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उमरा का संक्षिप्त तरीक़ा और विधि-विधान
"उमरा का संक्षिप्त तरीक़ा और विधि-विधान" नामी यह किताब उमरा के तरीक़े, उसके विधि-विधानों और आदाब को सरल अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। यह इबादत के क़बूल होने की शर्तों के उल्लेख से शुरू होती है, उमरा के कार्यों को सीखने के महत्व को स्पष्ट करती है, एहराम, तवाफ़, सई से लेकर सर मुंडवाने या बाल छोटे करवाने तक इसके सभी कार्यों को समझाती है, एहराम के दौरान वर्जित कार्यों का विवरण देती है और उमरा के सभी कार्यों का संक्षिप्त और क्रमबद्ध सार प्रस्तुत करती है, ताकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े के अनुसार उमरा करने वालों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका बन सके।
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उमरा का संक्षिप्त तरीक़ा और विधि-विधान
सभी प्रकार की प्रशंसा अल्लाह की है तथा दया और शांति अवतरित हो हमारे नबी मुहम्मद तथा आपके परिवार और सभी साथियों पर।
तत्पश्चात :
उमरा और उसके विधि-विधानों से संबंधित यह एक छोटी-सी पुस्तिका है, जिसमें हमने उमरा करने वाले के लिए अधिकांश आवश्यक बातों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
अल्लाह से दुआ है कि इसे अपनी प्रसन्नता की प्राप्ति का विशुद्ध साधन एवं समस्त मुसलमानों के लिए लाभकारी बनाए।
अध्ययन समिति अध्यक्षता धार्मिक मामलात मस्जिद-ए-हराम तथा मस्जिद-ए-नबवी
प्रस्तावना
पहला : इबादत के क़बूल होने की शर्तें
इबादत अल्लाह तआला के यहाँ तब तक क़बूल नहीं होती जब तक उसके अंदर निम्नलिखति दो शर्तें न पाई जाएँ :
उसे विशुद्ध रखना। यानी इबादत केवल अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति और आख़िरत में सफल होने के लिए की जाए। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हालाँकि उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह के लिए धर्म को विशुद्ध करते हुए, एकाग्र होकर, उसकी उपासना करें।" [1] [सूरा बय्यिना : 5] [1] अर्थात् अल्लाह की ओर और उसकी इबादत की ओर ध्यान देने वाले और उसके सिवा अन्य सभी चीज़ों से मुँह मोड़ने वाले बनकर। तफ़सीर अल-सादी (पृष्ठ 538)।
तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सभी कार्यों का दारोमदार नीयतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नीयत के अनुरूप ही परिणाम मिलेगा।" [2]. [2] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 1 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1907।
अपने कथन तथा कर्म में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करना। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है : ''जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ निकाली, जो धर्म का भाग नहीं है, तो वह अस्वीकृत है।'' [3] एक अन्य रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं : ''जिसने कोई ऐसा कार्य किया, जिसके सम्बंध में हमारा आदेश नहीं है, तो वह ग्रहणयोग्य नहीं है।'' [4] [3] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 2697 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1718। [4] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1718।
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दूसरा : उमरा का तरीक़ा और उसके विधि-विधान सीखने का महत्व
जो अल्लाह की इबादत करना चाहता हो, उसे उस इबादत को करने का अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का तरीक़ा सीखना चाहिए, ताकि उसका अमल सुन्नत के अनुरूप हो। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को अपने अनुसरण और अपने तरीक़े का पालन करने की प्रेरणा दिया करते थे। मालिक बिन हुवैरिस रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "तुम उसी प्रकार नमाज़ पढ़ो, जिस प्रकार मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो।" [5] [5] सहीह बुख़ारी, हदीस संख्या : 6008।
तथा जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : ''मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को देखा कि वह क़ुरबानी के दिन अपनी सवारी पर सवार होकर रमी कर रहे थे और फ़रमा रह थे : अपने हज के काम मुझसे सीख लो, क्योंकि मुझे नहीं पता कि शायद मैं इस हज के बाद फिर हज न कर सकूँ।''[6] [6] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1297।
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तीसरा : उमरा की फ़ज़ीलत
उमरा की दो फ़ज़ीलतें हैं : आम फ़ज़ीलत और ख़ास फ़ज़ीलत
आम फ़ज़ीलत : अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "एक उमरा दूसरे उमरा तक के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है तथा अल्लाह के यहाँ ग्रहण होने वाले हज का प्रतिफल केवल जन्नत है।" [7] [7] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 1773 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1349।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "हज और उमरा का सिलसिला जारी रखो, क्योंकि ये दोनों फ़क़्र और गुनाहों को ऐसे दूर कर देते हैं जैसे भट्टी लोहे, सोने और चाँदी की गंदगी को दूर करती है, और अल्लाह के यहाँ ग्रहण होने वाले हज का सवाब सिवाय जन्नत के कुछ नहीं है।" [9] [8] "अल-तमहीद" इब्न अब्द अल-बर, भाग : 15, पृष्ठ : 102 । [9] तिर्मिज़ी हदीस संख्या : 810 तथा नसाई हदीस संख्या : 2631।
जबकि रमज़ान में किए जाने वाले उमरा की विशेष फ़ज़ीलत के बारे में अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "रमज़ान में किया गया उमरा मेरे साथ किए गए हज के बराबर है।" [10] [10] सहीह बुख़ारी हदीस संख्या : 1863 तथा सहीह मुस्लिम हदीस संख्या : 1256।
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उमरा का तरीक़ा
पहला : मीक़ात के विधि-विधान
मीक़ात : इनसे मुराद वो स्थान हैं, जिन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा हज एवं उमरा का एहराम बाँदने के लिए निर्धारित किया गया है।
जो व्यक्ति इनमें से किसी मीक़ात से हज या उमरा का इरादा रखते हुए गुजरे, उसपर वहाँ से एहराम बाँधना वाजिब है और उसके लिए बिना एहराम बाँधे आगे बढ़ना जायज़ नहीं है।
लेकिन जिसका घर इन मीक़ातों की तुलना में मक्का से अधिक निकट हो, उसका मीक़ात वही स्थान है, जहाँ वह मौजूद है। वह वहीं से हज एवं उमरा का एहराम बाँधे।
जहाँ तक बात है मक्का के निवासियों की या उन लोगों की जो मक्का से एहराम बाँधने का इरादा रखते हों, तो वे हज के लिए मक्का से ही इहराम बाँध लेंगे, लेकिन उमरा का एहराम बाँधने के लिए हरम क्षेत्र के बाहर किसी स्थान, जैसे तनईम आदि की ओर जाएँगे और वहाँ से एहराम बाँधकर आएँगे।
जो हवाई जहाज़ में हो वह मीक़ात के बराबर से गुज़रने पर एहराम बाँध ले। अतः तैयारी में जुट जाए और एहराम के कपड़े पहन ले और फिर जैसे ही मीक़ात के बराबर से गुज़रे, फ़ौरन एहराम की नीयत कर ले। हवाई अड्डे पर उतरने तक देर करना जायज़ नहीं है। हाँ, ऐसा हो सकता है कि चूँकि जवाज़ तेज़ चलता है, इसलिए तलबिया का स्थान निकल जाने के अंदेशे के कारण मीक़ात के सामने आने से पहले ही एहतियात के तौर पर तलबिया पढ़ ले।
दूसरा : एहराम का तरीक़ा और उसके विधि-विधान :
एहराम बाँधने का इरादा रखने वाले के लिए निम्नलिखित कार्य शरई रूप से निर्धारित हैं :
1- स्नान करना। स्नान करना पुरुष एवं महिला दोनों के लिए सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। माहवारी और प्रसवोत्तर रक्तस्राव वाली महिलाओं के लिए भी।
2. अपने सर और दाढ़ी में उपलब्ध सबसे अच्छी ख़ुशबू लगाना। एहराम के बाद भी उसका असर रह जाए, तो कोई हर्ज नहीं है। लेकिन महिला के लिए ऐसा इत्र लगाना जायज़ नहीं है, जिसकी ख़ुशबू हो, ताकि उसकी सुगंध अजनबी पुरुषों तक न पहुँचे।
3. एहराम के कपड़े यानी एक तहबंद और एक चादर पहनना। सुन्नत यह है कि दोनों कपड़े सफेद एवं साफ़-सुथरे या नए हों। महिला अपने पसंद के कपड़े पहनकर एहराम बाँधेगी, परन्तु वह अपने शृंगार को ज़ाहिर नहीं करे गी। हाँ, वह नक़ाब और दस्ताने पहनने से बचेगी तथा अपने चेहरे एवं हाथों को अन्य कपड़ों से ढकेगी।
4. एहराम नमाज़ के बाद बाँधना सुन्नत है। नमाफ़ फ़र्ज़ हो या नफ़ल।
एहराम बाँधते समय कहे : (मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह! उमरा के लिए।) यदि किसी और की ओर से उमरा कर रहा हो तो कहे : (मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह! अमुक की ओर से उमरा के लिए)।
अगर एहराम बाँधने वाले व्यक्ति को इस बात का भय हो कि कोई रुकावट उसके एहराम के कार्य को पूरा करने में बाधा बन सकती है, तो उसे एहराम के समय शर्त रखनी चाहिए और कहना चाहिए : (मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह! उमरा के लिए। लेकिन अगर कोई रुकावट मुझे रोक दे, तो मैं वहीं उमरा से निकल जाऊँगा, जहाँ तू मुझे रोक दे।) जब यह शर्त रख दे और कोई रुकावट आ जाए जो एहराम के कार्य को पूरा करने से रोक दे, तो एहराम खोल सकता है और उसपर कोई चीज़ नहीं है।
फिर अधिक से अधिक यह तलबिया पढ़े : "لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ، لا شَرِيكَ لَكَ)[11]" (मैं उपस्थित हूँ। ऐ अल्लाह! मैं उपस्थित हूँ। तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ। सारी प्रशंसा, सारी नेमतें और सारा राज्य तेरा है। तेरा कोई साझी नहीं है।) पुरुष तलबिया ऊँची आवाज़ में पढ़े। अजनबी पुरुष मौजूद न हों, तो महिला भी ऐसा ही करेगी। मुहरिम को अधिक से अधिक तलबिया पढ़ना चाहिए, विशेष रूप से जब हालत या समय बदले, जैसे वह किसी ऊँची जगह पर चढ़े, किसी नीची जगह की ओर जाए, रात आए या दिन आए। [11] इंसान के 'لبيك' कहने का अर्थ है : ऐ मेरे रब! मैं तेरी पुकार पर बार-बार उपस्थित हूँ। यानी इन्सान का अपने पालनहार की पुकार पर उपस्थित होना और उसकी आज्ञाकारिता पर क़ायम रहना। "إنَّ الحمد والنِّعمة لك والمُلك" हम्द का अर्थ है : प्रेम तथा सम्मान के साथ किसी को संपूर्ण बताना। इस शब्द को जब बार-बार दोहराया जाए, तो यह प्रशंसा बन जाता है। नेमत का अर्थ है : हर वह चीज़ जो अल्लाह अपने अनुग्रह से बंदे को प्रदान करे। वांछित वस्तु की प्राप्ति हो कि अप्रिय वस्तु को दूर हटाना। "المُلك" शब्द का अर्थ है : बादशाहत भी तेरी ही है। अल्लाह ही हर चीज़ का मालिक है। "لا شريك لك" यानी सारे संपूर्ण गुणों का मालिक केवल तू ही है। इसमें तेरा कोई साझी नहीं है। बादशाहत तेरी है, पैदा केवल तू ही करता है, संचालनकर्ता तू ही है और पालनहार तू ही है। मजमू फ़तावा व रसाइल अल-उसैमीन (22/96) सारांश।
उमरा में तलबिया एहराम बाँधने से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक शरीयत सम्मत है।
एहराम बाँधे हुए व्यक्ति पर उससे निकलने तक एहराम के दौरन वर्जित कार्यों में से किसी कार्य में संलिप्त होने से बचना ज़रूरी है।
तीसरा : तवाफ़ का तरीक़ा
जब एहराम बाँधा हुआ व्यक्ति मस्जिद-ए-हराम में प्रवेश करे, तो सुन्नत यह है कि पहले अपने दाएँ पाँव को अंदर रखे और मस्जिद में प्रवेश करने की दुआ पढ़े। इस समय पढ़ी जाने वाली सबसे सही दुआओं में से एक दुआ यह है : "اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ" (ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के द्वार खोल दे)। यह दुआ किसी भी मस्जिद में प्रवेश करते समय पढ़ी जाती है।केवल मस्जिद-ए-हराम के लिए ख़ास नहीं है।
जब तवाफ़ शुरू करने का इरादा करे, तो तलबिया रोक दे और इज़्तिबा कर ले। इज़्तिबा यह है कि अपनी चादर के बीच वाले भाग को अपने दाएँ बगल के अंदर से निकालकर उसके दोनों किनारों को अपने बाएँ कंधे पर रख ले। जब तवाफ़ समाप्त हो जाए, तो अपनी चादर को तवाफ़ से पहले की स्थिति में लौटा ले, क्योंकि इज़्तिबा का स्थान केवल तवाफ़ है।
फिर हजर-ए-असवद के पास जाए, उसे दाएँ हाथ से छूए और चूमे। अगर चूमना संभव न हो, तो हाथ से छूए और हाथ को चूमे। अगर हाथ से छूना भी संभव न हो, तो किसी वस्तु जैसे लाठी आदि से छूए और उसे चूमे। अगर यह भी संभव न हो, तो हजर-ए-असवद के सामने खड़े होकर उसकी ओर इशारा करे और हाथ को न चूमे। बेहतर यही है कि भीड़ लगाकर लोगों को कष्ट न दे और स्वयं भी कष्ट न उठाए।
हजर-ए-असवद को छुते या उसकी ओर इशारा करते समय 'अल्लाहु अकबर' कहे।
फिर दाईं जानिब से शुरू करे और काबा को अपनी बाईं ओर रखे। जब रुक्न-ए-यमानी के पास पहुँचे, तो उसे छूए। चूमना नहीं है। अगर छूना संभव न हो, तो भीड़ लगाकर लोगों को कष्ट न दे। उसकी ओर इशारा न करे।
रुक्न-ए-यमानी और हजर-ए-असवद के बीच यह दुआ पढ़े : "ऐ हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा।" [सूरा बक़रा : 201]
हजर-ए-असवद के सामने से गुजरते समय हर बार उसकी ओर हाथ से इशारा करे और 'अल्लाहु अकबर' कहे।
शेष तवाफ़ में ज़िक्र, दुआ और क़ुरआन की तिलावत आदि जो चाहे, करे।
सुन्नत यह है कि पहले तीन चक्करों में रम्ल करे। रम्ल का अर्थ है : तेज़ गति से चलना जिसमें कदमों के बीच की दूरी कम हो। बाकी चार चक्करों में रम्ल नहीं है। इनमें सामान्य रूप से चलना है।
जब तवाफ़ पूरा कर ले, तो मक़ाम-ए-इबराहीम की तरफ़ बढ़े और पढ़े : "तथा (आदेश दिया) तुम 'मक़ामे इबराहीम' (इबराहीम के खड़े होने की जगह) को नमाज़ का स्थान बनाओ।" [सूरा बक़रा : 125] फिर हो सके तो उसके पीछे दो रकात नमाज़ पढ़े। अगर संभव न हो, तो मस्जिद के किसी भी स्थान पर पढ़ ले। पहली रकात में सूरा अल-फ़ातिहा के बाद : (क़ुल या अय्युहल काफ़िरून) [सूरा काफ़िरून : 1] और दूसरी रकात में सूरा फातिहा के बाद : (क़ुल हुव-ल्लाहु अहद) [सूरा इखलास : 1] पढ़े।
चौथा : सई का तरीक़ा
जब तवाफ़ और उसकी दो रकातें पूरी कर ले, तो सई के स्थान की ओर चल पड़े। सफ़ा के निकट पहुँचे, तो यह आयत पढ़े : "निःसंदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं।" [सूरा बक़रा : 158]
फिर कहे : ''मैं भी उसी क्रम से शुरू करता हूँ, जिस क्रम से अल्लाह तआला ने शुरू किया है।'' [12] [12] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1218]
फिर सफ़ा पहाड़ी पर चढ़े, यहाँ तक कि काबा या उसकी दिशा को देख सके, फिर क़िबले की ओर मुँह करके खड़े हो जाए, अल्लाह का एकत्व और उसकी बड़ाई बयान करे और कहे : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य है और उसी की सब प्रशंसा है और वह हर काम करने की क्षमता रखता है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसने अपना वचन पूरा कर दिखाया है, अपने बंदे की मदद की है और अकेले ही सारे जत्थों को पराजित कर दिया।" फिर इसके बीच में दुआ करे। इस तरह तीन बार कहे। [13] [13] सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या : 1218।
फिर सफ़ा से मर्वा की ओर पैदल चले। जब पहले हरे चिह्न तक पहुँचे, तो तेज़ दौड़े। जब दूसरे हरे चिह्न तक पहुँचे, तो सामान्य चाल में चले। महिलाओं को तेज़ दौड़ना नहीं है।
जब मर्वा पहुँचे, तो वही करे जो सफ़ा पर किया था।
फिर मर्वा से सफ़ा की ओर पैदल जाए, जब हरे चिह्न तक पहुँचे, तो तेज़ी से दौड़े, और जब दूसरे हरे चिह्न तक पहुँचे, तो सामान्य चाल में चले।
इसी तरह सात चक्कर पूरे करे। सफ़ा से मर्वा तक जाना एक चक्कर (सई) है और मरवा से सफ़ा तक वापस आना एक और चक्कर।
सई के दौरान ज़िक्र, दुआ और क़ुरआन की तिलावत में से जो पसंद हो, करे।
पाँचवाँ: सर मुंडवाने और बाल छोटे करवाने का तरीका :
जब उमरा करने वाला अपने तवाफ़ और सई को पूरा कर ले, तो उसके लिए आवश्यक है कि अपने सिर को मुंडवाए या बाल छोटे करवाए यदि वह पुरुष हो। सुन्नत यह है कि पूरे सर को मुंडवाए या पूरे सर के बाल छोटे करवाए।
सर मुँडवाना बाल छोटे करवाने से बेहतर है, सिवाय इसके कि हज का समय निकट हो और सर के बालों के उगने के लिए पर्याप्त समय न हो; तो ऐसे में छोटे करवाना ही उत्तम है।
औरत अपने बालों के सिरों से उंगली के एक पोर के बराबर काट लेगी।
एहराम की अवस्था में वर्जित कार्य
एहराम की अवस्था में वर्जित कार्य इस प्रकार हैं :
1- शरीर के किसी भी स्थान से बालों को मूँडना, काटना या उखाड़ना।
2- हाथों या पैरों के नाख़ूनों में से सब को या कुछ को काटना।
3- पुरुषों के लिए सिर को किसी सटे हुए वस्त्र, जैसे टोपी, ग़ुत्रा (शिमाग़) पगड़ी, चादर, रूमाल, कंबल या गत्ते आदि से ढकना।यह मनाही पुरुषों के साथ ख़ास है। महिला इसके दायरे में नहीं आती।
4- शरीर के नाप के अनुसार बने हुए साधारण कपड़े पहनना; जैसे सिलाई किया हुआ कपड़ा, पतलून, कमीज़, मोज़े और दस्ताने। यह विशेष रूप से पुरुषों के लिए है, महिलाओं के लिए नहीं। क्योंकि उन्हें निम्नलिखित चीज़ों से मना किया गया है :
क. नक़ाब, बुरक़ा या नक़ाब के समान मास्क पहनना, और उसके लिए अजनबी पुरुषों के सामने अपने चेहरे को चेहरे के लिए प्रचलित पर्दे से ढकना अनिवार्य है; चाहे पर्दा उसके चेहरे को छू भी ले, और उसके लिए यह धार्मिक रूप से वैध नहीं है कि वह अपने सिर पर पट्टी या उसके समान कुछ रखे ताकि पर्दा चेहरे को न छुए; क्योंकि इसके वैध होने का कोई प्रमाण नहीं है।
ख- अपने हाथों में दस्ताने पहनन। उसके लिए अपने हाथों को गैर-महरम पुरुषों की उपस्थिति में अपनी अबाया के अंदर रखना अनिवार्य है।
5- शरीर या एहराम के कपड़े पर खुशबू लगाना।
6- जंगली शिकार को मारना या उसका शिकार करना, चाहे उसे मारा न भी जाए।
7. खुद अपने या किसी दूसरे के लिए निकाह का पैग़ाम देना।
8. निकाह करना।
9- चुम्बन और वासना के साथ छूने जैसे कार्य, जो गुप्तांग के अलावा हों।
10. संभोग करना।
उमरा के कार्यों का सारांश :
1- स्नान करना।
2- खुशबु लगाना।
3- एहराम का कपड़ा पहनना।
4- एहराम बाँधना। यीनी उमरा के कार्यों को आंरभ करने की नीयत करना।
5- तलबिया पुकारना।
6- काबा का तवाफ़ करना।
7. मक़ाम इब्राहीम के पीछे दो रकात नमाज़ पढ़ना।
8- स़फ़ा एवं मरवा पहाड़ी के बीच सई करना।
9. सर मुंडवाना या बाल छोटे करवाना।
अल्लाह ही बेहतर जानता है। दरूद व सलाम हो हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर।
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