अहज़ाब: 59] ''और अपने पैर (धरती पर) मारते हुए न चलें कि उसका ज्ञान हो जाए जो शोभा उन्होंने छुपा रखी है'' [सूरा अल-नूर: 31]، ''और पुण्य यह नहीं है कि तुम अपने घरों में पीछे की ओर से प्रवेश करो, बल्कि पुण्य यह है कि तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करो, और अपने घरों में दरवाज़ों से प्रवेश करो''। [सूरा अल-बक़रा: 189]।

इन के अलावा भी बहुत सारी आयतें हैं जिन से स्पष्ट होता है कि यह धर्म व्यापक और पूर्ण है। इस में किसी वृद्धि की ज़रूरत नहीं है, उसी प्रकार से इस में कमी भी जायज़ नहीं है। इसी लिए अल्लाह तआला ने क़ुरआन की विशेषता के बारे में वर्णन किया है: ''और हम ने आप पर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का स्पष्ट उल्लेख है''। [सूरा अल-नहल: 89]। अतः लोगों को अपने दीन व दुनिया के मामले में जो कुछ भी चाहिए, अल्लाह ने उसको अपनी किताब में बयान कर दिया है, स्पष्ट रूप से या इशारों में, शब्दों में या अर्थों में।

मेरे भाइयो!

कुछ लोग अल्लाह तआला की इस आयत: ''धरती में विचरते जीव तथा अपने दो पंखों से उड़ते पक्षी तुम्हारे जैसी जातियाँ हैं, हमने पुस्तक में किसी चीज़ की कमी नहीं की है, फिर वे अपने पालनहार की ओर ही एकत्र किये जायेंगे''। [सूरा अल-अनआम: 38] की अलग व्याख्या करते हैं। सो अल्लाह के इस कथन: "हमने पुस्तक में कोई चीज़ नहीं छोड़ी है।'' की व्याख्या में कहते हैं कि यहाँ पुस्तक से अभिप्राय क़ुरआन है, जब्कि सही बात यह है कि यहाँ किताब का अर्थ ''लौहे महफ़ूज़'' है। जहाँ तक क़ुरआन की बात है तो अल्लाह तआला ने नफ़्यि अर्थात इंकार एवं नकारात्मक वाक्यों के प्रोयग से अधिक स्पष्ट अंदाज़ में इसका वर्णन किया है। ''और हम ने आप पर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का स्पष्ट उल्लेख है''। [सूरा अल-नहल: 89] यह ज़्यादा सटीक एवं स्पष्ट है अल्लाह की इस बात से: "हमने पुस्तक में कोई चीज़ नहीं छोड़ी है''।

यदि कहने वाला कहे: क़ुरआन में हमें पाँच दैनिक नमाज़ों की संख्या एवं हर नमाज़ की अलग अलग संख्या कहाँ मिलती है? अल्लाह की यह आयत ''और हम ने आप पर यह किताब उतारी है, जिसमें हर चीज़ का स्पष्ट उल्लेख है'' [सूरा अल-नहल: 89] कैसे सही हो सकती है जबकि हम क़ुरआन में हर नमाज़ की रकअतों की संख्या नहीं पाते हैं?

इसका उत्तर है: अल्लाह तआला ने अपनी किताब में स्पष्ट किया है कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें जो भी आदेश दें एवं जिस चीज़ की तरफ़ भी हमारी रहनुमाई करें, उसका मानना हम पर अनिवार्य है। ''जिसने रसूल की आज्ञा का अनुपालन किया, (वास्तव में) उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया तथा जिसने मुँह फेर लिया, तो (हे नबी!) हमने आपको उनका प्रहरी (दारोगा) बनाकर नहीं भेजा है''। [सूरा अल-निसा: 80]। ''रसूल, जो तुम्हें दें, उसे ले लो और जिस से रोकें उस से रुक जाओ, और अल्लाह से डरो, क्योंकि निःसंदेह अल्लाह कठोर यातना देने वाला है''। [सूरा अल-हश्र: 7]। सुन्नत ने जो कुछ बयान किया है, क़ुरआन ने भी उसे प्रमाणित किया है, इस लिए कि सुन्नत वह्यी (आकाशवाणी, प्रकाशना) का एक प्रकार है जिसे अल्लाह ने अपने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा, एवं उन्हें सिखाया। जैसा कि अल्लाह तआला ने कहा है: ''और अल्लाह ने आप पर किताब (क़ुरआन) और हिकमत (सुन्नत) उतारी है,और जो आप नहीं जानते थे, वह आपको सिखाया, और अल्लाह का आप पर बड़ा फ़ज़्ल है''। [सूरा अल-निसा: 113]। इस तरह से जो कुछ सुन्नत में आया है, तो मानो वह ऐसे ही है जैसे अल्लाह की किताब में आया है।

मेरे भाइयो!

जब यह बात साबित हो गई तो क्या यह कहा जा सकता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु हो गई और वह धर्म जो अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद है, उसका कुछ हिस्सा अधूरा रह गया? बिलकुल नहीं। नबी (उन पर दरूद व शांति हो) ने पूर्ण दीन को बयान कर दिया है, शाब्दिक रूप से, या कर्म के द्वारा, या अपने साथियों के किसी काम पर सहमति के द्वारा। ख़ुद अपनी तरफ से बोल कर, या किसी के सवाल पर जवाब देकर। कभी कभी अल्लाह तआला दूर दराज़ क्षेत्र से किसी देहाती को भेज देता ताकि वह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर किसी धार्मिक मामला पर कोई प्रश्न पूछें, जो प्रश्न रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ रहने वाले आपके साथी नहीं पूछ पाते हों। इस लिए वह लोग इस बात पर ख़ुश होते थे कि कोई देहाती आकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से किसी मसअला पर प्रश्न पूछे।

यह इस बात का प्रमाण है कि इंसान को अपनी इबादत, मामला तथा जीवन गुजारने के लिए जिन चीज़ों की भी ज़रूरत पड़ने वाली है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको बयान कर दिया है। इस बात का प्रमाण अल्लाह का यह कलाम है: ''मैंने आज तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को संपूर्ण कर दिया है तथा तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी है, और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म स्वरूप चुन लिया है''। [सूरा अल-माइदा: 3]।

मुसलमानो! जब आपके निकट यह बात स्पष्ट हो गई, तो यह संज्ञान में रहे कि जो कोई अल्लाह के धर्म में नई बात गढ़ेगा यद्यपि उसकी नीयत सही ही क्यों न हो, उसकी इस आविष्कारित नई बात को गुमराही मानने के साथ साथ महान अल्लाह के धर्म में संदेह पैदा करने वाला एवं अल्लाह की इस बात को झुठलाना माना जाएगा जिस में उसने कहा है: “ आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया''। [सूरा अल-माइदा: 3]। क्योंकि यह बिदअती जो सर्वशक्तिमान अल्लाह के धर्म में किसी नये क़ानून का आविष्कार करता है, जो अल्लाह के धर्म में नहीं है, तो वह इसी तरह है जैसे कह रहा हो कि यह धर्म मुकम्मल नहीं है। उसने अल्लाह की निकटता प्राप्त करने हेतु इस नई चीज़ को लाकर इस दीन को मुकम्मल कर दिया।

यह आश्चर्यजनक है कि एक व्यक्ति सर्वशक्तिमान अल्लाह की ज़ात, उनके नामों और गुणों से संबंधित कोई नई बात गढ़े, फिर कहे: इस के द्वारा वह अपने रब का सम्मान करता है, इससे वह अपने रब की पवित्रता बयान करता है। और इसके द्वारा वह अल्लाह तआला की इस आयत का अनुसरण करता है: ''और तुम ज्ञान रखते हुए भी अल्लाह तआला का साझी न बनाओ''। [सूरा अल-बक़रा: 22] आप इससे आश्चर्यचकित होंगे कि एक आदमी अल्लाह की ज़ात के संबंध में अल्लाह के दीन में ऐसी नई बात गढ़े जिसे न इस उम्मत के पहले के लोग और न इसके इमामगण मानते थे, फिर वह कहे: वह अल्लाह की पवित्रता बयान करता है, वह अल्लाह का सम्मान करता है एवं अल्लाह की इस बात का अनुपालन करता है: ''और तुम अल्लाह तआला का साझी न बनाओ''। और जो इसका उल्लंघन करेगा, वह ''मुमस़्स़िल'' व ''मुशब्बिहा'' (किसी को अल्लाह जैसा बनाने वाला), या इसी तरह के बुरे उपनामों के योग्य होगा।

इसी प्रकार आप इससे भी आश्चर्यचकित होंगे कि कुछ लोग अल्लाह के दीन में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से संबंधित ऐसी नई बातें बोलेंगे जो दीन का हिस्सा नहीं थीं। फिर दावा करेंगे कि वे अल्लाह के रसूल से मुहब्बत एवं उनका सम्मान करने वाले लोग हैं। और जो लोग उनके इस बिदअत में उनका साथ न दें वे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गुस्ताख़ हैं। या इसी तरह के बुरे नामों से उनको पुकारते हैं जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से संबंधित उनके इस बिदअत में उनका समर्थन नहीं करते हैं।

अफ़सोस है कि इस तरह के लोग दावा करते हैं कि हम अल्लाह एवं उसके रसूल का सम्मान करने वाले हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन लोगों ने जब अल्लाह के भेजे हुए धर्म एवं रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीयत में उन चीज़ों को ज़्यादा कर लिया जो उस में से नहीं थीं, तो निःसंदेह वे लोग अल्लाह एवं उसके रसूल से आगे बढ़ने वाले लोग हो गए। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: ''हे लोगो जो ईमान लाये हो! आगे न बढ़ो अल्लाह और उसके रसूल से, और डरो अल्लाह से। वास्तव में, अल्लाह सब कुछ सुनने एवं जानने वाला है''। [सूरा अल-हुजरात: 1]।

मेरे भाइयो!

मेैं आप से सवाल करता हूँ, अल्लाह का वास्ता देता हूँ और चाहता हूँ कि आपका उत्तर आपकी अंतरात्मा से हो, न कि अपनी भावनाओं से, जो आप के धर्म की मान्यताओं एवं तकाज़ा के अनुसार हो न कि आप के अंध अनुकरण के आधार पर। जो लोग अल्लाह के दीन में कोई बात जोड़ता है जो उस में से नही थी, चाहे वह अल्लाह की ज़ात, उसके गुणों या नामों से संबंधित हो, या रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में, फिर वह कहे: हम तो अल्लाह एवं उसके रसूल का महिमा मंडन करते हैं?! क्या ये लोग इस बात के अधिक योग्य हैं कि वे ही अल्लाह एवं उसके रसूल की इज़्ज़त करने वाले लोग हैं या वे लोग जो अल्लाह की शरीयत से तनिक भी इधर उधर नहीं हटते हैं, शरीयत में जो आया है, उस पर ईमान लाते हैं, जो भी ख़बर दी गई है, उसकी पुष्टि करते हैं, जिन चीज़ों का आदेश दिया गया है या जिन चीज़ों से मना किया गया है, उनको सुनते एवं मानते हैं। जो शरीयत में नहीं आया है उस संबंध में वे कहते हैं कि हम यहीं रुक जाते हैं, हमारे लिए जायज़ नहीं है कि हम अल्लाह एवं उसके रसूल से आगे बढ़ें, इसी प्रकार से यह सही नहीं है कि हम वह बात करें जो शरीयत में नहीं आई है। इन दोनों में से कौन इस बात के अधिक योग्य है कि वह अल्लाह एवं उसके रसूल से मुहब्बत एवं उनका महिमा मंडन करने वाला है? बेशक वे लोग जिन लोगों ने कहा कि हमें जो बातें बताई गई हैं, हम उन पर ईमान लाते हैं एवं उनकी पुष्टि करते हैं, तथा हमें जो आदेश दिए गए हैं हम उनको सुनते और मानते हैं। और उन्होंने कहा: हम रुक गए, और हमें जिनको करने की आज्ञा नहीं दी गई, उन से परहेज किया। और उन्होंने कहा: हमारी हैसियत इतनी छोटी है कि हम इस योग्य नहीं कि अल्लाह की व्यवस्था में उन चीज़ों को जगह दें जो उस में नहीं हैं, या अल्लाह के दीन में वह ज़्यादा करें जो उसका हिस्सा नहीं है। बेशक यही वे लोग हैं जो ख़ुद की हैसियत को जानते हैं, अपने सृष्टिकर्ता के मूल्य को पहचानते हैं। वे लोग अल्लाह एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान करते हैं। वही लोग अल्लाह एवं उसके रसूल से सच्ची मुहब्बत करते हैं। न कि वे लोग जो अल्लाह के दीन में नई नई बातों को बढ़ाते हैं जो पहले उसमें नहीं थीं, चाहे अक़ीदा हो या बात या अमल (अर्थातः आस्था हो अथवा कथनी या करनी)।

और आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि कुछ लोग रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस़ को जानते हैं। ''दीन के मामले में) बिद्अत (अर्थातः नई-नई चीज़ें) आविष्कार करने से बचो, क्योंकि प्रत्येक बिद्अत गुमराही (पथभ्रष्टता) है, तथा प्रत्येक गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है''। वे जानते हैं कि शब्द ''कुल्लु बिदअतिन'' एक व्यापक आम उसूल व नियम है, जो समावेश और व्यापक सामान्य को दर्शाने वाले सबसे शक्तिशाली शब्द एवं उपकरण ''कुल'' के साथ बयान किया गया है। जिस रसूल -अल्लाह का उनपर दरूद एवं शांति हो- ने इस उसूल को बताया, वह इस शब्द के अर्थ को अच्छी तरह जानते थे। वह सृष्टि में सबसे बड़े वाक्पटु एवं इंसानों के सबसे बड़े शुभ चिंतक एवं ख़ैरख़्वाह हैं। वह किसी शब्द का अर्थ जाने बग़ैर उसे बिल्कुल भी नहीं बोलते हैं।

जब अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: ''हर बिदअत गुमराही है''। तो आपको अच्छी तरह मालूम था कि क्या कह रहे हैं और उसका अर्थ क्या है। बेशक आपने यह बात केवल उम्मत की भलाई के लिए कही है।

जब इस कलाम में तीनों बातें पाई गईं: शुभ चिंता एवं ख़ैर ख़्वाही की पराकाष्ठा, उच्चतम बयान और वाक्पटुता एवं मुकम्मल ज्ञान और जानकारी। इसका अर्थ यह हुआ कि इस कलाम (वाणी) से वही मुराद है जो इसका अर्थ है। क्या इस उसूल (नियम) के बाद बिदअत को तीन या पाँच प्रकारों में बाँटना सही है? बिल्कुल नहीं, यह सही नहीं है।

यह जो कुछ विद्वान बिदअत -ए- ह़सनह की बात करते हैं, तो यह दो परिस्थितियों से ख़ाली नहीं है।

1- हो सकता है कि वह बिदअत हो ही न, परन्तु उसे बिदअत समझ लिया गया हो।

2- हो सकता है कि वह बुरी बिदअत हो, परन्तु उसकी बुराई के संबंध में ज्ञान न हो।

जो कोई बिदअत -ए- ह़सनह होने का दावा करे, उसका जवाब इस तरह से दिया जाएगा

कि अहले बिदअत के लिए अपनी बिदअत को बिदअत -ए- ह़सनह कहने का कोई औचित्य नहीं है, जबकि हमारे पास रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खुली तलवार मौजूद है कि''हर बिद्अत गुमराही है''। यह धारदार तलवार नुबूवत व रिसालत की फ़ैक्टरी में तैयार हुई है, न कि शंका की फ़ैक्टरी में। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस को नुबूवत की फ़ैक्टरी में इस ख़ूबसूरत तरीक़ा से ढ़ाला है कि जिस किसी के हाथ में यह धारदार तलवार होगी उसके सामने कोई भी बिदअत -ए- ह़सनह या उसका कहने वाला टिक नहीं सकता है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्पष्ट रूप से कहा है: ''हर बिद्अत गुमराही है''।

मैं समझता हूँ कि आप के अंतर्मन में एक कीड़ा छुपा हुआ हो जो कहता है किः सत्य की ओर मार्गदर्शित उमर बिन ख़त्ताब (अल्लाह उनसे राज़ी हो) के बारे में तुम्हारा क्या विचार है जब उन्होंने उबैइ बिन कअब एवं तमीम अल-दारी को आदेश दिया था कि वे रमज़ान के महीने में लोगों की (रात की नमाज़ में) इमामत कराएं। फिर वह निकले और देखा कि लोग अपने इमाम के साथ इकठ्ठा नमाज़ पढ़ रहे हैं, तो आप (अल्लाह उनसे राज़ी हो) ने कहा, क्या ही अच्छी बिद्अत है यह। जो लोग सोए हुए हैं वे नमाज़ (अभी) पढ़ने वालों से बेहतर हैं?

इसका उत्तर दो तरह से दिया जा सकता है:

पहला: किसी भी इंसान के लिए जायज़ नहीं है कि वह किसी भी कलाम (वाणी) के द्वारा, रसूल सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के कलाम का उल्लंघन करे। न अबू बक्र के कलाम से, जो नबी के बाद इस उम्मत के सबसे श्रेष्ठ आदमी हैं। न उमर के कलाम से, जो नबी के बाद इस उम्मत के दूसरे सबसे श्रेष्ठ आदमी हैं। न उस़मान के कलाम से, जो नबी के बाद इस उम्मत के तीसरे सबसे श्रेष्ठ आदमी हैं। न अली के कलाम से, जो नबी के बाद इस उम्मत के चौथे सबसे श्रेष्ठ आदमी हैं। न ही उनके अलावा किसी अन्य के कलाम को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कलाम के सामने पेश किया जा सकता है, इस लिए कि अल्लाह तआला ने कहा है: ''जो लोग अल्लाह के रसूल के आदेश का उल्लंघन करते हैं, और उससे विमुख होते हैं उन्हें डरना चाहिए कहीं उन पर कोई आपदा न आ जाए अथवा उन्हें कोई यातना न आ घेरे''। [सूरा अल-नूरः 63]، इमाम अहमद (अल्लाह की उनपर रहमत बरसे) ने कहा है: "तुम्हें मालूम है कि फ़ितना किसे कहते हैं? फ़ितना शिर्क का नाम है। हो सकता है कि किसी के सामने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की कोई हदीस़ आए और उसके दिल में विचलन, या संदेह महसूस हो, तो वह हलाक व बर्बाद हो जाएगा"।

इब्ने-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं: ''कहीं तुम पर आसमान से पत्थर न बरसे, मैं कहता हूँः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया और तुम कहते होः अबू बक्र तथा उमर ने कहा''।

दूसरा: हमें इस बात का पक्का यक़ीन है कि अमीर अल-मोमिनीन उमर बिन ख़त्ताब (अल्लाह उनसे राज़ी हो) अल्लाह तआला एवं उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कलाम अर्थात वाणी का सबसे ज़्यादा सम्मान करने वाले थे। वह अल्लाह तआला की सीमाओं पर रुक जाने के लिए प्रसिद्ध थे, यहाँ तक कि उन्हें महान अल्लाह के कलाम का सबसे बड़ा अज्ञाकारी माना जाता था। उस औरत का क़िस्सा -यदि यह क़िस्सा सही हो तो- जिसमें उस औरत ने उमर (अल्लाह उनसे राज़ी हो) के उस फ़ैसले का विरोध किया था जिस में वह अज्ञात महर को सीमित करने की बात कह रहे थे, तो उस औरत ने क़ुरआन की इस आयत से उनका विरोध किया: ''और यदि तुम किसी पत्नी के स्थान पर किसी दूसरी पत्नी से विवाह करना चाहो और तुमने उनमें से एक को (सोने चाँदी) का ढेर भी (महर में) दिया हो, तो उसमें से कुछ न लो। क्या तुम चाहते हो कि उसपर आरोप लगाकर तथा खुले पाप द्वारा ले लो''? [सूरा अल-निसा: 63]، तो उमर रज़ियल्लाहु अन्हू, महर के सीमा निर्धारण से रुक गए, परन्तु इस घटना के सही होने पर संदेह है।

परन्तु कहने का तात्पर्य यह है कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हू, अल्लाह की निर्धारित सीमाओं पर रुक जाने वाले एवं उन्हें न लांघने वाले इंसान थे। उमर रज़ियल्लाहु अन्हू जैसे व्यक्ति के बारे में यह सोचा भी नहीं जा सकता है कि वह तमाम इंसानों के सरदार मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बात का विरोध करेंगे। तथा किसी बिद्अत के बारे में कहें कि ''क्या ही अच्छी बिद्अत है'', एवं इस बिद्अत का वही अर्थ हो जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस ''हर बिद्अत गुमराही है'' में वर्णित बिद्अत शब्द का है।

बल्कि ज़रूरी है कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हू की बात ''क्या ही अच्छी बिद्अत है'' की बिद्अत का अर्थ वह न माना जाए जो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीस़ में ''हर बिद्अत गुमराही है'' की बिद्अत का अर्थ है। उमर रज़ियल्लाहु अन्हू अपनी बात ''क्या ही अच्छी बिद्अत है'' से लोगों के अलग अलग होकर नमाज़ पढ़ने के बाद फिर से एक इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने की तरफ इशारा करना चाह रहे थे। जब्कि रमज़ान में (एक साथ मिल कर) क़्याम (रात की नमाज़ पढ़ने) की बुनियाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग में पड़ चुकी थी, बुख़ारी एवं मुस्लिम शरीफ में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है, कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रमज़ान में केवल तीन रात तरावीह की नमाज़ पढ़ाई तथा चौथी रात बाहर नहीं निकले और फरमाया: ''मुझे डर है कि कहीं तुम पर यह (नमाज़) फ़र्ज न कर दिया जाए फिर तुम उसको कर न सको''। सो रमज़ान में जमाअत के साथ तरावीह पढ़ना रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सून्नत थी और उमर रज़ियल्लाहु अन्हू ने उसे बिद्अत इस आधार पर कहा कि जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तरावीह की नमाज़ पढ़ाना छोड़ दिया तो लोग बंट गए। कोई अकेला पढ़ लेता, कोई दो आदमी के साथ पढ़ता तो कोई कुछ लोगों का समूह बना कर मस्जिद में पढ़ता। तो अमीर अल-मोमिनीन उमर रज़ियल्लाहु अन्हू ने अपनी सही और सटीक राय के मुताबिक उचित समझा कि लोगों को एक इमाम के तहत एकजुट होना चाहिए। तो आपका यह काम इससे पहले लोगों के बंट जाने की तुलना में बिद्अत था। यह एक तुलनात्मक अतिरिक्त बिद्अत थी, न कि पुर्णतः अपनी ओर से पैदा की हुई बिद्अत, जिसे हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हू ने पैदा किया हो। बल्कि यह सुन्नत रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माना में मौजूद थी, परन्तु आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माना से ही इसे छोड़ दिया गया था, यहां तक कि उमर रज़ियल्लाहु अन्हू ने इसे दोबारा ज़िन्दा किया।

इस बुनियाद पर अहले बिद्अत के लिए कोई रास्ता नहीं बचता है कि जिसे वह बिद्अत -ए- ह़सनह कहते हैं, उसके लिए कोई औचित्य पैदा करें।

हो सकता है कि कोई यह कहे कि बहुत सारी नई चीज़ें (बिद्अतें) हैं जिनको मुसलमानों ने स्वीकार किया हैं, उनपर अमल किया है, जबकि वह रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने में नहीं थीं, जैसा कि मदरसे, स्कूल, किताबों का लिखना इत्यादि। इस बिद्अत को मुसलमानों ने अच्छा समझा, इस पर अमल किया एवं इसको अच्छा कर्म जाना। आप इसके बीच, जिसपर मुसलमानों में लगभग सर्वसम्मति बन चुकी है, तथा मुसलमानों के नेता, मुसलमानों के पैगंबर और सारे जहानों के रब के दूत (अल्लाह की दया एवं शांति हो उन पर) के शब्दों के बीच कैसे सम्मति एवं संयोजन पैदा करेंगे जिस में उन्होंने कहा है: ''हर बिद्अत गुमराही है''।

उसके उत्तर में हम कहेंगे: वास्तव में यह कोई बिद्अत नहीं है, बल्कि यह जायज़ चीज़ तक पहुँचने का साधन है, और स्थानों एवं ज़मानों के अलग होने से साधन भी अलग होते हैं। यह स्थापित नियमों में से है: साधनों का वही हुक्म होगा जो उद्देश्यों का होगा, जायज़ चीज़ों के साधन जायज़ होंगे और नाजायज़ चीज़ों के साधन नाजायज़ होंगे, बल्कि हराम चीज़ों के साधन हराम होंगे, और बेहतर भी यही है कि बुराई के साधन बुरे एवं हराम हों।

अल्लाह तआला की इस आयत पर विचार कीजिए: (हे मुसलमानों!) तुम उन (मूर्तियों) को गाली न दो जिन्हें वो अल्लाह के अलावा पुकारते हैं, फिर वे बिना जाने, समझे एवं ज़ुल्म करते हुए अल्लाह को गाली देंगे। [सूरा अल-अनआम: 108]، बहुदेववादियों के पूज्यों को गाली देना कोई ज़ुल्म नहीं है, बल्कि सही और उचित है, परन्तु सारे जहानों के रब को गाली देना ग़लत, अनुचित, दुस्साहस और अन्याय है। बहुदेववादियों के पुज्यों को गाली देना प्रशंसनीय कार्य है लेकिन क्योंकि यह अल्लाह को गाली देने का कारण बनता है, इस लिए यह हराम और मना है।

मैं ने यह उदाहरण यह बताने के लिए पेश किया है कि साधनों के वही हुक्म हैं जो उद्देश्यों के हैं। इस तरह यद्यपि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माना में इस प्रकार से स्कूलों, विद्या एकत्र करने एवं पुस्तक लेखन का चलन नहीं था, मगर ज्ञात रहे कि यह साधन हैं न कि उद्देश्य, और साधनों के वही हुक्म हैं जो उद्देश्यों के हैं।

यदि कोई व्यक्ति हराम इल्म फैलाने के लिए स्कूल खोले तो उसका स्कूल खोलना भी हराम होगा, और यदि वह जायज़ इल्म की पढ़ाई के लिए स्कूल बनाए तो उसका स्कूल बनाना जायज़ होगा।

यदि कोई कहे कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस हदीस के बारे में आप क्या कहेंगे, जो इस्लाम में कोई अच्छी सुन्नत जारी करेगा ,उसको उसका बदला मिलेगा, और जो कोई दूसरा उसे देख कर अमल करेगा, तो उसका भी बदला क़्यामत तक के लिए जारी करने वाले को मिलेगा। और यहां जारी करने का मतलब विधान बनाना है?

उत्तर: जिसने ''जो इस्लाम में कोई अच्छी सुन्नत जारी करेगा'' कहा है, उसी ने ''हर बिद्अत गुमराही है'' भी कहा है। और यह संभव नहीं है कि सच्चा एवं विश्वसनीय नबी ऐसी बात कहें जो उन्हीं की दूसरी बात का खंडन करे। यह भी मुमकिन नहीं है कि कभी भी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दो बातें एक दूसरे की विपरीत हों। इसी प्रकार यह भी संभव नहीं है कि यह दोनों विपरीत होने के साथ साथ एक ही अर्थ में आए हों। और जो यह सोचता है कि अल्लाह का कलाम और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कलाम एक दूसरे के ख़िलाफ है, तो वह अपने दृष्टिकोण पर दोबारा विचार करे। इस धारणा ने या तो उसकी ओर से किसी कमी या किसी लापरवाही के कारण जन्म लिया है। यह कदापि संभव नहीं है कि अल्लाह के कलाम एवं रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कलाम में विरोधाभास पाया जाए।

इस तरह से ''हर बिद्अत गुमराही है'' एवं ''जो इस्लाम की कोई अच्छी सुन्नत जारी करेगा'' के बीच विरोधाभास इस प्रकार से ख़त्म होगा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है ''जो इस्लाम की कोई अच्छी सुन्नत जारी करेगा'' और बिद्अत इस्लाम में से नहीं है। इसी तरह कहने वाले ने कहा है ''अच्छी'' जबकि बिद्अत अच्छी नहीं है। इसी प्रकार से सुन्नत और बिद्अत में बड़ा फ़र्क है।

इसका उत्तर यह भी हो सकता है कि हदीस के शब्द ''من سنّ'' का अर्थ हो ''من أحيى'' पुनर्जीवित करना, अर्थात उस सुन्नत को दोबारा ज़िन्दा करना जिस पर अमल ख़त्म हो चुका था। इस तरह से ''सुन्नत जारी करना'' की निस्बत अपेक्षाकृत होगी -जैसा कि "बिद्अत'' के शब्द की निस्बत अपेक्षाकृत होगी-, उस व्यक्त के ओर जो उस सुन्नत को दोबारा ज़िन्दा करे जिस पर अमल ख़त्म हो चुका था।

इसका तीसरा भी जवाब हो सकता है जो इस हदीस़ के बयान किये जाने के कारण में छुपा हुआ है। और वह है उस प्रतिनिधि मंडल का किस्सा, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए थे तथा उनकी दशा दयनीय थी। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों से उन्हें दान देने का आह्वान किया, तभी अंसार का एक आदमी चाँदी की एक गठरी लेकर आया जिससे उसका हाथ लगभग भारी हो गया था। उन्होंने उस गठरी को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने रखा, तो आप का चेहरा मुबारक खुशी एवं प्रसन्नता से खिल उठा और फरमाया: ''जो इस्लाम में कोई अच्छी सुन्नत जारी करेगा ,उसको उसका बदला मिलेगा, और जो कोई दूसरा उसे देख कर अमल करेगा, तो उसका भी बदला क़्यामत तक के लिए जारी करने वाले को मिलेगा''। यहां ''सुन्नत जारी करने'' का अर्थ किसी काम को करके दिखलाना है, न कि किसी काम के बारे में क़ानून बनाना है। इस तरह से ''जिस ने इस्लाम में कोई अच्छी सुन्नत जारी किया'' का अर्थ होगा जिसने किसी सुन्नत पर अमल करके दिखलाया, न कि उसका क़ानून बनाया। इस लिए कि क़ानून बनाना हराम है, इस हदीस़ ''हर बिद्अत गुमराही है'' की बुनियाद पर।

मेरे भाइयो! याद रहे कि जब तक आप का अमल छह मामलों में शरीयत के अनुसार न हो तब तक अनुपालन स़ाबित नहीं होगा।

पहला: कारण, जब कोई व्यक्ति अल्लाह की इबादत करे किसी ऐसे कारण की बुनियाद पर जो शरीयत में वैध नहीं है, तो वह बिद्अत है, उसका यह अमल उसके मुंह पर मार दिया जाएगा।

इसका उदाहरण यह है कि कुछ लोग रजब महीना की 27वीं रात को जाग कर इबादत करते हैं, इस तर्क की बुनियाद पर कि इस रात को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मेराज को गए थे। अब रात की नमाज़ तो इबादत है मगर उसके साथ इस कारण को मिलाना बिद्अत है, इस लिए कि उसने अपनी इबादत की बुनियाद ऐसे कारण पर रखी है जो शरीयत में स़ाबित नहीं है।

इसी तरह शरई इबादत को कारण से मिलाना, बहुत महत्वपुर्ण मामला है, इससे बहुत सारी चीज़ों का बिद्अ होना ज्ञात होता है जिनके बारे में ऐसा समझा जाता है कि वह सुन्नतों में से हैं जबकि वह सुन्नतों में से नहीं होती हैं।

दूसरा: रूप व प्रकार, इबादत के लिए शर्त है कि वह उसी प्रकार में से हो जिस रूप व प्रकार में अल्लाह ने कहा है। यदि इंसान की इबादत उस रूप व प्रकार में से हो जो शरीयत में नहीं है तो वह अस्वीकार्य है।

इसका उदाहरण यह है कि जैसे कोई घोड़े की क़ुर्बानी पेश करे, यह क़ुर्बानी सही नहीं है क्योंकि इस प्रकार की क़ुर्बानी को शरीयत ने जायज़ नहीं कहा है। शरीअत ने चौपायों में से ऊँट, गाय एवं भेड़-बकरी की क़ुर्बानी को जायज़ कहा है।

तीसरा: मात्रा, अब यदि कोई व्यक्ति कहे कि चूँकि नमाज़ फ़र्ज़ है, इस लिए नमाज़ की संख्या में ज़्यादा कर देंगे तो यह बिद्अत होगी एवं अस्वीकार्य होगी, इस लिए कि शरीअत ने जो संख्या निर्धारित की है यह उसके विरूद्ध है।

यदि अच्छा समझ कर कोई इंसान ज़ुहर की नमाज़ चार के स्थान पर पाँच रकअत पढ़े, तो उसकी नमाज़ सर्वसम्मती से सही नहीं होगी।

चौथा: तरीक़ा, यदि कोई व्यक्ति वज़ू करे और इस का आरंभ अपने दोनों पैर धोने से करे, फिर अपने सिर का मसह करे, फिर दोनों हाथ धोए, उसके बाद चेहरा, तो हम कहेंगे: उसका वज़ू नहीं हुआ, क्योंकि उसने तरीक़ा अपनाने में शरीयत के उलट किया।

पांचवाँ: ज़माना, यदि कोई व्यक्ति ज़िलहिज्जा महीना के पहले दिन क़ुर्बानी कर दे तो उसकी क़र्बानी अस्वीकार्य होगी, क्योंकि उसने ज़माना में शरीयत का उल्लंघन किया।

मैं ने सुना है कि कुछ लोग अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए रमज़ान के महीना में बकरियाँ ज़बह करते हैं। यह काम इस लिए बिद्अत है क्योंकि शरीयत में, क़ुर्बानी, हदी (हज के अवसर पर अल्लाह के लिए जानवर पेश करना) एवं अक़ीक़ा के अतिरिक्त किसी भी जानवर को ज़ब्ह़ करने के द्वारा अल्लाह की निकटता प्राप्त करने का कोई प्रमाण नहीं है। इस तरह रमज़ान में ईद-अल-अज़हा की तरह, पुण्य की नीयत से क़ुर्बानी करना बिद्अत है। हाँ गोश्त खाने के लिए जानवर ज़बह करने में कोई हर्ज नहीं है।

छठा: स्थान, यदि कोई व्यक्ति मस्जिद के बाहर कहीं भी एतेकाफ़ करे तो उसका यह एतेकाफ़ सही नहीं होगा। इस लिए कि एतेकाफ़ केवल मस्जिदों में होता है। यदि कोई औरत कहे कि मैं घर में नमाज़ पढ़ने की जगह में एतेकाफ़ करुंगी, तो उसका यह एतेकाफ़ जगह के आधार पर शरीयत के ख़िलाफ़ होने के कारण सही नहीं होगा।

इसका दूसरा उदाहरण यह है कि यदि कोई व्यक्ति काबा का तवाफ़ (चक्कर लगाना) करना चाहे, और तवाफ़ करने की जगह, या उसके आस पास बहुत भीड़ पाए, तो वह मस्जिद के बाहर तवाफ़ कर ले, तो उसका यह तवाफ़ सही नहीं होगा, क्योंकि तवाफ़ केवल तवाफ़ करने की जगह में जायज़ है। अल्लाह तआला ने अपने दोस्त इब्राहीम से फ़रमाया: ''एवं परिक्रमा करने वालों के लिए मेरे घर को पवित्र रखना'' [सूरा अल-हज: 26]।

जब तक दो शर्तें पूरी नहीं होंगी तब तक कोई भी इबादत नेक काम नहीं समझी जाएगी:

पहली: इख़्लास़, अर्थात उसे पूर्ण निष्ठा के साथ केवल अल्लाह के लिये अंजाम देना।

दूसरी: मुताबआ, अर्थात अनुसरण, उपरोक्त छह बातों के पाये जाने के बाद ही अनुसरण पाया जाएगा।

मैं उन लोगों से कहना चाहुंगा जो बिद्अत के फ़ितना में ग्रस्त हैं, और हो सकता है कि उनके उद्देश्य अच्छे हों और वह खैर चाहते हों कि: यदि आप भला चाहते हैं, तो अल्लाह की क़सम सलफ़ (अगले लोग, अल्लाह उनसे राज़ी हो) के रास्ते से बेहतर कोई रास्ता हो ही नहीं सकता।

मेरे भाइयो!

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ लें, अगले नेक लोगों के रास्ता पर चलें एवं उनके रंग में रंग जाएं फिर देखें कि यह चीज़ आपको कोई नुक़सान पहुँचाती है क्या?

और मैं कहना चाहुंगा -मैं अल्लाह की शरण चाहता हूँ इस बात से कि मैं वह कहूँ जो मैं नहीं जानता हूँ- कि आप बिद्अत पर अटल रहने वाले बहुत सारे लोगों को पाएंगे कि वे शरई तौर पर स़ाबित चीज़ों एवं सुन्नतों को लागू करने से भी भागेंगे और सुस्ती से काम लेंगे। यदि वे बिद्अतों से छुटकारा भी पा लें तो प्रमाणित सुन्नतों का सामना व अनुसरण वे लापरवाही से करेंगे। यह सब दिलों पर बिद्अतों के घातक प्रभाव के नतीजे हैं। बिद्अतों के दिलों पर नुक़सान बहुत ज़्यादा हैं और उनके ख़तरे बड़े संगीन हैं। जब भी कोई क़ौम अल्लाह के दीन में कोई बिद्अत ईजाद करती है तो उसी तरह की सुन्नत या उस से बड़ी सुन्नत से वह हाथ धो बैठती है, जैसा कि पहले के कुछ विद्वानों का कहना है।

परन्तु जब इंसान को यह अनुभव हो जाता है कि वह अनुपालक है न कि विधायी, तो इस से उनके अंदर सारे जहानों के रब के प्रति पूर्ण भय, अधीनता, समर्पण एवं इबादत का भाव, तथा सत्यवादियों के इमाम, रसूलों के सरदार एवं सारे जहानों के रब के पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मुकम्मल अनुपालन का एहसास पैदा होता है।

मैं सलाह देता हूँ उन तमाम मुस्लिम भाईयों को जो किसी भी प्रकार की बिद्अत के शिकार हैं, चाहे वह बिद्अत अल्लाह की ज़ात, उसके नाम या गुणों से संबंधित हो या रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनके सम्मान से, कि वे अल्लाह से डरें एवं अपनी बिद्अत से फिर जाएं, अपने मामलों का आधार अनुपालन पर रखें न कि बिद्अत एवं नवाचार का आविष्कार करने पर, एकेश्वरवाद पर न कि अनेकेश्वरवाद पर, सुन्नत पर न कि बिद्अत पर तथा अल्लाह जो पसंद करे उस पर न कि शैतान जो पसंद करे उस पर। फिर वह देखें कि उनके दिलों को किस प्रकार से सुकून, शांति, ताज़गी, खुशी का एहसास एवं रोशनी प्राप्त होती है?

मैं अल्लाह तआला से प्रार्थना करता हूं कि वह हमें सत्य मार्ग पर चलने वाले एवं उसकी तरफ बुलाने वाले, प्रतिनिधि एवं समाज सुधारक बनाए, हमारे दिलों को ईमान एवं इल्म की रौशनी से रौशन कर दे तथा हमें जो ज्ञान दिया है उसको हमारे लिए मुस़ीबत न बनाए। साथ ही वह हमें अपने मोमिन बन्दों के रास्ते पर चलाए, तथा हमें उसके धर्मपरायण दोस्तों एवं सफल होने वाले समूह में से बनाए। दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर, उनकी औलाद पर और उनके सभी साथियों पर।

*