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621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

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अस्र की नमाज़ जल्दी पढ़ा करो। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने अस्र की नमाज़ छोड़ दी, उसके सभी कर्म व्यर्थ हो गए।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
उम्म-ए-सलमा रज़ियल्लाहु अनहा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास हबशा (इथियोपिया) में देखे हुए मारिया नामी एक गिरजाघर और उसके चित्रों का वर्णन किया, तो आपने कहा : "वे ऐसे लोग हैं कि उन लोगों के अंदर जब कोई सदाचारी बंदा अथवा सदाचारी व्यक्ति मर जाता, तो उसकी कब्र के ऊपर मस्जिद बना लेते और उसमें वो चित्र बना देते। वे अल्लाह के निकट सबसे बुरे लोग हैं।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
मुझे एक रात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बिस्तर पर नहीं मिले। मैंने ढूँढना शुरू किया, तो मेरे हाथ आपके पैरों के तलवों से जा लगे। दरअसल आप मस्जिद में (सजदे की हालत में) थे और आपके दोनों क़दम खड़े थे। आप फ़रमा रहे थे : (ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं प्रशंसनीय है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है)। तथा एक रिवायत में हैः मेरा हाथ आपके कदमों के भीतरी भाग पर पड़ा, जबकि आप मस्जिद में थे, दोनों क़दम खड़े थे और आप कह रहे थेः (ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा अधिकार अनुसार नहीं कर सकता। तू वैसा ही है, जैसा तूने अपने बारे में कहा है)।
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
"खड़े होकर नमाज़ पढ़ो, अगर इसकी क्षमता न हो तो बैठकर पढ़ो और अगर यह भी न हो सके तो पहलू के बल लेट कर नमाज़ अदा करो।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ तकबीर से और क़ुरआन पाठ "अल-ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से आरंभ करते थे। जब आप रुकूअ करते, तो अपने सर को न उठाए रखते और न बहुत झुका देते, बल्कि इन दोनों के बीच रखते। जब रुकू से सर उठाते, तो उस समय तक सजदा नहीं करते, जब तक सीधे खड़े न हो जाते। जब सजदे से सर उठाते, तो दूसरा सजदा उस समय तक नहीं करते, जब तक ठीक से बैठ नहीं जाते। हर दो रकात पर "अत-तहिय्यात" पढ़ते और जब बैठते, तो अपने बाएँ पैर को बिछा देते और दाएँ पैर को खड़ा रखते तथा शैतान की तरह बैठने से मना फ़रमाते। आप इस बात से भी मना करते थे कि आदमी अपने दोनों बाज़ुओं को दरिंदे की तरह बिछा दे। आप नमाज़ का अंत सलाम से करते थे।
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
"जब नमाज़ खड़ी हो जाए, तो फ़र्ज़ नमाज़ के सिवा कोई नमाज़ ही नहीं।"
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ज़ुहर से पहले की चार रकातें और फ़ज्र से पहले की दो रकातें नहीं छोड़ते थे।
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ा करते थे : "لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، اللَّهُمَّ لَا مَانِعَ لِمَا أَعْطَيْتَ، وَلَا مُعْطِيَ لِمَا مَنَعْتَ، وَلَا يَنْفَعُ ذَا الْجَدِّ مِنْكَ الْجَدُّ" (अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझेदार नहीं है। उसी का राज्य तथा उसी की प्रशंसा है। वह हर काम का सामर्थ्य रखता है। ऐ अल्लाह! तू जो कुछ दे, उसे कोई रोकने वाला नहीं और जो रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं। किसी धनवान का धन तेरे विरुद्ध उसके कुछ काम नहीं आ सकता।)
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है