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621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

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"अज़ान तथा इक़ामत के बीच की जाने वाली दुआ रद्द नहीं होती।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने दाएँ हाथ में रेशम और बाएँ हाथ में सोना लिया, उन्हें लेकर दोनों हाथों को उठाया और फिर फ़रमाया : "यह दोनों वस्तुएँ मेरी उम्मत के पुरुषों पर हराम और स्त्रियों के लिए हलाल हैं।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनका हाथ पकड़ा और फ़रमाया : "ऐ मुआज़! अल्लाह की क़सम, मैं तुमसे मोहब्बत रखता हूँ।" आगे फ़रमाया : "ऐ मुआज़! मैं तुमको वसीयत करता हूँ कि हर नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ना हरगिज़ न छोड़ना : ऐ अल्लाह! अपने ज़िक्र करने, शुक्र करने और बेहतर अंदाज़ में अपनी इबादत करने में मेरी मदद फ़रमा।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई और अह़मद ने रिवायत किया है
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब उन्हें यमन भेजा, तो आदेश दिया कि वह हर तीस गायों पर एक एक वर्षीय बछड़ा या बछिया लें और हर चालीस गायों पर एक दो वर्षीय गाय वसूल करें, तथा हर बालिग़ व्यक्ति से एक दीनार या उसके बराबर मआफ़िरी कपड़े, जो यमन में बनते हैं, लें।
शवाहिद के आधार पर स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
"जिसकी दो पत्नियाँ हों और उसका झुकाव किसी एक की ओर हो, वह क़यामत के दिन इस अवस्था में आएगा कि उसका एक पहलू झुका हुआ होगा।"
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
“दुआ ही इबादत है।” फिर यह आयत पढ़ी : "तथा तुम्हारे रब ने कहा है : तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 60]
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें ख़ुतबा-ए-हाजत इस तरह सिखाया : "إِنَّ الحَمْدَ للهِ، نَسْتَعِيْنُهُ وَنَسْتَغْفِرُهُ، وَنَعُوْذُ بِهِ مِنْ شُرُوْرِ أَنْفُسِنَا، مَنْ يَهْدِ اللهُ فَلَا مُضِلَّ لَهُ، وَمَنْ يُضْلِلْ فَلَا هَادِيَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا الله، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُوْلُهُ، {يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ والأرحام إن الله كان عليكم رقيبا} [النساء: 1]، {يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 102]، {يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا} [الأحزاب:70 - 71]." (सारी प्रशंसा अल्लाह की है। हम उसी से मदद माँगते हैं, उसी से क्षमा चाहते हैं और अपने नफ़्स की बुराइयों से उसी की शरण माँगते हैं। जिसे अल्लाह रास्ता दिखाए, उसे कोई रास्ते से भटका नहीं सकता और जिसे रास्ते से भटका दे, उसे कोई रास्ता दिखा नहीं सकता। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। {ऐ लोगो ! अपने रब से डरो, जिसने तुम सब को (केवल) एक व्यक्ति से पैदा किया और (वह इस तरह कि) उन्हीं से उन का जोड़ा (पत्नी) पैदा किया और (फिर केवल) उन्हीं दोनों (पति-पत्नी) से बहुत से पुरुषों व महिलाओं को (पैदा कर के संसार में) फैला दिया और उस अल्लाह से डरो जिसके नाम पर तुम आपस में एक-दूसरे से सवाल करते हो और रिश्तों को काटने से भी बचो। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारी निगरानी करने वाला है।} [अन-निसा : 1] {ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो, जितना उससे डरने का हक़ है और तुम (दीन-ए-) इस्लाम के सिवा किसी और दीन पर कदापि नहीं मरना।} [आल-ए-इमरान : 102] {ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरते रहो और (जब कहो तो) उचित बात कहा करो,तो (अल्लाह) तुम्हारी कामों को सठीक कर देगा और तुम्हारे पाप धो देगा और जिस व्यक्ति ने अल्लाह व उसके रसूल का आज्ञापालन किया, तो उसने बहुत बड़ी सफलता अर्जित कर ली।} [अल-अह़ज़ाब : 70-71]
स़ह़ीह़ इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मस्जिद में एतिकाफ़ किया, तो लोगों को बुलंद आवाज़ से क़ुरआन पढ़ते हुए सुना। चुनाँचे, आपने पर्दा हटाया और फ़रमाया : "सुनो! तुममें से हर कोई अपने रब से मुनाजात (सरगोशी) कर रहा है, इसलिए कोई किसी को तकलीफ़ न पहुँचाए, और कोई क़ुरआन पढ़ते हुए अपनी आवाज़ दूसरे से बुलंद न करे", या फ़रमाया : "नमाज़ में।"
स़ह़ीह़ इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है