يومي الأول في الإسلام

يومي الأول في الإسلام

इस्लाम में मेरा पहला दिन

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इस्लाम में मेरा पहला दिन

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से, जो बड़ा दयालु एवं अत्यंत दयावान है।

प्राक्कथन

सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को सारे संसारों के लिए रहमत बनाकर भेजा। और मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पुज्य नहीं है, उसका कोई साझी नहीं है, वह पहले वाले एवं बाद वाले, सब का माबूद व उपास्य है। तथा मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के बंदे एवं उसके रसूल हैं। वह नबियों एवं रसूलों की श्रृंखला की अंतिम कड़ी हैं। क़यामत तक के लिए उनपर दरूद एवं बहुत सारी शांति अवतरित हो। इसके पश्चात् कहना है कि :

सभी लोग ख़ुशियों की तलाश में रहते हैं। कुछ लोग धन इकट्ठा करना अपनी ख़ुशी समझते हैं, कुछ लोग नाम के पीछे भागते हैं, कुछ लोग उच्च पदों की प्राप्ति को अपना सौभाग्य मानते हैं और कुछ लोग जीवन के और सुखों को ढ़ूँढ़ने में लगे रहते हैं। परन्तु हकीकत यह है कि जिन लोगों को ये चीजें मिलीं, उनमें से कई को वह खुशी नहीं मिली, जो वे चाहते थे।

वह ख़ुशी हमें उस समय तक प्राप्त नहीं हो सकती है, जब तक कि हम उस सत्य धर्म के मार्ग पर न चलें, जिसको हमारे सृष्टिकर्ता ने हम सब मानव के लिए चुना है, उसके रंग में न रंग जाएँ तथा उसकी शिक्षा के अनुसार जीवन व्यतीत न करें। हम केवल इसी से दुनिया में अच्छा जीवन व ख़ुशी, एवं प्रलोक में अनंतकाल के लिए प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं। अल्लाह तआला कहता है :

"जो भी स्वयं को अल्लाह की आज्ञा के पालन के लिए समर्पित कर देगा तथा सदाचारी होगा, तो उसके पालनहार के पास उसका प्रतिफल है, और उनपर कोई भय नहीं होगा और न वे उदासीन होंगे।"

[सूरा अल-बक़रा: 112]

तथा कहता है :

"जो भी सदाचार करेगा, वह नर हो अथवा नारी और वह ईमान वाला हो, तो हम उसे स्वच्छ जीवन व्यतीत कराएँगे और उन्हें उनका पारिश्रमिक उनके उत्तम कर्मों के अनुसार अवश्य प्रदान करेंगे।"

[सूरा अल- नह्ल: 97]

मेरे प्यारे भाई! आपने इस्लाम ग्रहण करके अपना पाँव हिदायत, रोशनी, ख़ुशी एवं सौभाग्य के पथ पर डाल दिया है। आपको इस बात का विश्वास होना चाहिए कि इस्लाम में आपका पहला दिन आपके जीवन के दूसरे दिनों की तरह नहीं है। बल्कि यह दिन आपके नया जन्म लेने की तरह है।

जिस दिन आप पैदा हुए थे, तो आप अपनी माता के गर्भ के अंधकार और तंगी से निकल कर संसार के प्रकाश और विशालता में आए थे। उसी प्रकार आज आप कुफ़्र के अंधकार से निकल कर ईमान के प्रकाश, तथा भ्रष्टता की संकीर्णता से निकल कर हिदायत की विशालता की ओर आए हैं।

''तो क्या, जो आदमी निर्जीव था, फिर हमने उसे जीवन प्रदान किया, तथा उसके लिए प्रकाश बना दिया, जिसके उजाले में वह लोगों के बीच चल रहा है, उस जैसा हो सकता है, जो अंधेरों में घेरा हुआ हो और उससे निकल नहीं पा रहा हो''?

[सूरा अल-अन्आम: 122]

आपका इस्लाम में हार्दिक स्वागत है। आपकी सेवा में इस छोटी-सी पुस्तक को पेश कर रहा हूँ, जो महत्वपूर्ण मामलों एवं महान उसूलों व नियमों को शामिल है, जिनको आपके इस्लाम में प्रवेश के पहले दिन ही जानना अनिवार्य है।

प्रवेश :

इस्लाम ही सत्य धर्म है :

इस्लाम धर्म ही वह सत्य धर्म है, जिसको अल्लाह ने सभी लोगों के लिए पसंद किया है। यही वह धर्म है, जिसके सिवा अल्लाह कोई और धर्म स्वीकार नहीं करेगा। अल्लाह तआला कहता है :

''अल्लाह के निकट सबसे प्रिय धर्म इस्लाम है।''

[सूरा आल-ए-इमरान : 19]

तथा सर्वोच्च व महानतम अल्लाह कहता है :

''और जो इस्लाम के अलावा कोई और धर्म तलाश करे, तो वह उससे हरगिज़ स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा।''

[सूरा आल-ए-इमरान: 85]

जो इस्लाम धर्म ग्रहण करता है एवं उसपर सख़्ती से अमल करता है, वह प्रकाश एवं मार्गदर्शन के मार्ग पर चलता है। उस अति स्पष्ट सीधे रास्ते पर चलता है, जो उस अल्लाह तक पहुँचाता है, जिसने इंसान को पैदा किया एवं इस दुनिया में उसे जीवन प्रदान किया।

इस्लाम धर्म इस दुनिया में मानवीय स्थिति की बेहतरी, उसके लिए शांति एवं समृद्धि लेकर आया है। इसी प्रकार मरने के बाद परलोक में उसकी ख़ुशी एवं कामयाबी का गारंटर एवं प्रत्याभूतिदाता है। जब अल्लाह उसे जन्नत में प्रवेश कराएगा, तो वह वहाँ की सदैव के लिए रहने वाली नेमतों का आनंद उठाएगा।

हर इंसान का कर्तव्य है कि वह सत्य धर्म की खोज करे, जो कि इस्लाम है। उसको जाने, उसपर विश्वास करते हुए उसे ग्रहण करे एवं उसकी शिक्षाओं तथा आदेशाों का पालन करे, ताकि वह दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयों को पा सके।

एक व्यक्ति इस्लाम में कैसे प्रवेश करता है?

जब कोई व्यक्ति इन शब्दों ''أشهد أن لا إله إلا الله، وأن محمدا رسول الله'' (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पुज्य नहीं है एवं मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं) को सच्चाई, विश्वास एवं उनके अर्थ को जानते हुए कहता है, अर्थात उनके अर्थ को जानते हुए, उस पर विश्वास रखते हुए तथा उसके कहने वाले को सत्य मानते हुए कहता है, वह इस्लाम में प्रवेश कर जाता है। इसके बाद उसपर अनिवार्य होता है कि इस्लाम के शेष आदेशों को जाने एवं उनपर यथाशक्ति अमल करे। वह जितना ज़्यादा अमल करेगा, उतना ही उसका ईमान बढ़ता जाएगा एवं अल्लाह के निकट उसका प्रतिफल बड़ा होता जाएगा।

इन दोनों गवाहियों ''अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं'', का अर्थ :

आप ''अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं'' कहकर इस्लाम में प्रवेश तो कर गए, परन्तु क्या आप इसके अर्थ की वास्तविकता को जानते हैं?

पहली गवाही ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' का अर्थ इस बात का विश्वास रखना एवं स्वीकृति प्रदान करना है कि एकमात्र पूज्य अल्लाह के कोई भी पूज्य नहीं है, जो इबादत एवं अनुसरण का हक़दार हो। अल्लाह पाक एवं महान है, जो इस संसार का सृष्टिकर्ता है एवं उसके मामलों को तय करता है।

दूसरी गवाही ''मुहम्मदुर रसूलुल्लाह'' का अर्थ इस बात का विश्वास रखना एवं स्वीकृति प्रदान करना है कि मुहम्मद अल्लाह के बंदे एवं पूरी मानवता की ओर उसके अंतिम रसूल हैं। फिर उन्होंने जो आदेश दिया है उसका पालन किया जाए, जिसकी ख़बर दी है उसपर विश्वास किया जाए, जिससे रोका है, उससे रुका जाए एवं अल्लाह की उसी प्रकार से इबादत की जाए, जिस प्रकार से उन्होंने तय किया है।

आपको इस्लाम मुबारक हो :

मेरे प्रिय भाई! जिस दिन आपने इस्लाम में प्रवेश किया वह आपका अब तक का सबसे अच्छा दिन है। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सही हदीस़ से स़ाबित है, उन्होंने कहा है :

''इस्लाम अपने पूर्व के सभी गुनाहों को मिटा देता है।''

इसे ''मुस्लिम'' ने रिवायत किया है।

अर्थात आपके इस्लाम ग्रहण करने के पूर्व आपने जो भी कुफ़्र, बुराई, गुनाह या पाप किया है, अल्लाह की ओर से उसकी माफ़ी के शुभ संदेश को स्वीकार करें। आज आप गुनाह से पाक हो गए हैं एवं अपने जीवन का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। आज आप गुनाहों से उसी प्रकार पाक हैं, जिस प्रकार आपके जन्म वाले दिन थे। आप एक नया जीवन शुरू कर रहे हैं, जो भलाई से ओत-प्रोत है एवं प्रकाश, ख़ुशी तथा समृद्धि के मार्ग पर बढ़ता है।

इस्लाम की नेमत की ख़ुशी :

वह ख़ुशी बहुत बड़ी है, जिसे आपने इस्लाम ग्रहण करते समय अनुभव किया है और वह जीवन भर आपके साथ जुड़ा रहना चाहिए। सत्य मार्ग की नेमत सबसे बड़ी नेमत एवं सबसे बड़ा उपकार है, जिसे अल्लाह अपने बंदे पर करता है। यह हवा, पानी, खाने, पीने, धन, पद एवं शान व शौकत से भी बड़ी है। यह किसी भी चीज़ से बड़ी नेमत है। अतः हम क्यों न आनन्दित हों?! महान अल्लाह कहता है :

''आप कह दें कि यह (क़ुरआन) अल्लाह का अनुग्रह और उसकी दया है। अतः लोगों को इससे प्रसन्न हो जाना चाहिए और यह उससे उत्तम है, जो वे एकत्र कर रहे हैं।''

[सूरा यूनुस : 59]

जरूरी है कि आप, अपने ऊपर अल्लाह के अनुग्रह का अनुभव करें कि उसने इस्लाम की नेमत के लिए आपको लाखों लोगों में से चुना है।

''अल्लाह जिसे सुपथ दिखाना चाहता है, तो उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है।''

[सूरा अल-अन्आम : 125]

इस बहुत बड़ी एवं महान नेमत के लिए बहुत धन्यवाद की आवश्यकता है। आप पर अनिवार्य है कि आप सत्य धर्म का मार्ग दिखाने के लिए अल्लाह की अधिक से अधिक प्रशंसा करें, उसकी तारीफ़ करें तथा उसका धन्यवाद करें।

जिन नियमों का जानना आवश्यक है :

आपके इस्लाम में प्रवेश करने के बाद, कुछ चीज़ों का जानना और सीखना जरूरी है, जैसा कि उन तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर का जानना आवश्यक है, जो मरने के बाद हर इंसान से पूछे जाते हैं, जिनकी बुनियाद पर ही शाश्वत भाग्य निर्धारित होता है, या तो जन्नत या जहन्नम। वे तीन प्रश्न इस प्रकार हैं :

आपका रब कौन है?

आपका धर्म किया है?

आपका नबी कौन है?

प्रथम आधार : आपका रब कौन है?

मेरा रब अल्लाह है।

मुसलमान का अक़ीदा है कि उसका रब अल्लाह है, जिसने इस संसार को उसकी सभी चीज़ों के साथ पैदा किया है, तथा इंसान की रचना भी उसी ने की है।

जब हम इस विशाल ब्रह्मांड, एवं इसके विशाल आकाशगंगाओं तथा अरबों ग्रहों और तारों के बारे में सोचते हैं; इसी प्रकार जब हम इस धरती के बारे में विचार करते हैं, जिसमें हम जिंदा हैं, तथा इसमें जो समतल मैदान, पहाड़, भूमि, समुद्र और नदियाँ हैं, इसमें जो गहरे समुद्र, रेगिस्तान और जंगलों में से ब्रह्मांड के अजूबे हैं, तथा जब हम चिंतन करते हैं मनुष्य की विचित्र रचना पर तथा उसके अलावा दूसरी सृष्टियों पर, तो हमारा सोच व विचार एक न झुठला सकने वाले परिणाम तक ले जाता है कि इसका अवश्य ही कोई महान, ज्ञानी, प्रभावशाली एवं जानकार सृष्टिकर्ता है, जिसने इस ब्रह्मांड को निराले ढंग से पैदा किया है। यह संभव ही नहीं है कि यह सभी सृष्टियाँ बिना किसी पैदा करने वाले के अपने आप अस्तित्व में आ जाएँ। उसी सृष्टिकर्ता ने उन्हें पैदा किया है, उनके मामलों को संगठित किया है एवं उनको इस तरह बनाया है कि जिसे देख कर बुद्धि दंग रह जाती है। इस बात को महान अल्लाह ने हर बुद्धि वाले के लिए स्पष्ट रूप से बयान किया है, जब उसने कहा है :

"क्या यह लोग बिना किसी पैदा करने वाले के स्वयं पैदा हो गए हैं या यह स्वयं उत्पत्तिकर्ता (पैदा करने वाले) हैं?"

[सूरा अल-तूर: 35]

न ही इस ब्रह्मांड ने स्वयं अपने आपको उत्पन्न कर लिया है और न ही यह किसी पैदा करने वाले के बिना अस्तित्व में आ गया है। यह बुद्धिजीवियों के निकट असंभव है।

केवल अल्लाह ही इबादत का हक़दार है :

यह रब एकमात्र पूज्य है जो पूजा के योग्य है, इसलिए कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ है वही उनका सृष्टिकर्ता एवं प्रबंधन करने वाला है, तथा उन्हें आजीविका देने वाला है। उसी ने सभी इंसानों को पैदा किया है, उन्हें इस धरती पर ठहराया है एवं जीवन के साधन प्रदान किए हैं। अल्लाह तआला कहता है :

''वही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है, उसके अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं। वह प्रत्येक वस्तु का उत्पत्तिकार है। अतः, उसी की इबादत करो तथा वही प्रत्येक चीज़ का अभिरक्षक है।''

[सूरा अल- अन्आम: 102]

सभी इंसान के लिए अनिवार्य है कि वे एक अल्लाह की इबादत करें एवं उसकी इबादत व पूजा में किसी को साझी न ठहराएँ। महान अल्लाह कहता है :

"हे लोगो! केवल अपने उस पालनहार की इबादत (वंदना) करो, जिसने तुम्हें तथा तुमसे पहले वाले लोगों को पैदा किया। इसी में तुम्हारा बचाव है।"

[सूरा अल-बक़रा : 21]

तथा अल्लाह कहता है :

''अल्लाह की इबादत करो और किसी को उसका साझी मत बनाओ।''

[सूरा निसा : 36]

नबियों की ओर से एकेश्वरवाद का आह्वान :

इस मामले के अत्यंत स्पष्ट होने के बावजूद महान अल्लाह ने अपने अनुग्रह, मेहरबानी एवं हम पर दया के तौर पर हमको पैदा करके जीवन में भटकने के लिए नहीं छोड़ दिया, बल्कि हमारी ओर रसूलों को भेजा एवं उनके साथ पवित्र ग्रन्थों को उतारा, जो हमें अल्लाह के बारे में बताते एवं उसकी ओर हमारी रहनुमाई करते हैं। अल्लाह ने कहा है :

''वास्तव में, हमने आपको सत्य के साथ शुभ सूचक तथा सचेतकर्ता बनाकर भेजा है, और कोई ऐसा समुदाय नहीं, जिसमें कोई सचेतकर्ता न आया हो।''

[सूरा फ़ातिर: 24]

मानव पिता बाबा आदम (उनपर शांति हो) एवं सभी नबी, जैसे नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा इत्यादि नबी और हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम -तक सभी एक महान आधार पर सहमत हैं। और वह है लोगों को एक अल्लाह पर ईमान लाने, उसी एक की इबादत करने, उसके अलावा किसी भी दूसरे पूज्य, जैसे मानव, पत्थर, पेड़, सितारे, ग्रह इत्यादि की पूजा को त्याग देने की ओर बुलाना। अल्लाह तआला कहता है :

"हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा कि अल्लाह की इबादत करो और उसके अलावा सभी पूज्यों से दूर रहो।"

[सूरा अन-नह्लन: 36]

तथा महान अल्लाह कहता है :

''और नहीं भेजा हमने आपसे पहले कोई भी रसूल, परन्तु उसकी ओर यही वह्यी (प्रकाशना) करते रहे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत (वंदना) करो।''

[सूरा अल-अंबिया: 25]

अल्लाह के नामों एवं गुणों का बयान :

अल्लाह के उत्तम नाम एवं उच्च गुण हैं। जब हम उनको जान जाएँगे तो अपने रब के बारे में हमारी जानकारी में बढ़ोतरी होगी। तथा उसकी मुहब्बत एवं डर में वृद्धि होगी और उसके अनुग्रह व दया के लिए हमारी आशाएँ बढ़ जाएँगी। अल्लाह तआला कहता है :

''वही अल्लाह है, नहीं है कोई वंदनीय (पूज्य) परन्तु वही। उसी के उत्तम नाम हैं।''

[सूरा ताहा : 8]

अल्लाह के वे नाम जिनसे उनके गुण साबित होते हैं, बहुत हैं। जैसा कि :

रहमान एवं रहीम। अल्लाह तआला ने कहा है :

''तुम सब का एक ही पूज्य है, उसके अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं, वह रहमान (बहुत दया करने वाला) एवं रहीम (अति कृपालु) है।''

[सूरा अल-बक़रा : 163]

वह बहुत बड़ा एवं व्यापक दया वाला है, जिसकी महानता एवं व्यापक्ता हर वस्तू एवं हर प्रकार की सृष्टियों को शामिल है। उसकी कृपा दुनिया में उसकी प्रत्येक सृष्टि को घेरे हुई है, जैसे जानवर और मानव, मुसलमान हो या गैर मुसलमान। अल्लाह तआला कहता है :

''और मेरी दया हर वस्तु को शामिल है।''

[सूरा अल-आराफ़: 156]

वह सभी को खिलाता है, उन्हें स्वास्थ्य, खाना एवं औलाद इत्यादि देता है। जहाँ तक परलोक में उसकी दया की बात है, तो यह केवल उनके मोमिन बंदों के लिए होगी, जिन लोगों ने उसके नबियों एवं रसूलों का अनुसरण किया। उन्हीं लोगों के लिए सदैव की ख़ुशी तक पहुँचाने वाली मुकम्मल रहमत होगी।

उन्हीं गुणों में से एक गुण ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) है। अल्लाह कहता है :

"अल्लाह सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है।''

[सूरा अल-ज़ुमर : 62]

उसी ने आकाशों एवं धरती, तथा उनके बीच जो कुछ है, उनको पैदा किया है। सब कुछ उसी ने बनाया है कण से लेकर आकाशगंगा तक, बल्कि उससे भी बढ़कर। उनको अपने ज्ञान, शक्ति एवं क्षमता के अनुसार अच्छे ढंग से बनाया है। इसी कारणवश आप उसकी रचना में किसी प्रकार की कमी या असंतुलन नहीं देखेंगे।

उन्हीं में से एक गुण ग़फ़ूर (बहुत अधिक क्षमा करने वाला) है। जो सच्ची तौबा करने वाले के सभी गुनाह क्षमा कर देता है। चाहे उसके पिछले कर्म कैसे भी क्यों न हों। बल्कि कभी-कभी वह अपनी ओर से दया करके बहुत सारे लोगों को माफ़ कर देता है, सिवाय उसके जिसने महान अल्लाह की इबादत में किसी को साझी ठहराया हो। इस लिए कि वह तौबा के बगैर शिर्क को माफ़ नहीं करता है। अल्लाह ने अपनी सभी सृष्टियों पर माफ़ी पाने का द्वार खोल दिया है; तौबा, क्षमायाचना, ईमान, नेक काम तथा अल्लाह की सृष्टि के साथ अच्छा व्यवहार करने के द्वारा। महान अल्लाह ने कहा है :

''और मैं निश्चय ही बड़ा क्षमाशील हूँ उसके लिए, जिसने क्षमा याचना की तथा ईमान लाया और सदाचार किया फिर सुपथ पर रहा।''

[सूरा अल-नज्म: 82]

उन्हीं गुणों में से एक गुण रज़्ज़ाक़ (आजीविका देने वाला) है। पाक अल्लाह बादशाह है। उसके हाथ में हर चीज़ की चाबी है। वह बेनियाज़ (और धनवान) है एवं यह उसका उपकार है कि वह बहुत अधिक देने वाला है। जितनी भी सृष्टि एवं रचना है, सबके खाने की ज़िम्मेदारी उसी पर है। अल्लाह ने कहा है :

''और मैंने जिन्नात तथा मनुष्य को केवल मेरी इबादत के लिए पैदा किया है।''

न मैं उनसे जीविका चाहता हूँ, न मेरी यह चाहत है कि वे मुझे खिलाएँ।

अल्लाह तो स्वयं ही सब को जीविका प्रदान करने वाला और महान शक्ति वाला है।''

[सूरा अल-ज़ारियातः 56-58]

उन्हीं गुणों में से एक गुण ''सलाम'' है। अर्थात जो हर प्रकार की कमियों एवं अपूर्णताओं से पवित्र है। जिसके लिए पूर्णता, महिमा और सुंदरता की विशेषताएँ हैं एवं जो अपने बंदों की ओर से बात तथा काम (कथनी एवं करनी) के द्वारा सलाम को सार्वजनिक करने को पसंद करता है। उसका फ़रमान है :

"वह अल्लाह ही है, जिसके अतिरिक्त कोई सच्चा वंदनीय नहीं है। वह सब का स्वामी, पवित्र एवं सलाम (शांति प्रदान करने वाला) है।"

[सूरा अल-हश्र: 23]

उन्हीं गुणों में से एक गुण ''अलीम'' (सब कुछ जानने वाला, सर्वज्ञ) है। अल्लाह ''समीअ'' (सब कुछ सुनने वाला), ''बसीर'' (सब कुछ देखने वाला), एवं ''अलीम'' (सब कुछ जानने वाला) है। उसका ज्ञान प्रत्येक वस्तु को शामिल है। वह जानता है जो कुछ दृश्य है तथा जो कुछ अदृश्य है एवं जो कुछ सीनों में छुपा है। वह जानता है जो कुछ भूतकाल में हुआ, जो वर्तमानकाल में हो रहा है या जो भविष्य में होगा। वह ''रक़ीब'' है, अर्थात बंदों के कामों की ख़बर रखता है। उससे न अनुयायियों का अनुसरण छुपा है और न ही पापियों का पाप, और न ही उसे दुर्बलों की आवश्यकता है एवं न ही उपासना करने वालों की ध्वनियों की। अल्लाह तआला कहता है :

''निश्चय ही अल्लाह हर वस्तु को जानने वाला है।''

[सूरा अल-बक़रा : 231]

वह सारे जहानों का रब पाक एवं पवित्र है, जिसने हर चीज़ को सटीक एवं उत्तम ढंग से पैदा किया है। इस दुनिया की सभी ख़ूबसूरती एवं पूर्णता अल्लाह की पूर्णता की निशानियों में से है।

दूसरा आधार : आपका धर्म किया है?

मेरा धर्म इस्लाम है :

इस्लाम : तौहीद (केवल अल्लाह की इबादत) के माध्यम से अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण करना, आज्ञाकारिता के माध्यम से उस के आदेशों के आगे झुक जाना और बहुदेववाद (शिर्क) तथा बहुदेववादियों से बरी हो जाना।

मुस्लिम वह है जो इस्लाम धर्म को ग्रहण करता है, अपना मामला अल्लाह के हवाले करता है, उसके अस्तित्व एवं उसके एक होने को स्वीकार करता है, उसके आदेशों के सामने झुकता है एवं उसने जिन कामों से रोका है, उनसे रुक जाता है। अल्लाह तआला क़ुरआन में कहता है :

''तथा उस व्यक्ति से अच्छा किसका धर्म हो सकता है, जिसने स्वयं को अल्लाह के लिए झुका दिया, वह एकेश्वरवादी भी हो और एकेश्वरवादी इब्राहीम के धर्म का अनुसरण भी करे?"

[सूरा अल-निसा : 125]

एक अन्य स्थान में कहता है :

"और किस की बात उससे अच्छी होगी, जो अल्लाह की ओर बुलाए तथा सदाचार करे और कहे कि मैं मुसलमानों में से हूँ।"

[सूरा फ़ुस्सिलत : 33]

इस्लाम धर्म की विशेषताएँ :

इस्लाम न्याय का धर्म है : यह क़रीबी एवं दूर वाले, मित्र एवं शत्रु तथा मोमिन एवं काफ़िर सबके साथ न्याय करने का आदेश देता है। अल्लाह तआला कहता है :

''अल्लाह न्याय करने का आदेश देता है।''

[सूरा अल-नह्ल : 90]

महान अल्लाह आदेश पारित करने वाला तथा न्याय करने वाला है, उसके यहाँ किसी पर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा। वह क़यामत के बारे में कहता है :

''आज प्रत्येक प्राणी को प्रतिकार दिया जाएगा, उसके करतूत का। आज कोई अत्याचार नहीं होगा।''

[सूरा ग़ाफ़िर : 17]

इस्लाम दया का धर्म है : अल्लाह तआला कहता है :

"और (हे नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा।"

[सूरा अल-अंबिया : 107]

तथा अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमाते हैं :

''दया करने वालों पर रहमान दया करता है। धरती वालों पर दया करो, आकाश वाला तुम पर दया करेगा।''

इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।

इस्लाम प्रेम, एकजुटता और आत्मीयता का धर्म है : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का फरमान है :

''तुममें से कोई उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक कि अपने भाई के लिए वही पसंद न करे, जो अपने लिए पसंद करता है।''

इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

इस्लाम सहजता का धर्म है : इस्लामी शिक्षा आसानी वाली एवं मुश्किल को ख़त्म करने पर आधारित है। इस वास्तविकता को हर वह व्यक्ति जानता है, जो उसकी शिक्षाओं से अवगत है। अल्लाह तआला कहता है :

"अल्लाह तुम्हारे साथ सरलता चाहता है, कठोरता की इच्छा नहीं रखता।'' [सूरा अल-बक़रा: 185]

एक अन्य स्थान में कहता है :

''अल्लाह तुम लोगों पर कोई परेशानी डालना नहीं चाहता है।''

[सूरा अल-माइदा : 6]

एक अन्य स्थान में कहता है :

''अल्लाह किसी प्राणी पर उसकी क्षमता से अधिक (दायित्व का) भार नहीं रखता है।''

[सूरा अल-बक़रा : 286]

इस्लाम ज्ञान का धर्म है: क़ुरआन की प्रथम आयत जो उतरी, वह यह है :

"अपने पालनहार के नाम से पढ़, जिसने पैदा किया।''

[सूरा अल-अलक़ : 1]

इस्लाम हर मुस्लिम पुरूष एवं महिला को ज्ञान प्राप्त करने एवं उसे अधिकाधिक अर्जित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अल्लाह तआला कहता है :

''आप कहिए, ऐ मेरे रब! मेरे ज्ञान में और अधिकता कर।''

[सूरा ताहा : 114]

शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए उच्च स्थान है। अल्लाह पाक कहता है :

''अल्लाह तुममें से ईमान वालों का, तथा जिन्हें विद्या प्रदान हुआ है, उनकी श्रेणियों को ऊँचा करता है।''

[सूरा अल-मुजादला : 11]

इस्लाम धर्म की वैश्विकता :

इस्लाम एक वैश्विक धर्म है। यह किसी विशेष स्थान के लिए या किसी विशेष समुदाय के लिए नहीं है। यह केवल अरबों का धर्म नहीं है। यह सभी लोगों का धर्म है। महान अल्लाह पवित्र क़ुरआन में अपने नबी को संबोधित करते हुए कहता है :

''आप कह दीजिए कि ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का भेजा हुआ हूँ, जिसकी बादशाही सभी आसमानों और ज़मीन पर है, उसके सिवा कोई उपासना के योग्य नहीं, वही जीवन और मृत्यु देता है, अत: अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके अनपढ़ नबी पर, जो कि अल्लाह पर और उसके आदेशों पर ईमान रखते हैं और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो।''

[सूरा अल-आराफ़ : 158]

न ही यह किसी बीते युग के लिए विशिष्ट है, बल्कि यह आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के नबी बनाए जाने के बाद से क़यामत तक के लिए सच्चा धर्म है। महान अल्लाह ने कहा है :

''और जो भी इस्लाम के सिवा (किसी और धर्म) को अपनाएगा, उसे उसकी तरफ़ से कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह परलोक में घाटा उठाने वालों में से होगा।''

[सूरा आल-ए-इमरान : 85]

इस्लाम एक सम्पूर्ण धर्म है :

- इस्लाम मुस्लिम व्यक्ति, मुस्लिम समाज तथा मुस्लिम उम्मत के हर क्षेत्र के लिए जीवन शैली है, चाहे वह राजनीति हो या अर्थव्यवस्था या समाज इत्यादि।

- इस्लाम एक अक़ीदा (आस्था) है, शरीयत (धार्मिक विधान) है : वह सही आस्थाओं, महान इबादतों, सटीक मामलों, सुन्दर आचरणों और अनुशासित व्यवहारों पर आधारित है।

- इस्लाम की शिक्षाएँ एवं उसके आदेश इंसान का संबंध उसके रब के साथ, इंसान का संबंध उसके अपने आपके साथ, इंसान का रिश्ता दूसरे मानव के साथ यहाँ तक कि जानवरों और निर्जीव वस्तुओं से भी उसका संबंध मज़बूत करती हैं।

- इस्लाम की शिक्षाएँ शरीर एवं आत्मा, दोनों की भलाई से संबंधित हैँ।

संक्षिप्त में यह कहा जा सकता है कि इस्लाम लोक एवं परलोक में इंसान के लिए उसकी भलाई, बेहतरी तथा ख़ुशी का ख़ज़ाना लेकर आया है।

इस्लामी अक़ीदा की बुनियादें (ईमान के स्तंभ) :

आस्था और दृढ़ विश्वास में इस्लामी अक़ीदा की बुनियादें छह मामलों में प्रदर्शित होती हैं। उनको ईमान के स्तंभ कहा जाता है। वे इस प्रकार हैं :

1- अल्लाह पर ईमान : अर्थात अल्लाह के अस्तित्व का विश्वास कि वही अकेला पूरे ब्रह्मांड और उसमें मौजूद हर चीज़ का सृष्टिकर्ता, स्वामी और शासक है। वही इबादत के योग्य है, वह एक है एवं उसका कोई साझी नहीं है। वह सुंदरता और महिमा (जमाल और जलाल) के गुणों से विशेषित है। वह परिपूर्ण है तथा हर अवगुण एवं कमी से पवित्र है। उसके जैसा कोई नहीं है।

फ़रिश्तों पर ईमान : वो महान अल्लाह की सृष्टियों में से एक सृष्टि हैं। अल्लाह ने उन्हें अपनी इबादत, अपने आदेशों के पूर्ण अनुसरण एवं जिन कामों को उनके सुपुर्द किया गया है, उनको अंजाम देने के लिए पैदा किया है। हम संक्षिप्त रूप में उनके अस्तित्व पर विश्वास रखते हैं, तथा जिनके नामों, गुणों एवं कार्यों के विषय में हमें वह्यी (प्रकाशना, आकाशवाणी) के द्वारा विस्तार से बताया गया है, हम उनपर पर विस्तार से ईमान रखते हैं। जैसे कि जिब्रील, जिन्हें अल्लाह ने नबियों एवं रसूलों के पास संदेश ले जाने के लिए नियुक्त किया है, मीकाईल को बारिश बरसाने एवं पौधों से संबंधित दायित्व का भार सौंपा गया है, इस्राफ़ील को सूर फूँकने की ज़िम्मेदारी दी गई है, मौत का फ़रिश्ता जो लोगों के प्राण हरने का कार्य अंजाम देता है, और मालिक जहन्नम का दारोगा है।

3- किताबों पर ईमान : ये वो किताबें हैं, जिनको अल्लाह ने अपने रसूलों पर उतारा है, सृष्टि पर दया खाकर एवं उनको सुपथ दिखाने के लिए, ताकि वह दुनिया एवं आख़िरत की ख़ुशी को प्राप्त कर सके। हम उनपर संक्षेप में ईमान रखते हैं एवं जिनका नाम हमें वह्यी के द्वारा मालूम हुआ है, उनपर विस्तार से ईमान रखते हैं। जैसे कि क़ुरआन जो मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर उतरा है, इंजील ईसा -अलैहिस्सलाम- पर, तौरात मूसा -अलैहिस्सलाम- पर उतरे हैं तथा दाऊद -अलैहिस्सलाम- को ज़बूर दिया गया था। इसके अलावा इब्राहीम -अलैहिस्सलाम- को सहीफ़े प्रदान हुए थे।

4- रसूलों पर ईमान : वे सभी मानव थे, अल्लाह ने उनकी ओर मार्गदर्शन की वह्य (प्रकाशना) की थी, एवं उनको लोगों की ओर संदेशवाहक बनाकर भेजा था, ताकि उसके दीन को पहुँचा दें। उनमें से प्रथम नूह -अलैहिस्सलाम- थे एवं अंतिम मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- थे। वे सभी के सभी धर्म एवं नैतिकता के शीर्ष पर थे। उनके भेजे जाने का प्रमुख उद्देश्य लोगों को केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाना था, और यह कि वे शिर्क एवं उसके सिवा किसी और की पूजा को छोड़ दें, भलाई के कार्य करें एवं बुराई को त्याग दें।

हम ईमान रखते हैं कि अल्लाह ने इंसानों में से रसूलों को भेजा और अपने बंदों पर उनकी दी गई खबरों पर विश्वास करने तथा उनके दिए गए आदेशों का अनुसरण एवं अनुपालन करने को फ़र्ज किया है। अल्लाह ने हमें उनमें से कुछ के नामों तथा उनके समुदायों के साथ उनके क़िस्सों की ख़बर दी है, जैसे कि इद्रीस, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा, हूद, स़ालेह एवं शोएब इत्यादि -अल्लाह उन सब पर शांति अवतरित करे-। जबकि अल्लाह ने हमें उनमें से कुछ के नामों के बारे में नहीं बताया है। अल्लाह ने कहा है :

''तथा (हे नबी!) हम भेज चुके हैं बहुत-से रसूलों को आपसे पूर्व, जिनमें से कुछ का वर्णन हम आपसे कर चुके हैं तथा कुछ का वर्णन आपसे नहीं किया है तथा किसी रसूल के वश में ये नहीं था कि वह कोई आयत (चमत्कार) ले आए, परन्तु अल्लाह की अनुमति से। फिर जब आ जाएगा अल्लाह का आदेश, तो निर्णय कर दिया जाएगा सत्य के साथ और क्षति में पड़ जाएँगे वहाँ, झूठे लोग।''

[सूरा ग़ाफ़िर : 78]

5- आख़िरत के दिन पर ईमान : और वह क़यामत का दिन है, जिस दिन अल्लाह लोगों को उनके दुनिया में किए गए कामों के हिसाब एवं उनपर प्रतिफल निर्धारित करने के लिए उठाएगा। वहाँ लोग दो गिरोहों में बट जाएँगे। मोमिनों का ठिकाना जन्नत होगा और वे वहाँ सदैव रहेंगे। तथा काफ़िरों का ठिकाना जहन्नम होगा और वे उसमें हमेशा रहेंगे। उनके अलावा जिन लोगों ने मोमिन होते हुए गुनाह किया, उनको या तो अल्लाह क्षमा कर देगा या कुछ समय की अवधि के लिए अज़ाब देगा, फिर उन्हें जन्नत में प्रवेश दे देगा।

6- अच्छे बुरे भाग्य पर ईमान : मुसलमानों का इस बात पर ईमान है कि अल्लाह जानता है जो हुआ एवं जो कुछ होने वाला है। बेशक अल्लाह ने सृष्टियों के भाग्यों को लिख दिया है, उनको चाहा है एवं निर्धारित कर दिया है। ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं होता है, मगर उसके लिख देने, उसकी इच्छा करने एवं पैदा करने की बुनियाद पर उसको उसकी जानकारी होती है। यदि अच्छा हो तो वह अल्लाह की दया से होता है और यदि उसके विपरीत होता है, तो यह अल्लाह की तरफ से या तो परीक्षा होती है या सज़ा। और यह अल्लाह की हिकमत एवं न्याय के तहत होता है। यह हिकमत इतनी बड़ी तथा ऊँची होती है कि कोई भी इंसान उसको जान नहीं सकता है। जब इंसान भाग्य की अच्छाई एवं बुराई पर ईमान ले आता है, तो उसके दिल और आत्मा को संतुष्टि मिलती है। वह अपना मामला अल्लाह के हवाले कर देता है, इस लिए कि वह जान जाता है कि प्रत्येक चीज़ केवल अल्लाह के हाथ में है। वह जो चाहेगा, होगा तथा वह जो नहीं चाहेगा, नहीं होगा।

इस्लाम के स्तंभ :

इस्लाम के स्तंभ वो बुनियादें हैं, जिनपर वह खड़ा है। वह पाँच हैं। हर मुसलमान के लिए उनको अंजाम देना अनिवार्य है :

1- इस बात की गवाही कि अल्लाह के सिवा कोई पुज्य नहीं है एवं मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के रसूल हैं। यह ऐसी गवाही है, जिसे ज़ुबान से कहा जाएगा एवं दिल उसकी पुष्टि करते हुए विश्वास रखेगा कि केवल अल्लाह ही सत्य पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं है और मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के संदेशवाहक हैं।

2- नमाज़ क़ायम करना : हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह दिन रात में पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़े, ऐसी नमाज़ जिसमें महान अल्लाह के सम्मान में क़याम (खड़ा होना) हो, रकू एवं सजदा हो। उन नमाज़ों के अलग-अलग नाम निर्धारित हैं। वह हैं : फ़ज्र की नमाज़, ज़ुहर की नमाज़, अस्र की नमाज़, मग़रिब की नमाज़ और इशा की नमाज़। इनके अतिरिक्त दूसरी नमाज़ें हैं, जो वाजिब नहीं हैं।

3- ज़कात देना : मुसलमान के पास जो धन है, वह उसका एक छोटा-सा सीमित भाग अलग करके उसके जो हक़दार हैं, जैसे फ़क़ीर, मिसकीन (भिखारी एवं निर्धन) इत्यादि जिनको ज़कात दी जाती है, उनको देता है।

4- रमज़ान का रोज़ा : मुसलमान रमज़ान के महीने में, अल्लाह की इबादत की नीयत से फ़ज्र से लेकर सूर्यास्त तक खाने, पीने तथा अपनी स्त्री से सहवास करने जैसी रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से बचा रहता है।

5- अल्लाह के घर काबा का हज करना: इबादत की नीयत से सामर्थ्यवान मुसलमान का कम से कम जीवन में एक बार मक्का जाना एवं हज की कार्रवाइयों को पूरा करना।

इस्लाम में इबादत (प्रार्थना) का बयान :

इबादत : यह अल्लाह को एक जानना एवं उसकी निकटता चाहना है, हर उस चीज़ द्वारा जिसे वह पसंद करता हो, एवं चाहता हो, बातों तथा ज़ाहिरी (दृश्य) एवं गैर ज़ाहिरी (अदृश्य) कार्यों के द्वारा।

बातों में क़ुरआन पढ़ना, दुआ करना, अल्लाह का ज़िक्र करना, लाभदायक ज्ञान सिखाना एवं दूसरों को भलाई की बातें बताना इत्यादि आते हैं।

जबिक कार्यों में पवित्रता अपनाना, नमाज़ पढ़ना, हज करना एवं लोगों की ज़रूरतों को पूरी करना इत्यादि आते हैं।

ज़ाहिरी (दृश्य) कार्य : इनसे मुराद वो कार्य हैं, जो आँखों के सामने हों, जिन्हें देखा जाए और सुना जाए इत्यादि, जैसे नमाज़, हज, क़ुरआन पढ़ना, अल्लाह की ओर बुलाना, रिश्तेदारों का ख़्याल रखना आदि।

बातिनी (गैर ज़ाहिरी, अदृश्य) कार्य : ये वो कार्य हैं, जिनका स्थान दिल है। जैसे अल्लाह से मुहब्बत, उससे आशा रखना, उससे डरना, उसकी श्रद्धा रखना एवं उसपर भरोसा करना इत्यादि।

इस्लाम में इबादत का महत्व :

महान अल्लाह की इबादत, यही वह उद्देश्य है, जिसके लिए अल्लाह ने इंसान को पैदा किया है। अल्लाह ने कहा है :

''और मैंने जिन्न तथा मनुष्य को केवल मेरी इबादत के लिए पैदा किया है।''

[सूरा अल-ज़ारियात : 56]

बड़ी हिकमतों एवं बहुत सारी मसलहतों, जिनका प्रभाव इंसानी आत्माओं एवं उनके जीवन पर पड़ता है, के तहत इबादत को वैध किया गया है। इबादत के गुणों में से एक यह है कि यह आत्माओं को पवित्र तथा शुद्ध करती है और उन्हें इंसानी कमाल की उच्च श्रेणी में बिठाती है।

इंसान को इबादत की सबसे अधिक आवश्यकता है। जिस प्रकार से उसके शरीर को खाने पीने की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार से उसके दिल व आत्मा को इबादत व उपासना के द्वारा अल्लाह की तरफ ध्यानाकर्षण करने की आवश्यकता पड़ती है। आत्मा को संतुष्टि प्राप्त नहीं हो सकती है मगर अल्लाह के ज़िक्र एवं उसकी इबादत से, और न ही दिल ख़ुश हो सकता है और न ही सीना शांत रह सकता है, मगर अल्लाह की निकटता प्राप्त करके एवं उसके साथ अपना अच्छा संबंध बना कर के। इबादत गुजार (धार्मिक) लोग सबसे अधिक ख़ुश एवं संतुष्ट होते हैं। जो प्रसन्न रहना चाहता है, उसको चाहिए कि केवल एक अल्लाह की इबादत व पूजा करे।

इस्लाम में इबादत की व्यापकता :

इस्लाम में इबादत पुण्य के प्रत्येक उन कार्यों को शामिल है, जिन्हें अल्लाह पसंद करता है एवं जिनके द्वारा हम अल्लाह की निकटता प्राप्त करते हैं और यह शामिल हैं :

- इबादत के विभिन्न प्रतीक : जैसे नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज, क़ुरआन का पढ़ना, दुआ एवं महान अल्लाह का ज़िक्र करना इत्यादि।

अच्छा व्यवहार : जैसे माँ बाप की सेवा, रिश्तेदारी का ख़्याल रखना, स्त्री एवं औलाद के साथ अच्छा बर्ताव करना, क्रय एवं विक्रय में नैतिकता का पालन करना, कामों को अच्छी तरह करना, पड़ोसी के साथ नेकी करना, ज़रूरतमंदों की मदद करना एवं जानवर के साथ भी अच्छा व्यवहार करना इत्यादि।

इसी प्रकार अच्छे चाल-चरित्र को भी शामिल है : जैसे सच बात कहना, अमानत को अदा करना, वचन पूरा करना, किसी से मुस्कुरा कर मिलना, अच्छी बात कहना, लज्जा करना एवं दूसरे अच्छे व्यवहार को अपनाना।

मुसलमान हर हाल में अल्लाह की इबादत करता है। मस्जिद में, घर में, काम करते हुए एवं हर स्थान पर। उसका पूरा जीवन अल्लाह के लिए है। अल्लाह तआला ने कहा है :

''आप कह दें कि निश्चय ही मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी तथा मेरा जीवन-मरण, सारे संसारों के पालनहार अल्लाह के लिए है।''

[सूरा अल-अन्आम : 162]

तीसरा मूल : आपका नबी कौन है?

मेरे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं।

हमारे नबी : मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुतल्लिब बिन हाशिम हैं। आप अल्लाह के नबी इब्राहीम के नबी बेटे इसमाईल -उन दोनों पर अल्लाह के अच्छे दरूद व सलाम अवतरित हों- के वंश से हैं।

अल्लाह ने आपको मक्का में नबी बनाकर भेजा, जब आपकी आयु चालीस साल थी एवं आपपर क़ुरआन उतारा। आपने लोगों को एकेश्वरवाद एवं इस्लाम धर्म की ओर बुलाया। लोगों ने आपको बड़ी पीड़ा पहुँचाई, आपके साथियों को यातनाएँ दीं एवं कुछ को शहीद कर दिया। ऐसे में तेरह साल बाद आपने यस़रिब शहर (इसके बाद इस नगर को मदीनातुन नबी अर्थात नबी का नगर के नाम से जाना जाने लगा) की ओर हिजरत कर गए। वहाँ आपने इस्लामी राज्य की स्थापना की एवं इस्लामी समाज की बुनियाद डाली। वहाँ आप लोगों को सत्य धर्म की ओर बुलाते और उसकी ओर ध्यान दिलाते। लोगों को यहाँ धर्म सिखाते हुए दस साल गुज़ारे। आप इसी डगर पर चलते रहे, यहाँ तक कि शरीयत पूरी हो गई, इस्लाम मुकम्मल हुआ एवं धर्म परिपूर्ण हुआ। और अल्लाह का यह फ़रमान उतरा :

"आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म परिपूर्ण कर दिया, तथा तुमपर अपना पुरस्कार पूरा कर दिया, और तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म स्वरूप स्वीकार कर लिया।"

[सूरा अल-माइदा : 3]

इसके पश्चात कि लोगों को अल्लाह के धर्म में मुहब्बत के साथ एवं अपनी पसंद से प्रवेश करते हुए देख कर आपकी आँख ठंडी हो गई, आपकी मृत्यु हो गई। जैसा कि महान अल्लाह ने कहा है :

''(हे नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाए।

और आप लोगों को अल्लाह के धर्म में झुंड के झुंड प्रवेश करते देख लें।

तो आप अपने रब की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें, तथा उससे क्षमा माँगें। निःसंदेह वह बड़ा क्षमा करने वाला है।''

[सूरा अल-नस्र : 1-3]

दयावान नबी :

हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- दयावान नबी हैं। दया ने आपके सम्पूर्ण जीवन में, तथा आपके जीवन के किसी चरण एवं परिस्थिति में, आपका साथ नहीं छोड़ा। अल्लाह ने कहा है :

"और (हे नबी!) हमने आपको समस्त संसार के लिए दया बनाकर भेजा।"

[सूरा अल-अंबिया : 107]

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की रहमत का नमूना ही था कि आप लोगों को सही रास्ते पर लाने, उन्हें कुफ़्र, अज्ञानता एवं पथभ्रष्टता के अंधकार से ईमान, ज्ञान एवं सुपथ के प्रकाश की ओर निकाल बाहर करने के सबसे अधिक इच्छुक थे। जब उनके समुदाय ने ईमान स्वीकार नहीं किया, तो वह ग़म और अफ़सोस में घुले एवं मरे जा रहे थे। अल्लाह ने कहा है :

''तो संभवतः आप उनके पीछे अपना प्राण खो देंगे, संताप के कारण, यदि वे इस हदीस (क़ुरआन) पर ईमान न लाएँ।''

[सूरा अल-कहफ़ : 6]

इसी तरह, आपकी दया के अर्थ एवं रूप विश्वासियों के लिए आपकी चिंता और करुणा में प्रकट होते हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है :

"(ऐ ईमान वालो!) तुम्हारे पास तुम ही में से एक रसूल आ गया हैl उसको वह बात भारी लगती है जिससे तुम्हें दुःख होl वह तुम्हारी सफ़लता की लालसा रखता हैl और ईमान वालों के लिए करुणामय दयावान हैl"

[सूरा अत-तौबा : 128]

आपकी दया प्रकट होती है धर्म को आसान बनाने में, अपनी उम्मत को उन चीज़ों की ज़िम्मेदारी न देने में, जो उसके लिए मुश्किल हों एवं जिन्हें करने की वह शक्ति न रखती हो। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहा है : ''सहजता से काम लो एवं किसी को मुश्किल में न डालो, लोगों को शुभ संदेश सुनाओ एवं उन्हें दूर न भगाओ।'' इसका वर्णन बुख़ारी एवं मुस्लिम ने किया है।

रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- दया से परिपूर्ण थे। आप औरतों एवं बच्चों पर सबसे अधिक दया करने वाले इंसान थे। आपके साथियों में से एक साथी हज़रत अनस बिन मालिक -अल्लाह उनसे राज़ी हो- ने कहा है : ''मैंने आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अधिक अपने परिवार से प्रेम करने वाला किसी को नहीं देखा।'' इसे मुस्लिम ने वर्णित किया है।

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की दया केवल मानव तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह जानवरों तक फैली हुई थी। आपने उनसे अच्छा व्यवहार करने एवं उन्हें कष्ट न देने का आह्वान किया। आपने अपने साथियों से कहा कि एक वेश्या ने एक कुत्ते को पानी पिलाया तो अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया एवं उसे जन्नत प्रदान किया। तथा एक महिला केवल इसलिए जहन्नम चली गई कि उसने एक बिल्ली को बाँधे रखा, उसे न खाना दिया और न ही पानी दिया, यहाँ तक कि (भूख-प्यास से) वह मर गई।

सभी लोगों के लिए आम संदेश :

पूर्व के सभी नबी एवं रसूल -उन सभी पर अल्लाह का दरूद एवं सलाम हो- अपने विशेष समुदायों की ओर भेजे जाते थे, परन्तु मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का संदेश सभी लोगों एवं हर युग व स्थान के लिए आम है।

उच्च अल्लाह ने कहा है :

''हमने आपको सभी लोगों की ओर शुभ संदेश देने वाला एवं डराने वाला बना कर भेजा है।''

[सूरा सबा : 28]

अल्लाह का कथन है :

"ऐ नबी! आप लोगों से कह दें कि ऐ मानव जाति के लोगो! मैं तुम सभी की ओर अल्लाह का रसूल हूँ।"

[सूरा अल-आराफ़ : 158]

एक हदीस में नबी -ए- करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है :

''हर नबी अपने विशेष समुदाय की ओर भेजे जाते थे, जबकि मैं सभी लोगों की ओर भेजा गया हूँ।''

इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के नबी बनाए जाने से लेकर आज तक, एवं क़यामत आने तक के हर इंसान के लिए आपका अनुसरण करना, आपकी लाई हुई शरीयत पर विश्वास रखना एवं आपके धर्म को स्वीकार करना अनिवार्य है। अल्लाह ने आपके द्वारा आकाशीय संदेशों के सिलसिले का अंत किया है एवं आपकी आज्ञाओं के पालन को वाजिब किया है। जो उनका अनुसरण करेगा वह दुनिया में कामयाब रहेगा एवं आख़िरत में जन्नत में प्रवेश करेगा। और जो उनकी अवज्ञा करेगा, वह दुनिया में अभागा रहेगा एवं आख़िरत में उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा। अल्लाह ने कहा है :

''जो मेरे मार्गदर्शन पर चलेगा, वह न गुमराह होगा और न अभागा।

"और (हाँ) जो मेरे ज़िक्र (क़ुरआन) से मुँह फेरेगा, उसकी ज़िंदगी तंगी में रहेगी और हम उसको क़यामत के दिन अंधा करके उठाएँगें।"

[सूरा ताहा : 123,124]

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने घर में तथा अपने परिवार के साथ :

घर वह स्थान है जो इंसान के अच्छे व्यवहार, उसकी पूर्ण शिष्टता और रहने-सहने के अच्छे तरीक़े को बयान करता है। जब इंसान अपनी पत्नी या बच्चे या सेवक के साथ होता है, तो उसका प्राकृतिक रूप सामने आता है, जिसमें दिखावा नहीं होता है।

जो कोई उम्मत-ए-इस्लाम के पैग़ंबर, उनके प्रतिनिधि एवं शिक्षक -मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के घर में उनके हाल पर विचार करेगा, तो पाएगा कि आपने इसका एक उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है कि एक सज्जन व्यक्ति को अपने घर में तथा अपने परिवार और बच्चों के साथ कैसा होना चाहिए।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी माँ आइशा से जब पूछा गया कि आप घर में क्या करते थे? तो उन्होंने कहा :

''आप अपने घरेलू काम-काज़ में मश्गूल होते थे। चुनांचे जब नमाज़ का समय होता, तो नमाज़ के लिए निकल जाते।''

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने परिवार एवं पत्नियों के लिए सबसे अच्छे व्यक्ति थे। उन्होंने अच्छे व्यवहार, नरमी और अपनी पत्नी की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक इच्छाओं को जानने के विषय में अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। तथा उन्हें ख़ुश एवं प्रसन्न करने के लिए अवसरों का भरपूर प्रयोग करते थे। आइशा -अल्लाह उनसे राज़ी हो- कहती हैं :

''मैंने एक दिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े देखा। दरअसल हब्शा के कुछ लोग मस्जिद में खेल रहे थे और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी चादर से मुझे छिपा रहे थे और मैं उनका खेल देख रही थी।''

इसे बुखारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी बेटियों से बहुत मुहब्बत करते थे एवं उनका सम्मान करते थे। जब आपके पास आपकी बेटी फ़ातिमा आतीं, तो आप खड़े हो जाते, आप उनके बोसे लेते एवं अपनी जगह में बिठाते। इसी तरह आप अपनी बेटियों के घर जाते एवं उनकी ख़ैर ख़बर (हाल-चाल) लेते।

उम्मत के लिए आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जो वसीयतें की हैं, उनमें एक यह है :

''महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार किया करो।''

इसे बुखारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के उच्च आचरण कुछ उदाहरण :

आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- लोगों में सबसे उच्च आचरण एवं अच्छे शिष्टाचार वाले व्यक्ति थे। अल्लाह ने आपका ज़िक्र इन शब्दों में किया है :

"तथा निश्चय ही आप बड़े सुशील हैं।"

[सूरा अल-क़लम : 4]

आप आचरण के उस शीर्ष पर थे, जहाँ तक कोई नहीं पहुँच पाया। आपको हर प्रकार की कमी से सुरक्षित कर लिया गया था एवं अच्छाई की हर पूर्णता पर बिठा दिया गया था। क़ुरआन करीम ही आपके आचरण का प्रतीक है। आप उससे शिष्टाचार सीखते एवं उसी से उम्मत को सिखाते। आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के आचरण इस प्रकार थे :

- आप, लोगों में सबसे बुद्धिमान, सबसे न्यायप्रिय, सबसे विवेकी, सबसे उदार और सबसे सम्माननीय थे।

- आप लोगों में सबसे शर्मीले व हयादार थे।

- आप लोगों में सबसे विनम्र थे। किसी के भी निमंत्रण को स्वीकार कर लेते। उपहार स्वीकार करते यद्यपि वह मामूली एवं थोड़ा-सा क्यों न हो, तथा उसके बदले में कुछ दिया करते भी थे।

- आप बीमारों को देखने जाते, जनाज़ा में हाज़िर होते, फ़क़ीरों (निर्धनों) के पास बैठते, मिसकीन को खाना खिलाते, अच्छे एवं शिष्टाचार से सुसज्जित व्यक्तियों का सम्मान करते और सम्माननीय लोगों से दोस्ती रखते।

- जो कोई भी आपके पास कोई ज़रूरत लेकर आता, आप उसकी जरूरत पूरी करने के लिए खड़े होते, न कठोरता दिखाते और न ही क्रोधित होते, न बुराई का बदला बुराई से देते। हमेशा क्षमा से काम लेते, मगर जब अल्लाह की सीमाओं को लाँघा जाता तो उस समय अपने लिए नहीं बल्कि अल्लाह के लिए क्रोधित होते।

- आपके आचरण में से यह भी दाखिल था कि आप सलाम करने में पहल करते। जब आपकी मुलाक़ात आपके किसी साथी से होती, तो मुसाफ़हा करने (हाथ मिलाने) में पहल करते।

- जो कोई आपके साथ बैठता, आप उसपर पूरा ध्यान देते, सुनते सुनाते, बात करते, अच्छा व्यवहार करते एवं अच्छी राय देते।

- आप लोगों में सबसे नरम, अच्छे एवं लोगों के लिए सर्वाधिक लाभदायक थे।

- आप मज़ाक भी करते। लेकिन मज़ाक़ में भी उचित बात ही कहते। मुस्कुराते बहुत थे, लेकिन ठहाका लगाकर हँसते नहीं थे। अपनी स्त्रियों के साथ प्रतियोगिता करते तथा उनके संग नरमी से पेश आते।

- आपको जो मिलता खा लेते। जो पाते, उसे ठुकराते नहीं थे और न ही किसी खाने का अवगुण बयान करते। यदि खजूर मिलती तो खा लेते, यदि गोश्त मिलता तो खा लेते, यदि कोई गेहूँ या जौ की रोटी मिलती, तो उसे खा लेते, और यदि मीठा या मधु मिलता, तो भी खा लेते। यदि बिना रोटी के केवल दूध मिलता तो भी कोई बात नहीं, और यदि तरबूज या ताज़ा खजूर मिलती तो भी उसे खा लेते।

- आपको जो भी पहनने मिलता, पहन लेते। कभी शमला (एक ढीला लिबास) तो कभी ऊन का जुब्बा, जो भी हलाल लिबास पाते, पहन लेते।

- सवारी के लिए जो भी उपलब्ध होता, उसपर सवार हो जाते। कभी घोड़ा, कभी ऊँट, कभी खच्चर, कभी गधा और कभी पैदल ही चल देते।

- आपका कोई भी समय अल्लाह के लिए काम किए बगैर नहीं गुज़रता। या तो उसमें आप अपनी आत्मा को सुधारने में लगे रहते या फिर अपने परिवार को नसीहत करते।

इनके अतिरिक्त भी आपके बहुत सारे उच्च आचरण एवं अच्छे व्यवहार थे। आपपर अल्लाह का दरूद व सलाम हो।

निष्कर्ष

इस्लाम एक महान धर्म है। यह मुस्लिम व्यक्ति -जो उसकी शिक्षाओं को मानता है- को दुनिया में संतुष्टि, शांति, अच्छा जीवन एवं बेहतर स्थिति प्रदान करता है, तथा आख़िरत में सदैव रहने वाली ख़ुशी और नेमतों से नवाज़ता है। इसी प्रकार उसके मार्गदर्शनों का अनुसरण करने वाले मुस्लिम समाज को उन्नति, प्रगति, बुद्धि, विकास, सामाजिक एकता, शांति और सुरक्षा से पुरस्कृत करता है।

हे इस्लाम धर्म को स्वीकार करने वाले! आपको बधाई हो, इस महान नेमत की प्राप्ति पर। जिसने इसके अक़ीदा, शरीयत, शिक्षाओं, आदेशों, आचरणों एवं शिष्टाचारों को जाना, उनको मज़बूती के साथ थामा, यथाशक्ति उनको जीवन के हर क्षेत्र में लागू करने का प्रयास किया, वह जल्द ही अपने आपपर इसका प्रभाव देखेगा और जान जाएगा कि कैसे यह एक आम आदमी को एक नेक इंसान में परिवर्तित करता है, जो स्वयं तो सौभाग्यशाली होता ही है, अपने आस-पास के लोगों को भी सौभाग्यशाली बनाता है, जैसे कि माँ-बाप, पत्नी, बच्चे, सगे-संबंधी, पड़ोसी एवं दोस्त, तथा हर उस व्यक्ति को, जो इस मुस्लिम के संपर्क में आता है, जिसे अल्लाह ने इस्लाम धर्म में प्रवेश करने एवं अल्लाह की तरफ जाने वाले रास्ते पर चलने के सम्मान से नवाज़ा है।

यह पुस्तिका आपके लिए धर्म के आदेशों को जानने का आरंभिक रास्ता है। फिर इसके बाद आपको चाहिए कि आप लाभकारी ज्ञान प्राप्त करने, नेक कार्य करने, अपने आप को पाक करने एवं अपने दिल को सुधारने के मार्ग में अधिक से अधिक प्रयास करें। इस्लाम के बारे में आपका ज्ञान जितना अधिक होगा, एवं उस ज्ञान के आधार पर आपका अमल (कर्म) जितना ज़्यादा होगा, उतना ही आप अपने महान रब के निकट होते जाएंगे। अतः क़ुरआन को सीखने, उसकी तिलावत करने तथा उसकी आयतों में विचार करने पर ध्यान दीजिए। रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के जीवन एवं उनकी सुन्नत की जानकारी प्राप्त कीजिए। वह आपके आदर्श हैं, जिससे आप इस दुनिया में रोशनी प्राप्त कर सकते हैं। वही एक है जिसके बारे में अल्लाह ने कहा है कि वह जो कुछ भी तुम्हें दे, उसे स्वीकार करो। जहाँ तक उनके अलावा दूसरे मानव की बात है, तो वह जितना भी महान एवं उच्च क्यों न हो, उसकी जो बात क़ुरआन एवं सुन्नत के अनुसार है, उसे स्वीकार किया जाएगा, तथा जो उनके ख़िलाफ़ है, वह अस्वीकार्य होगी। धर्म के मामले में झगड़ा मत करें एवं अपने मुस्लिम भाइयों के साथ झगड़ा, मतभेद तथा विवाद से बचिए।

हम अल्लाह से हमारे लिए तथा आपके लिए शक्ति एवं इस धर्म पर दृढ़ता प्रदान करने हेतु प्रार्थना करते हैं, यहाँ तक कि हम अल्लाह से इस हाल में मिलें कि वह हमसे राज़ी हो। सभी प्रकार की प्रशंसा सारे जहानों के रब के लिए है, दरूद व सलाम व शांति हो हमारे नबी मुहम्मद, उनकी औलाद, उनके सभी साथियों तथा क़यामत तक के लिए उनका अनुसरण करने वालों पर।