Skip to content
621 हदीसें

नबवी हदीसों का विश्वकोश

परिणाम फ़िल्टर करें

621 में से 2 कार्ड

फ़िल्टर हटाएँ

हदीस का दर्जा

"क़यामत उस समय तक नहीं आएगी, जब तक सूरज अपने डूबने के स्थान से न निकले। जब सूरज अपने डूबने के स्थान से निकलेगा और लोग देखेंगे, तो सब लोग ईमान ले आएँगे। ऐसा उस समय होगा, जब : " किसी प्राणी को उसका ईमान लाभ नहीं देगा, जो पहले ईमान न लाया हो या अपने ईमान की हालत में कोई सत्कर्म न किया हो।" [सूरा अल-अनआम : 158] क़यामत इस तरह आएगी कि दो लोगों ने अपने बीच कपड़े फैला रखे होंगे, न उसकी खरीद-बिक्री कर सकेंगे और न उसे समेट सकेंगे। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी अपनी ऊँट को दूह चुका होगा, लेकिन दूध पी नहीं सकेगा। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी अपने हौज़ को ठीक कर रहा होगा, लेकिन उसका पानी पी नहीं सकेगा। क़यामत इस तरह आएगी कि आदमी निवाला मुँह तक उठा चुका होगा, लेकिन उसे खा नहीं सकेगा।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर {لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَإِنْ تُبْدُوا مَا فِي أَنْفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُمْ بِهِ اللهُ فَيَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ وَاللهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ} [البقرة: 284] आयत उतरी, तो यह बात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा पर बहुत भारी गुज़री। वे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, फिर घुटनों के बल बैठ गए और कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! हमपर ऐसे कार्यों का भार डाला गया है, जिन्हें हम कर सकते हैं; नमाज़, रोज़ा, जिहाद और सदक़ा। और आपपर यह जो आयत उतरी है, यह हमारे सामर्थ्य से बाहर है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "क्या तुम वही कहना चाहते हो, जो तुमसे पहले के दो किताबों वालों (यहूद एवं नस़ारा) ने कहा था कि हमने सुना और हमने अवज्ञा की? बल्कि कहो : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है।", उन्होंने कहा : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है। जब लोगों ने इसे पढ़ा, तो उनकी ज़बानें इस पर चल पड़ीं, अतः अल्लाह ने इसके बाद यह आयत उतारी : {آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ المَصِيرُ} [البقرة: 285]। जब उन्होंने ऐसा किया, तो अल्लाह तआला ने उसे निरस्त कर दिया, फिर यह आयत उतारी : {لَا يُكَلِّفُ اللهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلَانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الكَافِرِينَ} [البقرة: 286] कहा : "हाँ।"
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है