تعليم الصلاة
नमाज़ की शिक्षा: संकलनकर्ता : डा०अब्दुल्लाह बिन अहमद अज्जैद| प्रस्तावना: इसलाम के पांच स्तम्भ: सहीह हदीस द्वारा सिद्ध है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : इस्लाम के पाँच सतंभ (अरकान) हैं: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत एवं उपासना के लायक़ नहीं है और यह कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, रमज़ान के रोज़े रखना, अपने धन की जकात देना एवं अल्लाह के पवित्र घर (काबा शरीफ) का हज करना। उपरोक्त हदीस इस्लाम के पांचों स्तम्भ के बयान को सम्मिलित है :
नमाज़ की शिक्षा:
संकलनकर्ता : डा०अब्दुल्लाह बिन अहमद अज्जैद|
प्रस्तावना:
इसलाम के पांच स्तम्भ:
सहीह हदीस द्वारा सिद्ध है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : इस्लाम के पाँच सतंभ (अरकान) हैं: इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत एवं उपासना के लायक़ नहीं है और यह कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ क़ायम करना, रमज़ान के रोज़े रखना, अपने धन की जकात देना एवं अल्लाह के पवित्र घर (काबा शरीफ) का हज करना।
उपरोक्त हदीस इस्लाम के पांचों स्तम्भ के बयान को सम्मिलित है :
प्रथम स्तम्भ: ला इलाहा इल्लल्लाह एवं मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही देना| अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, इसलिए शब्द "ला इलाहा" अल्लाह के अतिरिक्त जिन चीजों की भी पूजा की जाती है उन सभी को नकारता है और शब्द "इल्लल्लाह" इबादत (उपासना) को केवल एक अल्लाह के लिए जिसका कोई साझी नहीं, सिद्ध करता है, अल्लाह (तआला) फरमाते हैं: "अल्लाह गवाही देता है, जो न्याय के साथ स्थिर है, कि उसके अतिरिक्त कोइ अन्य पूज्य नहीं है, इसी प्रकार फरिश्ते एवं ज्ञानी लोग भी (साक्षी हैं) कि उसके अतिरिक्त कोइ अन्य पूज्य नहीं l वह प्रभुत्वशाली हिकमत वाला हैl" सूरा आल-इमरान: الآية
और ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही तीन बातों के इकरार का तक़ाज़ा करती है|
1 - तौहीद उलूहियत: (ईश्वर का अकेले ही उपासना के योग्य होना)इसका अर्थ है कि अल्लाह पाक अकेला ही सम्पूर्ण इबादत के योग्य है,और इबादत का कोई अंश उसके अतिरिक्त के लिए वैध नहीं, एकेश्वरवाद का यही वह भाग है जिसके लिए अल्लाह ने सभी जीवन प्राणियों को पैदा किया है, अल्लाह (तआला) ने फ़रमाया: "और मैं ने जिन्न और मनुष्य को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी इबाद करें।" (अज्ज़ारियात : 56 ) यही वह तौहीद है जिसकी ओर आमन्त्रण देने के लिए अल्लाह ने समस्त रसूलों को भेजा और सभी धर्म ग्रन्थ उतारे,अल्लाह (तआला) ने फ़रमाया: "और हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत (वंदना) करो तथा तागूत (अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्य) से बचोl" (अन्नहल : 36 )
तौहीद (एकेश्वरवार) के विपरीत शिर्क (बहुदेववाद) है,इसलिए यदि तौहीद का अर्थ प्रत्येक प्रकार की इबादत को अल्लाह के लिए विशेष करना है, तो शिर्क का अर्थ हुआ कि इबादत का कोई भाग अल्लाह के अतिरिक्त के लिए किया जाये, और जो व्यक्ति इबादत के विभिन्न प्रकारों जैसे नमाज़,रोज़ा,दुआ,मनौती,बलि एवं किसी कब्र वाले से गोहार माँगना आदि में से किसी प्रकार को अल्लाह के अतिरिक्त के लिए करे,उसको पसन्द करते हुए और अपनी इच्छा के अनुसार,तो उसने अल्लाह के साथ शिर्क किया और शिर्क ही वह महापाप है जो सम्पूर्ण अच्छे कर्मों को बरबाद एवं नष्ट कर देता है|
2 - तौहीद रुबुबियत: (अखिल जगत का अकेला प्रभु होना) इस तौहीद (एकेश्वर्वाद )का अर्थ इस बात का इकरार करना कि अल्लाह हीं पैदा करने वाला,जीविका देने वाला,जीवन और मृत्यु देने वाला,ऐसा प्रबंधक जिसके लिए धरती और राजपाट है|तौहीद के इस भाग का इक़रार सम्पूर्ण सृष्टी के अन्दर उस प्राकृतिक रूप से पाया जाया ता है,जिस पर अल्लाह ने उसे पैदा किया है,यहाँ तक कि वे मुश्रिकिन (बहुदेववादी ) जिन के बीच हमारे रसूल मुहम्मद सल्लाल्लाही अलैहि वसल्लम भेजे गए ,वे भी इस तौहीद का इक़रार करते थे,और इसका इनकार नहीं करते थे जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "(आप) कहिए कि वह कौन है जो तुमको आकाश तथा धरती से जीविका पहुंचता है,अथवा वह कौन है जो कानों तथा आँखों पर पूर्ण अधिकार रखता है तथा वह कौन है जो जीवधारी को निर्जीव से निकालता है तथा निर्जीव से सजीव को निकालता है तथा वह कौन है जो सभी कार्यों का संचालन करता है ? अवश्य वह यही कहेंगे कि अल्लाह ! तो कहिए कि फिर डरते क्यों नहीं| (यूनुस : 31) तौहीद के इस भाग का इंकार मानव जाती में से केवल थोड़े व्यक्तियों ने किया,उन व्यक्तियों ने भी केवल प्रत्यक्ष रूप से घमंड और स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के लिए किया वरना अपने ह्रदय और आत्मा के भीतर पूर्ण रूप से इस का इकरार किया,जैसाकि अल्लाह (तआला) ने फ़रमाया : "तथा उन्होंने अस्वीकार कर दिया यघपि उनके दिल विश्वास कर चुके थे केवल अत्याचार एवं खमंड के कारण| (अन-नमल : 14) 3 - तौहीद अस्मा व सिफ़ात : (अल्लाह के पवित्र नामों एवं गुणों में एकेश्ववार) तौहीद के इस भाग का अर्थ है कि अल्लाह ने जो कुछ अपने विषय में अथवा उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके विषय में वर्णन किया है उन पर ईमान रखा जाये और उन नामों एवं विशेषताओं को उसी रूप में रखा जाये जो उसकी महिमा के योग्य है,उनकी उपमा,उदाहरण और ती स्थिति न बयान किया जाये, न उनके अर्थ को बदला जाये और न रद्द किया जाये, जैसा कि अल्लाह (तआला) ने फ़रमाया| "तथा शुभ नाम अल्लाह के लिए ही है, इसलिए इन नामों से उसी को पुकारो| (अल-आराफ़ : 180) अल्लाह तआला का फ़रमान है : "उस जैसा कोई नहीं,और वह सुनने वाला देखने वाला है|" (अश्शुरा : 11)
अत: ला इलाहा इल्लल्लाह उन्हीं तीन चीज़ों की घोषणा और इक़रार का नाम है और जो व्यक्ति इसके अर्थ को जानते हुए और उनकी आवश्यकताओं को पूरी करते हुए अल्लाह तआला से शिर्क को नकारे और उसके एकेश्वरवार को सिद्ध करे वही सच्चा मुसलमान है, और जो व्यक्ति इस (कलिमा) को मुख से कहे, और प्र्तेयक्ष रूप से इसकी आवश्यकताओं के अनुसार कर्म भी करे, परन्तु ह्रदय में इस पर विश्वास न रखे वह मुनाफ़िक़ (द्वयवादी-अवसरवादी) है, और जो मुख से इस (कलिमा) को प्रकट करे और अनेक बार करे परन्तु उसका कर्म इसके विपरीत हो तो वह काफ़िर (नास्तिक) है|
मुहम्मद रसूलुल्लाह की गवाही : कलिमा के इस भाग की गवाही का अर्थ यह है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिस संदेश को अल्लाह के पास से लाये हैं उस पर विश्वास रखा जाये, उसको सत्य समझा जाये, उनके आदेश का पालन किया जाये और अवज्ञा से बचा जाये, और यह कि प्रत्येक व्यक्ति की उपासना और आराधना उस शास्त्र के अनुसार हो जिसके अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने प्रचलित किया है, जैसाकि अल्लाह (तआला) ने फ़रमाया| "(ऐ ईमान वालो!) तुम्हारे पास तुम ही में से एक रसूल आ गया हैl उसको वह बात भारी लगती है जिससे तुम्हें दुःख होl वह तुम्हारी सफ़लता की लालसा रखता हैl और ईमान वालों के लिए करुणामय दयावान हैl" (अत्तैबा-128) अल्लाह तआला का फ़रमान है : "जिसने (इस) रसूल का अनुसरण किया उसी ने अल्लाह की आज्ञाकारित की| (अन-निसा : 80) अल्लाह तआला का फ़रमान है : "और अल्लाह एवं उसके रसूल के आदेशों का पालन करो, ताकि तुम पर कृपा की जाये| (आल-इमरान : 132) अल्लाह तआला का फ़रमान है : "मुहम्मद अलाह के रसूल हैं तथा जो लोग उनके साथ हैं काफिरों पर कठोर है, आपस में दयालु हैं| (अल-फत्ह : 29)
दूसरा और तीसरा स्तम्भ : नमाज़ स्थापित करना और ज़कात देना|
जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है: "और उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे धर्म को शुद्ध कर रखें, और सबको तज कर केवल उसीकी उपासना करें, और नमाज़ स्थापित करें और ज़कात देंl और यही शाश्वत धर्म हैl" (अल-बय्यिन :-5) अल्लाह तआला का फ़रमान है : "और नमाज़ स्थापित करो, एवं ज़कात दो, और रुकुल करने वालें के साथ रुकुल करो (झुक जाओ)| (अल-बकरा:-43) नमाज़ का वर्णन हम शीध्र ही करने वाले हैं,परन्तु ज़कात वह धन है जो धनी व्यक्तियों से लेकर निर्धनों और उनको दिया जाता है जिनको ज़कात लेने का अधिकार है|
ज़कात इस्लाम के स्तम्भों में से महान स्तम्भ है जिसके द्वारा समाज में एकता एवं समानता पैदा होती है और समाज के सदस्य एक-दूसरे के लिए सहायक और सहयोगी होते हैं, इस प्रकार कि धनवान के धन में निर्धनों का भी अधिकार होता है और इस अधिकार में धनवान का कोई उपकार नहीं होता|
चैथा स्तम्भ : रमज़ान के महीने का रोज़ा| जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है: "ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़े उसी प्रकार अनिवार्य कर दिए गए हैं, जिस प्रकार तुमसे पूर्व लोगों पर अनिवार्य किए गए थे, ताकि तुम अल्लाह से डरोl" (अल-बकरा:-183) पांचवां स्तम्भ : सामर्थ्य रखने वालों के लिए अल्लाह के घर का हज्ज करना| जैसा की अल्लाह ताआला का फ़रमान है: "तथा अल्लाह के लिए लोगों पर इस घर का हज अनिवार्य है, जो उस तक राह पा सकता हो, और जो कुफ्र करेगा, तो सुन ले कि अल्लाह संसार वासियों से बेनियाज़ हैl" (आल-इमरान : 97)
इस्लाम में नमाज़ का महत्व|
उपरोक्त बयान से इसलाम में नमाज़ का महत्त्व और उसकी प्रधानता का ज्ञान होता है,और यह कि वह इसलाम का दूसरा स्तम्भ है जिसको स्थापित किये बिना इन्सान का इसलाम हि सही नहीं होसकता,उसको अदा करने में आलस्य करना या गफलत करना मुनाफिकों की निशानियों में है,और इसको छोड़ देना कुफ्र पथभ्रष्टता और इसलाम की सिमा से बाहर होजाना है,इसलिए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सही हदीस में फ़रमाया है: "इंसान और कुफ्र तथा शिर्क के बीच अंतर केवल नमाज़ का छोड़ देना है|" और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः "हमारे और उन (काफिरों) के बीच अंतर केवल नमाज़ का है,इसलिए जिस व्यक्ति ने उसे छोड़ दिया उसने कुफ्र किया| इस हदीस को इमाम तिरमिज़ी रिवायत किया और कहा की यह हदीस हसन है| नमाज़ इस्लाम की चोटी और उसका मूल आधार है,यह अल्लाह और उसके भक्तों के बीच सम्बंध जोड़ने का माध्यम है| जैसाकि एक सहीह हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फ़रमाया: "जब तुम में से कोई नमाज़ पड़ता है तो अपने प्रभु से मुनाजात (कान में बात कहना अथवा अकेले बातें) करता है|" नमाज़ बन्दे और प्रभु के बीच प्रेम का चिन्ह और उसकी अनुकम्पाओं पर उसको सम्मान देना है, अल्लाह (तआला) के निकट नमाज़ की महानता और महत्व की एक बड़ी दलील यह है कि यह प्रथम अनिवार्य उपासनाओं में से है जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अनिवार्य किया गया, और इसे मेराज की रात्रि में इस उम्मत (समुदाय) पर फ़र्ज़ किया गया| और जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया गया कि कौन सा कर्म सर्वोत्तम है तो आप ने फ़रमाया: "नमाज़ को उसके समय पर अदा करना| बुख़ारी एवं मुस्लिम| नमाज़ को अल्लाह (तआला) ने पापों से पवित्र होने का एक साधन बनाया है जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया| "कि यदि तुममें से किसी के द्वारा पर एक नदी हो जिस में वह प्रत्येक दिन पांच बार स्नान करता हो तो क्या उसके शरीर पर कुछ मैल कुचैल बाक़ी रहेगा, उन्हों (साहब किराम) ने फ़रमाया कि मैल कुचैल में से कुछ भी बाक़ी न रहेगा, आप (अल्लाह के रसूम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि इसी प्रकार पांचो नमाज़ है, इसके द्वारा अल्लाह (तआला अपने बन्दों के)पापों को मिटा देता है| बुख़ारी एवं मुस्लिम। एक अन्य हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम- ने संसार से विदा होते समय अंतिम वसीयत की और अपनी उम्मत (समुदाय) से जो वायदा लिया वह यही था:" कि वे नमाज़ और दासों के सम्बंध में अल्लाह से डरें"| अहमद, नसाई और इब्ने माजा| अल्लाह (तआला) ने क़ुरआन करीम में नमाज़ का बहुत अधिक महत्त्व बयान किया है, और नमाजियों की बड़ी प्रशंसा की है, अनगणित स्थानों पर विशेष रूप से नमाज़ का वर्णन किया है और स्थापित करने एवं समय पर पढने के लिए बल दिया है, एक स्थान पर फ़रमाया: "नमाज़ों की सुरक्षा करो विशेषकर मध्य वाली नमाज़ की, और अल्लाह के लिए नम्रता पूर्वक खड़े रहा करो"| (अल-बकरा:-238) तथा अल्लाह तआला का यह फ़रमान भी उसीका प्रमाण है: "तथा नमाज़ स्थापित कीजिए, नि:सन्देह नमाज़ निर्लज्जा तथा दुराचार से रोकती है|" अल -अनकबूत :45 तथा अल्लाह तआला का यह फ़रमान भी: "हे इमान वालो! धैर्य तथा नमाज़ के द्वारा सहायता चाहो,अल्लाह (तआला) धैर्य रखने वालों का साथ देता है|" (अल-बकरा:-153) तथा उसका फ़रमान है: "अवश्य नमाज़ मोमिनों पर निश्चित तथा निर्धारित समय पर अनिवार्य की गई है|" (अन-निसा : 103) दूसरी ओर अल्लाह (तआला) ने नमाज़ छोड़ने और उसके स्थापित करने में आलस्य एवं सुस्ती करने वालों के लिए अज़ाब(प्रकोप) को अनिवार्य कर दिया है, फरमाया: "फिर उनके पश्चात ऐसे कपूत पैदा हुए कि उन्होंने नमाज़ बरबाद कर दी तथा मानोकांक्षा के पीछे पड़ गए,अतः वे विनाश (अथवा नर्क की घाटी) को पाएंगे|" मरयम :59 अल्लाह ने अपनी महान किताब में ब्यान फरमाया है कि पापियों के नर्क में जाने प्रथम कारण उनका नमाज़ को छोड़ देना है,ब्यान फ़रमाया: "तुम्हें नर्क में किस चीज़ ने डाला,वे उत्तर देंगे कि हम नमाज़ी न थे| अल-मुद्दस्सिर :42 - 43 और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने दो ठंडे समय में नमाज़ पढ़ी अर्थात फ़ज्र और अस्र की,वह जन्नत ( स्वर्ग ) में प्रवेश करेगा| जैसा कि सहीह हदीस में है: "जिसने दो ठंडे समय में नमाज़ पढ़ी वह जन्नत में जायेगा|"
नमाज़ धर्म का एक ऐसा चिन्ह है जो सभी रसूलों के धर्मों में सामान्य रही है और सम्पूर्ण अम्बिया को इसके स्थापित का आदेश दिया गया था| यह अकेला अल्लाह जिसका कोई साझी नहीं,उसके लिए स्वंय को समर्पण कर देने और उसकी आज्ञा पालन की प्रतिनिधि करती है दिलों में तक़वा (संयम),अल्लाह की ओर झुकना,धैर्य,अल्लाह का डर,अल्लाह के मार्ग में युद्ध और अल्लाह पर विश्वास का प्रसिक्षण देती है| यह एक ऐसा स्पष्ट चिन्ह है जो अल्लाह पर ईमान (विश्वास) और अखिल जगत के प्रभु के प्रति सच्चाई को प्रकट करती है|
इसलिए प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है कि वह नमाज़ों को उनके समय पर पढने और स्थापित करने का प्रयोजन करे, और जिस प्रकार अल्लाह ने उसे निर्धारित किया है उसी प्रकार उसे स्थापित करे,ताकि अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की आज्ञा पालन और अनुकरण से सैभाग्य प्राप्त करे और अल्लाह के क्रोध एवं उसके प्रकोप से सुरक्षित रहे|
तहारत (पवित्रता का बयान)
पवित्रता एवं सफाई तीन वस्तुओं को सम्मिलित है|
1 - शरीर का पवित्र होना2 - वस्त्र का पवित्र होना3 - जिस स्थान में नमाज़ पढ़ी जाये उसका पवित्र होना,शरीर की पवित्रता दो प्रकार में से एक के द्वारा होनी चाहिए|
प्रथम स्नान द्वारा : बड़ी नापाकी जो जनाबत (पत्नी से संभोग अथवा इहतिलाम के कारण) या मासिक धर्म या परसैति कर कारण होती है उसमें गुस्ल (स्नान) अनिवार्य है,उसकी विधी यह है कि पवित्रता की नियत से अपने पुरे शरीर पर और बालों पर पानी बहाये|
द्वितीय वज़ू द्वारा : अल्लाह तआला फ़रमाते है: "हे ईमान वालों ! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने मुंह तथा कोहनियों सहित अपने हांथों को धो लिया करो और अपने सिर का मसह कर लो,तथा अपने पैर टखनों सहित धुल लो|" अल-मायदह :6 यह आयत करीमा वज़ु के समय निम्नलिखित बातों का आदेश देती है,जिसका पालन करना अनिवार्य है : 1- चेहरा का धोना,इसी के अन्तर्गत कुल्ली करना और नाक में पानी चढाना है| 2- दोनों हांथों को कुहनियों के साथ धोना| 3- पुरे सिर का मसह करना,दोनों कान भी इसी के अंतर्गत है| 4- दोनों पैर को टखनों के साथ धोना| कपडे और स्थान पवित्रता उस समय होगी जब किउनको नापाक वस्तुओं पेशाब,पाखाना आदि से साफ़ करदिया जाये|
तयम्मुम :
पवित्रता के सम्बंध में अल्लाह तआला की मुसलमानों पर बहुत बड़ी कृपा है कि उसने उन लोगों के लिए जिनके पास जल न हो अथवा उसका प्रयोग हानिकारक हो ऐसी अवस्था में पवित्र मिट्टी से तयम्मुम(पवित्रता) करने की आज्ञा दी है,वह इस प्रकार कि अपनी हथेलियों को धरती पर मारे फिर उनको अपने चेहरे पर फेरे और हांथों पर मले| अल्लाह तआला का फ़रमान है : " और जल न मिले तो पवित्र मिट्टी से तयम्मुम कर लो,उसे अपने चेहरे तथा हांथों पर मलो| अल-मायदह :6| अम्मार -रज़ियल्लाहु अन्हु- फ़रमाते हैं: अम्मार बिन यासिर कहते हैं कि: ((नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझे किसी काम से बाहर भेजा, तो वहाँ नापाक हो गया और पानी न मिल सका, इस लिए मैं ज़मीन पर लोट लगाने लगा, जिस तरह जानवर करता है। फिर मैं नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आया और यह घटना बताई, तो आप ने फ़रमायाः (तुम्हारे लिए पर्याप्त था कि तुम अपने हाथों से इस तरह कर लेते|) फिर आप ने दोनो हाथ मिट्टी पर एक बार मारा, उसके बाद बाएं हाथ को दाहिने हाथ पर मला तथा दोनों हथेली के ऊपरी भाग और चेहरे पर फेरा)। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
फ़र्ज़ (अनिवार्य) नमाज़ें :
इस्माल में प्रत्येक मुस्लिम(पुरुष एवं स्त्री)पर दिन और रात में पांच नमाज़े अनिवार्य की हैं:1- भोर (फज्र) की नमाज़2- ज़ुहर की नमाज़3- अस्र की नमाज़4- मगरिब की नमाज़ (सूर्यास्त के समय)5- इशा की नमाज़|
फज्र की नमाज़ : दो रकअत है,और उसका समय दूसरे फज्र के उदय अर्थात रात्रि के अंतिम भाग में पूरब की ओर जो प्रकाश फैल जाता है (भोर) से लेकर सूर्य उदय तक रहता है|
ज़ुहर की नमाज़ : चार रकअत है, उसका समय दोपहर को आकाश के बीच से सूर्य के ढलने से आरंभ होता है और उस समय तक रहता है जब तक कि सूर्य ढलते समय वाली छाया के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु की छाया उसके समान न हो जाये|
अस्र की नमाज़ : चार रकअत है, उसका समय ज़ुहर के समय के समाप्त हो जाने के पश्चात आरम्भ होता है और उस समय क रहता है जबतक कि सूर्य ढलने के पश्चात वाली छाया के अतिरिक्त प्रत्येक वस्तु की छाया उसकी तो गुणा न हो जाये, प्रंतु इस नमाज़ का आवश्यकतानुसार समय सूर्यास्त तक रहता है|
मगरिब की नमाज़ : तीन रकअत है, उसका समय सूर्यास्त से लेकर आकाश से लाली के समाप्त होजाने तक है|
इशा की नमाज़ : चार रकअत है उसका समय मगरिब के समय के समाप्त हो जाने के बाद आरम्भ होता है और तिहाई अथवा आधी रात्रि तक रहता है|
नमाज़ का तरीक़ा (विधी) :
उपरोक्त तरीके से शारीर और स्थान की पवित्रता प्राप्त कर लेने के बाद और इस बात की पुष्टि कर लेने के बाद कि नमाज़ का समय होचुका है,नमाज़ अदा करने वाला क़िबला की ओर मुंह करे,(किबला अल्लाह का घर है जिसको काबा कहते हैं,जो मक्का शरीफ़ में है) जो अनिवार्य (फर्ज़)अथवा न नफिल (इच्छुक) नमाज़ पढना चाहता है,उसकी दिल में नियत करे फिर निम्नलिखित कार्य करे :
अल्ल्हू अकबर कहते हुए तकबीर कहे और अपनी दृष्टी को सजदह के स्थान पर रखे| अल्लाहु अकबर कहते समय अपने दोनों हांथों को अपने कंधे के बराबर या कानों के लौ के बराबर उठाए| तकबीर तहरिमा(नमाज़ आरम्भ करते समयअल्लाहु अकबर कहना) के बाद दुआए इस्तिफताह पढनी सुन्नत है,इस्तिफ्ताह की दुआ यह है: "सुभानका अल्लाहुम्मा व बिहम्दिका व ताबरकसमोका व तआला जद्दोका व ला इलाहा गैरोका" "तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंशा करते है,तेरा नाम बरकत वाला है,तेरी महिमा उच्च है,तेरे सिवा कोई सच्चा पूजत नहीं|" यदि चाहे तो इसके बदले यह दुआ पढ़े : ((अल्लाहुम्मा बाइद बैनी व बैना खतायाया कमा बाअत्ता बैना अलमशरिक़ वलमगरिब,अल्लाहुम्मा नक्केनी मिन खतायाया कमा युनक्का अस्सौबो अल अबयजो मिनद्दनस,अल्लाहुम्मग्सिलनी मिन खतायाया बिलमाए वस्सल्जे वल्बरदे)) " हे अल्लाह ! मेरे और मेरे पापों के मध्य दूरी करदे,जैसे तूने पूर्व और पश्चिम के बीच दूरी करदी है,हे अल्लाह ! मुझे पापों से ऐसे साफ सुथरा करदे जिस प्रकार सफ़ेद कपडा मैल कुचैल से साफ़ किया जाता है,हे अल्लाह ! मुझे मेरे पापों से जल,बर्फ और ओले द्वारा धुल दे| उसके बाद कहे : ((अऊज़ो बिल्लाहे मिनश -शैतानिर्रजीम,बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम)) फिर सूरह फातिहा पढ़े जो निम्नलिखित है : "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार हैl" बड़ा दयावान अति करुणामयी है| बदले (क़ियामत)के दिन का स्वामी है| "हम केवल तेरी ही उपासना करते हैं और केवल तुझी से सहायता माँगते हैंl" हमें सीधा (सत्य)मार्ग दिखा| उनलोगों का मार्ग जिनपर तू ने उपकार किया,उनका नहीं जिनपर प्रकोप हुआ तथा न गुमराहों का| सूरह फातिहा के ख़त्म होने के बाद आमीन कहे| फिर उसको जो कुछ कुरआन याद हो वह पढ़े,जैसे : जब अल्लाह की सहायता एवं विजय प्राप्त होजाए| और तुम लोगों को अल्लाह के धर्म की ओर झुंड के झुंड आते देख लो| तो तूम अपने प्रभु महिमा एवं प्रशंसा करने में लग जाओ और उससे क्षमा की प्रार्थना करो,निसंदेह वह क्षमा करने वाला है| या इसके अतिरिक्त दूसरी सूरह|
फिर उसके बाद "अल्लाहु अकबर "कहते हुए रुकूअ में जाए,रुकूअ में अपनी पीठ को समतल रखे,अपने हांथों को अपने घुटनों पर रखे और यह दूआ पढ़े, "सुबहान रब्बियल अज़ीम" पवित्र है मेरा महान प्रभू " इस दुआ को तीन बार अथवा तीन से अधिक बार पढना सुन्नत है|
फिर "समि अल्लाहु लिमन हमिद:" कहते हुए चाहे इमाम हो या अकेला अपना सिर रुकूअ से उठाये,और भली प्रकार सीधा खड़े हो जाने के बाद यह दुआ पढ़े : ((रब्बना व लकल-हम्दो हम्दन कसीरन तय्येबन मुबारकन फ़ीहे मिलअस-समवाते व मिलअल अरज़े, व मिलआ मा बैनहुमा व मिलआ मा शेता मिन शैइन बादो))"ऐ हमारे प्रभु ! तेरे ही लिए सम्पूर्ण प्रशंसा है, अत्याधिक पवित्र प्रशंसा, उसमें बरकत दी गयी है, धरती, आकाशों, उनके बीच और उनके पश्चात जो कुछ चाहे उन सब से भर कर |" परन्तु यदि मुक्तदी (इमाम के पीछे नमाज़ पढने वाला) हो तो रुकूअ से सिर उठाते समय वह उपरोक्त दुआ (रब्बना व लकल-हम्द) अन्त तक पढ़े|
फिर अल्लाहु अकबर कहते हुए सजदः में जाये और सजदः की स्थिति में अपने बाज़ूओं (भुजाओं) को अपने पहलू से और दोनों जांघो को पिंडली से अलग रखे, स्पष्ट रहे कि सजदः सात अंगों पर होना चाहिए, -नाक के साथ माथा (ललाट) पर -दोनों घुटनों - दोनों पैर की अंगुलियों के भीतरी भाग (पंजों) पर - और सजदः में तीन या तीन से अधिक बार यह पढ़े :((सुब्हान रब्बीअल-आला)) "पवित्र है मेरा उच्चय प्रभु"इस दुआ के अतिरिक्त भी जो दुआ चाहे अधिक से अधिक पढ़े|
फिर "अल्लाहु अकबर" कहते हुए अपना सिर उठाये और दाहिने पैर को खड़ा करके अपने बायें पैर पर बैठ जाये, अपने दोनों हाथों को अनपे दोनों जांघों और घुटनों पर रखे और यह दुआ पढ़े : ((रब्बिग फ़िरली वरहमनी व अफ़िनी वरज़ुक़नी वहदिनी वजबुरनी))"ऐ मेरे प्रभु ! मुझे क्षमा कर दे, मेरे ऊपर दया कर, मुझे माफ़ कर दे, मुझे जीविका दे, मुझे सन्मार्ग दे, मेरे घाटे को पूरा कर दे|" फिर "अल्लाहु अकबर"कहते हुए दूसरा सजदः करे और जिस प्रकार पहले सजदः में किया था उसी प्रकार करे, इसके साथ ही उसकी पहली रकअत पूरी हो गई| फिर दूसरी रकअत के लिए "अल्लाहु अकबर" कहते हुए खड़ा हो जाये| फिर सूरह फ़ातिहा और कुछ क़ुरआन पढ़कर रुकूअ में जाये, रुकूअ से (सिर) उठाये, उसके पश्चात दो सजदः करे और वैसा करे जैसा कि पूर्ण रूप से पहली रकअत में किया था| दूसरे सजदः से उठने के बाद उसी प्रकार बैठ जाये जिस प्रकार दोनो सजदः के बीच बैठा था और तश्ह्हुद की दुआ पढ़े जो यह है : हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे, मैं साक्षी देता हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उस के रसूल हैं। फिर यदि नमाज़ दो रकअत वाली है जैसे फज्र की नमाज़, जुमुआ की नमाज़ और ईद की नमाज़, तो इस स्थिति में अपनी जगह बैठा रहे और "अत्तिहियात" पूरी पढने के पश्चात दरूद शरीफ़ पढ़े : हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी आल की उसी प्रकार से प्रशंसा कर जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी आल की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनकी आल पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर जिस प्रकार से तूने इबराहीम एवं उनकी आल पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। इस स्थिति में चार वस्तुओं से अल्लाह की शरण मांगे और यह दुआ पढ़े : ((अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ोबिका मिन अज़ाबे जहन्नमा व मिन अज़ाबिल कब्र, व मिन फित्नतिल मह्या वल ममाते व मिन फित्नतिल मसीह अ अद्दज्जाल))"हे अल्लाह मैं तेरी शरण चाहता हूँ, नरक के दण्ड से और कब्र के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फितने से, और मसीह दज्जाल के फितने से|" फिर चाहे फ़र्ज़ (अनिवार्य) नमाज़ हो अथवा नफ़िल (इज्छुक) संसार और परलोक की भलाई से सम्बन्धित जो भी दुआ हो मांगे| फिर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह" कहते हुए दाहिने ओर सलाम फेरे और फिर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह" कहते हुए बायें ओर सलाम फेरे|
यदि नमाज़ तीन रकअत वाली हो जैसे मगरिब की नमाज़, या चार रकअत वाली हो, जैसे ज़ुहर, अस्र और इशा की नमाज़ें तो प्रथम तश्ह्हुद के बाद "अल्लाहु अकबर" कहते हुए खड़ा हो जाये, फिर केवल सूरह फ़ातिहा पढ़े और उसी प्रकार रुकूअ एवं सजदः करे जिस प्रकार प्रथम दो रकअत में किया था, फिर इसी प्रकार चौथी रकअत के लिए करे, और सजदः समाप्त कर लेने के बाद "तवर्रुक" करते हुए बैठ जाये अर्थात सीधा (दाहिना) पैर खड़ा रखकर उल्टे (बायें) पैर को उसके निचे से निकाल ले और नितम्ब (सुरिन) को धरती पर रखकर बैठ जाये और मगरिब की नमाज़ में तीसरी रकअत और ज़ुहर, अस्र और इशा में चौथी रकअत के पश्चात अंतिम तश्ह्हुद करे, उसमें तश्ह्हुद की दुआ पढ़े, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद भेजे और यदि चाहे तो दुआ करे, फिर दायें और बायें ओर सलाम फेरे, जैसाकि वर्णन हुआ|
इस प्रकार उसकी नमाज़ पूरी हो गई|
जमाअत के साथ नमाज़|
जमाअत के संग नमाज़ पढ़ना अकेले नमाज़ पढ़ने के 27 गुणा अधिक उत्तम है।
जैसा कि सहीह बुखारी में हदीस है,अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रिवायत किया है| और एक अन्य हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ब्यान फ़रमाया: "मैंने संकल्प किया है कि जमाअतखाड़ी करने आदेश दे दूँ फिर उन लोगों के पास जाऊं जो अपने घरों में रह जाते हैं और नमाज़(जमाअत) में उपस्थित नहीं होते और उनके घरों को जला दूँ|" इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। इसलिए यदि जमाअत से नमाज़ पढने को छोड़ देना महापाप न होता तो नबीसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके घरो को जलादेने की धमकी न देते| "और नमाज़ स्थापित करो, एवं ज़कात दो, और रुकुल करने वालें के साथ रुकुल करो (झुक जाओ)| इस आयत करीम से ज्ञात हुआ कि मुसलमानों के साथ जमाअत से नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है|
जुमुआ की नमाज़ :
इसलाम धर्म संग्र्हता एवं एकत्रता को पसंद करता है और उसकी ओर आमन्त्रण देता है|इसके विपरीत वह गुटबन्दी और अलग अलग रहने को अप्रिय जनता है और उस से घृणा करता है|मुसलमानों के बीच परिचय कराने,एकत्र होने,प्रेम व्यवहार करने के लिए उसने कोई अवसर नहीं छोड़ा,बल्कि उसकी ओर बुलाया और आदेश दिया है|
जुमुआ का दिन मुसलमानों के लिए ईद(पर्व)का दिन है,उस दिन अल्लाह की याद और उसकी प्रशंसा के लिए चलकर आते हैं,और अल्लाह घरों (मस्जिदों) में संसार के सारे झमेलों को छोड़कर एकत्र होते हैं ताकि अल्लाह के लिए एक अनिवार्य नमाज़ पढ़ सकें और जुमुआ के खुतबे में जो सप्ताहिक पाठ है विद्वानों की नसीहतों और खतीबों के उपदेशों को सुन सकें| इस खुतबे में खतिब(भाषण देने वाला) अल्लाह की तौहीद (उद्वैत )को श्रोताओं के दिल में बिठाता है,उनके दिलों में अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रेम को उभरता है,उनकी आज्ञा पालन का उपदेश देता है,उनके हृदयों को खुतबा के द्वारा गरमाता है| अल्लाह तआला का फ़रमाते है : "हे ईमान वालो ! जुमुआ के दिन (शुक्रवार को) नमाज़ की अज़ान दी जाये तो तुम अल्लाह की याद की ओर शीघ्र आ जाया करो तथा क्रय-विक्रय छोड़ दो, यह तुम्हारे पक्ष को अति उत्तम है यदि तुम जानते हो| फिर जब नमाज़ हो जाये तो धरती पर फ़ैल जाओ तथा अल्लाह की कृपा को खोजो, तथा अल्लाह का अत्यधिक वर्णन करो ताकि तुम सफ़लता प्राप्त कर सको| (अल-जुमुआ:9,10) जुमुआ की नमाज़ प्रत्येक उस मुसलमान पुरुष पर अनिवार्य है जो प्रौढ़ (बालिंग) हो, आज़ाद हो और यात्रा में न हो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस नमाज़ को हमेशा पढ़ा और उसके छोड़ने वालों पर सख्ती की-आप ने फ़रमाया : "लोग जुमुआ की नमाज़ छोड़ने से रुक जायें वरना अल्लाह उनके ह्रदय (दिलों) पर मुहर लगा देगा फिर वे अचेत रहने वालों में हो जायेंगे|" इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो व्यक्ति तीन जुमुआ सुस्ती के कारण छोड़ दे अल्लाह (तआला) उसके ह्रदय पर मुहर लगा देगा| जुमुआ की नमाज़ दो रकअत है, जिस को एक मुसलमान मुसलमानों की जमाअत के साथ इमाम का अनुसरण करते हुए पढता है|
जुमुआ की नमाज़ जमाअत के बीना सहीह नहीं है, इसमें सभी मुसलमान एकत्र होते हैं, उनका इमाम उनको खुत्बा देता है, उन्हें नसीहत करता है और उन्हें सहीह मार्ग दिखाता है, खुत्बा के मध्य बात चित करना हराम (अवैध) है, यहाँ तक कि यदि आप ने अपने साथी से कहा कि "चुप रहो" तो आपने गलत किया|
यात्री की नमाज़
अल्लाह तआला ने कहाः "अल्लाह (तआला) तुम्हारे साथ सरलता चाहता है कठोरता की इच्छा नही रखता | (अल-बकरा:-185)
चूँकि इसलाम सरलता और आसानी का धर्म है इसलिए अल्लाह किसी आत्मा पर उसके सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डालता,और उसे ऐसा आदेश नहीं देता जिसके पालन की वह क्षमता न रखता हो,चूँकि यात्रा में कष्ट और परेशानी की संभावना अधिक होती है इसलिए अल्लाह तआला ने इसमें दो चीजों की छुट दी है|
प्रथम :नमाज़ कस्र करना: कस्र का अर्थ यह है कि चार रकअत वाली नमाज़ दो रकअत पढ़ी जाए,इसलिए यदि तुम यात्रा में हो तो ज़ुहर अस्र और इशा की नमाज़ चार रकअत की बजाए दो रकअत पढो,हां मगरिब और फज्र की नमाज़ें अपनी स्थिति पर रहेंगी उनमे क़स्र नहीं है| नमाज़ का क़स्र करना यह अल्लाह की ओर से अपने बन्दों लिए एक छुट और आसानी है और अल्लाह इस बात को पसंद करता है कि जिस प्रकार उसके आदेश का पालन किया जाये उसी प्रकार उसकी ओर से छुट को भी स्वीकार किया जाये| यात्रा के सम्बंध में मोटर से,रेल से,वयुयान से,ज जहाज़ से,चौपायों द्वारा और पैदल यात्रा करने के मध्य कोई र नहीं,बल्कि जिस यात्रा को भी यात्रा कहा जाए उसमे नमाज़ क़स्र की जासकती है जब तक कि वह पाप की यात्रा न हो| द्वितीय:दो नमाज़ों को इकठ्ठा करना ; यात्री के लिए अनुमति है कि वह एक हि समय पर दो नमाज़ों को एक साथ इकठ्ठा करके पढ ले,इस आधार पर वह ज़ुहर और अस्र के मध्य,इसी प्रकार मगरिब और इशा के मध्य नमाज़ को इकठ्ठा करेगा और दोनों नमाज़ों का समय एक होगा जिसमे दोनों नमाजें ऐक दूसरे से अलग अलग पढ़ी जाएंगी,अर्थात पहले ज़ुहर की नमाज़ पढ़ेगा फिर उसके तुरंत पश्चात् अस्र की नमाज़ पढ़ेगा, अथवा मगरिब की नमाज़ पढ़ेगा और फिर उसके पश्चात् इशा की नमाज़ पढ़ेगा| यह स्पष्ट रहे कि दो नमाज़ केवल ज़ुहर और अस्र के बीच,इसी प्रकार मगरिब और इशा के बीच इकठ्ठी करेंगे,इसलिए अन्य समय जैसे फज्र और ज़ुहर के बीच या अस्र और मगरिब के बीच दो नमाज़ों को इकठ्ठा करना वैध(जायज़) नहीं|
मसनून दुआयें :
नमाज़ी के लिए मसनून तरीका यह है कि वह नमाज़ से सलाम फेरने के बाद तीन बार"असतगफिरुल्लाह" कहे और यह दुआ पढ़े : "अल्लाहुम्मा अन्तस्सालम व मिन्कस्सलाम तबारकता या ज़ल जलाल वल इकराम,ला इलाहा इल्लाहू वह्दहू ला शारिका लहू लहुल मुल्को व लाहुल हम्दु,व हुवा अला कुल्ल्ले शैइन क़दीर,अल्लाहुम्मा लमानिआ लिमा आतैता व ला मोतिया लिमा मनाता वला यन्फउ ज़ल्जद्दे मिन्कल्जद्द" "हे अल्लाह! तू सलामती वाला है,और तुझ से सलामती है,ऐ महानता एवं इज्ज़त वाले तू बरकत वाला है,अल्लाह के अलावा कोई इबादत के लायक नहीं है, वह एक है, उसका कोई साझी नहीं, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए सब प्र्शंसा है और वह हर बात पर ताकत रखता है । ऐ अल्लाह ! जो कुछ तू दे, उसको रोकने वाला कोई नहीं और जो चीज़ तू रोक ले, उसका देने वाला कोई नहीं,और धनि को उसका धन तेरे प्रकोप से कोई लाभ न देगा"(बुखारी एवं मुस्लिम)। फिर (33) तैंतीस बार "सुब्हानल्लाह" (33) तैंतीस बार "अलहम्दु लिल्लाह" और (33) तैंतीस बार "अल्लाहु अकबर" कहे : और सौ की गिनती इस दुआ से पूरी करे : "अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी पूजने के योग्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है, वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है|" उसके बाद आयतुल कुर्सी, सूरह अल-इख्लास, सूरह अल-फ़लक और सूरह अन-नास पढ़े| फज्र और मगरिब की नमाज़ों के पश्चात उपरोक्त सूरतों को तीन-तीन बार पढना उत्तम है, इसी प्रकार मगरिब एवं फज्र की नमाज़ों के बाद उपरोक्त दुआओं को पढने के पश्चात दस बार इस दुआ का पढना मुस्तहब (उत्तम) है| "अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी पूजने के योग्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है, वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है|" स्पष्ट रहे
कि इन सभी दुआओं का पढना सुन्नत है फ़र्ज़ (अनिवार्य) नहीं|
सुन्नते मूअक्क्दह :
प्रत्येक मुस्लिम पुरुष एवं स्त्री के लिए उत्तम है कि वह यात्रा में न होने की स्थिति में बाहर रकअत सुन्नतों की अवश्य सुरक्षा करे| जुहार की नमाज़ से पूर्व चार रकअत और दो रकअत नमाज़ के बाद, मगरिब के बाद दो रकअत, इशा के बाद दो रकअत और फज्र की नमाज़ से पूर्व दो रकअत| उम्मुल मोमिनीन उम्मे हबीब -रमला बिन्ते अबी सुफियान रज़ी अल्लाहु अन्हुमा कहती हैं: कि मैंने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते हुए सुना :"जो मुसलमान बन्दा अल्लाह के लिए प्रतिदिन अनिवार्य के अतिरिक्त बाहर रकअत नफ़िल (इच्छुक) नमाज़ पढता है अल्लाह उसके लिए जन्नत (स्वर्ग) में घर बनाता है, या जन्नत में उसके लिए घर बनाया जाता है| इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। परन्तु यात्रा में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़ुहर, मगरिब और इशा की सुन्न्तें छोड़ देते थे और केवल फज्र की सुन्न्तें एवं वित्र की नमाज़ों का ख्याल रखते थे और हमारे लिए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जीवन में उत्तम आदर्श है जैसाकि अल्लाह ने बयान फ़रमाया : "तुम्हारे लिए अवश्य अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है|" (अल-अहज़ाब:21) और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : "तुम उसी प्रकार नमाज़ पढो जिस प्रकार मुझे नमाज़ पढ़ते हुए देखते हो|"
और अल्लाह ही तौफ़ीक देने वाला है और दरूद व सलाम मुहम्मद एवं उनके परिवार और साथियों पर हो|
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