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621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

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अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब हुनैन युद्ध के लिए निकले, तो मुश्रिकों (बहुदेववादियों) की ओर से पूजे जाने वाले एक पेड़ के पास से गुज़रे, जिसे 'ज़ात-ए-अनवात' कहा जाता था। वे उसमें अपने हथियार लटकाया करते थे। चुनांचे लोगों ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उनकी तरह हमारे लिए भी एक 'ज़ात-ए-अनवात' बना दीजिए। उनकी बात सुन अल्लाह के रसूलसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : सुबहानल्लाह (अल्लाह पवित्र है)! तुम लोग ठीक वैसा ही कह रहे हो, जैसा मूसा की क़ौम ने कहा था। उन्होंने मूसा (अलैहिस्सलाम) से कहा था : "اجْعَلْ لَنَا إِلَهًا كَمَا لَهُمْ آَلِهَةٌ" (हमारे लिए भी कोई पूज्य बना दीजिए, जैसा कि मुश्रिकों के बहुत-से पूज्य हैं।) [अल-आराफ़: 138] सुन लो, तुम लोग भी पहले समुदायों के पदचिह्नों पर चल पड़ोगे।"
स़ह़ीह़ इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया है
'जो अल्लाह चाहे एवं अमुक चाहे' ना कहो, बल्कि 'जो अल्लाह चाहे फिर अमुक चाहे' कहो।
सभी सनदों के आधार पर स़़ह़ीह़ इसे अबू दावूद ने तथा नसई ने अल-कुबरा में एवं अह़मद ने रिवायत किया है
"अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल- ने किसी फैसले के लिए रिश्वत लेने वाले तथा देने वाले दोनों के ऊपर लानत भेजी है।"
स़ह़ीह़ इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया है
"जब लोग किसी को अत्याचार करते हुए देखें और उसका हाथ न पकड़ें, तो संभव है कि अल्लाह उन तमाम लोगों पर अपना अज़ाब उतार दे।"
स़ह़ीह़ इसे अबू दावूद ने, तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-कुबरा में इसी प्रकार इब्न-ए-माजह ने और अह़मद ने रिवायत किया है
"जो अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी न बनाया होगा, उसे कोई पाप हानि नहीं पहुँचाएगा, और जो उससे इस अवस्था में मिलेगा कि किसी को उसका साझी ठहराया होगा, तो कोई नेकी उसे लाभ नहीं पहुँचाएगी।"
स़ह़ीह़ इसे अह़मद ने रिवायत किया है
"वह वचन, जो हमारे और उनके बीच है, नमाज़ है। जिसने इसे छोड़ दिया, उसने कुफ़्र किया।"
स़ह़ीह़ इसे तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
"अपशगुन लेना शिर्क है। अपशगुन लेना शिर्क है। अपशगुन लेना शिर्क है। -आपने यह बात तीन बार कही।- तथा हममें से हर व्यक्ति के दिल में इस तरह की बात आती है, लेकिन सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह उसे अपने ऊपर भरोसे के ज़रिए दूर कर देता है।
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक दिन हमें फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाई, फिर पूछा : “क्या अमुक व्यक्ति उपस्थित है?” लोगों ने कहा : नहीं। आपने पुनः पूछा : “क्या अमुक व्यक्ति उपस्थित है?” लोगों ने कहा : नहीं। आपने फ़रमाया : “यह दो नमाज़ें मुनाफिकों के लिए सर्वाधिक कठिन हैं और यदि वह जान लेते कि इनमें कितना सवाब है, तो वे अवश्य आते, चाहे (हाथ एवं) घुटनों के बल घिसटते हुए ही क्यों न हो। प्रथम सफ (पंक्ति) फरिश्तों की सफ के समान है। यदि तुम इसकी फज़ीलत (महत्व) जान लेते, तो इसके लिए जल्दी करते। एक आदमी की नमाज़ दूसरे आदमी के साथ अकेले नमाज़ पढ़ने से बेहतर है और दो आदमियों के साथ नमाज़ पढ़ना एक आदमी के साथ नमाज़ पढ़ने से बेहतर है। लोग (नमाज़ में) जितने अधिक होंगे, नमाज़ अल्लाह तआला के समीप उतनी अधिक प्रिय होगी।”
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है