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621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

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"अल्लाह से डरो जो तुम्हारा रब है, पाँच वक़्त की नमाज़ें पढ़ो, अपने महीने (अर्थाथ रमज़ान महीने) के रोज़े रखो, अपने धन की ज़कात दो तथा अपने शासकों की बात मानो, तुम अपने रब की जन्नत में दाख़िल हो जाओगे।"
स़ह़ीह़ इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया है
"मिसवाक (दातून) मुँह को साफ़ करने वाली और अल्लाह को प्रसन्न करने वाली वस्तु है।"
स़ह़ीह़ इसे नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
"जो औरत अपने वली गण (अभिभावकों) की अनुमति के बिना निकाह करे, उसका निकाह बातिल है। (निकाह बातिल होने की बात आपने तीन बार कही।) अगर मर्द ने ऐसी औरत के साथ एकांत वास किया है, तो जो कुछ उसने औरत से पाया है उसके बदले में औरत के लिए महर है। अगर वलियों के बीच मतभेद हो जाए, तो शासक उस औरत का वली है, जिसका कोई वली न हो।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! मुझसे इस्लाम के बारे में एक ऐसी बात कहें, जिसके बारे में मुझे किसी और से पूछने की ज़रूरत न पड़े। आपने फ़रमाया : "तुम कहो कि मैं अल्लाह पर ईमान लाया और फिर इसपर मज़बूती से क़ायम रहो।"
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम और अह़मद ने रिवायत किया है
"मुश्रिकों से अपनी जान, माल एवं ज़बान द्वारा जिहाद करो।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की किसी पत्नी से रिवायत है (अबू आमिर ने कहा, नाफ़े कहते हैं कि मेरा ख़याल है कि वह हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा थीं) उनसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पढ़ने के तरीक़े के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फ़रमाया : तुम लोग इसकी ताक़त नहीं रखते । उनसे कहा गया : हमें उसके बारे में बताएँ। तो उन्होंने ठहर-ठहर कर पढ़कर दिखाया। अबू आमिर कहते हैं कि नाफ़े ने कहा : तो इब्ने अबू मुलैका ने हमें इस तरह पढ़कर सुनाया : 'अलह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन' यहाँ रुक गए। फिर 'अर-रह़मानिर-रह़ीम' पढ़ने के बाद रुक गए और 'मालिकि यौमिद्दीन' पढ़ने के बाद रुक गए।
स़ह़ीह़ इसे अह़मद ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनका हाथ पकड़ा और फ़रमाया : "ऐ मुआज़! अल्लाह की क़सम, मैं तुमसे मोहब्बत रखता हूँ।" आगे फ़रमाया : "ऐ मुआज़! मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि हर नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना हरगिज़ न छोड़ना : ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र करने, शुक्र करने और बेहतर अंदाज़ में अपनी इबादत करने में मेरी मदद फ़रमा।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी क़ौम से कभी भी उस समय तक युद्ध नहीं किया, जब तक कि उन्हें (इस्लाम की) दावत न दे दी हो।
स़ह़ीह़ इसे अह़मद और बैहक़ी ने रिवायत किया है