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البَقَرَة /

आयत 270

2 : 270
البَقَرَة आयतें 286
सूरह · البَقَرَة
हिन्दी · Omari
2 : 270

وَمَآ أَنفَقۡتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوۡ نَذَرۡتُم مِّن نَّذۡرٖ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُهُۥۗ وَمَا لِلظَّٰلِمِينَ مِنۡ أَنصَارٍ

तथा तुम जो भी दान करो अथवा मन्नत मानो, तो निःसंदेह अल्लाह उसे जानता है और अत्याचारियों के लिए कोई सहायक नहीं।

Explanation & meanings · 1
  1. अर्थात स्वयं पर इबादत का वह कार्य अनिवार्य कर लेना जो अनिवार्य नहीं है।