कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर फ़ासिक़ होने का लांछन न लगाए। काफ़िर होने का लांछन भी न लगाए। क्योंकि अगर वह ऐसा न हुआ, तो यह लांछन उसी की ओर लौट आएगा।
अबू ज़र रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है :
"कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर फ़ासिक़ होने का लांछन न लगाए। काफ़िर होने का लांछन भी न लगाए। क्योंकि अगर वह ऐसा न हुआ, तो यह लांछन उसी की ओर लौट आएगा।"
«لاَ يَرْمِي رَجُلٌ رَجُلًا بِالفُسُوقِ، وَلاَ يَرْمِيهِ بِالكُفْرِ، إِلَّا ارْتَدَّتْ عَلَيْهِ، إِنْ لَمْ يَكُنْ صَاحِبُهُ كَذَلِكَ».
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस बात से सावधान किया है कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहे कि : तुम फ़ासिक़ हो, या तुम काफ़िर हो। क्योंकि अगर सामने वाला व्यक्ति फ़ासिक़ या काफ़िर न हुआ, तो कहने वाला व्यक्ति ही इस विशेषण का हक़दार हो जाएगा और उसकी कही हुई बात उसी की ओर लौट जाएगी। लेकिन, अगर वह वैसा ही हो जैसा कि उसने कहा, तो कहने वाले का कोई नुक़सान नहीं होगा क्योंकि उसकी बात दुरुस्त है।
किसी शरई कारण के बिना किसी को काफ़िर या फ़ासिक़ कहना हराम है।
लोगों पर कोई हुक्म लगाने से पहले सत्यापन वाजिब है।
इब्न-ए-दक़ीक़ अल-ईद कहते हैं : किसी व्यक्ति को, जो सच-मुच काफ़िर न हो, काफ़िर कहने वालों के लिए यह बहुत बड़ी चेतावनी है। और वास्तव में यह बड़े दुविधा की बात है।
इब्न-ए-हजर असक़लानी कहते हैं : किसी को काफ़िर या फ़ासिक़ कहने से उसके काफ़िर या फ़ासिक़ न हो जाने से यह लाज़िम नहीं आता कि कहने वाला ऐसा कहने के कारण गुनाहगार नहीं होगा। दरअसल इसके बारे में तफ़सील है। अगर सामने वाले का शुभचिंतन या उसका हाल बताकर किसी और का शुभचिंतन उद्देश्य हो, तो जायज़ है। अगर शर्म दिलाना, बदनाम करना और कष्ट देना उद्देश्य हो, तो जायज़ नहीं है। क्योंकि शरीयत ने उसको आदेश पर्दा डालने, शिक्षा देने और समझाने-बुझाने का दिया है और यह काम नर्मी से हो जाए, तो सख़्ती करना जायज़ नहीं है। बल्कि सख़्ती करने से कभी-कभी इन्सान भड़क जाता है और उस काम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता है। क्योंकि बहुत-से लोग अहंकारी होते हैं और उनका अहंकार उस समय विशेष रूप से जाग उठता है, जब बताने वाला उनसे कमतर हो।
सह़ीह़ बुख़ारी (8/ 15) (6045).
सह़ीह़ मुस्लिम (1/ 79) (61).
अधिक (10)
نزهة المتقين.
لمجموعة من الباحثين (2/ 1073).
كنوز رياض الصالحين.
لمجموعة من الباحثين (18/ 446).
بهجة الناظرين.
لسليم الهلالي (3/ 82).
شرح رياض الصالحين.
لابن عثيمين (6/ 220).
التنوير شرح الجامع الصغير.
للصنعاني (9/ 275).
पुस्तकों में उद्धृत
4 पुस्तकेंअधिक (4)
- رياض الصالحينرياض الصالحين مع فوائد وهدايات - 7«لا يَرمي رجُلٌ رجُلاً بالفسْقِ أو الكُفْرِ إلَّا ارتَدَّتْ عليْه، إنْ لمْ يَكُنْ صاحبُهُ كذلكَ».
- مادة العقيدة الإسلامية(لا يَرْمِي رَجُلٌ رَجُلًا بِالْفُسُوقِ، وَلا يَرْمِيهِ بِالْكُفْر، ِ إِلَّا ارْتَدَّتْ عَلَيْهِ، إِنْ لَمْ يَكُنْ صَاحِبُهُ كَذَلِكَ )[176].
- مجموعة زاد العقيده (4)العقيدة 4«لا يَرْمِي رَجُلٌ رَجُلًا بِالفُسُوقِ، وَلا يَرْمِيهِ بِالكُفْر، إِلَّا ارْتَدَّتْ عَلَيْهِ، إِنْ لَمْ يَكُنْ صاحِبُهُ كَذَلِكَ».
- نبراس طالب (4)1«لاَ يَرْمِي رَجُلٌ رَجُلًا بِالفُسُوقِ، وَلاَ يَرْمِيهِ بِالكُفْرِ، إِلَّا ارْتَدَّتْ (رجعت)عَلَيْهِ، إِنْ لَمْ يَكُنْ صَاحِبُهُ كَذَلِكَ»