عربي - Arabic English Qafár af - Afar Afrikaans - Afrikanns Akan Shqip - Albanian አማርኛ - Amharic Հայերեն - Armenian অসমীয়া - Assamese Azərbaycanca - Azerbaijani Bamanankan - Bambara Bassa Bemba বাংলা - Bengali Bosanski - Bosnian Български - Bulgarian မြန်မာဘာသာ - Burmese Bisaya - Cebuano Cham Нохчий - Chechen chiCheŵa - Chewa 中文 - Chinese Адыгэбзэ - Circassian Hrvatski - Croatian Česky - Czech Dagbani Dansk - Danish فارسی دری - Dari Dendi ދިވެހި ބަސް - Dhivehi Nederlands - Dutch إستوني - Estonian Suomi - Finnish Français - French Fulfulde - Fula ქართული - Georgian Deutsch - German Ελληνικά - Greek ગુજરાતી - Gujrati Kreyòl ayisyen - Haitian Creole Hausa हिन्दी - Hindi Magyar - Hungarian Igbo Indonesia - Indonesian Italiano - Italian 日本語 - Japanese Jóola - Jola ಕನ್ನಡ - Kannada Қазақша - Kazakh ភាសាខ្មែរ - Khmer Kikuyu Ikinyarwanda - Kinyarwanda Ikirundi - Kirundi 한국어 - Korean كوردی سۆرانی - kurdish كوردي kurmancî - Kurmanji Kyrgyz ລາວ - Lao latviešu - Latvian Lingala lietuvių - Lithuanian Luganda Македонски - Macedonian Maguindanaon Malagasy - Malagasy Bahasa Melayu - Malay മലയാളം - Malayalam Mandinka मराठी - Marathi Mõõré - Moore नेपाली - Nepali أنكو - NKo Norwegian ଓଡ଼ିଆ - Odia oromoo - Oromo پښتو - Pashto فارسی - Persian Polski - Polish Portuguese ਪੰਜਾਬੀ - Punjabi Română - Romanian Русский - Russian Српски - Serbian Shona සිංහල - Sinhala Slovenščina - Slovenian Soomaaliga - Somali Soninke Sesotho - Sotho Español - Spanish Kiswahili - Swahili Svenska - Swedish Tagalog Тоҷикӣ - Tajik தமிழ் - Tamil తెలుగు - Telugu ไทย - Thai ትግረኛ - Tigrinya Türkçe - Turkish Ukrainian اردو - Urdu ئۇيغۇرچە - Uyghur Ўзбек - Uzbek Việt Nam - Vietnamese Wolof Yao Yorùbá - Yoruba Zarma زولو - Zulu
621 हदीसें
नबवी हदीसों का विश्वकोश
श्रेणियाँ
हदीस का दर्जा
जिसमें वर्णित है
रावी
जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर {لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَإِنْ تُبْدُوا مَا فِي أَنْفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُمْ بِهِ اللهُ فَيَغْفِرُ لِمَنْ يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَنْ يَشَاءُ وَاللهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ} [البقرة: 284] आयत उतरी, तो यह बात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा पर बहुत भारी गुज़री। वे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, फिर घुटनों के बल बैठ गए और कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! हमपर ऐसे कार्यों का भार डाला गया है, जिन्हें हम कर सकते हैं; नमाज़, रोज़ा, जिहाद और सदक़ा। और आपपर यह जो आयत उतरी है, यह हमारे सामर्थ्य से बाहर है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "क्या तुम वही कहना चाहते हो, जो तुमसे पहले के दो किताबों वालों (यहूद एवं नस़ारा) ने कहा था कि हमने सुना और हमने अवज्ञा की? बल्कि कहो : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है।", उन्होंने कहा : हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी क्षमा चाहते हैं और तेरी ही ओर लौटना है। जब लोगों ने इसे पढ़ा, तो उनकी ज़बानें इस पर चल पड़ीं, अतः अल्लाह ने इसके बाद यह आयत उतारी : {آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ المَصِيرُ} [البقرة: 285]। जब उन्होंने ऐसा किया, तो अल्लाह तआला ने उसे निरस्त कर दिया, फिर यह आयत उतारी : {لَا يُكَلِّفُ اللهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ} [البقرة: 286] कहा : "हाँ"। {وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلَانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الكَافِرِينَ} [البقرة: 286] कहा : "हाँ।"
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सभी हालतों में अल्लाह का ज़िक्र (गुणगान) किया करते थे।
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
जब अबू तालिब की मृत्यु का समय निकट आया, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनके पास आए। उस समय आपने उनके पास अब्दुल्लाह बिन अबू उमय्या बिन मुग़ीरा और अबू जह्ल को पाया। आपने कहा : "ऐ चचा जान, आप 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कह दें, मैं इस कलिमा को अल्लाह के पास प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करूँगा।" यह सुन अबू जह्ल और अब्दुल्लाह बिन अबू उमय्या ने कहा : क्या तुम अब्दुल मुत्तलिब का धर्म छोड़ दोगे? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बार-बार निवेदन करते रहे और दोनों रोकने के प्रयास में लगे रहे। अंततः अबू तालिब ने यही कहा कि वह अब्दुल मुत्तलिब के धर्म पर कायम हैं। इस तरह 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहने से इनकार कर दिया। वर्णनकर्ता कहते हैं : परन्तु, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तक मुझे रोका न जाए, मैं आपके लिए क्षमा माँगता रहूँगा।" चुनांचे अल्लाह ने यह आयत उतारी : {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قربى...} (नबी और ईमान लाने वालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों के लिए क्षमा की प्रपर्थना करें, यद्यपि वे नातेदार ही क्यों न होंं) [अत-तौबा : 113] तथा अबू तालिब के बारे में यह आयत उतारी : {إِنَّكَ لا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ} (तुम जिसे चाहो सुपथ पर नहीं ला सकते, किंतु अल्लाह जिसे चाहता है राह दिखाता है, और वह राह पाने वालों को भली-भाँति जानता है।) [अल-क़सस : 56]
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास था, तो एक व्यक्ति ने कहा : मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं इस्लाम के बाद हाजियों को पानी पिलाने के सिवा कोई और काम न करूँ। और दूसरे ने कहा : मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं इस्लाम के बाद सम्मानित मस्जिद (काबा) की सेवा करने के सिवा कोई और काम न करूँ। जबकि एक अन्य व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की राह में जिहाद करना तुम दोनों की कही हुई बातों से उत्तम है। तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें डाँटा और कहा : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास अपनी आवाज़ें ऊँची न करो। दरअसल वह जुमे का दिन था। लेकिन जब मैं जुमे की नमाज़ पढ़ लूँगा, तो (अंदर जाकर) आपसे उस बात के बारे में पूछूँगा जिसमें तुम लोगों ने मतभेद किया है। चुनांचे इसी संदर्भ में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने यह आयत उतारी : {क्या तुम हाजियों को पानी पिलाने और सम्मानित मस्जिद की सेवा को, उसके (ईमान के) बराबर समझते हो, जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया।} [सूरा तौबा : 19] आयत के अंत तक।
स़ह़ीह़ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है
"जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।"
स़ह़ीह़ इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है