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621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

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"मुझे ‏शरीर के सात अंगों पर सजदा करने का हुक्म दिया गया है: पेशानी पर और आपने अपने हाथ से अपनी नाक की ओर इशारा किया, दोनों हाथों और दोनों घुटनों तथा दोनों पावों की उंग्लियों पर और यह भी हुक्म दिया गया कि हम कपड़ों और बालों को न समेटें।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
कुछ लोग सह्ल बिन साद साइदी के पास आए। उनके बीच इस बात को लेकर बहस हो गई थी कि मिंबर की लकड़ी किस पेड़ की थी? उन लोगों ने सह्ल से इसके बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा : अल्लाह की क़सम, मुझे अच्छी तरह मालूम है कि उसकी लकड़ी किस पेड़ की थी। मैंने उस दिन भी उसे देखा जब उसे पहली बार रखा गया और उस दिन भी देखा जब उसपर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पहली बार बैठे। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अमुक औरत -एक अंसारी औरत जिसका नाम भी सह्ल ने लिया था- को कहला भेजा : "अपने बढ़ई दास से कहो कि मेरे लिए लकड़ी का एक मिंबर बना दे, जिसपर मैं लोगों से बात करते समय बैठ सकूँ।" चुनांचे उन्होंने अपने दास को इसका आदेश दिया और उसने जंगल के झाऊ के पेड़ से मिंबर तैयार करके उनको दे दिया। चुनांचे उन्होंने उसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास भेज दिया और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश से उसे यहाँ रख दिया गया। फिर मैंने देखा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसपर खड़े होकर नमाज़ पढ़ी। आपने उसी पर खड़े होकर तकबीर कही और उसी पर खड़े होकर रुकू किया, फिर पीछे हटते हुए मिंबर से उतर गए और मिंबर के पास ही सजदा किया और फिर मिंबर पर खड़े हो गए। जब नमाज़ पूरी हो गई, तो लोगों को संबोधित करते हुए कहा : "लोगो! मैंने ऐसा इसलिए किया, ताकि तुम मेरा अनुसरण कर सको और मेरी नमाज़ सीख सको।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
मैंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ नमाज़ पढ़ी। आप अपनी दाईं ओर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बकरकातुह" और बाईं ओर "अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बकरकातुह" कहकर सलाम फेरते थे।
ह़सन इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ तकबीर से और क़ुरआन पाठ "अल-ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से आरंभ करते थे। जब आप रुकूअ करते, तो अपने सर को न उठाए रखते और न बहुत झुका देते, बल्कि इन दोनों के बीच रखते। जब रुकू से सर उठाते, तो उस समय तक सजदा नहीं करते, जब तक सीधे खड़े न हो जाते। जब सजदे से सर उठाते, तो दूसरा सजदा उस समय तक नहीं करते, जब तक ठीक से बैठ नहीं जाते। हर दो रकात पर "अत-तहिय्यात" पढ़ते और जब बैठते, तो अपने बाएँ पैर को बिछा देते और दाएँ पैर को खड़ा रखते तथा शैतान की तरह बैठने से मना फ़रमाते। आप इस बात से भी मना करते थे कि आदमी अपने दोनों बाज़ुओं को दरिंदे की तरह बिछा दे। आप नमाज़ का अंत सलाम से करते थे।
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच यह दुआ पढ़ा करते थे : "رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي" (ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे।
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
"सबसे बुरा चोर वह है, जो अपनी नमाज़ में चोरी करता है।" किसी सहाबी ने पूछा कि नमाज़ में चोरी करने का क्या मतलब है? आपने उत्तर दिया : "रुकू एवं सजदा संपूर्ण रूप से न किया जाए।"
स़ह़ीह़ इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है
"जब तुम सजदा करो, तो अपनी हथेलियों को ज़मीन पर रख दिया करो और अपनी कोहनियों को ऊपर उठाए रखो।"
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच में यह दुआ पढ़ते थे : "ऐ अल्लाह! तू मुझे माफ कर दे, मेरे ऊपर रहम कर, मुझे आफियत (स्वास्थ्य इत्यादि) दे तथा मुझे रोज़ी प्रदान कर।"
शवाहिद के आधार पर ह़सन इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है