बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम:अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ), जो बड़ा दयालु एवं बेहद दयावान है।
अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ, जो करीम (अर्थाथ: सबसे अधिक सम्मान वाला एवं सम्मान प्रदान करने वाला, तथा सबसे ज़ियादा भलाई और बख्शिश करने वाला) और महान अर्श का रब ह:, कि दुनिया तथा आखिरत में आप का संरक्षण करे।
और आप जहां भी रहें आप को मुबारक बनाए, और आप को उन लोगों में शामिल कर दे, जो कुछ प्राप्त होने पर शुक्र अदा करते हैं, जब उन्हें किसी परीक्षा में डाला जाए तो वे धैर्य रखते हैं, और पाप करने पर क्षमा मांगते हैं। क्योंकि यह तीनों गुण सआदत (सौभाग्य या बेहतर अंजाम) के आधार हैं।
जान लें! -अल्लाह आपका अपने आज्ञापालन की ओर मार्गदर्शन करे-, कि हनीफ़ीयत यानी इबराहीम -अलैहिस्सलाम- के धर्म का अर्थ यह है; कि आप धर्म को अल्लाह के लिए विशुद्ध करते हुए केवल एक उसी की इबादत करें, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है :﴾और मैंने जिन्न तथा मनुष्य को केवल अपनी ही इबादत के लिए उत्पन्न किया है﴿[अज़-ज़ारियात : 56]।जब आपने यह जान लिया कि अल्लाह ने आपको अपनी इबादत के लिए पैदा किया है, तो यह भी जान लें कि कोई भी इबादत उसी समय इबादत कहलाएगी, जब वह तौहीद से सुसज्जित हो। बिलकुल वैसे ही, जैसे नमाज़ उसी समय नमाज़ कहलाएगी, जब वह तहारत (पवित्रता) के साथ अदा की जाए। अतः, जब शिर्क इबादत में प्रवेश कर जाए, तो इबादत भ्रष्ट हो जाती है, जैसे कि तहारत में हदस (अपवित्रता की अवस्था) प्रवेश करने से तहारत नष्ट हो जाती है। फिर जब आपने यह जान लिया कि शिर्क जब किसी इबादत के साथ मिश्रित हो जाता है तो उस इबादत को भ्रष्ट कर देता है एवं अन्य सभी कार्यो को भी नष्ट कर देता है तथा इस शिर्क का करने वाला नरक में सदैव रहने का हक़दार बन जाता है- तो आप यह भी जान लें कि आपकी सबसे पहली ज़िम्मेवारी होती है शिर्क की पहचान करना, शायद अल्लाह आप को शिर्क के जाल से बचा ले, जिसके बारे में अल्लाह तआला का फ़रमान है :﴾निःसंदेह, अल्लाह तआला अपने साथ शिर्क (साझी ठहराए जाने) को माफ़ नहीं करता और इसके सिवा दूसरे गुनाह जिस के लिए चाहे माफ कर देता है﴿[अन-निसा : 116]।और शिर्क को जानने के लिए ज़रूरी है कि आप चार नियमों से अवगत हो जाएँ, जिन्हें अल्लाह तआला ने अपनी किताब मे ज़िक्र किया है :
मान्य सिफारिश:इससे अभिप्राय वह सिफ़ारिश है, जो अल्लाह से तलब की जाए,इस सिफारिश के द्वारा सिफारिश करता को अल्लाह की ओर से सम्मानित किया जाता है तथा वह व्यक्ति जिसके लिए सिफारिश की जा सके, केवल वही हो सकता है जिसके कथन तथा कर्म से अल्लाह प्रसन्न हो एवं जिसके लिए सिफारिश की अनुमति दे ।जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है :﴾उसकी अनुमति के बिना कौन उसके पास सिफारिश कर सकता है?﴿[अल-बक़रा : 255]।
एवं अबू वाक़िद लैसी -रज़ियल्लाहु अनहु- की हदीस भी इस विषय का प्रमाण है जिस में वे फ़रमाते हैं कि (हम नबी -सल्ललल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ हुनैन की ओर निकले। उस समय हम नए-नए मुसलमान हुए थे। उन दिनों मुश्रिकों का एक बेरी का पेड़ हुआ करता था, जिसके पास वे डेरा डाला करते थे तथा जिस पर अपने हथियार लटकाया करते थे। उस पेड़ का नाम ज़ातु अनवात था। हम भी एक बेरी के पेड़ के पास से गुज़रे, तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, जैसे मुश्रिकों के पास ज़ातु अनवात है, हमारे लिए भी एक ज़ातु अनवात नियुक्त कर दें)। पूरी हदीस।
और अल्लाह तआला ही सबसे ज़्यादा और बेहतर जानता है। तथा अल्लाह की कृपा और शांति (दरूद व सलाम) हो (हमारे नबी) मुहम्मद पर और आपके सम्स्त परिजनों एवं सभी सहाबा (साथियों) पर ।
इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब का आह्वान तथा जीवन-वृत्त
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इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब का आह्वान तथा जीवन-वृत्त
लेखक : शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह बिन बाज़ समस्त प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है जो समस्त जहानों का पालनहार है, और अल्लाह तआला की असीम कृपा एवं शांति तथा बरकत अवतरित हो उसके बंदे, रसूल और समस्त सृष्टियों में सबसे उत्तम, हमारे स्वामी एवं मार्गदर्शक मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह पर तथा उनके परिवारजनों, सहाबियों और उनके दिखाए हुए पथ के पथिकों पर। तत्पश्चात : ऐ प्रतिष्ठावान भाइयो तथा ऐ प्रिय बेटो! मैं आप सज्जनों के सामने एक संक्षिप्त व्याख्यान प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जिसका उद्देश्य, आपके विचारों को प्रकाशमान करना, वास्तविकताओं को प्रकट करना, अल्लाह और उसके बंदों के लिए शुभचिंतन का दायित्व निभाना है,…
यह किताब उन बुनियादी उसूलों का वर्णन करती है जिनका सीखना हर मुसलमान पर अनिवार्य है: (जो यह हैं) अल्लाह को जानना, इस्लाम धर्म को जानना, और नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को जानना,तथा यह किताब क़ुरआन एवं हदीस के प्रमाणों के आधार पर, ईमान के निर्माण और नेक अमल की राह में इन उसूलों की अहमियत पर ज़ोर देती है।
इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब अध्याय:इस्लाम को धर्म स्वरूप कबूल करने की अनिवार्यता अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जो व्यक्ति इस्लाम के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म ढूँढे, उसका धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।" [1] (सूरा आल-ए-इमरान: आयत संख्या : 85) अल्लाह तआला ने यह भी फ़रमाया है : "और यही धर्म मेरा सीधा मार्ग है। अतः इसी रास्ते पर चलो और दूसरे रास्तों पर न चलो। अन्यथा वह तुम्हें अल्लाह के रास्ते से भटका देंगे।" [1] (सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 153) [2] सूरा अल-अनआम, आयत संख्या : 153 [1] सूरा आल-ए-इमरान, आयत संख्या : 85 मुजाहिद कहते हैं कि इस आयत में…